بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم अल्लाह के नाम पर, जिसका नाम पृथ्वी या आसमान में कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचाता है, और वह सुनने वाला, जानने वाला है

November 29,2022

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इस्लामी सभ्यता और उसके मूल एवं सिद्धांत

मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी सभ्यता के बहस का फ़ैसला करने के लिए सबसे पहले इस सवाल को सुलझाना ज़रूरी है कि सभ्यता किसे कहते हैं? लोग समझते हैं कि किसी क़ौम की सभ्यता नाम है उसके आचार-विचार, ज्ञान-विज्ञान, शिल्प-कला, शिष्टाचार और संस्कृति, और सामाजिक एवं राजनीतिक शैली का। लेकिन वास्तव में, ये स्वयं सभ्यता नहीं हैं, बल्कि ये सभ्यता के परिणाम और उसकी अभिव्यक्तियां हैं। ये सभ्यता का मूल नहीं, उसकी शाखाएं और पत्तियां हैं। किसी सभ्यता का मूल्य निर्धारण इन बाहरी दिखावे और प्रदर्शन के आधार पर नहीं किया जा सकता है। इन सब को छोड़कर हमें उसकी रूह तक पहुंचना चाहिए और इसकी बुनियाद की जांच करनी चाहिए। इस दृष्टि से किसी सभ्यता में पहली चीज़ जो खोजी जानी चाहिए, वह है सांसारिक जीवन के बारे में उसकी अवधारणा। वह मनुष्य को इस संसार में क्या स्थान देती है? उसकी नज़र में दुनिया क्या है? मनुष्य का इस संसार से क्या संबंध है? और अगर मनुष्य इस दुनिया को बरते तो क्या समझ कर बरते?

क़ुरआन प्रबोधन - 12: पवित्र क़ुरआन की शिक्षा : आधुनिक समय की अपेक्षाएँ

एक दृष्टि से पवित्र क़ुरआन के दर्स (प्रवचन) की ज़रूरतें और अपेक्षाएँ हर दौर में समान रही हैं। मुसलमानों के इतिहास का कोई दौर ऐसा नहीं गुज़रा जिसमें उन्हें दर्से-क़ुरआन की ज़रूरत न रही हो, और इसकी अपेक्षाओं और ज़रूरत पर चर्चा न हुई हो। इस्लाम की आरंभिक बारह-तेरह शताब्दियों में कोई शताब्दी ऐसी नहीं गुज़री जब मुसलमानों की शिक्षा-व्यवस्था और उनके प्रशिक्षण-व्यवस्था में पवित्र क़ुरआन को मौलिक और आधारभूत महत्त्व प्राप्त न रहा हो। फिर विभिन्न कालों, विभिन्न ज़मानों और विभिन्न इलाक़ों में मुसलमानों के ज़ेहन में जो सवाल वह्य और नुबूवत (पैग़म्बरी) के बारे में पैदा होते रहे हैं, वे कमो-बेश हर दौर में समान रहे हैं। बल्कि वह्य, नुबूवत (पैग़म्बरी) और मरने के बाद की ज़िन्दगी जैसी मौलिक अवधारणाओं (अक़ीदों) के बारे में नास्तिक जिन सन्देहों एवं आपत्तियों को व्यक्त करते रहे हैं उनकी हक़ीक़त भी हर दौर में कमो-बेश एक जैसी ही रही है।

क़ुरआन प्रबोधन - 11: पवित्र क़ुरआन का विषय और महत्त्वपूर्ण वार्त्ताएँ

डॉ० महमूद अहमद ग़ाज़ी इस चर्चा का विषय है पवित्र क़ुरआन का मूल विषय और इसकी महत्त्वपूर्ण वार्त्ताएँ। पवित्र क़ुरआन की महत्त्वपूर्ण वार्त्ताओं पर चर्चा करने के लिए ज़रूरी है कि पहले यह देखा जाए कि पवित्र क़ुरआन का अस्ल और मूल विषय क्या है। यह देखना इसलिए ज़रूरी है कि दुनिया की हर किताब का कोई न कोई विषय होता है, जिससे वह मूल रूप से बहस करती है। शेष बहसों के बारे में इस किताब में चर्चा या तो सन्दर्भगत होती है या केवल उस हद तक उन विषयों पर चर्चा की जाती है जिस हद तक उनका संबंध किताब के मूल विषय से होता है। अतः यह सवाल स्वाभाविक रूप से पैदा होता है कि पवित्र क़ुरआन का मूल विषय क्या है।

