Hindi Islam
Hindi Islam
×

Type to start your search

سُورَةُ العَلَقِ

अल-अलक़

(मक्का में उतरी, आयतें 19)

परिचय

नाम

दूसरी आयत के शब्द 'अलक़' (ख़ून का लोथड़ा) को इस सूरा का नाम क़रार दिया गया है।

उतरने का समय

इस सूरा के दो भाग हैं : पहला भाग शुरू से लेकर पाँचवीं आयत के वाक्य 'जिसे वह न जानता था' पर समाप्त होता है। और दूसरा भाग आयत-6 से शुरू होकर सूरा के अन्त तक चलता है। पहले भाग के बारे में मुस्लिम समुदाय के ज़्यादातर आलिम इस बात से सहमत हैं कि यह सबसे पहली वह्य है जो अल्लाह के रसूल (सल्ल०) पर उतरी। दूसरा भाग बाद में उस समय अवतरित हुआ जब अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने हरम (काबा की मसजिद) में नमाज़ पढ़नी शुरू की और अबू-जहल ने आपको धमकियाँ देकर उससे रोकने की कोशिश की।

वह्य का आरंभ

हज़रत आइशा (रज़ि०) फ़रमाती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) पर वह्य का आरंभ सच्चे (और कुछ रिवायतों में है अच्छे) सपनों के रूप में हुआ। आप जो सपना देखते, वह ऐसा होता कि जैसे आप दिन की रौशनी में देख रहे हैं। फिर आप एकान्त प्रिय हो गए और कई-कई दिन-रात हिरा की गुफा में रहकर इबादत (आराधना) करने लगे। हज़रत आइशा (रजि०) ने 'तहन्नुस' का शब्द प्रयोग किया है जिसकी व्याख्या इमाम ज़ोहरी ने तअब्बुद (इबादत करना) से की है। यह किसी तरह की इबादत थी जो आप करते थे, क्योंकि उस समय तक अल्लाह की ओर से आपको इबादत का तरीक़ा नहीं बताया गया था। एक दिन जबकि आप (सल्ल०) हिरा की गुफा में थे, यकायक आपपर वह्य उतरी और फ़रिश्ते ने आकर आपसे कहा, "पढ़ो।" इसके बाद हज़रत आइशा (रज़ि०) स्वयं अल्लाह के रसूल (सल्ल०) का कथन नक़्ल करती हैं, “मैंने कहा, मैं तो पढ़ा हुआ नहीं हूँ।” इसपर फ़रिश्ते ने मुझे पकड़कर भींचा, यहाँ तक कि मेरी सहन-शक्ति जवाब देने लगी, फिर उसने मुझे छोड़ दिया। [ऐसा तीन बार हुआ।] तीसरी बार जब फ़रिश्ते ने मुझे छोड़ा तो कहा, 'इक़रा बिस्मि रब्बिकल-लज़ी ख़-ल-क़' (पढ़ो अपने रब के नाम के साथ जिसने पैदा किया।) यहाँ तक कि 'मालम यालम' (जिसे वह न जानता था) तक पहुँच गया।" हज़रत आइशा (रजि०) फ़रमाती हैं कि इसके बाद अल्लाह के रसूल (सल्ल०) काँपते-लरज़ते हुए वहाँ से पलटे और हज़रत ख़दीजा के पास पहुँचकर कहा, "मुझे ओढ़ाओ, मुझे ओढ़ाओ।" चुनाँचे आपको ओढ़ा दिया गया। जब आपपर से भय की दशा समाप्त हुई तो आपने फ़रमाया, “ऐ ख़दीजा! यह मुझे क्या हो गया है ?" फिर सारा क़िस्सा आपने उनको सुनाया और कहा, “मुझे अपनी जान का डर है।" उन्होंने कहा, "हरगिज़ नहीं, आप ख़ुश हो जाइए, अल्लाह की क़सम, आपको अल्लाह कभी रुसवा न करेगा। आप रिश्तेदारों से अच्छा व्यवहार करते हैं, सच बोलते हैं, (एक रिवायत में इतना और है कि अमानते अदा करते हैं), बे-सहारा लोगों का बोझ उठाते हैं, ग़रीब लोगों के काम कर देते हैं, आथित्य सत्कार करते हैं और भले कामों में मदद करते हैं।" फिर वे नबी (सल्ल०) को साथ लेकर वरक़ा-बिन-नौफ़ल के पास गईं जो उनके चचेरे भाई थे। अज्ञान-काल में ईसाई हो गए थे, अरबी और इबरानी में इंजील लिखते थे, बहुत बूढ़े और अंधे हो गए थे। हज़रत ख़दीजा ने उनसे कहा, "भाईजान! ज़रा अपने भतीजे का क़िस्सा सुनिए।" वरक़ा ने नबी (सल्ल०) से कहा, "भतीजे! तुमको क्या नज़र आया?" अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने जो कुछ देखा था, वह बयान किया। वरक़ा ने कहा, "यह वही नामूस (वह्य लानेवाला फ़रिश्ता) है जो अल्लाह ने मूसा के पास भेजा था। काश, मैं आपकी नुबूवत के समय में ताक़तवर जवान होता! काश मैं उस समय जिंदा रहूँ जब आपकी क़ौम आपको निकालेगी!" अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया, “क्या ये लोग मुझे निकाल देंगे?" वरक़ा ने कहा, "हाँ, कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई आदमी वह चीज़ लेकर आया हो जो आप लाए हैं और उससे दुश्मनी न की गई हो। अगर मैंने आपका समय पाया तो मैं आपकी भरपूर मदद करूँगा।" मगर ज़्यादा समय न बीता था कि वरक़ा का देहान्त हो गया।

