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سُورَةُ الحُجُرَاتِ

49. अल-हुजुरात

(मदीना में उतरी, आयतें 18)

परिचय

नाम

आयत 4 के वाक्यांश "इन्नल्लज़ी-न युनादू-न-क मिंव-वरा-इल हुजुरात" (जो लोग तुम्हें कमरों अर्थात् हुजरों के बाहर से पुकारते हैं) से लिया गया है। तात्पर्य यह है कि वह सूरा जिसमें शब्द हुजुरात आया है।

उतरने का समय

यह बात उल्लेखों से भी मालूम होती है और सूरा की विषय-वस्तु से भी इसकी पुष्टि होती है कि यह सूरा अलग-अलग मौक़ों पर उतरे आदेशों और निर्देशों का संग्रह है जिन्हें विषय की अनुकूलता के कारण जमा कर दिया गया है। इसके अलावा उल्लेखों से यह भी मालूम होता है कि इनमें से अधिकतर आदेश मदीना तय्यिबा के अन्तिम समय में उतरे हैं।

विषय और वार्ता

इस सूरा का विषय मुसलमानों को उन शिष्ट नियमों की शिक्षा देना है जो ईमानवालों के गौरव के अनुकूल है। आरंभ की पाँच आयतों में उनको वह नियम सिखाया गया है जिसका उन्हें अल्लाह और उसके रसूल के मामले में ध्यान रखना चाहिए। फिर यह आदेश दिया गया है कि अगर किसी आदमी या गिरोह या क़ौम के विरुद्ध कोई ख़बर मिले तो ध्यान से देखना चाहिए कि ख़बर मिलने का माध्यम भरोसे का है या नहीं। भरोसे का न हो तो उसपर कार्रवाई करने से पहले जाँच-पड़ताल कर लेनी चाहिए कि ख़बर सही है या नहीं। इसके बाद यह बताया गया है कि अगर किसी समय मुसलमानों के दो गिरोह आपस में लड़ पड़ें तो इस स्थिति में दूसरे मुसलमानों को क्या नीति अपनानी चाहिए।

फिर मुसलमानों को उन बुराइयों से बचने की ताकीद की गई है जो सामाजिक जीवन में बिगाड़ पैदा करती हैं और जिनकी वजह से आपस के सम्बन्ध ख़राब होते हैं। इसके बाद उन क़ौमी (जातीय) और नस्ली (वंशगत) भेद-भाव पर चोट की गई है जो दुनिया में व्यापक बिगाड़ का कारण बनते हैं। [इस सिलसिले में] सर्वोच्च अल्लाह ने यह कहकर इस बुराई की जड़ काट दी है कि तमाम इंसान एक ही मूल (अस्ल) से पैदा हुए हैं और क़ौमों और क़बीलो में उनका बँट जाना परिचय के लिए है, न कि आपस में गर्व के लिए। और एक इंसान पर दूसरे इंसान की श्रेष्ठता के लिए नैतिक श्रेष्ठता के सिवा और कोई वैध आधार नहीं है। अन्त में लोगों को बताया गया है कि मौलिक चीज़ ईमान का मौखिक दावा नहीं है, बल्कि सच्चे दिल से अल्लाह और उसके रसूल को मानना, व्यावहारिक रूप से आज्ञापालक बनकर रहना और निष्ठा के साथ अल्लाह की राह में अपनी जान और माल खपा देना है।

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سُورَةُ الحُجُرَاتِ
49. अल-हुजुरात
وَلَوۡ أَنَّهُمۡ صَبَرُواْ حَتَّىٰ تَخۡرُجَ إِلَيۡهِمۡ لَكَانَ خَيۡرٗا لَّهُمۡۚ وَٱللَّهُ غَفُورٞ رَّحِيمٞ ۝ 1
(5) अगर वे तुम्हारे बरामद होने तक सब्र करते तो उन्हीं के लिए बेहतर था,3 अल्लाह दरगुज़र करनेवाला और रहीम है।
