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سُورَةُ الذَّارِيَاتِ

51. अज़-ज़ारियात

(मक्‍का में उतरी, आयतें 60)

परिचय

नाम

पहले ही शब्द 'वज़-ज़ारियात' (क़सम है उन हवाओं को जो धूल उड़ानेवाली हैं) से लिया गया है। आशय यह है कि वह सूरा जिसका आरम्भ 'अज़ ज़ारियात' शब्द से होता है।

उतरने का समय

विषय वस्तुओं और वर्णन-शैली से मालूम होता है कि यह सूरा [भी उसी] कालखंड में उतरी थी, जिसमें सूरा-50, ‘क़ाफ़’ उतरी है।

विषय और वार्ता

इसका बड़ा भाग आख़िरत (परलोक) के विषय पर है और अन्त में तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाया गया है। इसके साथ लोगों को इस बात पर भी सचेत किया गया है कि नबियों (अलैहि०) की बात न मानना और अपनी अज्ञानतापूर्ण धारणाओं पर आग्रह करना स्वयं उन्हीं क़ौमों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ है जिन्होंने यह नीति अपनाई है। आख़िरत के बारे में जो बात इस सूरा के छोटे-छोटे, मगर अत्यंत अर्थपूर्ण वाक्यों में बयान की गई है, वह यह है कि मानव-जीवन के परिणामों के बारे में लोगों की विभिन्न और परस्पर विरोधी धारणाएँ स्वयं इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि इनमें से कोई धारणा भी ज्ञान पर आधारित नहीं है, बल्कि हर एक ने अटकलें दौड़ाकर अपनी जगह जो दृष्टिकोण बना लिया, उसी को वह अपनी धारणा बनाकर बैठ गया। इतनी बड़ी और महत्त्वपूर्ण मौलिक समस्या पर, जिसके बारे में आदमी की राय का ग़लत हो जाना उसकी पूरी ज़िन्दगी को ग़लत करके रख देता है, ज्ञान के बिना केवल अटकलों के आधार पर कोई धारणा बना लेना एक विनाशकारी मूर्खता है। ऐसी समस्या के बारे में सही राय क़ायम करने का बस एक ही रास्ता है और वह यह है कि इंसान को आख़िरत के बारे में जो ज्ञान अल्लाह की ओर से उसका नबो (ईशदूत) दे रहा है, उसपर वह गम्भीरतापूर्वक विचार करे और ज़मीन तथा आसमान की व्यवस्था और स्वयं अपने अस्तित्व पर दृष्टि डालकर खुली आँखों से देखे कि क्या उस ज्ञान के सही होने की गवाही हर ओर मौजूद नहीं है? इसके बाद बड़े संक्षिप्त शब्दों में एकेश्वरवाद की ओर बुलाते हुए कहा गया है कि तुम्हारे पैदा करनेवाले ने तुमको दूसरों को बन्दगी (भक्ति और आज्ञापालन) के लिए नहीं, बल्कि अपनी बन्दगी के लिए पैदा किया है। वह तुम्हारे बनावटी उपास्यों की तरह नहीं है जो तुमसे रोज़ी (आजीविका) लेते हैं और तुम्हारी सहायता के बिना जिनकी प्रभुता नहीं चल सकती। वह ऐसा उपास्य है जो सबको रोज़ी देता है, किसी से रोज़ी लेने का मुहताज नहीं, और जिसका प्रभुत्व स्वयं उसके अपने बल-बूते पर चल रहा है। इसी सिलसिले में यह भी बताया गया कि नबियों (अलैहि०) का मुक़ाबला जब भी किया गया है, बुद्धिसंगत आधार पर नहीं, बल्कि उसो दुराग्रह, हठधर्मी और अज्ञानतापूर्ण अहंकार के आधार पर किया गया है जो आज मुहम्मद (सल्ल०) के साथ बरता जा रहा है। फिर मुहम्मद (सल्ल०) को निर्देश दिया गया है कि इन सरकशों की ओर ध्यान न दें और अपने आमंत्रण और याद दिलाने का काम करते रहें, क्योंकि वह इन लोगों के लिए चाहे लाभप्रद न हो, किन्तु ईमानवालों के लिए लाभप्रद है।

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سُورَةُ الذَّارِيَاتِ
51. अज़-ज़ारियात
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील और अत्यन्त दयावान है।
وَٱلذَّٰرِيَٰتِ ذَرۡوٗا
(1) क़सम है उन हवाओं की जो धूल उड़ानेवाली हैं,
فَٱلۡحَٰمِلَٰتِ وِقۡرٗا ۝ 1
(2) फिर पानी से लदे हुए बादल उठानेवाली हैं,1
1. इस बात पर सभी टीकाकार सहमत हैं कि ‘अज़-ज़ारियात’ से तात्पर्य अस्त व्यस्त और धूल उड़ानेवाली हवाएँ हैं और ‘अल-हामिलाति विक़रन’ (भारी बोझ उठानेवालियों) से तात्पर्य वे हवाएँ हैं जो समुद्रों से लाखों करोड़ों गैलन पानी के भाप बादलों के रूप में उठा लेती हैं।
فَٱلۡجَٰرِيَٰتِ يُسۡرٗا ۝ 2
(3) फिर धीमी गति के साथ चलनेवाली हैं,
فَٱلۡمُقَسِّمَٰتِ أَمۡرًا ۝ 3
(4) फिर एक बड़े काम (वर्षा) को बाँटनेवाली हैं2,
2. मूल वाक्यांश अल-जारियाति युसरन’ और ‘अल-मुक़स्सिमाति अमरन’ की व्याख्या में टीकाकरों के मध्य मतभेद है। एक वर्ग ने इस बात को प्राथमिकता दी है कि इन दोनों से तात्पर्य भी हवाएँ ही हैं अर्थात् यही हवाएँ फिर बादलों को लेकर चलती हैं और फिर धरती के अलग-अलग हिस्सों में फैलकर अल्लाह के आदेशानुसार, जहाँ जितना आदेश होता है, पानी बाँटती हैं। दूसरे वर्ग ने ‘अल-ज़ारियाति युसरन’ से तात्पर्य धीमी गति के साथ चलनेवाली नौकाएँ ली हैं और ‘अल-मुक़स्सिमाति अमरन’ से तात्पर्य वे फ़रिश्ते लिए है जो अल्लाह के आदेशानुसार उसकी रचनाओं के भाग्य की चीजें उनमें बाँटते हैं, लेकिन पूरा वार्ता-क्रम देखा जाए तो [पहली व्याख्या] अधिक उपयुक्त है। शाह रफ़ीउद्दीन साहब, शाह अब्दुल क़ादिर साहब और मौलाना महमूदुल हसन साहब ने भी अपने अनुवादों में पहला अर्थ ही लिया है।
إِنَّمَا تُوعَدُونَ لَصَادِقٞ ۝ 4
(5) तथ्य यह है कि जिस चीज़ से तुम्हें डराया जा रहा है,3 वह सत्य है
3. मूल शब्द ‘तूअदू-न’ प्रयुक्त किया गया है। यह अगर ‘वअ-द’ से हो तो इसका अर्थ होगा, ‘जिस चीज़ का तुमसे वादा किया जा रहा है।’ और ‘वईद’ से हो तो अर्थ यह होगा कि ‘जिस चीज़ का तुमको डरावा दिया जा रहा है।’ भाषा की दृष्टि से दोनों अर्थ समान रूप से सही हैं, लेकिन प्रसंग व संदर्भ को देखा जाए का दूसरा अर्थ अधिक अनुकूलता रखता है। इसी लिए हमने ‘तूअद् न’ को ‘वादे’ के बजाय ‘वईद के अर्थ में लिया है।
