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سُورَةُ المُجَادلَةِ

58. अल-मुजादला

(मदीना में उतरी, आयतें 22) 

परिचय

नाम

इस सूरा का नाम 'अल-मुजादला' भी है और 'अल-मुजादिला' भी। यह नाम पहली ही आयत के शब्द 'तुजादिलु-क' (तुमसे तकरार कर रही है) से लिया गया है।

उतरने का समय

सूरा-33 (अहज़ाब) में अल्लाह ने मुँहबोले बेटे के सगा बेटा होने को नकारते हुए केवल यह कहकर छोड़ दिया था कि "और अल्लाह ने तुम्हारी उन बीवियों (पत्‍नियों) को, जिनसे तुम 'ज़िहार' करते हो, तुम्हारी माएँ नहीं बना दिया है।" (ज़िहार से अभिप्रेत है पत्‍नी को माँ की उपमा देना।) मगर उसमें यह नहीं बताया गया था कि ज़िहार करना कोई पाप या अपराध है और न यह बताया गया था कि इस कर्म के विषय में शरीअत का क्या आदेश है। इसके विपरीत इस सूरा में ज़िहार का पूरा क़ानून बयान कर दिया गया है। इससे मालूम होता है कि ये विस्तृत आदेश उस संक्षिप्त आदेश के बाद उतरे हैं। [इस तथ्य के अन्तर्गत यह ] बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि इस सूरा के उतरने का समय अहज़ाब के अभियान (शव्वाल, 05 हिजरी) के बाद का है।

विषय और वार्ता

इस सूरा में मुसलमानों को उन विभिन्न समस्याओं के बारे में आदेश दिए गए हैं जो समस्याएँ उस समय पैदा हो गई थीं। सूरा के आरंभ से आयत 6 तक ज़िहार' के बारे में शरीअत के आदेश बयान किए गए हैं और उसके साथ मुसलमानों को अत्यन्त कड़ाई के साथ सावधान किया गया है कि इस्लाम के बाद भी अज्ञानकाल के तरीक़ों पर जमे रहना और अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाओं को तोड़ना निश्चित रूप से ईमान के विपरीत कर्म है, जिसकी सज़ा दुनिया में भी अपमान और अपयश है और आख़िरत में भी उसपर कड़ी पूछ-गच्छ होनी है। आयत 7 से 10 तक में मुनाफ़िक़ों (कपटाचारियों) की इस नीति पर पकड़ गई है कि वे आपस में गुप्त कानाफूसियाँ करके तरह-तरह की शरारतों की योजनाएँ बनाते थे और अल्लाह के रसूल (सल्ल०) को यहूदियों की तरह ऐसे ढंग से सलाम करते थे, जिससे दुआ के बजाय बद-दुआ का पहलू निकलता था। इस संबंध में मुसलमानों को तसल्ली दी गई है कि मुनाफ़िक़ों की ये कानाफूसियाँ तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकर्ती, इसलिए तुम अल्लाह के भरोसे पर अपना काम करते रहो, और इसके साथ उनको यह नैतिक शिक्षा भी दी गई है कि सच्चे ईमानवालों का काम पाप और अत्याचार एवं अन्याय और रसूल की अवज्ञा के लिए कानाफूसियाँ करना नहीं है, वे अगर आपस में बैठकर एकान्त में कोई बात करें भी तो वह भलाई और ईशपरायणता (तक़वा) की बात होनी चाहिए। आयत 11 से 13 तक में मुसलमानों को सभा-सम्बन्धी कुछ नियम सिखाए गए हैं और कुछ ऐसे सामाजिक दोषों को दूर करने के लिए निर्देश दिए गए हैं जो पहले भी लोगों में पाए जाते थे और आज भी पाए जाते हैं। आयत 14 से सूरा के अन्त तक मुस्लिम समाज के लोगों को, जिनमें सच्चे ईमानवाले और मुनाफ़िक़ (कपटाचारी) और दुविधाग्रस्त सब मिले-जुले थे, बिल्कुल दो-टूक तरीक़े से बताया गया है कि धर्म में आदमी के निष्ठावान होने की कसौटी क्या है। एक प्रकार के मुसलमान वे हैं जो इस्लाम के दुश्मनों से दोस्ती रखते हैं, अपने हित के लिए दीन से विद्रोह करने में वे कोई संकोच नहीं करते। दूसरे प्रकार के मुसलमान वे हैं जो अल्लाह के दीन (ईश्वरीय धर्म) के मामले में किसी और का ध्यान रखना तो अलग रहा स्वयं अपने बाप, भाई, सन्तान और परिवार तक की वे परवाह नहीं करते। अल्लाह ने इन आयतों में स्पष्ट रूप से कह दिया है कि पहले प्रकार के लोग चाहे कितनी ही क़समें खा-खाकर अपने मुसलमान होने का विश्वास दिलाएँ, वास्तव में वे शैतान के दल के लोग हैं और अल्लाह के दल में सम्मिलित होने का सौभाग्य केवल दूसरे प्रकार के मुसलमानों को प्राप्त है।

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سُورَةُ المُجَادلَةِ
58. अल-मुजादला
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील और अत्यन्त दयावान है।
قَدۡ سَمِعَ ٱللَّهُ قَوۡلَ ٱلَّتِي تُجَٰدِلُكَ فِي زَوۡجِهَا وَتَشۡتَكِيٓ إِلَى ٱللَّهِ وَٱللَّهُ يَسۡمَعُ تَحَاوُرَكُمَآۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعُۢ بَصِيرٌ
(1) अल्लाह ने सुन ली1 उस औरत की बात जो अपने पति के मामले में तुमसे तकरार कर रही है और अल्लाह से फ़रियाद किए जाती है। अल्लाह तुम दोनों की बातचीत सुन रहा है,2 वह सब कुछ सुननेवाला और देखनेवाला है।
1. यहाँ सुनने से अभिप्रेत सिर्फ़ सुन लेना नहीं है, बल्कि उसकी याचना पर उसकी कठिनाई को दूर करना है।
2. यह औरत, जिनके बारे में ये आयतें उतरी हैं, ख़ज़रज क़बीले की ख़ौला बिन्ते-सालबा थीं। उनके पति औस बिन सामित अंसारी [ने उनसे] ज़िहार किया था और वे नबी (सल्ल०) से पूछने आई थी कि इस्लाम में इसका क्या आदेश है। उस समय तक चूँकि अल्लाह की ओर से इस विषय में कोई आदेश नहीं आया था, इसलिए नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया कि मेरे विचार में तुम अपने पति के लिए हराम हो गई हो। इसपर वे फ़रियाद करने लगीं कि मेरी और मेरे बच्चों की जिंदगी तबाह हो जाएगी। इसी हालत में जबकि वे रो-रोकर नबी (सल्ल०) से निवेदन कर रही थीं कि कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरा घर बिगड़ने से बच जाए। अल्लाह की ओर से वह्य उतरी और इस प्रकरण के बारे में यह बताया गया। इन सहाबिया की फ़रियाद का अल्लाह के दरबार में सुन लिया जाना और फ़ौरन ही वहाँ से उनकी फ़रियाद के जवाब में फरमान का आ जाना एक ऐसी घटना थी जिसकी वजह से सहाबा किराम (रजि०) की नज़रों में उनको इरजत का एक खास स्थान प्राप्त हो गया था।