3. अतराफ़े-अरब से आनेवालों में बाज़ ऐसे नाशाइस्ता लोग भी होते थे जो रसूल (सल्ल०) से मुलाक़ात के लिए आते तो किसी ख़ादिम से अन्दर इत्तिला कराने की ज़हमत भी न उठाते थे, बल्कि अज़वाजे-मुतह्हरात (रज़ि०) के हुजरों का चक्कर काटकर बाहर ही से आप (सल्ल०) को पुकारते फिरते थे। हुज़ूर (सल्ल०) को उन लोगों की इन हरकात से सख़्त तकलीफ़ होती थी मगर अपने तबई हिल्म की वजह से आप (सल्ल०) उन्हें बरदाश्त किए जा रहे थे। आख़िरकार अल्लाह तआला ने इस मामले में मुदाख़लत फ़रमाई और इस नाशाइस्ता तर्ज़े-अमल पर मलामत करते हुए लोगों को यह हिदायत दी कि जब वे आप (सल्ल०) से मिलने के लिए आएँ और आप (सल्ल०) को मौजूद न पाएँ तो पुकार-पुकारकर आप (सल्ल०) को बुलाने के बजाय सब्र के साथ बैठकर उस वक़्त का इन्तिज़ार करें जब आप (सल्ल०) ख़ुद बाहर तशरीफ़ लाएँ।
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बेइन्तिहा मेहरबान और रहम फ़रमानेवाला है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِن جَآءَكُمۡ فَاسِقُۢ بِنَبَإٖ فَتَبَيَّنُوٓاْ أَن تُصِيبُواْ قَوۡمَۢا بِجَهَٰلَةٖ فَتُصۡبِحُواْ عَلَىٰ مَا فَعَلۡتُمۡ نَٰدِمِينَ ۝ 2
(6) ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो तहक़ीक़ कर लिया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम किसी गरोह को नादानिस्ता नुक़सान पहुँचा बैठो और फिर अपने किए पर पशेमान हो।4
4. इस आयत में मुसलमानों को यह उसूली हिदायत दी गई है कि जब कोई अहमियत रखनेवाली ख़बर, जिसपर कोई बड़ा नतीजा मु-तरत्तब होता हो, तुम्हें मिले तो उसको क़ुबूल करने से पहले यह देख लो कि ख़बर लानेवाला कैसा आदमी है। अगर वह कोई फ़ासिक़ शख़्स हो, यानी जिसका ज़ाहिर हाल यह बता रहा हो कि उसकी बात एतिमाद के लायक़ नहीं है, तो उसकी दी हुई ख़बर पर अमल करने से पहले तहक़ीक़ कर लो कि अम्रे-वाक़िआ क्या है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تُقَدِّمُواْ بَيۡنَ يَدَيِ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦۖ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٞ
(1) ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! अल्लाह और उसके रसूल के आगे पेश-क़दमी न करो1 और अल्लाह से डरो, अल्लाह सब कुछ सुनने और जाननेवाला है।
1. यानी अल्लाह और रसूल (सल्ल०) के आगे बढ़कर न चलो, पीछे चलो। मुक़द्दम न बनो ताबे बनकर रहो। अपने मामलात में पेश-क़दमी करके बतौर ख़ुद फ़ैसले न करने लगो, बल्कि पहले यह देखो कि अल्लाह की किताब और उसके रसूल (सल्ल०) की सुन्नत में उनके मुताल्लिक़ क्या हिदायात मिलती हैं।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱجۡتَنِبُواْ كَثِيرٗا مِّنَ ٱلظَّنِّ إِنَّ بَعۡضَ ٱلظَّنِّ إِثۡمٞۖ وَلَا تَجَسَّسُواْ وَلَا يَغۡتَب بَّعۡضُكُم بَعۡضًاۚ أَيُحِبُّ أَحَدُكُمۡ أَن يَأۡكُلَ لَحۡمَ أَخِيهِ مَيۡتٗا فَكَرِهۡتُمُوهُۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَۚ إِنَّ ٱللَّهَ تَوَّابٞ رَّحِيمٞ ۝ 3
(12) ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! बहुत गुमान करने से परहेज़ करो कि बाज़ गुमान गुनाह होते हैं।9 तजस्सुस न करो।10 और तुममें से कोई किसी की ग़ीबत न करे।11 क्या तुम्हारे अन्दर कोई ऐसा है जो अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाना पसन्द करेगा?¹² देखो, तुम ख़ुद इससे घिन खाते हो। अल्लाह से डरो, अल्लाह बड़ा तौबा क़ुबूल करनेवाला और रहीम है।