وَإِنَّ ٱلدِّينَ لَوَٰقِعٞ ۝ 5
(6) और कर्मों का फल अवश्य ही सामने आनेवाला है।4
4. यह है वह बात जिसपर क़सम खाई गई है। इस क़सम का अर्थ यह है कि जिस अनुपम व्यवस्था और नियमबद्धता के साथ वर्षा का यह श्रेष्ठ विधान तुम्हारी आँखों के सामने चल रहा है और जो तत्त्वदर्शिता और मस्लहतें इसमें स्पष्ट रूप से काम करती नज़र आती हैं, वे इस बात की गवाही दे रही हैं कि यह दुनिया कोई निरुद्देश्य और निरर्थक घरौंदा नहीं है, बल्कि यह वास्तव में एक उच्च श्रेणी की तत्त्वदर्शितापूर्ण व्यवस्था है, जिसमें हर काम किसी उद्देश्य और किसी मस्लहत के लिए हो रहा है। इस व्यवस्था में यह किसी तरह संभव नहीं है कि यहाँ इनसान जैसे एक प्राणी को बुद्धि, चेतना, पहचान और उपभोग के अधिकार देकर उसमें भलाई और बुराई की नैतिक अनुभूति पैदा करके और उसे हर तरह के अच्छे और बुरे, सही और ग़लत कामों के मौक़े देकर ज़मीन में लूटमार करने के लिए सिर्फ़ व्यर्थ और निरर्थक तरीक़े से छोड़ दिया जाए और उससे कभी यह पूछ-गछ न हो कि दिल व दिमाग़ और शरीर की जो शक्तियाँ उसको दी गई थीं, दुनिया में काम करने के लिए जो व्यापक साधन उसके सुपुर्द किए गए थे और ख़ुदा की अनगिनत मख़लूक़ (सृष्टि) पर उपभोग के जो अधिकार उसे दिए गए थे, उनका प्रयोग उसने किस तरह किया।
وَٱلسَّمَآءِ ذَاتِ ٱلۡحُبُكِ ۝ 6
(7) क़सम है विभिन्न रूपोंवाले आसमान की,5
5. मूल में अरबी शब्द ज़ातिल हुबुक’ प्रयुक्त हुआ है। हुबुक रास्तों को भी कहते हैं। उन लहरों को भी कहते हैं जो हवा के चलने से रेगिस्तान की रेत और ठहरे हुए पानी में पैदा हो जाती हैं और धुंघराले बालों में जो लटें-सी बन जाती हैं, उनके लिए भी यह शब्द प्रयुक्त होता है। यहाँ आसमान को हुबुकवाला या तो इस दृष्टि से कहा गया है कि आसमान पर प्राय: तरह-तरह की शक्लोंवाले बादल छाए रहते हैं, जिनमें हवा के प्रभाव से बार-बार परिवर्तन होता है और कभी कोई रूप न स्वयं स्थिर रहता है, न किसी दूसरे रूप के सदृश होता है। या इस आधार पर फ़रमाया गया है कि रात के वक़्त आसमान पर जब तारे बिखरे होते हैं तो आदमी देखता है कि उनके बहुत-से विभिन्न रूप हैं और कोई रूप दूसरे रूप से नहीं मिलता।
إِنَّكُمۡ لَفِي قَوۡلٖ مُّخۡتَلِفٖ ۝ 7
(8) (आख़िरत के बारे में) तुम्हारी बात एक-दूसरे से भिन्न है।6
6. बातों की इस भिन्नता पर विभिन्न रूपोंवाले आसमान की क़सम उपमा के रूप में खाई गई है, अर्थात् जिस तरह आसमान के बादलों और तारों के झुरमुटों के रूप अलग-अलग हैं और उनमें कोई समानता नहीं पाई जाती है, इसी तरह आख़िरत के बारे में तुम लोग भाँति-भाँति की बोलियाँ बोल रहे हो और हर एक की बात दूसरे से भिन्न है। बालों में यह विभिन्नता स्वयं ही इस बात का प्रमाण है कि वह्य व रिसालत (ईश प्रकाशना एवं पैग़म्बरी) के प्रति उदासीन होकर इनसान ने अपने और इस दुनिया के परिणाम पर जब भी कोई राय बनाई है, ज्ञान के बिना बनाई है, वरना अगर इनसान के पास इस मामले में वास्तव में सीधे-सीधे ज्ञान का कोई साधन होता तो इतने अलग-अलग और एक-दूसरे से टकरानेवाले अक़ीदे (विश्वास) पैदा न होते।
يُؤۡفَكُ عَنۡهُ مَنۡ أُفِكَ ۝ 8
(9) उससे वही विमुख होता है जो सत्य से फिरा हुआ है।7
7. मूल अरबी शब्द है, युअफकु अन्हु मन उफिक' इस वाक्य में अन्हु में आया सर्वनाम अपनी दो संज्ञाओं के लिए प्रयुक्त हो सकता है-एक कर्मों का फल', दूसरे अलग-अलग बातें।' पहले रूप में इस कथन का अर्थ यह है कि ‘‘कर्मों के फल को तो जरूर सामने आना है, तुम लोग उसके बारे में तरह-तरह की अलग-अलग धारणाएँ रखती हो, परन्तु उसको मानने से वही व्यक्ति विमुख और उदंड होता है जो सत्य से फिरा हुआ है।’’ दूसरे रूप में अर्थ यह है कि "इन विभिन कथनों से वही व्यक्ति गुमराह होता है जो वास्तव में सत्‍य से हटा हुआ है।’’
قُتِلَ ٱلۡخَرَّٰصُونَ ۝ 9
(10) मारे गए अटकल और गुमान से हुक्म लगानेवाले,8
8. [अर्थात् आख़िरत की समस्या कोई] ऐसी समस्या नहीं है कि उसके बारे में आदमी सिर्फ़ अपनी अटकल से एक अन्दाज़ा क़ायम कर ले। इसलिए कि यह अन्दाज़ा अगर ग़लत निकले तो इसका अर्थ यह होगा कि आदमी ने अपने आपको बिलकुल तबाह व बरबाद कर लिया। साथ ही यह समस्या सिरे से उन समस्याओं में से है ही नहीं जिनके बारे में आदमी सिर्फ़ गुमान, अन्दाज़े और अटकल से कोई सही राय क़ायम कर सकता हो। क्योंकि अटकल और गुमान सिर्फ़ उन बातों में चल सकता है जिन्हें इनसान अनुभव कर सकता हो, और यह समस्या ऐसी है जिसका कोई पहलू भी अनुभव की परिधि में नहीं आता। इसलिए यह बात संभव ही नहीं है कि इसके बारे में कोई गुमान और अटकल पर आधारित अनुमान सही हो सके।
ٱلَّذِينَ هُمۡ فِي غَمۡرَةٖ سَاهُونَ ۝ 10
(11) जो अज्ञानता में डूबे हुए और ग़फ़लत में मदहोश हैं।9
9. अर्थात् उनको कुछ पता नहीं है कि अपने इन ग़लत अन्दाज़ों की बजह से वे किस अंजाम की ओर चले जा रहे है, हालाकि आख़िरत के बारे में ग़लत राय क़ायम करके जो रास्ता भी अपनाया गया है, वह सीधा विनाश की ओर जाता है।
يَسۡـَٔلُونَ أَيَّانَ يَوۡمُ ٱلدِّينِ ۝ 11
(12) पूछते हैं, आख़िर वह बदले का दिन कब आएगा?
