(12) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, बहुत गुमान करने से बचो कि कुछ गुमान गुनाह होते हैं,24 टोह में मत पड़ो25, और तुममें से कोई किसी की ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई) न करे।26 क्या तुममें कोई ऐसा है जो अपने मरे हुए भाई का मांस खाना पसन्द करेगा?27 देखो, तुम ख़ुद इससे घिन खाते हो। अल्लाह से डरो, अल्लाह बड़ा तौबा क़ुबूल करनेवाला और दया करनेवाला है।
24. यहाँ सर्वथा गुमान करने से नहीं रोका गया है, बल्कि बहुत ज़्यादा गुमान से काम लेने और हर प्रकार के गुमान का पालन करने से रोका गया है, और इसका कारण यह बताया गया है कि कुछ गुमान गुनाह होते हैं। वास्तव में जो गुमान गुनाह है, वह यह है कि आदमी किसी व्यक्ति से अकारण बदगुमानी करे या दूसरों के बारे में राय बनाने में सदैव बदगुमानी ही से शुरुआत किया करे या ऐसे लोगों के मामले में बदगुमानी से काम ले जिनका वाह्य रूप यह बता रहा हो कि वे भले और सज्जन हैं। इसी प्रकार यह बात भी गुनाह है कि एक व्यक्ति के किसी कथन या कर्म में बुराई और भलाई को समान रूप से सम्भावना हो और हम सिर्फ़ बदगुमानी से काम लेकर उसको बुराई ही समझें, जैसे कोई भला आदमी किसी सभा से उठते हुए अपने जूते के बजाय किसी और का जूता उठा ले और हम यह राय बना लें कि अवश्य उसने जूता चुराने ही की नीयत से यह हरकत की है। हालाँकि यह काम भूले से भी हो सकता है, और अच्छी सम्भावना को छोड़कर बुरो सम्भावना को अपनाने का कोई कारण बद-गुमानी के सिवा नहीं है।
25. अर्थात् लोगों के भेद और रहस्य न टटोलो। एक-दूसरे के दोष न तलाश करो। दूसरों के हालात और मामलों की टोह न लगाते फिरो। लोगों के निजी पत्रों को पढ़ना, दो आदमियों की बातें कान लगाकर सुनना, पड़ोसियों के घर में झाँकना और विभिन्न तरीक़ों से दूसरों के घरेलू जीवन या उनके निजी मामलों की टटोल करना, ये सब उस टोह में शामिल हैं जिससे रोका गया है। टोह से रोकने का यह आदेश केवल व्यक्ति ही के लिए नहीं है, बल्कि इस्लामी हुकूमत के लिए भी है। शरीअत ने बुराई से रोकने का जो कर्त्तव्य हुकूमत को सौंपा है, उसका यह तक़ाज़ा नहीं है कि वह जासूसी की एक व्यवस्था स्थापित करके लोगों की छिपी हुई बुराइयाँ ढूंढ-ढूंढकर निकाले और उनपर सज़ा दे, बल्कि उसे केवल उन बुराइयों के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग करना चाहिए जो प्रकट हो जाएँ । रहीं छिपी ख़राबियाँ, तो उनके सुधार का रास्ता जासूसी नहीं है, बल्कि शिक्षा, उपदेश, जनता का सामूहिक प्रशिक्षण और एक स्वच्छ सामाजिक वातावरण पैदा करने की कोशिश है। इस आदेश का अपवाद केवल वे विशेष परिस्थितियाँ हैं जिनमें टोह की वास्तव में ज़रूरत हो, जैसे किसी आदमी या गिरोह के व्यवहार में बिगाड़ की कुछ निशानियाँ स्पष्ट दिखाई पड़ रही हैं और उसके बारे में यह आशंका पैदा हो जाए कि वह कोई अपराध करनेवाला है, तो हुकूमत उसके हालात की जाँच कर सकती है। या जैसे किसी आदमी के यहाँ कोई शादी का सन्देश भेजे या उसके साथ कोई कारोबारी मामला करना चाहे, तो वह अपने सन्तोष के लिए उसके हालात की जाँच कर सकता है।
