Hindi Islam
Hindi Islam
×

Type to start your search

سُورَةُ الرُّومِ

30. अर-रूम 

(मक्का में उतरी-आयतें 60)

परिचय

नाम

पहली ही आयत के शब्द “ग़ुलि ब-तिर्रूम" (रूमी पराजित हो गए हैं) से लिया गया है।

उतरने का समय

आरंभ ही में कहा गया है कि "क़रीब के भू-भाग में रूमी (रोमवासी) पराजित हो गए हैं।” उस समय अरब से मिले हुए सभी अधिकृत क्षेत्रों पर ईरानियों का प्रभुत्व 615 ई० में पूरा हुआ था : इसलिए पूरे विश्वास के साथ यह कहा जा सकता है कि यह सूरा उसी साल उतरी थी और यह वही साल था जिसमें हबशा की हिजरत हुई थी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जो भविष्यवाणी इस सूरा की आरंभिक आयतों में की गई है वह क़ुरआन मजीद के अल्लाह के कलाम होने और मुहम्मद (सल्ल०) के सच्चे रसूल होने की स्पष्ट और खुली गवाहियों में से एक है । इसे समझने के लिए ज़रूरी है कि उन ऐतिहासिक घटनाओं का विस्तृत विवेचन किया जाए जो इन आयतों से संबंध रखती हैं। नबी (सल्ल०) की नुबूवत से 8 साल पहले की घटना है कि क़ैसरे-रूम (रोम का शासक) मारीस (Maurice) के विरुद्ध विद्रोह हुआ और एक व्यक्ति फ़ोकास (Phocas) ने राजसिंहासन पर क़ब्ज़ा कर लिया [और क़ैसर को उसके बाल-बच्चों के साथ क़त्ल करा दिया]। इस घटना से ईरान के सम्राट ख़ुसरो परवेज़ को रोम पर हमलावर होने के लिए बड़ा ही अच्छा नैतिक बहाना मिल गया, क्योंकि क़ैसर मॉरीस उसका उपकारकर्ता था। चुनांँचे 603 ई० में उसने रोमी साम्राज्य के विरुद्ध लड़ाई कर दी और कुछ साल के भीतर वह फ़ोकास की फ़ौज़ों को बराबर हराता हुआ [बहुत दूर तक अंदर घुस गया] रूम के दरबारियों ने यह देखकर कि फ़ोकास देश को नहीं बचा सकता, अफ़रीक़ा के गर्वनर से मदद मांँगी। उसने अपने बेटे हिरक़्ल (Heraclius) को एक शक्तिशाली बेड़े के साथ क़ुस्तनतीनिया भेज दिया। उसके पहुँचते ही फ़ोकास को पद से हटा दिया गया और उसकी जगह हिरक़्ल कै़सर बनाया गया। यह 610 ई० की घटना है और यह वही साल है जिसमें नबी (सल्ल०) अल्लाह की ओर से नबी बनाए गए।

ख़ुसरो परवेज़ ने फ़ोकास के हटाए और क़त्ल कर दिए जाने के बाद भी लड़ाई जारी रखी, और अब इस लड़ाई को उसने मजूसियों (अग्नि-पूजकों) और ईसाइयों के धर्मयुद्ध का रंग दे दिया [वह जीतता हुआ आगे बढ़ता रहा, यहाँ तक कि] 614 ई० में बैतुल-मक़दिस पर क़ब्ज़ा करके ईरानियों ने मसीही दुनिया पर क़ियामत ढा दी। इस जीत के बाद एक साल के अन्दर-अन्दर ईरानी फ़ौजें जार्डन, फ़िलस्तीन और सीना प्रायद्वीप के पूरे इलाके़ पर क़ब्ज़ा करके मिस्र की सीमाओं तक पहुँच गईं। यह वह समय था जब मक्का मुअज़्ज़मा में एक ओर उससे कई गुना अधिक ऐतिहासिक महत्त्ववाली लड़ाई [कुफ्र और इस्लाम की लड़ाई] छिड़ गई थी और नौबत यहाँ तक पहुँच गई थी कि 615 ई० में मुसलमानों की एक बड़ी संख्या को अपना घर-बार छोड़कर हबशा के ईसाई राज्य में (जिससे रोम की शपथ-मित्रता थी) पनाह लेनी पड़ी। उस वक़्त ईसाई रोम पर [अग्निपूजक] ईरान के प्रभुत्व की चर्चा हर ज़बान पर थी। मक्का के मुशरिक इसपर खु़शी मना रहे थे और इसे मुसलमानों [के विरुद्ध उसकी सफलता की एक मिसाल और शगुन ठहरा रहे थे।] इन परिस्थतियों में कु़रआन मजीद की यह सूरा उतरी और इसमें वह भविष्यवाणी की गई [जो इसकी शुरू की आयतों में बयान की गई है।] इसमें एक के बजाय दो भविष्यवाणियाँ थीं- एक यह कि रूमियों को ग़लबा (प्रभुत्व) मिलेगा। दूसरी यह कि मुसलमानों को भी उसी समय में जीत मिलेगी। प्रत्यक्ष में तो दूर-दूर तक कहीं इसकी निशानियाँ मौजूद न थीं कि इनमें से कोई एक भविष्यवाणी भी कुछ वर्ष के भीतर पूरी हो जाएगी। चुनांँचे क़ुरआन की ये आयतें जब उतरीं तो मक्का के विधर्मियों ने इसकी खू़ब हँसी उड़ाई, [लेकिन सात-आठ वर्ष बाद ही परिस्थतियों ने पलटा खाया।] 622 ई० में इधर नबी (सल्ल०) हिजरत करके मदीना तशरीफ़ ले गए और उधर कै़सर हिरक़्ल [ईरान पर जवाबी हमला करने के लिए] ख़ामोशी के साथ कु़स्तनतीनिया से काला सागर के रास्ते से तराबजू़न की ओर रवाना हुआ और 623 ई० में आरमीनिया से [अपना हमला] शुरू करके दूसरे साल 624 ई० में उसने आज़र बाइजान में घुसकर ज़रतुश्त के जन्म स्थल अरमियाह (Clorumia) को नष्ट कर दिया और ईरानियों के सबसे बड़े अग्निकुंड की ईंट से ईट बजा दी। अल्लाह की कु़दरत का करिश्मा देखिए कि यही वह साल था जिसमें मुसलमानों को बद्र में पहली बार मुशरिकों के मुक़ाबले में निर्णायक विजय मिली। इस तरह वे दोनों भविष्यवाणियाँ जो सूरा रूम में की गई थी, दस साल की अवधि समाप्त होने में पहले एक साथ ही पूरी हो गईं।

विषय और वार्ताएँ

इस सूरा में वार्ता का आरंभ इस बात से किया गया है कि आज रूमी (रोमवासी) परास्त हो गए हैं, मगर कुछ साल न बीतने पाएँगे कि पांँसा पलट जाएगा और जो परास्त है, वह विजयी हो जाएगा। इस भूमिका से यह बात मालूम हुई कि इंसान अपनी बाह्य दृष्टि के कारण वही कुछ देखता है जो बाह्य रूप से उसकी आँखों के सामने होता है, मगर इस बाह्य के परदे की पीछे जो कुछ है, उसकी उसे ख़बर नहीं होती। जब दुनिया के छोटे-छोटे मामलों में [आदमी अपनी ऊपरी नज़र के कारण] ग़लत अन्दाज़े लगा बैठता है, तो फिर समग्र जीवन के मामले में दुनिया को जिंदगी के प्रत्यक्ष पर भरोसा कर बैठना कितनी बड़ी ग़लती है। इस तरह रोम एवं ईरान के मामले से व्याख्यान का रुख़ आख़िरत के विषय की ओर फिर जाता है और लगातार 27 आयतों तक विविध ढंग से यह समझाने की कोशिश की जाती है कि आख़िरत सम्भव भी है, बुद्धिसंगत भी है और आवश्यक भी है। इस सिलसिले में आख़िरत पर प्रमाण जुटाते हुए सृष्टि की जिन निशानियों को गवाही के रूप में पेश किया गया है, वे ठीक वही निशानियाँ हैं जो तौहीद (एकेश्वरवाद) को प्रमाणित करती हैं। इस लिए आयत 41 के आरंभ में से व्याख्यान का रुख़ तौहीद को साबित करने और शिर्क (बहुदेववाद) को झुठलाने की ओर फिर जाता है और बताया जाता है कि शिर्क जगत् की प्रकृति और मानव की प्रकृति के विरुद्ध है। इसी लिए जहाँ भी इंसान ने इस गुमराही को अपनाया है, वहाँ बिगाड़ पैदा हुआ है। इस मौके़ पर फिर उस बड़े बिगाड़ की ओर, जो उस समय दुनिया के दो बड़े राज्यों के बीच लड़ाई की वजह से पैदा हो गया था, संकेत किया गया है और बताया गया है कि यह बिगाड़ भी शिर्क के नतीजों में से है। अन्त में मिसाल की शक्ल में लोगों को समझाया गया है कि जिस तरह मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन अल्लाह की भेजी हुई बारिश से सहसा जी उठती है, उसी तरह अल्लाह की भेजी हुई वह्य और नुबूवत भी मुर्दा पड़ी हुई मानवता के हक़ में रहमत (दयालुता) की बारिश है। इस मौके़ से फ़ायदा उठाओगे तो यही अरब की सूनी ज़मीन अल्लाह की रहमत से लहलहा उठेगी। लाभ न उठाओगे तो अपनी ही हानि करोगे।

---------------------

سُورَةُ الرُّومِ
30. अर-रूम
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील और अत्यन्त दयावान है।
الٓمٓ
(1) अलिफ़० लाम० मीम० ।
غُلِبَتِ ٱلرُّومُ ۝ 1
(2-3) रूमी क़रीब की धरती में पराजित हो गए हैं और अपनी इस पराजय के बाद कुछ साल के भीतर वे विजयी हो जाएँगे।1
1. इब्ने अब्बास (रजि०) और दूसरे सहाबा व ताबईन के बयानों से मालूम होता है कि रूम और ईरान की इस लड़ाई में मुसलमानों की हमदर्दियाँ रूम के साथ और मक्का के विधर्मियों की सहानुभूति ईरान के साथ थीं। इसके कई कारण थे- एक यह कि ईरानियों ने इस लड़ाई को मजूसी और ईसाई धर्म की लड़ाई का रंग दे दिया था और वे देश विजय करने के उद्देश्य से आगे बढ़कर इसे मजूसी धर्म फैलाने का साधन बना रहे थे। बैतुल-मक़दिस की जीत के बाद खु़सरो परवेज़ ने जो पत्र कै़सरे रूम को लिखा था, उसमें वह स्पष्ट रूप से अपनी विजय को मजूसी मत के सत्यपूर्ण होने की दलील करार देता है। सैद्धान्तिक रूप से मजूसियों का धर्म मक्का के मुशरिकों के धर्म से मिलता-जुलता था, क्योंकि वे भी तौहीद के इनकारी थे, दो ख़ुदाओं को मानते थे और आग की पूजा करते थे, इसलिए मुशरिकों को हमदर्दियाँ उनके साथ थीं। उनके मुक़ाबले में मसीही, चाहे कितने ही शिर्क में ग्रस्त हो गए हों,मगर वे अल्लाह की तौहीद को दीन की बुनियाद मानते थे, आख़िरत के क़ायल थे और वह्य व रिसालत को हिदायत का स्रोत मानते थे। इसी आधार पर उनका दीन अपनी असल के एतिबार से मुसलमानों के दीन से मिलता-जुलता था, इसलिए मुसलमान स्वाभाविक रूप से उनसे हमददी रखते थे और उनपर मुशरिक क़ौम का आधिपत्य उन्हें नागवार था। दूसरी वजह यह थी कि एक नबी के आने से पहले जो लोग पिछले नबी को मानते हों वे सैद्धान्तिक रूप से मुसलमान ही को परिभाषा में आते हैं और जब तक बाद के आनेवाले नबी को दावत उन्हें न पहुँचे और वे उसका इनकार न कर दें, उनकी गिनती मुसलमानों ही में रहती है (देखिए सूरा क़सस, टिप्पणी 73)। उस वक़्त नबी (सल्ल०) को नबी बनाए जाने पर सिर्फ़ पांच-छ: वर्ष ही गुज़रे थे और नबी (सल्ल०) की दावत अभी तक बाहर नहीं पहुंची थी, इसलिए मुसलमान ईसाइयों की गिनती इनकार करनेवालों में नहीं करते थे, अलबत्ता यहूदी उनकी निगाह में इनकारी थे, क्योंकि वे हज़रत ईसा को नुबूवत का इनकार कर चुके थे। तीसरी वजह यह थी कि इस्लाम के शुरू में ईसाइयों की ओर से मुसलमानों के साथ हमदर्दी ही का बर्ताव हुआ था, जैसा कि सूरा-28 क़सस, आयतें 52-55 और सूरा-5 माइदा, आयतें 82-85 में बयान हुआ है। बल्कि इनमें से बहुत-से लोग खुले मन से हक़ की दावत अपना रहे थे। फिर, हब्शा की हिजरत के मौक़े पर जिस तरह हब्शा के ईसाई बादशाह ने मुसलमानों को पनाह दी और उनकी वापसी के लिए मक्का के विधर्मियों की माँग को ठुकरा दिया, उसका भी यह तक़ाज़ा था कि मुसलमान आग के पुजारियों (मजूसियों) के मुक़ाबले में ईसाइयों के शुभ-चिंतक हों।
فِيٓ أَدۡنَى ٱلۡأَرۡضِ وَهُم مِّنۢ بَعۡدِ غَلَبِهِمۡ سَيَغۡلِبُونَ ۝ 2
0
فِي بِضۡعِ سِنِينَۗ لِلَّهِ ٱلۡأَمۡرُ مِن قَبۡلُ وَمِنۢ بَعۡدُۚ وَيَوۡمَئِذٖ يَفۡرَحُ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ ۝ 3
(4) अल्लाह ही का अधिकार है पहले भी और बाद में भी, 2 और वह दिन वह होगा जबकि अल्लाह की दी हुई विजय पर मुसलमान ख़ुशियाँ मनाएंगे।3
