26. अश-शुअरा
(मक्का में उतरी-आयतें 227)
परिचय
नाम
आयत 224 वश-शुअराउ यत्तबिउहुमुल ग़ावून' अर्थात् रहे कवि (शुअरा), तो उनके पीछे बहके हुए लोग चला करते है" से उद्धृत है।
उतरने का समय
विषय-वस्तु और वर्णन-शैली से महसूस होता है और रिवायतें भी इसकी पुष्टि करती हैं कि इस सूरा के उत्तरने का समय मक्का का मध्यकाल है।
विषय और वार्ताएँ
भाषण की पृष्ठभूमि यह है कि मक्का के विधर्मी नबी (सल्ल०) के प्रचार करने और उपदेश का मुक़ाबला लगातार विरोध और इंकार से कर रहे थे और इसके लिए तरह-तरह के बहाने गढ़े चले जाते थे। नबी (सल्ल०) उन लोगों को उचित प्रमाणों के साथ उनकी धारणाओं की ग़लती और तौहीद (एकेश्वरवाद) और आख़िरत की सच्चाई समझाने की कोशिश करते-करते थके जाते हैं, मगर वे हठधर्मी के नित नए रूप अपनाते हुए न थकते थे। यही चीज़ प्यारे नबी (सल्ल०) के लिए आत्म-विदारक बनी हुई थी और इस ग़म में आपकी जान घुली जाती थी। इन परिस्थितियों में यह सूरा उतरी।
वार्ता का आरंभ इस तरह होता है कि तुम इनके पीछे अपनी जान क्यों घुलाते हो? इनके ईमान न लाने का कारण यह नहीं है कि इन्होंने कोई निशानी नहीं देखी है, बल्कि इसका कारण यह है कि ये हठधर्म हैं, समझाने से मानना नहीं चाहते।
इस प्रस्तावना के बाद आयत 191 तक जो विषय लगातार वर्णित हुआ है वह यह है कि सत्य की चाह रखनेवाले लोगों के लिए तो अल्लाह की ज़मीन पर हर ओर निशानियाँ-ही-निशानियाँ फैली हुई हैं जिन्हें देखकर वे सत्य को पहचान सकते हैं। लेकिन हठधर्मी लोग कभी किसी चीज़ को देखकर भी ईमान नहीं लाए हैं, यहाँ तक कि अल्लाह के अज़ाब ने आकर उनको पकड़ में ले लिया है। इसी संदर्भ से इतिहास की सात क़ौमों के हालात पेश किए गए हैं, जिन्होंने उसी हठधर्मी से काम लिया था जिससे मक्का के काफ़िर (इंकारी) काम ले रहे थे और इस ऐतिहासिक वर्णन के सिलसिले में कुछ बातें मन में बिठाई गई हैं।
एक यह कि निशानियाँ दो प्रकार की हैं। एक प्रकार की निशानियाँ वे हैं जो अल्लाह की ज़मीन पर हर ओर फैली हुई हैं, जिन्हें देखकर हर बुद्धिवाला व्यक्ति जाँच कर सकता है कि नबी जिस चीज़ की ओर बुला रहा है, वह सत्य है या नहीं। दूसरे प्रकार की निशानियों वे हैं जो [तबाह कर दी जानेवाली क़ौमों] ने देखी। अब यह निर्णय करना स्वयं इंकारियों का अपना काम है कि वे किस प्रकार की निशानी देखना चाहते हैं।
दूसरे यह कि हर युग में काफ़िरों (इंकारियों) की मानसिकता एक जैसी रही है। उनके तर्क एक ही तरह के थे, उनकी आपत्तियाँ एक जैसी थी और अन्तत: उनका अंजाम भी एक जैसा ही रहा। इसके विपरीत हर समय में नबियों की शिक्षा एक थी। अपने विरोधियों के मुक़ाबले में उनके प्रमाण और तर्क की शैली एक थी और इन सबके साथ अल्लाह की रहमत का मामला भी एक था। ये दोनों नमूने इतिहास में मौजूद है। विधर्मी खुद देख सकते हैं कि उनका अपना चित्र किस नमूने से मिलता है।
तीसरी बात जो बार-बार दोहराई गई है वह यह है कि अल्लाह प्रभावशाली, सामर्थ्यवान और शक्तिशाली भी है और दयावान भी। अब यह बात लोगों को स्वयं ही तय करनी चाहिए कि वे अपने आपको उसकी दया का अधिकारी बनाते हैं या क़हर (प्रकोप) का। आयत 192 से सूरा के अंत तक में इस वार्ता को समेटते हुए कहा गया है कि तुम लोग अगर निशानियाँ ही देखना चाहते हो तो आख़िर वह भयानक निशानियाँ देखने पर आग्रह क्यों करते हो जो तबाह होनेवाली क़ौमों ने देखी हैं। इस क़ुरआन को देखो जो तुम्हारी अपनी भाषा में है, मुहम्मद (सल्ल०) को देखो, उनके साथियों को देखो। क्या यह वाणी किसी शैतान या जिन्न की वाणी हो सकती है? क्या इस वाणी का पेश करनेवाला तुम्हें काहिन नज़र आता है? क्या मुहम्मद (सल्ल०) और उनके साथी तुम्हें वैसे हो नज़र आते हैं जैसे कवि और उनके जैसे लोग हुआ करते हैं? [अगर नहीं, जैसा कि ख़ुद तुम्हारे दिल गवाही दे रहे होंगे] तो फिर यह भी जान लो कि तुम ज़ुल्म कर रहे हो और ज़ालिमों का-सा अंजाम देखकर रहोगे ।
---------------------
تِلۡكَ ءَايَٰتُ ٱلۡكِتَٰبِ ٱلۡمُبِينِ 1
(2) ये खुली किताब की आयतें है।1
1. अर्थात् ये आयतें जो इस सूरा में प्रस्तुत की जा रही है, उस किताब की आयतें हैं जो अपना उद्देश्य स्पष्ट रूप से खोलकर बयान करती है, जिसे पढ़कर या सुनकर हर व्यक्ति समझ सकता है कि वह किस चीज़ की ओर बुलाती है, किस चीज़ से रोकती है, किसे सत्य कहती है और किसे असत्य बताती है। मानना या न मानना अलग बात है, मगर कोई व्यक्ति यह बहाना कभी नहीं बना सकता कि इस किताब की शिक्षा उसको समझ में नहीं आई और वह उससे यह मालूम ही न कर सका कि वह उसको क्या चीज़ छोड़ने और क्या चीज़ अपनाने की ओर बुला रही है। क़ुरआन को “अल-किताबुल मुबीन” (खुली किताब) कहने का एक दूसरा अर्थ भी है, और वह यह कि इसका ईश्वरीय किताब होना बिल्कुल स्पष्ट है। इसकी भाषा, इसकी शैली, इसके विषय और इसके प्रस्तुत किए हुए तथ्य, सब के सब साफ़-साफ़ यह प्रमाण जुटा रहे हैं कि यह जगत् के स्वामी ही की किताब है। इस दृष्टि से इसका हर वाक्य (आयत) एक निशानी और एक चमत्कार (आयत) है।
لَعَلَّكَ بَٰخِعٞ نَّفۡسَكَ أَلَّا يَكُونُواْ مُؤۡمِنِينَ 2
(3) ऐ नबी! शायद तुम इस ग़म में अपनी जान खो दोगे कि ये लोग ईमान नहीं लाते।2
2. नबी (सल्ल०) की इस हालत का उल्लेख क़ुरआन मजीद में विभिन्न स्थानों पर किया गया है। [उदाहरण के रूप में देखिए सूरा-18 (कहफ़), आयत 10, और सूरा-35 (फ़ातिर), आयत 8] इससे अन्दाज़ा होता है कि उस काल में अपनी क़ौम को गुमराही और सत्य के विरोध को देख-देखकर नबी (सल्ल०) वर्षों अपने दिन-रात किस घुटन और जानलेवा स्थिति में बिताते रहे हैं।
إِن نَّشَأۡ نُنَزِّلۡ عَلَيۡهِم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ ءَايَةٗ فَظَلَّتۡ أَعۡنَٰقُهُمۡ لَهَا خَٰضِعِينَ 3
(4) हम चाहें तो आसमान से ऐसी निशानी उतार सकते हैं कि इनकी गरदनें उसके आगे झुक जाएँ।3
3. अर्थात् कोई ऐसी निशानी उतार देना जो सारे इनकारियों को ईमान और आज्ञापालन का रवैया अपनाने पर विवश कर दे, अल्लाह के लिए कुछ भी कठिन नहीं है। अगर वह ऐसा नहीं करता तो इसका कारण यह नहीं है कि यह काम उसको सामर्थ्य से बाहर है, बल्कि इसका कारण यह है कि इस तरह का बलात् ईमान उसको अपेक्षित नहीं है। यदि ऐसा ज़ोर-ज़बरदस्ती वाला ईमान अपेक्षित होता तो निशानियाँ उतारकर मजबूर करने की क्या ज़रूरत थी। अल्लाह इनसान को उसी प्रकृति और बनावट पर पैदा कर सकता था जिसमें कुछ (इनकार, अवज्ञा और बुराई को कोई सम्भावना ही नहीं होती, बल्कि फ़रिश्तों की तरह इनसान पी पैदाइशी आज्ञाकारी होता। यही वास्तविकता है जिसको ओर अनेक अवसरों पर क़ुरआन मजीद में इशारा किया गया है। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा-10 यूनुस, टिप्पणियाँ 101,102, सूरा-11 हुद टिप्पणी 116)
فَقَدۡ كَذَّبُواْ فَسَيَأۡتِيهِمۡ أَنۢبَٰٓؤُاْ مَا كَانُواْ بِهِۦ يَسۡتَهۡزِءُونَ 5
(6) अब कि ये झुठला चुके हैं, बहुत जल्द इनको उस चीज़ की वास्तविकता (विभिन्न तरीक़ों से) मालूम हो जाएगी जिसका ये उपहास करते रहे हैं।4
4. अर्थात् जिन लोगों का हाल यह हो कि समुचित ढंग से उनको समझाने और सीधा रास्ता दिखाने की जो कोशिश भी की जाए, उसका मुक़ाबला उदासीनता और बेपरवाही से करें, और फिर बेरुख़ी से आगे बढ़कर वास्तविकता का उपहास करने पर उतर आएँ, वे सिर्फ़ इस बात के अधिकारी हैं कि उनका बुरा अंजाम उन्हें दिखा दिया जाए। इस बुरे अंजाम के सामने आने की चूंकि बहुत-सी शक्लें हैं, और अलग-अलग लोगों के सामने वह अलग-अलग शक्लों में आ सकता है और आता रहा है. इसी लिए आयत में मूल अरबी में शब्द “नबा” का बहुवचन “अंबा” प्रयुक्त हुआ है।
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ 7
(8) निस्संदेह इसमें एक निशानी है5, मगर इनमें से अधिकतर माननेवाले नहीं।
5. अर्थात् सत्य की खोज के लिए किसी को निशानी की ज़रूरत हो तो कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं, आँखें खोलकर तनिक इस धरती ही के फलने-फूलने को देख ले, उसे मालूम हो जाएगा कि सृष्टि-व्यवस्था की जो वास्तविकता (एकेश्वरवाद) नबी पेश करते हैं, वह सही है या वे दृष्टिकोण सही हैं जो मुश्कि (बहुदेववादी) या अल्लाह के इनकारी बयान करते हैं। [प्रमाणों का विवरण मालूम करने के लिए देखिए सूरा-30 (रूम), टिमणी 35]
وَإِذۡ نَادَىٰ رَبُّكَ مُوسَىٰٓ أَنِ ٱئۡتِ ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ 9
(10) इन्हें उस समय का क़िस्सा सुनाओ जबकि तुम्हारे रब ने मूसा को पुकारा,7 “ज़ालिम क़ौम के पास जा
7. ऊपर की संक्षिप्त भूमिका के बाद अब ऐतिहासिक वर्णन की शुरुआत हो रही है, जिसका आरंभ हज़रत मूसा (अलैहि०) और फ़िरऔन के क़िस्से से किया गया है। इससे मुख्य रूप से जो शिक्षा देना अभिप्रेत है, वह यह है कि – एक यह कि हज़रत मूसा (अलैहि०) को जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था वे उन परिस्थितियों के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा कठोर थीं जिनसे नबी (सल्ल.) को सामना करना पड़ रहा था, लेकिन फ़िरऔन हज़रत मूसा (अलैहि०) का कुछ न बिगाड़ सका और अन्तत: उनसे टकराकर नष्ट हो गया। इससे अल्लाह क़ुरैश के काफ़िरों को यह शिक्षा देना चाहता है कि जिसके पीछे अल्लाह का हाथ हो उसका मुक़ाबला करके कोई जीत नहीं सकता। दूसरे यह कि जो निशानियाँ हज़रत मूसा (अलैहि०) के द्वारा फ़िरऔन को दिखाई गई उनसे ज़्यादा खुली निशानियाँ और क्या हो सकती हैं, लेकिन इसपर भी जो लोग हठधर्मी में पड़े हुए थे उन्होंने नबी की सच्चाई मान करके न दी। अब तुम यह कैसे कह सकते हो कि तुम्हारा ईमान लाना वास्तव में इसपर निर्भर है कि तुम कोई चमत्कार महसूस कर लो और भौतिक प्रमाण देख लो। तीसरे यह कि इस हठधर्मी का जो अंजाम फ़िरऔन ने देखा वह कोई ऐसा अंजाम तो नहीं है जिसे देखने के लिए दूसरे लोग बेचैन हों। अपनी आँखों से अल्लाह की शक्ति की निशानियाँ देख लेने के बाद जो नहीं मानते वे फिर ऐसे ही अंजाम से दोचार होते हैं। अब क्या तुम लोग उससे शिक्षा ग्रहण करने के बजाय उसका मज़ा चखना ही पसन्द करते हो? (तुलना के लिए देखिए सूरा-7 अल-आराफ़, आयत 103-137, सूरा-10 यूनुस, आयत 75-92, सूरा-17 बनी इसराईल, आयत 101-104, सूरा-20 ता. हा०, आयत-9-79)
