(5) क्या इसमें किसी अक़्ल रखनेवाले के लिए कोई क़सम है?1
1. इन आयतों की तफ़सीर में क़ुरआन की तफ़सीर लिखनेवाले आलिमों के बीच बहुत इख़्तिलाफ़ हुआ है, यहाँ तक कि ‘जुफ़्त और ताक़’ (सम-विषम) के बारे में तो 36 रायें (क़ौल) मिलती हैं। कुछ रिवायतों में इनकी तफ़सीर अल्लाह के रसूल (सल्ल०) से भी जोड़ी गई है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि कोई तफ़सीर नबी (सल्ल०) से साबित नहीं है, वरना मुमकिन न था कि सहाबा और ताबिईन और बाद के तफ़सीर लिखनेवाले आलिमों में से कोई भी आप (सल्ल०) की तफ़सीर के बाद ख़ुद इन आयतों का मतलब तय करने की जुरअत करता।
अन्दाज़े-बयान पर ग़ौर करने से साफ़ महसूस होता है कि पहले से कोई बहस चल रही थी जिसमें अल्लाह के रसूल (सल्ल०) एक बात पेश कर रहे थे और इनकार करनेवाले उसका इनकार कर रहे थे। इसपर नबी (सल्ल०) की बात को सही साबित करते हुए कहा गया कि क़सम है फ़ुलाँ और फ़ुलाँ चीज़ों की। मतलब यह था कि इन चीज़ों की क़सम, जो कुछ मुहम्मद कह रहे हैं वह सच है। फिर बात को इस सवाल पर ख़त्म कर दिया गया कि क्या किसी अक़्लमन्द के लिए इसमें कोई क़सम है? यानी क्या इस हक़ बात पर गवाही देने के लिए इसके बाद किसी और क़सम की ज़रूरत बाक़ी रह जाती है? क्या यह क़सम इसके लिए काफ़ी नहीं है कि एक होशमन्द इनसान उस बात को मान ले जिसे मुहम्मद (सल्ल०) पेश कर रहे हैं?
अब सवाल यह है कि वह बहस क्या थी जिसपर इन चार चीज़ों की क़सम खाई गई। इसके लिए हमें उस पूरी बात पर ग़ौर करना होगा जो बाद की आयतों में “तुमने देखा नहीं कि तुम्हारे रब ने आद के साथ क्या किया” से शुरू होकर सूरा के आख़िर तक चलती है। उससे मालूम हो जाता है कि बहस इनाम और सज़ा के बारे में थी, जिसको मानने से मक्कावाले इनकार कर रहे थे और अल्लाह के रसूल (सल्ल०) उन्हें लगातार तबलीग़ और नसीहत कर रहे थे कि वे इस सच्चाई को मान लें। इसपर फ़ज्र, और दस रातों और जुफ़्त और ताक़ (सम-विषम), और विदा होती हुई रात की क़सम खाकर कहा गया कि इस बात को मान लेने के लिए क्या ये चार चीज़ें काफ़ी नहीं हैं कि किसी अक़्लमन्द आदमी के सामने और कोई चीज़ पेश करने की ज़रूरत हो?
इन क़समों का यह मौक़ा-महल तय हो जाने के बाद लाज़िमी तौर पर हमें इनमें से हर एक के वह मानी लेने होंगे जो बाद के मज़मून को साबित करते हों। सबसे पहले कहा गया, “फ़ज्र की क़सम!” फ़ज्र पौ फटने को कहते हैं, यानी वह वक़्त जब रात के अंधेरे में से दिन की इबतिदाई रौशनी पूरब की तरफ़ एक सफ़ेद धारी की शक्ल में नमूदार होती है। फिर कहा, “दस रातों की क़सम“। बात के सिलसिले को निगाह में रखा जाए तो मालूम होता है कि इससे मुराद महीने की तीस रातों में से हर दस रातें हैं। पहली दस रातें वे जिनमें चाँद एक बारीक नाख़ून की शक्ल से शुरू होकर हर रात को बढ़ता रहता है, यहाँ तक कि आधे से ज़्यादा रौशन हो जाता है। दूसरी दस रातें वे जिनमें रात का बड़ा हिस्सा चाँद से रौशन रहता है। आख़िरी दस रातें वे जिनमें चाँद छोटे-से-छोटा और रात का ज़्यादातर हिस्सा अंधेरे-से-अंधेरा होता चला जाता है, यहाँ तक कि महीने के ख़ातिमे पर पूरी रात अंधेरी हो जाती है। इसके बाद फ़रमाया, “जुफ़्त और ताक़ की क़सम!” जुफ़्त उस अदद (संख्या) को कहते हैं जो दो बराबर के हिस्सों में बँट जाता है, जैसे 2, 4, 6, 8, और