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سُورَةُ لُقۡمَانَ

31. लुक़मान 

(मक्‍का में उतरी, आयतें 34)

परिचय

नाम

इस सूरा के दूसरे रुकूअ (आयत 12 से 19 तक) में वे नसीहतें बयान की गई हैं जो हकीम लुक़मान ने अपने बेटे को की थीं। इसी सम्पर्क से इसका नाम लुक़मान रखा गया है।

उतरने का समय

इसकी विषय वस्तुओं पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि यह उस समय उतरी है जब इस्लामी सन्देश को दबाने और रोकने के लिए दमन और अत्याचार का आरंभ हो चुका था, लेकिन अभी विरोध के तूफ़ान ने पूरी तरह भयानक रूप धारण नहीं किया था। इसकी निशानदेही आयत 14-15 से होती है, जिनमें नए-नए मुसलमान होनेवाले नौजवानों को बताया गया है कि माँ-बाप के हक़ तो बेशक अल्लाह के बाद सबसे बढ़कर हैं, लेकिन अगर वे तुम्हें शिर्क की ओर पलटने पर विवश करें तो उनकी यह बात कदापि न मानना।

विषय और वार्ता

इस सूरा में लोगों को शिर्क (अनेकेश्वरवाद) का निरर्थक और अनुचित होना और तौहीद (ऐकेश्वरवाद) का सत्य, उचित एवं उपयोगी होना समझाया गया है और उन्हें दावत दी गई है कि बाप-दादा की अंधी पैरवी छोड़ दें। खुले मन से उस शिक्षा पर विचार करें जो मुहम्मद (सल्ल०) जगत् के स्वामी की ओर से पेश कर रहे हैं और खुली आँखों से देखें कि हर ओर जगत् में और स्वयं उनके अपने भीतर कैसी-कैसी खुली निशानियाँ उसके सत्य होने की गवाही दे रही हैं। इस सिलसिले में यह भी बताया गया है कि यह कोई नई आवाज़ नहीं है जो दुनिया में या स्वयं अरब के इलाक़ों में पहली बार उठी हो। पहले भी जो लोग ज्ञान और बुद्धि तथा सूझ-बूझ और विवेक रखते थे, वे यही बातें कहते थे, जो आज मुहम्मद (सल्ल०) कह रहे हैं। तुम्हारे अपने ही देश में लुक़मान नामक हकीम गुज़र चुका है, जिसकी समझ-बूझ और विवेक को [तुम ख़ुद भी मानते हो।] अब देख लो कि वह किस विश्वास और किस नैतिकता की शिक्षा देता था।

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سُورَةُ لُقۡمَانَ
31. लुकमान
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील और अत्यन्त दयावान है।
الٓمٓ
(1) अलिफ लाम० मीम०।
تِلۡكَ ءَايَٰتُ ٱلۡكِتَٰبِ ٱلۡحَكِيمِ ۝ 1
(2) ये हिक्मत (तत्वज्ञान) वाली किताब की आयतें हैं1,
1. अर्थात् ऐसी किताब की आयतें जो तत्वदर्शिता से भरी हुई हैं, जिसकी हर बात तत्वदर्शितापूर्ण है।
هُدٗى وَرَحۡمَةٗ لِّلۡمُحۡسِنِينَ ۝ 2
(3) हिदायत और रहमत उत्‍तमकार लोगों के लिए2,
2. अर्थात ये आयतें सीधे रास्‍ते की ओर रहनुमाई करनेवाली हैं और अल्लाह की ओर से रहमत बनकर आई हैं, मगर इस रहमत और हिदायत से लाभ उठानेवाले केवल वही लोग हैं जो उत्तम कार्य-नीति अपनाते हैं, जिन्हें भलाई की तलाश है। रहे बुरे काम करनेवाले और बुराई को पसंद करनेवाले लोग, तो वे न इस रहनुमाई से लाभ उठाएँगे, न इस रहमत में से हिस्‍सा पाएँगे।
ٱلَّذِينَ يُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُم بِٱلۡأٓخِرَةِ هُمۡ يُوقِنُونَ ۝ 3
(4) जो नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते और आख़िरत (परलोक) पर यक़ीन रखते हैं,3
3. पहले ‘उत्तमकार’ का सामान्य शब्द प्रयुक्त करके इस बात की ओर संकेत किया गया है कि वे उन तमाम बुराइयों से रुकनेवाले हैं जिनसे यह किताब रोकती है और उन सारे नेक कामों पर अमल करनेवाले हैं, जिनका यह किताब आदेश देती है। फिर उन ‘उत्तमकार’ लोगों के तीन महत्वपूर्ण गुणों का मुख्य रूप से उल्लेख किया गया है, जिसका उद्देश्य यह बताता है कि बाक़ी सारी नेकियों का दारोमदार इन्हीं तीन चीज़ों पर है। वे नमाज़ क़ायम करते हैं, जिससे ख़ुदापरस्ती उनकी स्थाई आदत बन जाती है। वे ज़कात देते हैं, जिससे त्याग व क़ुर्बानी की भावना उनके भीतर मज़बूत होती है, दुनिया की सुख सामग्री से लगाव और प्रेम कम होता है और अल्लाह की प्रसन्नता की तलब उभरती है। और ये आख़िरत पर यक़ीन रखते हैं, जिससे उनके अन्‍दर ज़िम्‍मेदारी और जवाबदेही का एहसास उभरता है। ये तीनों गुण उनके अन्‍दर एक स्थाई चिंतन एवं नैतिक व्यवस्था पैदा कर देता है, जिसके कारण उनसे नेकी और भलाई [बाक़ायदा होने नगती हैं।]
أُوْلَٰٓئِكَ عَلَىٰ هُدٗى مِّن رَّبِّهِمۡۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ ۝ 4
(5) यही लोग अपने रब की ओर से सीधे रास्ते पर हैं और यही सफलता पानेवाले हैं।4
4. मक्का के इस्लाम विरोधी यह समझते थे और एलानिया कहते भी थे कि मुहम्मद (सल्ल०) और उनके इस पैग़ाम को स्वीकार करनेवाले लोग अपनी ज़िन्दगी बरबाद कर रहे हैं। इसलिए पूरे यक़ीन और ज़ोर के साथ कहा गया है कि सफलता पानेवाले वास्तव में यही लोग हैं और उससे महरूम (वंचित) रहनेवाले वे हैं, जिन्होंने इस राह को अपनाने से इनकार किया है। (सफलता का क़ुरआनी दृष्टिकोण जानने के लिए देखिए सूरा-10 यूनुस, टिप्पणी-23 और सूरा-23 मोमिनून, टिप्पणी-1)
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَشۡتَرِي لَهۡوَ ٱلۡحَدِيثِ لِيُضِلَّ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ بِغَيۡرِ عِلۡمٖ وَيَتَّخِذَهَا هُزُوًاۚ أُوْلَٰٓئِكَ لَهُمۡ عَذَابٞ مُّهِينٞ ۝ 5
(6) और इनसानों ही में से कोई ऐसा भी है 5 जो दिल बहलानेवाली बाते 6 ख़रीद कर लाता है ताकि लोगों को अल्लाह के रास्ते से ज्ञान के बिना7 भटका दे और इस रास्ते की दावत को मज़ाक़ में उड़ा दे। 8 ऐसे लोगों के लिए बड़ा ही अपमानजनक अज़ाब है।9
5. अर्थात् एक ओर तो अल्लाह की ओर से जो रहमत और हिदायत आई हुई है जिससे कुछ लोग लाभ उठा रहे हैं, दूसरी ओर उन्हीं ख़ुशनसीब इनसानों के पहलू व-पहलू ऐसे बदनसीब लोग भी मौजूद हैं जो अल्लाह की आयतों के मुक़ाबले में यह रवैया अपना रहे हैं।
