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سُورَةُ الطَّلَاقِ

65. अत-तलाक़

(मदीना में उतरी, आयतें 12)

परिचय

नाम

इस सूरा का नाम ही 'अत-तलाक़' नहीं है, बल्कि यह इसकी विषय-वस्तु का शीर्षक भी है, क्योंकि इसमें तलाक़ ही के नियमों का उल्लेख हुआ है।

उतरने का समय

हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-मसऊद (रज़ि०) ने स्पष्टत: कहा है और सूरा के विषय के आन्तरिक साक्ष्य से भी यही स्पष्ट होता है कि यह अनिवार्यत: सूरा-2 (बक़रा) की उन आयतों के बाद उतरी है जिनमें तलाक़ के नियम-सम्बन्धी आदेश पहली बार दिए गए थे। उल्लेखों से मालूम होता है कि जब सूरा बक़रा के आदेशों को समझने में लोग ग़लतियाँ करने लगे और व्यवहारतः भी उनसे ग़लतियाँ होने लगीं, तब अल्लाह ने उनके सुधार के लिए ये नियम-सम्बन्धी आदेश अवतरित किए।

विषय और वार्ता

इस सूरा के आदेशों एवं निर्देशों को समझने के लिए आवश्यक है कि उन निर्देशों को पुन: मन में ताज़ा कर लिया जाए जो तलाक़ और इद्दत के सम्बन्ध में इससे पहले सूरा-2 (बक़रा), आयत-28, 229, 230, 234; सूरा-33 (अहज़ाब), आयत 49 में वर्णित हो चुके हैं। इन आयतों में जो नियम निर्धारित किए गए थे, वे ये थे—

(1) एक पुरुष अपनी पत्‍नी को अधिक-से-अधिक तीन तलाक़ दे सकता है।

 

(2) एक या दो तलाक़ देने की स्थिति में इद्दत के अन्दर पति को रुजूअ (अर्थात् बिना निकाह के पुनः दाम्पत्य सम्बन्ध स्थापित करने) का अधिकार होता है और इद्दत का समय समाप्त होने के बाद वही पुरुष और स्त्री पुनः निकाह करना चाहें तो कर सकते हैं। इसके लिए हलाला की कोई शर्त नहीं है। किन्तु यदि पुरुष तीन तलाक़ दे दे तो इद्दत के भीतर रुजूअ करने का अधिकार समाप्त हो जाता है और पुनः निकाह भी उस समय तक नहीं हो सकता, जब तक स्त्री का विवाह किसी और पुरुष से न हो जाए और वह (पुरुष) अपनी मरज़ी से उसको तलाक़ न दे दे।

(3) वह स्त्री जिसका पति से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित हो चुका हो और जो रजस्वला हो उसकी इद्दत यह है कि उसे तलाक़ के बाद तीन बार हैज़ (मासिक धर्म) आ जाए। एक तलाक़ या दो तलाक़ की स्थिति में इस इद्दत का अर्थ यह है कि स्त्री का अभी तक उस व्यक्ति (पति) से पत्‍नीत्व का सम्बन्ध पूर्णत: समाप्त नहीं हुआ है और वह इद्दत के भीतर उससे रुजूअ (पुनर्मिलन) कर सकता है। किन्तु यदि पुरुष तीन तलाक दे चुका हो तो यह इद्दत रुजूअ की गुंजाइश के लिए नहीं है, बल्कि केवल इसलिए है कि इसके समाप्त होने से पूर्व स्त्री किसी और व्यक्ति से निकाह नहीं कर सकती।

(4) वह स्त्री जिसका पति से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित न हुआ हो, जिसके हाथ लगाने से पहले ही तलाक़ दे दी जाए, उसके लिए कोई इद्दत नहीं है। वह चाहे तो तलाक़ के बाद तुरन्त निकाह कर सकती है।

(5) जिस स्त्री का पति मर जाए उसकी इद्दत 4 महीने 10 दिन है। अब यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि सूरा तलाक़ इन नियमों में से किसी नियम को निरस्त करने या उसमें संशोधन करने के लिए नहीं उतरी है, बल्कि दो उद्देश्य के लिए उतरी है। एक यह कि पुरुष को तलाक़ का जो अधिकार दिया गया है, उसे व्यवहार में लाने के लिए ऐसे बुद्धिमत्तापूर्ण तरीक़े बताए जाएँ जिनसे यथासम्भव विलगाव की नौबत न आने पाए, क्योंकि ईश्वरीय धर्म-विधान में तलाक़ की गुंजाइश केवल एक अवश्यम्भावी आवश्यकता के रूप में रखी गई है, अन्यथा अल्लाह को यह बात अत्यन्त अप्रिय है कि एक स्त्री और पुरुष के बीच में जो दाम्पत्य सम्बन्ध स्थापित हो चुका है, वह फिर कभी टूट जाए। नबी (सल्ल०) का कथन है कि "अल्लाह ने किसी ऐसी चीज़ को वैध नहीं किया है जो तलाक़ से बढ़कर उसे अप्रिय हो" (हदीस : अबू दाऊद)। दूसरा उद्देश्य यह है कि सूरा-2 (बक़रा) के नियम-सम्बन्धी आदेशों एवं निर्देशों के बाद इस सम्बन्ध में जो प्रश्न ऐसे रह गए थे जिनका उत्तर नहीं दिया गया था उनका उत्तर देकर इस्लाम के पारिवारिक क़ानून के इस विभाग को पूर्ण कर दिया जाए।