قَوۡمَ فِرۡعَوۡنَۚ أَلَا يَتَّقُونَ 10
(11) फ़िरऔन की क़ौम के पास8- क्या वे नहीं डरते?”9
8. यह वर्णनशैली फ़िरऔन की क़ौम के घोर अत्याचार को स्पष्ट करती है। इसका परिचय ही 'अत्याचारी क़ौम' के नाम से कराया गया है, मानो इसका असल नाम ज़ालिम क़ौम है और फ़िरऔन की क़ौम इसका अनुवाद और व्याख्या ।
9. अर्थात् ऐ मूसा! देखो कैसी अनोखी बात है कि ये लोग अपने आपको सर्वशक्तिमान समझते हुए दुनिया में ज़ुल्म व सितम ढाए जा रहे हैं और इस बात से निर्भीक हैं कि ऊपर कोई ईश्वर भी है जो उनसे पूछ-ताछ करनेवाला है।
وَيَضِيقُ صَدۡرِي وَلَا يَنطَلِقُ لِسَانِي فَأَرۡسِلۡ إِلَىٰ هَٰرُونَ 12
(13) मेरा सीना घुटता है और मेरी ज़बान नहीं चलती। आप हारून की ओर रिसालत भेजें 10
10. सूरा-20 ता० हा०, आयत-25 से 46 और सूरा-26 (क़सस) आयत 28 से 42 में इसका जो विवरण आया है, उसे इन आयतों के साथ मिलाकर देखा जाए तो मालूम होता है कि हज़रत मूसा (अलैहि०) एक तो इतने बड़े मिशन पर अकेले जाते हुए घबराते थे, दूसरे उनको यह भी एहसास था कि वह प्रवाह के साथ वार्ता नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने अल्लाह से निवेदन किया कि हज़रत हारून को उनके साथ मददगार की हैसियत से नबी बनाकर भेजा जाए, क्योंकि वे अधिक अच्छी तरह वार्ता कर सकते हैं। जब ज़रूरत पेश आएगी तो वे उनका समर्थन और पुष्टि करके उनकी पीठ मज़बूत करेंगे।
وَلَهُمۡ عَلَيَّ ذَنۢبٞ فَأَخَافُ أَن يَقۡتُلُونِ 13
(14) और मुझपर उनके यहाँ एक अपराध का आरोप भी है, इसलिए मैं डरता हूँ कि वे मुझे क़त्ल कर देंगे।11
11. यह संकेत है उस घटना की ओर जो सूरा-28 (क़सस), आयत 14 में बयान हुआ है । हज़रत मूसा (अलैहि०) ने फ़िरऔन की क़ौम के एक आदमी को एक इसराईली से लड़ते देखकर एक घूंसा मार दिया था जिससे वह मर गया। अब जो आठ-दस साल के छिपे रहने के बाद यकायकी उन्हें यह आदेश दिया गया कि तुम रिसालत का पैग़ाम लेकर उसी फ़िरऔन के दरबार में जा खड़े हो जिसके यहाँ तुम्हारे विरुद्ध क़त्ल का मुक़द्दमा पहले से मौजूद है, तो हज़रत मूसा (अलैहि०) को उचित तौर पर यह ख़तरा हुआ कि पैग़ाम सुनाने की नौबत आने से पहले ही वह तो मुझे उस हत्या के आरोप में फाँस लेगा।
قَالَ أَلَمۡ نُرَبِّكَ فِينَا وَلِيدٗا وَلَبِثۡتَ فِينَا مِنۡ عُمُرِكَ سِنِينَ 17
(18) फ़िरऔन ने कहा, “क्या हमने तुझको अपने यहाँ बच्चा-सा नहीं पाला था?14 तू ने अपनी उम्र के कई साल हमारे यहाँ गुज़ारे,
14. इससे एक संकेत इस विचार की पुष्टि में निकलता है कि यह फ़िरऔन वह फ़िरऔन न था जिसके घर में हज़रत मूसा (अलैहि०) ने परवरिश पाई थी, बल्कि यह उसका बेटा था। अगर यह वही फ़िरऔन होता तो कहता कि मैंने तुझे पाला था, लेकिन यह कहता है कि हमारे यहाँ तू रहा है और हमने तेरी परवरिश की है। (इस विषय पर विस्तृत वार्ता के लिए देखिए सूरा-7 अल-आराफ़, टिप्पणी 85,93)
قَالَ فَعَلۡتُهَآ إِذٗا وَأَنَا۠ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ 19
(20) मूसा ने उत्तर दिया, “उस वक़्त वह काम मैंने अनजाने में कर दिया था।16
16. मूल अरबी शब्द है “व अना मिनज़्ज़ाल्लीन” (मैं उस समय गुमराही में था या मैंने उस समय यह काम गुमराही की हालत में किया था।) यह शब्द गुमराही अनिवार्य रूप से “ज़लालत” का ही समानार्थी नहीं है, बल्कि अरबी भाषा में इसे अनभिज्ञता, नादानी, ख़ता, भूल-चूक आदि अर्थों में भी प्रयुक्त किया जाता है। जिस घटना का सूरा-28 क़सस में उल्लेख हुआ है, उसपर विचार करने से यहाँ ज़लालत का अर्थ ख़ता या भूल-चूक या अनजानापन ही लेना ज़्यादा सही है।
وَتِلۡكَ نِعۡمَةٞ تَمُنُّهَا عَلَيَّ أَنۡ عَبَّدتَّ بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ 21
(22) रहा तेरा उपकार जो तूने मुझपर जताया है, तो उसकी हक़ीकत यह है कि तूने बनी इसराईल को ग़ुलाम बना लिया था।”18
18. अर्थात् तेरे घर में परवरिश पाने के लिए, मैं क्यों आता अगर तूने बनी इसराईल पर ज़ुल्म न ढाया होता। तेरे ही ज़ुल्म की वजह से तो मेरी माँ ने मुझे टोकरी में डालका दरिया में बहाया था। वरना क्या मेरी परवरिश के लिए मेरा अपना घर मौजूद न था। इसलिए, परवरिश का एहसान जताना तुझे शोभा नहीं देता।
قَالَ فِرۡعَوۡنُ وَمَا رَبُّ ٱلۡعَٰلَمِينَ 22
(23) फ़िरऔन ने कहा,19 “और यह सारे जहान का रब क्या होता है”20
19. बीच में यह विवरण छोड़ दिया गया है कि हज़रत मूसा (अलैहि०) ने फ़िरऔन को वह सन्देश पहुंचाया जिसके लिए वे भेजे गए थे। इसे छोड़कर अब वह बात-चीत नक़्ल की जाती है जो इस सन्देश के पहुंचाने के बाद फ़िरऔन और मूसा के बीच हुई।
20. यह उसका प्रश्न हज़रत मूसा (अलैहि०) के इस कथन पर था कि में रब्बुल आलमीन (सारे जहानों के मालिक और आक़ा और शासक) की ओर से भेजा गया हूँ और इसलिए भेजा गया हूँ कि बनी इसराईल को मेरे साथ जाने दे। इस सन्देश का स्वरूप खुले तौर पर राजनीतिक था। इसका स्पष्ट अर्थ यह था कि हज़रत मूसा (अलैहि०) जिसके प्रतिनिधित्व के दावेदार हैं, वह सारे जहान का प्रशासन और संप्रभुत्व रखता है और फ़िरऔन को अपना अधीनस्थ समझकर उसके नाम यह फ़रमान भेज रहा है। इसपर फ़िरऔन पूछता है कि यह सारे जहानवलों का स्वामी और प्रशासक है, कौन, जो मिस्र के बादशाह को उसकी जनता के एक मामूली आदमी के हार्थो यह आदेश भेज रहा है।
قَالَ رَبُّكُمۡ وَرَبُّ ءَابَآئِكُمُ ٱلۡأَوَّلِينَ 25
(26) मूसा ने कहा, “तुम्हारा रब भी और तुम्हारे उन पूर्वजों का रब भी, जो गुज़र चुके हैं।”22
22. हज़रत मूसा (अलैहि०) का यह संबोधन फ़िरऔन के दरबारियों से था जिनसे फ़िरऔन ने कहा था कि “सुनते हो।” हज़रत मूसा ने उनसे फ़रमाया कि में सिर्फ़ उस रब का शासन और सम्प्रभुत्व मानता हूँ जो आज भी तुम्हारा और इस फ़िरऔन का रब है, और इससे पहले जो तुम्हारे और इसके बाप-दादा गुज़र चुके हैं, उन सबका रब भी है।
قَالَ رَبُّ ٱلۡمَشۡرِقِ وَٱلۡمَغۡرِبِ وَمَا بَيۡنَهُمَآۖ إِن كُنتُمۡ تَعۡقِلُونَ 27
(28) मूसा ने कहा, “पूरब और पश्चिम और जो कुछ इनके बीच है, सबका रब, अगर आप लोग कुछ बुद्धि रखते हैं।”23
23. अर्थात् मुझे तो पागल क़रार दिया जा रहा है, लेकिन आप लोग अगर बुद्धिवाले हैं तो ख़ुद सोचिए कि वास्तव में रब यह बेचारा फ़िरऔन है जो ज़मीन के एक छोटे-से हिस्से पर बादशाह बना बैठा है या वह जो पूरब व पश्चिम का मालिक और मिस्र समेत हर उस चीज़ का मालिक है, जो पूरब व पश्चिम से घिरी हुई है।
قَالَ لَئِنِ ٱتَّخَذۡتَ إِلَٰهًا غَيۡرِي لَأَجۡعَلَنَّكَ مِنَ ٱلۡمَسۡجُونِينَ 28
(29) फ़िरऔन ने कहा, “अगर तूने मेरे सिवा किसी और को उपास्य माना तो तुझे भी उन लोगों में शामिल कर दूंगा जो कै़दख़ानों में पड़े सड़ रहे हैं ।”24
24. इस बात-चीत को समझने के लिए यह बात दृष्टि में रहनी चाहिए कि आज की तरह पुराने समय में भी ‘उपास्य/ माबूद’ का अर्थ केवल धार्मिक अर्थों तक ही सीमित था अर्थात् यह कि उसे केवल पूजा-पाठ और मन्नत-चढ़ावे का हक़ दिया जाता था। रही किसी उपास्य की यह हैसियत कि वह क़ानूनी और राजनीतिक अर्थों में भी सबसे बड़ा है, तो यह चीज़ ज़मीन के अवास्तविक शासकों ने न पहले कभी मान कर दी थी, न आज वे इसे मानने के लिए तैयार है। फ़िरऔन की इस बात-चीत के पीछे यही सोच काम कर रही थी। अगर मामला सिर्फ़ पूजा-पाठ और मन्नत-चढ़ावे का होता तो उसको इससे कोई बहस न थी कि हज़रत मूसा दूसरे देवताओं को छोड़कर सिर्फ़ सारे जहानों के रब अल्लाह को इसका हक़दार समझते हैं। अगर केवल इसी अर्थ में हज़रत मूसा (अलैहि०) ने उसको इबादत में तौहीद की दावत दी होती तो उसे क्रुद्ध होने की कोई ज़रूरत न थी। जिस चीज़ ने उसे क्रुद्ध कर दिया था वह यह थी कि हज़रत मूसा (अलैहि०) ने सारे जहानों के रब के प्रतिनिधि की हैसियत से अपने आपको पेश करके उसे इस तरह एक राजनैतिक आदेश पहुंचाया कि मानो वह एक आधीन शासक है और एक सबसे बड़े शासक का सन्देशवाहक उससे उसकी आज्ञापालन की मांग कर रहा है। इस अर्थ में वह अपने ऊपर किसी की राजनैतिक और क़ानूनी श्रेष्ठता मानने के लिए तैयार न था। इसी लिए उसने साफ़-साफ़ धमकी दे दी कि मिस्र देश में तुमने मेरे सम्प्रभुत्व के सिवा किसी और की सत्ता का नाम भी लिया तो जेल की हवा खाओगे।
قَالَ أَوَلَوۡ جِئۡتُكَ بِشَيۡءٖ مُّبِينٖ 29
(30) मूसा ने कहा, “यद्यपि मैं ले आऊँ तेरे सामने एक खुली चीज़ भी”25
25. अर्थात् क्या तू इस स्थिति में भी मेरी बात मानने से इनकार कर देगा और मुझे जेल भेजेगा, जबकि मैं इस बात की एक खुली निशानी पेश कर दूं कि मैं सच में उस अल्लाह का भेजा हुआ हूँ जो तमाम दुनिया का रब, आसमानों और ज़मीन का रब और पूरब और पश्चिम का रब है?
يُرِيدُ أَن يُخۡرِجَكُم مِّنۡ أَرۡضِكُم بِسِحۡرِهِۦ فَمَاذَا تَأۡمُرُونَ 34
(35) चाहता है कि अपने जादू के ज़ोर से तुमको तुम्हारे देश से निकाल दे।29 अब बताओ, तुम क्या हुक्म देते हो” 30
29. दोनों मोजिज़ों की महानता का अन्दाज़ा इससे किया जा सकता है कि या तो एक क्षण पहले वह अपनी जनता के एक आदमी को भरे दरबार में रिसालत की बातें और बनी इसराईल की रिहाई की मांग करता देखकर पागल क़रार दे रहा था और उसे धमकी दे रहा था कि अगर तूने मेरे सिवा किसी को उपास्य माना तो जेल में सड़ा-सड़ाकर मार दूंगा, या अब इन निशानियों को देखते ही उसपर ऐसा भय छा गया कि उसे अपनी बादशाही और अपना देश छिनने का ख़तरा पैदा हो गया और घबराहट में उसे यह भी एहसास न रहा कि मैं भरे दरबार में अपने नौकरों के सामने कैसी बे-तुकी बातें कर रहा हूँ।
30. दूसरे शब्दों में मानो वह यह कह रहा था कि मेरी बुद्धि तो अब कुछ काम नहीं करती, तुम बताओ कि इस ख़तरे का मुक़ाबला मैं कैसे करूँ?