9. मुत्लक़न गुमान करने से नहीं रोका गया है, बल्कि बहुत ज़्यादा गुमान से काम लेने और हर तरह के गुमान की पैरवी करने से मना फ़रमाया गया है और इसकी वजह यह बताई गई है कि बाज़ गुमान गुनाह होते हैं। दरअस्ल जो गुमान गुनाह है वह यह है कि आदमी किसी शख़्स से बिला सबब बदगुमानी करे, या दूसरों के मुताल्लिक़ राय क़ायम करने में हमेशा बदगुमानी ही से इबतिदा किया करे, या ऐसे लोगों के मामले में बदज़नी से काम ले जिनका ज़ाहिर हाल यह बता रहा हो कि वे नेक और शरीफ़ हैं। इसी तरह यह बात भी गुनाह है कि एक शख़्स के किसी क़ौल या फ़ेल में बुराई और भलाई का यकसाँ एहतिमाल हो और हम मह्ज़ बदज़नी से काम लेकर उसको चुराई ही पर महमूल करें।
10. यानी लोगों के राज़ न टटोलो। एक-दूसरे के ऐब न तलाश करो। दूसरों के हालात और मामलात की टोह न लगाते फिरो। लोगों के निजी ख़ुतूत पढ़ना, दो आदमियों की बातें कान लगाकर सुनना, हमसायों के घर में झाँकना, और मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से दूसरों की ख़ानगी जिन्दगी या उनके ज़ाती मामलात की टटोल करना, ये सब उस तजस्सुस में दाख़िल हैं जिससे मना फ़रमाया गया है।
11. रसूलुल्लाह (सल्ल०) से पूछा गया कि “ग़ीबत की तारीफ़ क्या है?” आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, “ग़ीबत यह है कि तू अपने भाई का ज़िक्र इस तरह करे जो उसे नागवार हो।” अर्ज़ किया गया कि “अगर मेरे भाई में वह बात पाई जाती हो जो मैं कह रहा हूँ तो इस सूरत में आप (सल्ल०) का क्या ख़याल है?” फ़रमाया, “अगर उसमें वह बात पाई जाती हो तो तूने उसकी ग़ीबत की, और अगर उसमें वह मौजूद न हो तो तूने उसपर बुहतान लगाया।” इस हुरमत से मुस्तसना सिर्फ़ वे सूरतें हैं जिनमें किसी शख़्स के पीठ पीछे, या उसके मरने के बाद उसकी बुराई बयान करने की कोई ऐसी ज़रूरत लाहिक़ हो जो शरीअत की निगाह में एक सही ज़रूरत हो, और वह ज़रूरत ग़ीबत के बग़ैर पूरी न हो सकती हो, और उसके लिए अगर ग़ीबत न की जाए तो ग़ीबत की बनिस्बत ज़्यादा बड़ी बुराई लाज़िम आती हो। नबी (सल्ल०) ने इस इस्तिसना को उसूलन यूँ बयान फ़रमाया है कि “बदतरीन ज़्यादती किसी मुसलमान की इज़्ज़त पर नाहक़ हमला करना है।” इस इरशाद में 'नाहक़' की कैद यह बताती है कि 'हक़’ की बिना पर ऐसा करना जाइज़ है। मसलन ज़ालिम के ख़िलाफ़ मज़लूम की शिकायत हर उस शख़्स के सामने जिससे वह तवक़्को़ रखता हो कि वह ज़ुल्म को दफ़ा करने के लिए कुछ कर सकता है। इसलाह की नीयत से किसी शख़्स या गरोह की बुराइयों का ज़िक्र ऐसे लोगों के सामने जिनसे यह उम्मीद हो कि वे इन बुराइयों को दूर करने के लिए कुछ कर सकेंगे। इस्तिफ़्ता की ग़रज़ से किसी मुफ़्ती के सामने सूरते-वाक़िआ बयान करना जिसमें किसी शख़्स के किसी ग़लत फ़ेल का ज़िक्र आ जाए। लोगों को किसी शख़्स या अशख़ास के शर से ख़बरदार करना ताकि वे उनके नुक़सान से बच सके। ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ अलल-एलान आवाज़ बलन्द करना और उनकी बुराइयों पर तनक़ीद करना जो फ़िस्क़ व फ़ुजूर फैला रहे हों या बिदआत और गुमराहियों की इशाअत कर रहे हों, या ख़लके-ख़ुदा को बेदीनी और ज़ुल्म व जौर के फ़ित्नों में मुब्तला कर रहे हों।