2. अर्थात् पहले जब ईरानी विजयी हुए तो इस बुनियाद पर नहीं कि मआज़ल्लाह (ख़ुदा की पनाह)! जगत् स्वामी उनके मुकाबले में हार खा गया और बाद में जब रूमी जीतेंगे तो उसका अर्थ यह नहीं है कि अल्लाह को उसका खोया हुआ देश मिल जाएगा। शासनाधिकार तो हर हाल में अल्लाह ही का है। पहले जिसे जीत मिली, उसे भी अल्लाह ही ने जीत दी और बाद में जो जीतेगा, वह भी अल्लाह ही के हुक्म से जीतेगा। उसके ईश्वरत्व में कोई अपने ज़ोर से ग़लबा हासिल नहीं कर सकता, जिसे वह उठाता है वही उठता है और जिसे वह गिराता है वही गिरता है।
3. हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ि०), अबू सईद ख़ुदरी (रज़ि०), सुफ़ियान सौरी (रज़ि०), सुदी (रह०) आदि लोगों का बयान है कि ईरानियों पर रूमियों की विजय और बद्र की लड़ाई में मुशरिकों पर मुसलमानों की विजय का समय एक ही था। इसलिए मुसलमानों को दोहरी प्रसन्नता प्राप्त हुई। यही बात ईरान और रूम के इतिहास से भी सिद्ध होती है। सन् 624 ई० ही वह साल है जिसमें बद्र की लड़ाई हुई और यही वह साल है जिसमें कै़सरे रूम ने जरतुश्त की जन्म भूमि नष्ट की और ईरान के सबसे बड़े आतिशकदे (अग्नि-कुंड) को ध्वस्त कर दिया।
بِنَصۡرِ ٱللَّهِۚ يَنصُرُ مَن يَشَآءُۖ وَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ ۝ 4
(5) अल्लाह मदद करता है जिसे चाहता है, और वह ज़बरदस्त और दयावान है।
وَعۡدَ ٱللَّهِۖ لَا يُخۡلِفُ ٱللَّهُ وَعۡدَهُۥ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعۡلَمُونَ ۝ 5
(6) यह वादा अल्लाह ने किया है, अल्लाह कभी अपने वादे की अवहेलना नहीं करता, मगर अधिकतर लोग जानते नहीं हैं।
يَعۡلَمُونَ ظَٰهِرٗا مِّنَ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا وَهُمۡ عَنِ ٱلۡأٓخِرَةِ هُمۡ غَٰفِلُونَ ۝ 6
(7) लोग दुनिया की ज़िन्दगी का बस ऊपरी पहलू जानते हैं और आख़िरत से वे स्वयं भी ग़ाफ़िल हैं।4
4. अर्थात्, यद्यपि आख़िरत को साबित करनेवाली निशानियों और गवाहियां बहुतायत में मौजूद हैं, और इससे ग़फलत का कोई उचित कारण नहीं है, लेकिन ये लोग इससे स्वयं ही ग़फ़लत बरत रहे हैं। दूसरे शब्दों में यह उनकी अपनी कोताही है कि दुनिया की ज़िन्दगी के इस परी परदे पर निगाह जमाकर बैठ गए हैं और इसके पीछे जो कुछ आने वाला है उससे बिल्कुल बेख़बर है, वरना अल्लाह की ओर से उनको ख़बरदार करने में कोई कोताही नहीं हुई है।
أَوَلَمۡ يَتَفَكَّرُواْ فِيٓ أَنفُسِهِمۗ مَّا خَلَقَ ٱللَّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ وَمَا بَيۡنَهُمَآ إِلَّا بِٱلۡحَقِّ وَأَجَلٖ مُّسَمّٗىۗ وَإِنَّ كَثِيرٗا مِّنَ ٱلنَّاسِ بِلِقَآيِٕ رَبِّهِمۡ لَكَٰفِرُونَ ۝ 7
(8) क्या इन्होंने कभी अपने आप में सोच विचार नहीं किया?5 अल्लाह ने ज़मीन और आसमानों को और उन सारी चीज़ों को जो उनके बीच है, सत्य पर और एक नियत समय ही के लिए पैदा किया है।” 6 मगर बहुत-से लोग अपने रब की मुलाक़ात के इनकारी हैं। 7
5. यह आख़िरत का अपने आप में एक स्थायी प्रमाण है। इसका अर्थ यह है कि अगर ये लोग बाहर किसी ओर नज़र दौड़ाने से पहले स्वयं अपने अस्तित्व पर विचार करते तो इन्हें अपने भीतर भी वे दलीलें मिल जातीं जो आज की ज़िन्दगी के बाद दूसरी ज़िन्दगी की ज़रूरत सिद्ध करते हैं। इनसान की तीन प्रमुख विशेषताएं ऐसी हैं जो उसको ज़मीन की दूसरी मौजूद चीज़ों से अलग कर देती हैं- एक यह कि ज़मीन और उसके वातावरण की अनगिनत चीजें उसके वशीभूत कर दी गई हैं और उनके उपभोग के विस्तृत अधिकार उसको दे दिए गए हैं। दूसरे यह कि उसे अपनी ज़िन्दगी का रास्ता चुनने में आज़ाद छोड़ दिया गया है। ईमान और इनकार, आज्ञापालन और अवज्ञा, नेकी और बदी की राहों में से जिस राह पर भी जाना चाहे, जा सकता है। सत्य और असत्य, सही और ग़लत, जिस तरीक़े को भी अपनाना चाहे, अपना सकता है। हर रास्ते पर चलने की उसे सामर्थ्य दी जाती है और उसपर चलने में वह अल्लाह के जुटाए साधनों का उपयोग कर सकता है, भले ही वह अल्लाह के आज्ञापालन का रास्ता हो या उसकी अवज्ञा का रास्ता । तीसरे यह कि उसमें पैदाइशी तौर पर नैतिकता रख दी गई है, जिसके आधार पर वह उन कर्मों में अंतर करता है जिनके संबंध में उसे करने या न करने का अधिकार प्राप्त है और जिनमें वह विवश है, उसे अधिकार प्राप्त नहीं है। वह वैकल्पिक कामों को भलाई और बुराई की श्रेणियों में रखता है और तत्काल यह राय क़ायम करता है कि अच्छा काम इनाम का और बुरा काम सज़ा के योग्य होना चाहिए। ये तीनों विशेषताएँ जो इनसान के अपने अस्तित्व में पाई जाती हैं, इस बात की निशानदेही करती हैं कि कोई समय ऐसा होना चाहिए जब इनसान का हिसाब-किताब किया जाए, जब उससे पूछा जाए कि जो कुछ दुनिया में उसको दिया गया था उसके उपभोग के अधिकारों को उसने किस तरह इस्तेमाल किया? जब यह देखा जाए कि उसने चुनाव की अपनी स्वतंत्रता को प्रयोग में लाकर के सही रास्ता अपनाया या ग़लत? जब उसके ‘इख़्तियारी’ कामों की जाँच की जाए और भले कर्म पर इनाम और बुरे कर्म पर सज़ा दी जाए। यह समय अनिवार्य रूप से इनसान की जीवन-लीला ख़त्म और उसके कर्मों का खाता बन्द होने के बाद ही आ सकता है, न कि इससे पहले। और यह समय अनिवार्यतः उसी समय आना चाहिए जबकि एक व्यक्ति या एक क़ौम का नहीं, बल्कि सारे ही इनसानों के कर्मों का खाता बंद हो । क्योंकि एक व्यक्ति या एक क़ौम के मर जाने पर उन प्रभावों का सिलसिला समाप्त नहीं हो जाता जो उसने अपने कर्मों के कारण दुनिया में छोड़े हैं। उसके छोड़े हुए अच्छे या बुरे प्रभाव भी तो उसके हिसाब में गिने जाने चाहिएँ। ये प्रभाव जब तक पूरे तौर पर प्रकट न हो लें, न्याय के अनुसार पूरा हिसाब-किताब करना और पूरी सज़ा या इनाम देना कैसे संभव है। इस तरह इनसान का अपना अस्तित्त्व इस बात की गवाही देता है और ज़मीन में इनसान को जो हैसियत हासिल है वह आप से आप इस बात का तक़ाज़ा करती है कि दुनिया की मौजूदा ज़िन्दगी के बाद एक दूसरी ज़िन्दगी ऐसी हो जिसमें अदालत कायम हो, इनसाफ़ के साथ इनसान की ज़िन्दगी के कर्मों का हिसाब-किताब किया जाए और हर आदमी को उसके काम के हिसाब से बदला दिया जाए।
6. इस वाक्य में आख़िरत के दो और प्रमाण दिए गए हैं। इसमें बताया गया है कि अगर इनसान अपने अस्तित्त्व से बाहर की सृष्टि की व्यवस्था को ध्यान से देखे तो उसे दो वास्तविकताएँ स्पष्ट दिखाई देंगी। एक यह कि यह सृष्टि सोद्देश्य बनाई गई है। यह किसी बच्चे का खेल नहीं है कि सिर्फ़ मन बहलावे के लिए उसने एक बे-ढंगा-सा घरौंदा बना लिया हो जिसका बनाव-बिगाड़ दोनों ही निरर्थक हो, बल्कि यह एक गंभीर व्यवस्था है जिसका एक-एक कण इस बात पर गवाही दे रहा है कि उसे अत्यंत समझ-बूझ और विवेक के साथ बनाया गया है, जिसकी हर चीज़ में एक कानून काम कर रहा है, जिसकी हर चीज़ उद्देश्यपूर्ण है। इनसान की सारी सभ्यता और उसको पूरी अर्थ व्यवस्था और उसके तमाम ज्ञान-विज्ञान स्वयं इस बात पर गवाह हैं । दुनिया की हर चीज़ के पीछे काम करनेवाले कानूनों को मालूम करके और हर चीज़ जिस उद्देश्य के लिए बनाई गई है उसे खोज करके ही इनसान यहाँ यह सब कुछ बना सका है, वरना एक नियमरहित और निरुद्देश्य खिलौने में अगर एक पुतले को हैसियत से उसको रख दिया गया होता तो किसी विज्ञान और किसी सभ्यता एवं संस्कृति की बात सोची तक न जा सकती थी। अब आख़िर यह बात तुम्हारी बुद्धि में कैसे समाती है कि जिस तत्त्वदर्शी ने इस तत्त्वदर्शिता और उद्देश्य के साथ यह दुनिया बनाई है और उसके भीतर तुम जैसे एक प्राणी को अत्यंत ऊंचे दर्जे की मानसिक और शारीरिक क्षमताएँ देकर, अधिकार देकर, चुनने को आज़ादी देकर, नैतिकता को अनुभूति देकर अपनी दुनिया का अनगिनत सरो-सामान तुम्हारे हवाले किया है, उसने तुम्हें निरुद्देश्य ही पैदा कर दिया होगा? तुम दुनिया में बनाव-बिगाड़ और नेकी और बदी और न्याय-अन्याय और सही-ग़लत के सारे हंगामे बरपा करने के बाद यूँ ही मरकर मिट्टी में मिल जाओगे और तुम्हारे किसी अच्छे या बुरे काम का कोई नतीजा न होगा? तुम अपने एक-एक कर्म से अपनी या अपने जैसे हज़ारों इनसानों की ज़िन्दगी पर और दुनिया को अनगिनत चीज़ों पर बहुत से लाभप्रद या हानिप्रद प्रभाव डालकर चले जाओगे और तुम्हारे मरते ही कमों का यह सारा खाता बस यूँ ही लपेटकर नदी में बहा दिया जाएगा? दूसरी वास्तविकता जो इस सृष्टि व्यवस्था के अध्ययन करने से स्पष्ट दीख पड़ती है, वह यह कि यहाँ किसी चीज़ के लिए भी स्थायित्व नहीं है। हर चीज़ के लिए एक उम्र निश्चित है जिसे पहुँचने के बाद वह समाप्त हो जाती है और यही मामला कुल मिलाकर पूरी सृष्टि का भी है। यहाँ जितनी शक्तियाँ काम कर रही हैं वे सब सीमित हैं। एक समय तक ही वे काम कर रही हैं और किसी वक़्त पर अवश्य ही उन्हें ख़र्च हो जाना और इस व्यवस्था को समाप्त हो जाना है। प्राचीन काल में तो ज्ञान की कमी की वजह से उन दार्शनिकों और वैज्ञानिकों की बात तो कुछ चल भी जाती थी जो दुनिया को शाश्वत और अक्षय मानते थे, मगर आधुनिक विज्ञान ने इस वार्ता में कि क्या चीज़ शाश्वत है और क्या शाश्वत नहीं है, जो एक लम्बी मुद्दत से आस्तिकों एवं नास्तिकों के बीच चली आ रही थी, क़रीब-क़रीब निश्चित रूप से अपना वोट आस्तिकों के हक़ में डाल दिया है। अब नास्तिकों के लिए बुद्धि और विवेक का नाम लेकर यह दावा करने की कोई गुंजाइश बाक़ी नहीं रहती है कि दुनिया सदा से है और सदा रहेगी और क़ियामत भी न आएगी। प्राचीन भौतिकवाद पूरे तौर पर इस कल्पना पर निर्भर था कि पदार्थ नष्ट नहीं हो सकता, सिर्फ़ रूप बदला जा सकता है। मगर हर बदलाव के बाद पदार्थ-पदार्थ ही रहता है और उसकी मात्रा में कोई कमी-बेशी नहीं होती, इस कारण यह नतीजा निकाला जाता था कि इस भौतिक जगत् का न कोई आरंभ है, न कोई अंत। लेकिन अब एटोमिक ताक़त (Atomic Energy) की खोज ने इस पूरी कल्पना को ही उलट-पलटकर रख दिया है। अब यह बात खुल गई है कि ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित होती है और पदार्थ फिर ऊर्जा में बदल जाता है, यहाँ तक कि न रूप बाक़ी रहता है, न मूलतत्त्व । अब उष्मा गति का द्वितीय नियम (Second Law of Thermo Dynamics) ने यह सिद्ध कर दिया है कि यह भौतिक जगत न सदा से हो सकता है न सदा के लिए हो सकता है। इसको अनिवार्य रूप से एक समय शुरू और एक समय ख़त्म होना ही चाहिए। इसलिए विज्ञान के आधार पर अब क़ियामत का इनकार संभव नहीं रहा है। और स्पष्ट है कि जब विज्ञान हथियार डाल दे तो दर्शन किन टांगों पर उठकर क़ियामत का इनकार करेगा?