6. मूल अरबी शब्द है ‘लहवल हदीस’ अर्थात् ऐसी बात जो आदमी को अपने में व्यस्त करके हर दूसरी चीज़ से ग़ाफ़िल कर दे। शब्दकोष के अनुसार तो इन शब्दों में निंदा का कोई पहलू नहीं है, लेकिन इन शब्दों का इस्तेमाल बुरी, बेकार और बेहूदा बातों के लिए ही होता है। लहवल हदीस ‘ख़रीदने’ का अर्थ यह भी लिया जा सकता है कि वह आदमी सत्य बात को छोड़कर असत्य बात को अपनाता है। लेकिन यह लाक्षणिक अर्थ है। सही अर्थ इस वाक्य का यही है कि आदमी अपना माल ख़र्च करके कोई बेहूदा चीज़ ख़रीदे। और बहुत-सी रिवायतें भी इस व्याख्या का समर्थन करती हैं। इने-हिशाम ने मुहम्मद बिन इस्हाक़ की रिवायत नवल की है कि जब नबी (सल्ल०) की दावत मक्का के इस्लाम विरोधियों को सारी कोशिशों के बावजूद फैलती चली जा रही थी तो ना बिन हारिस ने कुरैश के लोगों से कहा कि जिस तरह तुम इस आदमी का मुक़ाबला कर रहे हो, इससे काम न चलेगा। ठहरो, इसका इलाज में करता हूँ। इसके बाद वह मक्का से इराक़ गया और वहाँ से अजम (ग़ैर अरब) के बादशाहों के क़िस्से और रुस्तम व असफ़न्दयार की दास्तानें लाकर उसने क़िस्सागोई की महफ़िलें जमाना शुरू कर दी ताकि लोगों का ध्यान क़ुरआन से हटे और वे उन कहानियों में खो जाएँ। (सीरत इब्ने हिशाम, भाग 1, पृ. 320-321) यही रिवायतें अरबाबुन्नजूल में वाहिदी ने कलबी और मुकातिल से दर्ज की है और इसे अब्बास ने इसपर इतना और जोड़ा है कि नज़्र ने इस उद्देश्य के लिए गानेवाली लौड़ियाँ भी ख़रीदी थी। जिस किसी के बारे में वह सुनता कि नबी (सल्ल.) की बातों का असर ले रहा है, उसपर अपनी एक लौडीं मुसल्लत कर देता और उससे कहता कि उसे खूब खिला-पिला और गाना सुना, ताकि तेरे साथ मशगुल होकर उसका दिल उधर से हट जाए।
7. ‘ज्ञान के बिना’ का ताल्लुक. ‘ख़रीदता है’ के साथ भी हो सकता है और भटका दे’ के साथ भी। अगर उसका ताल्लुक पहले वाक्य से माना जाए, तो अर्थ यह होगा कि यह अज्ञानी और नासमझ आदमी इस मनमोहक चीज़ को ख़रीदता है और कुछ नहीं जानता कि कैसी कोमती चीज़ को छोड़कर वह किस विनाशकारी चीज़ को ख़रीद रहा है। और अगर उसे दूसरे वाक्य से संबंधित समझा जाए तो इसका अर्थ यह होगा कि वह ज्ञान के बिना लोगों के मार्गदर्शन के लिए उठा है, उसे यह समझ नहीं है कि अल्लाह के बन्दों को अल्लाह की राह से भटकाने की कोशिश करके वह कितना बड़ा पाप अपनी गरदन पर ले रहा है।
8. अर्थात् यह आदमी लोगों को किस्से-कहानियों और गाने बजाने (की सांस्कृतिक गतिविधियों) में लगा कर अल्लाह की आयतों को मुँह चिढ़ाना चाहता है। उसकी कोशिश यह है कि क़ुरआन की इस दावत को हँसी-ठट्ठों में उड़ा दिया जाए।
9.यह सज़ा उनके अपराध के अनुसार है। वे अल्लाह के दीन और उसकी आयतों और उसके रसूल को अपमानित करना चाहते हैं, अल्लाह इसके बदले में उनको बड़ी रुसवाई की यातना देगा।
وَإِذَا تُتۡلَىٰ عَلَيۡهِ ءَايَٰتُنَا وَلَّىٰ مُسۡتَكۡبِرٗا كَأَن لَّمۡ يَسۡمَعۡهَا كَأَنَّ فِيٓ أُذُنَيۡهِ وَقۡرٗاۖ فَبَشِّرۡهُ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ ۝ 6
(7) उसे जब हमारी आयतें सुनाई जाती हैं तो वह बड़े घमंड के साथ इस तरह रुख़ फेर लेता है, मानो उसने उन्हें सुना ही नहीं, मानो उसके कान बहरे हैं। अच्छा, शुभसूचना सुना दो उसे एक दर्दनाक अज़ाब की।
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ لَهُمۡ جَنَّٰتُ ٱلنَّعِيمِ ۝ 7
(8) अलबत्ता जो लोग ईमान ले आएँ और भले कर्म करें, उनके लिए नेमत भरी जन्नतें हैं।10
10. यह नहीं कहा कि उनके लिए जन्नत की नेमतें हैं, बल्कि फ़रमाया यह है कि उनके लिए नेमत भरी जन्नतें हैं, जिससे अपने आप यह स्पष्ट होता है कि पूरी-पूरी जन्नतें उनके सुपुर्द कर दी जाएँगी और वे उनकी नेमतों से इस तरह लाभ उठाएँगे जिस तरह एक मालिक अपनी चीज़ से लाभ उठाता है, न कि उस तरह जैसे किसी को मिल्कियत का हक़ दिए बिना केवल एक चीज़ से लाभ उठाने का मौका दे दिया जाए।
خَٰلِدِينَ فِيهَاۖ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقّٗاۚ وَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡحَكِيمُ ۝ 8
(9) जिनमें वे सदा रहेंगे। यह अल्लाह का पक्का वादा है और वह प्रभुत्वशाली और तत्त्वदर्शी है।11
11. ‘यह अल्लाह का पक्का वादा है’ कहने के बाद अल्लाह के इन दो गुणों को बयान करने का अभिप्राय [इस संभावना को समाप्त करना है] कि ईमान और अच्छे कामों के बदले में जो कुछ अल्लाह ने देने का वादा फ़रमाया है, वह किसी को न मिल सके या उसके यहाँ ग़लत-बखशी से काम लिया जाए, हक़दार को महरूम रखा जाए और गैऱहक़दार को नवाज़ दिया जाए।
خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ بِغَيۡرِ عَمَدٖ تَرَوۡنَهَاۖ وَأَلۡقَىٰ فِي ٱلۡأَرۡضِ رَوَٰسِيَ أَن تَمِيدَ بِكُمۡ وَبَثَّ فِيهَا مِن كُلِّ دَآبَّةٖۚ وَأَنزَلۡنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَأَنۢبَتۡنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوۡجٖ كَرِيمٍ ۝ 9
(10) उसने 12 आसमानों को पैदा किया बिना सुतूनों (स्तंभों) के, जो तुमको नज़र आएँ।13 उसने जमीन में पहाड़ जमा दिए ताकि यह तुम्हें लेकर हुलक न जाए।14 उसने हर तरह के जानवर जमीन में फैला दिए और आसमान से पानी बरसाया और जमीन में तरह-तरह की उम्दा चीजें उगा दी।
12.ऊपर की प्रस्तावना के बाद अब मूल उद्देश्य अर्थात् शिर्क (अनेकेश्वरवाद) के खंडन और तौहीद (ऐकेश्वरवाद) को दावत पर वार्ता शुरू होती है।
13.मूल अरबी शब्द हैं 'बिगेरि अ-म-दिन तरौनहा'। इसके दो अर्थ हो सकते हैं। एक यह कि 'तुम ख़ुद देख रहे हो कि वे बिना सुतूनों के कायम हैं।' दूसरा अर्थ यह है कि वे ऐसे सुतूनों पर कायम हैं जो तुमको नज़र नहीं आते।' वर्तमान युग के भौतिक विज्ञान (Physical Science) की दृष्टि से अगर इसका अर्थ बताया जाए तो यह कहा जा सकता है कि आसमानों की पूरी दुनिया में ये अनगिनत शानदार तारे और ग्रह अपने-अपने स्थान और धुरी पर अदृश्य सहारों से कायम किए गए हैं। कोई तार नहीं है जिन्होंने उनको एक-दूसरे से बांध रखा हो। कोई छड़ें नहीं जो उनको एक दूसरे पर गिर जाने से रोक रही हों। सिर्फ गुरुत्वाकर्षण नियम है जो इस व्यवस्था को थामे हुए है। यह अर्थ हमारे आज के ज्ञान की दृष्टि से है। हो सकता है कि कल हमारे ज्ञान में कुछ और बढ़ोत्तरी हो और इससे अधिक लगता हुआ कोई दूसरा अर्थ इस वास्तविकता का निकाला जा सके।