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سُورَةُ الطَّلَاقِ
65. अत-तलाक़
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील और अत्यन्त दयावान है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِيُّ إِذَا طَلَّقۡتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَطَلِّقُوهُنَّ لِعِدَّتِهِنَّ وَأَحۡصُواْ ٱلۡعِدَّةَۖ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ رَبَّكُمۡۖ لَا تُخۡرِجُوهُنَّ مِنۢ بُيُوتِهِنَّ وَلَا يَخۡرُجۡنَ إِلَّآ أَن يَأۡتِينَ بِفَٰحِشَةٖ مُّبَيِّنَةٖۚ وَتِلۡكَ حُدُودُ ٱللَّهِۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ ٱللَّهِ فَقَدۡ ظَلَمَ نَفۡسَهُۥۚ لَا تَدۡرِي لَعَلَّ ٱللَّهَ يُحۡدِثُ بَعۡدَ ذَٰلِكَ أَمۡرٗا
(1) ऐ नबी! जब तुम लोग औरतों को तलाक़ दो तो उन्हें उनकी इद्दत के लिए तलाक़ दिया करो1 और इद्दत के समय की ठीक-ठीक गिनती करो2, और अल्लाह से डरो जो तुम्हारा रब है। (इद्दत की अवधि में) न तुम उन्हें उनके घरों से निकालो, न वे ख़ुद निकलें3 सिवाय इसके कि वे कोई खुली बुराई कर बैठें।4 यह अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ हैं। और जो कोई अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करेगा, वह अपने ऊपर ख़ुद जुल्म करेगा। तुम नहीं जानते, शायद इसके बाद अल्लाह (मेल-मिलाप की) कोई सूरत पैदा कर दे।5
1. इद्दत के लिए तलाक़ देने के दो अर्थ हैं और दोनों ही यहाँ अभीष्ट हैं। एक अर्थ इसका यह है कि इद्दत का आरंभ करने के लिए तलाक़ दो या दूसरे शब्दों में माहवारी की हालत में औरत को तलाक़ न दो, बल्कि उस समय तलाक़ दो जिससे उनकी इद्दत शुरू हो सके। यह बात सूरा-2 बक़रा, आयत 228 में बताई जा चुकी है कि पति द्वारा शारीरिक सम्बन्ध बना चुकी जिस औरत को माहवारी आती हो उसकी इद्दत तलाक़ के बाद तीन बार माहवारी का आना है। इस आदेश को दृष्टि में रखकर देखा जाए तो इद्दत का आरंभ करने के लिए तलाक़ देने की शक्ल अनिवार्य रूप से यही हो सकती है कि औरत को माहवारी की हालत में तलाक़ न दी जाए, क्योंकि उसकी इद्दत उस माहवारी से शुरू नहीं हो सकती जिसमें उसे तलाक़ दी गई हो और इस हालत में तलाक़ देने का अर्थ यह हो जाता है कि अल्लाह के आदेश के विरुद्ध औरत की इद्दत तीन माहवारी के बजाय चार माहवारी बन जाए। इसी के साथ इस आदेश का तक़ाज़ा यह भी है कि औरत को उस पाकी के दिनों में तलाक़ न दी जाए जिसमें पति उससे सहवास कर चुका हो, क्योंकि इस दशा में तलाक़ देते समय पति-पत्नी दोनों में से किसी को भी यह मालूम नहीं हो सकता कि सम्भोग के फलस्वरूप कोई गर्भ ठहरा है या नहीं। इस कारण इद्दत का आरंभ न इस निर्धारित निर्णय पर किया जा सकता है कि यह इद्दत आगे की माहवारी को दृष्टि में रखकर होगी और न इसी कल्पना पर किया जा सकता है कि यह गर्भवती स्त्री की इद्दत होगी। अतः यह आदेश एक ही समय में दो बातों का तक़ाज़ा कर रहा है। एक यह कि माहवारी की हालत में तलाक़ न दी जाए, दूसरे यह कि तलाक़ या तो उस पाकी में दी जाए जिसमें सम्भोग न किया गया हो या फिर उस दशा में दी जाए जबकि औरत का गर्भवती होना मालूम हो। इद्दत के लिए' तलाक़ देने का दूसरा अर्थ यह है कि इद्दत के अन्दर रुजूअ की