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سُورَةُ التَّحۡرِيمِ

66. अत-तहरीम

(मदीना में उतरी, आयतें 12)

परिचय

नाम

पहली आयत के शब्द 'लिमा तुहर्रिमु' (क्यों उस चीज़ को हराम करते हो) से उद्धृत है। इस शीर्षक का अभिप्राय यह है कि यह वह सूरा है जिसमें तहरीम' (किसी चीज़ को अवैध ठहराने) को घटना का उल्लेख हुआ है। इसमें अवैध ठहराने की जिस घटना का उल्लेख किया गया है, उसके सम्बन्ध में हदीसों के उल्लेखों में दो महिलाओं की चर्चा की गई है जो उस समय नबी (सल्ल०) की पत्नियों में से थीं। एक हज़रत सफ़ीया (रज़ि०), दूसरी हज़रत मारिया क़िब्तिया (रज़ि०), [और ये दोनों ही नबी (सल्ल०) के घर में सन् 7 हिजरी में आई हैं। इस] से यह बात लगभग निश्चित हो जाती है कि इस सूरा का अवतरण सन् 7 हिजरी या 8 हिजरी के दौरान में किसी समय हुआ था।

विषय और वार्ता

इस सूरा में अल्लाह के रसूल (सल्ल०) की पवित्र पत्नियों  के सम्बन्ध में कुछ घटनाओं की ओर संकेत करते हुए कुछ गम्भीर समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है : एक यह कि हलाल तथा हराम और वैध तथा अवैध की सीमाएँ निर्धारित करने के अधिकार निश्चित रूप से सर्वोच्च अल्लाह के हाथ में हैं और आम लोग तो अलग रहे, पैग़म्बर को भी अपने तौर पर अल्लाह की जाइज़ ठहराई हुई किसी चीज़ को हराम कर लेने का अधिकार नहीं है। दूसरे यह कि मानव-समाज में नबी (सल्ल०) का स्थान बहुत ही गंभीर स्थान है। एक साधारण बात भी जो किसी दूसरे मनुष्य के जीवन में घटित हो तो कुछ अधिक महत्त्व नहीं रखती, लेकिन नबी के जीवन में घटित हो तो उसकी हैसियत क़ानून की हो जाती है। इसलिए अल्लाह की ओर से नबियों के जीवन पर ऐसी कड़ी निगरानी रखी गई है कि उनका कोई छोटे से छोटा क़दम उठाना भी ईश्वरीय इच्छा से हटा हुआ न हो, ताकि इस्लामी क़ानून और उसके सिद्धान्त अपने बिलकुल वास्तविक रूप में अल्लाह के बन्दों तक पहुँच जाएँ। तीसरी बात यह है कि तनिक-सी बात पर जब नबी (सल्ल०) को टोक दिया गया और न केवल उसका सुधार किया गया, बल्कि उसे रिकार्ड पर भी लाया गया, तो यह चीज़ निश्चय ही हमारे दिल में यह इत्मीनान पैदा कर देती है कि नबी (सल्ल०) के पवित्र जीवन में जो कर्म और जो नियम-सम्बन्धी आदेश और निर्देश भी अब हमें मिलते हैं और जिनपर अल्लाह की ओर से कोई पकड़ या संशोधन रिकार्ड पर मौजूद नहीं है, वे सर्वथा विशुद्ध और ठीक हैं और पूर्ण रूप से अल्लाह की इच्छा के अनुकूल हैं। चौथी बात [यह कि अल्लाह ने न केवल यह कि नबी (सल्ल०) को एक साधारण-सी बात पर टोक दिया और ईमानवालों की माताओं को (अर्थात् नबी सल्ल० की पत्नियों को) उनकी कुछ ग़लतियों पर] कड़ाई के साथ सचेत किया, बल्कि [इस पकड़ और चेतावनी को अपनी किताब (क़ुरआन) में सदैव के लिए अंकित भी कर दिया। इसमें निहित उद्देश्य इसके सिवा और क्या हो सकता है कि अल्लाह इस तरह ईमानवालों को अपने महापुरुषों के आदर-सम्मान की वास्तविक मर्यादाओं एवं सीमाओं से परिचित कराना चाहता है। नबी, नबी है, ख़ुदा नहीं है कि उससे कोई भूल-चूक न हो। नबी इसलिए आदरणीय नहीं हैं कि उनसे भूल-चूक होना असम्भव है, बल्कि वे आदरणीय इसलिए हैं कि वे ईश्वरीय इच्छा के पूर्ण प्रतिनिधि हैं और उनकी छोटी-सी भूल को भी अल्लाह ने सुधारे बिना नहीं छोड़ा है। इसी तरह आदरणीय सहाबा हों या नबी (सल्ल०) की पाक पत्नियाँ, ये सब मनुष्य थे, फ़रिश्ते या परामानव न थे। उनसे भूल-चूक हो सकती थी। उनको जो उच्च पद प्राप्त हुआ, इसलिए हुआ कि अल्लाह के मार्गदर्शन और अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के प्रशिक्षण ने उनको मानवता का उत्तम आदर्श बना दिया था। उनका जो कुछ भी सम्मान है, इसी कारण है, न कि इस परिकल्पना के आधार पर कि वे कुछ ऐसी हस्तियाँ थीं जो ग़लतियों से बिलकुल पाक थीं। इसी कारण नबी (सल्ल०) के शुभकाल में सहाबा या आपकी पाक पत्नियों से होने के कारण जब भी कोई भूल-चूक हुई उसपर टोका गया। उनकी कुछ ग़लतियों का सुधार नबी (सल्ल०) ने किया जिसका उल्लेख हदीसों में बहुत-से स्थानों