وَقِيلَ لِلنَّاسِ هَلۡ أَنتُم مُّجۡتَمِعُونَ 38
(39) और लोगों से कहा गया, “तुम जन-सभा में चलोगे?32
32. अर्थात् सिर्फ़ एलान और इश्तिहार ही को काफी नहीं समझा गया, बल्कि आदमी इस उद्देश्य के लिए छोड़े गए कि लोगों को उकसा-उकसाकर यह मुक़ाबला देखने के लिए लाएँ। इससे मालूम होता है कि भरे दरबार में जो मोजिज़े हज़रत मूसा (अलैहि०) ने दिखाए थे, उनकी ख़बर आम लोगों में फैल चुकी थी और फ़िरऔन को यह अंदेशा हो गया था कि इससे देश के रहनेवाले प्रभावित होते चले जा रहे हैं। इसलिए उसने चाहा कि अधिक से अधिक लोग जमा हों और स्वयं देख लें कि लाठी का साँप बन जाना कोई बड़ी बात नहीं है, हमारे देश का हर जादूगर यह कमाल दिखा सकता है।
قَالَ نَعَمۡ وَإِنَّكُمۡ إِذٗا لَّمِنَ ٱلۡمُقَرَّبِينَ 41
(42) उसने कहा, “हाँ, और तुम तो उस समय निकटवर्ती लोगों में शामिल हो जाओगे”।35
35. और यह था वह बड़े से बड़ा बदला जो दीन और मिल्लत के इन सेवकों को समय के बादशाह के यहाँ से मिल सकता था, अर्थात् रुपया-पैसा ही नहीं मिलेगा, दरबार में कुर्सी भी प्राप्त हो जाएगी। इस तरह फ़िरऔन और उसके जादूगरों ने पहले ही मरहले पर नबी और जादूगर का महान नैतिक अन्तर स्वयं खोल कर रख दिया।
فَأَلۡقَوۡاْ حِبَالَهُمۡ وَعِصِيَّهُمۡ وَقَالُواْ بِعِزَّةِ فِرۡعَوۡنَ إِنَّا لَنَحۡنُ ٱلۡغَٰلِبُونَ 43
(44) उन्होंने तुरन्त अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंक दीं और बोले, “फ़िरऔन के प्रताप से हम ही विजयी रहेंगे।”36
36. यहाँ इसका उल्लेख छोड़ दिया है कि हज़रत मूसा (अलैहि०) की ज़बान से यह वाक्य सुनते ही जब जादूगरों ने अपनी रस्सियां और लाठियाँ फेंकी तो यकायक वह बहुत-से सांपों के रूप में हज़रत मूसा की ओर लपकती नज़र आई [इसका विवरण सूरा-7 अल-आराफ़, आयत 176 और सूरा-20 ता० हा० आयत (66-67) में आ चुका है।
قَالَ ءَامَنتُمۡ لَهُۥ قَبۡلَ أَنۡ ءَاذَنَ لَكُمۡۖ إِنَّهُۥ لَكَبِيرُكُمُ ٱلَّذِي عَلَّمَكُمُ ٱلسِّحۡرَ فَلَسَوۡفَ تَعۡلَمُونَۚ لَأُقَطِّعَنَّ أَيۡدِيَكُمۡ وَأَرۡجُلَكُم مِّنۡ خِلَٰفٖ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمۡ أَجۡمَعِينَ 48
(49) फ़िरऔन ने कहा, “तुम मूसा की बात मान गए इससे पहले के मैं तुम्हें अनुमति देता । अवश्य ही यह तुम्हारा बड़ा है जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। 38 अच्छा अभी तुम्हें मालूम हुआ जाता है, मैं तुम्हारे हाथ-पाँव विपरीत दिशाओं से करवाऊँगा और तुम सबको सूली बढ़ा दूँगा।”39
38. यहाँ चूंकि वार्ता-क्रम की अनुरूपता से सिर्फ़ यह दिखाना है कि एक ज़िद्दी और हठधर्मी आदमी किस तरह एक खुला मोजिज़ा देखकर और उसके मोजिज़ा होने पर ख़ुद जादूगरों की गवाही सुनकर भी उसे जादू कहे जाता है। इसलिए फ़िरऔन का सिर्फ इतना ही वाक्य दोहराने को काफ़ी समझा गया है, लेकिन सूरा-7 आराफ़ (आयत 123) में सविस्तार यह बताया गया है कि फ़िरऔन ने बाज़ी हारती देखकर तुरन्त ही एक राजनीतिक षड्यंत्र की कहानी गढ़ ली।
39. यह भयानक धमकी फ़िरऔन ने अपने इस विचार को सफल करने के लिए दी थी कि जादूगर वास्तव में मूसा के साथ साज़िश करके आए हैं। उसकी दृष्टि में यह था कि इस तरह ये लोग जान बचाने के लिए साज़िश मान लेंगे और वह नाटकीय प्रभाव ख़त्म हो जाएगा जो पराजित होते ही उनके सजदे में गिरकर ईमान ले आने से उपस्थित जनों पर पड़ा था।
إِنَّا نَطۡمَعُ أَن يَغۡفِرَ لَنَا رَبُّنَا خَطَٰيَٰنَآ أَن كُنَّآ أَوَّلَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ 50
(51) और हमें आशा है कि हमारा रब हमारे गुनाह माफ़ कर देगा, क्योंकि सबसे पहले हम ईमान लाए हैं।”40
40. अर्थात् हमें अपने रब की ओर तो पलटना बहरहाल एक न एक दिन अवश्य है। अब अगर तू हत्या का देगा तो इससे ज़्यादा कुछ न होगा कि वह दिन जो कभी आना था, आज आ जाएगा। इस स्थिति में डरने का क्या प्रश्न? हमें तो उल्टी क्षमा और ग़लतियों की माफ़ी की आशा है, क्योंकि आज इस जगह सच्चाई मालूम होते ही हमने मान लेने में एक क्षण की देर भी न की और इस पूरे जनसभा में सबसे पहले आगे बढ़कर हम ईमान ले आए।
۞وَأَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنۡ أَسۡرِ بِعِبَادِيٓ إِنَّكُم مُّتَّبَعُونَ 51
(52) हमने 41 मूसा को वह्य की कि “रातों-रात मेरे बन्दों को लेकर निकल जाओ, तुम्हारा पीछा किया जाएगा।”42
41. यहाँ कई साल का इतिहास बीच में छोड़ दिया गया है जिसे सूरा-7 आराफ़, आयत 127-141 और सूरा-10 यूनुस, आयत 83-89 में बयान किया जा चुका है और जिसका एक हिस्सा आगे सूरा-40 मोमिन, आयत 23-46 और सूरा-43 अज़-जुख़रुफ़ आयत 46-56 में आ रहा है। यहाँ चूंकि पूरे वार्ताक्रम को देखते हुए केवल यह बताना अपेक्षित है कि फ़िरऔन का अंजाम अन्ततः क्या हुआ और हज़रत मूसा (अलैहि०) की दावत को किस तरह सफलता प्राप्त हुई, इसलिए फ़िरऔन और हज़रत मूसा के संघर्ष के आरंभिक मरहले का उल्लेख करने के बाद अब क़िस्सा संक्षिप्त करके उस [समय का उल्लेख किया जा रहा है जब हज़रत मूसा को मिस्र से हिजरत करने का हुक्म दिया गया।]
42. यह बात स्पष्ट रहे कि बनी इसराईल की आबादी मिस्र में किसी एक जगह इकट्ठा न थी। इसलिए हज़रत मूसा (अलैहि०) को जब आदेश दिया गया होगा कि अब तुम्हें बनी इसराईल को लेकर मिस्त्र से निकल जाना है तो उन्होंने बनी इसराईल की तमाम बस्तियों में हिदायतें भेज दी होंगी कि सब लोग अपनी-अपनी जगह हिजरत के लिए तैयार हो जाएं और एक विशेष रात तय कर दी होगी कि उस रात हर बस्ती के हिजरत करनेवाले निकल खड़े हों।
كَذَٰلِكَۖ وَأَوۡرَثۡنَٰهَا بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ 58
(59) यह तो हुआ उनके साथ और (दूसरी ओर) बनी इसराईल को हमने इन सब चीज़ों का वारिस कर दिया।45
45. कुछ टीकाकारों ने इस आयत का यह अर्थ लिया है कि जिन बाग़ों, चश्मों, ख़ज़ानों और अति उत्तम निवास-स्थलों से ये ज़ालिम लोग निकले थे, उन्हीं का वारिस अल्लाह ने बनी इसराईल को बना दिया। यह अर्थ अगर लिया जाए तो इसका अर्थ अनिवार्य रूप से यह होना चाहिए कि फ़िरऔन के डूब जाने पर बनी इसराईल फिर मिस्र वापस पहुंच गए हों, लेकिन यह चीज़ इतिहास से भी सिद्ध नहीं है और स्वयं क़ुरआन की दूसरी व्याख्याओं से भी इस आयत का यह अर्थ मेल नहीं खाता । सूरा-2 बक़रा, सूरा-5 माइद, सूरा-7 आराफ़ और सूरा-20 ताहा में जो हालात बयान किए गए हैं, उनसे स्पष्ट मालूम होता है कि फ़िरऔन के डूब जाने के बाद बनी इसराईल मिस्र की ओर पलटने के बजाय अपने गन्तव्य स्थल (फ़लस्तीन) ही की ओर आगे रवाना हो गए और फिर हज़रत दाद के ज़माने 973-1013 (ई० पू०) तक उनके इतिहास में जो घटनाएँ भी हुई वे सब उस क्षेत्र में घटित हुई, जो आज सीना प्रायद्वीप, उत्तरी अरब, जार्डन और फ़लस्तीन के नामों से जाने जाते हैं। इसलिए हमारे नज़दीक आयत का सही अर्थ यह है कि अल्लाह ने एक ओर फ़िरऔन वालों को इन नेमतों से महरूम किया और दूसरी ओर बनी इसराईल को यही नेमतें प्रदान कर दी अर्थात् दे फ़लस्तीन की धरती पर बागों, चश्मों, ख़ज़ानों और उत्तम निवासस्थलों के मालिक हुए। इसी अर्थ की पुष्टि सूरा-7 आराफ़ की आयत 136-137 करती है।
فَأَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنِ ٱضۡرِب بِّعَصَاكَ ٱلۡبَحۡرَۖ فَٱنفَلَقَ فَكَانَ كُلُّ فِرۡقٖ كَٱلطَّوۡدِ ٱلۡعَظِيمِ 62
(63) हमने मूसा को वह्य के ज़रिये आदेश दिया कि “मार अपनी लाठी समुद्र पर।” यकायक समुद्र फट गया और उसका हर टुकड़ा एक विशाल पहाड़ की तरह हो गया।47
47. जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि समुद्र हज़रत मूसा (अले०) की लाठी मारने से फटा था और यह काम एक ओर बनी इसराईल के पूरे क़ाफ़िले को गुज़ारने के लिए किया गया था और दूसरी ओर इससे अभिप्रेत फ़िरऔन की सेना को डुबो देना था, तो इससे साफ़ मालूम होता है कि लाठी को चोट लगने पर पानी बहुत ऊंचे पहाड़ों की शक्ल में खड़ा हो गया और इतनी देर तक खड़ा रहा कि हज़ारों लाखों बनी इसराईल का मुहाजिर क़ाफ़िला उसमें से भी गुज़र गया और फिर फ़िरऔन को पूरी सेना उनके बीच पहुँच भी गई। स्पष्ट है कि प्रकृति के सामान्य नियम के अनुसार जो तूफ़ानी हवाएं चलती हैं, वे चाहे कैसी ही तेज़ और प्रचण्ड हों, उनके प्रभाव से कभी समुद्र का पानी इस तरह विशाल पहाड़ों की तरह इतनी देर तक खड़ा नहीं रहा करता । इसलिए यह स्पष्ट रूप से एक मोजज़े का बयान है। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा-20 ता० हा०, टिप्पणी 53, सूरा-44 अद-दुख़ान, टिप्पणी 23)
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ 66
(67) इस घटना में एक निशानी है49, मगर इन लोगों में से अधिकतर माननेवाले नहीं हैं।
49. अर्थात् क़ुरैश के लिए इसमें यह शिक्षा है कि हठधर्म लोग खुले-खुले मोजिजे़ देखकर भी किस तरह ईमानलाने से इनकार ही किए जाते हैं और फिर उस हठधर्मी का अंजाम कैसा दर्दनाक होता है। दूसरी ओर ईमानवालों के लिए भी इसमें यह निशानी है कि कुफ़्र और उसकी ताक़तें चाहे देखने में कैसी ही छाई हुई नज़र आती हों, अन्ततः अल्लाह की मदद से सत्य का बोलबाला होता है और असत्य इस तरह पराजित होकर रहता है।
وَٱتۡلُ عَلَيۡهِمۡ نَبَأَ إِبۡرَٰهِيمَ 68
(69) और इन्हें इबराहीम का क़िस्सा सुनाओ 50,
50. यहाँ हज़रत इबराहीम (अलैहि०) की पवित्र ज़िन्दगी के उस काल का क़िस्सा बयान हुआ है जबकि नुबूवत दिए जाने के बाद शिर्क व तौहीद के मसले पर आपका अपने परिवार और अपनी क़ौम से संघर्ष शुरू हुआ था। इबराहीमी जीवन के इस काल का इतिहास विशेष रूप से जिस कारणवश क़ुरआन बार-बार सामने लाता है, वह यह है कि अरब के लोग सामान्य रूप से और क़ुरैश मुख्य रूप से यह दावा रखते थे कि इबराहीमी मत ही उनका धर्म है। अरब के मुशरिकों के अलावा ईसाइयों और यहूदियों का भी यह दावा था कि हज़रत इबराहीम उनके दीन (धर्म) के पेशवा (मार्गदर्शक) हैं । इसपर क़ुरआन जगह-जगह उन लोगों को सचेत करता है कि हज़रत इबराहीम जो दीन लेकर आए थे वह यही विशुद्ध इस्लाम जिसे पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल०) लाए हैं और जिससे आज तुम संघर्षरत हो। वे मुशरिक न थे, बल्कि उनकी सारी लडाई शिर्क ही के ख़िलाफ़ थी और इसी लड़ाई की वजह से उन्हें अपने बाप, ख़ानदान, क़ौम और वतन, सबको छोड़कर सीरिया व फ़लस्तीन और हिजाज़ में प्रवास का जीवन जीना पड़ा था। इसी तरह वे यहूदी और ईसाई भी न थे, बल्कि यहूदियत और ईसाइयत तो उनके सदियों बाद वुजूद में आई।
قَالُواْ نَعۡبُدُ أَصۡنَامٗا فَنَظَلُّ لَهَا عَٰكِفِينَ 70
(71) उन्होंने जवाब दिया, “कुछ बुत है जिनकी हम पूजा करते हैं और उन्हीं की सेवा में हम लगे रहते हैं।”52
52. इस जवाब की मूल आत्मा अपने अक़ीदे पर उनका जमाव और सन्तोष था, मानो वास्तव में वे यह कह रहे थे कि हाँ, हम भी जानते हैं कि ये लकड़ी और पत्थर के बुत हैं जिनकी हम पूजा कर रहे हैं, मगर हमारा दीन व ईमान यही है कि हम इनकी पूजा और सेवा में लगे रहें।
قَالَ أَفَرَءَيۡتُم مَّا كُنتُمۡ تَعۡبُدُونَ 74
(75-76) इसपर इब्राहीम ने कहा, “कभी तुमने (आँखें खोलकर) उन चीज़ों को देखा भी जिनकी बन्दगी तुम और तुम्हारे पिछले बाप-दादा करते रहे?54
54. अर्थात् क्या एक धर्म के सच्चे होने के लिए बस यह तर्क काफ़ी है कि वह बाप-दादा के समयों से चला आ रहा है? क्या आँखें खोलकर यह देखने की कोई ज़रूरत नहीं] कि जिनको बन्दगी हम कर रहे हैं, उनके अन्दर वास्तव में उपास्य होने का कोई (गुण) पाया भी जाता है या नहीं?