गुंजाइश रखते हुए तलाक़ दो। इस तरह तलाक़ न दे बैठो जिससे रुजूअ का मौक़ा ही बाक़ी न रहे। इस आदेश की जो व्याख्या हदीसों में मिलती है उसके अनुसार तलाक़ का नियम यह है कि माहवारी के दिनों में तलाक़ न दी जाए, बल्कि उस पाकी की हालत में दी जाए जिसमें पति ने पत्नी से सम्भोग न किया हो या फिर उस हालत में दी जाए जबकि औरत का गर्भवती होना मालूम हो और एक ही समय में तीन तलाकें न दे डाली जाएँ। अल्लाह के इस आदेश का पालन किया जाए तो किसी व्यक्ति को भी तलाक़ देकर पछताना न पड़े।
2. अर्थ यह है कि तलाक़ को खेल न समझ बैठो कि तलाक़ का अहम मामला पेश आने के बाद यह भी न याद रखा जाए कि कब तलाक़ दी गई है, कब इद्दत शुरू हुई और कब उसको समाप्त होना है। तलाक़ एक बहुत ही नाजुक मामला है जिससे औरत और मर्द और उनकी सन्तान और उनके परिवार के लिए बहुत-सी क़ानूनी समस्याएँ पैदा होती हैं। इसलिए जब तलाक़ दी जाए तो उसके समय और तिथि को याद रखा जाए और यह भी याद रखा जाए कि किस हालत में औरत को तलाक़ दी गई है।
فَإِذَا بَلَغۡنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمۡسِكُوهُنَّ بِمَعۡرُوفٍ أَوۡ فَارِقُوهُنَّ بِمَعۡرُوفٖ وَأَشۡهِدُواْ ذَوَيۡ عَدۡلٖ مِّنكُمۡ وَأَقِيمُواْ ٱلشَّهَٰدَةَ لِلَّهِۚ ذَٰلِكُمۡ يُوعَظُ بِهِۦ مَن كَانَ يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۚ وَمَن يَتَّقِ ٱللَّهَ يَجۡعَل لَّهُۥ مَخۡرَجٗا ۝ 1
(2) फिर जब वे अपनी (इद्दत की) अवधि के अन्त को पहुँचें तो या तो उन्हें भले तरीके से (अपने निकाह) में रोक रखो या भले तरीक़े पर उनसे अलग हो जाओ6 और दो ऐसे आदमियों को गवाह बना लो जो तुममें से इंसाफ़ करनेवाले हो7 और (ऐ गवाह बननेवालो!) गवाही ठीक-ठीक अल्लाह के लिए अदा करो। ये बातें हैं जिनका तुम लोगों को उपदेश दिया जाता है, हर उस व्यक्ति को जो अल्लाह और आख़िरत (परलोक) के दिन पर ईमान रखता हो।8 जो कोई अल्लाह से डरते हुए काम करेगा, अल्लाह उसके लिए कठिनाइयों से निकलने का कोई रास्ता पैदा कर देगा।9
6. अर्थात् एक या दो तलाक़ देने की स्थिति में इद्दत ख़त्म होने से पहले-पहले फैसला कर लो कि औरत को का अपनी पत्नी बनाए रखना है या नहीं। रखना हो तो निभाने के उद्देश्य से रखो। इस उद्देश्य से न रखो कि उसको सताने के लिए रुजूअ कर लो और फिर तलाक़ देकर उसकी इद्दत लंबी करते रहो। और अगर विदा ना करना हो तो सज्जन पुरुष की तरह किसी लड़ाई-झगड़े के बिना विदा कर दो। महर या उसका कोई हिस्सा बाक़ी हो तो अदा कर दो और जो हो सके कुछ न कुछ तलाक़ के अवसर पर दो, जैसा कि सूरा-2 बक़रा, क आयत 241 में कहा गया है। (अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा-33 अल-अहज़ाब, टिप्पणी 86)
7. इब्ने-अब्बास (रजि०) कहते हैं कि इससे मुराद तलाक़ पर भी गवाह बनाना है और रुजूअ पर भी (इब्ने-जरीर)। चारों फुक़हा इसपर सहमत हैं कि तलाक़ और रुजूअ और जुदाई पर गवाह बनाना, इन कामों के सही होने के लिए शर्त नहीं है कि अगर गवाह न बनाया जाए तो न तलाक़ पड़े, न रुजूअ सही हो और न म जुदाई। बल्कि यह आदेश इस सावधानी के लिए दिया गया है कि दोनों फ़रीकों (पक्षों) में से कोई बाद में किसी घटना का इंकार न कर सके और झगड़ा पैदा होने की शक्ल में आसानी से फ़ैसला हो सके और शक व शुबहात का दरवाज़ा भी बन्द हो जाए।