यह क़िस्सा स्वतः अपने मुँह से बोल रहा है कि फ़रिश्ते के आने से एक क्षण पहले तक भी अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के मन में यह बात न थी कि आप नबी बनाए जानेवाले हैं। इस चीज़ की तलब रखना या इसकी आशा करना तो दूर की बात, आपकी कल्पना में भी यह बात न थी कि ऐसा कोई मामला आपके साथ होगा। वह्य का उतरना और फ़रिश्ते का इस तरह सामने आना आपके लिए अचानक एक घटना थी, जिसका पहला प्रभाव आपपर वही हुआ जो एक बेख़बर व्यक्ति पर इतनी बड़ी एक घटना के घटित होने से स्वाभाविक रूप से हो सकता है। यही कारण है कि जब आप इस्लाम की दावत लेकर उठे तो मक्का के लोगों ने आपपर हर तरह की आपत्ति की, मगर उनमें कोई यह कहनेवाला न था कि हमें तो पहले ही यह ख़तरा था कि आप कोई दावा करनेवाले हैं, क्योंकि आप एक समय से नबी बनने की तैयारियाँ कर रहे थे।

इस क़िस्से से एक बात यह भी मालूम होती है कि नुबूवत से पहले आपकी ज़िन्दगी कितनी पवित्र थी और आपका चरित्र कितना श्रेष्ठ था। हज़रत ख़दीजा (रज़ि०) ने अपने लम्बे दाम्पत्य जीवन में आपको इतना उत्तम श्रेणी का व्यक्ति पाया था कि जब नबी (सल्ल.) ने उनको हिरा की गुफा में पेश आनेवाली घटना सुनाई तो बे-झिझक उन्होंने मान लिया कि वास्तव में अल्लाह का फ़रिश्ता ही आपके पास वह्य लेकर आया था। इसी तरह वरक़ा-बिन-नौफ़ल ने भी जब यह घटना सुनी तो इसे कोई वस्वसा नहीं समझा, बल्कि सुनते ही कह दिया कि यह वही नामूस (फ़रिश्ता) है जो मूसा (अलैहि०) के पास आया था। इसका मतलब यह है कि उनके नज़दीक भी आप इतने उच्च श्रेणी के व्यक्ति थे कि आपका नुबूवत-पद पर आसीन होना कोई आश्चर्य की बात न थी।

दूसरे भाग के उतरने की वजह

इस सूरा का दूसरा भाग उस समय उतरा जब अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने हरम (काबा) में इस्लामी तरीक़े पर नमाज़ पढ़नी शुरू की और अबू-जहल ने आपको डरा-धमकाकर इससे रोकना चाहा। चुनाँचे इस सिलसिले में कई हदीसें हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अब्बास (रज़ि०) और हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि०) से रिवायत की गई हैं जिनमें अबू-जहल की इन अशिष्टताओं का उल्लेख किया गया है। हज़रत अबू-हुरैरा (रजि०) का बयान है कि अबू-जहल ने क़ुरैश के लोगों से पूछा, "क्या मुहम्मद तुम्हारे सामने धरती पर अपना मुँह टिकाते हैं?" लोगों ने कहा, "हाँ!" उसने कहा, "लात और उज्जा की क़सम! अगर मैंने उनको इस तरह नमाज़ पढ़ते हुए देख लिया तो उनकी गरदन पर पाँव रख दूँगा और उनका मुँह ज़मीन से रगड़ दूँगा।" फिर ऐसा हुआ कि नबी (सल्ल०) को नमाज़ पढ़ते हुए देखकर वह आगे बढ़ा कि आपकी गरदन पर पाँव रखे, मगर यकायक लोगों ने देखा कि वह पीछे हट रहा है और अपना मुँह किसी चीज़ से बचाने की कोशिश कर रहा है। उससे पूछा गया, "यह तुझे क्या हो गया?" उसने कहा, "मेरे और उनके बीच आग की एक खाई और एक भयानक चीज़ थी और कुछ पंख थे।" अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया, "अगर वह मेरे करीब आता तो फ़रिश्ते उसके चीथड़े उड़ा देते।" (अहमद, मुस्लिम, नसाई)