هَٰذَا خَلۡقُ ٱللَّهِ فَأَرُونِي مَاذَا خَلَقَ ٱلَّذِينَ مِن دُونِهِۦۚ بَلِ ٱلظَّٰلِمُونَ فِي ضَلَٰلٖ مُّبِينٖ ۝ 10
(11) यह तो है अल्लाह की संरचना, अब तनिक मुझे दिखाओ, इन दूसरों ने क्या पैदा किया है ?15-अस्ल बात यह है कि ये जालिम लोग खुली गुमराही में पड़े हुए हैं।16
15.अर्थात् उन हस्तियों ने जिनको तुम अपना उपास्य बनाए बैठे हो।
16.अर्थात् जब ये लोग अल्लाह के सिवा इस सृष्टि में किसी दूसरे के कुछ पैदा करने की कोई निशानदेही नहीं कर सकते और स्पष्ट है कि नहीं कर सकते, तो उनका उन हस्तियों को जो कुछ पैदा नहीं कर सकती, ईश्वरत्व (ख़ुदाई) में शरीक ठहराना अलावा इसके कि खुली मूर्खता है और कोई दूसरा कारण उनके इस मूर्खता भरे काम का नहीं बताया जा सकता।
وَلَقَدۡ ءَاتَيۡنَا لُقۡمَٰنَ ٱلۡحِكۡمَةَ أَنِ ٱشۡكُرۡ لِلَّهِۚ وَمَن يَشۡكُرۡ فَإِنَّمَا يَشۡكُرُ لِنَفۡسِهِۦۖ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَنِيٌّ حَمِيدٞ ۝ 11
(12) हमने17 लुक़मान को तत्त्वदर्शिता (हिकमत) प्रदान की थी कि अल्लाह का कृतज्ञ (शुक्रगुज़ार) हो। 18 जो कोई शुक्र करे उसका शुक्र उसके अपने ही लिए फ़ायदेमंद है। और जो नाशुक्री करे, तो वास्तव में अल्लाह बेनियाज़ और आपसे आप प्रशंसित है।19
17. शिर्क (अनेकेश्वरवाद) के खंडन में एक ज़ोरदार बुद्धिसंगत प्रमाण पेश करने के बाद अब अरब के लोगों को यह बताया जा रहा है कि पहले भी बुद्धिमान और ज्ञानी लोग यही बात कहते रहे हैं और तुम्हारा अपना मशहूर हकीम लुक़मान अब से बहुत पहले यही कुछ कह गया है। लुक़मान का नाम अरब में एक हकीम और ज्ञानी के रूप में बहुत प्रसिद्ध था। अज्ञानकाल के कवियों, जैसे उमरुल-कै़स, लबीद, आशा, तरफ़ा आदि के काव्य में उनका उल्लेख हुआ है। अविवासियों में कुछ एके-लिखे लोगों के पास लुक़मान के सहीफे के नाम से उनके तत्वदर्शितापूर्ण कथनों का एक संग्रह भी मौजूद था। ऐतिहासिक दृष्टि से लूक़मान के व्यक्तित्त्व के बारे में बड़े मतभेद हैं। अज्ञानकाल अन्धकारपूर्ण सदियों में कोई लिखित और साहित इतिहास तो मौजूद न था। जानकारियाँ उन सीना ब-सीना रिवायती और कथाओ पर निर्भर थी, जो सैकड़ों वर्षों से चली आ रही थीं। इन रिवायतों के अनुसार कुछ लोग लुक़मान को आद क़ौम का एक व्यक्ति और यमन का एक बादशाह बताते थे, लेकिन इन्ने अब्बास कहते हैं कि लुक़मान एक हब्शी ग़ुलाम था। यही बात हजरत अबू हुरैरा (रज़ि०), मुजाहिद, इक्रिमा और ख़ालिद रबई ने कही है। हज़रत ज़ाकिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी (रज़ि०) का बयान है कि वह नूबा का रहनेवाला था। सईद बिन मुसव्यिव (रह०) का कथन है कि वह मिस्र के काले लोगों में से था। ये तीनों कथन क़रीब क़रीब मिलते जुलते हैं, क्योंकि अरब के लोग काले रंगवाले लोगों को उस जमाने में आमतौर से हब्शी कहते थे और नूबा उस क्षेत्र का नाम है जो मिस्र के दक्षिण और सूडान के उत्तर में स्थित है। इसलिए तीनों कथनी में एक आदमी को मिस्री नूबी और हब्शी क़रार देना सिर्फ़ शब्दों का अन्तर है। अर्थ में कोई अन्तर नहीं है। फिर ‘रोजुल- अनफ़’ में सुहैली और ‘मुरुजुज़-ज़हब’ में मसऊदी के बयान से इस सवाल पर रौशनी पड़ती है कि उस सूडानी गु़लाम की बातें अरब में कैसे फैली। उन दोनों का बयान है कि यह आदमी वास्तव में नूबी था, लेकिन मदयन और ऐला (वर्तमान नाम अक़बा) के क्षेत्र का निवासी था। इसी वजह से उसकी भाषा अरबी थी और उसकी तत्त्वदर्शिता अरब में मशहूर हुई।
18. अर्थात् अल्लाह के दिए हुए इस ज्ञान व तत्त्वदर्शिता और सूझ-बूझ तथा विवेक का सबसे पहला तक़ाज़ा यह था कि इनसान अपने रब के मुक़ाबले में कृतज्ञता और एहसानमंदी का रवैया अपनाए, न कि नेमत की नाशुक्री और नमकहरामी का। और उसकी यह कृतज्ञता सिर्फ़ ज़बानी जमाख़र्च ही न हो, बल्कि चिंतन, कथनी और करनी तीनों रूपों में हो।
19.अर्थात् जो आदमी नाशुक्री करता है, उसका नाशुक्र होना उसके अपने लिए हानिकारक है, अल्लाह का इससे कोई नुक़सान नहीं होता। वह बेनियाज़ है, किसी के शुक्र का मुहताज नहीं है। वह तो आप से आप प्रशंसित है, चाहे कोई उसकी प्रशंसा करे या न करे।
وَإِذۡ قَالَ لُقۡمَٰنُ لِٱبۡنِهِۦ وَهُوَ يَعِظُهُۥ يَٰبُنَيَّ لَا تُشۡرِكۡ بِٱللَّهِۖ إِنَّ ٱلشِّرۡكَ لَظُلۡمٌ عَظِيمٞ ۝ 12
(13) याद करो जब लुक़मान अपने बेटे को नसीहत कर रहा था तो उसने कहा, “बेटा! अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करना 20, सत्य यह है कि शिर्क बहुत बड़ा ज़ुल्‍म है।”21
20. लुक़मान की तत्त्वदर्शितापूर्ण बातों में से इस ख़ास नसीहत को दो अनुकूलताओं के कारण यहाँ बयान किया गया है। एक यह कि उन्होंने यह नसीहत अपने बेटे को की थी और स्पष्ट है कि आदमी दुनिया में सबसे बढ़कर अगर किसी के प्रति सत्यनिष्ठ हो सकता है, तो वह उसकी अपनी औलाद ही है। इसलिए लुक़मान का अपने बेटे को [सबसे पहले] यह नसीहत करना [कि अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करना] इस बात का खुला प्रमाण है कि उनके नज़दीक शिर्क वास्तव में एक बहुत बुरा काम था। दूसरी अनुकूलता यह है कि उस वक़्त मक्का के बहुत से इस्लाम विरोधी अपनी औलाद को शिर्क पर कायम रहने और मुहम्मद (सल्ल०) के धर्म से मुंह मोड़ लेने पर मजबूर कर रह थे, इसलिए इन मूर्खों को सुनाया जा रहा है कि तुम्हारे इलाक़े के मशहूर हकीम ने तो अपनी औलाद के हित की रक्षा इस तरह की थी कि उसे शिर्क (अनेकेश्वावाद) से परहेज़ करने की नसीहत की। अब तुम जो अपनी औलाद को उसी शिर्क पर मजबूर कर रहे हो तो यह उनके लिए बुरा चाह रहे हो या भला?