पर हुआ है और कुछ ग़लतियों का उल्लेख क़ुरआन मजीद में करके अल्लाह ने स्वयं उनको सुधारा, ताकि मुसलमान कभी महापुरुषों के आदर की कोई अतिशयोक्तिपूर्ण धारणा न बना लें। पाँचवीं बात यह है कि अल्लाह का दीन (धर्म) बिलकुल बेलाग है, उसमें हर व्यक्ति के लिए केवल वही कुछ है जिसका वह अपने ईमान और कर्मों की दृष्टि से पात्र है। इस मामले में विशेष रूप से नबी (सल्ल०) की पाक पत्नियों के सामने तीन प्रकार की स्त्रियों को उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत किया गया है। एक उदाहरण हज़रत नूह (अलैहि०) और हज़रत लूत (अलैहि०) की विधर्मी पत्नियों का है। [जिन के लिए] नबियों की पत्नियाँ होना कुछ काम न आया। दूसरी मिसाल फ़िरऔन की पत्नी की है। चूँकि वे ईमान ले आईं, इसलिए फ़िरऔन जैसे सबसे बड़े विधर्मी की पत्नी होना भी उनके लिए किसी हानि का कारण न बन सका। तीसरा उदाहरण हज़रत मरयम (अलैहि०) का है, जिन्हें महान पद इसलिए मिला कि अल्लाह ने जिस कठिन परीक्षा में उन्हें डालने का निर्णय किया था, उसके लिए वे नतमस्तक हो गईं। इन बातों के अतिरिक्त एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य जो इस सूरा की आयत 3 से हमें मालूम होता है वह यह है कि सर्वोच्च अल्लाह की ओर से नबी (सल्ल०) को केवल वही ज्ञान प्रदान नहीं किया जाता था जो क़ुरआन में अंकित हुआ है, बल्कि आप (सल्ल०) को प्रकाशना के द्वारा दूसरी बातों का ज्ञान भी प्रदान किया जाता था जो क़ुरआन में अंकित नहीं किया गया है।

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سُورَةُ التَّحۡرِيمِ
66. अत-तहरीम
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील और अत्यन्त दयावान है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَآ أَحَلَّ ٱللَّهُ لَكَۖ تَبۡتَغِي مَرۡضَاتَ أَزۡوَٰجِكَۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
(1) ऐ नबी! तुम क्यों उस चीज़ को हराम करते हो जिसको अल्लाह ने तुम्हारे लिए हलाल किया है।1 (क्या इसलिए कि) तुम अपनी बीवियों की प्रसन्नता चाहते हो?2—अल्लाह क्षमा करनेवाला और दया करनेवाला है।3
1. यह वास्तव में प्रश्न नहीं है, बल्कि अप्रसन्नता की अभिव्यक्ति है। अर्थात् उद्देश्य नबी (सल्ल०) से यह पूछना नहीं है कि आपने यह काम क्यों किया है? बल्कि आपको इस बात पर सचेत करना है कि अल्लाह की हलाल (वैध) की हुई चीज़ को अपने ऊपर हराम (अवैध) कर लेने का जो काम आप से हो गया है, वह अल्लाह को नापसन्द है। यद्यपि नबी (सल्ल०) ने उस चीज़ को न अक़ीदे के तौर पर हराम समझा था और न उसे शरीअत के पहलू से हराम क़रार दिया था। बल्कि केवल अपने आप पर उसके इस्तेमाल को हराम कर लिया था। लेकिन चूँकि आपकी हैसियत एक आम व्यक्ति की नहीं, बल्कि अल्लाह के रसूल की थी और आपके किसी चीज़ को अपने ऊपर हराम कर लेने से यह ख़तरा पैदा हो सकता था कि मुस्लिम समुदाय भी उस चीज़ को हराम या कम-से-कम मकरूह (नापसन्दीदा) समझने लगे, इसलिए अल्लाह ने आपके इस काम पर पकड़ की और आपको इस हराम ठहराने के काम से बाज़ रहने का हुक्म दिया। इससे यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) को भी अपने तौर पर किसी चीज़ को हलाल या हराम करने देने का अधिकार न था।
2. इससे मालूम हुआ कि नबी (सल्ल०) ने हराम ठहराने का यह काम ख़ुद अपनी किसी इच्छा के कारण नहीं किया था, बल्कि आपकी बीवियों ने यह चाहा था कि आप ऐसा करें और आपने केवल उनको प्रसन्न करने के लिए एक हलाल चीज़ अपने लिए हराम कर ली थी। हराम ठहराने के इस काम पर टोकने के साथ उसकी इस वजह का उल्लेख भी मुख्य रूप से करने से साफ़ मालूम होता है कि मक़सद सिर्फ़ नबी (सल्ल०) ही को हलाल को हराम ठहराने पर टोकना नहीं था, बल्कि साथ-साथ आपकी बीवियों को भी इस बात पर सचेत करना था कि उन्होंने नबी की बीवी होने की हैसियत से अपनो नाज़ुक ज़िम्मेदारियों का एहसास न किया और नबी (सल्ल०) से एक ऐसा काम करा दिया जिससे एक हलाल चीज़ के हराम हो जाने का ख़तरा पैदा हो सकता था। यद्यपि क़ुरआन में