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फ़िलिस्तीनी संघर्ष ने इसराईल के घिनौने चेहरे को बेनक़ाब कर दिया

सय्यद सआदतुल्लाह हुसैनी (अमीरे जमाअत इस्लामी हिन्द) यह फ़िलिस्तीनी संधर्ष ही है जिसने नई पश्चिमी सत्ता के चेहरे से मानवाधिकार, स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र का लुभावना और सुन्दर मुखौटा उतार फेंका है और अंदर से उसी वंशवादी, क्रूर और ख़ूँख़ार दानव को नंगा करके दुनिया के सामने ला खड़ा किया है जो सोलहवीं सदी से बीसवीं सदी तक इस दुनिया को अपने ख़ूनी पंजों से लहू-लुहान करता रहा, लाखों इन्सानों को ग़ुलाम बनाकर बेचता रहा और जिसने सारी दुनिया पर क़ब्ज़ा करके संसाधनों की लूट मचा रखी थी। फ़िलिस्तीनी संधर्ष ने दुनिया पर स्पष्ट कर दिया है कि नई पश्चिमी सत्ता नैतिक संवेदनशीलता से ख़ाली एक पाश्विक अस्तित्व है जिसका कोई मज़बूत सांस्कृतिक आधार नहीं है। स्वतंत्रता और लोकतंत्र के ऊंचे दावों के शोर में दबा हुआ उस के दिल का यह चोर फ़िलिस्तीनी संधर्ष ने पकड़ कर दुनिया के सामने पेश कर दिया है कि इस सत्ता के लिए एशियाई और अफ़्रीक़ी जनता आज भी उस की प्रजा और ग़ुलाम है और उनकी ज़मीनों और संसाधनों को वह अपना ऐसा स्वामित्व समझता है कि उसे वह जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकता है। मौलाना अली मियां नदवी ने वर्षों पहले सचेत किया था:

इसराईली राज्य अपनी आख़िरी सांसें ले रहा है

आरी शाबित एक यहूदी स्कॉलर और राजनीतिक समीक्षक ऐसा लगता है कि हमारा सामना इतिहास के सबसे ज़्यादा भड़के हुए लोगों से पड़ गया है और अब फ़िलिस्तीनियों की ज़मीन पर उनका ही हक़ माने बिना कोई चारा नहीं है। मेरा ख़याल है कि हम बंद गली में दाख़िल हो चुके हैं और अब इसराईलियों के लिए फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर क़ब्ज़े को बनाए रखना, बाहर से आए यहूदियों को बसाना और अम्न बहाल करना मुम्किन नहीं रहा। इसी तरह ज़ायोनिज़्म में नयापन लाने का आंदोलन, लोकतंत्र का बचाव और राज्य में आबादी का फैलाव भी अब और नहीं चल पाएंगे। इन हालात में इस मुल्क में रहने का कोई मज़ा बाक़ी नहीं रहा और इसी तरह “डेली हारेट्ज़’’ में लिखना भी बदमज़ा हो गया है और “डेली हारेट्ज़’’ के पढ़ने में भी अब कोई आकर्षण बचा नहीं रहा। अब हमें वही करना पड़ेगा जो दो वर्ष पहले “रोगील अलफ़ार’’ ने किया था और वह यह देश छोड़कर बाहर चले गये थे ।

वर्तमान स्थिति की समीक्षा

हसीब असग़र 7 अक्टूबर, 2023 को ग़ज़्ज़ा से इसराईल पर हुए ऐतिहासिक हमलों ने इसराईली सेना की प्रतिष्ठा और उसकी ख़ुफ़िया क्षमताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा झटका दिया है, जिसकी भरपाई शायद दशकों तक नहीं हो सकेगी। इसराईल का आतंक, उसकी परमाणु शक्ति, उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद की क्षमताएं और उसकी निरोधक क्षमता सब शून्य हो गई है। जिन टैंकों के बारे में मीडिया हथियार कंपनियों का दलाल बनकर यह दावा करता रहा है, कि इन्हें किसी भी तरह नुक़सान नहीं पहुंचाया जा सकता, उसे फ़िलिस्तीनी मुजाहिद इस तरह भस्म कर देते हैं मानो वह बच्चे का कोई खिलौना हो। इस स्थिति ने इसराईली बलों में हड़कंप मचा कर रख दी है।