क़ुरआन प्रबोधन - 10: नज़्मे-क़ुरआन और क़ुरआन की शैली

डॉ० महमूद अहमद ग़ाज़ी नज़्मे-क़ुरआन (क़ुरआन का व्यवस्थीकरण) वह चीज़ है जिसने सबसे पहले अरब के बहुदेववादियों और मक्का के इस्लाम-विरोधियों को क़ुरआन मजीद के आरंभ से परिचित कराया और जिसको सबसे पहले अरब के बड़े-बड़े साहित्यकारों, भाषणकर्ताओं और भाषाविदों ने महसूस किया, जिसने अरबों के उच्च कोटि वर्गों से यह बात मनवाई कि पवित्र क़ुरआन की वर्णन शैली एक अलग प्रकार की वर्णन शैली है। यह वह शैली है जिसका उदाहरण न अरबी शायरी में मिलता है, न भाषण कला में, न कहानत में और न किसी और ऐसे कलाम में जिससे अरबवासी इस्लाम से पहले परिचित रहे होँ। पवित्र क़ुरआन में शेअर की मधुरता और संगीतगुण भी है, भाषण कला का ज़ोरे-बयान भी है, वाक्यों का संक्षिप्त रूप भी है। इस में सारगर्भिता भी पाई जाती है और अर्थों की गहराई भी, इसमें तथ्य एवं ब्रह्मज्ञान की गहराई भी है और तत्त्वदर्शिता एवं बुद्धिमत्ता भी। इस किताब में तर्क और प्रमाणों का प्रकाश और तार्किकता का नयापन और शक्ति भी उच्च कोटि की पाई जाती है, और इन सब चीज़ों के साथ-साथ यह कलाम भाषा की उत्कृष्टता एवं वाग्मिता के उच्चतम स्तर पर भी आसीन है।

क़ुरआन प्रबोधन - 9: उलूमुल-क़ुरआन (क़ुरआन से संबंधित ज्ञान)

डॉ० महमूद अहमद ग़ाज़ी उलूमुल-क़ुरआन के अन्तर्गत वे सारे ज्ञान-विज्ञान आते हैं जो इस्लामी विद्वानों, क़ुरआन के टीकाकारों और समाज के चिन्तकों ने पिछले चौदह सौ वर्षों के दौरान में पवित्र क़ुरआन के हवाले से संकलित किए हैं। एक दृष्टि से इस्लामी ज्ञान एवं कलाओं का पूरा भंडार पवित्र क़ुरआन की तफ़सीर (टीका) से भरा पड़ा है। आज से कमो-बेश एक हज़ार वर्ष पहले क़ुरआन के प्रसिद्ध टीकाकार और फ़क़ीह (धर्मशास्त्री) क़ाज़ी अबू-बक्र इब्नुल-अरबी ने लिखा था कि मुसलमानों के जितने ज्ञान एवं कलाएँ हैं, जिनका उन्होंने उस वक़्त अनुमान सात सौ के क़रीब लगाया था, वे सब के सब अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से हदीस की व्याख्या हैं, और हदीस पवित्र क़ुरआन की व्याख्या है। इस दृष्टि से मुसलमानों के सारे ज्ञान एवं कलाएँ उलूमुल-क़ुरआन की हैसियत रखते हैं।