यह नहीं बताया गया है कि वह चीज़ क्या थी जिसे नबी (सल्ल०) ने अपने ऊपर हराम किया था, लेकिन विश्वस्त उल्लेखों से मालूम होता है कि यह शहद को हराम ठहराने की घटना थी। इसका सारांश यह है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) आम तौर पर हर दिन अस्र के बाद अपनी तमाम बीवियों के यहाँ जाते थे। एक मौक़े पर ऐसा हुआ कि आप (सल्ल०) हज़रत ज़ैनब-बिन्त-जहश के यहाँ जाकर ज़्यादा देर तक बैठने लगे, क्योंकि उनके यहाँ कहीं से शहद आया हुआ था और नबी (सल्ल०) को मीठा बहुत पसन्द था इसलिए आप (सल्ल०) उनके यहाँ शहद का शरबत पीते थे। इसपर आपकी कुछ दूसरी बीवियों को रश्क आया और उन्होंने एका करके आपको उस शहद से ऐसी नफ़रत दिलाई कि आपने उसको इस्तेमाल न करने की प्रतिज्ञा कर ली।
3. यानी बीवियों की ख़ुशी की ख़ातिर एक हलाल चीज़ को हराम कर लेने का जो काम नबी (सल्ल०) से हो गया है यह अगरचे आपके इतने ज़्यादा अहम ज़िम्मेदारीवाले मंसब के लिहाज़ से मुनासिब न था, लेकिन यह कोई गुनाह भी न था कि इसपर पकड़ की जाए। इसलिए अल्लाह तआला ने सिर्फ़ टोककर उसका सुधार कर देने पर बस किया और आप (सल्ल०) की इस ग़लती को माफ़ कर दिया।
قَدۡ فَرَضَ ٱللَّهُ لَكُمۡ تَحِلَّةَ أَيۡمَٰنِكُمۡۚ وَٱللَّهُ مَوۡلَىٰكُمۡۖ وَهُوَ ٱلۡعَلِيمُ ٱلۡحَكِيمُ ۝ 1
(2) अल्लाह ने तुम लोगों के लिए अपनी क़समों की पाबन्दी से निकलने का तरीक़ा निश्चित कर दिया है।4 अल्लाह तुम्हारा संरक्षक है, और वही जाननेवाला और तत्त्वदर्शी है।5
4. मतलब यह है कि कफ़्फ़ारा अर्थात् प्रायश्चित नियम की पूर्ति करके क़समों की पाबन्दी से निकलने का जो तरीक़ा अल्लाह ने सूरा-5 माइदा आयत-89 में निर्धारित कर दिया है उसका पालन करके आप उस प्रतिज्ञा को भंग कर दें जो आपने एक हलाल चीज़ को अपने ऊपर हराम कर लेने के लिए किया है।
5. अर्थात् अल्लाह तुम्हारा संरक्षक और तुम्हारे मामलों का ज़िम्मेदार है। वह अधिक बेहतर जानता है कि तुम्हारी भलाई किस चीज़ में है और जो आदेश भी उसने दिए हैं, सरासर तत्त्वदर्शिता के आधार पर दिए हैं। पहली बात कहने का मतलब यह है कि अल्लाह के निर्धारित किए हुए तरीक़ों में परिवर्तन करने का अधिकार तुममें से किसी को प्राप्त नहीं है। तुम्हारे लिए हक़ यही है कि अपने मामले उसके हवाले करके बस उसका आज्ञापालनि करते रहो। दूसरी बात कहने से यह हक़ीक़त मन में बिठाई गई है कि अल्लाह ने जो तरीक़े और क़ानून निर्धारित किए हैं, वे सब ज्ञान और तत्त्वदर्शिता पर आधारित हैं। जिस चीज़ को हलाल किया है, ज्ञान एवं तत्त्वदर्शिता के आधार पर हलाल किया है और जिसे हराम क़रार दिया है, उसे भी ज्ञान एवं तत्त्वदर्शिता के आधार पर हराम क़रार दिया है। इसलिए जो लोग अल्लाह पर ईमान रखते हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि हमारी भलाई इसी में है कि हम उसके दिए हुए आदेशों का पालन करें।
وَإِذۡ أَسَرَّ ٱلنَّبِيُّ إِلَىٰ بَعۡضِ أَزۡوَٰجِهٖ حَدِيثًا فَلَمَّا نَبَّأَتۡ بِهٖ وَأَظۡهَرَهُ ٱللَّهُ عَلَيۡهٖ عَرَّفَ بَعۡضَهٗ وَأَعۡرَضَ عَنۢ بَعۡضٍۖ فَلَمَّا نَبَّأَهَا بِهٖ قَالَتۡ مَنۡ أَنۢبَأَكَ هَٰذَاۖ قَالَ نَبَّأَنِيَ ٱلۡعَلِيمُ ٱلۡخَبِيرُ ۝ 2
(3) (और यह मामला भी ध्यान देने योग्य है कि) नबी ने एक बात अपनी एक बीवी से गुप्त रूप में कही थी, फिर जब उस बीवी ने (किसी और पर) वह रहस्य प्रकट कर दिया और अल्लाह ने नबी को इस (रहस्योद्घाटन) की सूचना दे दी तो नबी ने उसपर किसी हद तक (उस बीवी को) ख़बरदार किया और किसी हद तक उसे टाल दिया। फिर जब नबी ने उसे (रहस्योद्घाटन की) यह बात बताई तो उसने पूछा, आपको इसकी किसने ख़बर दी? नबी ने कहा, "मुझे उसने ख़बर दी जो सब कुछ जानता है और खूब ख़बर रखनेवाला है।''6
