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سُورَةُ الشُّورَىٰ

42. अश-शूरा

(मक्का में उतरी, आयतें 53)

परिचय

नाम

आयत 38 के वाक्यांश “व अमरुहुम शूरा बैन-हुम' अर्थात् 'वे अपने मामले आपस के परामर्श (अश-शूरा) से चलाते हैं' से लिया गया है। इस नाम का अर्थ यह है कि वह सूरा जिसमें शब्द 'शूरा' आया है।

उतरने का समय

इसकी विषय-वस्तु पर विचार करने से साफ़ महसूस होता है कि यह सूरा-41 'हा-मीम अस-सजदा' के ठीक बाद उतरी होगी, क्योंकि यह एक तरह से बिल्कुल उसकी अनुपूरक दिखाई देती है। सूरा-41 (हा-मीम अस-सजदा) में क़ुरैश के सरदारों के अंधे-बहरे विरोध पर बड़ी गहरी चोटें की गई थीं। उस चेतावनी के तुरन्त बाद यह सूरा अवतरित की गई, जिसने समझाने-बुझाने का हक़ अदा कर दिया।

विषय और वार्ता

बात इस तरह आरंभ की गई है कि [मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर वह्य (ईश-प्रकाशना) का आना कोई निराली बात नहीं] ऐसी ही वह्य, इसी तरह के आदेश के साथ अल्लाह इससे पहले भी नबियों (उनपर ख़ुदा की दया और कृपा हो) पर निरन्तर भेजता रहा है। इसके बाद बताया गया है कि नबी सिर्फ़ ग़ाफ़िलों को चौंकाने और भटके हुओं को रास्ता बताने आया है। [वह खुदा के पैदा किए हुए लोगों के भाग्यों का मालिक नहीं बनाया गया है।] उसकी बात न माननेवालों की पकड़ करना और उन्हें अज़ाब देना या न देना अल्लाह का अपना काम है। फिर इस विषय के रहस्य को स्पष्ट किया गया है कि अल्लाह ने सारे इंसानों को जन्म ही से सीधे रास्ते पर चलनेवाला क्यों न बना दिया और यह मतभेद की सामर्थ्य क्यों दे दी, जिसकी वजह से लोग विचार और कर्म के हर उलटे-सीधे रास्ते पर चल पड़ते हैं। इसके बाद यह बताया गया है कि जिस धर्म को मुहम्मद (सल्ल०) पेश कर रहे हैं, वह वास्तव में है क्या? उसका पहला आधार यह है कि अल्लाह चूँकि जगत् और इंसान का पैदा करनेवाला, मालिक और वास्तविक संरक्षक है, इसलिए वही इंसान का शासक भी है और उसी का यह अधिकार है कि इंसान को दीन और शरीअत (धर्म और विधि-विधान अर्थात् धारणा और कर्म की प्रणाली) प्रदान करे। दूसरे शब्दों में, प्राकृतिक प्रभुत्त्व की तरह विधि-विधान सम्‍बन्‍धी प्रभुत्‍व भी अल्‍लाह के लिए विशिष्‍ट है। इसी आधार पर अल्‍लाह तआला ने आदिकालत से इंसान के लिए एक धर्म निर्धारित किया है। वह एक ही धर्म या जो हर युग में तमाम नबियों को दिया जाता रहा। कोई नबी भी अपने किसी अलग धर्म का प्रवर्तक नहीं था। वह धर्म हमेशा इस उद्देश्य के लिए भेजा गया है कि ज़मीन पर वही स्थापित, प्रचलित और लागू हो। पैग़म्‍बर इस धर्म के सिर्फ़ प्रचार पर नहीं, बल्कि उसे स्थापित करने की सेवा कार्य पर लगाए गए थे। मानव-जाति का मूल धर्म यही था, किन्‍तु नबियों के बाद हमेशा यही होता रहा कि स्‍वार्थी लोग उसके अन्‍दर अपने स्‍वेच्‍छाचार, अहंकार और आत्‍म-प्रदर्शन की भावना के कारण अपने स्‍वार्थ के लिए साम्प्रदायिकता खड़ी करके नए-नए धर्म निकालते रहे। अब मुहम्मद (सल्ल०) इसलिए भेजे गए है कि कृत्रिम पंथों और कृत्रिम धर्मों और इंसानों के गढ़े हुए धर्मों की जगह वही मूल धर्म लोगों के सामने प्रस्तुत करें और (पूरे जमाव के साथ) उसी को स्थापित करने की कोशिश करें। तुम लोगों को यह एहसास नहीं है कि अल्लाह के दीन को छोड़कर अल्लाह के अतिरिक्त दूसरों के बनाए हुए दीन (धर्म) और क़ानून को अपनाना अल्‍लाह के मुक़ाबले में कितना बड़ा दुस्‍साहास है। अल्‍लाह के नज़दीक यह सब से बुरा शिर्क और बड़ा संगीन अपराध है, जिसकी कड़ी सज़ा भुगतनी पड़ेगी। इस तरह दीन की एक