21.ज़ुल्म का वास्तविक अर्थ है किसी का हक़ मारना और न्याय के विरुद्ध काम करना । शिर्क इस कारण बहुत बड़ा ज़ुल्म है कि आदमी उन हस्तियों को अपने पैदा करनेवाले, रोज़ी देनेवाले और नेमतें देनेवाले के बराबर ला खड़ा करता है, जिनका न उसको पैदा करने में कोई हिस्सा है, न उसको रोज़ी पहुँचाने में कोई दखल है और न उन नेमतों के अता करने में कोई शिर्कत है जिनसे आदमी इस दुनिया में फ़ायदा उठा रहा है। यह ऐसा अन्याय है जिससे बढ़कर किसी अन्याय की कल्पना नहीं की जा सकती। फिर आदमी पर उसके पैदा करनेवाले का यह हक़ है कि वह सिर्फ उसी की बन्दगी व इबादत करे लेकिन वह दूसरों की बन्दगी करके उसका हक़ मारता है। फिर आदमी पर ख़ुद उसके अपने अस्तित्व का यह हक है कि उसे अपमान और अज़ाब में ग्रस्त न करे, मगर वह पैदा करनेवाले को छोड़कर ममलूक की बन्दगी करके अपने आपको अपमानित भी करता है और अज़ाब का हक़दार भी बनाता है।
وَوَصَّيۡنَا ٱلۡإِنسَٰنَ بِوَٰلِدَيۡهِ حَمَلَتۡهُ أُمُّهُۥ وَهۡنًا عَلَىٰ وَهۡنٖ وَفِصَٰلُهُۥ فِي عَامَيۡنِ أَنِ ٱشۡكُرۡ لِي وَلِوَٰلِدَيۡكَ إِلَيَّ ٱلۡمَصِيرُ ۝ 13
(14) और यह 22 सत्य है कि हमने इनसान को अपने माँ-बाप का हक़ पहचानने की ख़ुद ताक़ीद की है। उसकी माँ ने कमज़ोरी पर कमज़ोरी झेलकर उसे अपने पेट में रखा और दो साल उसका दुध छूटने में लगे।23 (इसी लिए हमने उसकी नसीहत की कि) मेरा शुक्र कर और अपने माँ-बाप का शुक्र बजा ला, मेरी ही ओर तुझे पलटना है।
22. यहाँ से पैराग्राफ़ के आख़िर तक का पूरा अंश संदर्भ से हटकर बीच में आया एक वाक्य है जो अल्लाह ने अपनी ओर से लुक़मान के कथन की और अधिक व्याख्या के लिए इरशाद फ़रमाया है।
23. इन शब्दों से इमाम शाफ़ई, इमाम अहमद, इमाम अबू यूसुफ़ और इमाम मुहम्मद (रह०) ने यह नतीजा निकाला है कि बच्चे को दूध पिलाने की मुदत दो साल है। इस मुद्दत के अंदर अगर किसी बच्चे ने किसी औरत का दूध पिया हो, तब तो दूध पिलाने की हुर्मत साबित होगी, वरना इस मुद्दत के बाद अगर किसी को दूध पिलाया है तो इससे हुर्मत साबित नहीं होगी [हुर्मत का मतलब यह है कि किसी औरत का दूध पीनेवाले किसी दूसरे के बच्चे की शादी दूध पिलानेवाली उस औरत के अपने बच्चे से नहीं हो सकती।] इमाम मालिक (रह०) से भी एक रिवायत इसी कथन के समर्थन में है, लेकिन इमाम अबू हनीफ़ा (रह०) ने और सावधानी दिखाते हुए वाई साल की मुदत निर्धारित की है। इसलिए कि आयत का मंशा यह नहीं है कि बच्चे को ज़रूर ही दो साल चूध पिलाया जाए। सूरा-2 बकरा में कहा गया है : “माएं बच्चे को पूरे दो साल दूध पिलाएँ, उस आदमी के लिए जो पूरी मुदत तक दूध पिलवाना चाहता हो।” (आयत 233) इब्ने-अब्बास (रजि०) ने इन शब्दों से यह नतीजा निकाला है और उलमा ने इसपर उनसे सहमति जताई है कि गर्भ की सबसे कम मुद्दत छ: पाह है। इसलिए कि क़ुरआन में एक दूसरी जगह फ़रमाया गया है “उसका पेट में रहना और उसका दूध छूटना तीस महीनी में हुआ।” (सूरा-46 अल-अहकाफ, आयत 15) यह एक अहम क़ानूनी नुक्ता है जो जाइज़ व नाजाइज़ विलादत की बहुत-सी बहसों का फ़ैसला कर देता है।
وَإِن جَٰهَدَاكَ عَلَىٰٓ أَن تُشۡرِكَ بِي مَا لَيۡسَ لَكَ بِهِۦ عِلۡمٞ فَلَا تُطِعۡهُمَاۖ وَصَاحِبۡهُمَا فِي ٱلدُّنۡيَا مَعۡرُوفٗاۖ وَٱتَّبِعۡ سَبِيلَ مَنۡ أَنَابَ إِلَيَّۚ ثُمَّ إِلَيَّ مَرۡجِعُكُمۡ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ۝ 14
(15) लेकिन अगर वे तुझपर दबाव डाले कि मेरे साथ तू किसी ऐसे को शरीक करे जिसे तू नहीं जानता24 तो उनकी बात हरगिज़ न मान। दुनिया में उसके साथ नेक बर्ताव करता रह, मगर पैरवी उस आदमी के रास्ते की कर जो मेरी ओर पलट आया है। फिर तुम सबको पलटना मेरी ही ओर है 25, उस समय मैं तुम्हें बता दूंगा कि तुम कैसे अमल करते रहे हो। 26
24.अर्थात् जो तेरी जानकारी में मेरा शरीक नहीं है।
25.अर्थात् औलाद और माँ-बाप सबको।
26.व्याख्या के लिए देखिए सूरा-29 अनकबूत, टिप्पणी 11-12
يَٰبُنَيَّ إِنَّهَآ إِن تَكُ مِثۡقَالَ حَبَّةٖ مِّنۡ خَرۡدَلٖ فَتَكُن فِي صَخۡرَةٍ أَوۡ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ أَوۡ فِي ٱلۡأَرۡضِ يَأۡتِ بِهَا ٱللَّهُۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَطِيفٌ خَبِيرٞ ۝ 15
(16) (और लुक़मान 27 ने कहा था कि) “बेटा। कोई चीज़ राई के दाने बराबर भी हो और किसी चट्टान में या आसमानों या ज़मीन में कहीं छिपी हुई हो, अल्लाह उसे निकाल लाएगा। 28 वह सूक्ष्मदर्शी और ख़बर रखनेवाला है।
27. लुक़मान की दूसरी नसीहतों का उल्लेख यहाँ यह बताने के लिए किया जा रहा है कि अक़ीदे की तरह नैतिकता के बारे में भी जो शिक्षाएँ नबी (सल्ल०) पेश कर रहे हैं, वे भी अरब में कोई अनोखी बातें नहीं हैं।
28. अर्थात् अल्लाह के ज्ञान से और उसकी पकड़ से कोई चीज़ बच नहीं सकती। [चाहे वह कितनी ही दूर और कितनी ही छिपी हुई क्यों न हो।] इसलिए तुम कहीं किसी हाल में भी नेकी या बदी का कोई ऐसा कार्य नहीं कर सकते जो अल्लाह से छिपा रह जाए। वह न सिर्फ़ यह कि इसे जानता है, बल्कि जब हिसाब-किताब का समय आएगा, तो वह तुम्हारी एक-एक हरकत का रिकार्ड सामने लाकर रख देगा।
يَٰبُنَيَّ أَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ وَأۡمُرۡ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَٱنۡهَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَٱصۡبِرۡ عَلَىٰ مَآ أَصَابَكَۖ إِنَّ ذَٰلِكَ مِنۡ عَزۡمِ ٱلۡأُمُورِ ۝ 16
(17) बेटा। नमाज़ क़ायम कर, नेकी का हुक्म दे, बुराई से मना कर और जो मुसीबत भी पड़े उसपर सब्र कर।29 ये वे बातें हैं जिनकी बड़ी ताकीद की गई है।30
29. इसमें एक सूक्ष्म संकेत इस बात की ओर है कि जो आदमी भी नेकी का हुक्म देने और बदी से रोकने का काम करेगा। [उसे तरह-तरह के विरोधों] और तकलीफ़ों का सामना करना पड़ता है।
30. दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि यह बड़े हौसले का काम है। लोगों के सुधार के लिए उठना और उनकी कठिनाइयों को सहना कम हिम्मत लोगों के बस की बात नहीं है। यह उन कामों में से है जिनके लिए बड़ा दिल-गुर्दा चाहिए।
وَلَا تُصَعِّرۡ خَدَّكَ لِلنَّاسِ وَلَا تَمۡشِ فِي ٱلۡأَرۡضِ مَرَحًاۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخۡتَالٖ فَخُورٖ ۝ 17
(18) और लोगों से मुंह फेरकर बात न कर 31, न ज़मीन में अकड़कर चल, अल्लाह किसी अहंकारी और डींग मारनेवाले आदमी को पसन्द नहीं करता है।32
31.मूल अरबी शब्द है ‘ला तुसअ-अिर ख़द-द-क लिन्नास’। सअर अरबी भाषा में एक बीमारी को कहते हैं जो ऊँट की गरदन में होती है और उसकी वजह से ऊँट अपना मुँह हर वक्त एक ही ओर फेरे रखता है। इससे मुहावरा निकला ‘फला आदमी ने ऊँट की तरह अपना कल्ला फेर लिया’, अर्थात् घमंड के साथ पेश आया और मुँह फेरकर बात की।
32.मूल अरबी शब्द है ‘मुख़ताल और फ़ख़ूर’ । ‘मुख़ताल’ का अर्थ है वह आदमी जो अपनी समझ से अपने आपको बड़ी चीज समझता हो और ‘फ़ख़ूर’ उसको कहते हैं जो अपनी बड़ाई को दूसरों पर ज़ाहिर करे। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा-17 बनी इसराईल, टिप्पणी 43)