فَإِنَّهُمۡ عَدُوّٞ لِّيٓ إِلَّا رَبَّ ٱلۡعَٰلَمِينَ 76
(77) मेरे तो ये सब दुश्मन हैं 55, सिवाय एक सारे जहान के रब56 के
55. अर्थात् मैं उनकी इबादत को सिर्फ़ अलाभप्रद और अहानिकारक ही नहीं समझता, बल्कि उलटा हानिप्रद समझता हूँ, इसलिए मेरे नज़दीक तो उनको पूजना दुश्मन को पूजना है। इसके अलावा हज़रत इब्राहीम के इस कथन में उस विषय को ओर भी संकेत है जो सूरा-19 मरयम (आयत 81-82) में बताया गया है।
56. अर्थात् तमाम उन उपास्यों में से, जिनकी दुनिया में बन्दगी और पूजा की जाती है, सिर्फ एक अल्लाह सारे जहानों का रब है जिसको बन्दगी में मुझे अपनी भलाई नज़र आती है। इसके बाद हज़रत इब्राहीम कुछ वाक्यों में उन कारणों का उल्लेख करते हैं जिनके आधार पर सिर्फ सारे जहानों का रब अल्लाह ही इबादत का हक़दार है।
وَإِذَا مَرِضۡتُ فَهُوَ يَشۡفِينِ 79
(80) और जब बीमार हो जाता हूँ तो वही मुझे अच्छा करता है58,
58. यह दूसरा कारण है अल्लाह और सिर्फ़ अल्लाह के इबादत के अधिकारी होने का। उसने इनसान को पैदा करने के साथ रहनुमाई, परवरिश, निगरानी, देख-भाल, हिफ़ाज़त और ज़रूरत पूरी करने का ज़िम्मा भो स्वयं ही ले लिया है। पैदा करनेवाले को यह व्यापक रहमत और पालन-पोषण के कार्य जब हर क्षण हर पहलू से इनसान को सहारा दे रही है तो इससे बड़ी मूर्खता और इससे बढ़कर कृतघ्नता भी और कौन-सी हो सकती है कि इनसान उसको छोड़कर किसी दूसरी हस्ती के आगे नतमस्तक हो।
وَٱلَّذِيٓ أَطۡمَعُ أَن يَغۡفِرَ لِي خَطِيٓـَٔتِي يَوۡمَ ٱلدِّينِ 81
(82) और जिससे मैं उम्मीद रखता हूँ कि बदले के दिन (क़ियामत मे) वह मेरी ग़लती क्षमा कर देगा।”59
59. यह तीसरा कारण है जिसके आधार पर अल्लाह के सिवा किसी दूसरे की इबादत सही नहीं हो सकती। इनसान का मामला अपने अल्लाह के साथ सिर्फ़ इस दुनिया और इसकी ज़िन्दगी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके बाद उसका अंजाम भी सर्वथा अल्लाह ही के हाथ में है। वही अल्लाह जो उसको अस्तित्व में लाया है, अन्तत: उसे इस दुनिया से वापस बुला लेता है और कोई शक्ति दुनिया में ऐसी नहीं है कि जो इनसान की इस वापसी को रोक सके। फिर वही अल्लाह है जो अकेले इस बात का फै़सला करेगा कि कब इन तमाम इनसानों को, जो दुनिया में पैदा हुए थे, दोबारा अस्तित्व में लाए और उनसे उनके सांसारिक जीवन की जाँच-पड़ताल करे। फिर वही अकेला अल्लाह इस अदालत का क़ाज़ी (न्यायाधीश) और शासक होगा, कोई दूसरा उसके अधिकारों में नाम मात्र को भी साझीदार न होगा, सज़ा देना या माफ़ करना बिल्कुल उसके अपने ही हाथ में होगा। इन सच्चाइयों की मौजूदगी में जो आदमी अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी करता है। वह अपने बुरे अंजाम का ख़ुद सामान करता है।
رَبِّ هَبۡ لِي حُكۡمٗا وَأَلۡحِقۡنِي بِٱلصَّٰلِحِينَ 82
(83) (इसके बाद इबराहीम ने दुआ की) “ऐ मेरे रब! मुझे हुक्म प्रदान कर 60 और मुझे सालेह (नेक) लोगों के साथ मिला, 61
60. यहाँ 'हुक्म' से तात्पर्य ज्ञान, विवेक, सही समझ और निर्णय-शक्ति है।
61. अर्थात् दुनिया में मुझे नेक और भला समाज दे और आख़िरत में मेरा अंजाम नेक लोगों के साथ कर। जहाँ तक आख़िरत का ताल्लुक़ है, यह तो हर उस इनसान की दुआ होनी ही चाहिए जो मरने के बाद की ज़िन्दगी और जज़ा व सज़ा पर यक़ीन रखता हो, लेकिन दुनिया में भी एक पुनीतात्मा (पाकीज़ा रूह) की हार्दिक इच्छा यही होती है कि अल्लाह उसे एक दुराचारी, अवज्ञाकारी और भ्रष्ट समाज में ज़िन्दगी बसर करने की मुसीबत से मुक्ति दे।
وَٱغۡفِرۡ لِأَبِيٓ إِنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ 85
(86) और मेरे बाप को माफ़ कर दे कि बेशक वह गुमराह लोगों में से है।63
63. हज़रत इबराहीम (अलैहि०) अपने बाप के अत्याचार से तंग आकर जब घर से निकलने लगे तो उन्होंने विदा होते वक़्त फ़रमाया, आपको सलाम है, मैं आपके लिए अपने रब से क्षमा की दुआ करूंगा, वह मेरे प्रति अति कृपाशील है।” (सूरा-19 मरयम, आयत-47) इसी वादे के आधार पर उन्होंने क्षमा की दुआ न सिर्फ़ अपने बाप के लिए की, बल्कि एक दूसरी जगह पर बयान हुआ है कि माँ और बाप दोनों के लिए की, “ऐ हमारे रब | मुझे माफ़ कर दे और मेरे माँ बाप को भी” (सूरा-14 इबराहीम, आयत-41)। लेकिन बाद में उन्हें स्वयं यह एहसास हो गया कि हक़ का एक दुश्मन, चाहे वह एक मोमिन का बाप ही क्यों न हो, वह मग़फ़िरत की दुआ का हक़दार नहीं है । “इबराहीम का अपने बाप के लिए मग़फ़िरत की दुआ करना सिर्फ़ इस वादे की वजह से था जो उसने उससे किया था, मगर जब यह बात उसपर खुल गई कि वह ख़ुदा का दुश्मन है तो उसने उससे बेज़ारी ज़ाहिर कर दी।” (सूरा-9 अत-तौबा आयत 114)
إِلَّا مَنۡ أَتَى ٱللَّهَ بِقَلۡبٖ سَلِيمٖ 88
(89) अलावा इसके कि कोई आदमी भला चंगा-दिल लिए हुए अल्लाह के सामने हाज़िर हो।”65
65. इन दो वाक्यो के बारे में यह बात विश्वास के साथ नहीं कही जा सकती कि ये हज़रत इबराहीम (अलैहि०) को दुआ का हिस्सा है या इन्हें अल्लाह ने उनके कथन पर बढ़ाते हुए इर्शाद फ़रमाया है। अगर पहली बात मानो जाए तो इसका अर्थ यह है कि हज़रत इबराहीम अपने बाप के लिए यह दुआ करते वक्त स्वयं भी इन वास्तविकताओं का एहसास रखते थे, और दूसरी बात मान ली जाए तो इसका अर्थ यह होगा कि उनको दुआ पर टिप्पणी करते हुए अल्लाह यह फ़रमा रहा है कि क़ियामत के दिन आदमी के काम अगर कोई चीज़ आ सकता है तो वह माल और औलाद नहीं, बल्कि भला चंगा-दिल है, ऐसा दिल जो कुफ़्र व शिर्क, साफ़रमानों और अवज्ञा और उद्दंडता से पाक हो । माल और सन्तान भी भले चंगे-दिल के साथ ही लाभप्रद हो सकते हैं, इसके बिना नहीं।
وَمَآ أَضَلَّنَآ إِلَّا ٱلۡمُجۡرِمُونَ 98
(99) और वे अपराधी लोग ही थे जिन्होंने हमको इस गुमराही में डाला।69
69. यह अनुपालकों और श्रद्धालुओं की ओर से उन लोगों का सत्कार हो रहा होगा जिन्हें यही लोग दुनिया में बुज़ुर्ग, पेशवा और मार्गदर्शक मानते रहे थे। आख़िरत में जाकर जब सच्चाई खुलेगी और पीछे चलनेवालों को मालूम हो जाएगा कि आगे चलनेवाले स्वयं कहाँ आए हैं और हमें कहाँ ले आए हैं, तो यही श्रद्धालु उनको अपराधी ठहराएंगे और उनपर लानत भेजेंगे। क़ुरआन मजीद में जगह-जगह पारलौकिक जगत का यह शिक्षाप्रद चित्र खींचा गया है ताकि अंधानुकरण करनेवाले दुनिया में आँखें खोलें और किसी के पीछे चलने से पहले देख लें कि वह ठोक भी जा रहा है या नहीं। देखिए सूरा-7 आराफ़, आयत 38, सूरा-41, हा० मीम० अस-सज्दा, आयत 29, सूरा-33 अल-अहज़ाब, आयत (67-68]
وَلَا صَدِيقٍ حَمِيمٖ 100
(101) और न कोई जिगरी दोस्त।71
71. यानी कोई ऐसा भी नहीं है जो हमारा दुख बाँटनेवाला और हमारे लिए कुढ़नेवाला हो, चाहे हमको छुड़ा न सके मगर कम-से-कम उसे हमारे साथ कोई हमदर्दी ही हो। क़ुरआन मजीद यह बताता है कि आख़िरत में दोस्तियाँ सिर्फ़ ईमानवालों ही की बाक़ी रह जाएँगी। रहे गुमराह लोग, तो दुनिया में चाहे कैसे ही जिगरी दोस्त रहे हों, वहाँ पहुँचकर एक-दूसरे के जानी दुश्मन होंगे, एक-दूसरे को मुजरिम ठहराएँगे और अपनी बरबादी का ज़िम्मेदार ठहराकर हर एक-दूसरे को ज़्यादा-से-ज़्यादा सज़ा दिलवाने की कोशिश करेगा, “दोस्त उस दिन एक-दूसरे के दुश्मन होंगे सिवाय परहेज़गारों के (कि उनकी दोस्तियाँ क़ायम रहेंगी)।” (सूरा-18 ज़ुख़रुफ़, आयत-67)
فَلَوۡ أَنَّ لَنَا كَرَّةٗ فَنَكُونَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ 101
(102) काश, हमें एक बार फिर पलटने का मौक़ा मिल जाए तो हम ईमानवाले हों।”72
72. इस तमन्ना का उत्तर भी क़ुरआन में दे दिया गया है कि “अगर उन्हें पिछली ज़िन्दगी को ओर वापस भेज दिया जाए तो वही कुछ करेंगे जिससे उन्हें मना किया गया है ।” (सूरा अल-अनआम, आयत 28) [और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा-23 मोमिनून, टिप्पणी 90-92]