7. अर्थात् इस बात के इनकारी कि इन्हें मरने के बाद अपने रब के सामने हाज़िर होना है।
أَوَلَمۡ يَسِيرُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَيَنظُرُواْ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡۚ كَانُوٓاْ أَشَدَّ مِنۡهُمۡ قُوَّةٗ وَأَثَارُواْ ٱلۡأَرۡضَ وَعَمَرُوهَآ أَكۡثَرَ مِمَّا عَمَرُوهَا وَجَآءَتۡهُمۡ رُسُلُهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِۖ فَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيَظۡلِمَهُمۡ وَلَٰكِن كَانُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ ۝ 8
(9) और क्या ये लोग कभी धरती में चले-फिरे नहीं हैं कि इन्हें उन लोगों का अंजाम नज़र आता जो इनसे पहले गुज़र चुके हैं? 8 वे इनसे अधिक शक्ति रखते थे, उन्होंने ज़मीन को ख़ूब उधेड़ा था 9 और उसे इतना आबाद किया था जितना इन्होंने नहीं किया है। 10 उनके पास उनके रसूल रौशन निशानियाँ लेकर आए, 11 फिर अल्लाह उनपर जु़ल्म करनेवाला न था, मगर वे ख़ुद ही अपने ऊपर ज़ुल्म कर रहे थे। 12
8. यह आख़िरत के पक्ष में ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत किया गया है। अर्थ यह है कि आख़िरत का इनकार दुनिया में दो-चार आदमियों ही ने तो नहीं किया है। मानव-इतिहास में बहुत-से इनसान इस रोग के शिकार होते रहे हैं, बल्कि पूरी-पूरी क़ौमें ऐसी गुज़री हैं जिन्होंने या तो उसका इनकार किया है या उससे बेपरवाह होकर रही हैं, या मरने के बाद की ज़िन्दगी के बारे में ऐसे ग़लत अक़ीदे गढ़ लिए हैं जिनसे आख़िरत का अक़ीदा निरर्थक होकर रह जाता है। फिर इतिहास का निरंतर अनुभव बताता है कि आख़िरत का इनकार जिस रूप में भी किया गया है, उसका ज़रूरी नतीजा यह हुआ कि लोगों के चरित्र बिगड़ गए, वे अपने आपको अनुत्तरदाई समझकर बे-नकेल का ऊँट बन गए, उन्होंने जुल्म और बिगाड़ और धृष्टता और दुष्टता को हद कर दो और इसी चीज़ की वजह से क़ौमों पर कौमें नष्ट होती चली गईं। क्या हज़ारों साल के इतिहास का यह अनुभव, जो बराबर इनसानी नस्लों के सामने आता रहा है, यह सिद्ध नहीं करता आख़िरत एक सच्चाई है जिसका इनकार इनसान को नष्ट कर देनेवाला है? इनसान गुरुत्वाकर्षण को इसी लिए तो मान रहा है कि अनुभव और अवलोकन से उसने भौतिक चीज़ों को हमेशा धरती की ओर गिरते देखा है। इनसान ने विष को विष इसी लिए तो माना है कि जिसने भी विष खाया, वह नष्ट हुआ। इसी तरह जब आख़िरत का इनकार हमेशा इनसान के लिए नैतिक बिगाड़ की वजह बना हुआ है तो क्या यह अनुभव यह शिक्षा देने के लिए पर्याप्त नहीं है कि आख़िरत एक सच्चाई है और इसको नज़र-अंदाज़ करके दुनिया में ज़िन्दगी बसर करना ग़लत है।
9. मूल अरबी शब्द ‘असारुल अर्ज़’ प्रयुक्त हुआ है। इसका अर्थ खेती के लिए हल चलाना भी हो सकता है और ज़मीन को खोदकर ज़मीन के अन्दर से पानी, नहरें, नाले और खनिज पदार्थ निकालना भी हो सकता है।
10. इसमें उन लोगों की दलीलों का जवाब मौजूद है जो सिर्फ़ भौतिक प्रगति को किसी क़ौम के अच्छा होने की निशानी समझते हैं। वे कहते हैं कि जिन लोगों ने ज़मीन के साधनों को इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया है, जिन्होंने दुनिया में महान रचनात्मक कार्य किए हैं और एक शानदार संस्कृति को जन्म दिया है, भला यह कैसे संभव है कि अल्लाह उनको जहन्नम का ईंधन बना दे। क़ुरआन इसका जवाब देता है कि यह रचनात्मक कार्य पहले भी बहुत-सी क़ौमों ने बड़े पैमाने पर किए हैं, फिर क्या तुम्हारी आँखों ने नहीं देखा कि वे क़ौमें अपनी सभ्यता और संस्कृति सहित धरती में दफ़्न कर दी गई? और उनके निर्माण का गगनचुंबी महल धरती पर आ रहा? जिस अल्लाह के क़ानून ने यहाँ सत्य के अक़ीदे और अच्छे चरित्र के बिना सिर्फ़ भौतिक निर्माण को यह महत्त्व दिया है, आख़िर क्या कारण है कि उसी अल्लाह का क़ानून दूसरी दुनिया में इन्हें जहन्नम में न डाले?
11. अर्थात् ऐसी निशानियाँ लेकर आए जो उनके सच्चे नबी होने का विश्वास दिलाने के लिए काफ़ी थीं। इस संदर्भ में नबियों के आने के उल्लेख का अर्थ यह है कि एक ओर इनसान के अपने अस्तित्त्व में और उससे बाहर सारी सृष्टि-व्यवस्था में और मानव-इतिहास के निरंतर अनुभवों में आख़िरत की गवाहियाँ मौजूद थीं और दूसरी ओर बराबर ऐसे नबी आए जिनके साथ उनकी नुबूवत के सत्य पर होने की खुली-खुली निशानियाँ पाई जाती थीं और उन्होंने इनसानों को सचेत किया कि वास्तव में आख़िरत आनेवाली है।
12. अर्थात् इसके बाद जो तबाही उन क़ौमों पर आई, वह उनपर अल्लाह का ज़ुल्म न था, बल्कि वह उनका अपना ज़ुल्म था जो उन्होंने अपने ऊपर किया। जो व्यक्ति या गिरोह न ख़ुद सही सोचे और न किसी समझानेवाले के समझाने से सही रवैया अपनाए, उसपर आगर तबाही आती है तो वह स्वयं ही अपने बुरे अंजाम का ज़िम्मेदार है। अल्लाह पर उसका आरोप नहीं लगाया जा सकता। अल्लाह ने तो अपनी किताबों और अपने नबियों के ज़रिये से इनसान को वास्तविकता की जानकारी देने का प्रबन्ध भी किया है और वे ज्ञानात्मक और बौद्धिक साधन भी प्रदान किए हैं जिनसे काम लेकर वह हर समय नबियों और आसमानी किताबों के दिए हुए ज्ञान के सही होने को जाँच सकता है । इस मार्गदर्शन और इन साधनों से अगर अल्लाह ने इनसान को महरूम रखा होता और इस हालत में इनसान को ग़लत रवैया अपनाने के नतीजों से दोचार होना पड़ता, तब बेशक अल्लाह पर जुल्म के आरोप की गुंजाइश निकल सकती थी।
ثُمَّ كَانَ عَٰقِبَةَ ٱلَّذِينَ أَسَٰٓـُٔواْ ٱلسُّوٓأَىٰٓ أَن كَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ وَكَانُواْ بِهَا يَسۡتَهۡزِءُونَ ۝ 9
(10) अन्तत: जिन लोगों ने बुराइयाँ की थीं उनका अंजाम बहुत बुरा हुआ, इसलिए कि उन्होंने अल्लाह की आयतों को झुठलाया था और वे उनका उपहास करते थे।
ٱللَّهُ يَبۡدَؤُاْ ٱلۡخَلۡقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥ ثُمَّ إِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ ۝ 10
(11) अल्लाह ही सृष्टि का आरंभ करता है, फिर वही उसे दोहराएगा13 फिर उसी की ओर तुम पलटाए जाओगे।
13. यह बात यद्यपि दावे के रूप में बयान की गई है, मगर इसमें खु़द दावे की दलील भी मौजूद है। बुद्धि स्पष्टतः इस बात की गवाही देती है कि जिसके लिए संरचना का आरंभ करना संभव हो उसके लिए उसी संरचना की पुनरावृत्ति करना कहीं अधिक संभव है। संरचना तो एक वास्तविकता है जो सबके सामने मौजूद है और विधर्मी व मुशरिक भी मानते हैं कि यह अल्लाह ही का काम है। इसके बाद उनका यह सोचना नितांत अनुचित बात है कि वही अल्लाह जिसने इस संरचना की शुरुआत की है, उसकी पुनरावृत्ति नहीं कर सकता।
وَيَوۡمَ تَقُومُ ٱلسَّاعَةُ يُبۡلِسُ ٱلۡمُجۡرِمُونَ ۝ 11
(12) और जब वह घड़ी14 आएगी, उस दिन अपराधी हक्का-बक्का रह जाएँगे।15
14. अर्थात् अल्लाह को ओर पलटने और उसके सामने पेश होने की घड़ी।
15. मूल में अरबी शब्द ‘इब्लास’ प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ है घोर निराशा और सदमे के कारण किसी आदमी का गुम-सुम हो जाना, आशा के सारे रास्ते बन्द पाकर हैरान व परेशान रह जाना, कोई युक्ति न पाकर स्तब्ध रह जाना—यह शब्द जब अपराधी के लिए इस्तेमाल किया जाए तो ज़ेहन के सामने उसका यह चित्र उभरता है कि एक आदमी ठीक अपराध की हालत में रंगे हाथों (Red handed) पकड़ा गया है, न भागने की कोई राह पाता है, न अपनी सफ़ाई में कोई चीज़ पेश करके बच निकलने की कोई आशा रखता है, इसलिए ज़बान उसकी बन्द है और वह बड़ी निराशा और टूटे दिल के साथ हैरान व परेशान खड़ा है। इस जगह यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि यहाँ अपराधियों से तात्पर्य सिर्फ़ वही लोग नहीं हैं जिन्होंने दुनिया में क़त्ल, चोरी, डाका और इसी तरह के दूसरे अपराध किए हैं, बल्कि उन सब लोगों से तात्पर्य है जिन्होंने अल्लाह से विद्रोह किया है, उसके रसूलों की शिक्षा और मार्गदर्शन को स्वीकार करने से इनकार किया है, आख़िरत की जवाबदेही से इनकार किया है या उससे निश्चिन्त रहे हैं और दुनिया में अल्लाह के बजाय दूसरों की या अपने मन की बन्दगी करते रहे हैं, चाहे इस बुनियादी गुमराही के साथ उन्होंने वे काम किए हों या न किए हों जिन्हें सामान्य रूप से अपराध कहा जाता है। साथ ही इसमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने अल्लाह को मानकर, उसके रसूलों पर ईमान लाकर, आख़िरत का इकरार करके, फिर जानबूझ कर अपने रब को नाफ़रमानियाँ की हैं और अन्तिम समय तक अपने इस द्रोहपूर्ण रवैये पर डटे रहे हैं। ये लोग जब अपनी आशाओं के बिल्कुल विपरीत आख़िरत की दुनिया में यकायक जी उठेंगे और देखेंगे कि यहाँ तो सच में वह दूसरा जीवन सामने आ गया है जिसका इनकार करके या जिसे नज़र अंदाज़ करके वे दुनिया में काम करते रहे थे, तो उनके होश उड़ जाएंगे और वह दशा उनपर छा जाएगी जिसका चित्र ‘युब्लिसुल मुजरिमून’ के शब्दों में खींचा गया है।
وَلَمۡ يَكُن لَّهُم مِّن شُرَكَآئِهِمۡ شُفَعَٰٓؤُاْ وَكَانُواْ بِشُرَكَآئِهِمۡ كَٰفِرِينَ ۝ 12
(13) उनके ठहराए हुए शरीकों में से कोई उनका सिफ़ारिशी न होगा 16 और वे अपने शरीकों के इनकारी हो जाएँगे। 17
16. शरीक तीन प्रकार की हस्तियाँ हो सकती हैं। एक फ़रिश्ते, नबी, वली और शहीद व भले लोग जिनको विभिन्न समयों में मुशरिकों ने अल्लाह के गुणों और अधिकारोंवाला समझकर उनकी उपासना की है। वे क़ियामत के दिन साफ़ कह देंगे कि तुम यह सब कुछ हमारी मर्ज़ी के बिना, बल्कि हमारी शिक्षा और निर्देश के बिल्कुल विपरीत करते रहे हो, इसलिए हमारा तुमसे कोई वास्ता नहीं। हमसे कोई आशा न रखो कि हम तुम्हारी सिफ़ारिश के लिए ख़ुदा-ए-बुजु़र्ग के सामने कुछ विनती करेंगे। दूसरा प्रकार उन चीज़ों का है जो या निर्जीव चेतनाहीन हैं, जैसे चाँद, सूरज, तारे, पेड़, पत्थर और हैवान आदि। मुशरिकों ने उनको खु़दा बनाया और उनकी पूजा की और उनसे दुआएं मांगी, मगर वे बेचारे बेख़बर है कि अल्लाह के खलीफ़ा साहब ये सारी मन्नतें और चढ़ावे उनके लिए कर रहे हैं। स्पष्ट है इनमें से भी कोई वहाँ उनकी सिफ़ारिश के लिए आगे बढ़नेवाला न होगा। तीसरा प्रकार उन बड़े अपराधियों का है जिन्होंने स्वयं कोशिश करके, धोखाधड़ी से काम लेकर, झूठ के जाल फैलाकर या ताक़त इस्तेमाल करके दुनिया में अल्लाह के बन्दों से अपनी बन्दगी कराई, जैसे शैतान, झूठे धार्मिक गुरु और ज़ालिम व जाबिर शासक आदि। ये वहाँ स्वयं कष्ट में गिरफ़्तार होंगे। अपने इन बन्दों की सिफ़ारिश के लिए आगे बढ़ना तो दूर की बात, उनकी उल्टी कोशिश यह होगी कि अपने कर्म-पत्र का बोझ हलका करें और प्रभु के समक्ष यह सिद्ध कर दें कि ये लोग अपने अपराधों के ख़ुद ज़िम्मेदार हैं। उनकी गुमराही का बोझ हम पर नहीं पड़ना चाहिए, इस तरह मुशरिकों के लिए वहाँ किसी ओर से भी कोई सिफ़रिश नहीं होगी।
17. अर्थात् उस वक़्त ये मुशरिक ख़ुद इस बात का इक़रार करेंगे कि हम उनको अल्लाह का शरीक ठहराने में ग़लती पर थे। उनपर यह वास्तविकता खुल जाएगी कि सच में उनमें से किसी का भी खु़दाई (ईश्वरत्त्व) में कोई हिस्सा नहीं है, इसलिए जिस शिर्क पर आज वे दुनिया में आग्रह कर रहे हैं, उसी का वे आख़िरत में इनकार करेंगे।
وَيَوۡمَ تَقُومُ ٱلسَّاعَةُ يَوۡمَئِذٖ يَتَفَرَّقُونَ ۝ 13
(14) जिस दिन वह घड़ी आएगी उस दिन (सब इनसान) अलग गिरोहों में बँट जाएँगे।18