وَيَرۡزُقۡهُ مِنۡ حَيۡثُ لَا يَحۡتَسِبُۚ وَمَن يَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱللَّهِ فَهُوَ حَسۡبُهُۥٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ بَٰلِغُ أَمۡرِهِۦۚ قَدۡ جَعَلَ ٱللَّهُ لِكُلِّ شَيۡءٖ قَدۡرٗا ۝ 2
(3) और उसे ऐसे रास्ते से रोज़ी देगा जिधर वह सोच भी न सकता हो।10 जो अल्लाह पर भरोसा करे, उसके लिए वह काफ़ी है। अल्लाह अपना काम पूरा करके रहता है।11 अल्लाह ने हर चीज़ के लिए एक तक़दीर (अन्दाज़ा) नियत कर रखी है।
10. अभिप्राय यह है कि इद्दत के दौरान तलाक़शुदा पत्नी को घर में रखना, उसका ख़र्च बरदाश्त करना और विदा करते हुए उसको महर या तलाक़ का भत्ता देकर विदा करना निस्सन्देह आदमी पर आर्थिक भार डालता है, लेकिन अल्लाह से डरनेवाले आदमी को यह सब कुछ सहन करना चाहिए। उसके आदेश पर चलकर माल ख़र्च करोगे तो वह ऐसे रास्तों से तुम्हें रोज़ी देगा जिधर से रोज़ी मिलने की तुम सोच भी नहीं सकते।
11. अर्थात कोई ताक़त अल्‍लाह के आदेश को लागू होने से रोकनेवाली नहीं है।
وَٱلَّٰٓـِٔي يَئِسۡنَ مِنَ ٱلۡمَحِيضِ مِن نِّسَآئِكُمۡ إِنِ ٱرۡتَبۡتُمۡ فَعِدَّتُهُنَّ ثَلَٰثَةُ أَشۡهُرٖ وَٱلَّٰٓـِٔي لَمۡ يَحِضۡنَۚ وَأُوْلَٰتُ ٱلۡأَحۡمَالِ أَجَلُهُنَّ أَن يَضَعۡنَ حَمۡلَهُنَّۚ وَمَن يَتَّقِ ٱللَّهَ يَجۡعَل لَّهُۥ مِنۡ أَمۡرِهِۦ يُسۡرٗا ۝ 3
(4) और तुम्हारी औरतों में से जो माहवारी से निराश हो चुकी हों, उनके मामले में अगर तुम लोगों को कोई सन्देह हो रहा है तो (तुम्हें मालूम हो कि) उनकी इद्दत तीन महीने है।12 और यही हुक्म उनका है जिन्हें अभी माहवारी न हुई है।13 और गर्भवती औरतों की इद्दत की सीमा उनके बच्चा पैदा हो जाने तक है।14 जो व्यक्ति अल्लाह से डरे उसके मामले में वह आसानी पैदा कर देता है।
12. यह उन औरतों का हुक्म है जिनको हैज़ (माहवारी) आना पूर्णतः बन्द हो चुका हो और बुढ़ापे की वजह से वह निराशा (रजोनिवृत्ति) की अवस्था' में दाखिल हो चुकी हों। उनकी इद्दत उस दिन से गिनी जाएगी जिस दिन उन्हें तलाक़ दी गई हो। और तीन महीनों से मुराद तीन कमरी (चाँद के) महीने हैं।
13. माहवारी चाहे कमसिनी की वजह से न आई हो, या इस कारण कि कुछ औरतों को बहुत देर में माहवारी आनी शुरू होती है और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी औरत को उम्र भर नहीं आती, बहरहाल तमाम शक्लों में ऐसी औरत की इद्दत वही है जो रजोनिवृत्ति (Menopouse) की अवस्था को पहुँचनेवाली औरत की इद्दत है, अर्थात् तलाक़ के वक़्त से तीन महीने। यहाँ यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि क़ुरआन मजीद के स्पष्टीकरण के अनुसार इद्दत का प्रश्न उस औरत के मामले में पैदा होता है जिससे पति सम्भोग कर चुका हो, क्योंकि सहवास से पहले तलाक़ की शक्ल में सिरे से कोई इद्दत है ही नहीं, (अल-अहज़ाब 49)। इसलिए ऐसी लड़कियों की इद्दत बयान करना जिन्हें माहवारी आनी शुरू न हुई हो, स्पष्टतः इस बात का प्रमाण है कि इस उम्र में न सिर्फ निकाह कर देना जायज़ है, बल्कि पति का उसके साथ सम्भोग करना भी जायज़ है।
ذَٰلِكَ أَمۡرُ ٱللَّهِ أَنزَلَهُۥٓ إِلَيۡكُمۡۚ وَمَن يَتَّقِ ٱللَّهَ يُكَفِّرۡ عَنۡهُ سَيِّـَٔاتِهِۦ وَيُعۡظِمۡ لَهُۥٓ أَجۡرًا ۝ 4