6. किसी रिवायत (उल्लेख) से निश्चित रूप से यह नहीं मालूम होता कि वह बात क्या थी जो नबी (सल्ल०) ने अपनी एक बीवी से राज़ (रहस्य) के तौर पर कही थी और उन बीवी ने एक दूसरी बीवी से उसका ज़िक्र कर दिया। लेकिन हमारे नज़दीक, एक तो उसका खोज लगाना सही नहीं है, दूसरे जिस मक़सद के लिए यह आयत उतरी है उसकी दृष्टि से [इसका कोई महत्त्व भी नहीं है, वरना] अल्लाह उसे स्वयं बयान फ़रमा देता। मूल उद्देश्य जिसके लिए इस मामले को क़ुरआन मजीद में बयान किया गया है, नबी (सल्ल०) की बीवियों में से एक को इस ग़लती पर टोकना है कि उनके महान प्रतिष्ठित पति ने जो बात रहस्यमय ढंग से उनसे फ़रमाई थी उसे उन्होंने रहस्य न रखा और उसे बता दिया। [रहस्योद्घाटन के इस मामले को] यह महत्त्व जिस कारण से दिया गया, वह यह था कि वह बीवी किसी सामान्य पति की न थीं, बल्कि उस महान व्यक्ति की बीवी थीं जिसे अल्लाह ने अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी के पद पर नियुक्त किया था, जिसे हर वक़्त कुफ़्फ़ार, मुशरिकों और मुनाफ़िक़ (शत्रुओं) के साथ एक निरन्तर संघर्ष करना पड़ रहा था। ऐसी हस्ती के घर में अनगिनत ऐसी बातें हो सकती थीं जो अगर राज़ न रहतीं और समय से पहले ज़ाहिर हो जाती तो उस महान कार्य को हानि पहुँच सकती थी जो वह हस्ती अंजाम दे रही थी। इसलिए जब उस घर की एक महिला की पहली बार यह कमज़ोरी सामने आई तो उसपर तत्काल टोक दिया गया और परदे के पीछे से नहीं, बल्कि क़ुरआन मजीद में स्पष्ट शब्दों में टोका गया, ताकि न सिर्फ़ नबी (सल्ल०) की पाक बीवियों को, बल्कि मुस्लिम समाज के तमाम ज़िम्मेदार लोगों की बीवियों को राज़ों की हिफ़ाज़त की ट्रेनिंग दी जाए।
إِن تَتُوبَآ إِلَى ٱللَّهِ فَقَدۡ صَغَتۡ قُلُوبُكُمَاۖ وَإِن تَظَٰهَرَا عَلَيۡهِ فَإِنَّ ٱللَّهَ هُوَ مَوۡلَىٰهُ وَجِبۡرِيلُ وَصَٰلِحُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَۖ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ بَعۡدَ ذَٰلِكَ ظَهِيرٌ ۝ 3
(4) अगर तुम दोनों अल्लाह से तौबा करती हो (तो यह तुम्हारे लिए बेहतर है), क्योंकि तुम्हारे दिल सीधी राह से हट गए हैं।7 और अगर नबी के मुक़ाबले में तुमने जत्थाबंदी की 8 तो जान रखो कि अल्लाह उसका संरक्षक है, और उसके बाद जिबरील और तमाम नेक ईमानवाले और सब फ़रिश्ते उसके साथी और सहायक हैं।9
7. मूल अरबी शब्द हैं 'फ-क़द सग़त क़ुलूबुकुमा'। 'सग़्व' अरबी भाषा में मुड़ जाने और टेढ़ा हो जाने के अर्थ में बोला जाता है। शाह वलीयुल्लाह साहब ने इस वाक्य का अनुवाद किया है, "हर आईना कज शुदा अस्त दिले-शुमा (अर्थात् निस्सन्देह तुम्हारा दिल टेढ़ा हो गया है।)" और शाह रफ़ीउद्दीन साहब का अनुवाद है, "कज (टेढ़े) हो गए हैं दिल तुम्हारे।"
8. मूल अरबी शब्द हैं 'व इन तज़ाहरा अलैहि'। तज़ाहुर का अर्थ है किसी के मुक़ाबले में परस्पर सहयोग करना या किसी के ख़िलाफ़ एका करना। आयत का सम्बोधन स्पष्ट रूप से दो महिलाओं की ओर है, और संदर्भ से मालूम होता है कि ये महिलाएँ रसूल (सल्ल०) की पाक बीवियों में से हैं। हज़रत उमर (रज़ि०) की रिवायत के अनुसार यह हज़रत आइशा (रज़ि०) और हफ़्सा (रज़ि०) हैं और सीधी राह से हट जाने का अर्थ यह है कि ये दोनों बीवियाँ नबी (सल्ल०) के साथ कुछ अधिक दुस्साहस के साथ पेश आने लगी थीं जिसे अल्लाह ने नापसन्द फ़रमाया और इन्हें चेतावनी दी।
9. मतलब यह है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के मुक़ाबले में जत्थाबन्दी करके तुम अपना ही नुक़सान करोगी, क्योंकि जिसका सरपरस्त और मददगार अल्लाह है और जिबरील और फ़रिश्ते और तमाम नेक ईमानवाले जिसके साथ हैं उसके मुक़ाबले में जत्थाबन्दी करके कोई कामयाब नहीं हो सकता।
عَسَىٰ رَبُّهٗ إِن طَلَّقَكُنَّ أَن يُبۡدِلَهٗ أَزۡوَٰجًا خَيۡرًا مِّنكُنَّ مُسۡلِمَٰتٍ مُّؤۡمِنَٰتٍ قَٰنِتَٰتٍ تَٰٓئِبَٰتٍ عَٰبِدَٰتٍ سَٰٓئِحَٰتٍ ثَيِّبَٰتٍ وَأَبۡكَارًا ۝ 4
(5) असंभव नहीं कि अगर नबी तुम सब बीवियों को तलाक़ दे दे तो अल्लाह उसे ऐसी बीवियाँ तुम्हारे बदले में प्रदान कर दे जो तुमसे बेहतर हों।10 सच्ची मुसलमान, ईमानवाली11, आज्ञापालन करनेवाली 12, तौबा करनेवाली 13, इबादत करनेवाली 14 और रोज़ेदार 15, चाहे विवाहिता हों या कुँवारियाँ।