यहूदियों की योजना

बैतुल-मक़दिस और फ़िलिस्तीन के संबंध में आपको यह मालूम होना चाहिए कि ईसा से लगभग तेरह सौ वर्ष पूर्व इस्राइलियों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया था और दो शताब्दियों के निरंतर संघर्ष के बाद अंततः उस पर कब्ज़ा कर लिया। वे इस भूमि के मूल निवासी नहीं थे। प्राचीन निवासी अन्य लोग थे जिनकी जनजातियों और क़ौमों के नाम बाइबिल में ही विस्तार से वर्णित हैं, और बाइबिल से ही हमें पता चलता है कि इस्राइलियों ने इन लोगों का नरसंहार करके उस भूमि पर उसी प्रकार क़ब्ज़ा कर लिया जिस तरह फिरंगियों ने रेड-इंडियन को नष्ट करके अमेरिका पर क़ब्ज़ा कर लिया। उनका दावा था कि ईश्वर ने यह देश उन्हें विरासत में दे दिया है। इसलिए, उन्हें इसके मूल निवासियों को विस्थापित करके, बल्कि उनकी नस्ल को खत्म करके उस पर कब्ज़ा करने का अधिकार है।

तूफ़ान अल-अक़सा : ऐतिहासिक संदर्भ

डॉ. सलीम ख़ान फ़िलिस्तीन की जनता को इसराईल ने पिछले 75 वर्षों से ग़ुलाम बना रखा है। आज की विकसित दुनिया की नज़र के सामने फ़िलिस्तीनियों के सारे मानवाधिकार एक-एक करके छीन लिए गए और उन्हें लगातार दमन और अत्याचार का निशाना बनाया जा रहा है। फ़िलिस्तीनियों से उनका पूरा देश ख़ाली करा लिया गया है और पूरी आबादी को एक पट्टीनुमा इलाक़े में दीवारों के अंदर क़ैद कर दिया गया है। दुनिया की इस सबसे बड़ी खुली जेल में भी फ़िलिस्तीन के लोग सुरक्षित नहीं हैं। इसराईली सेना जब चाहे उन पर बमबारी करती है और जब चाहे उनके घरों पर बुलडोज़र चला देती है। साधनहीनता की स्थिति में फ़िलिस्तीनी ग़ुलेल और पत्थरों से मिसाइलों और टैंकों का मुक़ाबला करते हैं और विडम्बना यह है कि इसपर भी क्रूर दुनिया उन्हें आतंकवादी कहती है।

इस्लाम में जिहाद: क्या और क्यों?

आधुनिक काल में यूरोप ने अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्लाम पर जो निराधार आरोप लगाए हैं, उनमें सबसे बड़ा आरोप यह है कि इस्लाम एक रक्तपिपासु धर्म है और अपने अनुयायियों को रक्तपात सिखाता है। इस आरोप में अगर कुछ सच्चाई होती, तो स्वभाविक रूप से यह आरोप उस समय लगाया जाता, जब इस्लाम की पाषाणभेदी तलवार ने इस धरती पर तहलका मचा रखा था, और वास्तव में दुनिया को यह संदेह हो सकता था कि उनकी ये विजयी कार्रवाइयां किसी ख़ूनी शिक्षा का परिणाम हों। लेकिन अजीब बात है कि इस बदनामी का जन्म इस्लाम के विकास के सूरज के डूब जाने के लम्बे समय बाद हुआ। इसके काल्पनिक साँचे में उस समय जान फूँकी गई जब इस्लाम की तलवार तो ज़ंग खा चुकी थी, मगर ख़ुद इस आरोप के लेखक, यूरोप की तलवार निर्दोषों के ख़ून से लाल हो रही थी और उसने दुनिया के कमज़ोर देशों को इस तरह निगलना शुरू कर दिया था, जैसे कोई अजगर छोटे-छोटे जानवरों को डसता और निगलता है।