وَٱقۡصِدۡ فِي مَشۡيِكَ وَٱغۡضُضۡ مِن صَوۡتِكَۚ إِنَّ أَنكَرَ ٱلۡأَصۡوَٰتِ لَصَوۡتُ ٱلۡحَمِيرِ ۝ 18
(19) अपनी चाल में संतुलन पैदा कर 33 और अपनी आवाज़ जरा धीमी रख, सब आवाज़ों से अधिक बुरी आवाज़ गधों की आवाज़ होती है।’’34
33.सन्दर्भ पर विचार किया जाए तो साफ़ मालूम होता है कि यहाँ चाल में तेज़ी और सुस्ती वार्ता का विषय नहीं है। धीर चलना या तेज चलना अपने भीतर अपने आप में कोई नैतिक गुण या अवगुण नहीं रखता। वास्तव में जो चीज़ यहाँ अभिप्रेत है वह मनःस्थिति में सुधार है जिसके प्रभाव से चाल में घमंड और दीनता (मुहताजी) प्रकट होती है। बड़ाई का घमंड अंदर मौजूद हो तो वह जरूर ही एक खास तरीके की चाल में ढलकर प्रकट होता है। इसी तरह चाल में दीनता (मुहताजी) का प्रकट होना भी किसी न किसी निन्दनीय मनःस्थिति के प्रभाव से होता है । लुकमान की नसीहत का उद्देश्य यह है कि अपनी मनःस्थितियों की इस हालत को दूर करी और एक सीधे साथै भले मानुष और सज्जन पुरुष की-सी चाल चलो, जिसमें न कोई ऐंठ और अकड़ हो, न मरियलपन और न दिखावटी धार्मिकता और विनम्रता (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा 25 अल-फुरकान, टिप्पणी 79 )
34.इसका मंशा यह नहीं है कि आदमी हमेशा धीरे बोले और कभी जोर से बात न करे, बल्कि गधे की आवाज़ जैसी कहकर स्पष्ट कर दिया गया है कि अभिप्रेत किस तरह के स्वर और किस तरह की आवाज़ में बात करने से रोकना है। बोलने के ढंग और आवाज की एक पस्ती और बुलन्दी और सख्ती और नर्मी तो वह होती है, जो स्वाभाविक और वास्तविक जरूरतों के अनुसार हो, जैसे, करीब के आदमी या कम आदमियों मैं आप बात कर रहे हो तो धीरे बोलेंगे।दूर के आदमी से बोलना हो या बहुत-से लोगों से बातें करनी हों, तो अवश्य और से बोलना होगा। ऐसा ही अन्तर स्वरों में भी मौके मौके की दृष्टि से जरूर ही होता है। प्रशंसा का स्वर निंदा के स्वर से और प्रसन्नता व्यक्त करने का स्वर नाराजी प्रकट करने के स्वर से अलग होना ही चाहिए। यह किसी दर्ज में भी आपत्ति के योग्य नहीं है, नलुकमान की नसीहत का अर्थ यह है कि आदमी इस अन्ता को मिटाकर बस हमेशा एक ही तरह नर्म आबाज़ और पस्त स्वर में बात किया करे। आपनि की जो चीज़ है वह घमंड का इजहार करने, धौंस जमाने और दूसरे को अपमानित करने और उसपर रौब डालने के लिए गला फाड़ना और गधे की-सी आवाज़ में बोलना है।
أَلَمۡ تَرَوۡاْ أَنَّ ٱللَّهَ سَخَّرَ لَكُم مَّا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِ وَأَسۡبَغَ عَلَيۡكُمۡ نِعَمَهُۥ ظَٰهِرَةٗ وَبَاطِنَةٗۗ وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يُجَٰدِلُ فِي ٱللَّهِ بِغَيۡرِ عِلۡمٖ وَلَا هُدٗى وَلَا كِتَٰبٖ مُّنِيرٖ ۝ 19
(20) क्या तुम लोग नहीं देखते कि अल्लाह ने ज़मीन और आसमानों की सारी चीजें तुम्हारे लिए वशीभून कर रखी है35 और अपनी खुली और छुपी नेमतें36 तुमपर पूरी कर दी हैं? इसपर हाल यह है कि ईमानों में से कुछ लोग हैं जो अल्लाह के बारे में झगड़ते हैं37, बिना इसके कि उनके पास कोई ज्ञान हो, या हिदायत, या कोई रौशनी दिखानेवाली किताब।38
35.किसी चीज़ को किसी के लिए वशीभूत करने की दो शक्लें हो सकती हैं। एक यह कि वह चीज़ उसके अधीन कर दी जाए और उसै अधिकार दे दिया जाए कि जिस तरह चाहे उसका उपयोग करे और जैसे चाहे उप इस्तेमाल करें। दूसरी यह कि उस चीज़ को ऐसे नियमों का पाबन्द कर दिया जाए कि जिसके कारण वह उस आदमी के लिए लाभप्रय हो जाए, और उसके हित की सेवा करती रहे। ज़मीन व आसमान की तमाम चीजों को अल्लाह ने इंसान के लिए एक ही अर्थ में वशीभूत नहीं कर दिया है, बल्कि कुछ चीजें पहले अर्थ में वशीभूत की हैं और कुछ चीजें दूसरे अर्थ में। जैसे, हवा, पानी, मिट्टी, आग, पेड़-पौधे, खनिज पदार्थ, चौपाए आदि अनगिनत चीजें पहले अर्थ में हमारे लिए वशीभूत हुई हैं और चाँद, सूरज आदि दूसरे अर्थ में।
36.खुली नेमतों से तात्पर्य वै नमते हैं जो आदमी को किसी न किसी प्रकार महसूस होती हैं या उसके ज्ञान में हैं। और छिपी हुई नैगती से ये नेमतें तात्पर्य हैं जिन्हें आदमी न जानता है, न महसूस करता है। अनगिनत चीजें हैं, जो इंसान के अपने शरीर मैं और उसके बाहर दुनिया में उसके हित के लिए काम कर रही हैं, मगर इंसान को उसका पता तक नहीं है कि उसके पैदा करनेवाले ने उसकी सुरक्षा के लिए, उसको रोज़ी पहुँचाने के लिए, उसके विकास के लिए और उसके कल्याण क्या-क्या सामान जुटा रखा है।
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّبِعُواْ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُواْ بَلۡ نَتَّبِعُ مَا وَجَدۡنَا عَلَيۡهِ ءَابَآءَنَآۚ أَوَلَوۡ كَانَ ٱلشَّيۡطَٰنُ يَدۡعُوهُمۡ إِلَىٰ عَذَابِ ٱلسَّعِيرِ ۝ 20
(21) और जब उनसे कहा जाता है कि पैरवी करो उस चीज़ की जो अल्लाह ने उतारी है, तो कहते हैं कि हम तो उस चीज़ की पैरवी करेंगे, जिसपर हमने अपने बाप-दादा को पाया है। क्या ये उन्हीं की पैरवी करेंगे, चाहे शैतान उनको भड़कती हुई आग ही की ओर क्यों न बुलाता रहा हो?39
39.अर्थात् हर व्यक्ति और हर परिवार और हर क़ौम के बाप-दादा का सत्य पर होना कुछ ज़रूरी नहीं है। सिर्फ़ यह बात कि यह तरीक़ा बाप-दादा के वास्तों से चला आ रहा है कदापि इस बात की दलील नहीं है कि यह सत्य भी है। कोई बुद्धिमान यह मूर्खता का काम नहीं कर सकता कि अगर उसके बाप-दादा गुमराह रहे हों, तो वह भी आँखें बन्द करके उन्हीं के रास्ते पर चलता जाए और कभी यह मालूम करने को ज़रूरत न महसूस करे कि यह रास्ता जा किधर रहा है।
۞وَمَن يُسۡلِمۡ وَجۡهَهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ وَهُوَ مُحۡسِنٞ فَقَدِ ٱسۡتَمۡسَكَ بِٱلۡعُرۡوَةِ ٱلۡوُثۡقَىٰۗ وَإِلَى ٱللَّهِ عَٰقِبَةُ ٱلۡأُمُورِ ۝ 21
(22) जो आदमी अपने आपको अल्लाह के सुपुर्द कर दे 40 और व्यवहार में वह नेक हो 41, उसने वास्तव में एक भरोसे के योग्य सहारा थाम लिया 42, और सारे मामलों का आखिरी फ़ैसला अल्लाह ही के हाथ है।
40.अर्थात् पूरी तरह अपने आपको अल्लाह की बन्दगी में दे दे। अपनी कोई चीज़ उसकी बन्दगी से अलग करके न रखे। अपने सारे मामले उसके सुपुर्द कर दे और उसी की दी हुई हिदायतों को अपनी पूरी ज़िन्दगी का क़ानून बनाए।
41.अर्थात् ऐसा न हो कि ज़बान से तो वह समर्पण और सुपुर्दगी की घोषणा कर दे मगर व्यावहारतः वह रवैया न अपनाए जो अल्लाह के एक आज्ञापालक दास का होना चाहिए।
42.अर्थात् न उनको इस बात का कोई ख़तरा कि उसे ग़लत रहनुमाई मिलेगी, न इस बात का कोई अन्देशा कि अल्लाह की बन्दगी करके उसका अंजाम ख़राब होगा।
وَمَن كَفَرَ فَلَا يَحۡزُنكَ كُفۡرُهُۥٓۚ إِلَيۡنَا مَرۡجِعُهُمۡ فَنُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمُۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ ۝ 22
(23) अब जो कुफ़्र (इनकार) करता है, उसका कुफ़्र तुम्हें ग़म में न डाले43, उन्हें पलटकर आना तो हमारी ही ओर है, फिर हम उन्हें बता देंगे कि ये क्या कुछ करके आए है। निश्चय ही अल्लाह सीनों के छिपे हुए भेद तक जानता है।