18. अर्थात् दुनिया की वे तमाम जत्थेबन्दियाँ जो आज क़ौम, नस्ल, राष्ट्र, भाषा, क़बीला व बिरादरी और आर्थिक और राजनीतिक हितों की बुनियाद पर बनी हुई हैं, उस दिन टूट जाएँगी और ख़ालिस अक़ीदे और चरित्र व नैतिकता के आधार पर नए सिरे से एक दूसरी गिरोहबन्दी होगी। एक ओर मानव-जाति के सारे अगले-पिछले ईमानवालों का एक गिरोह होगा। दूसरी ओर एक-एक क़िस्म के पथभ्रष्टतापूर्ण विचार और धारणाएँ रखनेवालों और एक-एक क़िस्म के अपराधी लोगों के अलग-अलग गिरोह बन जाएँगे। दूसरे शब्दों में यूं समझना चाहिए कि इस्लाम जिस चीज़ को इस दुनिया में अलगाव और जोड़ने का वास्तविक आधार क़रार देता है और जिसे अज्ञानता के पुजारी यहाँ मानने से इनकार करते हैं, आख़िरत में इसी आधार पर अलगाव होगा और जुड़ना भी । इस्लाम कहता है कि इनसानों को काटने और जोड़नेवाली असल चीज़ अक़ीदा और चरित्र है। ईमान लानेवाले और अल्लाह की हिदायत पर जीवन-व्यवस्था की नींव रखनेवाले एक उम्मत (समुदाय) हैं, चाहे वे दुनिया के किसी हिस्से से ताल्लुक़ रखते हों। और कुफ़्र और बुराई की राह अपनानेवाले एक दूसरी उम्मत हैं, चाहे उनका ताल्लुक किसी नस्ल व देश से हो।
فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ فَهُمۡ فِي رَوۡضَةٖ يُحۡبَرُونَ ۝ 14
(15-16) जो लोग ईमान लाए हैं और जिन्होंने भले कर्म किए हैं, वे एक बाग़19 में आनन्द और उत्साह के साथ रखे जाएँगे। 20 और जिन्होंने इनकार किया है और हमारी आयतों को और आख़िरत की मुलाक़ात को भुलाया है21 अज़ाब में हाज़िर रखे जाएंगे।
19. ‘एक बाग़’ का शब्द यहाँ उस बाग़ की महत्ता और महानता बताने के लिए इस्तेमाल हुआ है। अरबी भाषा की तरह हिन्दी, उर्दू में भी यह वर्णनशैली इस उद्देश्य के लिए प्रसिद्ध है। जैसे कोई आदमी किसी को एक बड़ा अहम काम करने को कहे और उसके साथ यह कहे कि तुमने अगर यह काम कर दिया तो मैं तुम्हें ‘एक चीज़’ दूंगा तो इससे तात्पर्य यह नहीं होता कि वह चीज़ संख्या की दृष्टि से एक होगी, बल्कि इससे अभिप्रेत यह होता है कि उसके इनाम में तुमको एक बड़ी क़ीमती चीज़ दूंगा जिसे पाकर तुम मालामाल हो जाओगे।
20. मूल में अरबी शब्द 'युह-बरून' प्रयुक्त हुआ है जिसके अर्थ में खुशी, आनन्द, शान व शौकत और मान-सम्मान आदि शामिल है।
21. यह बात ध्यान देने को है कि ईमान के साथ तो भले कर्म का उल्लेख किया गया है, लेकिन कुछ के बुरे अंजाम का बयान करते हुए बुरे कर्म का कोई उल्लेख नहीं किया गया। इससे स्‍पष्‍ट होता है कि कुफ़्र स्वतः आदमी के अंजाम को ख़राब कर देने के लिए काफ़ी है, चाहे कर्म की ख़राबी उसके साथ शामिल हो या न हो।
وَأَمَّا ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَكَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِنَا وَلِقَآيِٕ ٱلۡأٓخِرَةِ فَأُوْلَٰٓئِكَ فِي ٱلۡعَذَابِ مُحۡضَرُونَ ۝ 15
0
فَسُبۡحَٰنَ ٱللَّهِ حِينَ تُمۡسُونَ وَحِينَ تُصۡبِحُونَ ۝ 16
(17) अत:22 तस्बीह (गुणगान) करो अल्लाह की23, जबकि तुम शाम करते हो और जब सुबह करते हो।
22. यह अतः इस अर्थ में है कि जब तुम्हें यह मालूम हो गया कि ईमान और भले कर्म का अंजाम वह कुछ और इनकार करने का अंजाम यह कुछ है जो तुम्हें यह तरीक़ा अपनाना चाहिए। साथ ही यह ‘अतः इस अर्थ में भी है कि कुछ और शिर्क करनेवाले आख़िरत की ज़िन्दगी को असंभव क़रार देकर अल्लाह को वास्तव में मजबूर और बेबस क़रार दे रहे हैं। इसलिए तुम इसके मुक़ाबले में अल्लाह का गुणगान करो और उसके पाक होने का एलान करो।
23. अल्लाह की ‘तस्बीह’ करने से तात्पर्य उन तमाम ऐबों, ख़राबियों और कमज़ोरियों से, जो मुशरिक अपने शिर्क और आख़िरत के इनकार से अल्लाह से जोड़ देते हैं, उस ला-शरीक हस्ती के पाक और पवित्र होने का एलान और इज़हार करना है। इस एलान और इज़हार की बेहतरीन शक्ल नमाज़ है। इसी आधार पर बहुत से टीकाकार कहते है कि यहाँ तस्बीह (गुणगान) करने से तात्पर्य नमाज़ पड़ना है। इसके समर्थन में यह स्पष्ट संकेत स्वयं इस आयत में मौजूद है कि अल्लाह की पाकी बयान करने के लिए इसमें कुछ विशेष समय निर्धारित किए गए हैं। वक़्तों का यह निर्धारण तस्बीह के एक विशेष व्यावहारिक रूप ही की ओर इशारा करता है और यह व्यावहारिक रूप नमाज़ के सिवा और कोई नहीं है।
وَلَهُ ٱلۡحَمۡدُ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَعَشِيّٗا وَحِينَ تُظۡهِرُونَ ۝ 17
(18) आसमानों और जमीन में उसी के लिए हम्द (पशंसा है और (तस्बोह करो उसको) तीसरे पहर और जबकि तुमपर जुहर का वक़्त आता है।24
24. इस आयत में नमाज़ के चार बक्तों की ओर साफ संकेत है- फज, मगरिब, अस और जुह्र। इसके साथ सूरा-11 हूद, आयत 14, सूरा-17 बनी इसराईल, आयत 78 और सूरा-30 ताल हाल, आयत 10 को पढ़ा जाए तो नमाज के पांचों बक्तों का आदेश निकल आता है। लेकिन स्पष्ट है कि सिर्फ इन आयतों को पढ़कर कोई आदमी भी नमाज़ के वक्तो को तय नहीं कर सकता था जब तक कि अल्लाह के नियुक्त किए हुए क़ुरआन के शिक्षक हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) स्वयं अपने कथन और कार्य से उनको ओर रहनुमाई न फ़रमाते।
يُخۡرِجُ ٱلۡحَيَّ مِنَ ٱلۡمَيِّتِ وَيُخۡرِجُ ٱلۡمَيِّتَ مِنَ ٱلۡحَيِّ وَيُحۡيِ ٱلۡأَرۡضَ بَعۡدَ مَوۡتِهَاۚ وَكَذَٰلِكَ تُخۡرَجُونَ ۝ 18
(19) वह ज़िन्दा को मुर्दे में से निकालता और मुर्दे को ज़िन्दा में से निकाल लाता है और ज़मीन को उसकी मौत के बाद जीवन प्रदान करता है।25 इसी तरह तुम लोग भी (मौत की हालत से) निकाल लिए जाओगे।
25. अर्थात् अल्लाह हर वक़्त ज़िन्दा इनसानों और जीवों में से अवशेष वस्तुएँ (Waste Matter) निकाल रहा है जिनके भीतर लेशमात्र भी जीवन नहीं होता। वह हर क्षण बेजान पदार्थ (Dead Matter) के अंदर ज़िन्दगी की रूह फूंककर अनगिनत जीते-जागते जानवरों, पेड़-पौधों और इनसानों को अस्तित्त्व में ला रहा है। वह हर वक़्त यह मंज़र (दृश्य) तुम्हें दिखा रहा है कि बंजर पड़ी हुई ज़मीन को जब पानी मिला और यकायक वह जैविक और वानस्पतिक जीवन के ख़ज़ाने उगलना शुरू कर देती है। यह सब कुछ देखकर भी अगर कोई आदमी यह समझता है कि जीवन के इस कारख़ाने को चलानेवाला रब इनसान के मर जाने के बाद उसे दोबारा ज़िन्दा करने से असमर्थ है तो वास्तव में वह बुद्धि का अंधा है।
وَمِنۡ ءَايَٰتِهِۦٓ أَنۡ خَلَقَكُم مِّن تُرَابٖ ثُمَّ إِذَآ أَنتُم بَشَرٞ تَنتَشِرُونَ ۝ 19
(20) उसकी 26 निशानियों में से यह है कि उसने तुमको मिट्टी से पैदा किया, फिर यकायक तुम मानव हो कि (ज़मीन में) फैलते चले जा रहे हो।27
26. यहाँ से आयत 27 तक अल्लाह की जो निशानियाँ बयान की जा रही हैं, वे एक ओर तो ऊपर के वार्ताक्रम की अनुकूलता से आख़िरत की ज़िन्दगी की संभावना और उसके होने को साबित करती हैं और दूसरी ओर यही निशानियाँ इस बात को भी सिद्ध करती हैं कि यह सृष्टि न बग़ैर ईश्वर के है, न इसके बहुत-से ईश्वर हैं। इस तरह ये आयत अपने विषय को दृष्टि से पिछली वार्ता और आगे की वार्ता दोनों के साथ जुड़ी हुई है।
27. अर्थात् इनसान का संरचना-तत्त्व इसके सिवा क्या है कि कुछ बेजान तत्व हैं जो धरती में पाए जाते हैं । जैसे कुछ कार्बन, कुछ कैल्शियम, कुछ सोडियम और ऐसे ही कुछ और तत्त्व - इन्हीं को मिलाकर वह अद्भुत हस्ती बना खड़ी की गई है जिसका नाम इनसान है और उसके अंदर अनुभूतियाँ, भावनाएँ, कामनाएँ, चेतना, बुद्धि और विवेक की विचित्र क्षमताएँ पैदा कर दी गई हैं जिनमें से किसी का स्रोत भी उसके मिश्रण में खोजा नहीं जा सकता। फिर उसके भीतर वह विचित्र प्रजनन-शक्ति भी पैदा कर दी गई जिसकी बदौलत करोड़ों और अरबों इनसान वही बनावट और वही क्षमताएँ लिए हुए अनगिनत विरासती और बेहद व हिसाब व्यक्तिगत विशेषताएँ रखनेवाले निकलते चले आ रहे हैं। क्या तुम्हारी बुद्धि यह गवाही देती है कि यह अत्यन्त तत्वदर्शितापूर्ण संरचना किसी तत्त्वदर्शी रचयिता की रचना के बिना आपसे आप हो गई है? या यह कि इनसान के पैदा करने की यह महान योजना बहुत-से खु़दाओं के सोच-विचार और उपार्यों का नतीजा हो सकता है? या यह कि जो अल्लाह इनसान को पूरी तरह अनस्तित्त्व (नास्ति) से अस्तित्त्व में लाया है वह उसी इनसान को मौत देने के बाद दोबारा ज़िन्दा नहीं कर सकता?
وَمِنۡ ءَايَٰتِهِۦٓ أَنۡ خَلَقَ لَكُم مِّنۡ أَنفُسِكُمۡ أَزۡوَٰجٗا لِّتَسۡكُنُوٓاْ إِلَيۡهَا وَجَعَلَ بَيۡنَكُم مَّوَدَّةٗ وَرَحۡمَةًۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يَتَفَكَّرُونَ ۝ 20
(21) और उसकी निशानियों में से यह है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही सहजाति से बीवियाँ बनाई28, ताकि तुम उनके पास सुकून हासिल करो 29 और तुम्हारे बीच मुहब्बत और रहमत पैदा कर दी। 30 निश्चय ही इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो सोच-विचार करते है।
28. अर्थात् पैदा करनेवाले की तत्त्वदर्शिता की क्षमता यह है कि उसने इनसान की सिर्फ़ एक जाति का रूप नहीं बनाया, बल्कि उसे दो जातियों (Sexes) की शक्ल में पैदा किया जो मानवता में बराबर हैं। जिनकी बनावट का बुनियादी फ़ार्मूला भी समान है, मगर दोनों एक दूसरे से भिन्न शारीरिक बनावट, भिन्न मानसिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताएं और भिन्न भावनाएँ और इच्छाएँ लेकर पैदा होती हैं और फिर उनमें यह आश्चर्यजनक अनुकूलता रख दी गई है कि उनमें से हर एक दूसरे का पूरक है, हर एक को देह और उसका मनोविज्ञान और इच्छाएँ दूसरे की दैहिक व मनोवैज्ञानिक तक़ाज़ों का पूर्ण जवाब है। इसके अलावा वह तत्त्वदर्शी स्रष्टा इन दोनों जातियों के लोगों को शुरू ही से एक विशेष प्रकार के अनुपात के साथ पैदा किए चला जा रहा है। यह चीज़ खुलकर इस बात की दलील बन रही है कि एक तत्त्वदर्शी पैदा करनेवाले, बल्कि एक ही पैदा करनेवाले तत्वदर्शी ने अपनी प्रभुत्त्वशाली सामर्थ्य से [इन सारे मामलों का प्रबन्ध कर रखा है।]
29. अर्थात् यह प्रबन्ध अललटप नहीं हो गया है, बल्कि बनानेवाले ने पूरे इरादे के साथ इस उद्देश्य के लिए यह प्रबन्ध किया है कि मर्द अपनी प्रकृति के तकाज़े औरत के पास और औरत अपनी प्रकृति की माँग मर्द के पास पाए और दोनों एक-दूसरे से जुड़कर ही सुख-शान्ति प्राप्त करें। यही वह तत्वदर्शितापूर्ण प्रबन्ध है जिसे पैदा करनेवाले ने एक ओर इनसानी नस्ल को बाक़ी रखने का और दूसरी ओर इनसानी संस्कृति व सभ्यता को अस्तित्त्व में लाने का साधन बनाया है। अगर |इन दोनों जातियों में वह बेचैनी न रख दी जाती जो उनके आपसी मिलन के बिना सुकून नहीं दे सकती तो किसी सभ्यता व संस्कृति के अस्तित्त्व में आने की कोई संभावना न थी। यही शान्ति की चाहत है जिसने उन्हें मिलकर घर बनाने पर मजबूर किया, इसी कारण परिवार और क़बीले अस्तित्व में आए और इसी के कारण इनसान की ज़िन्दगी में सभ्यता विकसित हुई। कौन बुद्धिवाला व्यक्ति यह सोच सकता है कि बुद्धिमत्ता की यह महान कृति प्रकृति की अंधी ताक़तों से संयोगवश अस्तित्त्व में आ गया है ? या बहुत-से ख़ुदा यह प्रबंध कर सकते थे। यह तो एक तत्त्वदर्शी और एक ही तत्त्वदर्शी की तत्त्वदर्शिता का खुला निशान है।