स्पष्ट धारणा प्रस्तुत करने के बाद फ़रमाया गया है कि तुम लोगों को समझाकर सीधे रास्‍ते पर लाने के लिए जो बेहतर से बेहतर तरीक़ा सम्भव था, वह प्रयोग में लाया जा चुका। इसपर भी अगर तुम मार्ग न पाओ तो दुनिया में कोई चीज़ तुम्हें सीधे रास्ते पर नहीं ला सकती। इन यथार्थ तथ्यों को बयान करते हुए बीच-बीच में संक्षेप में तौहीद (एकेश्वरवाद) और आख़िरत (परलोकवाद) की दलीलें दी गई हैं और दुनियापरस्‍ती के नतीजों पर सचेत किया गया है। फिर वार्ता को समाप्त करते हुए दो महत्त्वपूर्ण बातें कही गई हैं। एक यह कि मुहम्मद (सल्ल०) का अपनी समस्याओं और वार्ताओं से बिलकुल अनभिज्ञ रहना और फिर यकायक इन दोनों चीजों को लेकर दुनिया के सामने आ जाना, आप (सल्ल.) के नबी होने का स्पष्ट प्रमाण है। दूसरे यह कि अल्लाह ने यह शिक्षा तमाम नबियों की तरह आप (सल्ल.) को भी तीन तरीक़ों से दी है, एक वह्य (प्रकाशना), दूसरे परदे के पीछे से आवाज़ और तीसरे फ़रिश्तों के द्वारा सन्देश। यह स्पष्ट इसलिए किया गया कि विरोधी लोग यह आरोप न लगा सकें कि नबी (सल्ल०) अल्लाह से उसके सम्मुख होकर बात करने का दावा कर रहे हैं।

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سُورَةُ الشُّورَىٰ
42. अश-शूरा
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान हैं।
حمٓ ۝ 1
हा-मीम॥1॥
عٓسٓقٓ ۝ 2
ऐन-सीन-क़ाफ़ ॥2॥
كَذَٰلِكَ يُوحِيٓ إِلَيۡكَ وَإِلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكَ ٱللَّهُ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡحَكِيمُ ۝ 3
इसी प्रकार अल्लाह प्रुभत्वशाली, तत्वदर्शी तुम्हारी ओर और उन लोगों की ओर (प्रकाशना) वह्‍य करता रहा है जो तुम से पहले गुज़र चुके हैं।॥3॥
لَهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۖ وَهُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡعَظِيمُ ۝ 4
आकाशों और धरती में जो कुछ है उसी का है, और वह सर्वोच्‍च, महिमावान है।॥4॥
تَكَادُ ٱلسَّمَٰوَٰتُ يَتَفَطَّرۡنَ مِن فَوۡقِهِنَّۚ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ يُسَبِّحُونَ بِحَمۡدِ رَبِّهِمۡ وَيَسۡتَغۡفِرُونَ لِمَن فِي ٱلۡأَرۡضِۗ أَلَآ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ ۝ 5
लगता है कि आकाश स्वयं अपने ऊपर से फट पड़े। हाल यह है कि फ़रिश्ते अपने रब का गुणगान कर रहे हैं और उन लोगों के लिए जो धरती में है, क्षमा की प्रार्थना करते रहते हैं। सुन लो! निश्‍चय ही अल्लाह क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है।॥5॥
وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَ ٱللَّهُ حَفِيظٌ عَلَيۡهِمۡ وَمَآ أَنتَ عَلَيۡهِم بِوَكِيلٖ ۝ 6
और जिन लोगों ने उससे हटकर अपने कुछ दूसरे संरक्षक बना रखे हैं, अल्लाह उनपर निगरानी रखे हुए है। तुम उनके कोई ज़िम्मेदार नहीं हो।॥6॥
وَكَذَٰلِكَ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ قُرۡءَانًا عَرَبِيّٗا لِّتُنذِرَ أُمَّ ٱلۡقُرَىٰ وَمَنۡ حَوۡلَهَا وَتُنذِرَ يَوۡمَ ٱلۡجَمۡعِ لَا رَيۡبَ فِيهِۚ فَرِيقٞ فِي ٱلۡجَنَّةِ وَفَرِيقٞ فِي ٱلسَّعِيرِ ۝ 7
और (जैसे हम स्पष्ट आयतें उतारते हैं) उसी प्रकार हमने तुम्हारी ओर एक अरबी क़ुरआन की प्रकाशना की है, ताकि तुम बस्तियों के केन्द्र (मक्‍का) को और जो लोग उसके चतुर्दिक हैं उनको सचेत कर दो, और सचेत करो इकट्ठा होने के दिन से, जिसमें कोई सन्देह नहीं। एक गिरोह जन्‍नत में होगा और एक गिरोह भड़कती आग में।॥7॥
وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَعَلَهُمۡ أُمَّةٗ وَٰحِدَةٗ وَلَٰكِن يُدۡخِلُ مَن يَشَآءُ فِي رَحۡمَتِهِۦۚ وَٱلظَّٰلِمُونَ مَا لَهُم مِّن وَلِيّٖ وَلَا نَصِيرٍ ۝ 8
यदि अल्लाह चाहता तो उन्हें एक ही समुदाय बना देता, किन्तु वह जिसे चाहता है अपनी दयालुता में दाख़िल करता है। रहे ज़ालिम, तो उनका न तो कोई निकटवर्ती मित्र है और न कोई (दूर का) सहायक।॥8॥
أَمِ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَۖ فَٱللَّهُ هُوَ ٱلۡوَلِيُّ وَهُوَ يُحۡيِ ٱلۡمَوۡتَىٰ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ ۝ 9
(क्या उन्होंने अल्लाह से हटकर दूसरे सहायक बना लिए हैं), या उन्होंने उससे हटकर दूसरे संरक्षक बना रखे हैं? संरक्षक तो अल्लाह ही है। वही मुर्दों को जीवित करता है और उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्‍त है।॥9॥
وَمَا ٱخۡتَلَفۡتُمۡ فِيهِ مِن شَيۡءٖ فَحُكۡمُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبِّي عَلَيۡهِ تَوَكَّلۡتُ وَإِلَيۡهِ أُنِيبُ ۝ 10
(रसूल ने कहा,) "जिस चीज़ में तुमने विभेद किया है उसका फ़ैसला तो अल्लाह के हवाले है। वही अल्लाह मेरा रब है। उसी पर मैंने भरोसा किया है और उसी की ओर में रुजू करता हूँ।॥10॥
فَاطِرُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ جَعَلَ لَكُم مِّنۡ أَنفُسِكُمۡ أَزۡوَٰجٗا وَمِنَ ٱلۡأَنۡعَٰمِ أَزۡوَٰجٗا يَذۡرَؤُكُمۡ فِيهِۚ لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَيۡءٞۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ ۝ 11
वह आकाशों और धरती का पैदा करनेवाला है। उसने तुम्हारे लिए तुम्हारी अपनी ही सहजाति से जोड़े बनाए, और चौपायों के जोड़े भी। फैला रहा है वह तुमको अपने में। उसके सदृश कोई चीज़ नहीं। वही सब कुछ सुनता, देखता है।॥11॥
لَهُۥ مَقَالِيدُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ يَبۡسُطُ ٱلرِّزۡقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقۡدِرُۚ إِنَّهُۥ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ ۝ 12
आकाशों और धरती की कुंजियाँ उसी के पास हैं। वह जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है नपी-तुली कर देता है। निस्सन्‍देह उसे हर चीज़ का ज्ञान है।॥12॥
۞شَرَعَ لَكُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا وَصَّىٰ بِهِۦ نُوحٗا وَٱلَّذِيٓ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ وَمَا وَصَّيۡنَا بِهِۦٓ إِبۡرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَىٰٓۖ أَنۡ أَقِيمُواْ ٱلدِّينَ وَلَا تَتَفَرَّقُواْ فِيهِۚ كَبُرَ عَلَى ٱلۡمُشۡرِكِينَ مَا تَدۡعُوهُمۡ إِلَيۡهِۚ ٱللَّهُ يَجۡتَبِيٓ إِلَيۡهِ مَن يَشَآءُ وَيَهۡدِيٓ إِلَيۡهِ مَن يُنِيبُ ۝ 13
उसने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया जिसकी ताकीद उसने नूह को की थी।" और वह (जीवन्त आदेश), जिसकी प्रकाशना हमने तुम्हारी ओर की है और वह जिसकी ताकीद हमने इबराहीम और मूसा और ईसा को की थी, यह है कि "धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग न हो जाओ।" बहुदेववादियों को वह चीज़ बहुत अप्रिय है जिसकी ओर तुम उन्हें बुलाते हो। अल्लाह जिसे चाहता है अपनी ओर छाँट लेता है और अपनी ओर का मार्ग उसी को दिखाता है जो उसकी ओर रुजू करता है।॥13॥