43.अर्थ यह है कि ऐ नबी! जो आदमी तुम्हारी बात मानने से इनकार करता है, वह अपने नज़दीक तो यह समझता है कि उसने इस्लाम को रद्द करके और कुफ़्र पर आग्रह करके तुम्हें चोट पहुंचाई है, लेकिन चोट उसने ख़ुद अपने आप को पहुंचाई है। इसलिए अगर वह नहीं मानता तो तुम्हें परवाह करने की कोई ज़रूरत नहीं।
نُمَتِّعُهُمۡ قَلِيلٗا ثُمَّ نَضۡطَرُّهُمۡ إِلَىٰ عَذَابٍ غَلِيظٖ ۝ 23
(24) हम थोड़ा समय उन्हें दुनिया में मज़े करने का मौक़ा दे रहे हैं, फिर उनको बेबस करके एक सख़्त अज़ाब की ओर खींच ले जाएँगे।
وَلَئِن سَأَلۡتَهُم مَّنۡ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُۚ قُلِ ٱلۡحَمۡدُ لِلَّهِۚ بَلۡ أَكۡثَرُهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ ۝ 24
(25) अगर तुम इनसे पूछो कि ज़मीन और आसमानों को किसने पैदा किया है, तो ये जमा कहेंगे कि अल्लाह ने। कहो प्रशंसा अल्लाह के लिए है।44 मगर इनमें से अधिकतर लोग जानते नहीं हैं।45
44.अर्थात् शुक्र है कि तुम इतनी बात तो जानते और मानते हो, लेकिन जब वास्तविकता यह है तो फिर प्रशंसा सारी की सारी केवल अल्लाह ही के लिए होनी चाहिए। दूसरी कोई हस्ती प्रशंसा की हकदार कैसे हो सकती है, जबकि जगत् की संरचना में उसका कोई हिस्सा ही नहीं है।
45.अर्थात् अधिकतर लोग यह नहीं जानते कि अल्लाह को जगत् का सृष्टा मानने के जरूरी नतीजे और तकाज़े क्या है, और कौन-सी बातें ऐसी हैं जो उससे मेल नहीं खातीं। जब एक आदमी यह मानता है कि ज़मीन और आसमानों का पैदा करनेवाला सिर्फ अल्लाह है, तो ज़रूरी है कि वह यह भी माने कि इलाह (पूज्य) और रब भी सिर्फ़ अल्लाह ही है, इबादत और आज्ञापालन और बन्दगी का हकदार भी अकेले वही है, तस्बीह व तहमीद (गुणगान) भी उसके सिवा किसी दूसरे की नहीं की जा सकती, दुआएँ भी उसके सिवा किसी और से नहीं माँगी जा सकतीं और अपनी सृष्टि के लिए कानून बनानेवाला और हाकिम भी उसके सिवा कोई नहीं हो सकता। पैदा करनेवाला एक हो और उपास्य दूसरा, यह बिल्कुल बुद्धि के खिलाफ और सरासर उलटी बात है, जिसका माननेवाला वही आदमी हो सकता है जो अज्ञानता में पड़ा हुआ हो। इसी तरह एक हस्ती को पैदा करनेवाला मानना और फिर दूसरी हस्तियों में से किसी को जरूरतें पूरी करनेवाला और मुश्किलें दूर करनेवाला ठहराना, किसी के आगे सर झुकाना और किसी को अधिकारोंवाला हाकिम और वह हस्ती मानना जिसका पूर्ण आज्ञापालन किया जाए, ये सब भी आपस में टकरानेवाली बातें हैं, जिन्हें कोई ज्ञान रखनेवाला इंसान स्वीकार नहीं कर सकता।
لِلَّهِ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۚ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡغَنِيُّ ٱلۡحَمِيدُ ۝ 25
(26) आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, अल्लाह 46 का है, बेशक अल्लाह बेनियाज़ और आप से आप प्रशंसित47 है।
46.अर्थात् वास्तविकता केवल इतनी ही नहीं है कि ज़मीन और आसमानों का पैदा करनेवाला अल्लाह है, बल्कि वास्तव में वही उन सब चीज़ों का मालिक भी है जो ज़मीन और आसमानों में पाई जाती है। अल्लाह ने अपनी यह सृष्टि बनाकर यूँ ही नहीं छोड़ दी है कि जो चाहे उसका या उसके किसी हिस्से का मालिक बन बैठे। अपनी सृष्टि का वह आप ही मालिक है और हर चीज़ जो इस सृष्टि में मौजूद है, वह उसकी मिल्कियत है। यहाँ उसके सिवा किसी की भी यह हैसियत नहीं है कि उसे ख़ुदाई (ईश्वरीय) अधिकार प्राप्त हों।
47.इसकी व्याख्या टिप्पणी न० 19 में गुज़र चुकी है।
وَلَوۡ أَنَّمَا فِي ٱلۡأَرۡضِ مِن شَجَرَةٍ أَقۡلَٰمٞ وَٱلۡبَحۡرُ يَمُدُّهُۥ مِنۢ بَعۡدِهِۦ سَبۡعَةُ أَبۡحُرٖ مَّا نَفِدَتۡ كَلِمَٰتُ ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٞ ۝ 26
(27) ज़मीन में जितने पेड़ हैं, अगर वे सब के सब क़लम बन जाएँ और समुद्र (दवात बन जाए) जिसे सात और अधिक समुद्र रौशनाई जुटाएँ, तब भी अल्लाह की बातें (लिखने से) समाप्त न होंगी।48 बेशक अल्लाह प्रभुत्वशाली और तत्त्वदर्शी है।
48.अल्लाह की बातों से तात्पर्य हैं उसके रचना-सम्बन्धी काम और उसकी शक्ति और तत्त्वदर्शिता के करिश्मे। यह विषय इससे थोड़े भिन्न शब्दों में सूरा-18 कहफ़, आयत 109 में भी आया है। बज़ाहिर एक आदमी यह गुमान करेगा कि शायद इस कथन में ज़्यादा बढ़ाकर बात कही गई है, लेकिन अगर आदमी थोड़ा-सा विचार करे तो उसे महसूस होगा कि वास्तव में इसमें कण भर भी बढ़ा-चढ़ाकर बात नहीं कही गई है। जितनी कलम इस धरती के पेड़ों से बन सकती हैं, और जितनी रोशनाई ज़मीन के मौजूदा समुद्र और वैसे ही सात और ज़्यादा समुद्र जुटा सकते हैं, उनसे अल्लाह की शक्ति और तत्त्वदर्शिता और उसको पैदा करने के सारे करिश्मे तो दूर की बात, शायद दुनिया की मौजूद चीज़ों की पूरी सूची भी नहीं लिखी जा सकती। अकेले इस धरती में जितनी चीज़ें पाई जाती हैं, उन्हीं की गिनती मुश्किल है, कहाँ यह कि इस अनन्त सृष्टि की तमाम चीज़ों को लिखा जा सके। इस बयान से वास्तव में यह आभास कराना अभिप्रेत है कि जो अल्लाह इतनी बड़ी सृष्टि को अस्तित्त्व में लाया है और वह शुरू से आखिर तक उसकी सारी व्यवस्था चला रहा है, उसकी ख़ुदाई में उन छोटी-छोटी हस्तियों की हैसियत ही क्या है, जिन्हें तुम उपास्य बना बैठे हो। फिर भला यह कैसे सोचा जा सकता है कि सृष्टि में से किसी को यहाँ ईश्वरीय अधिकारों का कोई थोड़ा सा हिस्सा भी मिल सके।
مَّا خَلۡقُكُمۡ وَلَا بَعۡثُكُمۡ إِلَّا كَنَفۡسٖ وَٰحِدَةٍۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعُۢ بَصِيرٌ ۝ 27
(28) तुम सारे इनसानों को पैदा करना और फिर दोबारा जिला उठाना तो (उसके लिए) बस ऐसा है जैसे एक जान को (पैदा करना और जिला उठाना) सच तो यह है कि अल्लाह सब कुछ सुनने और देखनेवाला है।”49
49.अर्थात् वह एक ही समय में सम्पूर्ण सृष्टि की आवाज़ें अलग-अलग सुन रहा है और कोई आवाज़ उसके सुनने को इस तरह व्यस्त नहीं करती कि उसे सुनते हुए वह दूसरी चीज़ें न सुन सके। [इसी तरह वह सृष्टि की सारी चीज़ों को एक ही समय में देख भी रहा है।] ठीक ऐसा ही मामला इनसानों को पैदा करने और दोबारा अस्तित्त्व में लाने का भी है। शुरू से आज तक जितने भी आदमी पैदा हुए हैं और आगे क़ियामत तक पैदा होंगे, उन सबको वह एक आन की आन में फिर पैदा कर सकता है। उसकी पैदा करने की क्षमता एक इनसान को बनाने में इस तरह व्यस्त नहीं होती कि उसी समय वह दूसरे इनसान न पैदा कर सके। उसके लिए एक इनसान का बनाना और ख़रबों इनसानों का बना देना बराबर है।
أَلَمۡ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يُولِجُ ٱلَّيۡلَ فِي ٱلنَّهَارِ وَيُولِجُ ٱلنَّهَارَ فِي ٱلَّيۡلِ وَسَخَّرَ ٱلشَّمۡسَ وَٱلۡقَمَرَۖ كُلّٞ يَجۡرِيٓ إِلَىٰٓ أَجَلٖ مُّسَمّٗى وَأَنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِيرٞ ۝ 28
(29) क्या तुम देखते नहीं हो कि अल्लाह रात को दिन में पिरोता हुआ ले आता है और दिन को रात में? उसने सूरज और चाँद को वशीभूत कर रखा है,50 सब एक निर्धारित समय तक चले जा रहे हैं।51 और (क्या तुम नहीं जानते) कि जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है?