ٱلَّذِينَ يُظَٰهِرُونَ مِنكُم مِّن نِّسَآئِهِم مَّا هُنَّ أُمَّهَٰتِهِمۡۖ إِنۡ أُمَّهَٰتُهُمۡ إِلَّا ٱلَّٰٓـِٔي وَلَدۡنَهُمۡۚ وَإِنَّهُمۡ لَيَقُولُونَ مُنكَرٗا مِّنَ ٱلۡقَوۡلِ وَزُورٗاۚ وَإِنَّ ٱللَّهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٞ ۝ 1
(2) तुममें से जो लोग अपनी पत्नियों से ज़िहार करते हैं 3, उनकी पत्नियाँ उनकी माँएँ नहीं हैं, उनकी माएँ तो वही हैं जिन्होंने उनको जन्म दिया है।4 ये लोग एक अत्यन्त अप्रिय और झूठी बात कहते हैं,5 और वास्तविकता यह है कि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला और क्षमाशील है।6
3. अरब में कभी-कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती थी कि पति और पत्नी में लड़ाई होती तो पति ग़ुस्से में आकर कहता कि "तू मेरे लिए ऐसी ही है जैसे मेरी माँ की पीठ।" इसका आशय यह होता है कि "तुझसे संभोग करना मेरे लिए ऐसा है जैसे कि अपनी माँ से संभोग करूँ।" इस ज़माने में भी बहुत से नादान लोग पत्नी से लड़कर उसकी उपमा माँ, बहन, बेटी से दे बैठते हैं जिसका स्पष्ट अर्थ यह होता है कि आदमी अब उसे मानो पत्नी नहीं, बल्कि उन औरतों की तरह समझता है जो उसके लिए हराम हैं। इसी कर्म का नाम ज़िहार है। अज्ञानकाल में अरबों के यहाँ यह तलाक़, बल्कि इससे भी बढ़कर सम्बन्ध-विच्छेद की घोषणा समझी जाती थी, क्योंकि उनकी दृष्टि में इसका अर्थ यह था कि पति अपनी पत्नी से न केवल वैवाहिक सम्बन्ध तोड़ रहा है, बल्कि उसे माँ की तरह अपने लिए हराम ठहरा रहा है।
4. अर्थ यह है कि अगर एक व्यक्ति मुँह फोड़कर बीवी की उपमा माँ से दे बैठता है, तो उसके ऐसा करने से पत्नी माँ नहीं हो सकती, न वह उस तरह हराम हो सकती है जैसे माँ। इस तरह यह बात कहकर अल्लाह ने अज्ञानकाल के उस कानून को निरस्त कर दिया जिसके अनुसार 'ज़िहार' करनेवाले पति से उसकी पत्नी का निकाह टूट जाता था और वह उसके लिए माँ की तरह पूर्ण रूप से हराम समझ ली जाती थी।
وَٱلَّذِينَ يُظَٰهِرُونَ مِن نِّسَآئِهِمۡ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا قَالُواْ فَتَحۡرِيرُ رَقَبَةٖ مِّن قَبۡلِ أَن يَتَمَآسَّاۚ ذَٰلِكُمۡ تُوعَظُونَ بِهِۦۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِيرٞ ۝ 2
(3) जो लोग7 अपनी पत्नियों से ज़िहार करें, फिर अपनी उस बात से रुजूअ् करें जो उन्होंने कही थी,8 तो इससे पहले कि दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएँ, एक 'ग़ुलाम' (दास) आज़ाद करना होगा। इससे तुमको नसीहत की जाती है9 और जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।10
7. यहाँ से ज़िहार के क़ानूनी आदेश का उल्लेख हो रहा है।
8. मूल अरबी शब्द हैं यऊदू-न लिमा क़ालू'। इनका शाब्दिक अर्थ यह होगा कि 'पलटें उस बात की ओर जो उन्होंने कही।' लेकिन अरबी भाषा और मुहावरे की दृष्टि से इन शब्दों के अर्थ में बड़ा मतभेद हो गया है। अधिकांश फुकहा (धर्मशास्त्रियों) ने दो अर्थों में से किसी एक को प्राथमिकता दी है। एक अर्थ तो यह है कि ज़िहार शब्द ज़बान से निकलने के बाद आदमी पलटकर उस बात को सुधारना चाहे जो उसने कहीं है। दूसरे शब्दों में आ-द लिमा क़ा ल' का अर्थ है, कहनेवाले ने अपनी बात से रुजू कर लिया।' दूसरा अर्थ यह कि जिस चीज़ को आदमी ने ज़िहार करके अपने लिए हराम (अवैध) किया था, उसे पलटकर फिर अपने लिए हलाल करना चाहिए। दूसरे शब्दों में 'आ-द लिमा क़ा-ल' का अर्थ यह है कि जिस आदमी ने हराम होने (अवैधता) को मान लिया था, वह अब हलाल होने (वैधता) की ओर पलट आया।
فَمَن لَّمۡ يَجِدۡ فَصِيَامُ شَهۡرَيۡنِ مُتَتَابِعَيۡنِ مِن قَبۡلِ أَن يَتَمَآسَّاۖ فَمَن لَّمۡ يَسۡتَطِعۡ فَإِطۡعَامُ سِتِّينَ مِسۡكِينٗاۚ ذَٰلِكَ لِتُؤۡمِنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦۚ وَتِلۡكَ حُدُودُ ٱللَّهِۗ وَلِلۡكَٰفِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝ 3
(4) और जो व्यक्ति गुलाम न पाए, वह दो महीने के लगातार रोज़े रखे, इससे पहले कि दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएँ और जिसे इसकी भी सामर्थ्य न हो, वह साठ मुहताजों को खाना खिलाए।11 यह आदेश इसलिए दिया जा रहा है कि तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ।12 यह अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ हैं, और इनकार करनेवालों के लिए दर्दनाक सज़ा है।13
11. यह है ज़िहार के बारे में अल्लाह का आदेश। इस्लामी फुकहा (धर्मशास्त्रियों) ने इस आयत के शब्द [ज़िहार के सिलसिले की घटनाओं के बारे में] अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के फ़ैसलों और इस्लाम के सामान्य नियमों से इस विषय में जो क़ानून ज्ञात किया है [उसका संक्षिप्त विवरण यह है :] (1) ज़िहार का यह क़ानून अरब अज्ञानता के उस प्रचलन को समाप्त करता है जिसके अनुसार यह कार्य निकाह (विवाह) के रिश्ते को तोड़ देता था और औरत पति के लिए सदा के लिए हराम (अवैध) हो जाती थी। इसी तरह यह क़ानून उन तमाम क़ानूनों और रिवाजों को भी निरस्त करता है जो ज़िहार को निरर्थक और बेअसर समझते हों और आदमी के लिए इस बात को वैध रखते हों कि वे अपनी पत्तियों की उपमा माँ या अन्य औरतों से देकर भी], जिनसे किसी भी दशा में उस की शादी नहीं हो सकती, उसके साथ पहले की तरह पति-पत्नी का सम्बन्ध बनाए रखे, क्योंकि इस्लाम की दृष्टि में माँ और दूसरी हराम औरतों की प्रतिष्ठा ऐसी मामूली