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ 102
(103) निस्संदेह इसमें एक बड़ी निशानी है 73, मगर इनमें से अधिकतर लोग ईमान लानेवाले नहीं ।
73. अर्थात् हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के क़िस्से में । इस क़िस्से में निशानी के दो पहलू हैं- एक यह कि अरब के मुशरिक और मुख्य रूप से क़ुरैश के लोग एक ओर तो हज़रत इबराहीम (अलैहि०) को पैरवी का दावा और उनके साथ अपने ताल्लुक़ जोड़ने पर गर्व करते हैं, मगर दूसरी ओर उसी शिर्क में पड़े हुए हैं जिसके विरुद्ध संघर्ष करते उनकी उम्र बीत गई थी। दूसरा पहलू इस क़िस्से में निशानी का यह है कि इबराहीम (अलैहि०) को क़ौम दुनिया से मिट गई और ऐसी मिटी कि इसका नाम व निशान तक बाक़ी न रहा। इसमें से अगर किसी को स्थाथित्व प्राप्त हुआ तो केवल इबराहीम और उनके मुबारक बेटों (इस्माईल और इस्हाक़) की सन्तान ही को प्राप्त हुआ।
كَذَّبَتۡ قَوۡمُ نُوحٍ ٱلۡمُرۡسَلِينَ 104
(105) नूह की क़ौम74 ने रसूलों को झुठलाया।75
74. तुलना के लिए देखिए सूरा-7 अल-आराफ, आयतें 59-64, सूरा-10 युनूस आयतें 71-73, सूरा-11 हूद आयतें 25-48, सूरा-17 बनी इसराईल आयत 3, सूरा-21 अल-अंबिया आयतें 76-77, सूरा-23 अल-मोमिनून आयतें 23-30,सूरा 25 अल-फु़रक़ान आयत 37
75. यद्यपि उन्होंने एक ही रसूल को झुठलाया था, लेकिन चूंकि रसूल का झुठलाना वास्तव में उस दावत और सन्देश का झुठलाना है जिसे लेकर वह अल्लाह की ओर से आता है, इसलिए जो आदमी या गिरोह किसी एक रसूल का भी इनकार कर दे, वह अल्लाह की निगाह में तमाम रसूलों का इनकारी है।
إِذۡ قَالَ لَهُمۡ أَخُوهُمۡ نُوحٌ أَلَا تَتَّقُونَ 105
(106) याद करो जबकि उनके भाई नूह ने उनसे कहा था, “क्या तुम डरते नहीं हो?76
76. हज़रत नूह (अलैहि०) के इस कथन का अर्थ सिर्फ़ डर नहीं, बल्कि अल्लाह का डर है। और अधिक विस्तार कि लिए देखिए, सूरा -23 अल-मोमिनून, टिप्पणी 25)
وَمَآ أَسۡـَٔلُكُمۡ عَلَيۡهِ مِنۡ أَجۡرٍۖ إِنۡ أَجۡرِيَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ 108
(109) मैं इस काम पर तुमसे कोई बदला नहीं चाहता हूँ। मेरा बदला तो जहान के रब के ज़िम्मे है।79
79. यह अपनी सत्यता पर हज़रत नूह (अलैहि०) का दूसरा तर्क है। इसका अर्थ यह है कि मैं एक निः स्वार्थ आदमी हूँ। तुम किसी ऐसी निजी फ़ायदे की निशानदेही नहीं कर सकते जो इस काम से मुझे प्राप्त हो रहा हो या जिसके प्राप्त करने की मैं कोशिश कर रहा हूँ। इस निःस्वार्थपूर्ण ढंग से बिना किसी निजी लाभ के जब मैं सत्य की इस दावत के काम में रात व दिन अपनी जान खपा रहा हूँ तो तुम्हें समझना चाहिए कि मैं इस काम में निष्ठावान हूँ, कोई मनोकामना इसकी प्रेरक नहीं कि उसके लिए मैं झूठ गढ़कर लोगों को धोखा दूं। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा-23 अल-मोमिनून, टिप्पणी 70)
۞قَالُوٓاْ أَنُؤۡمِنُ لَكَ وَٱتَّبَعَكَ ٱلۡأَرۡذَلُونَ 110
(111) उन्होंने उत्तर दिया, “क्या हम तुझे मान लें, हालांकि तेरी पैरवी अत्यन्त नीच लोगों ने अपनाई है?"81
81. ये लोग जिन्होंने हज़रत नूह (अलैहि०) को सत्य के आह्वान का यह उत्तर दिया, उनकी क़ौम के सरदार, प्रधान और गणमान्य लोग थे, जैसा कि [सूरा-11 हूद, आयत 27 में स्पष्ट रूप से फ़रमाया गया है, इससे मालूम होता है कि हज़रत नूह (अलैहि०) पर ईमान लानेवाले अधिकतर ग़रीब लोग, छोटे-छोटे पेशेवर लोग या ऐसे नौजवान थे जिनकी क़ौम में कोई हैसियत न थी। ठीक यही बात क़ुरैश के विधर्मी नबी (सल्ल०) के बारे में कहते थे कि इनकी पैरवी करनेवाले या तो दास और ग़रीब लोग हैं या कुछ नादान लड़के । क़ौम के बड़े और प्रतिष्ठित लोगों में से कोई भी इनके साथ नहीं है, मानो इन लोगों की सोच यह थी कि सत्य केवल वह है जिसे क़ौम के बड़े लोग सत्य मानें, क्योंकि वही बुद्धि और समझ-बूझ रखते हैं। रहे छोटे लोग, तो उनका छोटा होना ही इस बात की दलील है कि वे बुद्धिहीन और राय के कमज़ोर हैं, इसलिए उनका किसी बात का मान लेना और बड़े लोगों का रद्द कर देना स्पष्ट रूप से यह अर्थ रखता है कि वह एक महत्वहीन बात है।
إِنۡ حِسَابُهُمۡ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّيۖ لَوۡ تَشۡعُرُونَ 112
(113) उनका हिसाब तो मेरे रब के ज़िम्मे है। काश, तुम कुछ समझ से काम लो!82
82. यह उनकी आपत्ति का पहला उत्तर है। (हज़रत नूह (अलैहि०) इस उत्तर में फ़रमाते हैं। कि मेरे पास यह जानने का कोई साधन नहीं कि जो आदमी मेरे पास आकर ईमान लाता है और एक अक़ीदा अपना करके उसके अनुसार कर्म करने लगता है, उसके इस कर्म की तह में क्या-क्या प्रेरक तत्त्व कार्य कर रहे हैं और वे कितना महत्व का मूल्य रखते हैं। इन चीज़ों का देखना और इनका हिसाब लगाना तो अल्लाह का काम है, मेरा और तुम्हारा काम नहीं है।
إِنۡ أَنَا۠ إِلَّا نَذِيرٞ مُّبِينٞ 114
(115) मैं तो बस एक साफ़ साफ़ सचेत कर देनेवाला आदमी हूँ।''83
83. यह उनकी आपत्ति का दूसरा उत्तर है। उनकी आपत्ति में यह बात भी छिपी हुई थी कि ईमान लानेवालों के गिरोह में चूंकि हमारे समाज के निचले वर्ग लोग शामिल हैं, इसलिए ऊँचे वर्गों में से कोई आदमी ज़ुमरे (दल) शामिल होना गवारा नहीं कर सकता। हज़रत नूह (अलैहि०) इसका उत्तर यह देते हैं कि मैं आख़िर यह अनुचित तरीक़ा कैसे अपना सकता हूँ कि जो लोग मेरी बात नहीं मानते उनके तो पीछे फिरता रहूँ और जो मेरी बात मानते हैं उन्हें धक्के देकर निकाल हूँ। मेरी हैसियत तो एक ऐसे बे-लाग आदमी की है जिसने एलानिया खड़े होकर पुकार दिया है कि जिस तरीक़े पर तुम लोग चल रहे हो, यह असत्य है और इसपर चलने का अंजाम विनाश है और जिस तरीके़ की ओर मैं रहनुमाई कर रहा हूँ उसी में तुम सबकी मुक्ति है। अब जिस जी चाहे मेरी इस चेतावनी को स्वीकार करके सीधे रास्ते पर आए और जिसका जी चाहे आँखें बन्द करके विनाश की राह चलता रहे । ठीक यही मामला इन आयतों के उतरने के समय में नबी (सल्ल०) और मक्का के विधर्मियों के बीच चल रहा था। [देखिए सूरा-6 अल-अनआम, आयत 52, सूरा-80 अ-ब-स, आयत 5-13] और इसी को निगाह में रखने से यह समझ में आ सकता है कि हज़रत नूह (अलैहि०) और उनकी क़ौम के सरदारों की यह बातचीत यहाँ क्यों सुनाई जा रही है।
قَالَ رَبِّ إِنَّ قَوۡمِي كَذَّبُونِ 116
(117) नूह ने दुआ की, “ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम ने मुझे झुठला दिया।85
85. अर्थात् आख़िरी और पूरे तौर पर झुठला दिया है जिसके बाद अब किसी तस्दीक़ (पुष्टि) और ईमान की आशा बाक़ी नहीं रही। प्रत्यक्ष वार्ता से कोई आदमी इस सन्देह में न पड़े कि बस पैग़म्बर और क़ौम के सरदारों के बीच ऊपर की वार्ता हुई और उनकी ओर से प्रथमतः झुठला देने के बाद पैग़म्बर ने अल्लाह के समक्ष रिपोर्ट पेश कर दी कि ये मेरी नुबूवत नहीं मानते। अब आप मेरे और इनके मुक़द्दमे का फ़ैसला फ़रमा दें। क़ुरआन मजीद में विभिन्न जगहों पर उस लम्बे संघर्ष का उल्लेख किया गया है जो हज़रत नूह (अलैहि०) की दावत और उनकी क़ौम के इनकार पर जमे रहने के अन्तराल सदियों चलता रहा। [देखिए सूरा-29 अल अन-कबूत, आयत 14, सूरा-71 नूह, आयत 27.सूरा-11 हूद, आयत 36]
كَذَّبَتۡ عَادٌ ٱلۡمُرۡسَلِينَ 122
(123) आद ने रसूलों को झुठलाया।88
88. तुलना के लिए देखिए सूरा-7 अल-आराफ़, आयतें 65-72, सूरा-11 हूद, 50-60 । साथ ही इस क़िस्से के विवरण के लिए क़ुरआन के निम्नलिखित स्थान भी निगाह में रहें :सूरा-41 हा० मीम० अस-सजदा, आयतें 13-16, सूरा-46 अल-अहकाफ़, 21-26, सूरा-91 अज़-ज़ारियात, 41-45, सूरा-54 अल-क़मर, 18-22, सूरा-69 अल-हाक़्क़ा, 4-8, सूरा-89 अल-फ़ज़्र, 6-8
إِذۡ قَالَ لَهُمۡ أَخُوهُمۡ هُودٌ أَلَا تَتَّقُونَ 123
(124) याद करो जबकि उनके भाई हूद ने उनसे कहा था,89 "क्या तुम डरते नहीं ?