50.अर्थात् रात और दिन का पाबन्दी के साथ और नियमत: आना खुद यह प्रकट कर रहा है कि सूरज और चाँद पूरी तरह एक नियम में कसे हुए हैं। सूरज और चाँद का उल्लेख यहाँ सिर्फ इसलिए किया गया है कि ये दोनों ऊपरी दुनिया की वे सर्वाधिक प्रकट चीज़ें हैं जिनको इनसान पुराने समय से उपास्य बनाता चला आ रहा है। [वरना अभिप्रेत वास्तव में पूरी सृष्टि के बारे में यह कहना है कि वह अटल नियमों में कसी हुई है।]
51.अर्थात् हर चीज़ की उम्र की जो अवधि तय कर दी गई है, उसी समय तक वह चल रही है। सूरज हो या चाँद, या सृष्टि का कोई और तारा और सय्यारा (ग्रह), इनमें से कोई चीज़ भी न शुरू से है न हमेशा रहेगी। इसके उल्लेख का उद्देश्य यह बताना है कि ऐसो नश्वर और ऐसी विवश चीज़ें आखिर उपास्य कैसे हो सकती हैं।
ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدۡعُونَ مِن دُونِهِ ٱلۡبَٰطِلُ وَأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡكَبِيرُ ۝ 29
(30) यह सब कुछ इस वजह से है कि अल्लाह ही सत्य है 52 और उसे छोड़कर जिन दूसरी चीज़ों को ये लोग पुकारते हैं, वे सब असत्य हैं 53, और (इस वजह से कि) अल्लाह ही उच्च और महान है।54
52.अर्थात् वास्तविक कर्ता-धर्ता है। पैदा करने और प्रबन्ध करने के अधिकारों का असल मालिक है।
53.अर्थात् वे सब सिर्फ़ तुम्हारी कल्पनाओं के पैदा किए हुए ख़ुदा हैं। तुमने मान लिया है कि फ़ुलाँ साहब ख़ुदाई में कोई दख़ल रखते हैं और फ़ुलाँ हज़रत को मुश्किल दूर करने और ज़रूरतें पूरी करने के अधिकार प्राप्त हैं, हालांकि वास्तव में उनमें से कोई साहब भी कुछ नहीं बना सकते।
54. अर्थात् हर चीज़ से उच्च और महान, जिसके सामने सब पस्त हैं और हर चीज़ से बुजुर्ग, जिसके सामने सब छोटे हैं।
أَلَمۡ تَرَ أَنَّ ٱلۡفُلۡكَ تَجۡرِي فِي ٱلۡبَحۡرِ بِنِعۡمَتِ ٱللَّهِ لِيُرِيَكُم مِّنۡ ءَايَٰتِهِۦٓۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّكُلِّ صَبَّارٖ شَكُورٖ ۝ 30
(31) क्या तुम देखते नहीं हो कि नाव समुद्र में अल्लाह की कृपा से चलती है, ताकि वह तुम्हें अपनी कुछ निशानियाँ दिखाए?55 वास्तव में इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं हर उस आदमी के लिए जो सब्र और शुक्र करनेवाला हो।56
55.अर्थात् ऐसी निशानियाँ, जिनसे यह पता चलता है कि अधिकार बिल्कुल अल्लाह के हाथ में हैं। इनसान अपने समुद्री सफ़र के लिए, चाहे कैसे ही बेहतर प्रबन्ध कर ले, लेकिन समुद्र में जिन हौलनाक ताक़तों का उसे सामना करना पड़ता है, उनके मुक़ाबले में वह अकेले उपायों के बल-बूते पर सकुशल सफ़र नहीं कर सकता, जब तक अल्लाह की कृपा न हो। इसी तरह आदमी सुख-शान्ति की स्थिति में चाहे कैसा पक्का नास्तिक या कट्टर अनेकेश्वरवादी हो, लेकिन समुद्र के तूफ़ान में जब उसकी नाव डोलने लगती है, उस समय नास्तिक को भी मालूम हो जाता है कि अल्लाह है और मुशरिक भी जान लेता है कि अल्लाह बस एक ही है।
56.अर्थात् जिन लोगों में ये दो गुण पाए जाते हैं, वे जब इन निशानियों से वास्तविकता को पहचान जाते हैं तो हमेशा के लिए तौहीद (ऐकेश्वरवाद) का पाठ ग्रहण करके उसपर मज़बूती के साथ जम जाते हैं। पहला गुण यह कि वे सब्बार (बड़े सब्र करनेवाले) हों, उनके अन्दर स्थिरता हो, गवारा और नागवार, सख़्त और नर्म, अच्छे और बुरे तमाम हालतों में एक सही अक़ीदे (विश्वास) पर क़ायम रहें। दूसरा गुण यह कि वे शकूर (बड़े शुक्र करनेवाले) हों। नमक हराम और नाशुक्रे न हों, बल्कि नेमत का मूल्य पहचानते हों और नेमत देनेवाले के लिए शुक्र की एक स्थाई भावना अपने मन में रखते हों।
وَإِذَا غَشِيَهُم مَّوۡجٞ كَٱلظُّلَلِ دَعَوُاْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ فَلَمَّا نَجَّىٰهُمۡ إِلَى ٱلۡبَرِّ فَمِنۡهُم مُّقۡتَصِدٞۚ وَمَا يَجۡحَدُ بِـَٔايَٰتِنَآ إِلَّا كُلُّ خَتَّارٖ كَفُورٖ ۝ 31
(32) और जब (समुद्र में) इन लोगों पर एक मौज छत्रों की तरह छा जाती है तो ये अल्लाह को पुकारते हैं अपने धर्म को बिलकुल उसी के लिए विशुद्ध करके। फिर जब वह बचाकर इन्हें स्थल तक पहुँचा देता है, तो उनमें से कोई ‘इक़्तिसाद’57 बरतता है, यानी बीच का रास्ता अपनाता है और हमारी निशानियों का इनकार वही लोग करते हैं, जो ग़द्दार (बहुत वादा तोड़ने वाले) और नाशुक्रे होते हैं।58
57.इसके कई अर्थ हो सकते हैं। ‘इक़्तिसाद’ को अगर सत्यवादिता के अर्थ में लिया जाए तो इसका मतलब यह होगा कि उनमें से कम ही ऐसे निकलते हैं जो वह समय बीत जाने के बाद भी उस तौहीद पर जमे रहते हैं, जिसे उन्होंने तूफ़ान में घिर कर स्वीकारा था और यह शिक्षा सदा के लिए उनको सच्चाई पर चलनेवाला बना देती है। और अगर इक़्तिसाद का अर्थ बीच का रास्ता और सन्तुलित मार्ग लिया जाए तो इसका एक अर्थ यह होगा कि इनमें से कुछ लोग अपने शिर्क और नास्तिकता के विश्वास में उस सख़्ती के साथ क़ायम नहीं रहते, जिसपर इस अनुभव से पहले थे, और दूसरा अर्थ यह होगा कि वह समय बीत जाने के बाद इनमें से कुछ लोगों के भीतर निष्ठा की वह भावना ठंडी पड़ जाती है जो उस समय पैदा हुई थी। अधिक सही यह मालूम होता है कि अल्लाह ने यहाँ यह द्विअर्थी वाक्य इन तीनों भावों की ओर इशारा करने के लिए प्रयोग किया हो।