इस्लामी सभ्यता और उसके मूल एवं सिद्धांत

पश्चिमी लेखकों और उनके प्रभाव से पूर्वी विद्वानों का एक बड़ा समूह भी यह राय रखता है कि इस्लाम की सभ्यता अपनी पूर्ववर्ती सभ्यताओं, विशेष रूप से ग्रीक और रोमन सभ्यताओं से ली गई है, और वह एक अलग सभ्यता केवल इस आधार पर बन गई है कि अरबी मानसिकता ने उस पुरानी सामग्री को नई शैली में ढालकर उसका रूप बदल दिया है। यही वह सिद्धांत है जिसके आधार पर ये लोग इस्लामी सभ्यता के तत्वों को ईरानी, बेबीलोनियाई, सीरियाई, फोनीशियन, मिस्री, ग्रीक और रोमन सभ्यताओं में तलाश करते हैं और फिर अरबी लक्षणों में उस मानसिक कारक का पता लगाते हैं जिसने उन सभ्यताओं से अपने ढब का मसाला लेकर उसे अपने ढंग से तैयार किया। लेकिन यह एक बड़ी ग़लत धारणा है।

पवित्र क़ुरआन की शिक्षा : आधुनिक समय की अपेक्षाएँ (क़ुरआन लेक्चर -12)

एक दृष्टि से पवित्र क़ुरआन के दर्स (प्रवचन) की ज़रूरतें और अपेक्षाएँ हर दौर में समान रही हैं। मुसलमानों के इतिहास का कोई दौर ऐसा नहीं गुज़रा जिसमें उन्हें दर्से-क़ुरआन की ज़रूरत न रही हो, और इसकी अपेक्षाओं और ज़रूरत पर चर्चा न हुई हो। इस्लाम की आरंभिक बारह-तेरह शताब्दियों में कोई शताब्दी ऐसी नहीं गुज़री जब मुसलमानों की शिक्षा-व्यवस्था और उनके प्रशिक्षण-व्यवस्था में पवित्र क़ुरआन को मौलिक और आधारभूत महत्त्व प्राप्त न रहा हो। फिर विभिन्न कालों, विभिन्न ज़मानों और विभिन्न इलाक़ों में मुसलमानों के ज़ेहन में जो सवाल वह्य और नुबूवत (पैग़म्बरी) के बारे में पैदा होते रहे हैं, वे कमो-बेश हर दौर में समान रहे हैं। बल्कि वह्य, नुबूवत (पैग़म्बरी) और मरने के बाद की ज़िन्दगी जैसी मौलिक अवधारणाओं (अक़ीदों) के बारे में नास्तिक जिन सन्देहों एवं आपत्तियों को व्यक्त करते रहे हैं उनकी हक़ीक़त भी हर दौर में कमो-बेश एक जैसी ही रही है। नूह (अलैहिस्सलाम) के ज़माने से लेकर अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के शुभ दौर तक पवित्र क़ुरआन ने विभिन्न लोगों और विभिन्न व्यक्तित्वों का उल्लेख किया है। और उन व्यक्तित्वों के समकालीन लोगों और उनके ज़माने में प्रचलित विचारों और असत्य धारणाओं का खंडन भी किया है। यह ग़लत विचार और असत्य धारणाएँ (अक़ीदे) लगभग एक जैसी ही हैं।

पवित्र क़ुरआन का विषय और महत्त्वपूर्ण वार्त्ताएँ (क़ुरआन लेक्चर - 11)