10. इससे मालूम हुआ कि क़ुसूर सिर्फ़ हज़रत आइशा और हफ़्सा (रज़ि०) ही का न था, बल्कि नबी (सल्ल०) की दूसरी पाक बीवियाँ भी कुछ-न-कुछ क़ुसूरवार थीं। इसी लिए उन दोनों के बाद इस आयत में नबी (सल्ल०) की बाक़ी सब बीवियों को भी सावधान किया गया। हदीसों से मालूम होता है कि उस ज़माने में नबी (सल्ल०) बीवियों से इतने ज़्यादा नाराज़ हो गए थे कि एक माह तक आपने उनसे ताल्लुक़ तोड़े रखा और सहाबा (रजि०) में यह मशहूर हो गया कि आपने उनको तलाक दे दी है। हदीसों में इस घटना के बारे में जो भी विवरण आए हैं उनसे कुछ अनुमान हो सकता है कि उस वक़्त अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के घरेलू जीवन में क्या हालात पैदा हो गए थे जिनकी वजह से यह ज़रूरी हुआ कि अल्लाह हस्तक्षेप करके नबी (सल्ल०) की बीवियों के व्यवहार में सुधार करे। ये बीवियाँ यद्यपि समाज की सबसे अच्छी औरतें थी, मगर बहरहाल थीं इंसान ही, और इंसान होने के तक़ाज़ों से मुक्त न थीं। कभी इनके लिए निरन्तर तंगी की जिंदगी बसर करना दुश्वार हो जाता था और वे बे-सब्र होकर नबी (सल्ल०) से गुज़ारे-ख़र्च की माँग करने लगतीं। इसपर अल्लाह ने सूरा-33 अहजाब की आयतें-28-29 उतारकर उनको सचेत किया। (विस्तार के लिए देखिए सूरा-33 अहज़ाब, टिप्पणी-41) फिर कभी नारी-स्वभाव की वजह से उनसे ऐसी बातें हो जाती थीं जो सामान्य मानव जीवन में नित्य व्यवहार के प्रतिकूल न थीं। मगर जिस घर में होने का सौभाग्य अल्लाह ने उनको प्रदान किया था, उसकी शान और उसकी महान ज़िम्मेदारियों से वे अनुकूलता न रखती थीं। इन बातों से जब यह आशंका हुई कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के घरेलू जीवन में कहीं कड़वाहट न आ जाए और उसका प्रभाव उस महान कार्य पर न पड़े जो अल्लाह नबी (सल्ल०) से ले रहा था, तो क़ुरआन मजीद में यह आयत उतारकर उनका सुधार किया गया। इस आयत का पहला ही वाक्य ऐसा था कि उसको सुनकर नबी (सल्ल०) की पाक बीवियों के दिल काँप उठे होंगे। इसके बाद तो यह संभव ही न था कि उनकी ओर से फिर कभी कोई ऐसी बात सामने आती जिसपर अल्लाह की ओर से पकड़ की नौबत आती। यही कारण है कि क़ुरआन मजीद में बस दो ही स्थान हमको ऐसे मिलते हैं जहाँ इन सर्वश्रेष्ठ महिलाओं को चेतावनी दी गई है। एक सूरा-33 अल-अहज़ाब और दूसरे यह सूरा-66 अत-तहरीम।
11. मुस्लिम और मोमिन के शब्द जब एक साथ लाए जाते हैं तो मुस्लिम का अर्थ व्यावहारिक रूप से अल्लाह के आदेशों पर अमल करनेवाला होता है और मोमिन से मुराद वह व्यक्ति होता है जो सच्चे दिल से ईमान लाए। अतः बेहतरीन मुसलमान बीवियों की सबसे पहली ख़ूबी यह है कि वे सच्चे दिल से अल्लाह और उसके रसूल और उसके दीन पर ईमान रखती हों और व्यावहारिक रूप से अपने चरित्र, आचरण, व्यवहार और बर्ताव से अल्लाह दीन की पैरवी करनेवाली हों।
12. इसके दो मतलब हैं, और दोनों ही यहाँ मुराद हैं। एक, अल्लाह और उसके रसूल (सल्ल०) के हुक्म पर चलनेवाली। दूसरा, अपने शौहर की फ़रमाँबरदारी करनेवाली।
13. ‘ताइब’ का लफ़्ज़ जब आदमी की सिफ़त (गुण) के तौर पर आए तो इसका मतलब बस एक ही बार तौबा कर लेनेवाले नहीं होते, बल्कि ऐसे शख़्स होते हैं जो हमेशा अल्लाह से अपने क़ुसूरों की माफ़ी माँगता रहे, जिसका ज़मीर (अन्तरात्मा) ज़िन्दा और बेदार हो, जिसे हर वक़्त अपनी कमज़ोरियों और ग़लतियों का एहसास होता रहे और वह उनपर शर्मिन्दा हो। ऐसे शख़्स में कभी घमण्ड, अकड़ और ख़ुदपसन्दी के जज़्बात पैदा नहीं होते, बल्कि वह फ़ितरी तौर पर नर्म मिज़ाज और बरदाश्त करनेवाला होता है।
14. इबादत-गुज़ार आदमी बहरहाल कभी उस व्यक्ति की तरह ख़ुदा से ग़ाफ़िल नहीं हो सकता जिस तरह इबादत न करनेवाला इनसान होता है। एक औरत को बेहतरीन बीवी बनाने में इस चीज़ का भी बड़ा दख़ल है। इबादत-गुज़ार होने की वजह से वह अल्लाह की क़ायम की हुई हदों की पाबन्दी करती है, हक़वालों के हक़ पहचानती और अदा करती है, उसका ईमान हर वक़्त ताज़ा और ज़िन्दा रहता है, उससे इस बात की ज़्यादा उम्मीद की जा सकती है कि वह अल्लाह के हुक्मों की पैरवी से मुँह नहीं मोड़ेगी।
