अर्थशास्त्र
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सूद का हराम होना और इसका मूल कारण (लेक्चर-7)
डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी का यह महत्वपूर्ण लेक्चर (नंबर-7) "सूद का हराम होना और इसका मूल कारण" विषय पर आधारित है। अनुवादक गुलज़ार सहराई द्वारा प्रस्तुत इस व्याख्यान में वक्ता कुरान-हदीस की रोशनी में रिबा (सूद/ब्याज) की सख्त मनाही, उसके शाब्दिक व पारिभाषिक अर्थ, अज्ञानकाल से लेकर आधुनिक बैंक इंटरेस्ट तक की तुलना, रिबा की दो मुख्य किस्में (रिबाउल-जाहिलिया और रिबाउल-फज्ल), इसकी आर्थिक, सामाजिक व नैतिक बुराइयाँ तथा व्यापार को हलाल विकल्प बताते हुए विस्तार से चर्चा करते हैं। अल्लाह ने रिबा के खिलाफ "एलान-ए-जंग" क्यों किया? यह लेक्चर इस्लामी अर्थशास्त्र और फिक्ह समझने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
इस्लाम में अर्थव्यवस्था एवं व्यापार का महत्व तथा उसके आदेश (लेक्चर-6)
इस्लाम में अर्थव्यवस्था एवं व्यापार का महत्व तथा उसके आदेश (लेक्चर-6) डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी के प्रसिद्ध व्याख्यान श्रृंखला "मुहाज़रात-ए-माइशत-ओ-तिजारत" का हिस्सा है। इस लेक्चर में इस्लामी शरीअत की रोशनी में व्यापार की फ़ज़ीलत, हलाल रोज़ी की तलाश को इबादत का दर्जा, पैग़म्बर ﷺ और सहाबा किराम के व्यापारिक जीवन से उदाहरण, रिबा, ग़रर, क़िमार, तदलीस जैसे हराम तत्वों से बचाव, ज़ुह्द और तवक्कुल के साथ आर्थिक गतिविधियों का सन्तुलन तथा आधुनिक दौर में इस्लामी व्यापार के पुनर्संकलन की ज़रूरत पर गहन प्रकाश डाला गया है। यह व्याख्यान बताता है कि ईमानदार व्यापार न केवल हलाल कमाई का माध्यम है, बल्कि इस्लाम के प्रचार, समाज सेवा और आध्यात्मिक उन्नति का भी सशक्त ज़रिया बन सकता है।
इस्लाम में धन-सम्पत्ति एवं स्वामित्व के आदेश (लेक्चर-5)
इस चर्चा का शीर्षक है, इस्लाम में धन-सम्पत्ति एवं स्वामित्व के आदेश। धन एवं स्वामित्व की चर्चा इसलिए ज़रूरी है कि अर्थव्यवस्था तथा व्यापार का पूरा दारोमदार धन एवं स्वामित्व की धारणाओं पर है। धन एवं स्वामित्व के बारे में जो धारणाएँ होंगी, उन्हीं के आधार पर क़ानून का गठन किया जाएगा। उन्हीं के आधार पर लेन-देन के तमाम आदेश संकलित होंगे। क़ानून के विस्तृत विवरण उसके अनुसार तय होंगे। इसलिए सबसे पहले यह ज़रूरी है कि इस्लाम में धन एवं स्वामित्व के आदेशों और धारणाओं के बारे में वे तमाम विस्तृत जानकारियाँ हमारे सामने रहें जो पवित्र क़ुरआन और सुन्नत में बयान हुई हैं और जिनको सामने रखकर इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने उनके विस्तृत आदेश संकलित किए हैं। यह बात तो पवित्र क़ुरआन का हर विद्यार्थी जानता है कि पवित्र क़ुरआन के अनुसार अल्लाह तआला ही हर चीज़ का वास्तविक स्वामी है। सृष्टि में जो कुछ है उसका रचयिता और वास्तविक स्वामी हर दृष्टि से अल्लाह तआला ही है।
अर्थव्यवस्था तथा व्यापार में राज्य की भूमिका (लैक्चर-4)
यह लेख इस्लामी शरीअत के नजरिए से अर्थव्यवस्था और व्यापार में राज्य की भूमिका पर डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी के व्याख्यान का अनुवाद है। इसमें बताया गया है कि इस्लामी राज्य में बाजार आमतौर पर स्वतंत्र रहता है, लेकिन राज्य की जिम्मेदारी निगरानी, न्याय सुनिश्चित करना, फराइज़े-किफाया की पूर्ति, मैक्रो इकोनॉमिक्स नीतियां, आयात-निर्यात संतुलन और शरीअत के आदेशों का पालन कराना है।
आधुनिक काल की मुख्य वित्तीय एवं आर्थिक समस्याएँ : एक अवलोकन (लैक्चर-3)
यह लेख डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी द्वारा दिया गया व्याख्यान है, जिसमें आधुनिक काल की प्रमुख वित्तीय एवं आर्थिक समस्याओं का अवलोकन प्रस्तुत किया गया है। लेख पश्चिमी पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की कमियों, जैसे धन का संकेन्द्रण, बेरोज़गारी, गरीबी, मुद्रास्फीति और नैतिकता की अनुपस्थिति पर गहन विश्लेषण करता है तथा इन समस्याओं के इस्लामी समाधान पर बल देता है। यह इस्लामी अर्थशास्त्र की नैतिक आधारित व्यवस्था को पश्चिमी मॉडल के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसमें न्यायपूर्ण वितरण, ज़कात, रिबा का निषेध और वास्तविक ज़रूरतों की पूर्ति पर ज़ोर है।