आज की चर्चा का विषय है पवित्र क़ुरआन का मूल विषय और इसकी महत्त्वपूर्ण वार्त्ताएँ। पवित्र क़ुरआन की महत्त्वपूर्ण वार्त्ताओं पर चर्चा करने के लिए ज़रूरी है कि पहले यह देखा जाए कि पवित्र क़ुरआन का अस्ल और मूल विषय क्या है। यह देखना इसलिए ज़रूरी है कि दुनिया की हर किताब का कोई न कोई विषय होता है, जिससे वह मूल रूप से बहस करती है। शेष बहसों के बारे में इस किताब में चर्चा या तो सन्दर्भगत होती है या केवल उस हद तक उन विषयों पर चर्चा की जाती है जिस हद तक उनका संबंध किताब के मूल विषय से होता है। अतः यह सवाल स्वाभाविक रूप से पैदा होता है कि पवित्र क़ुरआन का मूल विषय क्या है। अगर क़ुरआन के मूल विषय का निर्धारण करने के लिए उसके अन्दर लिखी बातों को देखा जाए तो महसूस होता है कि पवित्र क़ुरआन में दार्शनिकता से भरपूर बहसें भी हैं। तो क्या पवित्र क़ुरआन को दर्शन की किताब कहा जा सकता है? जिन सवालों से दर्शन बहस करता है कि इंसान का आरंभ किया है, यह आरंभ क्यों और कैसे हुआ, आदम और आदमियत (मानवता) की वास्तविकता क्या है, अस्तित्व किसे कहते हैं, अस्तित्व का प्रकट चीज़ों से क्या संबंध है, ये वे चीज़ें हैं जिनके बारे में दर्शन-शास्त्र में सवाल उठाए जाते रहे हैं। पवित्र क़ुरआन के एक सरसरी अध्ययन से अनुमान हो जाता है कि इन सवालों का जवाब पवित्र क़ुरआन ने भी दिया है तो क्या पवित्र क़ुरआन को दर्शन की किताब क़रार दिया जाए?

नज़्मे-क़ुरआन और क़ुरआन की शैली (क़ुरआन लेक्चर- 10)

नज़्मे-क़ुरआन (क़ुरआन का व्यवस्थीकरण) वह चीज़ है जिसने सबसे पहले अरब के बहुदेववादियों और मक्का के इस्लाम-विरोधियों को क़ुरआन मजीद के आरंभ से परिचित कराया और जिसको सबसे पहले अरब के बड़े-बड़े साहित्यकारों, भाषणकर्ताओं और भाषाविदों ने महसूस किया, जिसने अरबों के उच्च कोटि वर्गों से यह बात मनवाई कि पवित्र क़ुरआन की वर्णन शैली एक अलग प्रकार की वर्णन शैली है। यह वह शैली है जिसका उदाहरण न अरबी शायरी में मिलता है, न भाषण कला में, न कहानत में और न किसी और ऐसे कलाम में जिससे अरबवासी इस्लाम से पहले परिचित रहे होँ। पवित्र क़ुरआन में शेअर की मधुरता और संगीतगुण भी है, भाषण कला का ज़ोरे-बयान भी है, वाक्यों का संक्षिप्त रूप भी है। इस में सारगर्भिता भी पाई जाती है और अर्थों की गहराई भी, इसमें तथ्य एवं ब्रह्मज्ञान की गहराई भी है और तत्त्वदर्शिता एवं बुद्धिमत्ता भी। इस किताब में तर्क और प्रमाणों का प्रकाश और तार्किकता का नयापन और शक्ति भी उच्च कोटि की पाई जाती है, और इन सब चीज़ों के साथ-साथ यह कलाम भाषा की उत्कृष्टता एवं वाग्मिता के उच्चतम स्तर पर भी आसीन है।

उलूमुल-क़ुरआन-क़ुरआन से संबंधित ज्ञान (क़ुरआन लेक्चर - 9)