وَمَا تَفَرَّقُوٓاْ إِلَّا مِنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلۡعِلۡمُ بَغۡيَۢا بَيۡنَهُمۡۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةٞ سَبَقَتۡ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰٓ أَجَلٖ مُّسَمّٗى لَّقُضِيَ بَيۡنَهُمۡۚ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ أُورِثُواْ ٱلۡكِتَٰبَ مِنۢ بَعۡدِهِمۡ لَفِي شَكّٖ مِّنۡهُ مُرِيبٖ ۝ 14
उन्होंने तो परस्पर एक-दूसरे पर ज़्यादती करने के उद्देश्य से इसके पश्‍चात् विभेद किया कि उनके पास ज्ञान आ चुका था। और यदि तुम्हारे रब की ओर से एक नियत अवधि तक के लिए बात पहले निश्चित न हो चुकी होती तो उनके बीच फ़ैसला चुका दिया गया होता। किन्तु जो लोग उनके पश्‍चात् किताब के वारिस हुए वे उसकी ओर से एक उलझन में डाल देनेवाले सन्देह में पड़े हुए हैं।॥14॥
فَلِذَٰلِكَ فَٱدۡعُۖ وَٱسۡتَقِمۡ كَمَآ أُمِرۡتَۖ وَلَا تَتَّبِعۡ أَهۡوَآءَهُمۡۖ وَقُلۡ ءَامَنتُ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِن كِتَٰبٖۖ وَأُمِرۡتُ لِأَعۡدِلَ بَيۡنَكُمُۖ ٱللَّهُ رَبُّنَا وَرَبُّكُمۡۖ لَنَآ أَعۡمَٰلُنَا وَلَكُمۡ أَعۡمَٰلُكُمۡۖ لَا حُجَّةَ بَيۡنَنَا وَبَيۡنَكُمُۖ ٱللَّهُ يَجۡمَعُ بَيۡنَنَاۖ وَإِلَيۡهِ ٱلۡمَصِيرُ ۝ 15
अतः इसी लिए (उन्हें सत्य की ओर) बुलाओ, और जैसा कि तुम्हें हुक्म दिया गया है स्वयं क़ायम रहो, और उनकी इच्छाओं का पालन न करना और कह दो, "अल्लाह ने जो किताब अवतरित की है, मैं उसपर ईमान लाया। मुझे तो आदेश हुआ है कि मैं तुम्हारे बीच न्याय करूँ। अल्लाह ही हमारा भी रब है और तुम्हारा रब भी। हमारे लिए हमारे कर्म है और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। हममें और तुममें कोई झगड़ा नहीं। अल्लाह हम सबको इकट्ठा करेगा और अन्ततः उसी की ओर जाना भी है।"॥15॥
وَٱلَّذِينَ يُحَآجُّونَ فِي ٱللَّهِ مِنۢ بَعۡدِ مَا ٱسۡتُجِيبَ لَهُۥ حُجَّتُهُمۡ دَاحِضَةٌ عِندَ رَبِّهِمۡ وَعَلَيۡهِمۡ غَضَبٞ وَلَهُمۡ عَذَابٞ شَدِيدٌ ۝ 16
जो लोग अल्लाह के विषय में झगड़ते हैं, इसके बाद कि उसकी पुकार स्वीकार कर ली गई, उनका झगड़ना उनके रब की दृ‍ष्टि में बिलकुल न ठहरनेवाला (असत्य) है। प्रकोप है उनपर और उनके लिए कड़ी यातना है।॥16॥
ٱللَّهُ ٱلَّذِيٓ أَنزَلَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ وَٱلۡمِيزَانَۗ وَمَا يُدۡرِيكَ لَعَلَّ ٱلسَّاعَةَ قَرِيبٞ ۝ 17
वह अल्लाह ही है जिसने हक़ के साथ किताब और तुला अवतरित की। और तुम्हें क्या मालूम कदाचित क़ियामत की घड़ी निकट ही आ लगी हो।॥17॥
يَسۡتَعۡجِلُ بِهَا ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِهَاۖ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مُشۡفِقُونَ مِنۡهَا وَيَعۡلَمُونَ أَنَّهَا ٱلۡحَقُّۗ أَلَآ إِنَّ ٱلَّذِينَ يُمَارُونَ فِي ٱلسَّاعَةِ لَفِي ضَلَٰلِۭ بَعِيدٍ ۝ 18
उसकी जल्दी वे लोग मचाते हैं जो उसपर ईमान नहीं रखते, किन्तु जो ईमान रखते हैं वे तो उससे डरते हैं और जानते हैं कि वह सत्य है। जान लो, जो लोग उस घड़ी के बारे में सन्देह डालनेवाली बहसें करते हैं, वे परले दरजे की गुमराही में पड़े हुए हैं।॥18॥
ٱللَّهُ لَطِيفُۢ بِعِبَادِهِۦ يَرۡزُقُ مَن يَشَآءُۖ وَهُوَ ٱلۡقَوِيُّ ٱلۡعَزِيزُ ۝ 19
अल्लाह अपने बन्दों की सूक्ष्‍म से सूक्ष्‍म बातों का ख़याल रखता है। वह जिसे चाहता है रोज़ी देता है। वह शक्तिमान, अत्यन्त प्रभुत्वशाली है।॥19॥
مَن كَانَ يُرِيدُ حَرۡثَ ٱلۡأٓخِرَةِ نَزِدۡ لَهُۥ فِي حَرۡثِهِۦۖ وَمَن كَانَ يُرِيدُ حَرۡثَ ٱلدُّنۡيَا نُؤۡتِهِۦ مِنۡهَا وَمَا لَهُۥ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِن نَّصِيبٍ ۝ 20