इस्लाम की वित्तीय एवं आर्थिक व्यवस्था मूल-अवधारणाएँ, महत्वपूर्ण विशेषताएँ तथा लक्ष्य (लैक्चर -2)
इस्लाम की वित्तीय एवं आर्थिक व्यवस्था की मूल अवधारणाएँ, महत्वपूर्ण विशेषताएँ तथा लक्ष्य पर आधारित यह व्याख्यान डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी का है, जिसका अनुवाद गुलज़ार सहराई ने किया। यह लेक्चर इस्लाम और अर्थव्यवस्था के गहरे संबंध को उजागर करता है, प्राचीन अरब की आर्थिक पृष्ठभूमि से लेकर क़ुरआन व हदीस के सिद्धांतों तक की चर्चा करता है। यह व्याख्यान इस्लामी अर्थशास्त्र को पूँजीवाद एवं कम्युनिज़्म के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है, जो न्याय, नैतिकता और आध्यात्मिकता पर आधारित है।
वित्त और अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धांत पवित्र कुरआन और पैगंबर हजरत मोहम्मद (स0) की सुन्नत (शिक्षाओं एवं निर्देशों) की रोशनी में! (लैक्चर -1)
प्रख्यात इस्लामी विद्वान डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी रहमतुल्लाह अलैह की मशहूर लेक्चर सीरीज़ “अर्थशास्त्र और व्यापार” का पहला व्याख्यान आपके सामने है। इस परिचयात्मक संवाद में आप जानेंगे कि पवित्र कुरआन और पैगंबर मुहम्मद ﷺ की सुन्नत ने मनुष्य के आर्थिक जीवन के लिए कौन-से मौलिक और सर्वकालिक सिद्धांत दिए हैं जिन पर सदियों से मुस्लिम उलेमा ने इस्लामी आर्थिक एवं व्यापारिक व्यवस्था की बुनियाद रखी। यह लेक्चर सीरीज़ के आगामी 11 व्याख्यानों की नींव है।
इन्सान की आर्थिक समस्या और उसका इस्लामी हल
इंसान का आर्थिक मसला हमको यह नज़र आता है कि सभ्यता के विकास की रफ़्तार को क़ायम रखते हुए किस तरह सभी लोगों तक जीवन की ज़रूरत की चीज़ें पहुँचाने का प्रबन्ध हो और किस तरह समाज में हर व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार प्रगति करने, अपने व्यक्तित्व को विकसित करने और अपनी पूर्णता को प्राप्त होने तक अवसर उपलब्ध रहे? इस्लाम क्या आदेश देता है।?
आधुनिक पूंजीवादी समाज में शिक्षा, उपचार और न्याय
दुनिया की इक्कीस सभ्यताओं में किसी भी शिक्षक ने कभी पैसे लेकर शिक्षा नहीं दी और न किसी डॉक्टर, हकीम, वैद्य और चिकित्सक ही ने किसी रोगी की जाँच कभी पैसे लेकर की, न किसी रोगी को इस कारण देखने से इनकार किया कि रोगी के पास पैसे नहीं हैं, इसके बावजूद उन 21 सभ्यताओं के सभी शिक्षक खाते-पीते लोग थे और अपने घर का ख़र्च भी उठाते थे। उन 21 सभ्यताओं के डॉक्टर और हकीम किसी रोगी से एक पैसा माँगे बिना भी ख़ुशहाल और सम्पन्न जीवन जीते थे, भूखे नहीं मरते थे।
ग़रीबी और अकाल का संबंध पूंजीवाद से
प्राचीनकाल में जब किसी क्षेत्र की भूमि उपजाऊपन खो देती, धरती अनाज उगलना बंद कर देती, तो लोग इन क्षेत्रों से पलायन करते थे। आधुनिक समय की गुमराही राष्ट्रभक्ति (Nationalism) ने जिसका इतिहास चार-सौ वर्ष से अधिक नहीं, राष्ट्रीय सीमाएँ बनाकर इस पलायन को असंभव बना दिया है। कुछ साल पहले अफ़्रीक़ा में अकाल पड़ा और लोग एक अफ़्रीक़ी देश से दूसरे अफ़्रीक़ी देश जाने लगे तो सीमाओं पर फ़ायरिंग कर के इंसानों को मार दिया गया।
इस्लामी अर्थशास्त्र: एक परिचय
"इस्लामी अर्थशास्त्र: एक परिचय" अर्थशास्त्र तथा इस्लामी विषयों के विशेषज्ञ एवं प्रख्यात विद्वान डॉ. फ़ज़्लुर्रहमान फ़रीदी के एक उर्दू शोध पत्र इस्लामी मआशियात : एक तारूफ़ का हिन्दी अनुवाद है जो उन्होंने अक्तूबर 1995 को 'इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर इस्लामिक इकानॉमिक्स' द्वारा जामिअतुल-फ़लाह, बिलरियागंज (आज़मगढ़) में आयोजित एक सेमिनार में प्रस्तुत किया था। प्रस्तुत लेख में पाश्चात्य संस्कृति एवं दर्शन द्वारा पोषित आधुनिक अर्थशास्त्र पर आलोचनात्मक दृष्टि डालते हुए उसकी ख़राबियों को उजागर किया गया है, साथ ही साथ इस्लामी आर्थिक प्रणाली का परिचय कराते हुए उसकी विशेषताओं का उल्लेख भी किया गया है। डॉ. साहब ने इस संक्षिप्त लेख में इस्लामी अर्थशास्त्र को वर्तमान आर्थिक समस्याओं, जैसे आर्थिक उतार-चढ़ाव, मुद्रा-स्फीति, ब्याज आधारित व्यवस्था की ख़राबियाँ, आय तथा धन के असमान वितरण की समस्या, अर्थशास्त्र का नैतिक मूल्यों से तटस्थ हो जाना, उपभोक्तावाद आदि के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है।