ताक़ (विषम) उस अदद को कहते हैं जो दो बराबर हिस्सों में बंट नहीं सकता, जैसे 1, 3, 5, 7। आम हैसियत से देखा जाए तो उससे मुराद कायनात की तमाम चीज़ें हो सकती हैं। क्योंकि हर चीज़ या तो जोड़ा-जोड़ा है या अकेला। लेकिन चूँकि यहाँ बात दिन और रात की हो रही है, इसलिए मज़मून के सिलसिले के जोड़ से जुफ़्त और ताक़ का मतलब दिनों का बदलना है कि महीने की तारीख़ें एक से दो और दो से तीन होती जाती हैं और हर तब्दीली एक नई कैफ़ियत लेकर आती है। आख़िर में फ़रमाया, “रात की क़सम, जबकि वह विदा हो रही हो!” यानी वह अंधेरा जो सूरज की डूबने के बाद से दुनिया पर छाया हुआ था, ख़त्म होने पर आ लगा हो और पौ फटनेवाली हो।
अब इन चारों चीज़ों पर एक साथ निगाह डालिए जिनकी क़सम इस बात पर खाई गई है कि मुहम्मद (सल्ल०) इनाम और सज़ा की जो ख़बर दे रहे हैं वह सच है। ये सब चीज़ें इस हक़ीक़त की दलील दे रही हैं कि क़ुदरत रखनेवाला एक रब इस कायनात पर हुकूमत कर रहा है, और वह जो काम भी कर रहा है बेतुका, बे-मक़सद, हिकमत और मस्लहत से ख़ाली होकर नहीं कर रहा है, बल्कि उसके हर काम में साफ़ तौर से एक हिकमत भरी स्कीम काम कर रही है। उसकी दुनिया में तुम यह कभी न देखोगे कि अभी रात है और यकायक सूरज आधे दिन पर आ खड़ा हो। या एक दिन चाँद पहली तारीख़ के चाँद की शक्ल में निकला हो और दूसरे दिन 14 वीं रात का पूरा चाँद नमूदार हो जाए। या रात आई हो तो किसी तरह उसके ख़त्म होने की नौबत ही न आए और वह मुस्तक़िल तौर से ठहरकर रह जाए। या दिनों के आने-जाने का सिरे से कोई बाक़यदा सिलसिला ही न हो कि आदमी तारीख़ों का कोई हिसाब रख सके और यह जान सके कि यह कौन-सा महीना है, उसकी कौन-सी तारीख़ है, किस तारीख़ से उसका कौन-सा काम शुरू और कब ख़त्म होना है, गर्मी के मौसम की तारीख़ें कौन-सी हैं और बरसात या सर्दी के मौसम की तारीख़ें कौन-सी। कायनात की दूसरी अनगिनत चीज़ों को छोड़कर अगर आदमी रात-दिन की इस बाक़ायदगी ही को आँखें खोलकर देखे और कुछ दिमाग़ को सोचने की तकलीफ़ भी दे तो उसे इस बात की गवाही मिलेगी कि यह ज़बरदस्त नज़्म और डिसिप्लिन (अनुशासन) किसी हस्ती का ही क़ायम किया हुआ है जो हर काम पर क़ुदरत रखती है। और इसके क़ायम होने से उस मख़लूक़ (इनसान और जानवर) की अनगिनत मस्लहतें जुड़ी हुई हैं जिसे उसने इस ज़मीन पर पैदा किया है। अब अगर ऐसे हिकमतवाले, अक़्लमन्द, क़ुदरतवाले और ताक़तवर ख़ालिक़ (पैदा करनेवाले) की दुनिया में रहनेवाला कोई शख़्स आख़िरत के इनाम और सज़ा का इनकार करता है तो वह दो बेवक़ूफ़ियों में से किसी एक बेवक़ूफ़ी में यक़ीनन मुब्तला है। या तो वह उसकी क़ुदरत का इनकारी है और यह समझता है कि वह इस कायनात को ऐसे बेमिसाल बन्दोबस्त और इन्तिज़ाम के साथ पैदा कर देने की क़ुदरत तो रखता है, मगर इनसान को दोबारा पैदा करके उसे इनाम और सज़ा देने की क़ुदरत नहीं रखता। या वह उसकी हिकमत और अक़्लमन्दी का इनकार करता है और उसके बारे में यह समझ बैठा है कि उसने दुनिया में इनसान को अक़्ल और इख़्तियार देकर पैदा तो कर दिया मगर वह न तो उससे कभी यह हिसाब लेगा कि उसने अपनी अक़्ल और अपने इख़्तियारात से काम क्या लिया, और न अच्छे काम का इनाम देगा, न बुरे काम की सज़ा। इन दोनों बातों में जिस बात को भी कोई शख़्स मानता है वह परले दर्जे का बेवक़ूफ़ है।