يَوۡمَ هُمۡ عَلَى ٱلنَّارِ يُفۡتَنُونَ ۝ 12
(13) वह उस दिन आएगा जब ये लोग आग पर तपाए जाएंगे।10
10. इस्लाम-विरोधियों का यह प्रश्न कि बदले का दिन कब आएगा, जानकारी हासिल करने के लिए न था, बल्कि व्यंग्य करने और इसी उड़ाने के लिए था, इसलिए उनको उत्तर इस ढंग से दिया गया। सच तो यह है कि आख़िरत के किसी इंकारी की ओर से जब भी यह प्रश्न होगा कि आखिरत किस तिथि को आएगी, उसका यह प्रन] व्यय और हंसी के रूप ही में होगा, इसलिए कि आखिरत के आने की तिथि बयान करने और न करने का कोई प्रभाव भी मूल वार्ता पर नहीं पड़ता।
ذُوقُواْ فِتۡنَتَكُمۡ هَٰذَا ٱلَّذِي كُنتُم بِهِۦ تَسۡتَعۡجِلُونَ ۝ 13
(14) (इनसे कहा जाएगा) अब चखो मज़ा अपने ‘फ़ित्‍ने’ का,11 यह वही चीज़ है जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।12
11. ‘फ़ितने’ का शब्द यहाँ दो अर्थ दे रहा है। एक अर्थ यह है कि अपने इस अज़ाब का मज़ा चखो। दूसरा अर्थ यह है कि अपने इस फ़ितने का मज़ा चखो जो तुमने दुनिया में फैला रखा था।
12. इस्लाम विरोधियों का यह पूछना कि आख़िर वह बदले का दिन कब आएगा?” अपने भीतर स्वयं यह अर्थ रखता था कि उसके आने में देर क्यों लग रही है? जब हम उसका इनकार कर रहे हैं और उसके झुठलाने की सज़ा हमारे लिए अनिवार्य हो चुकी है, तो वह आ क्यों नहीं जाती? इसी लिए जहन्नम की आग में उबा वे तप रहे होंगे, उस समय उनसे कहा जाएगा कि यह है वह चीज़ जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे। इस वाक्य का यह अर्थ आप से आप निकलता है कि यह तो अल्लाह की कृपा थी कि उसने तुमसे अवज्ञा प्रकट होते हो तुम्हें तुरन्त न पकड़ लिया और सोचने-समझने और सँभलने के लिए वह तुमको एक लम्बी मोहलत देता रहा। मगर तुम ऐसे मूर्ख थे कि उस मोहलत से लाभ उठाने के बजाय उलटे यह मांग करते रहे कि यह समय तुम पर जल्दी ले आया जाए। अब देख लो कि वह क्या चीज़ थी जिसके जल्दी आ जाने की माँग तुम कर रहे थे।
إِنَّ ٱلۡمُتَّقِينَ فِي جَنَّٰتٖ وَعُيُونٍ ۝ 14
(15) अलबत्ता अल्लाह का डर रखनेवाले लोग13 उस दिन बाग़ों और स्रोतों में होंगे,
13. इस संदर्भ में शब्द मुत्तक़ी (परहेज़गार) स्पष्ट रूप से यह अर्थ दे रहा है कि इससे तात्पर्य वे लोग हैं, जिन्होंने अल्लाह की किताब और उसके रसूल की दी हुई ख़बर पर विश्वास करके आख़िरत को मान लिया और वह रवैया अपना लिया जो आख़िरत की ज़िन्दगी की सफलता के लिए उन्हें बताया गया था और उस रवैये से बचे जिसके बारे में उन्हें बता दिया गया था कि यह अल्लाह के अज़ाब में डाल देनेवाला है।
ءَاخِذِينَ مَآ ءَاتَىٰهُمۡ رَبُّهُمۡۚ إِنَّهُمۡ كَانُواْ قَبۡلَ ذَٰلِكَ مُحۡسِنِينَ ۝ 15
(16) जो कुछ उनका रब उन्हें देगा, उसे ख़ुशी-ख़ुशी ले रहे होंगे।14 वे उस दिन के आने से पहले सुकर्मी थे,
14. यद्यपि मूल अरबी शब्द हैं, 'आखिजी-न मा आताहुम रब्बुहुम' और इनका शाब्दिक अर्थ केवल यह है कि "ले रहे होंगे जो कुछ उनके रब ने उनको दिया होगा," लेकिन संदर्भ को देखते हुए इस जगह लेने' का अर्थ केवल लेना' नहीं, बल्कि खुशी-खुशी लेना है। जब किसी व्यक्ति को उसकी पसन्द की चीज़ दी जाए तो उसे लेने में आप से आप ख़ुशी स्वीकार करने का अर्थ पैदा हो जाता है।
كَانُواْ قَلِيلٗا مِّنَ ٱلَّيۡلِ مَا يَهۡجَعُونَ ۝ 16
(17) रातों को कम ही सोते थे,15
15. टीकाकरों के एक वर्ग ने इस आयत का अर्थ यह लिया है कि कम ही ऐसा होता था कि वे रात भर सोकर गुज़ार दें और उसका कुछ न कुछ भाग, कम या अधिक, शुरू रात में या बीच रात में या रात के अन्तिम भाग में जागकर अल्लाह की इबादत (उपासना) में न लगा दें। यह टीका शब्दों के थोड़े-थोड़े विभेद के साथ हज़रत इब्ने-अब्बास, अनस बिन मालिक, मुहम्मद बाक़र, मुतरिफ़ बिन अब्दुल्लाह, अबुल आलिया, मुजाहिद, क़तादा, रबीअविन अनस आदि से नकल की गई है। दूसरे वर्ग ने इसका अर्थ यह बताया हैं कि वे अपनी रातों का अधिक भाग सर्वोच्च अल्लाह की इबादत में गुज़ारते थे और कम सोते थे। यह कथन इज़रत हसन बसरी, अहनफ़ बिन लैस और इब्ने-शिहाब जोहरी का है, और बाद के टीकाकारों व अनुवादकों ने इसी को प्राथमिकता दी है क्योंकि आयत के शब्दों और संदर्भ की दृष्टि से यही टीका अधिक अनुकूलता रखती नज़र आती है। इसी लिए हमने अनुवाद में यही अर्थ लिया है।
وَبِٱلۡأَسۡحَارِ هُمۡ يَسۡتَغۡفِرُونَ ۝ 17
(18) फिर वही रात के पिछले पहरों में माफ़ी मांगते थे,16
16. अर्थात् वे लोग उन लोगों में से न थे जो अपनी रातें बुराई के कामों और अश्लील कामों में गुज़ारते थे और फिर भी किसी क्षमा माँगने (इस्तिग़फ़ार) का विचार तक उन्हें न आया। इसके विपरीत उनका हाल यह था कि रात का अच्छा-ख़ासा हिस्सा अल्लाह की इबादत में लगा देते थे और फिर भी पिछले पहरों में अपने रख के सामने माफ़ी मानते थे कि आपकी बन्दगी का जो हक हमपर था, उसके अदा करने में हमसे कोताही हुई। हुम यस्त्रिग़्फ़रुन ‘ (वे माफ़ी माँगते थे) के शब्दों में एक संकेत इस बात की ओर भी निकलता है कि यह रवैया उन्हीं को शोभा देता था। बन्दगी की इस शान के वही योग्य थे कि अपने रब की बन्दगी में जान भी लड़ाएँ और फिर उसपर फूलने और अपनी नेकी पर गर्व करने के बजाय गिड़गिड़ाकर अपनी कोताहियों की माफ़ी भी माँगें । यह उन बेशर्म गुनाहगारों का रवैया न हो सकता था जो पाप भी करते थे और ऊपर से अकड़ते भी थे।