89. हज़रत हूद (अलैहि०) के इस भाषण को समझने के लिए अनिवार्य है कि इस क़ौम के बारे में वे जानकारियाँ हमारी दृष्टि में रहें जो क़ुरआन मजीद ने विभिन्न स्थानों पर हमें उपलब्ध कराई हैं। उनमें बताया गया है कि- नूह (अलैहि०) की क़ौम के विनाश के बाद दुनिया में जिस क़ौम को उत्थान प्रदान किया गया वह यही थी, (सूरा-7 अल-आराफ़, आयत 69)। शारीरिक दृष्टि से ये बड़े स्वस्थ और शक्तिशाली लोग थे, (सूरा-7 अल-आराफ़ आयत 69)। अपने समय में यह बे-मिसाल क़ौम थी। कोई दूसरी क़ौम इसकी टक्कर की न थी, (सूरा-89 अल-फ़ज, आयत 8)। इसकी सभ्यता एवं संस्कृति बड़ी शानदार थी। ऊँचे-ऊँचे स्तभों की ऊंची ऊंची भव्य हमारते बनाना इसकी यह विशेषता थी जिसके लिए वह उस वक्त की दुनिया में मशहूर थी (सूरा-8) अल-फ़ज्र, आयत 6-7)। इस भौतिक उन्नति और शारीरिक शक्ति ने उनको अत्यन्त घमंडी बना दिया था और उन्हें अपनी शक्ति का बड़ा भांड या (पुरावा हा० मीम अस-सन्दा, आयत 15)। उनकी राजनैतिक व्यवस्था कुछ बड़े बड़े प्रमुखशाली दमनकारियों के हाथ में थी जिनके आगे कोई दम न मार सकता था (हूद आयत 59) । धार्मिक दृष्टि से ये अल्लाह की हस्ती के इनकारी न थे, बल्कि शिर्क में पड़े, हुए थे। उनको इस बात से इनकार था कि बन्दगी सिर्फ अल्लाह की होनी चाहिए, (सूरा अल-आराफ़, आयत 20)। इन विशेषताओं को नज़र में रखने से हजरत इद (अलैहि०) का यह दावती भाषण अच्छी तरह समझ में आ सकता है।
وَإِذَا بَطَشۡتُم بَطَشۡتُمۡ جَبَّارِينَ 129
(130) और जब किसी पर हाथ डालते ही, अत्यंत निर्दयी बनकर डालते हो।92
92. अर्थात् अपना जीवन स्तर ऊंचा करने में तो तुम इतना आगे बढ़ गए हो, लेकिन तुम्हारी मानवता का स्तर इतना गिरा हुआ है कि कमज़ोरों के लिए तुम्हारे दिलों में कोई दया नहीं, आस पास की कमज़ोर क़ौमें हों या स्वयं अपने देश के निम्न वर्ग, सब तुम्हारे दमन और अत्याचार की चक्की में पिस रहे हैं।
إِنۡ هَٰذَآ إِلَّا خُلُقُ ٱلۡأَوَّلِينَ 136
(137) ये बातें तो यूं ही होती चली आई है।93
93. इसके दो अर्थ हो सकते हैं- एक यह कि जो कुछ हम कर रहे हैं यह आज कोई नई चीज़ नहीं है, सदियों से हमारे बाप-दादा यही कुछ करते चले आ रहे हैं। यही उनका दीन (धर्म) था और यही उनकी संस्कृति थी, और ऐसे ही उनके आचरण और व्यवहार थे। कौन-सी आफत उनपर टूट पड़ी थी कि अब हम उसके टूट पड़ने का डर रखें। ज़िन्दगी के इस तरीक़े में अगर कोई ख़राबी होती तो पहले ही वह अज़ाब आ चुका होता जिससे तुम डराते हो । दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि जो बातें तुम कर रहे हो, ऐसी ही बातें पहले भी बहुत से धार्मिक, उन्मादी और नैतिकता की बातें बधारनेवाले करते रहे हैं, मगर दुनिया की गाड़ी जिस तरह चल रही थी उसी तरह चली जा रही है। तुम जैसे लोगों की बातें न मानने का यह नतीजा कभी न निकला कि यह गाड़ी किसी सदमे से दो-चार होकर उलट गई होती।
كَذَّبَتۡ ثَمُودُ ٱلۡمُرۡسَلِينَ 140
(141) समूद ने रसूलों को झुठलाया।95
95. तुलना के लिए देखिए सूरा-7 अल-आराफ़, आयत 73-79, सूरा-11 हूद,61-68, सूरा-15 अल-हिज्र, 80-84, सूरा-17 बनी इसराईल 59 । इस क़ौम के बारे में कुरआन में विभिन्न स्थानों पर जो बातें कही गई हैं उनसे मालूम होता है कि आद के बाद जो कौम उन्नति के शिखर पर पहुंची थी, वह यही थी। “तुम्हें आद के बाद खलीफ़ा बनाया” (सूरा-7 अल-आराफ़ : 74) मगर उसके सांस्कृतिक विकास ने भी आख़िरकार वही शक्ल अपना ली, जो आद की तरक्क़ी ने की थी अर्थात् जीवन-स्तर को ऊँचे से ऊँचा और मानवता-स्तर घटिया से घटिया होता चला गया। एक ओर मैदानी इलाकों में भव्य महल और पहाड़ों में एलोरा और अजनता की गुफाओं जैसे मकान बन रहे थे, दूसरी ओर समाज में शिर्क और बुतपरस्ती का ज़ोर था और ज़मीन जुल्म व सितम से भरी जा रही थी। क़ौम के निकृष्ट उपद्रवी लोग उसके लीडर बने हुए थे, उच्च वर्ग अपनी बड़ाई के घमंड में मस्त थे। हज़रत सालेह (अलैहि०) के सत्य-आह्वान ने अगर अपील किया तो निचले वर्ग के कमजोर लोगों को किया । उच्च वर्गों ने इसे मानने से सिर्फ़ इसलिए इनकार कर दिया कि “जिस चीज़ पर तुम ईमान लाए हो उसको हम नहीं मान सकते।”
إِنِّي لَكُمۡ رَسُولٌ أَمِينٞ 142
(143) मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ96,
96. हज़रत सालेह की ईमानदारी एवं सच्चाई और असाधारण योग्यता की गवाही स्वयं उस क़ौम के लोगों के मुख से क़ुरआन इन शब्दों में दोहराता है- “उन्होंने कहा, ऐ सालेह। इससे पहले तो तुम हमारे बीच ऐसे आदमी थे जिससे हमारी बड़ी आशाएँ सम्बद्ध थी।” (सूरा-11 हूद, आयत 62)
وَتَنۡحِتُونَ مِنَ ٱلۡجِبَالِ بُيُوتٗا فَٰرِهِينَ 148
(149) तुम पहाड़ खोद-खोद कर गर्व से उनमें इमारतें बनाते हो।99
99. जिस तरह आद की संस्कृति की सबसे नुमायाँ विशेषता यह थी कि वे ऊँची-ऊँची स्तंभोंवाली इमारतें बनाते थे, इसी तरह समूद को संस्कृति को सबसे अधिक नुमायाँ विशेषता यह थी कि वे पहाड़ों को कॉट-छाँटकर उनके अन्दर इमारतें बनाते थे। (देखिए सूरा-87 फ़ज़, आयत 9) इसके अतिरिक्त क़ुरआन में यह भी बताया गया है कि वे अपने यहाँ मैदानी इलाक़ों में भी बड़े-बड़े महल बनाया करते थे। (सूरा-7 अल-आराफ़, आयत 74) और इन निर्माणों का वास्तविक उद्देश्य क्या था? क़ुरआन इसपर शब्द 'फ़ारिहीन' से रौशनी डालता है, अर्थात् यह सब कुछ अपनी बड़ाई, अपने धन और शक्ति और अपने कला-कौशल के प्रदर्शन के लिए था, कोई वास्तविक ज़रूरत उनके लिए प्रेरक न थी। समूद के इन भवनों में से कुछ अब भी बाक़ी हैं जिन्हें 1950 ई. के दिसम्बर में मैंने स्वयं देखा है । यह जगह मदीना तैयिबा और तबूक के बीच हिजाज़ के प्रसिद्ध स्थान 'अल-उला' (जिसे नबी सल्ल. के समय में “वादीउल-क़ुरा” कहा जाता था) से कुछ मील की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है। आज भी इस जगह को वहाँ के स्थानीय लोग अल-हिज्र और मदाइने-सालेह के नामों ही से याद करते हैं। इस क्षेत्र में जब हम दाख़िल हुए तो अल-उला के क़रीब पहुंचते ही हर ओर हमें ऐसे पहाड़ नज़र आए जो बिल्कुल खोल-खोल हो गए हैं। साफ़ महसूस होता था कि किसी सख्त हौलनाक भूकम्प ने उन्हें ज़मीन की सतह से चोटी तक झकझोरकर टुकड़े-टुकड़े कर रखा है। इसी तरह के पहाड़ हमें पूरब की ओर अल-उला से खैबर जाते हुए लगभग 50 मील तक और उत्तर की ओर जार्डन राज्य की सीमाओं में तीस-चालीस मील अन्दर तक मिलते चले गए। इसका अर्थ यह है तीन-चार सौ मील लम्बा और सौ मील चौड़ा एक क्षेत्र था, जिसे एक भारी भूकम्प ने हिलाकर रख दिया था।
ٱلَّذِينَ يُفۡسِدُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَا يُصۡلِحُونَ 151
(152) जो ज़मीन में बिगाड़ पैदा करते हैं और कोई सुधार नहीं करते ।"100
100. अर्थात् अपने सरदारों, धनवानों और उन नेताओं और शासकों का अनुपालन छोड़ दो, ये सीमा का उल्लंघन करनेवाले लोग हैं। नैतिकता की सारी सीमाएँ लाँधकर बेनकेल ऊँट बन चुके हैं। इनके हाथों से कोई सुधार नहीं हो सकता। तुम्हारे लिए सफलता की कोई शक्ल अगर है तो केवल यह कि अपने भीतर ईशभय पैदा करो और उपद्रवियों का अनुपालन छोड़ कर मेरा आज्ञापालन करो, क्योंकि मैं अल्लाह का रसूल हूँ।-यह था वह संक्षिप्त घोषणा पत्र जो हज़रत सालेह (अलैहि०) ने अपनी क़ौम के सामने पेश किया। इसमें केवल धर्म प्रचार ही न था, सांस्कृतिक व नैतिक सुधार और राजनैतिक क्रान्ति का आह्वान भी साथ-साथ मौजूद था।
قَالَ هَٰذِهِۦ نَاقَةٞ لَّهَا شِرۡبٞ وَلَكُمۡ شِرۡبُ يَوۡمٖ مَّعۡلُومٖ 154
(155) सालेह ने कहा, "यह ऊँटनी है।103 एक दिन इसके पीने का है और एक दिन तुम सबके पानी लेने का।104
103. मोजिज़े की माँग पर ऊँटनी पेश करने से स्पष्ट होता है कि वह सिर्फ़ एक आम ऊँटनी न थी, बल्कि ज़रूर उसकी पैदाइश और उसके ज़ाहिर होने में या उसकी संरचना में कोई ऐसी चीज़ थी जिसे मोजिज़े की माँग करने पर पेश करना उचित होता। यह बात यहाँ तो सिर्फ़ वार्ता-सन्दर्भ ही की अपेक्षा से समझ में आती है, लेकिन दूसरी जगहों पर क़ुरआन में स्पष्टतः इस ऊंटनी के अस्तित्त्व को मोजिज़ा कहा गया है। सूरा-7 आराफ़ और सूरा-11 हूद में फ़रमाया गया, “यह अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए निशानी के तौर पर है।”
104. अर्थात् एक दिन अकेले यह ऊँटनी तुम्हारे चश्मों और कुओं से पानी पिएगी और एक दिन सारी क़ौम के आदमी और जानवर पिएँगे। ख़बरदार! इसकी बारी के दिन कोई आदमी पानी लेने की जगह फटकने न पाए । यह चुनौती अपने आप में बड़ी कड़ी थी, लेकिन अरब की विशेष परिस्थितियों में तो किसी क़ौम के लिए इससे बढ़कर कोई दूसरी चुनौती हो नहीं सकती थी। वहाँ तो पानी ही के मसले पर ख़ून-ख़राबे हो जाते थे। लेकिन हज़रत सालेह ने अकेले उठकर यह चुनौती अपनी क़ौम को दी और क़ौम ने न सिर्फ़ यह कि इसको कान लटकाकर (सौर से) सुना, बल्कि बहुत दिनों तक डर के मारे वह इसपर अमल भी करती रही।
فَعَقَرُوهَا فَأَصۡبَحُواْ نَٰدِمِينَ 156
(157) मगर उन्होंने उसकी कूचें काट दीं 105 और अन्ततः पछताते रह गए,
105. यह अर्थ नहीं है कि जिस समय उन्होंने हज़रत सालेह से यह चुनौती सुनी उसी समय वे ऊँटनी पर पिल पड़े और उसकी कूचें काट डालीं, बल्कि एक लम्बे समय तक यह ऊँटनी सारी क़ौम के लिए एक समस्या बनी रही, लोग इसपर दिलों में खौलते रहे, मश्विरे होते रहे और आख़िरकार एक मनचले ने इस काम का बीड़ा उठाया कि वह क़ौम को इस बला से नजात दिलाएगा । (देखिए मूग 54 अल-कमर, आयत 29 और सूरा-91 शम्स, आयत 12)
فَأَخَذَهُمُ ٱلۡعَذَابُۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ 157
(158) अज़ाब ने उन्हें आ लिया।106 निश्चय ही इसमें एक निशानी है, मगर इनमें से अधिकतर माननेवाले नहीं,
106. क़ुरआन में दूसरी जगहों पर इस अज़ाब का जो विवरण आया है, वह यह है कि जब ऊंटनी मार डाली गई तो हज़रत सालेह (अलैहि०) ने एलान किया, तीन दिन अपने घरों में मजे़ कर लो।” (सूरा-11 सूद, आयत 65) इस नोटिस की मुद्दत ख़त्म होने पर रात को पिछले पहर सुबह के क़रीब एक ज़बरदस्त धमाका हुआ और उसके साथ ऐसा भयानक भूकम्प आया जिसने देखते ही देखते पूरी क़ौम को तबाह करके रख दिया। (और व्याख्या के लिए देखिए सूरा-54, अल-क़मर आयत-31, सूरा-7, अल-आराफ़ आयत 78, सूरा-15 अल-हिज,आयत 83-84)
كَذَّبَتۡ قَوۡمُ لُوطٍ ٱلۡمُرۡسَلِينَ 159
(160) लूत की क़ौम ने रसूलों को झुठलाया। 107
107. तुलना के लिए देखिए सूरा-7 अल-आराफ, आयत 80-84, सूरा-।। हूद, 74.83, सूरा-15 शल-हिज्र, 57-77, सूरा-21 अल-अंबिया, 71-75, सूरा-27 अन नम्ल, 54-58, सूरा-29) अल-अनकबूत, 28-35, सूरा-37 अस्साफ़्फ़ात 133-138,सूरा-54 अल-क़मर 33-39।
وَتَذَرُونَ مَا خَلَقَ لَكُمۡ رَبُّكُم مِّنۡ أَزۡوَٰجِكُمۚ بَلۡ أَنتُمۡ قَوۡمٌ عَادُونَ 165
(166) और तुम्हारी बीवियों में तुम्हारे रब ने तुम्हारे लिए जो कुछ पैदा किया है उसे छोड़ देते हो?109 बल्कि तुम लोग तो सीमा ही पार कर गए हो।”110
109. इसके भी दो अर्थ हो सकते हैं- एक यह कि इस इच्छा को पूरा करने के लिए जो बीवियाँ अल्लाह ने पैदा की थीं, उन्हें छोड़कर तुम अप्राकृतिक साधन अर्थात् मर्दों को इस काम के लिए इस्तेमाल करते हो। दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि खु़द इन बीवियों के अन्दर अल्लाह ने इस इच्छा को पूरा करने का जो प्राकृतिक रास्ता रखा था उसे छोड़कर तुम अप्राकृतिक रास्ता अपनाते हो।
110. अर्थात् तुम्हारा सिर्फ़ यही एक अपराध नहीं है, तुम्हारी ज़िन्दगी का तो पूरा तर्ज़ ही हद से ज़्यादा बिगड़ चुका है। इस आम बिगाड़ की दशा [जानने के लिए देखिए सूरा-27 अन-नम्ल, आयत 54, सूरा-29 अल-अनकबूत, आयत 29, सूरा-15 अल-हिज्र, टिप्पणी 39]
قَالُواْ لَئِن لَّمۡ تَنتَهِ يَٰلُوطُ لَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡمُخۡرَجِينَ 166
(167) उन्होंने कहा, “ऐ तूत! अगर तू इन बातों से बाज़ न आया तो जो लोग हमारी बस्तियों से निकाले गए हैं, उनमें तू भी शामिल होकर रहेगा।”111
111. अर्थात् तुझे मालूम है कि इससे पहले जिसने भी हमारे विरुद्ध ज़बान खोली है, या हमारी हरकतों का विरोध किया है या हमारी इच्छा के विरुद्ध काम किया है, वह हमारी बस्तियों से निकाला गया है। अब अगर तू ये बातें करेगा तो तेरा अंजाम भी यही होगा।