क़ुरआन प्रबोधन - 8: क़ुरआन के चमत्कारी गुण

डॉ० महमूद अहमद ग़ाज़ी पवित्र क़ुरआन के हवाले से एजाज़ुल-क़ुरआन (क़ुरआन के चमत्कारी गुण) एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय है। पवित्र क़ुरआन की महानता को समझने और इसकी श्रेष्ठता का अनुमान करने के लिए इसकी चमत्कारी प्रकृति को समझना अत्य़ंत अनिवार्य है। क़ुरआन के चमत्कारी गुणों पर चर्चा करते हुए उसके दो विशिष्ट पहलू हमारे सामने आते हैं। एक पहलू तो इल्मे-एजाज़ुल-क़ुरआन (क़ुरआन की चमत्कारी प्रकृति का ज्ञान) के आरंभ एवं विकास तथा इतिहास का है। यानी एजाज़ुल-क़ुरआन एक ज्ञान और तफ़सीर तथा उलूमे-क़ुरआन (क़ुरआन संबंधी ज्ञान) के एक विभाग के तौर पर किस प्रकार संकलित हुआ और किन-किन विद्वानों ने किन-किन पहलुओं को पवित्र क़ुरआन का चमत्कारी पहलू क़रार दिया। दूसरा पहलू यह है कि पवित्र क़ुरआन जिसको नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी पैग़म्बरी और सच्चाई के प्रमाण तथा प्रतीक के रूप में पेश किया, किस दृष्टि से आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सत्यता का प्रमाण और किस पहलू से आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पैग़म्बरी का प्रतीक और चमत्कार है। फिर दूसरे पैग़म्बरों (अलैहिमुस्सलाम) के चमत्कारों के सन्दर्भ में क़ुरआन के चमत्कार की हैसियत क्या है।

क़ुरआन प्रबोधन - 7: क़ुरआन के टीकाकारों की टीका-शैलियाँ

डॉ० महमूद अहमद ग़ाज़ी टीका-शैलियों से अभिप्रेत वह ढंग और विधि है जिसके अनुसार किसी टीकाकार ने पवित्र क़ुरआन की तफ़सीर या टीका की हो, या उस कार्य-विधि के अनुसार पवित्र क़ुरआन की टीका को संकलित करने का इरादा किया है। हम सब का ईमान (विश्वास) है कि पवित्र क़ुरआन रहती दुनिया तक के लिए है, और दुनिया के हर इंसान के लिए मार्गदर्शन उपलब्ध करता है। इस अस्थायी सांसारिक जीवन में इंसानों को अच्छा इंसान बनाने में जिन-जिन पहलुओं के बारे में कल्पना की जा सकती है, उन सब के बारे में पवित्र क़ुरआन मार्गदर्शन उपलब्ध करता है। पवित्र क़ुरआन एक व्यापारी के लिए भी मार्गदर्शक किताब है, एक शिक्षक के लिए भी मार्गदर्शक किताब है, एक दार्शनिक, अर्थशास्त्री और क़ानून-विशेषज्ञ के लिए भी मौलिक सिद्धांत उपलब्ध करता है। कहने का तात्पर्य यह कि ज़िंदगी का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जिसका संबंध इंसान को बेहतर इंसान बनाने से हो और उसके बारे में पवित्र क़ुरआन मार्गदर्शन न उपलब्ध करता हो।