وَفِيٓ أَمۡوَٰلِهِمۡ حَقّٞ لِّلسَّآئِلِ وَٱلۡمَحۡرُومِ ۝ 18
(19) और उनके मालों में हक़ था माँगनेवाले और उनके लिए जो पाने से रह गए हों।17
17. दूसरे शब्दों में, एक ओर अपने रब का हक़ वे इस तरह पहचानते और अदा करते थे, दूसरी ओर बन्दों के साथ उनका मामला यह था कि जो कुछ भी अल्लाह ने उनको दिया था, चाहे थोड़ा हो या बहुत, उसमें वे केवल अपना और अपने बाल-बच्चों ही का हक़ नहीं समझते थे, बल्कि उनको यह एहसास था कि हमारे इस माल में ख़ुदा के हर उस बन्दे का हक़ है जो हमारी मदद का मुहताज है। वे बन्दों की मदद ख़ैरात के रूप में नहीं करते थे कि उसपर उनसे शुक्रिया तलब करते और उनको अपने उपकार से दबा लेते, बल्कि वे इसे उनका हक़ समझते थे और अपना कर्त्तव्य समझकर अदा करते थे। फिर उनकी यह जन-सेवा सिर्फ़ उन्हीं लोगों तक सीमित न थी जो स्वयं माँगनेवाले बनकर उनसे मदद माँगने के लिए आते, बल्कि जिसके बारे में भी उनकी जानकारी में यह बात आ जाती थी कि वह अपनी रोज़ी पाने से महरूम रह गया है, उसकी सहायता के लिए वे खुद बेचैन हो जाते थे। कोई यतीम बच्चा जो बे-सहारा रह गया हो, कोई विधवा जिसका कोई सरपरस्त न हो, कोई विवश व अपंग जो अपनी रोज़ी के लिए हाथ-पाँव न मार सकता हो, कोई व्यक्ति जिसका रोज़गार छूट गया हो या जिसकी कमाई उसकी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त न हो रही हो, कोई व्यक्ति जो किसी आफ़त का शिकार हो गया हो और अपनी क्षति-पूर्ति स्वयं न कर सकता हो, तात्पर्य यह है कि कोई ज़रूरतमंद ऐसा न था जिसकी हालत उनको मालूम हो और वे उसकी मदद कर सकते हों और फिर भी उन्होंने उसका हक़ मानकर उसकी मदद करने में कोताही की हो। ये तीन गुण हैं जिनके आधार पर अल्लाह उनको मुत्तक़ी (परहेज़गार) और मुहसिन (उत्तमकर्मी) क़रार देता है और फ़रमाता है कि इन्हीं गुणों ने उनको जन्नत का अधिकारी बनाया है- एक यह कि आख़िरत पर ईमान लाकर उन्होंने हर उस रवैये से परहेज़ किया जिसे अल्लाह और उसके रसूल (सल्ल०) ने आख़िरत की ज़िन्दगी के लिए विनाशकारी बताया था। दूसरा यह कि उन्होंने अल्लाह की बन्दगी का हक़ अपनी जान लड़ाकर अदा किया और उसपर घमंड और गर्व करने के बजाय माफ़ी ही चाहते रहे। तीसरा यह कि उन्होंने अल्लाह के बन्दों को सेवा उनपर उपकार समझकर नहीं, बल्कि अपना कर्तव्य और उनका हक समझकर की। इस जगह यह बात और जान लेनी चाहिए कि ईमानवालों के मालों में माँगनेवाले और महरूम (वंचित) के जिस हक़ और अधिकार का यहाँ उल्लेख किया गया है, उससे तात्पर्य ज़कात नहीं है जिसे शरीअत ने उनपर अनिवार्य कर दिया है, बल्कि यह वह हक़ है जो ज़कात अदा करने के बाद भी एक सामर्थ्य रखनेवाला मोमिन अपने माल में ख़ुद महसूस करता है और अपने दिल की ख़ुशी के साथ उसे अदा करता है, बिना इसके कि शरीअत ने उसे ज़रूरी करार दिया हो। इब्ने-अब्बास, मुजाहिद और ज़ैद बिन असलम आदि बुज़ुर्गों ने इस आयत का यही मतलब बताया है। वास्तव में अल्लाह के इस कथन की मूल आत्मा यह है कि एक मुत्तक़ी’ (परहेज़गार) और मोहसिन’ (उत्तमकर्मी) इनसान कभी इस भ्रम में नहीं पड़ता कि ख़ुदा और उसके बन्दों का जा हक मेरे माल में था, ज़कात अदा करके मैंने उससे छुटकारा प्राप्त कर लिया है, अब मैंने इस बात का कोई उका नहीं ले लिया है कि हर नंगे, भूखे, मुसीबत के मारे इनसान की मदद करता फिरूं। इसके विपरीत जो अल्लाह का बन्दा वास्तव में परहेज़गार और मोहसिन’ (उत्तमकर्मी) होता है, वह हर समय हर उस भलाई के लिए, जो उसके बस में हो, दिल व जान से तैयार रहता है और जो मौक़ा भी उसे दुनिया में कोई नेक काम करने के लिए मिले, उसे हाथ से नहीं जाने देता। उसके सोचने का यह अंदाज़ ही नहीं होता कि जो नेकी मुझपर अनिवार्य की गई थी वह मैं कर चुका हूँ, अब और अधिक नेकी क्यों करूँ? भलाई और नेकी की क़द्र जो आदमी पहचान चुका हो वह उसे बोझ समझकर सहन नहीं करता, बल्कि अपने ही लाभ का सौदा समझकर अधिक से अधिक कमाने की फ़िक्र करता है।
وَفِي ٱلۡأَرۡضِ ءَايَٰتٞ لِّلۡمُوقِنِينَ ۝ 19
(20) ज़मीन में बहुत-सी निशानियाँ हैं विश्वास करनेवालों के लिए,18
18. निशानियों से तात्पर्य वे निशानियाँ हैं जो आख़िरत की संभावना और उसके आवश्यक और अनिवार्य रूप से आने की गवाहियाँ दे रही हैं। ज़मीन का अपना अस्तित्त्व और उसकी बनावट, उसका सूरज से एक विशेष दूरी पर और एक विशेष कोण (Angle) पर रखा जाना, उसपर तापमान और रौशनी की व्यवस्था, उसपर अलग-अलग मौसमों का आना-जाना, उसके ऊपर हवा और पानी का जुटाना, उसके पेट में तरह-तरह के अनगिनत ख़ज़ानों का जुटाया जाना, उसके सतह पर एक उपजाऊ छिलका चढ़ाया जाना, उसमें भाँति-भांति की असंख्य वनस्पतियों का उगाया जाना, उसके अन्दर ख़ुश्की और तरी और वायुमंडल में पाए जानेवाले जानवरों की अनगिनत नस्लें जारी करना, उसमें हर प्रकार के प्राणियों के लिए यथोचित परिस्थिति और उचित भोजन का प्रबन्ध करना, उसपर इनसान को अस्तित्त्व में लाने से पहले उन तमाम संसाधनों