उलूमुल-क़ुरआन के अन्तर्गत वे सारे ज्ञान-विज्ञान आते हैं जो इस्लामी विद्वानों, क़ुरआन के टीकाकारों और समाज के चिन्तकों ने पिछले चौदह सौ वर्षों के दौरान में पवित्र क़ुरआन के हवाले से संकलित किए हैं। एक दृष्टि से इस्लामी ज्ञान एवं कलाओं का पूरा भंडार पवित्र क़ुरआन की तफ़सीर (टीका) से भरा पड़ा है। आज से कमो-बेश एक हज़ार वर्ष पहले क़ुरआन के प्रसिद्ध टीकाकार और फ़क़ीह (धर्मशास्त्री) क़ाज़ी अबू-बक्र इब्नुल-अरबी ने लिखा था कि मुसलमानों के जितने ज्ञान एवं कलाएँ हैं, जिनका उन्होंने उस वक़्त अनुमान सात सौ के क़रीब लगाया था, वे सब के सब अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से हदीस की व्याख्या हैं, और हदीस पवित्र क़ुरआन की व्याख्या है। इस दृष्टि से मुसलमानों के सारे ज्ञान एवं कलाएँ उलूमुल-क़ुरआन की हैसियत रखते हैं।

क़ुरआन के चमत्कारी गुण (क़ुरआन लेक्चर - 8)

पवित्र क़ुरआन के हवाले से एजाज़ुल-क़ुरआन (क़ुरआन के चमत्कारी गुण) एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय है। पवित्र क़ुरआन की महानता को समझने और इसकी श्रेष्ठता का अनुमान करने के लिए इसकी चमत्कारी प्रकृति को समझना अत्य़ंत अनिवार्य है। क़ुरआन के चमत्कारी गुणों पर चर्चा करते हुए उसके दो विशिष्ट पहलू हमारे सामने आते हैं। एक पहलू तो इल्मे-एजाज़ुल-क़ुरआन (क़ुरआन की चमत्कारी प्रकृति का ज्ञान) के आरंभ एवं विकास तथा इतिहास का है। यानी एजाज़ुल-क़ुरआन एक ज्ञान और तफ़सीर तथा उलूमे-क़ुरआन (क़ुरआन संबंधी ज्ञान) के एक विभाग के तौर पर किस प्रकार संकलित हुआ और किन-किन विद्वानों ने किन-किन पहलुओं को पवित्र क़ुरआन का चमत्कारी पहलू क़रार दिया।

क़ुरआन के टीकाकारों की टीका-शैलियाँ (क़ुरआन लेक्चर - 7)

टीका-शैलियों से अभिप्रेत वह ढंग और विधि है जिसके अनुसार किसी टीकाकार ने पवित्र क़ुरआन की तफ़सीर या टीका की हो, या उस कार्य-विधि के अनुसार पवित्र क़ुरआन की टीका को संकलित करने का इरादा किया है। हम सब का ईमान (विश्वास) है कि पवित्र क़ुरआन रहती दुनिया तक के लिए है, और दुनिया के हर इंसान के लिए मार्गदर्शन उपलब्ध करता है। इस अस्थायी सांसारिक जीवन में इंसानों को अच्छा इंसान बनाने में जिन-जिन पहलुओं के बारे में कल्पना की जा सकती है, उन सब के बारे में पवित्र क़ुरआन मार्गदर्शन उपलब्ध करता है। पवित्र क़ुरआन एक व्यापारी के लिए भी मार्गदर्शक किताब है, एक शिक्षक के लिए भी मार्गदर्शक किताब है, एक दार्शनिक, अर्थशास्त्री और क़ानून-विशेषज्ञ के लिए भी मौलिक सिद्धांत उपलब्ध करता है। कहने का तात्पर्य यह कि ज़िंदगी का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जिसका संबंध इंसान को बेहतर इंसान बनाने से हो और उसके बारे में पवित्र क़ुरआन मार्गदर्शन न उपलब्ध करता हो।

इस्लामी इतिहास में क़ुरआन के कुछ बड़े टीकाकार (क़ुरआन लेक्चर - 6)