30. मुहब्बत से तात्पर्य यहाँ यौन-प्रेम (Sexual Love) है जो मर्द और औरत के अंदर अंतरंगता और आकर्षण का आरंभिक कारण बनता है और फिर उन्हें एक-दूसरे से चिपकाए रहता है, और रहमत से तात्पर्य वह आध्यात्मिक सम्बन्ध है जो दाम्पत्य जीवन में धीरे-धीरे उभरता है, जिसकी वजह से वे एक-दूसरे का भला चाहनेवाले, हितैषी और सहायक और दुख-सुख में शरीक बन जाते हैं। ये दो रचनात्मक शक्तियाँ हैं जो पैदा करनेवाले ने उस शुरुआती बेचैनी की मदद के लिए इनसान के भीतर पैदा की हैं जिनका उल्लेख ऊपर हुआ है। वह बेचैनी तो सिर्फ़ शान्ति चाहती है और उसकी खोज में मर्द और औरत को एक-दूसरे की ओर ले जाती है। इसके बाद ये दो ताक़तें आगे बढ़कर उनके बीच स्थायी मैत्री का असाधारण रिश्ता जोड़ देती है। इस [मुहब्‍बत और रहमत के अस्तित्त्व] का कोई कारण इसके सिवा नहीं बताया जा सकता कि एक तत्त्वदर्शी ने इरादे के साथ एक उद्देश्य के लिए उसे पूरी अनुकूलता के साथ उसे इनसान के भीतर समाहित कर दिया है।
وَمِنۡ ءَايَٰتِهِۦ خَلۡقُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَٱخۡتِلَٰفُ أَلۡسِنَتِكُمۡ وَأَلۡوَٰنِكُمۡۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّلۡعَٰلِمِينَ ۝ 21
(22) और उसकी निशानियों में से आसमानों और ज़मीन की पैदाइश 31 और तुम्हारी भाषाओं और तुम्हारे रंगों की भिन्नता है।32 निश्चय ही इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं बुद्धि से काम लेनेवालों के लिए।
31. अर्थात् उनका शून्य से अस्तित्व में आना और अटल विधान पर उनका स्थिर रहना और अनगिनत शक्तियों का उनके भीतर पूरे सन्तुलन और अनुपात के साथ काम करना अपने अन्दर इस बात की बहुत-सी निशानियाँ रखता है कि इस पूरी सृष्टि को एक पैदा करने वाला और एक ही पैदा करनेवाला अस्तित्व में लाया है और वही इस महान व्यवस्था का प्रबन्ध कर रहा है।
32. अर्थात् इसके बावजूद कि तुम्हारी ज्ञानेंद्रियाँ समान है, न मुंह और ज़ुबान की बनावट में कोई अन्तर है और न दिमाग की बनावट में, मगर ज़मीन के विभिन्न क्षेत्रों में तुम्हारी भाषाएँ भिन्न-भिन्न है, फिर एक ही बोली-बोलने वाले क्षेत्रों में शहर-शहर और बस्ती बस्ती की बोलियाँ अलग-अलग हैं, और यह भी कि हर व्यक्ति का स्वर, उच्चारण और बात करने की शैली एक-दूसरे से भिन्न है। इसी तरह तुम्हारा प्रजनन तत्त्व और तुम्हारी बनावट का फ़ार्मूला एक ही है, मगर तुम्हारे रंग इतने अलग-अलग हैं कि क़ौम और क़ौम तो दूर की बात, एक मां-बाप के दो बेटों का रंग भी बिल्कुल एक जैसा नहीं है। यहाँ नमूने के तौर पर सिर्फ़ दो ही चीज़ों की ओर तवज्जोह दिलाई गई है, वरना यही हाल दुनिया की हर चीज़ का है। यह चीज़ साफ़ बता रही है कि यह दुनिया कोई ऐसा कारख़ाना नहीं है जिसमें स्वचालित (ऑटोमेटिक) मशीनें चल रही हों और अधिक से अधिक पैदावार (Mass Production) के तरीक़े पर हर प्रकार की चीज़ों का बस एक-एक ठप्पा हो, जिससे ढल-दलकर एक ही तरह की चीज़ें निकलती चली आ रही हों, बल्कि यहाँ एक ऐसा महान कारीगर काम कर रहा है जो हर-हर चीज़ को पूरी व्यक्तिगत तवज्जोह के साथ एक नये डिज़ाइन, नये बेल-बूटे, नई अनुकूलता और नये गुणों के साथ बनाता है और उसकी बनाई हुई हर चीज़ अपनी जगह अछूती है। [यह आश्चर्यजनक स्थिति] इस बात का खुला प्रमाण है कि [इस सृष्टि का बनानेवाला] हर वक़्त पैदा करने के काम में लगा हुआ है और अपनी रचना की एक-एक चीज़ पर निजी ध्यान दे रहा है।
وَمِنۡ ءَايَٰتِهِۦ مَنَامُكُم بِٱلَّيۡلِ وَٱلنَّهَارِ وَٱبۡتِغَآؤُكُم مِّن فَضۡلِهِۦٓۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يَسۡمَعُونَ ۝ 22
(23) और उसकी निशानियों में से तुम्हारा रात और दिन को सोना और तुम्हारा उसके अनुग्रह (आजीविका) को खोजना है।33 निश्चय ही इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो (ध्यान से) सुनते हैं।
33. अनुग्रह को खोजने से तात्पर्य रोज़ी की खोज में दौड़-धूप करना है। यह चीज़ भी उन निशानियों में से है जो एक तत्त्वदर्शी स्रष्टा के प्रबन्ध का पता देती है। इनसान दुनिया में लगातार मेहनत नहीं कर सकता, बल्कि हर कुछ घंटों की मेहनत के बाद उसे कुछ घंटों के लिए आराम चाहिए होता है। इस उद्देश्य के लिए तत्त्वदर्शी दयावान सष्टा ने इनसान के भीतर सिर्फ़ थकन का एहसास और सिर्फ़ आराम की इच्छा पैदा कर देने ही को काफ़ी नहीं समझा, बल्कि उसने ‘नींद’ की एक ज़बरदस्त इच्छा उसके अस्तित्त्व में रख दी जो उसके इरादे के बिना, यहाँ तक कि उसको रुकावटों के बावजूद ख़ुद-बख़ुद हर कुछ घंटों की बेदारी और मेहनत के बाद उसे आ दबोचती है और कुछ घंटे आराम लेने पर उसे मजबूर कर देती है। इस नींद की वास्तविक स्थिति और इसके वास्तविक कारणों को आज तक इनसान नहीं समझ सका है। यह क़तई तौर पर एक पैदाइशो चीज़ है। इसका ठीक इनसानी ज़रूरत के मुताबिक़ होना ही इस बात की गवाही देने के लिए काफ़ी है कि यह एक संयोग से होनेवाली घटना नहीं है, बल्कि किसी तत्त्वदर्शी ने एक सोची-समझी योजना के अनुसार यह प्रबन्ध किया है। इस में एक बड़ी हिक्मत और मस्लहत और मक़सद साफ़ तौर पर काम करता नज़र आता है। फिर रोज़ी की खोज के लिए “अल्लाह की मेहरबानी की खोज” का शब्द प्रयोग करके निशानियों के एक दूसरे क्रम की ओर संकेत किया गया है। आदमी के भीतर रोज़ी खोजने की योग्यता और उसके अस्तित्त्व से बाहर रोज़ी के साधनों की मौजूदगी, साफ़-साफ़ एक दयावान और कृपाशील पालनहार के अस्तित्त्व का पता देती है।
وَمِنۡ ءَايَٰتِهِۦ يُرِيكُمُ ٱلۡبَرۡقَ خَوۡفٗا وَطَمَعٗا وَيُنَزِّلُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَيُحۡيِۦ بِهِ ٱلۡأَرۡضَ بَعۡدَ مَوۡتِهَآۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يَعۡقِلُونَ ۝ 23
(24) और उसकी निशानियों में से यह है कि वह तुम्हें बिजली की चमक दिखाता है, भय के साथ भी और लोभ के साथ भी 34 और आसमान से पानी बरसाता है, फिर उसके ज़रिये से ज़मीन को उसकी मौत के बाद ज़िन्दगी देता है।35 निश्चय ही इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो बुद्धि से काम लेते हैं।
34. अर्थात् उसकी गरज और चमक से आशा भी बंधती है कि वर्षा होगी और फ़सलें तैयार होंगी, मगर साथ ही डर-भय भी लगता है कि कहीं बिजली न गिर पड़े या ऐसी तूफ़ानी वर्षा न हो जाए जो सब कुछ बहा ले जाए।
35. यह चीज़ एक ओर मरने के बाद की ज़िन्दगी का पता देती है और दूसरी ओर यही चीज़ इस बात की भी दलील बनती है कि अल्लाह है, और ज़मीन व आसमान का प्रबन्ध करनेवाला एक ही अल्लाह है। ज़मीन के अनगिनत जीवों की रोज़ी उस पैदावार पर आश्रित है जो ज़मीन से निकलती है। इस पैदावार का आश्रय ज़मीन की उर्वरा क्षमता पर है। इस क्षमता के फलने-फूलने का आश्रय वर्षा पर है। यह वर्षा सूर्य की गर्मी पर मौसमों के परिवर्तन पर, आसमानी ताप, गर्मी-सर्दी पर, हवाओं के चलने पर निर्भर है। ज़मीन से लेकर आसमान तक की इन तमाम भिन्न-भिन्न चीज़ों के बीच यह ताल्लुक़ और संबंध कायम होना, फिर इन सबका अनगिनत और नाना प्रकार के उद्देश्यों और ज़रूरतों के लिए बिल्कुल उपयुक्त होना, क्या यह सब कुछ मात्र संयोग से हो सकता है ? क्या यह किसी कारीगर की सूझ-बूझ और उसको सोची-समझो योजना और उसकी प्रभावी तदबीर के बिना हो गया है? और क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि ज़मीन, सूरज, हवा, पानी, गर्मी, ठंडक और ज़मीन के प्राणियों का स्रष्टा और रब एक ही है।
وَمِنۡ ءَايَٰتِهِۦٓ أَن تَقُومَ ٱلسَّمَآءُ وَٱلۡأَرۡضُ بِأَمۡرِهِۦۚ ثُمَّ إِذَا دَعَاكُمۡ دَعۡوَةٗ مِّنَ ٱلۡأَرۡضِ إِذَآ أَنتُمۡ تَخۡرُجُونَ ۝ 24
(25) और उसकी निशानियों में से यह है कि आसमान और ज़मीन उसके हुक्म से क़ायम हैं 36, फिर ज्यों ही कि उसने तुम्हें ज़मीन से पुकारा, बस एक ही पुकार में अचानक तुम निकल आओगे।37
36. अर्थात् केवल यही नहीं कि वे उसके हुक्म से एक बार अस्तित्व में आ गए हैं, बल्कि उनका लगातार क़ायम रहना और उनके अन्दर जीवन के इस महान कारख़ाने का बराबर चलते रहना भी उसी के हुक्म को बदौलत है। एक क्षण के लिए भी अगर उसका हुक्म उन्हें बाक़ी न रखे तो यह सारी व्यवस्था एक क्षण में छिन्न-भिन्न हो जाए।
37. अर्थात् सृष्टि के पैदा करनेवाले और उसका प्रबन्ध करनेवाले के लिए तुम्हें दोबारा ज़िन्दा करके उठाना कोई बड़ा काम नहीं। उसकी सिर्फ़ एक पुकार उसके लिए बिल्कुल काफ़ी होगी कि शुरू दिन से आज तक जितने इनसान दुनिया में पैदा हुए हैं और आगे पैदा होंगे, वे सब एक साथ ज़मीन के हर कोने से निकल खड़े हों।
وَلَهُۥ مَن فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ كُلّٞ لَّهُۥ قَٰنِتُونَ ۝ 25
(26) आसमानों और ज़मीन में जो भी हैं, उसके बन्दे हैं। सब के सब उसी के आदेश के अधीन हैं।
وَهُوَ ٱلَّذِي يَبۡدَؤُاْ ٱلۡخَلۡقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥ وَهُوَ أَهۡوَنُ عَلَيۡهِۚ وَلَهُ ٱلۡمَثَلُ ٱلۡأَعۡلَىٰ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ وَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡحَكِيمُ ۝ 26
(27) वही है जो पैदा करने का आरंभ करता है, फिर वही उसे दोहराएगा और यह उसके लिए ज़्यादा आसान है। 38 आसमानों और ज़मीन में उसी का गुण सबसे श्रेष्ठ है और वह ज़बरदस्त और तत्त्वदर्शी है।
38. अर्थात् पहली बार पैदा करना अगर उसके लिए कठिन न था, तो आख़िर तुमने यह कैसे समझ लिया कि दोबारा पैदा करना उसके लिए कठिन हो जाएगा? एक बार जिसने किसी चीज़ को बनाया हो उसके लिए वहीं चीज़ दोबारा बनाना पहले के मुक़ाबले में ज़्यादा ही आसान होनी चाहिए।
ضَرَبَ لَكُم مَّثَلٗا مِّنۡ أَنفُسِكُمۡۖ هَل لَّكُم مِّن مَّا مَلَكَتۡ أَيۡمَٰنُكُم مِّن شُرَكَآءَ فِي مَا رَزَقۡنَٰكُمۡ فَأَنتُمۡ فِيهِ سَوَآءٞ تَخَافُونَهُمۡ كَخِيفَتِكُمۡ أَنفُسَكُمۡۚ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ ٱلۡأٓيَٰتِ لِقَوۡمٖ يَعۡقِلُونَ ۝ 27
(28) वह तुम्हें 39 ख़ुद तुम्हारी अपनी ही हस्ती से एक मिसाल देता है। क्या तुम्हारे उन गु़लामों में से, जो तुम्हारी मिल्कियत में हैं, कुछ गु़लाम ऐसे भी हैं जो हमारे दिए हुए माल व दौलत में तुम्हारे साथ बराबर के शरीक हों और तुम उनसे उस तरह डरते हो जिस तरह आपस में अपने जैसों से डरते हो? 40 इस तरह हम आयतें खोलकर पेश करते हैं उन लोगों के लिए जो बुद्धि से काम लेते हैं।
39. यहाँ तक तौहीद (एकेश्वरवाद) और आख़िरत का बयान मिला-जुला चल रहा था। उसमें जिन निशानियों की ओर ध्यान दिलाया गया है, उनके अन्दर तौहीद की दलीलें भी हैं, और वही दलीलें यह भी सिद्ध करती हैं कि आख़िरत का आना असंभव नहीं है । इसके बाद आगे विशुद्ध तौहीद पर वार्ता शुरू हो रही है।
40. मुशरिक यह मान लेने के बाद कि ज़मीन व आसमान और उसकी सब चीज़ों का पैदा करने वाला और मालिक अल्लाह है, उसकी सृष्टि में से कुछ को ख़ुदाई सिफ़तों (ईश्वरीय गुणों) और अधिकारों में उसका शरीक ठहराते थे। अल्लाह इस आयत में उसी शिर्क का खंडन कर रहा है। उदाहरण देने का उद्देश्य यह है कि अल्लाह के दिए हुए माल में से अल्लाह ही के पैदा किए हुए वे इनसान जो संयोग से तुम्हारी ग़ुलामी में आ गए हैं, तुम्हारे तो शरीक नहीं क़रार पा सकते, मगर तुमने यह विचित्र धांधली मचा रखी है कि अल्लाह को पैदा की हुई सृष्टि में अल्लाह की पैदा की हुई सृष्टि को बेझिझक उसके साथ ख़ुदाई (ईश्वरत्व) का शरीक ठहराते हो। इस तरह की मूर्खतापूर्ण बातों को सोचते आख़िर तुम्हारी बुद्धि कहाँ मारी जाती है? (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए, सूरा-16 अन-नहल, टिप्पणी (62)