(5) यह अल्लाह का आदेश है जो उसने तुम्हारी तरफ़ उतारा है। जो अल्लाह से डरेगा, अल्लाह उसकी बुराइयों को उससे दूर कर देगा और उसको बड़ा बदला देगा।15
15. यह यद्यपि एक सामान्य उपदेश है जो इंसानी जिंदगी की तमाम हालतों के लिए है, लेकिन इस ख़ास संदर्भ में यह उपदेश देने का उद्देश्य मुसलमानों को सचेत करना है कि ऊपर जो आदेश दिए गए हैं उनसे चाहे तुम्हारे ऊपर [तलाक़शुदा औरत के निवास और गुज़ारा-भत्ता की कितनी ही ज़िम्मेदारी का बोझ पड़ता हो, बहरहाल अल्लाह से डरते हुए उनकी पैरवी करो। अल्लाह का वादा है कि अपनी मेहरबानी से वह उसको हल्का कर देगा, तुम्हारे गुनाह माफ़ करेगा और तुम्हें बड़ा बदला देगा।
أَسۡكِنُوهُنَّ مِنۡ حَيۡثُ سَكَنتُم مِّن وُجۡدِكُمۡ وَلَا تُضَآرُّوهُنَّ لِتُضَيِّقُواْ عَلَيۡهِنَّۚ وَإِن كُنَّ أُوْلَٰتِ حَمۡلٖ فَأَنفِقُواْ عَلَيۡهِنَّ حَتَّىٰ يَضَعۡنَ حَمۡلَهُنَّۚ فَإِنۡ أَرۡضَعۡنَ لَكُمۡ فَـَٔاتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ وَأۡتَمِرُواْ بَيۡنَكُم بِمَعۡرُوفٖۖ وَإِن تَعَاسَرۡتُمۡ فَسَتُرۡضِعُ لَهُۥٓ أُخۡرَىٰ ۝ 5
(6) उनको (इद्दत की अवधि में) उसी जगह रखो जहाँ तुम रहते हो, जैसी कुछ भी जगह तुम्हें उपलब्ध हो, और उन्हें तंग करने के लिए उनको न सताओ।16 और अगर वे गर्भवती हों तो उनपर उनके बच्चा पैदा होने तक ख़र्च करते रहो17। फिर अगर वे तुम्हारे लिए (बच्चे को) दूध पिलाएँ तो उनका मुआवज़ा उन्हें दो, और भले तरीके से (मुआवज़े का मामला) आपसी बातचीत से तय कर लो।18 लेकिन अगर तुमने (मुआवज़ा तय करने में) एक-दूसरे को तंग किया तो बच्चे को कोई और औरत दूध पिला लेगी।19
16. इस बात में तमाम फुकहा (इस्लामी धर्मशास्त्री) सहमत हैं कि तलाक़शुदा औरत को अगर रजई तलाक़ दी गई हो तो पति पर उसका निवास और गुज़ारे-ख़र्च की ज़िम्मेदारी आती है और इस मामले में भी वे सहमत हैं कि अगर औरत गर्भवती हो तो चाहे उसे रजई तलाक़ दी गई हो या क़तई तौर पर अलग कर देनेवाली, बहरहाल उसके बच्चा जनने तक उसके निवास और उसके गुज़ारे-खर्च का ज़िम्मेदार पति होगा। इसके बाद मतभेद इस मामले में हुआ है कि क्या गैर-गर्भवती तलाक़शुदा मब्लूता (अर्थात् जिसे निश्चित रूप से अलग कर देनेवाली तलाक़ दी गई हो) निवास और गुज़ारा-खर्च दोनों की हक़दार है? या सिर्फ़ निवास का हक रखती है? या दोनों में से किसी की भी हक़दार नहीं है? एक वर्ग कहता है कि वह निवास और गुज़ारा-खर्च दोनों की हक़दार है। यह राय हज़रत उमर (रज़ि०), हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रजि०) हज़रत अली बिन हुसैन (इमाम जैनुल आबिदीन रजि०), क़ाज़ी शुरैह और इबराहीम नखई की है। इसी को हनफ़िया ने अपनाया है। दूसरा वर्ग कहता है कि तलाक़शुदा मब्तूता के लिए निवास का हक़ तो है, मगर गुज़ारा-ख़र्च का हक़ नहीं है। यह मत सईद बिन मुसय्यिब, सुलैमान बिन यसार, अता, शअबी, औज़ाई, लैस और अबू उबैदा (रह०) का है और इमाम शाफ़ई और इमाम मालिक (रह०) ने भी इसी को अपनाया है। तीसरा वर्ग कहता है कि तलाक़शुदा मब्लूता के लिए न निवास का हक़ है, न गुज़ारा-ख़र्च का। यह मत हसन बसरी (रह०), हम्माद बिन अबी लैला (रह०), अम्र बिन दीनार (रह०), ताऊस (रह०) इस्हाक़ बिन राहवैह (रह०) और अबू सौर का है। इब्ने-जरीर (रह०) ने हज़रत इब्ने-अब्बास (रजि०) का भी यही मत बयान किया है। इमाम अहमद बिन हंबल (रह०) और इमामिया ने भी इसी को अपनाया है और मुग़नियुल-मोहताज में शाफ़िइया का मत भी यह बयान किया गया है।