मुफ़स्सिरीने-क़ुरआन (क़ुरआन के टीकाकारों) पर चर्चा की ज़रूरत दो कारणों से महसूस होती है। पहला कारण तो यह है कि तफ़सीरी अदब (टीका संबंधी साहित्य) में जिस प्रकार से और जिस तेज़ी के साथ व्यापकता पैदा हुई उसके परिणामस्वरूप बहुत-सी तफ़सीरें (टीकाएँ) लिखी गईं। पूरे पवित्र क़ुरआन की विधिवत तथा पूरी टीका के अलावा भी टीका संबंधी विषयों पर सम्मिलित बहुत-सी किताबें तैयार हुईं और आए दिन तैयार हो रही हैं। उनमें से कुछ तफ़सीरों में ऐसी चीज़ें भी शामिल हो गई हैं जो सही इस्लामी विचारधारा को प्रस्तुत नहीं करती हैं। पवित्र क़ुरआन के विद्यार्थियों को उन तमाम प्रवृत्तियों और शैलियों से अवगत और सचेत रहना चाहिए। इसलिए उचित महसूस होता है कि कुछ ऐसे नामवर, विश्वसनीय और प्रवृत्ति बनानेवाले मुफ़स्सिरीने-क़ुरआन (क़ुरआन के टीकाकारों) का उल्लेख किया जाए जो तफ़सीर के पूरे भंडार में प्रमुख और अद्भुत स्थान भी रखते हैं और इस्लामी सोच का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, ये वे दूरदर्शी और बड़े मुफ़स्सिरीने-क़ुरआन हैं, जिन्होंने पवित्र क़ुरआन के उलूम (विद्याओं) के प्रचार-प्रसार में अत्यंत लाभकारी और सृजनात्मक भूमिका निभाई है, जिनके काम के प्रभाव, परिणाम तथा फल आज पूरी दुनिया के सामने हैं, और जिनकी निष्ठा और काम की उपयोगिता से आज पवित्र क़ुरआन के अर्थ और भावार्थ अपने मूल रूप में हम तक पहुँचे हैं और हमारे पास मौजूद हैं।

इल्मे-तफ़सीर : एक परिचय (क़ुरआन लेक्चर- 5)

पवित्र क़ुरआन जिसका सरसरी परिचय पिछली तीन-चार बैठकों में कराया गया है, अल्लाह तआला की आख़िरी किताब है। यह मुसलमानों के लिए क़ियामत तक जीवन-व्यवस्था की हैसियत रखता है। एक मानव समाज में तमाम सिद्धांतों और सामाजिक क़ानूनों का सबसे पहला मूल स्रोत यह किताब है। एक इस्लामी राज्य में यह किताब एक श्रेष्ठ क़ानून और दिशा निर्देश की हैसियत रखती है। पवित्र क़ुरआन एक ऐसा तराज़ू और कर्म-मापक है जिसके आधार पर सत्य-असत्य में अन्तर किया जा सकता है। यह वह कसौटी है जो हर सही को हर ग़लत से अलग कर सकती है। यह किताब मुसलमानों के लिए व्यावहारिक एवं प्रत्यक्ष रूप से, और पूरी मानवता के लिए, मार्गदर्शन की एक व्यवस्था है। यह एक ऐसी कसौटी है जिसपर परखकर खरे और खोटे का पता लगाया जा सकता है। यह वह मार्गदर्शन व्यवस्था है जो रहती दुनिया तक के लिए है, जिसकी पैरवी हर ज़माने और हर जगह के इंसानों के लिए वाजिब है। यह मार्गदर्शन-व्यवस्था हर स्थिति में इंसानों को पेश आनेवाले हर मामले में आध्यात्मिक मार्गदर्शन और नैतिक तथा शरीअत का मार्गदर्शन उपलब्ध कर सकती है। इस किताब की मदद से उच्च नैतिक मानदंड रहती दुनिया तक के लिए निर्धारित किए जा सकते हैं,