وَأَمۡطَرۡنَا عَلَيۡهِم مَّطَرٗاۖ فَسَآءَ مَطَرُ ٱلۡمُنذَرِينَ 172
(173) और उनपर बरसाई एक बरसात, बड़ी ही बुरी बारिश थी जो उन डराए जानेवालों पर आई।114
114. इस बारिश से तात्पर्य पानी की बारिश नहीं, बल्कि पत्थरों की बारिश है। क़ुरआन में दूसरी जगहों पर इस अज़ाब का जो विवरण आया है वह यह है कि हज़रत लूत (अलैहि.) जब रात के पिछले पहर अपने बाल बच्चों को लेकर निकल गए तो सुबह पौ फटते ही यकायक एक ज़ोर का धमाका हुआ, एक भयानक भूकम्प ने उनकी बस्तियों को तलपट करके रख दिया। एक ज़बरदस्त ज्वालामुखी फटने से उनपर पकी हुई मिट्टी के पत्थर बरसाए गए। और एक तूफ़ानी हवा से भी उनपर पथराव किया गया। बाइबल के उल्लेखों, प्राचीन यूनानी और लेटिन लेखों, आधुनिक युग की भूमि संबंधी खोजों और पुरातात्विक सर्वेक्षणों से इस अज़ाब के विवरणों पर जो रौशनी पड़ती उसका सार यह है : मृत-सागर (Dead Sea) के दक्षिण और पूरब में जो क्षेत्र आज अत्यंत वीरान और सुनसान हालत में पड़ा हुआ है, उसमें बहुतायत के साथ प्राचीन बस्तियों के खंडहरों की मौजूदगी पता देती है कि यह किसी जमाने में अत्यधिक आबाद क्षेत्र रहा था। पुरातत्त्व विशेषज्ञों का अंदाजा है कि इस क्षेत्र की आबादी और समृद्धि का युग सन् 2300 ई. पू. से 1900 ई० पू० तक रहा है और हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के बारे में इतिहासकारों का अनुमान यह है कि वह दो हज़ार वर्ष ई० पू० के लगभग समय में गुजरे हैं । इस दृष्टि से पुरातत्त्व की गवाही इस बात की पुष्टि करती है कि यह क्षेत्र हजरत इबराहीम और उनके भतीजे हजरत लूत (अलैहि०) के समय में ही बर्बाद हुआ है। इस क्षेत्र का सबसे अधिक आबाद और हरा-भरा हिस्सा वह था जिसे बाइबिल में “मिहीम की घाटी” कहा गया है। वर्तमान युग के अन्वेषकों की आम राय यह है कि दो हज़ार वर्ष ईसा पूर्व के लगभग समय में एक ज़बरदस्त भूकम्प की वजह से यह पाटी फटकर दब गई और मृत सागर का पानी इसके ऊपर छा गया। आज भी यह सागर का सबसे अधिक उथला हिस्सा है। इस समय तक (दक्षिणी) तट के साथ-साथ पानी में डूबे हुए जंगल साफ़ दिखाई देते हैं, बल्कि यह सन्देह भी किया जाता है कि पानी में कुछ इमारतें डूबी हुई हैं। बाइबिल और प्राचीन यूनानी और लेटिन लेखों से मालूम होता है कि इस क्षेत्र में जगह-जगह पेट्रोल और स्फाल्ट (Asphalt) के गढ़े थे और किसी-किसी जगह ज़मीन से ज्वलनशील गैस भी निकलती थी। अब भी वहाँ भूमिगत पेट्रोल और गैसों का पता चलता है। भूगोलीय खोजों से अनुमान किया गया है कि भूकम्प के भारी झटकों के साथ पेट्रोल, गैस और स्फाल्ट ज़मीन से निकलकर भड़क उठे और सारा क्षेत्र भक से उड़ गया।
كَذَّبَ أَصۡحَٰبُ لۡـَٔيۡكَةِ ٱلۡمُرۡسَلِينَ 175
(176) ऐकावालों ने रसूलों को झुठलाया।115
115. 'ऐकावालों' का संक्षिप्त उल्लेख सूरा-15 अल-हिज, आयत 78-84 में पहले गुज़र चुका है। यहाँ इसका विवरण दिया जा रहा है। टीकाकारों के बीच इस बात में मतभेद है कि क्या मदयन और ऐकावाले अलग-अलग क़ौमें हैं या एक ही क़ौम के दो नाम हैं । एक गिरोह का विचार है कि ये दो अलग क़ौमें हैं। इसके विपरीत कुछ टीकाकार दोनों को एक ही क़ौम बताते हैं। तहकीक से पता चलता है कि ये दोनों बातें अपनी जगह सही हैं । मदयन के लोग और ऐका के लोग निस्सन्देह दो अलग-अलग क़बीलें है, मगर हैं एक ही नस्ल की दो शाखाएँ । हजरत इबराहीम (अलैहि०) की जो सन्तान उनकी बीवी या दासी क़तूरा के पेट से थीं, वह अरब और इसराईल के इतिहास में बनी क़तूरा के नाम से प्रसिद्ध है। उनमें से एक क़बीला जो सबसे अधिक प्रसिद्ध हुआ, मदयान बिन इबराहीम के संबंध से मदयानी या पदयनवाले कहलाया और उसकी आबादी उत्तरी हिजाज़ से फ़लस्तीन के दक्षिण तक और वहाँ से सीना प्रायद्वीप के आख़िरी कोने तक लाल सागर और उक़बा खाड़ी के तटों पर फैल गई। उसकी राजधानी शहर मदयन थी। बाक़ी बनी क़तूरा जिनमें बनी दिदान (Dedanites), कहीं अधिक प्रसिद्ध हैं, उत्तरी अरब में तीमा और तबूक और अल-उला के बीच आबाद हुए और उनकी राजधानी तबूक थी जिसे प्राचीन काल में 'ऐका' कहते थे। मदयन और ऐकावालों के लिए एक ही पैग़म्बा भेजे जाने की वजह शायद यह थी कि दोनों एक ही नस्ल से भाषा बोलते थे और इनके क्षेत्र भी बिल्कुल एक-दूसरे से मिले हुए थे, बल्कि असंभव नहीं की कुछ मोनों में ये साथ साथ आबाद हो और आपस के शादी-ब्याह से इनका समाज भी आपस में घुल मिल गया हो। इसके अलावा बनी कतरा की इन दोनों शाखाओं का पेशा भी व्यापार था। और दोनों में एक ही तरह की व्यापारिक वे बेईमानियाँ और धार्मिक और नैतिक बीमारियाँ पाई जाती थी। हज़रत शुऐब (अलैहि०) और मदयनवालों के क़िस्से के विवरण के लिए देखिए सूरा-7 अल-आराफ़, आयत 85-93, सूरा-।। हूद, 84-95, सूरा-29 अल-अनकबूत, 36-37
قَالَ رَبِّيٓ أَعۡلَمُ بِمَا تَعۡمَلُونَ 187
(188) शुऐब ने कहा, “मेरा रब जानता है जो कुछ तुम कर रहे हो।” 116
116. अर्थात् अज़ाब भेजना मेरा काम नहीं है। यह तो सारे जहान के रब अल्लाह के अधिकार में है और वह तुम्हारे करतूत देख ही रहा है। अगर वह तुम्हें इस अज़ाब का पात्र समझेगा तो ख़ुद भेज देगा। ऐकवालों की इस मांग और हज़रत शुऐब के इस जवाब में क़ुरैश के विधर्मियों के लिए भी एक चेतावनी थी। वे भी अल्लाह के रसूल (सल्ल०) से यही मांग करते थे-”या फिर गिरा दे हमपर आसमान का कोई टुकड़ा जैसा कि तेरा दावा है, (सूरा 17 बनी इसराईल, आयत (92)। इसलिए उनको सुनाया जा रहा है कि ऐसी ही मांग ऐकावालों ने अपने पैगावर से की थी, उसका जो जवाब उन्हें मिला वही मुहम्मद (सल्ल०) की ओर से तुम्हारी मांग का जवाब भी है।
فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمۡ عَذَابُ يَوۡمِ ٱلظُّلَّةِۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَذَابَ يَوۡمٍ عَظِيمٍ 188
(189) उन्होंने उसे झुठला दिया। अन्ततः छतरीवाले दिन का अज़ाब उनपर आ गया 117, और वह बड़े ही भयानक दिन का अज़ाब था।
117. इस अज़ाब का कोई विवरण क़ुरआन में या किसी सही हदीस में नहीं बयान किया गया है। प्रत्यक्ष शब्दों से जो बात समझ में आती है, वह यह कि इन लोगों ने चूंकि आसमानी अज़ाब मांगा था, इसलिए अल्लाह ने उनपर एक बादल भेज दिया और वह छतरी की तरह इनपर उस समय तक छाया रहा जब तक अज़ाब की बारिशों ने उनको बिल्कुल नष्ट न कर दिया । क़ुरआन से यह बात साफ़ मालूम होती है कि मदयनवालों के अज़ाब की दशा ऐकावालों के अज़ाब से भिन्न थी। ये, जैसा कि यहाँ बताया गया है, छतरीवाले अज़ाब से नष्ट हुए और उनपर अज़ाब एक धमाके और भूकम्प के रूप में आया। इसलिए इन दोनों को मिलाकर एक दास्तान बनाने की कोशिश सही नहीं है। कुछ टीकाकारों ने छतरीवाले दिन के अज़ाब की कुछ व्याख्याएँ बयान की हैं, मगर हमें नहीं मालूम कि इन्हें ये जानकारियाँ कहा से मिलीं । इब्ने जरीर ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास का यह कथन नक़ल किया है कि “उलमा में से जो कोई तुमसे बयान करे कि छतरी के दिन का अज़ाब क्या था,उसको ठीक न समझो।”
وَإِنَّهُۥ لَتَنزِيلُ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ 191
(192) यह118 सारे जहानों के रब की उतारी हुई चीज़ है।119
118. ऐतिहासिक वर्णन समाप्त करके अब वार्ताक्रम उस विषय की ओर फिरता है जिससे सूरा का आरंभ हुआ था।
119. अर्थात् यह क़ुरआन जिसकी आयतें यहाँ सुनाई जा रही हैं और यह 'ज़िक्र' जिससे लोग मुँह मोड़ रहे हैं, किसी इनसान की मनगढ़त चीज़ नहीं है, बल्कि यह सारे जगत के रब की ओर से उतारा हुआ है।
نَزَلَ بِهِ ٱلرُّوحُ ٱلۡأَمِينُ 192
(193-194) इसे लेकर तेरे दिल पर अमानतदार रूह 120 उतरी है ताकि तू उन लोगों में शामिल हो जो (अल्लाह की ओर से दुनियावालों को) सचेत करनेवाले हैं,
120. तात्पर्य है जिब्रील (अलैहि०) जैसा कि सूरा-2 अल-बक़रा (आयत 97) में स्पष्टतः कहा गया है। यहाँ उनका नाम लेने के बजाय उनके लिए रूहे अमीन (अमानतदार रूह) की उपाधि इस्तेमाल करने से यह बताना अभिप्रेत है कि सारे जहान के रब की ओर से इस प्रकाशना को लेकर कोई (भौतिक शक्ति) नहीं आई है जिसके अन्दर परिवर्तन संभव हो, बल्कि वह एक विशुद्ध रूह है लेशमात्र भौतिकता के बिना, और वह पूरी तरह अमानतदार है, ख़ुदा का पैग़ाम जैसा उसके सुपुर्द किया जाता है वैसा ही कुछ बिना घटाए-बढ़ाए पहुंचा देती है।
بِلِسَانٍ عَرَبِيّٖ مُّبِينٖ 194
(195) साफ़-साफ़ अरबी भाषा में121,
121. इस वाक्य का सम्बन्ध “अमानतदार रूह उतरी है” से भी हो सकता है और “सचेत करनेवाले हैं” से भी। प्रथम दशा में इसका अर्थ यह होगा कि वह अमानतदार रूह उसे साफ़-साफ़ अरबी भाषा में लाई है और दूसरी दशा में अर्थ यह होगा कि प्यारे नबी (सल्ल०) उन नबियों में शामिल हैं जिन्हें अरबी भाषा में दुनियावालों को सचेत करने पर नियुक्त किया गया था, अर्थात् हूद, सालेह, इस्माईल और शुऐब (अलैहि०)। दोनों दशाओं में वार्ता का अभिप्राय एक ही है। (व्याख्या के लिए देखिए सूरा-43 ज़ुख़रुफ़, टिप्पणी 1)
فَقَرَأَهُۥ عَلَيۡهِم مَّا كَانُواْ بِهِۦ مُؤۡمِنِينَ 198
(199) और यह (उत्कृष्ट अरबी वाणी) वह इनको पढ़कर सुनाता, तब भी ये मान कर न देते।124
124. अर्थात् अब इन्हीं की क़ौम का एक आदमी इन्हें शुद्ध अरबों में यह कलाम पढ़कर सुना रहा है तो ये लोग कहते हैं कि इस आदमी ने इसे खु़द गढ़ लिया है। अरबवासी के मुख से अरबी भाषण अदा होने में आख़िर मोजिज़े की क्या बात है कि हम इसे अल्लाह का कलाम मान लें। लेकिन अगर यही मधुर अरबी वाणी अल्लाह की ओर से किसी गै़र-अरब पर मोजिज़े के तौर पर उतार दी जाती और वह उनके सामने आकर अति शुद्ध अरबी शैली में इसे पढ़ता तो यह ईमान न लाने के लिए दूसरा बहाना ढ़ूँढ़ते, उस वक़्त कहते कि इसपर कोई जिन आ गया है जो अजमी (ग़ैर-अरबी) की ज़बान से अरबी बोलता है। (व्याख्या के लिए देखिए सूरा-41 हामीम० अस-सद्ध टिपणी 54-58)
مَآ أَغۡنَىٰ عَنۡهُم مَّا كَانُواْ يُمَتَّعُونَ 206
(207) तो ज़िन्दगी का वह सामान, जो उनको मिला हुआ है, उनके किस काम आएगा?128
128. इस वाक्य और इससे पहले के वाक्य के बीच एक सुक्ष्म रिक्तता है जिसे सुननेवाले का मन थोड़ा-सा विचार करके ख़ुद भर सकता है। अज़ाब के लिए उनके जल्दी मचाने की वजह यह थी कि यह अज़ाब के आने का कोई अंदेशा न रखते थे। इसी वजह से वे अल्लाह के रसूल (सल्ल०) को चुनौते देते थे कि ले आओ अपना वह अज़ाब जिससे तुम हमें डराते हो। इसपर फ़रमाया जा रहा है, अच्छा, अगर मान लीजिए उनका यह विचार सही हो हो, अगर उनपर तुरन्त अज़ाब न आए, अगर उन्हें दुनिया में मजे करने के लिए एक लंबी ढील भी मिल जाए तो सवाल यह है कि जब भी उनपर आद और समूद या क़ौमे लूत और ऐकावालों की-सी कोई आफ़त यकायक टूट पड़ी या और कुछ नहीं तो मौत ही की अन्तिम घड़ी आ पहुंची तो उस समय दुनिया के भोग-विलास के ये कुछ साल आख़िर उनके लिए क्या लाभदायक सिद्ध होंगे।
وَمَا تَنَزَّلَتۡ بِهِ ٱلشَّيَٰطِينُ 209
(210) इस (खुली किताब) को शैतान लेकर नहीं उतरे है130
130. अर्थात् इसे शैतान लेकर नहीं उतरे हैं जैसा कि सत्य के दुश्मनों का आरोप है। क़ुरैश के विधर्मियों ने नबी (सल्ल०) के विरुद्ध जो आरोप आम लोगों में फैलाए थे, उनमें से एक यह था कि मुहम्मद (सल्ल०), अल्लाह की पनाह, काहिन हैं और आम कहिनों की तरह इनके मन में भी शैतान यह वाणी डाला करते हैं।
وَمَا يَنۢبَغِي لَهُمۡ وَمَا يَسۡتَطِيعُونَ 210
(211) न यह काम उनको सजता है131, और न वे ऐसा कर ही सकते हैं।132
131. अर्थात् यह वाणी और ये विषय शैतानों के मुंह पर फबते भी तो नहीं हैं। कोई बुद्धि रखता हो तो स्वयं समझ सकता है कि कहीं ये बातें, जो क़ुरआन में बयान हो रही हैं, शैतान की ओर से भी हो सकती हैं? क्या कभी तुमने सुना है कि किसी शैतान ने किसी काहिन (भविष्यवक्ता) के ज़रिये से लोगों को ख़ुदापरस्ती और ख़ुदातरसी की शिक्षा दी हो और शिर्क और बुतपरस्ती से रोका हो? आख़िरत की पूछ-ताछ का डर दिलाया हो ? जु़ल्म और कुकर्म और दुराचरण से मना किया हो ? नेकी और सच्चाई और दुनियावालों के साथ उपकार का उपदेश किया हो?