15. मूल में अरबी शब्द 'साइहात' प्रयुक्त हुआ है। अनेकों सहाबा और बहुत-से ताबिईन ने इसका अर्थ 'साइमात' बयान किया है। रोज़े के लिए सयाहत (सैर करने) का शब्द जिस संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है, वह यह है कि पुराने समय में सयाहत अधिकतर राहिब (संन्यासी) और दरवेश लोग करते थे और का उनके साथ रास्ते का कोई सामान (खाने-पीने का) नहीं हुआ करता था। प्रायः उनको उस समय तक भूखा रहना पड़ता था जब तक कहीं से कुछ खाने को न मिल जाए। इस कारण रोज़ा भी एक तरह की दरवेशी भरा ही है कि जब जक इफ़्तार का वक़्त न आए, रोज़ेदार भी भूखा रहता है। नबी (सल्ल०) की पाक बीवियों को सम्बोधित करके अल्लाह का यह इर्शाद है कि अगर नबी (सल्ल०) तुमको तलाक़ दे दें तो अल्लाह तुम्हारे बदले में उनको ऐसी बीवियाँ प्रदान करेगा जिनमें ऐसी-ऐसी विशेषताएँ होंगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि नबी (सल्ल०) की पाक बीवियाँ ये विशेषताएँ नहीं रखती थीं, बल्कि इसका अर्थ यह है कि तुम्हारे जिस ग़लत व्यवहार से नबी (सल्ल०) को तकलीफ़ हो रही है उसको छोड़ दो और उसके बजाए अपना सारा ध्यान इस कोशिश में लगाओ कि तुम्हारे अन्दर ये पवित्र गुण पूरे-पूरे तौर पर पैदा हों।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ قُوٓاْ أَنفُسَكُمۡ وَأَهۡلِيكُمۡ نَارًا وَقُودُهَا ٱلنَّاسُ وَٱلۡحِجَارَةُ عَلَيۡهَا مَلَٰٓئِكَةٌ غِلَاظٌ شِدَادٌ لَّا يَعۡصُونَ ٱللَّهَ مَآ أَمَرَهُمۡ وَيَفۡعَلُونَ مَا يُؤۡمَرُونَ ۝ 5
(6) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, बचाओ अपने आपको और अपने घरवालों को उस आग से जिसका ईंधन इंसान और पत्थर होंगे,16 जिसपर कठोर स्वभाव के सख़्त पकड़ करनेवाले फ़रिश्ते नियुक्त होंगे जो कभी अल्लाह के हुक्म की अवज्ञा नहीं करते और जो आदेश भी उन्हें दिया जाता है उसका पालन करते हैं17।
16. यह आयत बताती है कि एक व्यक्ति की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ अपने आप ही को अल्लाह के अज़ाब से बचाने की कोशिश तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका काम यह भी है कि प्राकृतिक-व्यवस्था ने जिस परिवार की अध्यक्षता का बोझ उसपर डाला है उसको भी वह अपनी सामर्थ्य की हद तक ऐसी शिक्षा-दीक्षा दे जिससे वे अल्लाह के प्रिय इंसान बनें और अगर वे जहन्नम के मार्ग पर जा रहे हों तो जहाँ तक भी उसके बस में हो उनको उससे रोकने की कोशिश करे। 'जहन्नम का ईंधन पत्थर होंगे' से मुराद शायद पत्थर का कोयला है। इब्ने-अब्बास (रज़ि०), मुजाहिद (रह०), इमाम मुहम्मद अल-बाक़र (रह०) और सुद्दी (रह०) कहते हैं कि ये गंधक के पत्थर होंगे।
17. अर्थात् उनको जो सज़ा भी किसी अपराधी को देने का हुक्म दिया जाएगा उसे ज्यों-का-त्यों लागू करेंगे और तनिक भी दया न करेंगे।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَا تَعۡتَذِرُواْ ٱلۡيَوۡمَۖ إِنَّمَا تُجۡزَوۡنَ مَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ۝ 6
(7) (उस समय कहा जाएगा कि) ऐ इंकार करनेवालो, आज उज़्र (बहाने) पेश न करो, तुम्हें तो वैसा ही बदला दिया जा रहा है जैसे तुम कर्म कर रहे थे।18
18. इन दोनों आयतों की वर्णन-शैली अपने भीतर मुसलमानों के लिए कड़ी चेतावनी लिए हुए है। पहली आयत में मुसलमानों को सम्बोधित करके फ़रमाया गया कि अपने आपको और अपने घरवालों को इस भयानक अज़ाब से बचाओ और दूसरी आयत में फ़रमाया गया कि जहन्नम में अज़ाब देते वक़्त इंकारियों से यह कहा जाएगा। इससे अपने आप यह विषय सामने आता है कि मुसलमानों को दुनिया में वह कार्य-नीति अपनाने से बचना चाहिए जिसके कारण आख़िरत में उनका अंजाम सत्य के इंकारियों के साथ हो।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ تُوبُوٓاْ إِلَى ٱللَّهِ تَوۡبَةً نَّصُوحًا عَسَىٰ رَبُّكُمۡ أَن يُكَفِّرَ عَنكُمۡ سَيِّـَٔاتِكُمۡ وَيُدۡخِلَكُمۡ جَنَّٰتٍ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ يَوۡمَ لَا يُخۡزِي ٱللَّهُ ٱلنَّبِيَّ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مَعَهُۥۖ نُورُهُمۡ يَسۡعَىٰ بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَبِأَيۡمَٰنِهِمۡ يَقُولُونَ رَبَّنَآ أَتۡمِمۡ لَنَا نُورَنَا وَٱغۡفِرۡ لَنَآۖ إِنَّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٍ قَدِيرٌ ۝ 7