12. ग़ीबत को मरे हुए भाई का गोश्त खाने से इसलिए तशबीह दी गई है कि जिसकी ग़ीबत की जा रही होती है वह बेचारा बिलकुल बेख़बर होता है कि कहाँ कौन उसकी इज़्ज़त पर हमला कर रहा है।
وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ فِيكُمۡ رَسُولَ ٱللَّهِۚ لَوۡ يُطِيعُكُمۡ فِي كَثِيرٖ مِّنَ ٱلۡأَمۡرِ لَعَنِتُّمۡ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ حَبَّبَ إِلَيۡكُمُ ٱلۡإِيمَٰنَ وَزَيَّنَهُۥ فِي قُلُوبِكُمۡ وَكَرَّهَ إِلَيۡكُمُ ٱلۡكُفۡرَ وَٱلۡفُسُوقَ وَٱلۡعِصۡيَانَۚ أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلرَّٰشِدُونَ ۝ 4
(7) ख़ूब जान रखो कि तुम्हारे दरमियान अल्लाह का रसूल मौजूद है। अगर वे बहुत-से मामलात में तुम्हारी बात मान लिया करे तो तुम ख़ुद ही मुशकिलात में मुब्तला हो जाओ। मगर अल्लाह ने तुमको ईमान की मुहब्बत दी और उसको तुम्हारे लिए दिलपसन्द बना दिया, और कुफ़्र वह फ़िस्क़ और नाफ़रमानी से तुमको मुतनफि़्फ़र कर दिया,
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَرۡفَعُوٓاْ أَصۡوَٰتَكُمۡ فَوۡقَ صَوۡتِ ٱلنَّبِيِّ وَلَا تَجۡهَرُواْ لَهُۥ بِٱلۡقَوۡلِ كَجَهۡرِ بَعۡضِكُمۡ لِبَعۡضٍ أَن تَحۡبَطَ أَعۡمَٰلُكُمۡ وَأَنتُمۡ لَا تَشۡعُرُونَ ۝ 5
(2) ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! अपनी आवाज़ नबी की आवाज़ से बलन्द न करो, और न नबी के साथ ऊँची आवाज़ से बात करो जिस तरह तुम आपस में एक-दूसरे से करते हो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा किया कराया सब ग़ारत हो जाए और तुम्हें ख़बर भी न हो।
فَضۡلٗا مِّنَ ٱللَّهِ وَنِعۡمَةٗۚ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٞ ۝ 6
(8) ऐसे ही लोग अल्लाह के फ़ज़्ल व एहसान से रास्त रौ हैं और अल्लाह अलीम व हकीम है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنَّا خَلَقۡنَٰكُم مِّن ذَكَرٖ وَأُنثَىٰ وَجَعَلۡنَٰكُمۡ شُعُوبٗا وَقَبَآئِلَ لِتَعَارَفُوٓاْۚ إِنَّ أَكۡرَمَكُمۡ عِندَ ٱللَّهِ أَتۡقَىٰكُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٞ ۝ 7
(13) लोगो! हमने तुमको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और फिर तुम्हारी क़ौमें और बिरादरियाँ बना दीं ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। दर-हक़ीक़त अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़तवाला वह है जो तुम्हारे अन्दर सबसे ज़्यादा परहेज़गार है।13 यक़ीनन अल्लाह सब कुछ जाननेवाला और बाख़बर है।