17. इस मामले में सभी एकमत हैं कि तलाक़शुदा, चाहे रजइय्या हो या मब्तूता, अगर गर्भवती हो तो बच्चा जनने तक उसको निवास और उसके गुज़ारे-ख़र्च का ज़िम्मेदार पति है। अलबत्ता मतभेद उस सूरत में है जबकि गर्भवती का पति मर गया हो। यह देखे बगैर कि वह तलाक़ देने के बाद मरा हो या उसने कोई तलाक़ न दो हो और औरत गर्भ की हालत में विधवा हो गई हो। इस मामले में फुकहा के मत इस प्रकार हैं- (i) हज़रत अली (रज़ि०) और हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रजि०) आदि का कथन है कि पति के छोड़े हुए कुल तरके (सामान) में उसका गुज़ारा-ख़र्च अनिवार्य है। (ii) हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि०) [के एक कथन के अनुसार] उसपर उसके पेट के बच्चे के हिस्से में से खर्च किया जाए अगर मैइयत ने कोई मीरास छोड़ी हो और अगर मीरास न छोड़ी हो तो मय्यत के वारिसों को उसपर खर्च करना चाहिए, क्योंकि अल्लाह ने फ़रमाया है, "दूध पिलाने की यह ज़िम्मेदारी जैसे बच्चे के बाप पर है वैसे ही उसके वारिस पर है।" (सूरा-2 अल-बकरा, आयत 233) (iii) हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ि०), हज़रत अब्दुल्लाह बिन जुबैर (रज़ि०), हज़रत हसन बसरी आदि कहते हैं कि मरे हुए पति के माल में उसके लिए कोई गुज़ारा खर्च नहीं है। इसका अर्थ यह है कि पति के तर्के में से उसको जो मीरास का हिस्सा मिला हो उससे वह अपना ख़र्च पूरा कर सकती है, लेकिन पति के कुल तर्के पर उसका गुज़ारा ख़र्च लागू नहीं होता जिसका भार तमाम वारिसों पर पड़े। (iv) इमाम अबू हनीफ़ा (रह०), इमाम अबू यूसुफ़ (रह०), इमाम मुहम्मद (रह०), इमाम ज़ुफ़र (रह०) कहते हैं कि मय्यत के माल में उसके लिए न निवास का हक़ है, न गुज़ारा-ख़र्च का, क्योंकि मौत के बाद मय्यत की कोई मिल्कियत ही नहीं है, इसके बाद तो वह वारिसों का माल है। उनके माल में गर्भवती विधवा का गुज़ारा-ख़र्च कैसे वाजिब हो सकता है (हिदाया, जस्सास)। यही मत इमाम अहमद बिन हंबल (रह०) का है। (अल-इंसाफ़) (v) इमाम शाफ़ई (रह०) कहते हैं कि उसके लिए कोई गुज़ारा-खर्च नहीं है, अलबत्ता उसे निवास का हक़ है (मुग़नियुल-मोहताज) । यही मत इमाम मालिक (रह०) का भी है (हाशियतुहसूक़ी)।
لِيُنفِقۡ ذُو سَعَةٖ مِّن سَعَتِهِۦۖ وَمَن قُدِرَ عَلَيۡهِ رِزۡقُهُۥ فَلۡيُنفِقۡ مِمَّآ ءَاتَىٰهُ ٱللَّهُۚ لَا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفۡسًا إِلَّا مَآ ءَاتَىٰهَاۚ سَيَجۡعَلُ ٱللَّهُ بَعۡدَ عُسۡرٖ يُسۡرٗا ۝ 6
(7) ख़ुशहाल व्यक्ति अपनी खुशहाली के अनुसार ख़र्च दे, और जिसको रोज़ी कम दी गई हो वह उसी माल में से ख़र्च करे जो अल्लाह ने उसे दिया है। अल्लाह ने जिसको जितना कुछ दिया है उससे अधिक वह उसपर ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं डालता। दूर नहीं कि अल्लाह तंगदस्ती के बाद सम्पन्नता भी प्रदान करे।