(8) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, अल्लाह से तौबा करो, विशुद्ध तौबा19, असंभव नहीं कि अल्लाह तुम्हारी बुराइयाँ तुमसे दूर कर दे और तुम्हें ऐसी जन्नतों में दाख़िल कर दे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी।20 यह वह दिन होगा जब अल्लाह अपने नबी को और उन लोगों को जो उसके साथ ईमान लाए हैं, रुसवा नहीं करेगा।21 उनका नूर (प्रकाश) उनके आगे-आगे और उनके दाहिनी तरफ़ दौड़ रहा होगा और वे कह रहे होंगे कि ऐ हमारे रब! हमारा नूर (प्रकाश) हमारे लिए मुकम्मल कर दे और हमें माफ़ कर, तू हर चीज़ पर सामर्थ्य रखता है।22
19. मूल में अरबी शब्द 'तौबतन-नसूहा' प्रयुक्त हुए हैं। तौबा को नसूह कहने का मतलब शब्दकोश की दृष्टि से या तो यह होगा कि आदमी ऐसी विशुद्ध तौबा करे जिसमें दिखावा और कपट लेश-मात्र भी न हो, या यह कि आदमी ख़ुद अपने साथ ख़ैख़ाही करे और गुनाह से तौबा करके अपने आपको दुष्परिणाम से बचा ले, या यह कि गुनाह से उसके दीन में जो दरार पड़ गई है, तौबा के द्वारा उसका सुधार करे, या यह कि तौबा करके वह अपने जीवन को इतना सँवार ले कि दूसरों के लिए वह शिक्षा लेने का साधन बन जाए। रहा इसका शरई अर्थ तो [अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के कथन के अनुसार तौबतुन-नसूह] से मुराद यह है कि जब तुमसे कोई क़ुसूर हो जाए तो अपने गुनाह पर शर्मिन्दा हो, फिर शर्मिन्दगी के साथ उसपर अल्लाह से क्षमा चाहो और आगे कभी यह काम न करो। (इब्ने-अबी-हातिम)
20. आयत के शब्द ध्यान देने योग्य हैं। यह नहीं कहा जा रहा है कि तौबा कर लो तो तुम्हें ज़रूर माफ़ कर दिया जाएगा और अनिवार्य रूप से तुम जन्नत में दाख़िल कर दिए जाओगे [बल्कि यह आशा दिलाई गई है] कि अगर तुम सच्चे दिल से तौबा करोगे तो असंभव नहीं कि अल्लाह तुम्हारे साथ यह मामला करे। इसका अर्थ यह है कि गुनाहगार की तौबा क़ुबूल कर लेना और उसे सज़ा देने के बजाए जन्नत प्रदान कर देना अल्लाह पर अनिवार्य नहीं है, बल्कि यह सरासर उसकी कृपा एवं दया होगी कि वह माफ़ भी कर दे और पुरस्कार भी दे। बन्दे को उससे क्षमा की आशा तो ज़रूर रखनी चाहिए, मगर इस भरोसे पर गुनाह नहीं करना चाहिए कि तौबा से माफ़ी मिल जाएगी।
21. यानी उनके अच्छे कर्मों का बदला नष्ट न करेगा। इनकारियों और कपटाचारियों को यह कहने का मौक़ा हरगिज़ न देगा कि इन लोगों ने ईशपरायणता भी की तो उसका क्या बदला पाया। रुसवाई बग़ावत करनेवालों और नाफ़रमानों के हिस्से में आएगी न कि वफ़ादारों और फ़रमाँबरदारों के हिस्से में।
22. इस आयत को सूरा-57 हदीद की आयतें—12, 13 के साथ मिलाकर पढ़ा जाए तो यह बात साफ़ मालूम हो जाती है कि ईमानवालों के आगे-आगे नूर के दौड़ने की यह कैफ़ियत उस वक़्त पेश आएगी जब वे हश्र के मैदान से जन्नत की तरफ़ जा रहे होंगे। वहाँ हर तरफ़ घुप्प अँधेरा होगा जिसमें वे सब लोग ठोकरें खा रहे होंगे जिनके हक़ में जहन्नम का फ़ैसला होगा, और रौशनी सिर्फ़ ईमानवालों के साथ होगी, जिसके सहारे वे अपना रास्ता तय कर रहे होंगे। इस नाज़ुक मौक़े पर अंधेरों में भटकनेवाले लोगों का रोना-चिल्लाना सुन-सुनकर ईमानवालों पर डर की कैफ़ियत छा रही होगी, अपने क़ुसूरों और अपनी कोताहियों का एहसास करके उन्हें अन्देशा हो रहा होगा कि कहीं हमारा नूर भी न छिन जाए और हम इन बदनसीबों की तरह ठोकरें खाते न रह जाएँ, इसलिए वे दुआ करेंगे कि ऐ हमारे रब! हमारे क़ुसूर माफ़ कर दे और हमारे नूर को जन्नत में पहुँचने तक हमारे लिए बाक़ी रख। इब्ने-जरीर ने हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अब्बास (रज़ि०) का क़ौल नक़्ल किया है कि ‘रब्बना अतमिम लना नू-रना’ का मतलब यह है कि “वे अल्लाह तआला से दुआ करेंगे कि उनका नूर उस वक़्त तक बाक़ी रखा जाए और उसे बुझने न दिया जाए जब तक वे पुल-सिरात से ख़ैरियत से न गुज़र जाएँ।” हज़रत हसन बसरी, मुजाहिद और ज़ह्हाक की तफ़सीर भी क़रीब-क़रीब यही है। इब्ने-कसीर (रह०) ने उनका यह क़ौल नक़्ल किया है कि “ईमानवाले जब देखेंगे कि मुनाफ़िक़ नूर से महरूम रह गए हैं तो वे अपने हक़ में अल्लाह से नूर के पूरा होने की दुआ करेंगे।” (और ज़्यादा तशरीह के लिए देखिए— तफ़हीमुल-क़ुरआन, सूरा-57 हदीद, हाशिया-17)
يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِيُّ جَٰهِدِ ٱلۡكُفَّارَ وَٱلۡمُنَٰفِقِينَ وَٱغۡلُظۡ عَلَيۡهِمۡۚ وَمَأۡوَىٰهُمۡ جَهَنَّمُۖ وَبِئۡسَ ٱلۡمَصِيرُ ۝ 8
(9) ऐ नबी! काफ़िरों (इंकार करनेवालों) और मुनाफ़िक़ों (कपटाचारियों) से जिहाद (संघर्ष) करो और उनके साथ सख़्ती से पेश आओ।23 उनका ठिकाना जहन्नम है, और वह बहुत बुरा ठिकाना है।
23. व्याख्या के लिए देखिए सूरा-9 अत-तौबा, टिप्पणी-82
ضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلٗا لِّلَّذِينَ كَفَرُواْ ٱمۡرَأَتَ نُوحٖ وَٱمۡرَأَتَ لُوطٖۖ كَانَتَا تَحۡتَ عَبۡدَيۡنِ مِنۡ عِبَادِنَا صَٰلِحَيۡنِ فَخَانَتَاهُمَا فَلَمۡ يُغۡنِيَا عَنۡهُمَا مِنَ ٱللَّهِ شَيۡـٔٗا وَقِيلَ ٱدۡخُلَا ٱلنَّارَ مَعَ ٱلدَّٰخِلِينَ ۝ 9
(10) अल्लाह इंकार करनेवालों के मामले में नूह और लूत की बीवियों को मिसाल के तौर पर पेश करता है। वे हमारे दो नेक बन्दों के निकाह में थीं, मगर उन्होंने अपने उन शौहरों के साथ विश्वासघात किया24 और वे अल्लाह के मुकाबले में उनके कुछ भी काम न आ सके। दोनों से कह दिया गया कि जाओ, आग में जानेवालों के साथ तुम भी चली जाओ
24. यह ख़ियानत (विश्वासघात) इस अर्थ में नहीं है कि वे बदकारी (कुकर्म) कर बैठी थीं, बल्कि इस अर्थ में है कि उन्होंने ईमान की राह में हज़रत नूह (अलैहि०) और हज़रत लूत (अलैहि०) का साथ न दिया, बल्कि उनके मुकाबले में दोन के शत्रुओं का साथ देती रहीं।
وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًا لِّلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱمۡرَأَتَ فِرۡعَوۡنَ إِذۡ قَالَتۡ رَبِّ ٱبۡنِ لِي عِندَكَ بَيۡتًا فِي ٱلۡجَنَّةِ وَنَجِّنِي مِن فِرۡعَوۡنَ وَعَمَلِهٖ وَنَجِّنِي مِنَ ٱلۡقَوۡمِ ٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 10
(11) और ईमानवालों के मामले में अल्लाह फ़िरऔन की बीवी की मिसाल पेश करता है, जबकि उसने दुआ की, "ऐ मेरे रब! मेरे लिए अपने यहाँ जन्नत में एक घर बना दे और मुझे फ़िरऔन और उसके कर्म से बचा लें25 और ज़ालिम लोगों से मुझे छुटकारा दे।
25. अर्थात् फ़िरऔन जो दुष्कर्म कर रहा है उसके दुष्परिणाम में मुझे शरीक न कर।
وَمَرۡيَمَ ٱبۡنَتَ عِمۡرَٰنَ ٱلَّتِيٓ أَحۡصَنَتۡ فَرۡجَهَا فَنَفَخۡنَا فِيهِ مِن رُّوحِنَا وَصَدَّقَتۡ بِكَلِمَٰتِ رَبِّهَا وَكُتُبِهِۦ وَكَانَتۡ مِنَ ٱلۡقَٰنِتِينَ ۝ 11
(12) और इमरान की बेटी मरयम26 की मिसाल देता है जिसने अपनी शर्मगाह (सतीत्व) की रक्षा की थी।27 फिर हमने उसके अन्दर अपनी ओर से रूह (आत्मा) फूँक दी28, और उसने अपने रब के बयानों और उसकी किताबों की पुष्टि की और वह आज्ञाकारी लोगों में से थी।29
26. हो सकता है कि हज़रत मरयम (अलैहि०) के पिता का नाम इमरान हो या उनको इमरान की बेटी इसलिए कहा गया हो कि वह इमरान के कुटुम्ब से थीं।
27. यह यहूदियों के इस आरोप का खंडन है कि उनके पेट से हज़रत ईसा (अलैहि०) का जन्म, अल्लाह की पनाह, किसी गुनाह का नतीजा था। सूरा-4 अन-निसा आयत-156 में इन ज़ालिमों के इसी आरोप को बहुत बड़ी तोहमत कहा गया है। (व्याख्या के लिए देखिए सूरा-4 अन-निसा, टिप्पणी-190)
28. यानी बिना इसके कि उनका किसी मर्द से ताल्लुक़ होता, उनके पेट में अपनी तरफ़ से एक जान डाल दी। (व्याख्या के लिए देखिए— तफ़हीमुल-क़ुरआन, सूरा-4 निसा, टिप्पणी—212, 213; सूरा-21 अम्बिया, हाशिया-89)
29. जिस मक़सद के लिए इन तीन तरह की औरतों को मिसाल में पेश किया गया है उसकी तशरीह हम इस सूरा के परिचय में कर चुके हैं, इसलिए उसको दोहराने की ज़रूरत नहीं है।