بَلِ ٱتَّبَعَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓاْ أَهۡوَآءَهُم بِغَيۡرِ عِلۡمٖۖ فَمَن يَهۡدِي مَنۡ أَضَلَّ ٱللَّهُۖ وَمَا لَهُم مِّن نَّٰصِرِينَ ۝ 28
(29) मगर ये ज़ालिम बे-समझे-बूझे अपनी कल्पनाओं के पीछे चल पड़े हैं। अब कौन उस आदमी को रास्ता दिखा सकता है जिसे अल्लाह ने भटका दिया हो 41, ऐसे लोगों का तो कोई सहायक नहीं हो सकता।
41. अर्थात् जब कोई आदमी सीधी-सीधी बुद्धि की बात न स्वयं सोचे और न किसी के समझाने से समझने के लिए तैयार हो, तो फिर उसकी बुद्धि पर अल्लाह की फटकार पड़ जाती है और उसके बाद हर वह चीज़ जो किसी उचित आदमी को सत्य बात तक पहुंचने में मदद दे सकती है, वह इस ज़िद्दी अज्ञानता प्रिय इनसान को उल्टी और अधिक गुमराही में डालती चली जाती है। यही स्थिति है जिसे ‘भटकाने’ शब्द से व्यक्त किया गया है । गुमराही पसन्द इनसान जब गुमराह ही होने पर आग्रह करता है, तो फिर अल्लाह उसके लिए वही साधन पैदा करता चला जाता है जो उसे भटकाकर हर दिन सत्य से दूर लिए चले जाते हैं।
فَأَقِمۡ وَجۡهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفٗاۚ فِطۡرَتَ ٱللَّهِ ٱلَّتِي فَطَرَ ٱلنَّاسَ عَلَيۡهَاۚ لَا تَبۡدِيلَ لِخَلۡقِ ٱللَّهِۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلۡقَيِّمُ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعۡلَمُونَ ۝ 29
(30) तो 42 (ऐ नबी! और नबी के अनुयायियो!) एकाग्र होकर अपना रुख़ इस दीन 43 की ओर जमा दो44 क़ायम हो जाओ उस फ़ितरत पर जिस पर अल्लाह ने इनसानों को पैदा किया है 45, अल्लाह की बनाई हुई संरचना बदली नहीं जा सकती। 46 यही बिल्कुल सीधा और दुरुस्त दीन है 47, मगर अधिकतर लोग जानते नहीं हैं।
42. यह ‘तो’ इस अर्थ में है कि जब वास्तविकता तुम्हें मालूम हो चुकी कि इस सृष्टि का पैदा करनेवाला और स्वामी एक अल्लाह के सिवा और कोई नहीं है तो इसके बाद अनिवार्य रूप से तुम्हारा तरीक़ा यह होना चाहिए।
43. उस दीन से तात्पर्य वह विशेष दीन है जिसे क़ुरआन पेश कर रहा है, जिसमें बन्दगी, इबादत और आज्ञापालन का अधिकारी एक अल्लाह के सिवा और कोई नहीं है।
44. “एकाग्र होकर अपना रुख़ उस ओर जमा दो” अर्थान् फिर किसी और तरफ़ का रुख़ न करो। ज़िन्दगी के लिए इस राह को अपना लेने के बाद फिर किसी दूसरे रास्ते की ओर ध्यान तक न जाने पाए।
45. अर्थात् तमाम इनसान इस प्रकृति पर पैदा किए गए हैं कि इनका कोई पैदा करनेवाला और कोई रब और कोई उपास्य और आज्ञा माननेवाला वास्तविक अधिकारी एक अल्लाह के सिवा नहीं है। इसी प्रकृति पर तुमको क़ायम होना चाहिए। इस विषय को बहुत-सी हदीसों में नबी (सल्ल०) ने स्पष्ट किया है। मिसाल के तौर पर बुख़ारी व मुस्लिम में है कि नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया, “हर बच्चा जो किसी माँ के पेट से पैदा होता है, मूल मानव प्रकृति पर पैदा होता है। ये माँ-बाप हैं जो उसे बाद में ईसाई या यहूदी या मजूसी आदि बना डालते हैं। इसकी मिसाल ऐसी है जैसे हर जानवर के पेट से पूरा-पूरा सही व सालिम जानवर बरामद होता है। कोई बच्चा भी कटे हुए कान लेकर नहीं आता, बाद में मुशरिक लोग अपने अज्ञानतापूर्ण अंधविश्वासों के आधार पर उसके कान काटते हैं।”
46. अर्थात् अल्लाह ने इनसान को अपना बन्दा बनाया है और अपनी ही बन्दगी के लिए पैदा किया है। यह बनावट किसी के बदलने से नहीं बदल सकती। न आदमी बन्दा से गैर-बन्दा बन सकता है, न किसी ग़ैर-ख़ुदा को ख़ुदा बना लेने से वह वास्तव में उसका ख़ुदा बन सकता है। इनसान चाहे अपने कितने ही उपास्य बना बैठे, लेकिन यह बात अपनी जगह अटल है कि वह एक अल्लाह के सिवा किसी का बन्दा नहीं है। दूसरा अनुवाद इस आयत का यह भी हो सकता है कि “अल्लाह की बनाई हुई बनावट में परिवर्तन न किया जाए” अर्थात् अल्लाह ने जिस प्रकृति पर इनसान को पैदा किया है, उसको बिगाड़ना और विकृत करना सही नहीं है।
47. अर्थात् प्रकृति के नियम पर क़ायम रहना ही सीधा और सही तरीक़ा है।
۞مُنِيبِينَ إِلَيۡهِ وَٱتَّقُوهُ وَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَلَا تَكُونُواْ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ۝ 30
(31-32) (क़ायम हो जाओ इस बात पर) अल्लाह की ओर पलटते हुए 48 और डरो उससे 49 और नमाज़ क़ायम करो 50 और न हो जाओ उन मुशरिकों में से जिन्होंने अपना-अपना दीन अलग बना लिया है और गिरोहों में बँट गए हैं। हर एक गिरोह के पास जो कुछ है, उसी में वह मगन है।51
48. अल्लाह की ओर पलटने से तात्पर्य यह है कि जिसने भी स्वतंत्रता और स्वायत्तता अपना कर या अन्य की बन्दगी का तरीक़ा अपना कर अपने असली और वास्तविक रब से बेवफ़ाई की हो, वह अपने इस चलन से बाज़ आ जाए और उसी एक अल्लाह की बन्दगी की ओर पलट आए जिसका बन्दा वह वास्तव में पैदा हुआ है।
49. अर्थात् तुम्हारे दिल में इस बात का डर होना चाहिए कि अगर अल्लाह के मुक़ाबले में तुमने स्वायत्तता की रीति अपनाई या उसके बजाय किसी और को बन्दगी की तो इस साहारी और नमकहरामी की सज़ा तुम्हें भुगतनी होगी।
50. अल्लाह की ओर पलटने और उसके प्रकोप का डर दोनों दिल के काम हैं। दिल को इस स्थिति को अपने ज़ाहिर होने और अपने मज़बूत होने के लिए अवश्य ही किसी ऐसे शारीरिक काम की ज़रूरत है जिससे प्रत्यक्ष रूप में भी हर आदमी को मालूम हो जाए कि फ्ला आदमी वास्तव में एक अल्लाह की बन्दगी की ओर पलट आया है और आदमी के अपने मन में भी इस पलटने और डरने की स्थिति को एक व्यावहारिक प्रयास के द्वारा निरंतर विकास प्राप्त होता चला जाए। इसी लिए अल्लाह उस मानसिक परिवर्तन का आदेश देने के बाद तुरन्त ही इस शारीरिक कार्य अर्थात् नमाज़ क़ायम करने का हुक्म देता है, क्योंकि अल्लाह की ओर पलटने और अल्लाह के डर को सुदृढ़ करने के लिए हर दिन पाँच वक़्त पाबन्दी के साथ नमाज़ अदा करने से बढ़कर कोई कार्य कारगर नहीं है।
51. यह संकेत है इस चीज़ की ओर कि तमाम इनसानों का वास्तविक दोन वही प्राकृतिक दीन है जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है। यह दीन मुशरिकाना धर्मों से क्रमवार विकसित होता हुआ तौहीद तक नहीं पहुँचा है, जैसा कि अनुमान करके मज़हब का एक दर्शन गढ़ लेनेवाले लोग समझते हैं, बल्कि इसके विपरीत ये जितने धर्म दुनिया में पाए जाते हैं ये सब के सब उस अस्ल दीन में बिगाड़ आने से पैदा हुए हैं और यह बिगाड़ इसलिए आया है कि अलग-अलग लोगों ने प्राकृतिक तथ्यों पर अपनी-अपनी नव-ईजाद बातों को बढ़ाकर अपने अलग दोन बना डाले और हर एक मूल वास्तविकता के बजाय उस गढ़ी हुई चीज़ पर आसक्त हो गया जिसकी वजह से वह दूसरों से जुदा होकर एक स्थायी सम्प्रदाय बना था।
مِنَ ٱلَّذِينَ فَرَّقُواْ دِينَهُمۡ وَكَانُواْ شِيَعٗاۖ كُلُّ حِزۡبِۭ بِمَا لَدَيۡهِمۡ فَرِحُونَ ۝ 31
0
وَإِذَا مَسَّ ٱلنَّاسَ ضُرّٞ دَعَوۡاْ رَبَّهُم مُّنِيبِينَ إِلَيۡهِ ثُمَّ إِذَآ أَذَاقَهُم مِّنۡهُ رَحۡمَةً إِذَا فَرِيقٞ مِّنۡهُم بِرَبِّهِمۡ يُشۡرِكُونَ ۝ 32
(33-34) लोगों का हाल है कि जब उन्हें कोई कष्ट पहुँचता है तो अपने रब की ओर पलटते और उसे पुकारते है। 52 फिर जब वह कुछ अपनी रहमत का मज़ा उन्हें चखा देता है तो यकायक उनमें से कुछ लोग शिर्क करने लगते हैं, 53 ताकि हमारे किए हुए एहसान की नाशुक्री करें। अच्छा, मज़े कर लो, बहुत जल्द तुम्हें मालूम हो जाएगा।
52. यह इस बात का खुला प्रमाण है कि उनके दिल की गहराइयों में तौहीद की गवाही मौजूद है। आशाओं के सहारे जब भी टूटने लगते हैं, उनका दिल स्वयं ही भीतर से पुकारने लगता है कि वास्तविक शासन-सत्ता सृष्टि के स्वामी ही की है और उसी की सहायता उनकी बिगड़ी बना सकती है।
53. अर्थात् फिर दूसरे उपास्यों की मन्नतें और चढ़ावे चढ़ने शुरू हो जाते हैं और कहा जाने लगता है कि यह मुसीबत फ़ुलां हज़रत की कृपा और फ़ुलां आस्ताने के अनुग्रह से टली है।
لِيَكۡفُرُواْ بِمَآ ءَاتَيۡنَٰهُمۡۚ فَتَمَتَّعُواْ فَسَوۡفَ تَعۡلَمُونَ ۝ 33
0
أَمۡ أَنزَلۡنَا عَلَيۡهِمۡ سُلۡطَٰنٗا فَهُوَ يَتَكَلَّمُ بِمَا كَانُواْ بِهِۦ يُشۡرِكُونَ ۝ 34
(35) क्या हमने कोई प्रमाण और तर्क उनपर उतारा है जो गवाही देता हो उस शिर्क की सच्चाई पर जो ये कर रहे हैं। 54
54. अर्थात् आख़िर किस तर्क से उन लोगों को यह मालूम हुआ है कि बलाएँ ख़ुदा नहीं टालता, बल्कि हज़रत टाला करते हैं? क्या बुद्धि इसकी गवाही देती है ? या कोई अल्लाह की किताब ऐसी है जिसमें अल्लाह ने यह फ़रमाया हो कि मैं अपने स्वामित्व के अधिकार को फ्ला-फ्ला हज़रतों को दे चुका हूँ और अब वे तुम लोगों के काम बनाया करेंगे?
وَإِذَآ أَذَقۡنَا ٱلنَّاسَ رَحۡمَةٗ فَرِحُواْ بِهَاۖ وَإِن تُصِبۡهُمۡ سَيِّئَةُۢ بِمَا قَدَّمَتۡ أَيۡدِيهِمۡ إِذَا هُمۡ يَقۡنَطُونَ ۝ 35
(36) जब हम लोगों को रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वे इसपर फूल जाते हैं और जब उनके अपने किए करतूतों से उनपर कोई मुसीबत आती है तो यकायक वे निराश होने लगते हैं। 55
55. ऊपर की आयत में इनसान की अज्ञानता और मूर्खता और उसकी नाशुक्री और नमकहरामी पर पकड़ थी। इस आयत में उसके छिछोरेपन और नीचता पर पकड़ की गई है। इस थुड़दिले को जब दुनिया में कुछ दौलत, ताक़त और इज़्ज़त नसीब हो जाती है तो उसे याद नहीं रहता कि यह सब कुछ अल्लाह का दिया है। यह समझता है कि मेरे ही कुछ ‘सुर्ख़ाब’ के पर लगे हुए हैं जो मुझे वह कुछ मिला जिससे दूसरे महरूम हैं। इस भ्रम में दंभ व घमंड का नशा उसपर ऐसा चढ़ता है कि फिर यह न अल्लाह को ख़ातिर में लाता है, न लोगों को, लेकिन ज्यों ही कि भाग्य ने मुँह मोड़ा, उसकी हिम्मत जवाब दे जाती है और [वह हताश होकर रह जाता है]
أَوَلَمۡ يَرَوۡاْ أَنَّ ٱللَّهَ يَبۡسُطُ ٱلرِّزۡقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقۡدِرُۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يُؤۡمِنُونَ ۝ 36
(37) क्या ये लोग देखते नहीं हैं कि अल्लाह ही रोज़ी कुशादा करता है जिसकी चाहता है और तंग करता है (जिसकी चाहता है।) निश्चय ही इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो ईमान लाते हैं।56
56. अर्थात् ईमानवाले इससे शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं कि कुफ़्र व शिर्क का इनसान के चरित्र पर क्या असर पड़ता है और इसके विपरीत अल्लाह पर ईमान लाने के नैतिक परिणाम क्या हैं । जो आदमी सच्चे मन से अल्लाह पर ईमान रखता हो वह कभी उस पस्ती में नहीं पड़ सकता जिसमें अल्लाह को भूले हुए लोग पड़े होते हैं। उसे कुशादा रोज़ी मिले तो फूलेगा नहीं, शुक्र करेगा। तंगी के साथ रोज़ो मिले या उपवास ही हो तब भी सब से काम लेगा, ईमानदारी, अमानतदारी और खु़द्दारी को हाथ से न जाने देगा और आख़िर वक़्त तक ख़ुदा से दया व कृपा की आस लगाए रहेगा। यह नैतिक श्रेष्ठता न किसी नास्तिक को नसीब हो सकती है, न मुशरिक को।
فَـَٔاتِ ذَا ٱلۡقُرۡبَىٰ حَقَّهُۥ وَٱلۡمِسۡكِينَ وَٱبۡنَ ٱلسَّبِيلِۚ ذَٰلِكَ خَيۡرٞ لِّلَّذِينَ يُرِيدُونَ وَجۡهَ ٱللَّهِۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ ۝ 37