बात नहीं है कि इंसान उनके और पत्नी के बीच समरूपता का विचार भी करे, यहाँ तक कि उसको ज़बान पर लाए। इन दोनों इन्तिहाओं के बीच इस्लामी क़ानून ने इस मामले में जो नीति अपनाई है, वह तीन बुनियादों पर कायम है : एक यह कि ज़िहार से निकाह नहीं टूटता, बल्कि औरत पहले की तरह पति की पत्नी रहती है। दूसरे यह कि जिहार से औरत वक्ती तौर पर पति के लिए हराम हो जाती है। तीसरे यह कि यह हुर्मत (अवैधता) उस समय तक बाक़ी रहती है जब तक शौहर कफ्फारा (प्रायश्चित-दण्ड) अदा न कर दे और यह कि सिर्फ कफ़्फ़ारा ही इस हुर्मत को ख़त्म कर सकता है। (2) जो चीज़ कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित-दण्ड) ज़रूरी होने का कारण है वह सिर्फ़ जिहार नहीं है, बल्कि जिहार के बाद 'औद' [(पलटना) है। अर्थात् अगर आदमी सिर्फ़ ज़िहार करके रह जाए और न पलटे, तो उसपर कफ्फारा जरूरी नहीं होता। (3) इस आयत में मूल अरबी शब्द 'मस' से अभिप्रेत छूना है, इसलिए कफ़्फारा से पहले सिर्फ़ संभोग ही हराम नहीं है, बल्कि पति किसी तरह भी पत्नी को छू नहीं सकता। (4) जिहार का पहला कफ़्फ़ारा ग़ुलाम आज़ाद करना है। ऐसा करने में आदमी असमर्थ हो तब दो महीने के रोज़ों के रूप में कफ़्फ़ारा दे सकता है और ऐसा करने में भी असमर्थ हो तब साठ मुहताजों को खाना खिला सकता है, लेकिन अगर तीनों कफ़्फ़ारों के अदा करने में कोई आदमी असमर्थ हो तो चूँकि शरीअत में कफ़्फ़ारे को कोई और शक्ल नहीं रखी गई है, इसलिए उसे उस समय तक इन्तिज़ार करना होगा, जब तक वह उनमें से किसी एक पर सामर्थ्य प्राप्त न कर ले। अलबत्ता सुन्नत से यह साबित है कि ऐसे आदमी को सहायता की जानी चाहिए ताकि वह तीसरा कफ़्फ़ारा अदा कर सके। (5) ग़ुलाम न पाने की स्थिति में आदेश है कि ज़िहार करनेवाला लगातार दो महीने के रोज़े रखे इससे पहले कि पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएँ। दो महीनों के बीच में अगर आदमी उस बीवी से संभोग कर बैठे, जिससे उसने जिहार किया हो, तो इससे निरन्तरता टूट जाएगी और नये सिरे से रोज़े रखने होंगे, क्योंकि हाथ लगाने से पहले दो महीने के लगातार रोज़े रखने का आदेश दिया गया है। (6) तीसरा कफ़्फ़ारा (अर्थात् साठ मुहताजों का खाना) वह व्यक्ति दे सकता है जो दूसरे कफ़्फ़ारे (अर्थात् दो महीनों के निरंतर रोज़ों) की सामर्थ्य न रखता हो। रोज़ों पर सामर्थ्य न होने का अर्थ यह है कि आदमी या तो बुढ़ापे की वजह से सामर्थ्य न रखता हो या बीमारी की वजह से, या इस कारण से कि वह लगातार दो महीनों तक संभोग से परहेज न कर सकता हो और उसे आशंका हो कि इस बीच कहीं बेसब्री न कर बैठे। खाना सिर्फ़ उन मुहताजों को दिया जा सकता है जिनका गुज़ारा ख़र्च आदमी के जिम्मे अनिवार्य न होता हो। खाना देने से अभिप्रेत दो समय का पेट भरकर खाना देना है। हनफ़ी मसलक के लोग कहते हैं कि दो समय के पेट भरने के क़ाबिल अनाज दे देना या खाना पकाकर दो समय खिला देना, दोनों समान रूप से सही हैं, क्योंकि कुरआन मजीद में 'इतआम' (खिलाना) का शब्द इस्तेमाल हुआ है, जिसका अर्थ भोजन देना भी है और खिलाना भी। मगर मालिकी, शाफ़ी और हंबली पकाकर खिलाने को सही नहीं समझते, बल्कि अनाज दे देना ही अनिवार्य ठहराते हैं। हनफ़ियों के नज़दीक अगर एक ही मुहताज को साठ दिन तक खाना दिया जाए तो यह भी सही है, लेकिन बाकी तीनों मस्लक एक मुहताज को देना सही नहीं समझते। उनके नज़दीक साठ ही मुहताजों को देना ज़रूरी है। (7) यद्यपि क़ुरआन मजीद में खाने के कफ़्फ़ारे के बारे में ये शब्द प्रयोग नहीं गिए गए हैं कि यह कफ़्फ़ारा भी पति-पत्नी के एक-दूसरे को छूने से पहले अदा होना चाहिए, लेकिन सन्दर्भ इसका तकाज़ा कर रहा है, कि इस तीसरे कफ़्फ़ारे पर भी यह पाबन्दी लागू होगी।
12. यहाँ 'ईमान लाने' से अभिप्रेत सच्चे और निष्ठावान मोमिन की-सी नीति अपनानी है। स्पष्ट है कि आयत का सम्बोधन मुशरिकों और इस्लाम-विरोधियों से नहीं हैं, बल्कि मुसलमानों से है जो पहले ही ईमान लाए म हुए थे। उनको शरीअत का एक आदेश सुनाने के बाद यह फरमाना कि "यह आदेश तुमको इसलिए दिया जा रहा है कि तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ" स्पष्ट रूप से यह अर्थ रखता है कि जो व्यक्ति ख़ुदा को इस आदेश के सुनने के बाद भी अज्ञानता के पुराने रिवाजी क़ानून का पालन करता रहे, उसकी यह नीति ईमान के विरुद्ध होगी। एक मोमिन का यह काम नहीं है कि अल्लाह और उसका रसूल जब जिंदगी के किसी मामले में उसके लिए एक क़ानून निर्धारित कर दे तो वह उसको छोड़कर दुनिया के किसी दूसरे क़ानून का पालन करे, या अपने मन की इच्छाओं पर चलता रहे।
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُحَآدُّونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ كُبِتُواْ كَمَا كُبِتَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡۚ وَقَدۡ أَنزَلۡنَآ ءَايَٰتِۭ بَيِّنَٰتٖۚ وَلِلۡكَٰفِرِينَ عَذَابٞ مُّهِينٞ ۝ 4
(5) जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं।14, वे उसी तरह अपमानित और तिरस्कृत कर दिए जाएँगे जिस तरह इनसे पहले के लोग अपमानित और तिरस्कृत किए जा चुके हैं।15 हमने साफ़-साफ़ आयतें उतार दी हैं, और कुफ्र (इंकार) करनेवालो के लिए अपमानजनक अज़ाब है।16