26. 'ग़ीबत' की परिभाषा यह है कि “आदमी किसी आदमी के पीठ पीछे उसके बारे में ऐसी बात कहे जो अगर उसे मालूम हो तो उसे नापसन्द हो।” यह परिभाषा खु़द अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाई है। हज़रत अबू हुरैरा (रज़ि०) की रिवायत, जिसका मुस्लिम, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, नसई और हदीस के अन्य आलिमों ने उल्लेख किया है, उसमें नबी (सल्ल०) ने 'ग़ीबत' की यह परिभाषा की है। ग़ीबत यह है कि “तू अपने भाई की चर्चा इस तरह करे जो उसे नापसन्द हो।” कहा गया कि अगर मेरे भाई में वह बात पाई जाती हो जो मैं कह रहा हूँ तो इस सूरत में आपका क्या विचार है? फ़रमाया, “अगर उसमें वह बात पाई जाती हो तो तूने उसकी ग़ीबत की, और अगर उसमें वह मौजूद न हो तो तूने उसपर बोहतान (झूटा आरोप) लगाया।” इस कथन से मालूम हुआ कि किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ उसके पीछे झूटा आरोप लगाना बोहतान है और उसके वास्तविक दोषों को बयान करना ग़ीबत है। यह काम चाहे खुले शब्दों में किया जाए या इशारों में, बारसाल हराम है। इसी तरह यह काम चाहे आदमी की ज़िंदगी में किया जाए या उके मरने के बाद दोनों स्थितियों में उसका अवैध होना समान है।
इस निषेध की अपवाद सिर्फ़ वे शक्लें है, जिनमें किसी व्यक्ति की पीठ पीछे या उसके मरने के उसको बुराई अयान करने को कोई ऐसी ज़रूरत मा पहे जो शरीअत की द्रष्टिय एक सही ज़रूरत हो और वह ज़रूरत ग़ीबत के बिना पूरी न हो सकती हो और उसके लिए अगर ग़ीबत न की जाए तो ग़ीबत के मुक़ाबले में ज़्यादा बड़ी बुराई लाज़िम आती हो। नबी (सल्ल०) ने इस अपवाद को उसूली तौर यूँ बयान फ़रमाया है, “ सबसे बुरी ज़्यादती किसी मुसलमान की बात पर नाहक़ हमला करना है,” (अबू दाऊद)। इस कथन में 'नाहक़' की कैद यह बताती है कि “हक़' के कारण ऐसा करना जाइन है। उलमा ने [इस सिलसिले में अल्लाह के रसूल (सल्ल०) की जीवनी में मिलनेवाले उदाहरणों को सामने रख कर] ग़ीबत को नीचे लिखी सूरतें जाइज़ (वैध) ठहराई हैं-
(1) ज़ालिम के विरुद्ध उस व्यक्ति की शिकायत जिस पर ज़ुल्म किया गया हो हर उस आदमी के सामने, जिससे वह यह आशा रखता हो कि वह ज़ुल्म को दूर करने के लिए कुछ कर सकता है।
(2) सुधार की नीयत से किसी व्यक्ति या गिरोह की बुराइयों का उल्लेख ऐसे लोगों के सामने जिनसे यह आशा हो कि वे उन बुराइयों को दूर करने के लिए कुछ कर सकेंगे।
(3) धर्मादेश (फ़तवा) प्राप्त करने के उद्देश्य से किसी मुफ़्ती के सामने सही स्थिति रखना जिसमें किसी व्यक्ति के किसी ग़लत काम का उल्लेख हो जाए।