(38) अत: (ऐ मोमिन!) रिश्तेदार को उसका हक़ दे और निर्धन और मुसाफ़िर को (उसका हक़)। 57 यह तरीक़ा बेहतर है उन लोगों के लिए जो अल्लाह की ख़ुशी चाहते हों, और वही सफलता पानेवाले हैं। 58
57. यह नहीं कहा कि रिश्तेदार मिसकीन और मुसाफ़िर को ख़ैरात दे। कहा यह गया है कि यह उसका अधिकार है जो तुझे देना चाहिए और अधिकार ही समझकर तू उसे दे। उसको देते हुए यह विचार तेरे दिल में न आने पाए कि यह कोई उपकार है जो तू उसपर कर रहा है, बल्कि यह बात अच्छी तरह तेरे मन में बैठी रहे कि माल के वास्तविक स्वामी ने अगर तुझे ज़्यादा दिया है और दूसरे बन्दों को कम अता फ़रमाया है तो यह ज़्यादा माल उन दूसरों का अधिकार है जो तेरी आज़माइश के लिए तेरे हाथ में दे दिया गया है, ताकि तेरा मालिक देखे कि तू उनका हक पहचानता और पहुँचाता है या नहीं। अल्लाह के इस इर्शाद और उसकी असल रूह पर जो आदमी भी गौर करेगा, वह यह महसूस किए बिना नहीं रह सकता कि क़ुरआन मजीद इनसान के लिए नैतिक और आध्यात्मिक विकास का जो रास्ता प्रस्तावित करता है, उसके लिए एक आज़ाद समाज और आज़ाद अर्थ-व्यवस्था (Free Economy) का मौजूद होना ज़रूरी है।
58. यह अर्थ नहीं है कि सफलता सिर्फ़ निर्धन और मुसाफ़िर और रिश्तेदार का अधिकार दे देने से प्राप्त हो जाती है, बल्कि अर्थ यह है कि इनसानों में से जो लोग इन हक़ों को नहीं पहचानते और नहीं अदा करते, वे सफलता पानेवाले नहीं हैं, बल्कि सफलता पानेवाले वे हैं जो विशुद्ध अल्लाह की प्रसन्नता के लिए ये हक़ पहचानते और अदा करते हैं।
وَمَآ ءَاتَيۡتُم مِّن رِّبٗا لِّيَرۡبُوَاْ فِيٓ أَمۡوَٰلِ ٱلنَّاسِ فَلَا يَرۡبُواْ عِندَ ٱللَّهِۖ وَمَآ ءَاتَيۡتُم مِّن زَكَوٰةٖ تُرِيدُونَ وَجۡهَ ٱللَّهِ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُضۡعِفُونَ ۝ 38
(39) जो व्याज तुम देते हो ताकि लोगों के मालों में शामिल होकर वह बढ़ जाए, अल्लाह के नज़दीक वह नहीं बढ़ता 59, और जो ज़कात तुम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के इरादे से देते हो, उसी के देनेवाले वास्तव में अपने माल बढ़ाते हैं।60
59. क़ुरआन मजीद में यह पहली आयत है जो सूद (ब्याज) की निंदा में उतरी। इसमें सिर्फ़ इतनी बात कही गई है कि तुम लोग तो सूद यह समझते हुए देते हो कि जिसको हम यह ज़्यादा माल दे रहे हैं, उसकी दौलत बढ़ेगी, लेकिन वास्तव में अल्लाह के नज़दीक सूद से दौलत की बढ़ौत्तरी नहीं होती, बल्कि ज़कात से होती है। आगे चलकर जब मदीना तैयिबा में सूद के हराम हो जाने का आदेश दिया गया तो उसपर आगे यह बात कही गई कि “अल्लाह सूद का मुठ मार देता है और सदक़ों को बढ़ाता है।” (बाद के आदेशों के लिए देखिए सूरा-3 आले इमरान, आयत 130, सूरा-2, अल-बकरा आयत 275-281) (इस आयत में सूद की सिर्फ़ थोड़ी-सी निंदा पर बस करना और कई साल बाद उसके हराम किए जाने का एलान होना क़ुरआन न की एक विशेष तत्वदर्शितापूर्ण नीति पर आधारित है। क़ुरआन मजीद का तरीक़ा यह है कि जिस चीज़ को बाद में किसी समय हराम करना होता है, उसके लिए वह पहले से जे़हनों को तैयार करना शुरू कर देता है। शराब के मामले में भी पहले केवल इतनी बात कही गई थी कि वह पवित्र रोज़ी नहीं है। (सूरा-16 fm अन नहल, आयत 67) फिर कहा कि उसका पाप उसके लाभ से अधिक है। (सूरा-2 अल-बकरा, आयत 219) फिर आदेश दिया गया कि नशे की हालत में नमाज़ के क़रीब न जाओ। (सूरा-4, अन-निसा, आयत 43) फिर उसके पूर्ण रूप से हराम किए जाने का फै़सला कर दिया गया। इसी तरह यहाँ सूद के बारे में केवल इतना कहने पर बस गया है कि यह वह चीज़ नहीं है जिससे दौलत में बढ़ोत्तरी होती है, बल्कि सच्ची बढ़ोत्तरी ज़कात से होती है। इसके बाद सूद-दर-सूद को मना किया गया ( सूरा-3, आले इमरान आयत 130) और सबसे अन्त में स्वयं सूद ही के बिल्कुल हराम होने का फै़सला कर दिया गया। (सूरा-2 अल-बक़रा, आयत 275)
60. इस बढ़ोत्तरी के लिए कोई सीमा निश्चित नहीं है, जितनी शुद्ध नीयत और त्याग की जितनी गहरी भावना और अल्लाह की प्रसन्नता की जितनी ही तेज़ तलब के साथ कोई आदमी अल्लाह के रास्ते में माल लगाएगा, उतना ही अल्लाह उसका अधिक से अधिक बदला देगा।
ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَكُمۡ ثُمَّ رَزَقَكُمۡ ثُمَّ يُمِيتُكُمۡ ثُمَّ يُحۡيِيكُمۡۖ هَلۡ مِن شُرَكَآئِكُم مَّن يَفۡعَلُ مِن ذَٰلِكُم مِّن شَيۡءٖۚ سُبۡحَٰنَهُۥ وَتَعَٰلَىٰ عَمَّا يُشۡرِكُونَ ۝ 39
(40) अल्लाह ही है 61 जिसने तुमको पैदा किया, फिर तुम्हें रोज़ी दी, 62 फिर वह तुम्हें मौत देता है, फिर वह तुम्हें ज़िन्दा करेगा। क्या तुम्हारे ठहराए हुए शरीकों में से कोई ऐसा है जो इनमें से कोई काम भी करता हो? 63 पाक है वह और अति उच्च और श्रेष्ठ है उस शिर्क से जो ये लोग करते हैं।
61. यहाँ से फिर कुफ़्फ़ार (विधर्मियों) और मुशरिकों को समझाने के लिए वार्ताक्रम तौहीद और आख़िरत के विषय की ओर फिर जाता है।
62. अर्थात् ज़मीन में तुम्हारी रोज़ी के लिए तमाम साधन जुटाए और ऐसा प्रबन्ध कर दिया कि रोज़ी की गर्दिश से हर एक को कुछ न कुछ हिस्सा पहुँच जाए।
63. अर्थात् अगर तुम्हारे बनाए हुए उपायों में से कोई भी न पैदा करनेवाला है,न रोज़ी देनेवाला, न मौत और जीवन उसके कब्जे में है और न मर जाने के बाद वह किसी को ज़िन्दा कर देने की सामर्थ्य रखता है तो आख़िर ये लोग हैं किस मरज़ की दवा कि तुमने उन्हें उपास्य बना लिया?
ظَهَرَ ٱلۡفَسَادُ فِي ٱلۡبَرِّ وَٱلۡبَحۡرِ بِمَا كَسَبَتۡ أَيۡدِي ٱلنَّاسِ لِيُذِيقَهُم بَعۡضَ ٱلَّذِي عَمِلُواْ لَعَلَّهُمۡ يَرۡجِعُونَ ۝ 40
(41) खु़श्की (थल) और तरी (जल) में बिगाड़ पैदा हो गया है लोगों के अपने हाथों की कमाई से ताकि मज़ा चखाए उनको उनके कुछ कामों का, शायद कि वे बाज़ आ जाएँ। 64
64. यह फिर उस लड़ाई की ओर संकेत है जो उस समय रूम और ईरान के बीच चल रही थी, जिसकी आग ने पूरे मध्य-पूर्व को अपनी लपेट में ले लिया था। “लोगों के अपने हाथों की कमाई” से तात्पर्य वह अवज्ञा, भ्रष्टता और जु़ल्म और अन्याय है जो शिर्क या अनीश्वरवाद का अक़ीदा अपनाने और आख़िरत को नज़रंदाज़ करने से अनिवार्य रूप से इनसानी चरित्र व आचरण में पैदा होता है। “शायद कि वे बाज़ आ जाएँ” का अर्थ यह है कि अल्लाह आख़िरत की सज़ा से पहले इस दुनिया में इनसानों को उनके तमाम कामों का नहीं, बल्कि कुछ कामों का बुरा नतीजा इसलिए दिखाता है कि वे वास्तविकता को समझें और अपने विचारों की ग़लती को महसूस करके उस सही अक़ीदे की ओर पलटें जो नबी हमेशा से इनसान के सामने पेश करते चले आ रहे हैं, जिसको अपनाने के सिवा इनसानी कामों को सही बुनियाद पर क़ायम करने की कोई दूसरी शक्ल नहीं है। यह विषय कुरआन मजीद में कई जगहों पर बयान हुआ है, मिसाल के तौर पर देखिए, सूरा-9 अत-तौबा, आयत 126, सूरा-13 अर-राद आयत 31, सूरा-32 अस-सजदा, आयत 21, सूरा-52 अत-तूर, आयत 47
قُلۡ سِيرُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَٱنظُرُواْ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلُۚ كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّشۡرِكِينَ ۝ 41
(42) (ऐ नबी!) इनसे कहो कि धरती में चल-फिरकर देखो, पहले गुज़रे हुए लोगों का क्या अंजाम हो चुका है, इनमें से अधिकतर मुशरिक ही थे।65
65. अर्थात् रोम व ईरान की विनाशकारी लड़ाई आज कोई नयी घटना नहीं है। पिछला इतिहास बड़ी-बड़ी क़ौमों के नाश व विनाश के रिकार्ड से भरा हुआ है और इन सब क़ौमों को जिन ख़राबियों ने नष्ट किया उन सबकी जड़ यही शिर्क था जिनसे बाज़ आने के लिए आज तुमसे कहा जा रहा है।
فَأَقِمۡ وَجۡهَكَ لِلدِّينِ ٱلۡقَيِّمِ مِن قَبۡلِ أَن يَأۡتِيَ يَوۡمٞ لَّا مَرَدَّ لَهُۥ مِنَ ٱللَّهِۖ يَوۡمَئِذٖ يَصَّدَّعُونَ ۝ 42
(43) अत: (ऐ नबी!) अपना रुख़ दृढ़ता के साथ जमा दो इस सत्य-धर्म की दिशा में इससे पहले कि वह दिन आए जिसके टल जाने की कोई शक्ल अल्लाह की ओर से नहीं है।66 उस दिन लोग फटकर एक दूसरे से अलग हो जाएँगे।
66. अर्थात् जिसको न अल्लाह ख़ुद टालेगा और न उसने किसी के लिए ऐसे किसी उपाय की कोई गुंजाइश छोड़ी है कि वह उसे टाल सके।
مَن كَفَرَ فَعَلَيۡهِ كُفۡرُهُۥۖ وَمَنۡ عَمِلَ صَٰلِحٗا فَلِأَنفُسِهِمۡ يَمۡهَدُونَ ۝ 43
(44-45) जिसने इनकार किया है उसके इनकार का बोझ उसी पर है 67, और जिन लोगों ने अच्छा कर्म किया वे अपने ही लिए सफलता का मार्ग साफ़ कर रहे हैं, ताकि अल्लाह ईमान लानेवालों और अच्छे कर्म करनेवालों को अपनी मेहरबानी से बदला दे। निश्चित रूप से वह इनकार करनेवालों को पसन्द नहीं करता।
67. यह एक व्यापक वाक्य है जो तमाम उन हानियों को अपने भीतर समेट लेता है जो इनकारी को अपने इनकार की वजह से पहुंच सकती है। हानियों की कोई विस्तृत सूची भी इतनी व्यापक नहीं हो सकती।
لِيَجۡزِيَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ مِن فَضۡلِهِۦٓۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 44
0
وَمِنۡ ءَايَٰتِهِۦٓ أَن يُرۡسِلَ ٱلرِّيَاحَ مُبَشِّرَٰتٖ وَلِيُذِيقَكُم مِّن رَّحۡمَتِهِۦ وَلِتَجۡرِيَ ٱلۡفُلۡكُ بِأَمۡرِهِۦ وَلِتَبۡتَغُواْ مِن فَضۡلِهِۦ وَلَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ ۝ 45
(46) उसकी निशानियों में से यह है कि वह हवाएँ भेजता है शुभ-सूचना देने के लिए 68 और तुम्हें अपनी रहमत देने के लिए और इस उद्देश्य के लिए कि नावें उसके हुक्म से चलें 69 और तुम उसकी कृपा खोजो 70 और उसके कृतज्ञ बनो।
68. अर्थात् रहमत की वर्षा की शुभ-सूचना देने के लिए।
69. यह एक और प्रकार की हवाओं का उल्लेख है जो जहाज़ चलाने में सहायक होती है। प्राचीन समय को बादबानी, नावों और जहाज़ों का सफ़र अधिकतर अनुकूल हवाओं पर आश्रित था और प्रतिकूल हवाएँ उनके लिए विनाश की पूर्व सूचना सिद्ध होती थीं। इसलिए वर्षा लानेवाली हवाओं के बाद उन हवाओं का उल्लेख एक विशेष नेमत की हैसियत से किया गया है।
70. अर्थात् व्यापार के लिए सफ़र करो।
وَلَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا مِن قَبۡلِكَ رُسُلًا إِلَىٰ قَوۡمِهِمۡ فَجَآءُوهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِ فَٱنتَقَمۡنَا مِنَ ٱلَّذِينَ أَجۡرَمُواْۖ وَكَانَ حَقًّا عَلَيۡنَا نَصۡرُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ۝ 46
(47) और हमने तुमसे पहले रसूलों को उनकी क़ौम की ओर भेजा और वे उनके पास रौशन निशानियाँ लेकर आए। 71 फिर जिन्होंने अपराध किया 72 उनसे हमने बदला लिया, और हमपर यह हक़ था कि हम ईमानबालों की सहायता करें।
71. अर्थात् एक प्रकार की निशानियाँ तो वे हैं जो सृष्टि की प्रकृति में हर ओर फैली हुई हैं, जिनसे इनसान को अपने जीवन में हर ओर साबक़ा पेश आता है, जिनमें से एक हवाओं के चलने की यह व्यवस्था है जिसका ऊपर की आयत में उल्लेख किया गया है। और दूसरे प्रकार की निशानियाँ वे हैं जो नबियों के मोजिज़ों की शक्ल में, अल्लाह की वाणी की शक्ल में, अपने असाधारण पवित्र आचरण की शक्ल में और मानव समाज पर अपने जीवनदायक प्रभावों की शक्ल में लेकर आए। ये दोनों प्रकार की निशानियाँ एक ही सत्य की निशानदेही करती हैं और वह यह कि जिस तौहीद की शिक्षा नबी दे रहे हैं,वही सत्य है। इनमें से हर निशानी दूसरे का समर्थन करती है। सृष्टि की निशानियाँ नबियों के बयान की सच्चाई पर गवाही देती हैं और नबियों की लाई हुई निशानियाँ उस सत्य को खोलती हैं जिसकी ओर सृष्टि की निशानियाँ संकेत कर रही हैं।