को उपलब्ध करा देना जो इतिहास के हर मरहले में उसकी हर दिन बढ़ती ज़रूरतों ही का नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति व सभ्यता की उन्नति का साथ भी देते चले जाएँ, यह और दूसरी अनगिनत निशानियाँ ऐसी हैं कि खुली आँखें रखनेवाला जिस ओर भी ज़मीन और उसके वातावरण में दृष्टि डाले, वे उसके दिल के दामन को खींच लेती हैं। जो व्यक्ति विश्वास के लिए अपने दिल के दरवाज़े बन्द कर चुका हो उसकी बात तो दूसरी है। वह इनमें और सब कुछ देख लेगा, बस वास्तविकता की ओर संकेत करनेवाली कोई निशानी ही न देखेगा। मगर जिसका दिल तास्सुब (पक्षपात) से पाक और सच्चाई के लिए खुला हुआ है, वह इन चीज़ों को देखकर कदापि यह धारणा न बनाएगा कि यह सब कुछ किसी संयोगवश धमाके का नतीजा है जो कई अरब साल पहले सृष्टि में अचानक हुआ था, बल्कि उसे विश्वास हो जाएगा कि यह उच्चतम श्रेणी की तत्त्वदर्शितापूर्ण कारीगरी अवश्य ही एक सर्वशक्तिमान, ज्ञानवान और तत्त्वदर्शी परमेश्वर की पैदा की हुई है। और वह परमेश्वर, जिसने यह ज़मीन बनाई है, न इस बात में असमर्थ हो सकता है कि इनसान को मरने के बाद दोबारा पैदा कर दे और न ऐसा नादान हो सकता है कि अपनी ज़मीन में बुद्धि और चेतना रखनेवाली एक मख़लूक़ को अधिकार देकर बे-नथे बैल की तरह छोड़ दे। अधिकारों का दिया जाना आप से आप हिसाब-किताब का तक़ाज़ा करता है। जो अगर न हो तो तत्त्वदर्शिता और न्याय के विरुद्ध होगा। और शक्ति का पाया जाना अपने आप ही इस बात का प्रमाण है कि दुनिया में मानव जाति का काम समाप्त होने के बाद उसका पैदा करनेवाला जब चाहेगा हिसाब-किताब के लिए उसके तमाम लोगों को ज़मीन के हर कोने से, जहाँ भी वे मरे पड़े हों, उठाकर ला सकता है।
وَفِيٓ أَنفُسِكُمۡۚ أَفَلَا تُبۡصِرُونَ ۝ 20
(21) और स्वयं तुम्हारे अपने अस्तित्त्व में हैं।19 क्या तुमको सूझता नहीं?
19. अर्थात् बाहर देखने की भी ज़रूरत नहीं, स्वयं अपने भीतर देखो तो तुम्हें इसी तथ्य पर गवाही देनेवाली अनगिनत निशानियाँ मिल जाएँगी। किस तरह एक सूक्ष्म कीड़े और ऐसे ही एक सूक्ष्म अंडे को मिलाकर माँ के जिस्म के एक कोने में तुम्हारी पैदाइश की नींव रखी गई। किस तरह तुम्हें उस अंधेरी जगह में परवरिश करके धीरे-धीरे बढ़ाया गया। किस तरह तुम्हें एक अद्वितीय बनावट का शरीर और चकित कर देनेवाली शक्तियों से मालामाल व्यक्तित्व प्रदान किया गया। किस तरह तुम्हारी बनावट के पूरा होते ही माँ के पेट की तंग और अंधेरी दुनिया से निकालकर तुम्हें इस लंबी-चौड़ी दुनिया में इस शान के साथ लाया गया कि एक ज़बरदस्त आटोमेटिक (स्वचालित) मशीन तुम्हारे अन्दर फिट है जो जन्म के दिन से जवानी और बुढ़ापे तक साँस लेने, भोजन पचाने, ख़ून बनाने और नस-नस में उसको दौड़ाने, गन्दगी निकालने, शरीर के नष्ट हो जानेवाले अंशों की जगह दूसरे अंशों के तैयार करने और अन्दर से पैदा होनेवाली या बाहर से आनेवाली मुसीबतों का मुक़ाबला करने और क्षति-पूर्ति करने, यहाँ तक कि थकावट के बाद तुम्हें आराम के लिए सुला देने तक का काम अपने आप किए जाती है, बिना इसके कि तुम्हारी तवज्जोह और कोशिशों का कोई हिस्सा ज़िन्दगी की इन बुनियादी ज़रूरतों पर व्यय हो। एक विचित्र दिमाग़ तुम्हारे सिर में रख दिया गया है जिसकी पेचीदा तहों में बुद्धि, सोच-विचार, चिन्तन, पहचान, इरादा, स्मृति, इच्छा, चेतनाएँ और भावनाएँ, झुकाव, रुझान और दूसरी मानसिक ताक़तों की एक अनमोल दौलत भरी पड़ी है। ज्ञान के बहुत-से साधन तुम्हें दिए गए हैं जो आँख, नाक, कान और पूरे शरीर की खाल से तुमको हर प्रकार की सूचनाएँ उपलब्ध कराते हैं। ज़बान और बोलने की शक्ति तुमको दे दी गई है जिसके द्वारा तुम अपने मन की बात व्यक्त कर सकते हो और फिर तुम्हारे अस्तित्त्व के इस पूरे साम्राज्य पर तुम्हारे अहं को एक शासक बनाकर बिठा दिया गया है कि इन तमाम शक्तियों से काम लेकर राय क़ायम करो और यह फै़सला करो कि तुम्हें किन राहों में अपने समय, मेहनतों और कोशिशों को लगाना है ? क्या चीज़ रद्द करनी है और क्या स्वीकार करनी है? किस चीज़ को अपना मक़सद बनाना है और किसको नहीं बनाना? यह हस्ती बनाकर जब तुम्हें दुनिया में लाया गया तो तनिक देखो कि यहाँ आते ही कितना सरो-सामान तुम्हें पालने-पोसने और तुम्हारे अस्तित्व की उन्नति और पूर्णता के लिए तैयार था, जिसके कारण तुम ज़िन्दगी के एक विशेष चरण (मरहले) पर पहुँचकर अपने इन अधिकारों को प्रयोग करने के योग्य हो गए। इन अधिकारों को प्रयोग में लाने के लिए जमीन में तुमको साधन दिए गए, अवसर जुटाए गए। बहुत-सी चीज़ों पर तुमको उपभोग की ताक़त दी गई। बहुत-से इनसानों के साथ तुमने तरह-तरह के मामले किए। तुम्हारे सामने कुफ़्र व ईमान (परमेश्वर को मानने, न मानने), आज्ञापालन व अवज्ञा, ज़ुल्म व ईसाफ़, भलाई व बुराई, सत्य व असत्य की तमाम राहें खुली हुई थी और इन राहों में से हर एक की ओर बुलानेवाले और हर एक की ओर ले जानेवाले कारण मौजूद थे। तुममें से जिसने जिस राह को भी चुना, अपनी ज़िम्मेदारी पर चुना, क्योंकि फ़ैसला और चुनाव की ताक़त उसके अन्दर रखी गई थी। हर एक के अपने ही चुनाव के अनुसार उसकी नीयतों