जो कोई आख़िरत की खेती चाहता है, हम उसके लिए उसकी खेती में बढ़ोत्तरी प्रदान करेंगे और जो कोई दुनिया की खेती चाहता है, हम उसमें से उसे कुछ दे देते हैं, किन्तु आख़िरत में उसका कोई हिस्सा नहीं।॥20॥
أَمۡ لَهُمۡ شُرَكَٰٓؤُاْ شَرَعُواْ لَهُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا لَمۡ يَأۡذَنۢ بِهِ ٱللَّهُۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةُ ٱلۡفَصۡلِ لَقُضِيَ بَيۡنَهُمۡۗ وَإِنَّ ٱلظَّٰلِمِينَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ ۝ 21
(क्या उन्हें समझ नहीं) या उनके कुछ ऐसे (ठहराए हुए) साझीदार हैं जिन्होंने उनके लिए कोई ऐसा धर्म निर्धारित कर दिया है जिसकी अनुज्ञा अल्लाह ने नहीं दी? यदि फ़ैसले की बात निश्चित न हो गई होती तो उनके बीच फ़ैसला हो चुका होता। निश्‍चय ही ज़ालिमों के लिए दुखद यातना है।॥21॥
تَرَى ٱلظَّٰلِمِينَ مُشۡفِقِينَ مِمَّا كَسَبُواْ وَهُوَ وَاقِعُۢ بِهِمۡۗ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ فِي رَوۡضَاتِ ٱلۡجَنَّاتِۖ لَهُم مَّا يَشَآءُونَ عِندَ رَبِّهِمۡۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلۡفَضۡلُ ٱلۡكَبِيرُ ۝ 22
तुम ज़ालिमों को देखोगे कि उन्होंने जो कुछ कमाया उससे डर रहे होंगे, किन्तु वह तो उनपर पड़कर रहेगा। किन्तु जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, वे जन्‍नतों की वाटिकाओं में होंगे। उनके लिए उनके रब के पास वह सब कुछ है जिसकी वे इच्छा करेंगे। वही तो बड़ा उदार अनुग्रह है।॥22॥
ذَٰلِكَ ٱلَّذِي يُبَشِّرُ ٱللَّهُ عِبَادَهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِۗ قُل لَّآ أَسۡـَٔلُكُمۡ عَلَيۡهِ أَجۡرًا إِلَّا ٱلۡمَوَدَّةَ فِي ٱلۡقُرۡبَىٰۗ وَمَن يَقۡتَرِفۡ حَسَنَةٗ نَّزِدۡ لَهُۥ فِيهَا حُسۡنًاۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ شَكُورٌ ۝ 23
उसी की शुभ-सूचना अल्लाह अपने उन बन्दों को देता है जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए — कहो, "मैं इसका तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता, बस निकटता का प्रेम-भाव चाहता हूँ, जो कोई नेकी कमाएगा हम उसके लिए उसमें अच्छाई की अभिवृद्धि करेंगे। निश्‍चय ही अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, गुणग्राहक है।"॥23॥
أَمۡ يَقُولُونَ ٱفۡتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبٗاۖ فَإِن يَشَإِ ٱللَّهُ يَخۡتِمۡ عَلَىٰ قَلۡبِكَۗ وَيَمۡحُ ٱللَّهُ ٱلۡبَٰطِلَ وَيُحِقُّ ٱلۡحَقَّ بِكَلِمَٰتِهِۦٓۚ إِنَّهُۥ عَلِيمُۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ ۝ 24
(क्या वे ईमान नहीं लाएँगे) या उनका कहना है कि "इस व्यक्ति ने अल्लाह पर मिथ्यारोपण किया है?" यदि अल्लाह चाहे तो तुम्हारे दिल पर मुहर लगा दे (जिस प्रकार उसने इनकार करनेवालों के दिल पर मुहर लगा दी है)। अल्लाह तो असत्य को मिटा रहा है और सत्य को अपने बोलों से सिद्ध कर रहा है। निश्‍चय ही वह सीनों तक की बात को भी भली-भाँति जानता है।॥24॥
وَهُوَ ٱلَّذِي يَقۡبَلُ ٱلتَّوۡبَةَ عَنۡ عِبَادِهِۦ وَيَعۡفُواْ عَنِ ٱلسَّيِّـَٔاتِ وَيَعۡلَمُ مَا تَفۡعَلُونَ ۝ 25
वही है जो अपने बन्दों की तौबा क़ुबूल करता है और बुराइयों को माफ़ करता है, हालाँकि वह जानता है जो कुछ तुम करते हो।॥25॥
وَيَسۡتَجِيبُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ وَيَزِيدُهُم مِّن فَضۡلِهِۦۚ وَٱلۡكَٰفِرُونَ لَهُمۡ عَذَابٞ شَدِيدٞ ۝ 26