وَكَأَيِّن مِّن قَرۡيَةٍ عَتَتۡ عَنۡ أَمۡرِ رَبِّهَا وَرُسُلِهِۦ فَحَاسَبۡنَٰهَا حِسَابٗا شَدِيدٗا وَعَذَّبۡنَٰهَا عَذَابٗا نُّكۡرٗا ۝ 7
(8) कितनी ही20 बस्तियाँ हैं जिन्होंने अपने रब और उसके रसूलों के आदेश की अवहेलना की तो हमने उनसे कड़ा हिसाब लिया और उनको बुरी तरह सज़ा दी
20. अब मुसलमानों को सावधान किया जाता है कि अल्लाह के रसूल और उसकी किताब के जरीए से जो आदेश उनको दिए गए हैं, उनकी अगर वे अवज्ञा करेंगे तो दुनिया और आख़िरत में किस अंजाम से दोचार होंगे और अगर आज्ञापालन का रास्ता अपनाएँगे तो क्या इनाम पाएँगे?
فَذَاقَتۡ وَبَالَ أَمۡرِهَا وَكَانَ عَٰقِبَةُ أَمۡرِهَا خُسۡرًا ۝ 8
(9) उन्होंने अपने किए का मज़ा चख लिया और उनका कार्य-परिणाम घाटा ही घाटा है।
أَعَدَّ ٱللَّهُ لَهُمۡ عَذَابٗا شَدِيدٗاۖ فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ يَٰٓأُوْلِي ٱلۡأَلۡبَٰبِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْۚ قَدۡ أَنزَلَ ٱللَّهُ إِلَيۡكُمۡ ذِكۡرٗا ۝ 9
(10) अल्लाह ने (आख़िरत में) उनके लिए सख़्त अज़ाब तैयार कर रखा है। अत: अल्लाह से डरो, ऐ बुद्धिमान लोगो जो ईमान लाए हो! अल्लाह ने तुम्हारी ओर एक उपदेश उतार दिया है,
رَّسُولٗا يَتۡلُواْ عَلَيۡكُمۡ ءَايَٰتِ ٱللَّهِ مُبَيِّنَٰتٖ لِّيُخۡرِجَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ مِنَ ٱلظُّلُمَٰتِ إِلَى ٱلنُّورِۚ وَمَن يُؤۡمِنۢ بِٱللَّهِ وَيَعۡمَلۡ صَٰلِحٗا يُدۡخِلۡهُ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدٗاۖ قَدۡ أَحۡسَنَ ٱللَّهُ لَهُۥ رِزۡقًا ۝ 10
(11) एक ऐसा रसूल21 जो तुमको अल्लाह की साफ़-साफ़ हिदायत देनेवाली आयतें सुनाता है, ताकि ईमान लानेवालों और अच्छे कर्म करनेवालों को अंधेरों से निकालकर रौशनी में ले आए।22 जो कोई अल्लाह पर ईमान लाए और अच्छा कर्म करे, अल्लाह उसे ऐसी जन्नतों में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। ये लोग उनमें हमेशा-हमेशा रहेंगे। अल्लाह ने ऐसे व्यक्ति के लिए बेहतरीन रोज़ी रखी है।
21. टीकाकारों में से कुछ ने 'नसीहत' से मुराद कुरआन लिया है और रसूल से मुराद मुहम्मद (सल्ल०) और कुछ कहते हैं कि नसीहत से मुराद स्वयं अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ही हैं अर्थात् आपकी ज़ात (व्यक्तित्व) सर्वथा नसीहत थी। हमारे नज़दीक यही दूसरी टीका अधिक सही है।
22. अर्थात् अज्ञान के अंधेरों से ज्ञान की रौशनी में निकाल लाए। इस कथन का पूरा महत्त्व उस समय समझ में आता है जब इंसान तलाक़, इद्दत और गुज़ारा-ख़र्च के बारे में दुनिया के दूसरे प्राचीन और वर्तमान पारिवारिक क़ानूनों का अध्ययन करता है। इस तुलनात्मक अध्ययन से मालूम होता है कि बार-बार की तब्दीलियों और नित नई क़ानून-साज़ियों के बावजूद आज तक किसी क़ौम को ऐसा उचित और फ़ितरी और समाज के लिए उपयोगी क़ानून नहीं मिल सका है जैसा इस किताब और इसके लानेवाले रसूल ने डेढ़ हज़ार वर्ष पहले हमको दिया था।
ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَ سَبۡعَ سَمَٰوَٰتٖ وَمِنَ ٱلۡأَرۡضِ مِثۡلَهُنَّۖ يَتَنَزَّلُ ٱلۡأَمۡرُ بَيۡنَهُنَّ لِتَعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ وَأَنَّ ٱللَّهَ قَدۡ أَحَاطَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عِلۡمَۢا ۝ 11