14. विरोध करने से अभिप्रेत अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाओं को न मानना और उनके बजाय कुछ दूसरी सीमाएँ निर्धारित कर लेना है। इब्ने-जरीर तबरी इस आयत की व्याख्या यह करते हैं, "वे लोग जो अल्लाह की सीमाओं और उसकी अनिवार्य की हुई बातों (फ़राइज़) के मामले में उसका विरोध करते हैं और उसकी निर्धारित की हुई सीमाओं की जगह दूसरी सीमाएँ निर्धारित कर लेते हैं।" बैज़ावी ने इसकी व्याख्या यह की है, "अल्लाह और उसके रसूल से विवाद और झगड़ा करते हैं या उनकी निर्धारित की हुई सीमाओं के सिवा दूसरी सीमाएँ स्वयं निर्धारित कर लेते हैं या दूसरों की निर्धारित की हुई सीमाओं को इख्त़ियार करते हैं।" आलूसी ने 'रूहुल मआनी' में बैज़ावी की इस व्याख्या से सहमति व्यक्त करते हुए शैखुल इस्लाम सादुल्लाह चलपी का यह कथन उद्धृत किया है कि "इस आयत में उन बादशाहों और बुरे हाकिमों के लिए बड़ी सख़्त धमकी है, जिन्होंने शरीअत की निर्धारित की हुई सीमाओं के विपरीत बहुत-से नियम बना लिए हैं और उनका नाम क़ानून रखा है।" इस स्थान पर अल्लामा आलूसी शरई क़ानूनों के मुक़ाबले में बनाए हुए क़ानूनों की संवैधानिक (यानी इस्लामी दृष्टि से संवैधानिक) हैसियत पर विस्तृत वार्ता करते हुए लिखते हैं, "उस व्यक्ति के कुफ्र में तो कोई सन्देह ही नहीं है जो इस क़ानून को पसंदीदा और शरीअत के मुकाबले में श्रेष्ठ कहता है और कहता है कि यह अधिक दूरदर्शितापूर्ण और क़ौम के लिए अधिक मुनासिब व उचित है, और जब किसी मामले में उससे कहा जाए कि शरीअत का ओदश उसके बारे में यह है तो उसपर गुस्से में भड़क उठता है, जैसा कि हमने कुछ उन लोगों को देखा है जिनपर अल्लाह की फिटकार पड़ी हुई है।"
15. मूल अरबी शब्द ' कब्ब्त' प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ है रुसवा करना, हलाक करना, लानत करना, धिक्कारना, धक्के देकर निकाल देना, अपमानित करना। अल्लाह के कहने का अभिप्राय यह है कि अल्लाह और उसके रसूल का विरोध और उसके आदेशों के प्रति द्रोह का जो परिणाम पिछले नबियों की उम्मतें भुगत चुकी हैं, उससे वे लोग कदापि न बच सकेंगे जो अब मुसलमानों में से वही नीति अपनाएँ। उन्होंने भी जब ख़ुदा की शरीअत के विरुद्ध स्वयं क़ानून बनाए या दूसरों के बनाए हुए कानूनों को अपनाया, तब अल्लाह की दया और उसकी कृपा दृष्टि से वे महरूम हुए और उसी का परिणाम यह निकला कि उनकी जिंदगी ऐसी गुमराहियों, चरित्रहीनताओं और नैतिक व सामाजिक बुराइयों से भरती चली गई, जिन्होंने अन्ततः दुनिया ही में उनको अपमानित और रुसवा करके छोड़ा। यही ग़लती अगर अब मुहम्मद (सल्ल०) की उम्मत करे तो कोई कारण नहीं कि यह अल्लाह की प्रिय बनी रहे और अल्लाह उसे अपमान के गढ़े में गिरने से बचाए चला जाए।
يَوۡمَ يَبۡعَثُهُمُ ٱللَّهُ جَمِيعٗا فَيُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوٓاْۚ أَحۡصَىٰهُ ٱللَّهُ وَنَسُوهُۚ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ شَهِيدٌ ۝ 5
(6) उस दिन (यह अपमानजनक अज़ाब होना है) जब अल्लाह उन सबको फिर से ज़िंदा करके उठाएगा और उन्हें बता देगा कि वे क्या कुछ करके आए हैं। वे भूल गए हैं मगर अल्लाह ने उनका सब किया-धरा गिन-गिनकर सुरक्षित कर रखा है17, और अल्लाह एक-एक चीज़ पर गवाह है।
17. अर्थात् उनके भूल जाने से मामला समाप्त नहीं हो गया है। उनके लिए ख़ुदा की नाफ़रमानी और उसके आदेशों का उल्लंघन ऐसी मामूली चीज़ हो सकती है कि उसे करनेवाले उसे याद तक न रखें, बल्कि उसे कोई आपत्तिजनक चीज़ ही न समझें कि उसकी कुछ परवाह उन्हें हो, मगर खुदा के नज़दीक यह कोई मामूली चीज़ नहीं है। उसके यहाँ उनकी हर करतूत नोट हो चुकी है, किस व्यक्ति ने कब, कहाँ, क्या हरकत की, उस हरकत के बाद उसकी अपनी प्रतिक्रिया क्या थी और उसके क्या परिणाम कहाँ-कहाँ, किस-किस रूप में निकले, यह सब कुछ उसके दफ्तर में लिख लिया गया है।
أَلَمۡ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۖ مَا يَكُونُ مِن نَّجۡوَىٰ ثَلَٰثَةٍ إِلَّا هُوَ رَابِعُهُمۡ وَلَا خَمۡسَةٍ إِلَّا هُوَ سَادِسُهُمۡ وَلَآ أَدۡنَىٰ مِن ذَٰلِكَ وَلَآ أَكۡثَرَ إِلَّا هُوَ مَعَهُمۡ أَيۡنَ مَا كَانُواْۖ ثُمَّ يُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُواْ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٌ ۝ 6
(7) क्या18 तुमको ख़बर नहीं है कि ज़मीन और आसमानों की हर चीज़ का अल्लाह को ज्ञान है? कभी ऐसा नहीं होता कि तीन आदमियों में कोई गुप्त बातचीत (सरगोशी) हो और उनके बीच चौथा अल्लाह न हो, या पाँच आदमियों में गुप्त बातचीत हो और उनमें छठा अल्लाह19 न हो। गुप्त बात करनेवाले चाहे इससे कम हों या अधिक, जहाँ कहीं भी वे हों, अल्लाह उनके साथ होता है।20 फिर क़ियामत के दिन वह उनको बता देगा कि उन्होंने क्या कुछ किया है। अल्लाह हर चीज़ का ज्ञान रखता है।
18. यहाँ से आयत दस तक लगातार मुनाफ़िक़ों (कपटाचारियों) की उस नीति की पकड़ की गई है जो उन्होंने उस समय मुस्लिम समाज में अपना रखी थी। वे ऊपर से मुसलमानों की जमाअत में शामिल थे, मगर अन्दर ही अन्दर उन्होंने ईमानवालों से अलग अपना एक जत्था बना रखा था। मुसलमान जब भी उन्हें देखते, यही देखते कि वे आपस में सर जोड़े खुसर-फुसर कर रहे हैं। इन्हीं खुफ़िया कानाफूसियों में वे मुसलमानों के अन्दर फूट डालने और बिगाड़ पैदा करने और आतंकित करने के लिए तरह-तरह की योजनाएँ बनाते और नई-नई अफ़वाहें गढ़ते थे।
19. प्रश्न पैदा होता है कि यहाँ दो और तीन के बजाय तीन और पाँच का उल्लेख किस कारण से किया गया है? पहले दो और फिर चार को क्यों छोड़ दिया गया? टीकाकारों ने इसके बहुत-से उत्तर दिए हैं, मगर हमारे नज़दीक सही बात यह है कि यह वार्ताशैली वास्तव में कुरआन के वाक्यों के साहित्यिक सौन्दर्य को बाक़ी रखने के लिए अपनाया गया है।
أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ نُهُواْ عَنِ ٱلنَّجۡوَىٰ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا نُهُواْ عَنۡهُ وَيَتَنَٰجَوۡنَ بِٱلۡإِثۡمِ وَٱلۡعُدۡوَٰنِ وَمَعۡصِيَتِ ٱلرَّسُولِۖ وَإِذَا جَآءُوكَ حَيَّوۡكَ بِمَا لَمۡ يُحَيِّكَ بِهِ ٱللَّهُ وَيَقُولُونَ فِيٓ أَنفُسِهِمۡ لَوۡلَا يُعَذِّبُنَا ٱللَّهُ بِمَا نَقُولُۚ حَسۡبُهُمۡ جَهَنَّمُ يَصۡلَوۡنَهَاۖ فَبِئۡسَ ٱلۡمَصِيرُ ۝ 7
(8) क्या तुमने देखा नहीं उन लोगों को जिन्हें गुप्त बातचीत करने से मना कर दिया गया था, फिर भी वे वही हरकत किए जाते हैं जिससे उन्हें रोका गया था?21 ये लोग छिप-छिपकर आपस में गुनाह और अत्याचार और रसूल की अवज्ञा की बातें करते हैं और जब तुम्हारे पास आते हैं तो तुम्हें उस तरीक़े से सलाम करते हैं जिस तरह अल्लाह ने तुमको सलाम नहीं किया है।22 और अपने दिलों में कहते हैं कि हमारी इन बातों पर अल्लाह हमें अज़ाब क्यों नहीं देता?23 उनके लिए जहन्नम ही काफ़ी है। उसी का वे ईंधन बनेंगे। बड़ा ही बुरा अंजाम है उनका।
21. इससे मालूम होता है कि इस आयत के उतरने से पहले नबी (सल्ल०) उन लोगों को इस रवैये से मना फ़रमा चुके थे। इस पर भी वे बाज़ न आए, तब सीधे तौर पर अल्लाह की ओर से प्रकोप का आदेश आया।
22. यह यहूदियों और मुनाफ़िक़ों दोनों ही की नीति थी। अनेक रिवायतों में यह बात आई है कि कुछ यहूदी नबी (सल्ल०) की सेवा में उपस्थित हुए और उन्होंने "अस्सामु अलैक या अबल क़ासिम" कहा। अर्थात् 'अस्सलामु अलैक' को कुछ इस ढंग से उच्चारित किया कि सुननेवाला समझे 'सलाम' कहा है, मगर वास्तव में उन्होंने 'साम' कहा था, जिसका अर्थ मौत है। नबी (सल्ल०) ने उत्तर में कहा, "व अलैकुम" (और भी)। हज़रत आइशा (रजि०) से न रहा गया और उन्होंने कहा, मौत तुम्हें आए और अल्लाह की लानत और फिटकार पड़े। नबी (सल्ल०) ने उन्हें सचेत किया कि ऐ आइशा! अल्लाह को बदज़बानी पसन्द नहीं है। हज़रत आइशा (रजि०) ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! आपने सुना नहीं कि उन्होंने क्या कहा? नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया, और तुमने नहीं सुना कि मैंने उन्हें क्या उत्तर दिया?' मैंने उनसे कह दिया, "और तुमपर भी" (बुख़ारी, मुस्लिम, इब्ने-जरीर, इब्ने अबी हातिम)। हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि०) का बयान है कि मुनाफ़िक़ों और यहूदियों, दोनों ने सलाम का यही ढंग अपना रखा था। (इब्ने-जरीर)
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا تَنَٰجَيۡتُمۡ فَلَا تَتَنَٰجَوۡاْ بِٱلۡإِثۡمِ وَٱلۡعُدۡوَٰنِ وَمَعۡصِيَتِ ٱلرَّسُولِ وَتَنَٰجَوۡاْ بِٱلۡبِرِّ وَٱلتَّقۡوَىٰۖ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ ٱلَّذِيٓ إِلَيۡهِ تُحۡشَرُونَ ۝ 8
(9) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! जब तुम आपस में गुप्त बात करो तो गुनाह और ज़्यादती और रसूल की अवज्ञा की बातें नहीं, बल्कि नेकी और तक़वा (धर्मपरायणता) की बातें करो और उस ख़ुदा से डरते रहो जिसके पास तुम इकट्ठे किए जाओगे।24
24. इससे यह मालूम हुआ कि नज्वा (आपस में गुप्त बात करना) अपने आप में मना नहीं है, बल्कि इसका वैध या अवैध होना उन लोगों के आचरण पर निर्भर करता है जो ऐसी बात करें, और उन परिस्थितियों पर है जिनमें ऐसी बात की जाए, और उन बातों के स्वरूप पर है जो इस तरीके से की जाएँ। जिन लोगों की सत्यनिष्ठा, जिनकी सत्यवादिता, जिनके चरित्र की पवित्रता से अवगत और परिचित समाज हो, उन्हें किसी जगह सिर जोड़े बैठे देखकर किसी को यह सन्देह नहीं हो सकता कि वे आपस में किसी शरारत की योजना बना रहे हैं। इसके विपरीत जो लोग शरारत और दुराचरण के लिए प्रसिद्ध हों, उनकी कानाफूसियाँ हर व्यक्ति के मन में यह खटक पैदा कर देती हैं कि अवश्य किसी नए 'फ़ितने' की तैयारी हो रही है। इसी तरह संयोगवश कहीं दो-चार आदमी आपस में किसी मामले पर कानाफूसी के अन्दाज़ में बात कर लें तो यह आपत्तिजनक नहीं है, लेकिन अगर कुछ लोगों ने अपना एक जत्था बना रखा हो और उनका निरन्तर तरीका यही हो कि सदैव ईमानवालों की जमाअत से अलग उनके बीच खुसर-फुसर होती रहती हो तो यह अवश्य ही ख़राबी का पता देती है, और कुछ नहीं तो इसकी कम से कम हानि यह है कि इससे मुसलमानों में पार्टीबाजी' की बीमारी फैलती है। इन सबसे बढ़कर जो चीज़ ‘नज़्ज़वा' के वैध-अवैध होने का फ़ैसला करती है वह उन बातों का स्वरूप है जो नवा में की जाएँ। दो आदमी अगर इसलिए आपस में कानाफूसी करते हैं कि किसी झगड़े को निबटाना है या किसी का हक़ दिलवाना है या किसी नेक काम में हिस्सा लेना है, तो यह कोई बुराई नहीं है, बल्कि पुण्य (सवाव) का काम है। इसके विपरीत अगर यही नवा दो आदमियों के बीच इस उद्देश्य के लिए हो कि कोई विगाह डलवाना है या किसी का हक़ मारना है या कोई गुनाह करना है, तो स्पष्ट है कि यह उद्देश्य अपने आप में एक बुराई है और इसके लिए ' नज़्ज़वा ' बुराई पर बुराई। जबी (सल्ल.) ने इस सिलसिले में (मजलिस) सभा के शिष्टाचार की जो शिक्षा दी है, वह यह है कि "जब तीन आदमी बैठे हों तो दो आदमी आपस में खुसर-फुसर न करें, क्योंकि यह तीसरे आदमी के लिए दुख का कारण होगा" (बुख़ारी, मुस्लिम, मुस्नद अहमद, तिर्मिज़ी, अबू दाऊद)। दूसरी हदीस में नबी (सल्ल०) के शब्द ये हैं, "दो आदमी आपस में कानाफूसी न करें, मगर तीसरे से अनुमति लेकर, क्योंकि यह उसके लिए दुख का कारण होगा" (मुस्लिम)। इसी अवैध कानाफूसी के आशय में यह बात भी आती है कि दो आदमी तीसरे आदमी की मौजूदगी में किसी ऐसी भाषा में बात करने लगें जिसे वह न समझता हो, और इससे भी अधिक अवैध बात यह है कि वे अपनी कानाफूसी के दौरान में किसी की ओर इस तरह देखें या संकेत करें जिससे यह स्पष्ट हो कि उनके बीच उसी के बारे में बात चीत हो रही है।