और वह उन लोगों की प्रार्थनाएँ स्वीकार करता है जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक प्रदान करता है। रहे इनकार करनेवाले, तो उनके लिए कड़ा यातना है।॥26॥
۞وَلَوۡ بَسَطَ ٱللَّهُ ٱلرِّزۡقَ لِعِبَادِهِۦ لَبَغَوۡاْ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَٰكِن يُنَزِّلُ بِقَدَرٖ مَّا يَشَآءُۚ إِنَّهُۥ بِعِبَادِهِۦ خَبِيرُۢ بَصِيرٞ ۝ 27
यदि अल्लाह अपने बन्दों के लिए रोज़ी कुशादा कर देता तो वे धरती में सरकशी करने लगते। किन्तु वह एक अंदाज़े के साथ जो चाहता है, उतारता है। निस्सन्‍देह वह अपने बन्दों की ख़बर रखनेवाला है। वह उनपर निगाह रखता है।॥27॥
وَهُوَ ٱلَّذِي يُنَزِّلُ ٱلۡغَيۡثَ مِنۢ بَعۡدِ مَا قَنَطُواْ وَيَنشُرُ رَحۡمَتَهُۥۚ وَهُوَ ٱلۡوَلِيُّ ٱلۡحَمِيدُ ۝ 28
वही है जो, इसके बाद कि लोग निराश हो चुके होते हैं, मेंह बरसाता है और अपनी दयालुता को फैला देता है। और वही है संरक्षक मित्र, प्रशंसनीय!॥28॥
وَمِنۡ ءَايَٰتِهِۦ خَلۡقُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَثَّ فِيهِمَا مِن دَآبَّةٖۚ وَهُوَ عَلَىٰ جَمۡعِهِمۡ إِذَا يَشَآءُ قَدِيرٞ ۝ 29
और उसकी निशानियों में से है आकाशों और धरती को पैदा करना और वे जीवधारी भी जो उसने इन दोनों में1 फैला रखे हैं। वह जब चाहे उन्हें इकट्ठा करने की सामर्थ्य भी रखता है।॥29॥ ———————— 1. अर्थात् आकाशों और धरती में।
وَمَآ أَصَٰبَكُم مِّن مُّصِيبَةٖ فَبِمَا كَسَبَتۡ أَيۡدِيكُمۡ وَيَعۡفُواْ عَن كَثِيرٖ ۝ 30
जो मुसीबत तुम्हें पहुँची वह तो तुम्हारे अपने हाथों की कमाई से पहुँची और बहुत कुछ तो वह माफ़ कर देता है।॥30॥
وَمَآ أَنتُم بِمُعۡجِزِينَ فِي ٱلۡأَرۡضِۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِيّٖ وَلَا نَصِيرٖ ۝ 31
तुम धरती में क़ाबू से निकल जानेवाले नहीं हो और न अल्लाह से हटकर तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र है और न सहायक ही।॥31॥
وَمِنۡ ءَايَٰتِهِ ٱلۡجَوَارِ فِي ٱلۡبَحۡرِ كَٱلۡأَعۡلَٰمِ ۝ 32
उसकी निशानियों में पहाड़ों के सदृश जहाज़ भी है।॥32॥
إِن يَشَأۡ يُسۡكِنِ ٱلرِّيحَ فَيَظۡلَلۡنَ رَوَاكِدَ عَلَىٰ ظَهۡرِهِۦٓۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّكُلِّ صَبَّارٖ شَكُورٍ ۝ 33
यदि वह चाहे तो वायु को ठहरा दे, तो वे समुद्र की पीठ पर ठहरे रह जाएँ — निश्‍चय ही इसमें कितनी ही निशानियाँ हैं हर उस व्यक्ति के लिए जो अत्यन्त धैर्यवान, कृतज्ञ हो।॥33॥
أَوۡ يُوبِقۡهُنَّ بِمَا كَسَبُواْ وَيَعۡفُ عَن كَثِيرٖ ۝ 34
या उनको2 उनकी कमाई के कारण विनष्ट कर दे और बहुतों को माफ़ भी कर दे।॥34॥ ————————— 2. अर्थात् जहाज़ों को।
وَيَعۡلَمَ ٱلَّذِينَ يُجَٰدِلُونَ فِيٓ ءَايَٰتِنَا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٖ ۝ 35
और परिणामतः वे लोग जान लें जो हमारी आयतों में झगड़ते हैं कि उनके लिए भागने की कोई जगह नहीं।॥35॥
فَمَآ أُوتِيتُم مِّن شَيۡءٖ فَمَتَٰعُ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَاۚ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ خَيۡرٞ وَأَبۡقَىٰ لِلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَلَىٰ رَبِّهِمۡ يَتَوَكَّلُونَ ۝ 36
तुम्हें जो चीज़ भी मिली है वह तो सांसारिक जीवन की अस्थायी सुख-सामग्री है। किन्तु जो कुछ अल्लाह के पास है वह उत्तम है और शेष रहनेवाला भी, वह उन्हीं के लिए है जो ईमान लाए और अपने रब पर भरोसा रखते हैं;॥36॥
وَٱلَّذِينَ يَجۡتَنِبُونَ كَبَٰٓئِرَ ٱلۡإِثۡمِ وَٱلۡفَوَٰحِشَ وَإِذَا مَا غَضِبُواْ هُمۡ يَغۡفِرُونَ ۝ 37
जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्‍लील कर्मों से बचते हैं और जब उन्हें (किसी पर) क्रोध आता है तो वे क्षमा कर देते हैं;॥37॥
وَٱلَّذِينَ ٱسۡتَجَابُواْ لِرَبِّهِمۡ وَأَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَمۡرُهُمۡ شُورَىٰ بَيۡنَهُمۡ وَمِمَّا رَزَقۡنَٰهُمۡ يُنفِقُونَ ۝ 38
और जिन्होंने अपने रब का हुक्म माना और नमाज़ क़ायम की, और उनका मामला उनके पारस्परिक परामर्श से चलता है, और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं;॥38॥
وَٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَابَهُمُ ٱلۡبَغۡيُ هُمۡ يَنتَصِرُونَ ۝ 39
और जो ऐसे हैं कि जब उनपर ज़्यादती होती है तो वे उसका मुक़ाबला करते हैं।॥39॥
وَجَزَٰٓؤُاْ سَيِّئَةٖ سَيِّئَةٞ مِّثۡلُهَاۖ فَمَنۡ عَفَا وَأَصۡلَحَ فَأَجۡرُهُۥ عَلَى ٱللَّهِۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 40
बुराई का बदला वैसी ही बुराई है, किन्तु जो क्षमा कर दे और सुधार करे तो उसका बदला अल्लाह के ज़िम्मे है। निश्‍चय ही वह ज़ालिमों को पसन्द नहीं करता।॥40॥
وَلَمَنِ ٱنتَصَرَ بَعۡدَ ظُلۡمِهِۦ فَأُوْلَٰٓئِكَ مَا عَلَيۡهِم مِّن سَبِيلٍ ۝ 41
और जो कोई अपने ऊपर ज़ुल्म होने के बाद बदला ले ले तो ऐसे लोगों पर कोई इलज़ाम नहीं।॥41॥
إِنَّمَا ٱلسَّبِيلُ عَلَى ٱلَّذِينَ يَظۡلِمُونَ ٱلنَّاسَ وَيَبۡغُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِ بِغَيۡرِ ٱلۡحَقِّۚ أُوْلَٰٓئِكَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ ۝ 42
इलज़ाम तो केवल उनपर आता है जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और धरती में नाहक़ ज़्यादती करते हैं। ऐसे लोगों के लिए दुखद यातना है।॥42॥
وَلَمَن صَبَرَ وَغَفَرَ إِنَّ ذَٰلِكَ لَمِنۡ عَزۡمِ ٱلۡأُمُورِ ۝ 43
किन्तु जिसने धैर्य से काम लिया और क्षमा कर दिया तो निश्‍चय ही वह उन कामों में से है जो (सफलता के लिए) आवश्यक ठहरा दिए गए हैं।॥43॥
وَمَن يُضۡلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِن وَلِيّٖ مِّنۢ بَعۡدِهِۦۗ وَتَرَى ٱلظَّٰلِمِينَ لَمَّا رَأَوُاْ ٱلۡعَذَابَ يَقُولُونَ هَلۡ إِلَىٰ مَرَدّٖ مِّن سَبِيلٖ ۝ 44
जिस व्यक्ति को अल्लाह गुमराही में डाल दे तो उसके बाद उसे सम्भालनेवाला कोई भी नहीं। तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब वे यातना को देख लेंगे तो कह रहे होंगे, "क्या लौटने का भी कोई मार्ग है?"॥44॥
وَتَرَىٰهُمۡ يُعۡرَضُونَ عَلَيۡهَا خَٰشِعِينَ مِنَ ٱلذُّلِّ يَنظُرُونَ مِن طَرۡفٍ خَفِيّٖۗ وَقَالَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّ ٱلۡخَٰسِرِينَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ وَأَهۡلِيهِمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِۗ أَلَآ إِنَّ ٱلظَّٰلِمِينَ فِي عَذَابٖ مُّقِيمٖ ۝ 45
और तुम उन्हें देखोगे कि वे उस (जहन्‍नम) पर इस दशा में लाए जा रहे हैं कि बेबसी और अपमान के कारण दबे हुए हैं। कनखियों से देख रहे हैं। जो लोग ईमान लाए वे उस समय कहेंगे कि "निश्‍चय ही घाटे में पड़नेवाले वही हैं, जिन्होंने क़ियामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को घाटे में डाल दिया। सावधान! निश्‍चय ही ज़ालिम स्थाई रहनेवाली यातना में होंगे।॥45॥
وَمَا كَانَ لَهُم مِّنۡ أَوۡلِيَآءَ يَنصُرُونَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِۗ وَمَن يُضۡلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِن سَبِيلٍ ۝ 46