58.ग़द्दार (विद्रोही) वह आदमी है जो बड़ा बे-वफ़ा हो और नाशुक्रा वह है जिसपर चाहे कितनी ही नेमतों की वर्षा कर दी जाए, वह उपकार मानकर न दे। ये गुण जिन लोगों में पाए जाते हैं, वे ख़तरे का समय टल जाने के बाद निस्संकोच भाव से अपने कुफ़्र, अपनी नास्तिकता और अपने शिर्क की ओर पलट जाते हैं। [और इस सच्चाई को भुला बैठते हैं कि उन्होंने] तूफ़ान की हालत में ख़ुदा के होने और एक ही ख़ुदा के होने की कुछ निशानियाँ बाह्य जगत् में भी और स्वयं अपने अन्तःकरण में भी पाई थीं और उनका अल्लाह को पुकारना इसी सत्य को पा लेने का नतीजा था।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱتَّقُواْ رَبَّكُمۡ وَٱخۡشَوۡاْ يَوۡمٗا لَّا يَجۡزِي وَالِدٌ عَن وَلَدِهِۦ وَلَا مَوۡلُودٌ هُوَ جَازٍ عَن وَالِدِهِۦ شَيۡـًٔاۚ إِنَّ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقّٞۖ فَلَا تَغُرَّنَّكُمُ ٱلۡحَيَوٰةُ ٱلدُّنۡيَا وَلَا يَغُرَّنَّكُم بِٱللَّهِ ٱلۡغَرُورُ ۝ 32
(33) लोगो! बचो अपने रब के ग़ज़ब (प्रकोप) से और डरो उस दिन से जबकि कोई बाप अपने बेटे की ओर से बदला न देगा और न कोई बेटा ही अपने बाप की ओर से कुछ बदला देनेवाला होगा।59 वास्तव में अल्लाह का वादा60 सच्चा है। अतः यह दुनिया की ज़िन्दगी तुम्हें धोखे में न डाले61 और न धोखेबाज़ तुमको अल्लाह के मामले में धोखा देने पाए।62
59.अर्थात् दुनिया में सबसे क़रीबी ताल्लुक अगर कोई है तो वह औलाद और माँ-बाप का है, मगर वहाँ हालत यह होगी कि बेटा पकड़ा गया हो तो बाप काम न आएगा और बाप की शामत आ रही हो तो बेटे में यह कहने की हिम्मत नहीं होगी कि इसके बदले मुझे जहन्नम में भेज दिया जाए। ऐसी स्थिति में यह आशा करने की क्या गुंजाइश बची रहती है कि कोई दूसरा आदमी वहाँ किसी के कुछ काम आएगा।
60.अल्लाह के वादे से तात्पर्य यह वादा है कि क़ियामत आनेवाली है, जब हर एक को अपने कामों की जवाबदेही करनी होगी।
61.दुनिया की ज़िन्दगी ऊपरी और सतही निगाह वाले इनसानों को अलग-अलग क़िस्म की ग़लतफ़हमियों में फँसा देती है। कोई यह समझता है कि इस ज़िन्दगी के बाद कोई दूसरी ज़िन्दगी नहीं है, इसलिए जितना कुछ भी तुम्हें करना है, बस यहीं कर लो। कोई अपने धन और शक्ति और समृद्धि के नशे में चूर होकर उसे अमर समझ बैठता है। कोई नैतिक और आध्यात्मिक उद्देश्यों को सिर्फ़ भुलाकर भौतिक लाभों और स्वादों को अपना अस्ल मक़सद बना लेता है और ‘जीवन-स्तर’ की उच्चता के सिवा किसी दूसरे उद्देश्य को कोई महत्त्व नहीं देता। कोई यह विचार करता है कि सांसारिक समृद्धि ही सत्य व असत्य की वास्तविक कसौटी है। कोई इसी समृद्धि को अल्लाह के दरबार में प्रिय होने की निशानी समझता है। ये और ऐसी ही जितनी ग़लतफ़हमियाँ भी हैं, इन सबको अल्लाह ने इस आयत में दुनिया की ज़िन्दगी के धोखे’ का नाम दिया है।
62. धोखेबाज़ से तात्पर्य शैतान भी हो सकता है, कोई इनसान या इनसानों का कोई गिरोह भी हो सकता है। इनसान का अपना नफ़्स (मन) भी हो सकता है और कोई दूसरी चीज़ भी हो सकती है। जिस आदमी ने मुख्य रूप से जिस ज़रीये से भी वह अस्ल फ़रेब खाया हो, जिसके प्रभाव से उसकी ज़िन्दगी का रुख़ सही दिशा से ग़लत दिशा में मुड़ गया, वही उसके लिए ‘धोखेबाज़’ है। ‘अल्लाह के मामले में धोखा देने’ के भी अलग-अलग रूप हैं। किसी को उसका ‘धोखेबाज़’ यह विश्वास दिलाता है कि ख़ुदा सिरे से है ही नहीं। किसी को यह समझाता है कि ख़ुदा इस दुनिया को बनाकर अलग जा बैठा है और अब यह दुनिया बन्दों के हवाले है। किसी को इस भ्रम में डालता है कि ख़ुदा के कुछ प्यारे ऐसे हैं जिनके क़रीब हो जाओ तो जो कुछ भी तुम चाहो, करते रहो, बख्शि़श तुम्हारी निश्चित है। किसी को इस धोखे में डालता है कि अल्लाह तो माफ़ करनेवाला, रहम फ़रमाने वाला है, तुम गुनाह करते चले जाओ, वह बख़्शता चला जाएगा।
إِنَّ ٱللَّهَ عِندَهُۥ عِلۡمُ ٱلسَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ ٱلۡغَيۡثَ وَيَعۡلَمُ مَا فِي ٱلۡأَرۡحَامِۖ وَمَا تَدۡرِي نَفۡسٞ مَّاذَا تَكۡسِبُ غَدٗاۖ وَمَا تَدۡرِي نَفۡسُۢ بِأَيِّ أَرۡضٖ تَمُوتُۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرُۢ ۝ 33
(34) उस घड़ी का ज्ञान अल्लाह ही के पास है । वही वर्षा करता है, वही जानता है कि माँओं के पेटों में क्या पल रहा है, कोई प्राणी नहीं जानता कि कल वह क्या कमाई करनेवाला है और न किसी आदमी को यह ख़बर है कि किस भू-भाग में उसको मौत आनी है, अल्लाह ही सब कुछ जाननेवाला और ख़बर रखनेवाला है।63
63.यह आयत वास्तव में उस सवाल का जवाब है जो क़ियामत का उल्लेख और आख़िरत का वादा सुनकर मक्का के इस्लाम-विरोधी बार-बार अल्लाह के रसूल (सल्ल०) से करते थे कि आख़िर वह घड़ी कब आएगी। पहला वाक्य ‘उस घड़ी का ज्ञान अल्लाह ही के पास है’ यह अस्ल सवाल का जवाब है। इसके बाद के चारों वाक्य इसके लिए प्रमाण रूप में कहे गए हैं। प्रमाण का सार यह है कि [जिन मामलों से इनसान की सबसे क़रीबी दिलचस्पियाँ जुड़ी हुई हैं जैसे वर्षा, बीवी का हमल, अपने कल के हालात व आमाल और अपनी ज़िन्दगी के ख़ात्मे की जगह] इनसान उन के बारे में भी कोई ज्ञान नहीं रखता, फिर भला यह जानना उसके लिए कैसे संभव है कि सारी दुनिया के अंजाम का वक़्त कब आएगा। यहाँ एक बात और भी अच्छी तरह समझ लेनी जरूरी है और वह यह है कि इस आयत में गै़ब (परोक्ष) की बातों और मामलों की कोई सूची नहीं दी गई हैं बल्कि सिर्फ सामने की कुछ चीज़ें मिसाल के तौर पर पेश की गई हैं, जिनसे इनसान की निहायत गहरी और क़रीबी दिलचस्पियाँ जुड़ी हुई हैं और इनसान उनसे बे-ख़बर है। (इस मसले पर विस्तृत विवेचन के लिए देखिए सूरा-27 अन-नम्ल, टिप्पणी 83)