और इरादों को व्यवहार में लाने के जो अवसर उसको प्राप्त हुए, उनसे लाभ उठाकर कोई सदाचारी बना और कोई दुराचारी, किसी ने ईमान (परमेश्वर में आस्था) का रास्ता अपनाया और किसी ने कुफ़्र व शिर्क (अधर्म और अनेकेश्वरवाद) या नास्तिकता की राह ली, किसी ने अपने मन को ग़लत इच्छाओं से रोका और कोई मनोकामना की पूर्ति में सब कुछ कर गुज़रा, किसी ने जु़ल्म किया और किसी ने ज़ुल्म सहा, किसी ने हक अदा किए और किसी ने हक़ मारे, किसी ने मरते दम तक दुनिया में भलाई की और कोई ज़िन्दगी को अन्तिम घड़ी तक बुराइयाँ करता रहा, किसी ने सत्य का बोलबाला करने के लिए जान लड़ाई और कोई असत्य का बोलबाला करने के लिए सत्यवादियों पर ज़ुल्म करता रहा। अब क्या कोई व्यक्ति, जिसके दिल की आँखें बिल्कुल ही फूट न गई हों, यह कह सकता है कि इस तरह की एक हस्ती ज़मीन पर संयोग से अस्तित्व में आ गई है? कोई तत्त्वदर्शिता और कोई योजना उसके पीछे काम नहीं कर रहा है? ज़मीन पर उसके हाथों ये सारे हँगामे जो हो रहे हैं, सब उद्देश्यहीन हैं और और किसी परिणाम के समाप्त हो जानेवाले हैं ? किसी भलाई का कोई इनाम और किसी बुराई का कोई फल नहीं ? किसी ज़ुल्म की कोई सुनवाई और किसी ज़ालिम की कोई पूछ-गछ नहीं ? इस तरह की बातें एक अक्ल का अंधा तो कह सकता है या फिर वह व्यक्ति कह सकता है जो पहले से कसम खाए बैठा है कि इनसान की पैदाइश के पीछे किसी तत्त्वदर्शी की तत्त्वदर्शिता को नहीं मानना है। मगर एक निष्पक्ष बुद्धिमान व्यक्ति यह माने बिना नहीं रह सकता कि इनसान को जिस तरह जिन शक्तियों और योग्यताओं के साथ इस दुनिया में पैदा किया गया है और जो हैसियत उसको यहाँ दी गई है, वह निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी तत्त्वदर्शितापूर्ण योजना है, और जिस ख़ुदा की यह योजना है उसकी तत्त्वदर्शिता अनिवार्य रूप से यह तक़ाज़ा करती है कि इनसान से उसके कामों की पूछ-गछ हो, और उसकी सामर्थ्य के बारे में यह गुमान करना कदापि सही नहीं हो सकता कि जिस इनसान को वह एक अत्यन्त सूक्ष्म कोशिका से शुरू करके इस स्थान तक पहुँचा चुका है, उसे फिर अस्तित्त्व में न ला सकेगा।
وَفِي ٱلسَّمَآءِ رِزۡقُكُمۡ وَمَا تُوعَدُونَ ۝ 21
(22) आसमान ही में है तुम्हारी रोज़ी भी और वह चीज़ भी जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है।20
20. आसमान से तात्पर्य यहाँ ऊपरी लोक है। रोज़ी से तात्पर्य वह सब कुछ है जो दुनिया में इनसान को जीने और काम करने के लिए दिया जाता है। और जिस चीज़ का वादा किया जा रहा है, उससे तात्पर्य क़ियामत, मरने के बाद ज़िन्दा करके उठाया और इकट्ठा किया जाना, हिसाब-किताब, पूछ-गछ, इनाम व सज़ा और जन्नत व दोज़ख़ हैं, जिनके सामने आने का वादा तमाम आसमानी किताबों में किया गया है और क़ुरआन में किया जा रहा है। अल्लाह के इस कथन का अर्थ यह है कि ऊपरी लोक ही से यह फै़सला होता है कि तुममें से किसको क्या कुछ दुनिया में दिया जाए और वहीं से यह फै़सला भी होना है कि तुम्हें पूछ-गछ और कर्मों का बदला देने के लिए कब बुलाया जाए?
فَوَرَبِّ ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِ إِنَّهُۥ لَحَقّٞ مِّثۡلَ مَآ أَنَّكُمۡ تَنطِقُونَ ۝ 22
(23) अतएव क़सम है आसमान और ज़मीन के मालिक की, यह बात सत्य है, ऐसी ही विश्वसनीय जिसे तुम बोल रहे हो।
هَلۡ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ضَيۡفِ إِبۡرَٰهِيمَ ٱلۡمُكۡرَمِينَ ۝ 23
(24) ऐ नबी !21 इबराहीम के आदरणीय मेहमानों का वृत्तान्त भी तुम्हें पहुँचा है?22
21. अब यहाँ से आयत 45 के अन्त तक नबियों और कुछ पिछली क़ौमों के अंजाम की ओर एक के बाद एक संक्षिप्त संकेत किए गए हैं, जिनका अभिप्राय दो बातें मन में बिठाना है- एक, यह कि मानव-इतिहास में ख़ुदा का बदला दिया जाने का क़ानून बराबर काम करता रहा है, जिसमें अच्छे काम करनेवाले लोगों के लिए इनाम और ज़ालिमों के लिए सज़ा के उदाहरण बराबर पाए जाते हैं। यह इस बात की खुली निशानी है कि दुनिया की इस ज़िन्दगी में भी इनसान के साथ उसके पैदा करनेवाले का मामला केवल भौतिक नियम ( Physical Law) पर आधारित नहीं है, बल्कि नैतिक नियम (Moral Law) उसके साथ सक्रिय है। और जब जगत् के साम्राज्य का स्वभाव यह है कि जिस मख़लूक़ (सृष्ट जीव) को प्राकृतिक देह में रहकर नैतिक कार्यों का अवसर दिया गया हो उसके साथ पशुओं और वनस्पतियों की तरह सिर्फ़ प्राकृतिक क़ानूनों पर मामला न किया जाए, बल्कि उसके नैतिक कर्मों पर नैतिक नियम भी लागू किया जाए, तो यह बात अपने आप में इस सत्य की ओर निशानदेही करती है कि इस साम्राज्य में एक ऐसा समय ज़रूर आना चाहिए जब इस भौतिक जगत् में इनसान का काम समाप्त हो जाने के बाद विशुद्ध नैतिक क़ानून के अनुसार उसके नैतिक कर्मों के नतीजे पूरी तरह बरामद हों। क्योंकि इस भौतिक जगत् में वे पूर्ण रूप से बरामद नहीं हो सकते। दूसरी बात यह कि जिन क़ौमों ने भी नबियों की बात न मानी, वे अन्ततः विनाश की अधिकारी बनीं। इतिहास का यह निरन्तर अनुभव इस बात पर गवाह है कि ख़ुदा का नैतिक क़ानून, जो नबियों के ज़रिये से दिया गया और उसके अनुसार मानव-कर्मों की पूछ-गछ जो आख़िरत में होनी है, पूर्णत: सत्य पर आधारित है. क्योंकि जिस क़ौम ने भी इस क़ानून से निस्पृह (बेनियाज़) होकर दुनिया में अपना रवैया निश्चित किया है, वह अन्तत: सीधे विनाश की ओर गई है।