और उनके कुछ संरक्षक भी न होंगे जो सहायता करके उन्हें अल्लाह से बचा सकें। जिसे अल्लाह गुमराही में डाल दे तो उसके लिए फिर कोई मार्ग नहीं।"॥46॥
ٱسۡتَجِيبُواْ لِرَبِّكُم مِّن قَبۡلِ أَن يَأۡتِيَ يَوۡمٞ لَّا مَرَدَّ لَهُۥ مِنَ ٱللَّهِۚ مَا لَكُم مِّن مَّلۡجَإٖ يَوۡمَئِذٖ وَمَا لَكُم مِّن نَّكِيرٖ ۝ 47
अपने रब की बात मान लो इससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जो पलटने का नहीं। उस दिन तुम्हारे लिए न कोई शरण-स्थल होगा और न तुम किसी चीज़ को रद्द कर सकोगे।॥47॥
فَإِنۡ أَعۡرَضُواْ فَمَآ أَرۡسَلۡنَٰكَ عَلَيۡهِمۡ حَفِيظًاۖ إِنۡ عَلَيۡكَ إِلَّا ٱلۡبَلَٰغُۗ وَإِنَّآ إِذَآ أَذَقۡنَا ٱلۡإِنسَٰنَ مِنَّا رَحۡمَةٗ فَرِحَ بِهَاۖ وَإِن تُصِبۡهُمۡ سَيِّئَةُۢ بِمَا قَدَّمَتۡ أَيۡدِيهِمۡ فَإِنَّ ٱلۡإِنسَٰنَ كَفُورٞ ۝ 48
अब यदि वे ध्यान में लाएँ तो हमने तो तुम्हें उनपर कोई रक्षक बनाकर तो भेजा नहीं है। तुमपर तो केवल (संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है। हाल यह है कि जब हम मनुष्य को अपनी ओर से किसी दयालुता का आस्वादन कराते हैं तो वह उसपर इतराने लगता है, किन्तु ऐसे लोगों के हाथों ने जो कुछ आगे भेजा है उसके कारण यदि उन्हें कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो निश्‍चय ही वही मनुष्य बड़ा कृतघ्‍न बन जाता है।॥48॥
لِّلَّهِ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ يَخۡلُقُ مَا يَشَآءُۚ يَهَبُ لِمَن يَشَآءُ إِنَٰثٗا وَيَهَبُ لِمَن يَشَآءُ ٱلذُّكُورَ ۝ 49
अल्लाह ही की है आकाशों और धरती की बादशाही। वह जो चाहता है पैदा करता है, जिसे चाहता है लड़कियाँ देता है और जिसे चाहता है लड़के देता है।॥49॥
أَوۡ يُزَوِّجُهُمۡ ذُكۡرَانٗا وَإِنَٰثٗاۖ وَيَجۡعَلُ مَن يَشَآءُ عَقِيمًاۚ إِنَّهُۥ عَلِيمٞ قَدِيرٞ ۝ 50
या उन्हें लड़के और लड़कियाँ मिला-जुलाकर देता है, और जिसे चाहता है निस्संतान रखता है। निश्‍चय ही वह सर्वज्ञ, सामर्थ्यवान है।॥50॥
۞وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ ٱللَّهُ إِلَّا وَحۡيًا أَوۡ مِن وَرَآيِٕ حِجَابٍ أَوۡ يُرۡسِلَ رَسُولٗا فَيُوحِيَ بِإِذۡنِهِۦ مَا يَشَآءُۚ إِنَّهُۥ عَلِيٌّ حَكِيمٞ ۝ 51
किसी मनुष्य की यह शान नहीं कि अल्लाह उससे बात करे, सिवाय इसके कि प्रकाशना के द्वारा या परदे के पीछे से (बात करे)। या यह कि वह एक रसूल (फ़रिश्ता) भेज दे, फिर वह उसकी अनुज्ञा से जो वह चाहे प्रकाशना कर दे। निश्‍चय ही वह सर्वोच्‍च, अत्यन्त तत्वदर्शी है।॥51॥
وَكَذَٰلِكَ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ رُوحٗا مِّنۡ أَمۡرِنَاۚ مَا كُنتَ تَدۡرِي مَا ٱلۡكِتَٰبُ وَلَا ٱلۡإِيمَٰنُ وَلَٰكِن جَعَلۡنَٰهُ نُورٗا نَّهۡدِي بِهِۦ مَن نَّشَآءُ مِنۡ عِبَادِنَاۚ وَإِنَّكَ لَتَهۡدِيٓ إِلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٖ ۝ 52
और इसी प्रकार हमने अपने आदेश से एक रूह (क़ुरआन) की प्रकाशना तुम्हारी ओर की है। तुम नहीं जानते थे कि किताब क्या होती है और न ईमान को (जानते थे), किन्तु हमने इस (प्रकाशना) को एक प्रकाश बनाया जिसके द्वारा हम अपने बन्दों में से जिसे चाहते हैं मार्ग दिखाते हैं। निश्‍चय ही तुम एक सीधे मार्ग की ओर पथप्रदर्शन कर रहे हो —॥52॥
صِرَٰطِ ٱللَّهِ ٱلَّذِي لَهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۗ أَلَآ إِلَى ٱللَّهِ تَصِيرُ ٱلۡأُمُورُ ۝ 53
उस अल्लाह के मार्ग की ओर जिसका वह सब कुछ है, जो आकाशों में है और जो धरती में है। सुन लो, सारे मामले अन्ततः अल्लाह ही की ओर पलटते हैं।॥53॥