क़ुरआन प्रबोधन - 6: इस्लामी इतिहास में क़ुरआन के कुछ बड़े टीकाकार

डॉ० महमूद अहमद ग़ाज़ी मुफ़स्सिरीने-क़ुरआन (क़ुरआन के टीकाकारों) पर चर्चा की ज़रूरत दो कारणों से महसूस होती है। पहला कारण तो यह है कि तफ़सीरी अदब (टीका संबंधी साहित्य) में जिस प्रकार से और जिस तेज़ी के साथ व्यापकता पैदा हुई उसके परिणामस्वरूप बहुत-सी तफ़सीरें (टीकाएँ) लिखी गईं। पूरे पवित्र क़ुरआन की विधिवत तथा पूरी टीका के अलावा भी टीका संबंधी विषयों पर सम्मिलित बहुत-सी किताबें तैयार हुईं और आए दिन तैयार हो रही हैं। उनमें से कुछ तफ़सीरों में ऐसी चीज़ें भी शामिल हो गई हैं जो सही इस्लामी विचारधारा को प्रस्तुत नहीं करती हैं। पवित्र क़ुरआन के विद्यार्थियों को उन तमाम प्रवृत्तियों और शैलियों से अवगत और सचेत रहना चाहिए। इसलिए उचित महसूस होता है कि कुछ ऐसे नामवर, विश्वसनीय और प्रवृत्ति बनानेवाले मुफ़स्सिरीने-क़ुरआन (क़ुरआन के टीकाकारों) का उल्लेख किया जाए जो तफ़सीर के पूरे भंडार में प्रमुख और अद्भुत स्थान भी रखते हैं और इस्लामी सोच का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, ये वे दूरदर्शी और बड़े मुफ़स्सिरीने-क़ुरआन हैं, जिन्होंने पवित्र क़ुरआन के उलूम (विद्याओं) के प्रचार-प्रसार में अत्यंत लाभकारी और सृजनात्मक भूमिका निभाई है, जिनके काम के प्रभाव, परिणाम तथा फल आज पूरी दुनिया के सामने हैं, और जिनकी निष्ठा और काम की उपयोगिता से आज पवित्र क़ुरआन के अर्थ और भावार्थ अपने मूल रूप में हम तक पहुँचे हैं और हमारे पास मौजूद हैं।

क़ुरआन प्रबोधन - 5: इल्मे-तफ़सीर : एक परिचय

डॉ० महमूद अहमद ग़ाज़ी पवित्र क़ुरआन से मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए ज़रूरी है कि इसको समझने और लागू करने में उन नियमों एवं सिद्धांतों का पालन किया जाए जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के ज़माने से क़ुरआन की व्याख्या एवं टीका के लिए बरते जा रहे हैं। प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के सामूहिक व्यवहार और मुस्लिम समाज के सामूहिक रवैये, व्यवहार और क़ुरआन की समझ के अनुसार क़ुरआन की तफ़सीर (टीका) के लिए ऐसे ऐसे विस्तृत नियम एवं सिद्धांत तय पा गए हैं जिनका पालन पहले दिन से आज तक किया जा रहा है। इन सिद्धांतों का एकमात्र उद्देश्य यह है कि जिस तरह अल्लाह की किताब (क़ुरआन) का टेक्स्ट सुरक्षित रहा, उसकी भाषा सुरक्षित रही, उसी तरह उसके अर्थ भी हर प्रकार के फेर-बदल और सन्देहों से सुरक्षित रहें, और इस बात का सन्तोष रहे कि कोई व्यक्ति नेक नीयती या बदनीयती से इस किताब की व्याख्या एवं टीका निर्धारित सिद्धांतों से हटकर मन-माने ढंग से न करने लगे।

क़ुरआन प्रबोधन - 4: पवित्र क़ुरआन का संकलन एवं क्रमबद्धता

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने पवित्र क़ुरआन को सुतूर (पंक्तियों) में भी इकट्ठा करवा दिया और लिखवाकर सुरक्षित करा दिया, और सुदूर (सीनों) में भी जमा करवा दिया। और लाखों सीनों को क़ुरआन के प्रकाश की कैंडिलों से रौशन कर दिया। पवित्र क़ुरआन के दौर में सुरक्षित होने का इशारा ख़ुद क़ुरआन मजीद में भी मौजूद है। “ये तो पवित्र क़ुरआन की वे स्पष्ट आयतें हैं जो इल्मवालों के सीनों में सुरक्षित हैं।” (क़ुरआन, 29:69) यह बात कि पवित्र क़ुरआन के विभिन्न अंश अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अलग-अलग लिखवाकर मुसलमानों को प्रदान कर दिए थे, पवित्र क़ुरआन में भी बयान हुई है। “ये अल्लाह के वह रसूल हैं जो पाकीज़ा सहीफ़े (पुस्तिकाएँ) पढ़कर सुनाते हैं, इन पाकीज़ा सहीफ़ों में क़ीमती लेख्य लिखे हए हैं।” मानो ऐसी छोटी-छोटी किताबें और तहरीरें आम तौर उपलब्ध थीं, जिनमें अल्लाह की किताब की आयतें और सूरतें लिखी हुई मौजूद थीं, जिनकी तरफ़ पवित्र क़ुरआन की इस आयत में इशारा किया गया है।