إِنَّمَا ٱلنَّجۡوَىٰ مِنَ ٱلشَّيۡطَٰنِ لِيَحۡزُنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَلَيۡسَ بِضَآرِّهِمۡ شَيۡـًٔا إِلَّا بِإِذۡنِ ٱللَّهِۚ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلۡيَتَوَكَّلِ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ ۝ 9
(10) कानाफूसी तो एक शैतानी काम है और वह इसलिए की जाती है कि ईमान लानेवाले लोग उससे दुखी हों, हालाँकि खुदा की इजाज़त के बिना वह उन्हें कुछ भी हानि नहीं पहुँचा सकती और ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा रखना चाहिए।25
25. यह बात इसलिए कही गई है कि अगर किसी मुसलमान को कुछ लोगों की कानाफूसियाँ देखकर यह सन्देह भी हो जाए कि वे उसी के विरुद्ध की जा रही हैं तब भी उसे इतना दुखी न होना चाहिए कि केवल सन्देह ही सन्देह पर कोई जवाबी कार्रवाई करने की चिन्ता में पड़ जाए या अपने दिल में इसपर कोई दुख या ईष्या या गैर-मामूली चिन्ता पालने लगे। उसको यह समझना चाहिए कि अल्लाह की अनुमति के बिना कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह भरोसा उसके मन में ऐसी शक्ति पैदा कर देगा कि बहुत-सी व्यर्थ आशंकाओं और काल्पनिक ख़तरों से उसको मुक्ति मिल जाएगी और वह दुष्टों को उनके हाल पर छोड़कर पूरे इत्मीनान और सुकून के साथ अपने काम में लगा रहेगा। अल्लाह पर भरोसा करनेवाला मोमिन न थुड़दिला होता है कि हर आशंका और गुमान उसकी शान्ति को भंग कर दे, न इतने छोटे दिल का होता है कि ग़लत काम करनेवालों के मुकाबले में आपे से बाहर होकर स्वयं भी न्याय के विरुद्ध हरकतें करने लगे।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا قِيلَ لَكُمۡ تَفَسَّحُواْ فِي ٱلۡمَجَٰلِسِ فَٱفۡسَحُواْ يَفۡسَحِ ٱللَّهُ لَكُمۡۖ وَإِذَا قِيلَ ٱنشُزُواْ فَٱنشُزُواْ يَرۡفَعِ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مِنكُمۡ وَٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡعِلۡمَ دَرَجَٰتٖۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِيرٞ ۝ 10
(11) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, जब तुमसे कहा जाए कि अपनी मजलिसों में कुशादगी पैदा करो तो जगह कुशादा कर दिया करो, अल्लाह तुम्हें कुशादगी प्रदान करेगा।26 और जब तुमसे कहा जाए कि उठ जाओ तो उठ जाया करो27 तुममें से जो लोग ईमान रखनेवाले हैं और जिनको ज्ञान दिया गया है, अल्लाह उनको ऊँचे दर्जे प्रदान करेगा28, और जो कुछ तुम करते हो अल्लाह को उसकी ख़बर है।
26. इसकी व्याख्या सूरा के परिचय में की जा चुकी है। कुछ टीकाकारों ने इस आदेश को केवल नबी (सल्ल०) की मजलिस तक सीमित समझा है। लेकिन जैसा कि इमाम मालिक (रह०) ने फ़रमाया है, सही बात यह है कि मुसलमानों की तमाम मजलिसों के लिए यह एक आम आदेश है। अल्लाह और उसके रसूलों ने इस्लामवालों को जो शिष्टाचार सिखाए हैं, से एक बात यह भी है कि जब किसी मजलिस में पहले से कुछ लोग बैठे हों और बाद में और कुछ लोग आएँ, तो यह शिष्टता पहले से बैठे हुए लोगों में होनी चाहिए कि वे स्वयं नए आनेवालों को जगह दें और जहाँ तक संभव हो, कुछ सिकुड़ और कुछ सिमटकर उनके लिए कुशादगी पैदा करें, और इतना शिष्टाचार बाद के आनेवालों में होना चाहिए कि में ज़बरदस्ती उनके अन्दर न घरों और कोई व्यक्ति किसी को उठाकर उसकी जगह बैठने की कोशिश न करे। हदीस में हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-उमर (रजि०) और हज़रत अबू हुरैरा (रजि०) की रिवायत है कि नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया, "कोई व्यक्ति किसी को उठाकर उसकी जगह न बैठे, बल्कि तुम लोग स्वयं दूसरों के लिए जगह कुशादा करो" (मुस्नद अहमद, बुख़ारी, मुस्लिम)। और हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस (रजि०) की रिवायत है कि नबी (सल्ल०) ने फ़माया, "किसी व्यक्ति के लिए यह वैध नहीं है कि दो आदमियों के दर्मियान उनकी अनुमति के बिना धस जाए।" (मुस्नद अहमद, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)
27. अब्दुर्रहमान बिन जैद बिन असलम का बयान है कि लोग नबी (सल्ल०) की मजलिस में देर तक बैठे रहते थे, और उनकी कोशिश यह होती थी कि अन्तिम समय तक बैठे रहें। इससे कभी-कभी नबी (सल्ल०) को कष्ट होता था, आपके आराम में बाधा पड़ती थी और आपके कामों का भी हरज होता था। इसपर यह आदेश आया कि जब तुम लोगों से कहा जाए कि उठ जाओ तो उठ जाओ। (इने-जरीर, इब्ने-कसीर)
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا نَٰجَيۡتُمُ ٱلرَّسُولَ فَقَدِّمُواْ بَيۡنَ يَدَيۡ نَجۡوَىٰكُمۡ صَدَقَةٗۚ ذَٰلِكَ خَيۡرٞ لَّكُمۡ وَأَطۡهَرُۚ فَإِن لَّمۡ تَجِدُواْ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٌ ۝ 11
(12) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! जब तुम रसूल से तनहाई में बात करो तो बात करने से पहले कुछ सदक़ा (दान) दो29, यह तुम्हारे लिए अच्छा और ज़्यादा पाकीज़ा है। अलबत्ता अगर तुम सदक़ा देने के लिए कुछ न पाओ तो अल्लाह माफ़ करनेवाला और दया करनेवाला है।
29. हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि० ) इस आदेश का कारण यह बयान करते हैं कि मुसलमान अल्लाह के रसूल (सल्ल०) से बहुत ज़्यादा बातें (अर्थात् एकान्त का निवेदन करके) पूछने लगे थे, यहाँ तक कि उन्होंने नबी (सल्ल०) को तंग कर दिया। अंतत: अल्लाह ने यह चाहा कि अपने नबी पर से यह बोझ हल्का कर दे (इब्ने-जरीर)। जैद-बिन-असलम (रजि०) कहते हैं कि नबी (सल्ल०) से जो व्यक्ति भी अकेले में बात करने का निवेदन करता, आप (सल्ल०) उसे रद्द न फ़रमाते थे। जिसका जी चाहता, आकर अर्ज करता कि मैं तनिक अलग बात करना चाहता हूँ और आप (सल्ल०) उसे अवसर दे देते। यहाँ तक कि बहुत-से लोग ऐसे मामलों में भी आप (सल्ल०) को कष्ट देने लगे जिनमें अलग बात करने की कोई आवश्यकता न होती। समय वह था, जिसमें सारा अरब मदीना के विरुद्ध लड़ रहा था। कभी-कभी किसी व्यक्ति की इस तरह की कानाफूसी के बाद शैतान लोगों के कान में यह फूंक देता था कि यह फ़लाँ क़बीले के हमलावर होने की ख़बर लाया था और इससे मदीना में अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो जाता था। दूसरी ओर लोगों की इस हरकत की वजह से मुनाफ़िक़ों को यह कहने का अवसर मिल जाता था कि मुहम्मद (सल्ल०) तो कानों के कच्चे हैं, हर एक की सुन लेते हैं। इन कारणों से अल्लाह ने यह पाबन्दी लगा दी कि जो आप (सल्ल.) से अकेले में बात करना चाहे, वह पहले सदक़ा (दान) दे। (अहकामुल कुरआन, लेखक इने-अरबी) हज़रत अली (रज़ि०) फ़रमाते हैं कि जब यह आदेश आया तो नबी (सल्ल.) ने मुझसे पूछा, "कितना सदक़ा मुक़र्रर किया जाए? क्या एक दीनार?" मैंने अर्ज़ किया, “यह लोगों को सामर्थ्य से अधिक है।" आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, "आधा दीनार?" मैंने अर्ज़ किया, "लोग इसको भी सामर्थ्य नहीं रखते।" फ़रमाया, "फिर कितना?" मैंने अर्ज़ किया, "बस एक जौ बराबर सोना।" फ़रमाया, "तुमने तो बड़ी कम मात्रा की सलाह दी" (इब्ने-जरीर, तिर्मिज़ी, मुस्नद अबू याला)। एक दूसरी रिवायत में हजरत अली (रज़ि०) फ़रमाते हैं कि क़ुरआन की यह एक ऐसी आयत है जिस पर मेरे सिवा किसी ने अमल नहीं किया। इस आदेश के आते ही मैंने सदक़ा पेश किया और एक प्रश्न आप (सल्ल०) से पूछ लिया (इब्ने-जरीर, हाकिम, इब्नुल मुंज़िर, अब्द-बिन-हुमैद)।
ءَأَشۡفَقۡتُمۡ أَن تُقَدِّمُواْ بَيۡنَ يَدَيۡ نَجۡوَىٰكُمۡ صَدَقَٰتٖۚ فَإِذۡ لَمۡ تَفۡعَلُواْ وَتَابَ ٱللَّهُ عَلَيۡكُمۡ فَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُواْ ٱلزَّكَوٰةَ وَأَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥۚ وَٱللَّهُ خَبِيرُۢ بِمَا تَعۡمَلُونَ ۝ 12
(13) क्या तुम डर गए इस बात से कि तनहाई में बात-चीत करने से पहले तुम्हें सदके देने होंगे? अच्छा, अगर तुम ऐसा न करो और अल्लाह ने तुमको इससे माफ़ कर दिया - तो नमाज़ क़ायम करते रहो, जकात देते रहो और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करते रहो। तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।30
30. यह दूसरा आदेश ऊपर के आदेश के थोड़े समय बाद ही आ गया और उसने सदका (दान) अनिवार्य होने का निरस्त कर दिया। इस बात में मतभेद है कि सदके का यह आदेश कितनी देर रहा। क़तादा कहते हैं कि एक दिन से भी कम अवधि तक बाकी रहा, फिर निरस्त कर दिया गया। मुक़ातिल बिन हय्यान कहते हैं कि दस दिन तक रहा। यह अधिक से अधिक इस आदेश के बाकी रहने की अवधि है जो किसी रिवायत में बयान हुई है।
۞أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ تَوَلَّوۡاْ قَوۡمًا غَضِبَ ٱللَّهُ عَلَيۡهِم مَّا هُم مِّنكُمۡ وَلَا مِنۡهُمۡ وَيَحۡلِفُونَ عَلَى ٱلۡكَذِبِ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ ۝ 13
(14) क्या तुमने देखा उन लोगों को जिन्होंने दोस्त बनाया है एक ऐसे गरोह को जिसपर अल्लाह का प्रकोप हुआ है?31 वे न तुम्हारे हैं न उनके32, और वे जान-बूझकर झूठी बात पर क़समें खाते हैं।33
31. संकेत है मदीना के यहूदियों की ओर जिन्हें मुनाफ़िक़ों ने दोस्त बना रखा था।
32. अर्थात् निष्ठापूर्ण संबंध उनका न ईमानवालों से है, न यहूदियों से। दोनों के साथ उन्होंने केवल अपने हितों के लिए नाता जोड़ रखा है।
أَعَدَّ ٱللَّهُ لَهُمۡ عَذَابٗا شَدِيدًاۖ إِنَّهُمۡ سَآءَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ۝ 14
(15) अल्लाह ने उनके लिए कठोर अज़ाब तैयार कर रखा है। बड़ी ही बुरी करतूत हैं जो वे कर रहे हैं।
ٱتَّخَذُوٓاْ أَيۡمَٰنَهُمۡ جُنَّةٗ فَصَدُّواْ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ فَلَهُمۡ عَذَابٞ مُّهِينٞ ۝ 15
(16) उन्होंने अपनी क़समों को ढाल बना रखा है जिसकी आड़ में वे अल्लाह की राह से लोगों को रोकते हैं34, इसपर उनके लिए अपमानजनक अज़ाब है।
34. अर्थ यह है कि एक ओर तो वे अपने ईमान और अपनी वफ़ादारियों की कसमें खाकर मुसलमानों को पकड़ से बचे रहते हैं और दूसरी ओर इस्लाम और मुसलमान और इस्लाम के पैग़म्बर के विरुद्ध हर प्रकार के सन्देह और बस्वसे लोगों के दिलों में पैदा करते हैं, ताकि लोग यह समझकर इस्लाम स्वीकार करने से रुके रहें कि जब घर के भेदी ये ख़बरें दे रहे हैं तो ज़रूर अन्दर कुछ दाल में काला होगा।
لَّن تُغۡنِيَ عَنۡهُمۡ أَمۡوَٰلُهُمۡ وَلَآ أَوۡلَٰدُهُم مِّنَ ٱللَّهِ شَيۡـًٔاۚ أُوْلَٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلنَّارِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ ۝ 16
(17) अल्लाह से बचाने के लिए न उनके माल कुछ काम आएंगे, न उनको सन्तान । वे दोज़ख़ के साथी हैं, उसी में वे सदैव रहेंगे।
يَوۡمَ يَبۡعَثُهُمُ ٱللَّهُ جَمِيعٗا فَيَحۡلِفُونَ لَهُۥ كَمَا يَحۡلِفُونَ لَكُمۡ وَيَحۡسَبُونَ أَنَّهُمۡ عَلَىٰ شَيۡءٍۚ أَلَآ إِنَّهُمۡ هُمُ ٱلۡكَٰذِبُونَ ۝ 17