22. यह क़िस्सा क़ुरआन मजीद में तीन जगहों पर पहले आ चुका है। देखिए सूरा-11 हूद, आयत 69-76; सूरा-15 अल-हिज्र, आयत 51-60; सूरा-29 अल-अन्कबूत, आयत 31-32
إِذۡ دَخَلُواْ عَلَيۡهِ فَقَالُواْ سَلَٰمٗاۖ قَالَ سَلَٰمٞ قَوۡمٞ مُّنكَرُونَ ۝ 24
(25) जब वे उसके यहाँ आए तो कहा, आपको सलाम है। उसने कहा, "आप लोगों को सलाम है- कुछ अपरिचित-से लोग हैं।’’23
23. सन्दर्भ को देखते हुए इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं- एक, यह कि हज़रत इबराहीम (अलैहि०) ने स्वयं उन मेहमानों से फ़रमाया कि आप लोगों से कभी पहले कोई मुलाक़ात नहीं हुई। आप शायद इस क्षेत्र में नए-नए पधारे हैं। दूसरा, यह कि उनके सलाम का जवाब देकर हज़रत इबराहीम (अलैहि०) ने अपने दिल में कहा या घर में सत्कार का प्रबन्ध करने के लिए जाते हुए अपने सेवकों से कहा कि ये कुछ अजनबी-से लोग हैं, पहले कभी इस क्षेत्र में इस शान और वेश-भूषा के लोग देखने में नहीं आए।
فَرَاغَ إِلَىٰٓ أَهۡلِهِۦ فَجَآءَ بِعِجۡلٖ سَمِينٖ ۝ 25
(26) फिर वह चुपके से अपने घरवालों के पास गया24 और एक (भुना हुआ) मोटा ताज़ा बछड़ा25 लाकर मेहमानों के सामने पेश किया।
24. अर्थात् अपने मेहमानों से यह नहीं कहा कि मैं आपके लिए खाने का प्रबन्ध करता हूँ, बल्कि उन्हें बिठाकर चुपचाप से सत्कार का प्रबन्ध करने चले गए, ताकि मेहमान संकोचवश यह न कहें कि इस तकलीफ़ की क्या ज़रूरत है।
25. सूरा-11 हूद में ‘इजलिन हनीज़' (भुने हुए बछड़े) के शब्द हैं। यहाँ बताया गया कि आपने ख़ूब छाँटकर मोटा ताजा बछड़ा भुनवाया था।
فَقَرَّبَهُۥٓ إِلَيۡهِمۡ قَالَ أَلَا تَأۡكُلُونَ ۝ 26
(27) उसने कहा, आप लोग खाते नहीं ?
فَأَوۡجَسَ مِنۡهُمۡ خِيفَةٗۖ قَالُواْ لَا تَخَفۡۖ وَبَشَّرُوهُ بِغُلَٰمٍ عَلِيمٖ ۝ 27
(28) फिर वह अपने दिल में उनसे डरा।26 उन्होंने कहा, डरिए नहीं। और उसे एक ज्ञानवान लड़के के पैदा होने की शुभ सूचना दी।27
26. अर्थात् जब उनके हाथ खाने की ओर न बढ़े तो हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के दिल में डर पैदा हुआ। इस डर की वजह यह भी हो सकती है कि अजनबी मुसाफ़िरों का किसी के घर जाकर खाने से परहेज़ करना क़बाइली ज़िन्दगी में इस बात की निशानी होता है कि वे किसी बुरे इरादे से आए हैं, लेकिन अनुमान यह है कि उनके इस बचने से ही हज़रत इबराहीम (अलैहि०) समझ गए कि ये फ़रिश्ते हैं जो मानव रूप में आए हैं, और चूँकि फ़रिश्तों का मानव-रूप में आना अत्यन्त असाधारण परिस्थिति में होता है, इसलिए आपको डर हुआ कि कोई भयानक मामला सामने है जिसके लिए ये लोग इस शान से तशरीफ़ लाए है।
27. सूरा-11 हूद में स्पष्ट किया गया है कि यह हज़रत इसहाक़ (अलैहि०) की पैदाइश की ख़ुशख़बरी थी और उसमें यह ख़ुशख़बरी भी दी थी कि हज़रत इसहाक़ (अलैहि०) से उनको हजरत याक़ूब (अलैहि०) जैसा पोता नसीब होगा।
فَأَقۡبَلَتِ ٱمۡرَأَتُهُۥ فِي صَرَّةٖ فَصَكَّتۡ وَجۡهَهَا وَقَالَتۡ عَجُوزٌ عَقِيمٞ ۝ 28
(29) यह सुनकर उसकी बीवी चिल्लाती हुई आगे बढ़ी और उसने अपना मुँह पीट लिया और कहने लगी बूढ़ी बाँझ!28
28. अर्थात् एक तो मैं बूढ़ी, ऊपर से बाँझ, अब मेरे यहाँ बच्चा पैदा होगा? बाइबल का बयान है कि उस समय हज़रत इबराहीम (अलैहि०) की उम्र सौ साल और हज़रत सारा की उम्र 90 साल थी। (उत्पत्ति 18:17)
قَالُواْ كَذَٰلِكِ قَالَ رَبُّكِۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلۡحَكِيمُ ٱلۡعَلِيمُ ۝ 29
(30) उन्होंने कहा, यही कुछ कहा है तेरे रब ने, वह तत्त्वदर्शी है और सब कुछ जानता है।29
29. इस क़िस्से का अभिप्राय यह बताना है कि जिस बन्दे ने अपने रब की बन्दगी का हक़ दुनिया में ठीक ठीक अदा किया था, उसके साथ परलोक में जो मामला होगा सो होगा, इसी दुनिया में उसको यह इनाम दिया गया कि सामान्य भौतिक नियमों के अनुसार जिस उम्र में उसके यहाँ सन्तान पैदा न हो सकती थी, उस समय अल्लाह ने उसे न सिर्फ़ औलाद दी, बल्कि ऐसी अनुपम औलाद दी जो आज तक किसी को प्राप्त नहीं हुई है। दुनिया में कोई दूसरा इनसान ऐसा नहीं है जिसकी नस्ल में लगातार चार नबी पैदा हुए हों। वे सिर्फ़ हज़रत इबराहीम (अलैहि०) ही थे जिनके यहाँ तीन पीढ़ी तक नुबूवत चलती रही और हजरत इसमाईल, हज़रत इसहाक़ और हज़रत याक़ूब और हज़रत यूसुफ़ (अलैहि०) जैसे महान पैग़म्बर उनके घराने से उठे।
۞قَالَ فَمَا خَطۡبُكُمۡ أَيُّهَا ٱلۡمُرۡسَلُونَ ۝ 30
(31) इबराहीम ने कहा, “ऐ अल्लाह के भेजे हुए दूत! क्या मुहिम (अभियान) आपके सामने हैं?”30
30. चूँकि फ़रिश्तों का मानव रूप में आना किसी बड़े महत्त्वपूर्ण काम के लिए होता है, इसलिए हज़रत इबराहीम (अलैहि०) ने उनके आने का उद्देश्य पूछने के लिए ‘ख़त्ब’ का शब्द प्रयोग किया। साथ अरबी भाषा में किसी सामान्य कार्य के लिए नहीं, बल्कि किसी बहुत बड़े कार्य के लिए बोला जाता है।
قَالُوٓاْ إِنَّآ أُرۡسِلۡنَآ إِلَىٰ قَوۡمٖ مُّجۡرِمِينَ ۝ 31