13. पिछली आयात में अहले-ईमान को ख़िताब करके वे हिदायात दी गई थीं जो मुस्लिम मुआशरे को ख़राबियों से महफ़ूज़ रखने के लिए ज़रूरी हैं। अब इस आयत में पूरी नौए-इनसानी को ख़िताब करके उस अज़ीम गुमराही की इसलाह की गई है जो दुनिया में हमेशा आलमगीर फ़साद की मूजिब बनी रही है, यानी नस्ल, रंग, ज़बान, वतन और क़ौमियत का तास्सुब। इस मुख़्तसर-सी आयत में अल्लाह तआला ने तमाम इनसानों को मुख़ातब करके तीन निहायत अह्म उसूली हक़ीक़तें बयान फ़रमाई हैं। एक यह कि तुम सबकी अस्ल एक ही है, एक ही मर्द और एक ही औरत से तुम्हारी पूरी नौअ वुजूद में आई है और आज तुम्हारी जितनी नस्लें भी दुनिया में पाई जाती हैं वे दर-हक़ीक़त एक इबतिदाई नस्ल की शाख़ें हैं जो एक माँ और एक बाप से शुरू हुई थीं। दूसरे यह कि अपनी अस्ल के एतिबार से एक होने के बावुजूद तुम्हारा क़ौमों और क़बीलों में तक़सीम हो जाना एक फ़ितरी अम्र था। मगर इस फ़ितरी फ़र्क़ व इख़्तिलाफ़ का तक़ाज़ा यह हरगिज़ न था कि इसकी बुनियाद पर ऊँच और नीच, शरीफ़ और कमीन, बरतर और कमतर के इमतियाज़ात क़ायम किए जाएँ। एक नस्ल दूसरी नस्ल पर अपनी फ़ज़ीलत जताए, एक रंग के लोग दूसरे रंग के लोगों को ज़लील व हक़ीर जानें और एक क़ौम दूसरी क़ौम पर अपना तफ़व्वुक़ जमाए। ख़ालिक़ ने जिस वजह से इनसानी गरोहों को अक़वाम और क़बाइल की शक्ल में मुरत्तब किया था वह सिर्फ़ यह थी कि उनके दरमियान बाहमी तआवुन और तआरुफ़ की फ़ितरी सूरत यही थी। तीसरे यह कि इनसान और इनसान के दरमियान फ़ज़ीलत और बरतरी की बुनियाद अगर कोई है और हो सकती है तो वह सिर्फ़ आख़लाक़ी फ़ज़ीलत है।
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصۡوَٰتَهُمۡ عِندَ رَسُولِ ٱللَّهِ أُوْلَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱمۡتَحَنَ ٱللَّهُ قُلُوبَهُمۡ لِلتَّقۡوَىٰۚ لَهُم مَّغۡفِرَةٞ وَأَجۡرٌ عَظِيمٌ ۝ 8
(3) जो लोग रसूले-ख़ुदा के हुज़ूर बात करते हुए अपनी आवाज़ पस्त रखते है वे दर-हक़ीक़त वही लोग हैं जिनके दिलों को अल्लाह ने तक़वा के लिए जाँच लिया है,2 उनके लिए मग़फ़िरत है और अज्रे-अज़ीम।
2. यानी जो लोग अल्लाह तआला की आज़माइशों में पूरे उतरे हैं और उन आज़माइशों से गुज़रकर जिन्होंने साबित कर दिया है कि उनके दिलों में फ़िल-वाक़े तक़वा मौजूद है वही लोग अल्लाह के रसूल (सल्ल०) का अदब व इहतिराम मलहूज़ रखते हैं। इस इरशाद से ख़ुद-ब-ख़ुद यह बात निकलती है कि जो दिल रसूल (सल्ल०) के इहतिराम से ख़ाली है वह दर-हक़ीक़त तक़वा से ख़ाली है।
وَإِن طَآئِفَتَانِ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ٱقۡتَتَلُواْ فَأَصۡلِحُواْ بَيۡنَهُمَاۖ فَإِنۢ بَغَتۡ إِحۡدَىٰهُمَا عَلَى ٱلۡأُخۡرَىٰ فَقَٰتِلُواْ ٱلَّتِي تَبۡغِي حَتَّىٰ تَفِيٓءَ إِلَىٰٓ أَمۡرِ ٱللَّهِۚ فَإِن فَآءَتۡ فَأَصۡلِحُواْ بَيۡنَهُمَا بِٱلۡعَدۡلِ وَأَقۡسِطُوٓاْۖ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُقۡسِطِينَ ۝ 9
(9) और अगर अहले-ईमान में से दो गरोह आपस में लड़ जाएँ5 तो उनके दरमियान सुलह कराओ। फिर अगर उनमें से एक गरोह दूसरे गरोह पर ज़्यादती करे तो ज़्यादती करनेवाले से लड़ो यहाँ तक कि वह अल्लाह के हुक्म की तरफ़ पलट आए। फिर अगर वह पलट आए तो उनके दरमियान अदल साथ सुल्ह करा दो। और इनसाफ़ करो कि अल्लाह इनसाफ़ करनेवालों को पसन्द करता है।