(18) जिस दिन अल्लाह उन सबको उठाएगा, वे उसके सामने भी उसी तरह क़समें खाएंगे जिस तरह तुम्हारे सामने खाते हैं।35 और अपने नज़दीक यह समझेंगे कि इससे उनका कुछ काम बन जाएगा। ख़ूब जान लो, वे परले दर्जे के झूठे हैं।
35. अर्थात् यह केवल दुनिया ही में और केवल इंसानों ही के सामने झूठी क़समें खाने पर बस नहीं करते, बल्कि आख़िरत में स्वयं अल्लाह के सामने भी ये झूठी कसमें खाने से बाज़ न रहेंगे। झूठ और फ़रेब इनके अन्दर इतना गहरा उतर चुका है कि मरकर भी यह उनसे न छूटेगा।
ٱسۡتَحۡوَذَ عَلَيۡهِمُ ٱلشَّيۡطَٰنُ فَأَنسَىٰهُمۡ ذِكۡرَ ٱللَّهِۚ أُوْلَٰٓئِكَ حِزۡبُ ٱلشَّيۡطَٰنِۚ أَلَآ إِنَّ حِزۡبَ ٱلشَّيۡطَٰنِ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ ۝ 18
(19) शैतान उनपर छा चुका है और उसने ख़ुदा की याद उनके दिल से भुला दी है। वे शैतान की पार्टी के लोग हैं। सावधान रहो, शैतान की पार्टीवाले ही घाटे में रहनेवाले हैं।
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُحَآدُّونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ أُوْلَٰٓئِكَ فِي ٱلۡأَذَلِّينَ ۝ 19
(20) निश्चय ही अत्यन्त अपमानित लोगों में से हैं वे लोग जो अल्लाह और उसके रसूल का मुक़ाबला करते हैं।
كَتَبَ ٱللَّهُ لَأَغۡلِبَنَّ أَنَا۠ وَرُسُلِيٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ قَوِيٌّ عَزِيزٞ ۝ 20
(21) अल्लाह ने लिख दिया है कि मैं और मेरे रसूल ही वर्चस्व प्राप्त करके रहेंगे।36 वास्तव में अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली और बलवान है।
36. व्याख्या के लिए देखिए सूरा-37 अस्साफ़्फात, टिप्पणी 93
لَّا تَجِدُ قَوۡمٗا يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ يُوَآدُّونَ مَنۡ حَآدَّ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَلَوۡ كَانُوٓاْ ءَابَآءَهُمۡ أَوۡ أَبۡنَآءَهُمۡ أَوۡ إِخۡوَٰنَهُمۡ أَوۡ عَشِيرَتَهُمۡۚ أُوْلَٰٓئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ ٱلۡإِيمَٰنَ وَأَيَّدَهُم بِرُوحٖ مِّنۡهُۖ وَيُدۡخِلُهُمۡ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَاۚ رَضِيَ ٱللَّهُ عَنۡهُمۡ وَرَضُواْ عَنۡهُۚ أُوْلَٰٓئِكَ حِزۡبُ ٱللَّهِۚ أَلَآ إِنَّ حِزۡبَ ٱللَّهِ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ ۝ 21
(22) तुम कभी यह न पाओगे कि जो लोग अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखनेवाले हैं, वे उन लोगों से मुहब्बत करते हों जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया है, भले ही वे उनके बाप हों या उनके बेटे या उनके भाई या उनके परिवारवाले।37 ये वे लोग हैं जिनके दिलों में अल्लाह ने ईमान अंकित कर दिया है और अपनी ओर से एक आत्मा प्रदान करके उनको शक्ति प्रदान की है वह उनको ऐसी जन्नतों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, उनमें वे सदैव रहेंगे। अल्लाह उनसे राज़ी हुआ और वे अल्लाह से राज़ी हुए। वे अल्लाह की पार्टी के लोग हैं। सावधान रहो, अल्लाह की पार्टीवाले ही सफलता पानेवाले हैं।
37. इस आयत में दो बातें कही गई हैं। एक बात सैद्धान्तिक है और दूसरी में वास्तविकता का उल्लेख है। सैद्धान्तिक बात यह कही गई है कि सच्चे धर्म पर ईमान और दीन के दुश्मनों की मुहब्बत, दो बिल्कुल विपरीत चीजें हैं जिनका एक जगह जमा होना किसी तरह भी नहीं सोचा जा सकता। यह बात निश्चित रूप से असंभव है कि ईमान और ख़ुदा के दुश्मन और रसूल की मुहब्बत एक दिल में जमा हो जाएँ, बिल्कुल उसी तरह जैसे एक आदमी के दिल में अपने आप की मुहब्बत और अपने शत्रु की मुहब्बत एक साथ जमा नहीं हो सकती। इसलिए अगर तुम किसी व्यक्ति को देखो कि वह ईमान का दावा भी करता है और साथ-साथ उसने ऐसे लोगों से मुहब्बत का नाता भी जोड़ रखा है जो इस्लाम के विरोधी हैं, तो यह भ्रम तुम्हें कदापि न होना चाहिए कि शायद वह अपनी इस नीति के बावजूद ईमान के दावे में सच्चा हो। यह तो है सैद्धान्तिक बात, मगर अल्लाह ने यहाँ केवल सिद्धान्त बयान करने पर बस नहीं किया है, बल्कि इस वास्तविकता को भी ईमान के दावेदारों के सामने नमूने के तौर पर पेश किया है कि जो लोग सच्चे ईमानवाले थे, उन्होंने वास्तव में सबकी आँखों के सामने उन तमाम रिश्तों को काट फेंका जो अल्लाह के दीन के साथ उनके सम्बन्ध में बाधक बने। यह एक ऐसी घटना थी जो बद्र और उहुद की लड़ाइयों में सारा अरब देख चुका है। मक्का से जो सहाबा किराम हिजरत करके आए थे, वे सिर्फ़ ख़ुदा और उसके दीन के लिए स्वयं अपने क़बीले और अपने सबसे क़रीबी रिश्तेदारों से लड़ गए थे। हज़रत अबू उबैदा (रजि०) ने अपने बाप अब्दुल्लाह बिन जर्राह को क़त्ल किया। हज़रत मुसअब बिन उमैर (रजि०) ने अपने भाई उबैद बिन उमैर को क़त्ल किया। हज़रत उमर (रजि०) ने अपने मामू आस बिन हिशाम बिन मुगीरह को क़त्ल किया। हज़रत अबू बक्र (रजि०) अपने बेटे अब्दुर्रहमान से लड़ने के लिए तैयार हो गए। हज़रत अली, हज़रत हमज़ा और हज़रत उबैदा बिन हारिस (रजि०) ने उत्बा, शैबा और वलीद बिन उक़बा को क़त्ल किया जो उनके करीबी रिश्तेदार थे। हज़रत उमर (रज़ि०) ने बद्र की लड़ाई के कैदियों के मामले में अल्लाह के रसूल (सल्ल०) से अर्ज़ किया कि इन सबको क़त्ल कर दिया जाए और हममें से हर एक अपने रिश्तेदार को क़त्ल करे। इस तरह प्रत्यक्ष-जगत् में दुनियावालों को यह दिखाया जा चुका था कि सत्यनिष्ठ मुसलमान कैसे होते हैं और अल्लाह और उसके दीन के साथ उनका ताल्लुक़ कैसा हुआ करता है।