72. अर्थात् जो लोग इन दोनों निशानियों की ओर से अंधे बनकर तौहीद से इनकार पर जमे रहे और अल्लाह से विद्रोह ही किए चले गए।
ٱللَّهُ ٱلَّذِي يُرۡسِلُ ٱلرِّيَٰحَ فَتُثِيرُ سَحَابٗا فَيَبۡسُطُهُۥ فِي ٱلسَّمَآءِ كَيۡفَ يَشَآءُ وَيَجۡعَلُهُۥ كِسَفٗا فَتَرَى ٱلۡوَدۡقَ يَخۡرُجُ مِنۡ خِلَٰلِهِۦۖ فَإِذَآ أَصَابَ بِهِۦ مَن يَشَآءُ مِنۡ عِبَادِهِۦٓ إِذَا هُمۡ يَسۡتَبۡشِرُونَ ۝ 47
(48-49) अल्लाह ही है जो हवाओं को भेजता है और वे बादल उठाती हैं, फिर वह इन बादलों को आसमान में फैलाता है जिस तरह चाहता है और इन्हें टुकड़ियों में बाँट देता है, फिर तू देखता है कि वर्षा की बूंदें बादल में से टपके चली आती हैं। यह वर्षा जब वह अपने बन्दों में से जिनपर चाहता है बरसाता है तो यकायक वे प्रसन्न हो जाते हालाँकि उसके बरसने से पहले वे निराश हो रहे थे।
وَإِن كَانُواْ مِن قَبۡلِ أَن يُنَزَّلَ عَلَيۡهِم مِّن قَبۡلِهِۦ لَمُبۡلِسِينَ ۝ 48
0
فَٱنظُرۡ إِلَىٰٓ ءَاثَٰرِ رَحۡمَتِ ٱللَّهِ كَيۡفَ يُحۡيِ ٱلۡأَرۡضَ بَعۡدَ مَوۡتِهَآۚ إِنَّ ذَٰلِكَ لَمُحۡيِ ٱلۡمَوۡتَىٰۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ ۝ 49
(50) देखो, अल्लाह की रहमत के प्रभाव कि मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को वह किस तरह जिला उठाता है? 73 निश्चय ही वह मुर्दो को ज़िन्दगी देनेवाला है और वह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है।
73. यहाँ जिस ढंग से नुबूवत और वर्षा का उल्लेख एक के बाद एक करके किया गया है, उसमें एक सूक्ष्म संकेत इस सत्य की ओर भी है कि नबी का आना भी इनसान के नैतिक जीवन के लिए वैसी ही रहमत है जैसे वर्षा का आना उसके भौतिक जीवन के लिए रहमत सिद्ध होता है। जिस तरह आसमानी वर्षा के आने से मुर्दा पड़ी ज़मीन यकायक जी उठती है और उसमें खेतियाँ लहलहाने लगती हैं, उसी तरह आसमानी वह्य का अवतरण नैतिकता और आध्यात्मिकता की वीरान पड़ी हुई दुनिया को जिला उठाता है और उसमें गुणों और भलाइयों के गुलज़ार लहलहाने लगते हैं। यह विधर्मियों का अपना दुर्भाग्य है कि अल्लाह की ओर से यह नेमत जब उनके यहाँ आती है तो वे उसकी नाशुक्री करते हैं और उसको अपने लिए रहमत की शुभ-सूचना समझने के बजाय मौत का सन्देश समझ लेते हैं।
وَلَئِنۡ أَرۡسَلۡنَا رِيحٗا فَرَأَوۡهُ مُصۡفَرّٗا لَّظَلُّواْ مِنۢ بَعۡدِهِۦ يَكۡفُرُونَ ۝ 50
(51) और अगर हम एक ऐसी हवा भेज दें जिसके प्रभाव से वे अपनी खेती को पीली पाएँ 74 तो वे इनकार करते रह जाते हैं। 75
74. अर्थात् रहमत की वर्षा के बाद जब खेतियाँ हरी-भरी हो चुकी हों उस समय अगर कोई ऐसी बड़ी ठंडी या बड़ी गर्म हवा चल पड़े जो हरी-भरी फ़स्लों को जलाकर रख दे।
75. अर्थात् फिर वे अल्लाह को कोसने लगते हैं और उसपर आरोप रखने लगते हैं कि उसने ये कैसी मुसीबतें हमपर डाल रखी हैं। हालांकि जब अल्लाह ने उनपर नेमत की वर्षा की थी, उस समय उन्होंने शुक्र के बजाय उसकी नाक़द्री की थी। यहाँ फिर एक सूक्ष्म संकेत इस विषय की ओर है कि जब अल्लाह के रसूल उसकी ओर से रहमत का सन्देश लाते हैं तो लोग उनकी बात नहीं मानते और उस नेमत को ठुकरा देते हैं। फिर जब उनके इनकार के अपराध में अल्लाह उनपर ज़ालिमों और जाबिरों को प्रभावी कर देता है और वे ज़ुल्म व सितम की चक्की में उन्हें पीसते हैं और मानवता की जौहर की जड़ें काट डालते हैं, तो वही लोग अल्लाह को गालियाँ देना शुरू कर देते हैं और उसपर आरोप लगाते हैं कि उसने यह कैसी जु़ल्म से भरी हुई दुनिया बना डाली है।
فَإِنَّكَ لَا تُسۡمِعُ ٱلۡمَوۡتَىٰ وَلَا تُسۡمِعُ ٱلصُّمَّ ٱلدُّعَآءَ إِذَا وَلَّوۡاْ مُدۡبِرِينَ ۝ 51
(52-53) (ऐ नबी) तुम मुर्दों को नहीं सुना सकते,76 न उन बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हो जो पीठ फेरे चले जा रहे हों, 77 और न तुम अंधों को उनकी गुमराही से निकालकर सीधा रास्ता दिखा सकते हो। 78 तुम तो सिर्फ़ उन्हीं को सुना सकते हो जो हमारी आयतों पर ईमान लाते और आज्ञाकारी हो जाते हैं।
76. यहाँ मुर्दों से मुराद वे लोग हैं जिनके ज़मीर (अन्तरात्माएँ) मर चुके हैं जिनके अन्दर अख़लाक़ी ज़िन्दगी का हलका-सा असर भी बाक़ी नहीं रहा है, जिनके मन की बन्दगी और जिद और हठधर्मी ने उस सलाहियत ही को ख़त्म कर दिया है जो आदमी को हक़ बात समझने और क़ुबूल करने के क़ाबिल बनाती है।
77. बहरों से मुराद वे लोग हैं जिन्होंने अपने दिलों पर ऐसे ताले लगा रखे हैं कि सबकुछ सुनकर भी वे कुछ नहीं सुनते। फिर जब ऐसे लोग यह कोशिश भी करें कि हक़ की दावत की आवाज़ सिरे से उनके कान में पड़ने ही न पाए, और दावत देनेवाले की शक्ल देखते ही दूर भागना शुरू कर दें तो ज़ाहिर है कि कोई उन्हें क्या सुनाए और कैसे सुनाए?
78. अर्थात् नबी का काम यह तो नहीं है कि अंधों का हाथ पकड़कर उन्हें सारी उम्र सीधे रास्ते पर चलाता रहे, वह तो सोधे रास्ते की ओर रहनुमाई ही कर सकता है। मगर जिन लोगों के दिल की आँखें फूट चुकी हों और जिन्हें वह रास्ता नज़र ही न आता हो जो नबी उन्हें दिखाने की कोशिश करता है, उनको रास्ता दिखाना नबी के बस का काम नहीं है।
وَمَآ أَنتَ بِهَٰدِ ٱلۡعُمۡيِ عَن ضَلَٰلَتِهِمۡۖ إِن تُسۡمِعُ إِلَّا مَن يُؤۡمِنُ بِـَٔايَٰتِنَا فَهُم مُّسۡلِمُونَ ۝ 52
0
۞ٱللَّهُ ٱلَّذِي خَلَقَكُم مِّن ضَعۡفٖ ثُمَّ جَعَلَ مِنۢ بَعۡدِ ضَعۡفٖ قُوَّةٗ ثُمَّ جَعَلَ مِنۢ بَعۡدِ قُوَّةٖ ضَعۡفٗا وَشَيۡبَةٗۚ يَخۡلُقُ مَا يَشَآءُۚ وَهُوَ ٱلۡعَلِيمُ ٱلۡقَدِيرُ ۝ 53
(54) अल्लाह ही तो है जिसने कमज़ोरी की हालत से तुम्हारी पैदाइश की शुरुआत की, फिर उस कमज़ोरी के बाद तुम्हें शक्ति प्रदान की, फिर उस शक्ति के बाद तुम्हें कमज़ोर और बूढ़ा कर दिया। वह जो कुछ चाहता है, पैदा करता है। 79 और वह सब कुछ जाननेवाला, हर चीज़ का सामर्थ्य रखनेवाला है।
79. अर्थात् बचपन, जवानी और बुढ़ापा, ये सारी हालतें उसी की पैदा की हुई हैं। यह उसी की इच्छा पर आश्रित है कि जिसे चाहे कमज़ोर पैदा करे और जिसको चाहे ताक़तवर बनाए, जिसे चाहे बचपन से जवानी तक न पहुंचने दे और जिसको चाहे जवानी की मौत दे दे, जिसे चाहे लम्बी उम्र देकर भी स्वस्थ रखे और जिसको चाहे शानदार जवानी के बाद बुढ़ापे में इस तरह एड़ियाँ रगड़वाए कि दुनिया उसे देखकर शिक्षा ग्रहण करने लगे। इनसान अपनी जगह जिस घमंड में चाहे पड़ा रहे, मगर अल्लाह की शक्ति के हाथों में वह इस तरह विवश है कि जो हालत भी अल्लाह उसपर तारी कर दे, उसे वह अपने किसी उपाय से नहीं बदल सकता ।
وَيَوۡمَ تَقُومُ ٱلسَّاعَةُ يُقۡسِمُ ٱلۡمُجۡرِمُونَ مَا لَبِثُواْ غَيۡرَ سَاعَةٖۚ كَذَٰلِكَ كَانُواْ يُؤۡفَكُونَ ۝ 54
(55) और जब वह घड़ी आ जाएगी 80 तो अपराधी क़समें खा-खाकर कहेंगे कि हम एक घड़ी भर से अधिक नहीं ठहरे हैं। 81 इसी तरह वे दुनिया की ज़िन्दगी में धोखा खाया करते थे। 82
80. अर्थात् क़ियामत जिसके आने की ख़बर दी जा रही है।
81. अर्थात् मरने के वक़्त से क़ियामत की उस घड़ी तक इन दोनों घड़ियों के बीच चाहे दस बीस-हज़ार वर्ष ही गुज़र चुके हों, मगर वे यह महसूस करेंगे कि कुछ घंटे पहले हम सोए थे और अब अचानक एक हादसे ने हमें जगा दिया है।
82. अर्थात् ऐसे ही ग़लत अन्दाज़े ये लोग दुनिया में भी लगाते थे। वहाँ भी ये वास्तविकता को समझने से महरूम थे, इसी वजह से यह आदेश दिया करते थे कि कोई क़ियामत-वियामत नहीं आनी, मरने के बाद कोई ज़िन्दगी नहीं और किसी प्रभु के सामने हाज़िर होकर हमें हिसाब नहीं देना।
وَقَالَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡعِلۡمَ وَٱلۡإِيمَٰنَ لَقَدۡ لَبِثۡتُمۡ فِي كِتَٰبِ ٱللَّهِ إِلَىٰ يَوۡمِ ٱلۡبَعۡثِۖ فَهَٰذَا يَوۡمُ ٱلۡبَعۡثِ وَلَٰكِنَّكُمۡ كُنتُمۡ لَا تَعۡلَمُونَ ۝ 55
(56) मगर जो ज्ञान और ईमान से सम्पन्न कर दिए गए थे, वे कहेंगे कि अल्लाह के लिखे में तो तुम जी उठने (हश्र) के दिन तक पड़े रहे हो, सो यह वही उठाए जाने का दिन है, लेकिन तुम जानते न थे।
فَيَوۡمَئِذٖ لَّا يَنفَعُ ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ مَعۡذِرَتُهُمۡ وَلَا هُمۡ يُسۡتَعۡتَبُونَ ۝ 56
(57) अत: वह दिन होगा जिसमें ज़ालिमों को उनका बहाना कोई लाभ न देगा और न उनसे क्षमा माँगने के लिए कहा जाएगा।83
83. दूसरा अनुवाद यह भी हो सकता है- “न उनसे यह चाहा जाएगा कि अपने रब को राज़ी करो।” इसलिए कि तौबा और ईमान और भले कर्म की ओर पलटने के सारे अवसरों को वे खो चुके होंगे और परीक्षा का समय समाप्त होकर फै़सले की घड़ी आ चुकी होगी।
وَلَقَدۡ ضَرَبۡنَا لِلنَّاسِ فِي هَٰذَا ٱلۡقُرۡءَانِ مِن كُلِّ مَثَلٖۚ وَلَئِن جِئۡتَهُم بِـَٔايَةٖ لَّيَقُولَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ إِنۡ أَنتُمۡ إِلَّا مُبۡطِلُونَ ۝ 57
(58) हमने इस क़ुरआन में लोगों को तरह-तरह से समझाया है। तुम चाहे कोई निशानी ले आओ, जिन लोगों ने मानने से इनकार कर दिया है वे यही कहेंगे कि तुम बातिल (असत्य) पर हो।
كَذَٰلِكَ يَطۡبَعُ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِ ٱلَّذِينَ لَا يَعۡلَمُونَ ۝ 58
(59) इस तरह ठप्पा लागा देता है अल्लाह उन लोगों के दिलों पर जो ज्ञानहीन हैं।
فَٱصۡبِرۡ إِنَّ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقّٞۖ وَلَا يَسۡتَخِفَّنَّكَ ٱلَّذِينَ لَا يُوقِنُونَ ۝ 59
(60) अत: (ऐ नबी!) सब्र करो, निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है। 84 और कदापि हल्का न पाएँ तुमको वे लोग जो विश्वास नहीं करते। 85
84. संकेत है उस वादे की ओर जो ऊपर आयत 47 में गुज़र चुका है। वहाँ अल्लाह ने अपनी यह सुन्नत बयान की है कि जिन लोगों ने भी अल्लाह के रसूलों की लाई हुई खुली हिदायतों का मुक़ाबला झुठलाने, उपहास करने और हठधर्मी दिखाने के साथ किया है, अल्लाह ने ऐसे अपराधियों से ज़रूर बदला लिया है। (“और उन लोगों से बदला लिया।” - क़ुरआन, 30 : 47) और अल्लाह पर यह हक़ है कि ईमानवालों की सहायता करे। (और मोमिनों की मदद करना हमपर हक़ था।” - क़ुरआन, 30 : 47)
85. अर्थात् दुश्मन तुमको ऐसा कमज़ोर न पाए कि उनके शोर और हँगामे से तुम दब जाओ या उनके आरोपित करने और झूठ गढ़ने की मुहिम से तुम आतंकित हो जाओ, उनकी फबतियों, तानों, हँसी उड़ाने और उपहास करने से तुम हतोत्साहित हो जाओ, या उनकी धमकियों और ताक़त के प्रदर्शनों और ज़ुल्म व सितम से तुम डर जाओ या उनके दिए हुए लालच से तुम फिसल जाओ या राष्ट्र-हित के नाम पर जो अपीलें वे तुमसे कर रहे हैं उनकी बुनियाद पर तुम उनके साथ समझौता कर लेने पर उतर आओ। इसके बजाय वे तुमको अपने उद्देश्य के एहसास में इतना जागरूक और अपने विश्वास और ईमान में इतना सुदृढ़ और अपने इरादे में इतना पक्का और अपने आचरण में इतना मज़बूत पाएँ कि न किसी डर से तुम्हें डराया जा सके, न किसी क़ीमत पर तुम्हें ख़रीदा सके, न किसी फ़रेब में तुमको फुसलाया जा सके, न कोई ख़तरा या नुक़सान या तकलीफ़ तुम्हें अपनी राह से हटा सके और न दीन के मामले में किसी लेन-देन का सौदा तुमसे चुकाया जा सके। यह सारा विषय अल्लाह की अर्थगर्भित शैली ने इस छोटे-से वाक्य में समेट दी है कि ‘ये अविश्वासी लोग तुमको हल्का न पाएँ।