इब्ने-अब्बास (रजि०) की एक और रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) मक़ामे-इबराहीम (हरम में एक ख़ास जगह) पर नमाज़ पढ़ रहे थे। अबू-जहल उधर से गुज़रा तो उसने कहा, "ऐ मुहम्मद! क्या मैंने तुमको इससे मना नहीं किया था?" और उसने आप (सल्ल०) को धमकियाँ देनी शुरू की। जवाब में अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने उसको सख्ती के साथ झिड़क दिया। इसपर उसने कहा, "ऐ मुहम्मद! तुम किस बल पर मुझे डराते हो? अल्लाह की कसम! इस घाटी में मेरे समर्थक सबसे अधिक हैं।" (अहमद, तिर्मिज़ी, नसाई)

इन्हीं घटनाओं पर इस सूरा का वह भाग उतरा जो "कल्ला इन्नल इनसा-न ल-यतग़ा" (हरगिज़ नहीं, इनसान सरकशी से काम लेता है) से आरंभ होता है। स्वाभाविक रूप से इस भाग को क़ुरआन में इसी जगह रखा जाना चाहिए था, जहाँ कि इस सूरा में रखा गया है, क्योंकि पहली वह्य उतरने के बाद इस्लाम का सबसे पहला प्रदर्शन नबी (सल्ल०) ने नमाज़ ही से आरंभ किया था, और कुफ़्फ़ार (विधर्मियों) से आपके टकराव का आरंभ भी इसी घटना से हुआ था।

---------------------

سُورَةُ العَلَقِ
96. अल-अलक़
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान हैं।
ٱقۡرَأۡ بِٱسۡمِ رَبِّكَ ٱلَّذِي خَلَقَ ۝ 1
पढ़ो, अपने रब के नाम के साथ जिसने पैदा किया,॥1॥
خَلَقَ ٱلۡإِنسَٰنَ مِنۡ عَلَقٍ ۝ 2
पैदा किया मनुष्य को जमे हुए ख़ून के लोथड़े से।॥2॥
ٱقۡرَأۡ وَرَبُّكَ ٱلۡأَكۡرَمُ ۝ 3
पढ़ो, हाल यह है कि तुम्हारा रब बड़ा ही उदार और श्रेष्‍ठ है,॥3॥
ٱلَّذِي عَلَّمَ بِٱلۡقَلَمِ ۝ 4
जिसने क़लम के द्वारा शिक्षा दी,॥4॥
عَلَّمَ ٱلۡإِنسَٰنَ مَا لَمۡ يَعۡلَمۡ ۝ 5
मनुष्य को वह ज्ञान प्रदान किया जिसे वह न जानता था।॥5॥
كَلَّآ إِنَّ ٱلۡإِنسَٰنَ لَيَطۡغَىٰٓ ۝ 6
कदापि नहीं, मनुष्य सरकशी करता है,॥6॥
أَن رَّءَاهُ ٱسۡتَغۡنَىٰٓ ۝ 7
इसलिए कि वह अपने आपको आत्मनिर्भर देखता है।॥7॥
إِنَّ إِلَىٰ رَبِّكَ ٱلرُّجۡعَىٰٓ ۝ 8
निश्‍चय ही तुम्हारे रब ही की ओर पलटना है।॥8॥
أَرَءَيۡتَ ٱلَّذِي يَنۡهَىٰ ۝ 9
क्या तुमने देखा उस व्यक्ति को॥9॥
عَبۡدًا إِذَا صَلَّىٰٓ ۝ 10
जो एक बन्दे को रोकता है, जब वह नमाज़ अदा करता है? —॥10॥
أَرَءَيۡتَ إِن كَانَ عَلَى ٱلۡهُدَىٰٓ ۝ 11
तुम्हारा क्या विचार है? यदि वह सीधे मार्ग पर हो,॥11॥
أَوۡ أَمَرَ بِٱلتَّقۡوَىٰٓ ۝ 12
या परहेज़गारी का हुक्म दे (उसके अच्छा होने में क्या संदेह है)॥12॥
أَرَءَيۡتَ إِن كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰٓ ۝ 13
तुम्हारा क्या विचार है? यदि उस (रोकनेवाले) ने झुठलाया और मुँह मोड़ा (तो उसके बुरा होने में क्या संदेह है) —॥13॥
أَلَمۡ يَعۡلَم بِأَنَّ ٱللَّهَ يَرَىٰ ۝ 14
क्या उसने नहीं जाना कि अल्लाह देख रहा है?॥14॥
كَلَّا لَئِن لَّمۡ يَنتَهِ لَنَسۡفَعَۢا بِٱلنَّاصِيَةِ ۝ 15
कदापि नहीं, यदि वह बाज़ न आया तो हम चोटी पकड़कर घसीटेंगे,॥15॥
نَاصِيَةٖ كَٰذِبَةٍ خَاطِئَةٖ ۝ 16
झूठी, ख़ताकार चोटी।॥16॥
فَلۡيَدۡعُ نَادِيَهُۥ ۝ 17
अब बुला ले वह अपनी मजलिस को!॥17॥
سَنَدۡعُ ٱلزَّبَانِيَةَ ۝ 18
हम भी बुलाए लेते हैं सिपाहियों को।॥18॥
كَلَّا لَا تُطِعۡهُ وَٱسۡجُدۡۤ وَٱقۡتَرِب۩ ۝ 19
कदापि नहीं, उसकी बात न मानो और सजदे करते और क़रीब होते रहो।॥19॥