5. यह नहीं फ़रमाया कि “जब अहले-ईमान में से दो गरोह आपस में लड़ें,” बल्कि यह फ़रमाया कि “अगर अहले-ईमान में से दो गरोह आपस में लड़ जाएँ।” इन अलफ़ाज़ से यह बात ख़ुद-ब-ख़ुद निकलती है कि आपस में लड़ना मुसलमानों का शेवा नहीं है और न ही होना चाहिए। न उनसे यह अम्र मुतवक़्क़े है कि वे मोमिन होते हुए आपस में लड़ा करेंगे। अलबत्ता अगर कभी ऐसा हो जाए तो ऐसी सूरत में वह तरीक़ेकार इख़्तियार करना चाहिए जो आगे बयान किया जा रहा है।
۞قَالَتِ ٱلۡأَعۡرَابُ ءَامَنَّاۖ قُل لَّمۡ تُؤۡمِنُواْ وَلَٰكِن قُولُوٓاْ أَسۡلَمۡنَا وَلَمَّا يَدۡخُلِ ٱلۡإِيمَٰنُ فِي قُلُوبِكُمۡۖ وَإِن تُطِيعُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ لَا يَلِتۡكُم مِّنۡ أَعۡمَٰلِكُمۡ شَيۡـًٔاۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٌ ۝ 10
(14) ये बदवी कहते हैं कि “हम ईमान लाए।”14 इनसे कहो, “तुम ईमान नहीं लाए, बल्कि यूँ कहो कि 'हम मुतीअ हो गए।' ईमान अभी तुम्हारे दिलों में दाख़िल नहीं हुआ है। अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी इख़्तियार कर लो तो वह तुम्हारे आमाल के अज्र में कोई कमी न करेगा, यक़ीनन अल्लाह बड़ा दरगुज़र करनेवाला और रहीम है।
14. इससे मुराद तमाम बदवी नहीं हैं, बल्कि यहाँ ज़िक्र चन्द ख़ास बदवी गरोहों का हो रहा है जो इस्लाम की बढ़ती हुई ताक़त देखकर मह्ज़ इस ख़याल से मुसलमान हो गए थे कि वे मुसलमानों की ज़र्ब से महफ़ूज़ भी रहेंगे और इस्लामी फ़ुतूहात के फ़वाइद से मुतमत्ते भी होंगे। ये लोग हक़ीक़त में सच्चे दिल से ईमान नहीं लाए थे, मह्ज़ ज़बानी इक़रारे-ईमान करके इन्होंने मस्लहतन अपने-आपको मुसलमानों में शुमार करा लिया था।
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُنَادُونَكَ مِن وَرَآءِ ٱلۡحُجُرَٰتِ أَكۡثَرُهُمۡ لَا يَعۡقِلُونَ ۝ 11
(4) (ऐ नबी!) जो लोग तुम्हें हुजरों के बाहर से पुकारते हैं उनमें से अक्सर बे-अक़्ल हैं।
إِنَّمَا ٱلۡمُؤۡمِنُونَ إِخۡوَةٞ فَأَصۡلِحُواْ بَيۡنَ أَخَوَيۡكُمۡۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُونَ ۝ 12
(10) मोमिन तो एक-दूसरे के भाई हैं, लिहाज़ा अपने भाइयों के दरमियान ताल्लुक़ात को दुरुस्त करो और अल्लाह से डरो, उम्मीद है कि तुमपर रह्म किया जाएगा।
إِنَّمَا ٱلۡمُؤۡمِنُونَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ثُمَّ لَمۡ يَرۡتَابُواْ وَجَٰهَدُواْ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِۚ أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلصَّٰدِقُونَ ۝ 13
(15) हक़ीक़त में तो मोमिन वे हैं जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए और फिर उन्होंने कोई शक न किया और अपनी जानों और मालों से अल्लाह की राह में जिहाद किया। वही सच्चे लोग हैं।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا يَسۡخَرۡ قَوۡمٞ مِّن قَوۡمٍ عَسَىٰٓ أَن يَكُونُواْ خَيۡرٗا مِّنۡهُمۡ وَلَا نِسَآءٞ مِّن نِّسَآءٍ عَسَىٰٓ أَن يَكُنَّ خَيۡرٗا مِّنۡهُنَّۖ وَلَا تَلۡمِزُوٓاْ أَنفُسَكُمۡ وَلَا تَنَابَزُواْ بِٱلۡأَلۡقَٰبِۖ بِئۡسَ ٱلِٱسۡمُ ٱلۡفُسُوقُ بَعۡدَ ٱلۡإِيمَٰنِۚ وَمَن لَّمۡ يَتُبۡ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ ۝ 14