(12) अल्लाह वह है जिसने सात आसमान बनाए और ज़मीन की क़िस्म से भी उन्हीं के सदृश23। उनके दर्मियान हुक्म उतरता रहता है। (यह बात तुम्हें इसलिए बताई जा रही है) ताकि तुम जान लो कि अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है और यह कि अल्लाह का ज्ञान हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है।
23. 'उन्हीं के सदृश' का अर्थ यह नहीं है कि जितने आसमान बनाए, उतनी ही ज़मीनें भी बनाईं, बल्कि अर्थ यह है कि जैसे अनेकों आसमान उसने बनाए हैं वैसी ही अनेकों ज़मीनें भी बनाई हैं और ज़मीन की क़िस्म से' का अर्थ यह है कि जिस तरह यह ज़मीन, जिस पर इंसान रहते हैं, अपने रहनेवालों के लिए बिछौना और पालना बनी हुई है, उसी तरह अल्लाह ने सृष्टि में और ज़मीनें भी बना रखी हैं जो अपनी-अपनी आवादियों के लिए बिछौना और पालना हैं। बल्कि कुछ जगहों पर तो क़ुरआन में यह इशारा भी कर दिया गया है कि प्राणी केवल ज़मीन पर ही नहीं हैं, उपरिलोक में भी पाए जाते हैं (मिसाल के तौर पर देखिए टीका सूरा-42 शूरा, आयत 29, टिप्पणी 50)। दूसरे शब्दों में आसमान में ये जो अनगिनत तारे और ग्रह दिखाई देते हैं, ये सब वीरान पड़े हुए नहीं हैं, बल्कि ज़मीन की तरह इनमें भी बहुत-से ऐसे हैं जिनमें दुनियाएँ आबाद हैं। पुराने टीकाकारों में से सिर्फ़ इब्ने अब्बास (रजि०) एक ऐसे टीकाकार हैं जिन्होंने उस काल में इस तथ्य को बयान किया था जब आदमी इसकी कल्पना तक करने के लिए तैयार न था कि सृष्टि में इस जमीन के सिवा कहीं और भी बुद्धि रखनेवाली सृष्टि बसती है। इब्ने-जरीर, इब्ने-अबी हातिम और हाकिम ने और शोबुल ईमान और किताबुल-अस्मा वस्सिफ़ात में बैहक़ी ने अबुजुहा के वास्ते से शब्दों के अन्तर के साथ इब्ने-अब्बास (रज़ि०) की यह व्याख्या उद्धृत की है कि "उनमें से हर ज़मीन में नबी है तुम्हारे नबी जैसा और आदम है तुम्हारे आदम जैसा और नूह है तुम्हारे नूह जैसा और इबराहीम है तुम्हारे इबराहीम जैसा और ईसा है तुम्हारे ईसा जैसा।" इस रिवायत को [जहाँ कुछ लोगों ने सही करार दिया है, वहाँ कुछ ने इसे रद्द भी किया है] लेकिन वास्तविकता यह है कि इसे रद्द करने की असल वजह लोगों का इसे बुद्धि और समझ से परे समझना है, वरना अपने आप में इसमें कोई बात भी बुद्धि से परे नहीं है। चुनाँचे अल्लामा आलूसी अपनी टीका में इसपर वार्ता करते हुए लिखते हैं कि "इसको सही मानने में न बुद्धि रोक है न शरीअत । मुराद यह है कि हर ज़मीन में एक मखलूक है जो एक मूल की ओर उसी तरह रुजूअ करती है जिस तरह बनी आदम हमारी जमीन में आदम की तरफ़ रुजू होते हैं। और हर ज़मीन में ऐसे लोग पाए जाते हैं जो अपने यहाँ दूसरों की अपेक्षा उसी तरह नुमायाँ हैं जिस तरह हमारे यहाँ नूह और इबराहीम (अलैहि०) नुमायाँ हैं।" यह बात उल्लेखनीय है कि हाल में अमरीका के रेंड कॉरपोरेशन (Rand Corporation) ने खगोलीय निरीक्षणों से अनुमान लगाया है कि ज़मीन जिस आकाश-गंगा (Galaxy) में स्थित है, केवल उसी के भीतर लगभग साठ करोड़ ऐसे ग्रह पाए जाते हैं जिनकी प्राकृतिक स्थिति हमारी ज़मीन से बहुत कुछ मिलती-जुलती है और संभावना है कि उसके अन्दर भी जानदार मख़लूक़ आबाद हो। (इकॉनोमिस्ट, लंदन, 26 जुलाई 1969)