(4) लोगों को किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की बुराई से सचेत करना, ताकि वे उसके नुक़सान से बच सकें। जैसे उल्लेखकर्ताओं (रावियों), गवाहों और लेखकों की कमज़ोरियाँ बयान करना सारे उलमा के नज़दीक सिर्फ़ जायज़ (वैध) ही नहीं, वाजिब (अनिवार्य) है, क्योंकि उसके बिना शरीअत (धर्म) को ग़लत रिवायतों (उल्लेखों) के प्रचार से, अदालतों को बे-इनसाफ़ी से और आम लोगों या ज्ञान प्राप्त करनेवालों को गुमराहियों से बचाना संभव नहीं है। या जैसे कोई व्यक्ति किसी से शादी-ब्याह का रिश्ता करना चाहता हो या किसी के पड़ोस में मकान लेना चाहता हो या किसी से साझीदारी का मामला करना चाहता हो या किसी को अपनी अमानत सौंपना चाहता हो और आपसे मशविरा करे तो आपके लिए अनिवार्य है कि उसका गुण-अवगुण उसे बता दें ताकि अनजाने में वह धोखा न खा जाए।
(5) ऐसे लोगों के विरुद्ध खुल्लम-खुल्ला आवाज़ उठाना और उनकी बुराइयों पर आलोचना करना, जो 'फ़िस्क़ व फ़ुजूर' (बुराई व गुमराही) फैला रहे हों, या दीन (धर्म) में ग़लत बातें पैदा कर रहे हों और गुमराहियों को बढ़ावा दे रहे हों, या ख़ुदा के बन्दों को अधर्म और अन्याय व अत्याचार की बुराइयों में डाल रहे हों।
(6) जो लोग किसी बुरी उपाधि से इतने ज़्यादा प्रसिद्ध हो चुके हों कि वे उस उपाधि के सिवा किसी और उपाधि से पहचाने न जा सकते हों उनके लिए वह उपाधि इस्तेमाल करना, प्रशंसा के उद्देश्य से न कि बुराई निकालने के उद्देश्य से।
(विस्तार के लिए देखिए फ़तहुल बारी, भाग 10, पृ० 362, नववी की शरहे-मुस्लिम, अध्याय तहरीमुल-ग़ीबा, रियाज़ुस्सालिहीन, अध्याय 'युबाहु मिनल ग़ीबा', अहकामुल क़ुरआन (जस्सास की पुस्तक) और रूहुल मआनी, तफ़सीर आयत' वला यगतब बअ-ज़ुकुम बअ़-ज़ा।)
इन अपवादों के अलावा पीठ पीछे किसी की बुराई करना बिलकुल ही हराम (अवैध) है।
27. इस वाक्य में अल्लाह ने 'ग़ीबत' की उपमा मरे हुए भाई का मांस खाने से इसलिए दी है ताकि इसके अत्यन्त घिनौना होने का विचार सामने आ सके। फिर इस उपमा को प्रश्न के रूप में पेश करके और अधिक प्रभावकारी बना दिया गया है, ताकि हर व्यक्ति अपनी अन्तरात्मा से पूछकर स्वयं फ़ैसला करे कि क्या वह अपने मरे हुए भाई का मांस खाने के लिए तैयार है? अगर नहीं है और उसकी फ़ितरत इस चीज़ से घिन खाती है, तो आख़िर वह यह बात कैसे पसन्द करता है कि अपने एक ईमानवाले भाई की अनुपस्थिति में उसकी इज्जत पर हमला करे, जहाँ वह अपनी रक्षा नहीं कर सकता और जहाँ उसको यह ख़बर तक नहीं है कि उसकी बेइज़्ज़ती की जा रही है ? इस कथन से यह बात भी मालूम हुई कि ग़ीबत के हराम होने का मूल कारण उस व्यक्ति का दिल दुखाना नहीं है जिसकी ग़ीबत की गई हो, बल्कि किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति में उसकी बुराई करना अपने आप में हराम (अवैध) है, यह देखे बिना कि उसको इसका ज्ञान हो या न हो और उसको इस काम से पीड़ा पहुँचे या न पहुँचे।