(11) ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! न मर्द दूसरे मर्दों का मज़ाक़ उड़ाएँ, हो सकता है कि वे उनसे बेहतर हों, और न औरतें दूसरी औरतों का मज़ाक उड़ाएँ, हो सकता है कि वे उनसे बेहतर हों।6 आपस में एक-दूसरे पर तअन न करो7 और न एक-दूसरे को बुरे अलक़ाब से याद करो।8 ईमान लाने के बाद फ़िस्क़ में नाम पैदा करना बहुत बुरी बात है। जो लोग इस रविश से बाज़ न आएँ वे ज़ालिम हैं।
6. ‘मज़ाक़ उड़ाने' से मुराद मह्ज़ ज़बान ही से मज़ाक़ उड़ाना नहीं है, बल्कि किसी की नक़्ल उतारना, उसकी तरफ़ इशारे करना, उसकी बात पर या उसके काम या उसकी सूरत या उसके लिबास पर हँसना, या उसके किसी नक़्स या ऐब की तरफ़ लोगों को इस तरह तवज्जोह दिलाना कि दूसरे उसपर हँसें, ये सब भी मज़ाक़ उड़ाने में दाख़िल हैं।
7. इसके मफ़हूम में चोटें करना, फबतियाँ कसना, इलज़ाम धरना, एतिराज़ जड़ना। ऐबचीनी करना और खुल्लम-खुल्ला या ज़ेरे-लब इशारों से किसी को निशाना-ए-मलामत बनाना, ये सब अफ़आल शामिल हैं।
8. इस हुक्म का मंशा यह है कि किसी शख़्स को ऐसे नाम से न पुकारा जाए या ऐसा लक़ब़ न दिया जाए जिससे उसकी तज़लील होती हो। मसलन किसी को फ़ासिक़ या मुनाफ़िक़ कहना। किसी को लंगड़ा या अंधा या काना कहना। किसी को उसके अपने या उसकी माँ या बाप या ख़ानदान के किसी ऐब या नक़्स से मुलक़्क़ब करना। किसी को मुसलमान हो जाने के बाद उसके साबिक़ मज़हब की बिना पर यहूदी या नसरानी कहना। किसी शख़्स या ख़ानदान या बिरादरी या गरोह का ऐसा नाम रख देना जो उसकी मज़म्मत और तज़लील का पहलू रखता हो। इस हुक्म से सिर्फ़ वे अलक़ाब मुस्तसना है जो अपनी ज़ाहिरी सूरत के एतिबार से तो बदनुमा हैं, मगर उनसे मज़म्मत मक़सूद नहीं होती, बल्कि वे उन लोगों की पहचान का ज़रिआ बन जाते हैं जिनको उन अलक़ाब से याद किया जाता है। मसलन हकीम नाबीना कि इससे मक़सूद सिर्फ़ पहचान है, मज़म्मत मक़सूद नहीं है।
قُلۡ أَتُعَلِّمُونَ ٱللَّهَ بِدِينِكُمۡ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۚ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ ۝ 15
(16) (ऐ नबी!) इन (मुद्दईयाने-ईमान) से कहो, “क्या तुम अल्लाह को अपने दीन की इत्तिला दे रहे हो? हालाँकि अल्लाह ज़मीन और आसमानों की हर चीज़ को जानता है और वह हर चीज़ का इल्म रखता है।”
يَمُنُّونَ عَلَيۡكَ أَنۡ أَسۡلَمُواْۖ قُل لَّا تَمُنُّواْ عَلَيَّ إِسۡلَٰمَكُمۖ بَلِ ٱللَّهُ يَمُنُّ عَلَيۡكُمۡ أَنۡ هَدَىٰكُمۡ لِلۡإِيمَٰنِ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ ۝ 16
(17) ये लोग तुमपर एहसान जताते हैं कि इन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया, इनसे कहो, “अपने इस्लाम का एहसान मुझपर न रखो, बल्कि अल्लाह तुमपर अपना एहसान रखता है कि उसने तुम्हें ईमान की हिदायत दी, अगर तुम वाक़ई (अपने दावए-ईमान में) सच्चे हो।
إِنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ غَيۡبَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ وَٱللَّهُ بَصِيرُۢ بِمَا تَعۡمَلُونَ ۝ 17
(18) अल्लाह ज़मीन और आसमानों की हर पोशीदा चीज़ का इल्म रखता है और जो कुछ तुम करते हो वह सब उसकी निगाह में है।