132. अर्थात् अगर शैतान करना चाहें भी तो यह काम उनके बस का नहीं है कि थोड़ी देर के लिए भी अपने आपको इनसानों के सच्चे शिक्षक और वास्तविक शुद्धीकर्ता के पद पर रखकर विशुद्ध सत्य और विशुद्ध भलाई की वह शिक्षा दे सकें जो क़ुरआन दे रहा है।
إِنَّهُمۡ عَنِ ٱلسَّمۡعِ لَمَعۡزُولُونَ 211
(212) वे तो उसके सुनने तक से दूर रखे गए हैं।133
133. अर्थात् इस क़ुरआन के अवतरण में दख़ल देना तो दूर की बात, जिस वक़्त अल्लाह की ओर से रूहुल अमीन (फ़रिश्ता जिबील अलैहि०) उसको लेकर चलता है और जिस समय मुहम्मद (सल्ल०) के दिल पर वह उसको उतारता है, इस पूरे क्रम में किसी जगह भी शैतानों को कान लगाकर सुनने तक का मौक़ा नहीं मिलता [कहाँ यह कि उन्हें यह मालूम हो सके कि आपपर क्या चीज़ उतर रही है ।] (और विवरण के लिए देखिए सूरा-15 हिज्र, टिप्पणी 8-12, सूरा-37 अस-साफ़्फ़ात, टिप्पणी 5-7 और सूरा-72 जिन्न, आयत 8-9,27)
فَلَا تَدۡعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ فَتَكُونَ مِنَ ٱلۡمُعَذَّبِينَ 212
(213) अत: ऐ नबी! अल्लाह के साथ किसी दूसरे उपास्य को न पुकारो, वरना तुम भी सज़ा पानेवालों में शामिल हो जाओगे। 134
134. (यद्यपि सम्बोधन प्रत्यक्ष में नबी (सल्ल०) से है, लेकिन] वास्तव में इससे अभिप्रेत विधर्मियों और मुशरिकों को सचेत करना है । वार्ता का उद्देश्य यह है कि कुरआन में जो शिक्षा दी जा रही है, यह चूंकि विशुद्ध सत्य है सृष्टि के शासक की ओर से, और इसमें शैतानी गन्दगियों का लेशमात्र भी दखल नहीं है, इसलिए यहाँ सत्य के मामले में किसी के साथ रियायत का कोई काम नहीं। अल्लाह को सब से बढ़कर अपनी सृष्टि में कोई प्रिय हो सकता है तो वह उसका पाक रसूल है, लेकिन मान लीजिए अगर वह भी बन्दगी की राह से बाल बराबर हट जाए तो पकड़ से नहीं बच सकता, तो फिर दूसरों की क्या मजाल है।
وَأَنذِرۡ عَشِيرَتَكَ ٱلۡأَقۡرَبِينَ 213
(214) अपने निकटतम रिश्तेदारों को डराओ135,
135. अर्थात् अल्लाह के इस बे-लाग दीन में जिस तरह नबी की ज़ात के लिए कोई रियायत नहीं, उसी तरह नबी के परिवार और उसके निकटतम नातेदारों के लिए भी किसी रिआयत की गुंजाइश नहीं है । इसलिए आदेश हुआ कि अपने सबसे निकटतम नातेदारों को भी साफ़-साफ़ सचेत कर दो। अगर वे अपना अक़ीदा औरअमल ठीक न रखेंगे तो यह बात उनके किसी काम न आ सकेगी कि वे नबी के रिश्तेदार हैं। विश्वसनीय रिवायतों में आया है कि इस आयत के उतरने के बाद नबी (सल्ल०) ने सबसे पहले अपने दादा की सन्तान को सम्बोधित किया और एक-एक को पुकारकर साफ़-साफ़ कह दिया कि “तुम लोग आग के अज़ाब से अपने आप को बचाने की चिन्ता कर लो, मैं अल्लाह की पकड़ से तुमको नहीं बचा सकता, अलबत्ता मेरे माल में से तुम लोग जो कुछ चाहो, मांग सकते हो।” फिर आपने सुबह-सबेरे सफा की सबसे ऊंची जगह पर खड़े होकर पुकारा [और क़ुरैश के एक-एक क़बीले और ख़ानदान का नाम ले-लेकर आवाज़ दी ।] हुजू़र (सल्ल०) की आवाज़ पर जब सब लोग जमा हो गए तो आपने फ़रमाया, “लोगो । आगर मैं तुम्हें बताऊँ कि इस पहाड़ की दूसरी ओर एक भारी फ़ौज है जो तुमपर टूट पड़ना चाहती है, तो तुम मेरी बात सच मानोगे?” सबने कहा, “हाँ, हमारे अनुभव में तुम कभी झूठ बोलनेवाले नहीं रहे हो।” आपने फ़रमाया, “अच्छा, तो मैं अल्लाह का कठोर अज़ाब आने से पहले तुमको खबरदार करता हूँ। अपनी जानों को उसकी पकड़ से बचाने की चिन्ता करो । मैं अल्लाह के मुक़ाबले में तुम्हारे किसी काम नहीं आ सकता।”
فَإِنۡ عَصَوۡكَ فَقُلۡ إِنِّي بَرِيٓءٞ مِّمَّا تَعۡمَلُونَ 215
(216) लेकिन अगर वे तुम्हारी अवज्ञा करें तो उनसे कह दो कि जो कुछ तुम करते हो उसको कोई ज़िम्मेदारी मुझ पर नहीं है। 136
136. इसके दो अर्थ हो सकते हैं- एक यह कि तुम्हारे रिश्तेदारों में से जो लोग ईमान लाकर तुम्हारा अनुकरण करें उनके साथ नम्रता का व्यवहार अपनाओ और जो तुम्हारी बात न मानें, उनसे विरक्ति की घोषणा कर दो। दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि यह बात केवल उन रिश्तेदारों के बारे में न हो जिन्हें सचेत करने का आदेश दिया गया था, बल्कि सबके लिए सामान्य हो ।
تَنَزَّلُ عَلَىٰ كُلِّ أَفَّاكٍ أَثِيمٖ 221
(222) वे हर जालसाज़ दुराचारी पर उतरा करते हैं। 140
140. तात्पर्य है काहिन, ज्योतिषी, फ़ालगीरी, मिट्टी के द्वारा सगुन विचार करनेवाले और आमिल’ क़िस्म के लोग जो ग़ैब (परोक्ष) जानने का ढोंग रचाते फिरते हैं। गोल मोल लच्छेदार बातें बनाकर लोगों की क़िस्मतें बताते हैं या सयाने बनकर जिन्नों और रूहों और मुअक्किलों के ज़रिये लोगों की बिगड़ी बनाने का कारोबार करते हैं।
أَلَمۡ تَرَ أَنَّهُمۡ فِي كُلِّ وَادٖ يَهِيمُونَ 224
(225) क्या तुम देखते नहीं हो कि वे हर घाटी में भटकते हैं। 143
143. अर्थात् कोई एक निश्चित राह नहीं है जिसपर वे सोचते और अपनी वाक्य-शक्ति ख़र्च करते हों, बल्कि उनकी सोच की रफ़्तार एक बे-लगम घोड़े की तरह है जो हर घाटी में भटकती फिरती है और भावनाओं, इच्छाओं और स्वार्थों की हर नयी लहर उनकी ज़बान से एक नया विषय अदा करती है जिसे सोचने और बयान करने में इस बात का सिरे से कोई ध्यान होता ही नहीं कि यह बात हक और सच्ची भी है। कवियों की इन सर्वविदित विशेषताओं को जो आदमी जानता हो उसके दिमाग में आख़िर यह बेतुकी बात कैसे उतर सकती है कि इस क़ुरआन के लानेवाले पर शायरी का आरोप रखा जाए जिसका भाषण जँचा-तुला, जिसको बात दोटूक, जिसका रास्ता बिलकुल साफ़ और निश्चित है और जिसने हक़ और सच्चाई और भलाई की दावत से हटकर कभी एक बात भी ज़बान से नहीं निकाली है।
إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ وَذَكَرُواْ ٱللَّهَ كَثِيرٗا وَٱنتَصَرُواْ مِنۢ بَعۡدِ مَا ظُلِمُواْۗ وَسَيَعۡلَمُ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓاْ أَيَّ مُنقَلَبٖ يَنقَلِبُونَ 226
(227) सिवा उन लोगों के जो ईमान लाए और जिन्होंने भले कर्म किए और अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद किया और जब उनपर ज़ुल्म किया गया तो सिर्फ़ बदला ले लिया 145 और ज़ुल्म करनेवालों को बहुत जल्द मालूम हो जाएगा कि वे किस अंजाम से दो-चार होते हैं। 146
145. यहाँ कवियों की उस आम निंदा से जो ऊपर बयान हुई, उन कवियों को अपवाद माना गया है जो चार विशेषताएं रखते हैं- एक यह कि वे मोमिन (ईमानवाले) हों, दूसरे यह कि अपने व्यावहारिक जीवन में नेक हों, तीसरे यह कि अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करनेवाले हों, अपनी सामान्य परिस्थितियों और समयों में भी और अपने काव्य में भी, और चौथे यह कि वे निजी स्वार्थों के लिए तो किसी की बुराई न करें, न निजी या नस्ली और क़ौमी पक्षपातों के लिए बदले को आग भड़काएँ, मगर जब ज़ालिमों के मुकाबले में सत्य के समर्थन में ज़रूरत पड़े तो फिर ज़बान से वही काम लें जो एक मुजाहिद तीर व तलवार से लेता है। ।चुनांचे रिवायतों में आता है कि ख़ुद नबी (सल्ल०) ने हज़रत काब बिन मालिक और हस्सान बिन साबित को इस्लाम का विरोध करनेवाले कवियों का उत्तर देने और उनकी भर्त्सना करने का निर्देश दिया था।
146. ज़ुल्म करनेवालों से तात्पर्य यहाँ वे लोग हैं जो सत्य को नीचा दिखाने के लिए सरासर हठधर्मी की राह से नबी (सल्ल०) पर शायरी और कहानत और जादूगरी और जुनून को तोहमतें लगाते फिरते थे, ताकि अनभिज्ञ लोग आपकी दावत से बदगुमान हों और आपकी शिक्षा की ओर तवज्जोह न दें।