(32) उन्होंने कहा, "हम एक अपराधी क़ौम की ओर भेजे गए हैं, 31
31. तात्पर्य है लूत (अलैहि०) की क़ौम। उसके अपराध इतने बढ़ चुके थे कि केवल ‘अपराधी क़ौम' का शब्‍द ही यह बताने के लिए पर्याप्त था कि इससे तात्पर्य कौन-सी कौम है। इससे पहले क़ुरआन मजीद में नीचे लिखी जगहों पर उसका उल्लेख हो चुका है। [सूरा 7 अल-आराफ़, आयत 80-84; सूरा-11 हूद, आयत 74-833; सूरा-15 अल-हिज्र, आयत 57-77; सूरा-21 अल-अंबिया, आयत 74-75; सूरा-26 अश-शुअरा, आयत 160-175%3; सूरा-27 अन-नम्ल, आयत 54-583; सूरा-29 अल-अन्कबूत, आयत 28-35; सूरा-37 अस्साफ़्फ़ात, आयत 133-136]
لِنُرۡسِلَ عَلَيۡهِمۡ حِجَارَةٗ مِّن طِينٖ ۝ 32
(33) ताकि उसपर पकी हुई मिट्टी के पत्थर बरसा दें,
مُّسَوَّمَةً عِندَ رَبِّكَ لِلۡمُسۡرِفِينَ ۝ 33
(34) जो आपके रब के यहाँ सीमा का उल्‍लंघन करनेवालों के लिए चिह्नित हैं।”32
32. अर्थात् एक-एक पत्थर पर आपके रब की ओर से निशान लगा दिया गया है कि उसे किस अपराधी का सर कुचलना है। [(विवरण के लिए देखिए सूरा-11 हूद, टिप्पणी 91-92)]
فَأَخۡرَجۡنَا مَن كَانَ فِيهَا مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ۝ 34
(35) —फिर33 हमने उन सब लोगों को निकाल लिया जो उस बस्ती में ईमानवाले थे,
33. बीच में यह क़िस्सा छोड़ दिया गया है कि हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के पास से ये फ़रिश्ते किस तरह हज़रत लूत (अलैहि०) के यहाँ पहुँचे और वहाँ उनके और लूत की क़ौम के बीच क्या कुछ पेश आया। इसका विवरण सूरा-17 हूद, सूरा-15 हिज्र और सूरा-29 अन्कबूत में आ चुका है। यहाँ सिर्फ उस अन्तिम समय का उल्लेख किया जा रहा है जब उस क़ौम पर अज़ाब आनेवाला था।
فَمَا وَجَدۡنَا فِيهَا غَيۡرَ بَيۡتٖ مِّنَ ٱلۡمُسۡلِمِينَ ۝ 35
(36) और वहाँ हमने एक घर के सिवा मुसलमानों का कोई घर न पाया।34
34. अर्थात् पूरी क़ौम में और उसके पूरे क्षेत्र में केवल एक घर था जिसमें ईमान व इस्लाम की रौशनी पाई जाती थी, और वह अकेला हज़रत लूत (अलैहि०) का घर था। बाक़ी पूरी क़ौम बुराइयों और बदकारियों में डूबी हुई थी और उसका सारा देश गन्दगी से भर चुका था। इसलिए अल्लाह ने उस एक घर के लोगों को बचाकर निकाल लिया और उसके बाद उस देश पर वह तबाही भेजी जिससे उस दुष्कर्मी कौम का कोई व्यक्ति बचकर न जा सका। इस आयत में तीन महत्त्वपूर्ण विषयों का उल्लेख हुआ है- एक यह कि अल्लाह का ‘कर्मानुसार बदला दिए जाने का क़ानून’ उस समय तक किसी क़ौम के पूर्ण विनाश का निर्णय नहीं करता जब तक उसमें कुछ ऐसी भलाई मौजूद रहे जिसकी उपेक्षा न की जा सके। दूसरा यह कि ‘मुसलमान’ सिर्फ उसी उम्मत का नाम नहीं है जो मुहम्मद (सल्ल०) का पालन करती है, बल्कि आप (सल्ल०) से पहले के तमाम नबी और उनकी पैरवी करनेवाले भी मुसलमान ही थे। उनके दीन अलग-अलग न थे कि कोई दीने इबराहीमी हो और कोई मूसवी और कोई ईसवी, बल्कि वे सब मुस्लिम थे और उनका दीन यही इस्लाम था। तीसरा यह कि मोमिन’ और ‘मुस्लिम’ के शब्द इस आयत में बिल्कुल एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। इस आयत को अगर सूरा-49 हुजुरात की आयत 14 के साथ मिलाकर पढ़ा जाए तो उन लोगों के विचार की गलती पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है जो यह समझते हैं कि ‘मोमिन’ और ‘मुस्लिम’ क़ुरआन मजीद के दो ऐसे स्थाई पारिभाषिक शब्द हैं जो हर जगह एक ही अर्थ के लिए प्रयुक्त हुए हैं। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए टीका सूरा-49 हुजुरात, टिप्पणी 31)
وَتَرَكۡنَا فِيهَآ ءَايَةٗ لِّلَّذِينَ يَخَافُونَ ٱلۡعَذَابَ ٱلۡأَلِيمَ ۝ 36
(37) उसके बाद हमने वहाँ बस एक निशानी उन लोगों के लिए छोड़ दी जो दर्दनाक अज़ाब से डरते हों।35
35. इस निशानी से तात्पर्य मृत सागर (Dead Sea) है जिसका दक्षिणी क्षेत्र आज भी एक ज़बरदस्त विनाश की निशानियाँ पेश कर रहा है। पुरातत्त्व विशेषज्ञों का अन्दाज़ा है कि लूत की कौम के बड़े शहर शायद तेज़ भूकंप से ज़मीन के भीतर धंस गए थे और उनके ऊपर मृत सागर का पानी फैल गया था। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा-26 अश-शुअरा, टिप्पणी 114)
وَفِي مُوسَىٰٓ إِذۡ أَرۡسَلۡنَٰهُ إِلَىٰ فِرۡعَوۡنَ بِسُلۡطَٰنٖ مُّبِينٖ ۝ 37
(38) और (तुम्हारे लिए निशानी है) मूसा के क़िस्से में। जब हमने उसे स्पष्ट प्रमाण के साथ फ़िरऔन के पास भेजा,36
36. अर्थात् ऐसे खुले मोजिज़े (चमत्कार) और ऐसी खुली-खुली निशानियों के साथ भेजा जिनसे इस बात में सन्देह न रहा था कि आप (सल्ल०) आसमान और ज़मीन के स्रष्टा की ओर से नियुक्त होकर आए हैं।
فَتَوَلَّىٰ بِرُكۡنِهِۦ وَقَالَ سَٰحِرٌ أَوۡ مَجۡنُونٞ ۝ 38
(39) तो वह अपने बल-बूते पर अकड़ गया और बोला, यह जादूगर है, या दीवाना है।37
37. अर्थात् कभी उसने आप (सल्ल०) को जादूगर क़रार दिया और कभी कहा कि यह व्यक्ति मजनून (दीवाना) है।
فَأَخَذۡنَٰهُ وَجُنُودَهُۥ فَنَبَذۡنَٰهُمۡ فِي ٱلۡيَمِّ وَهُوَ مُلِيمٞ ۝ 39
(40) आख़िरकार हमने उसे और उसकी सेनाओं को पकड़ा और सबको समुद्र में फेंक दिया और वह निन्दित होकर रह गया।38
38. स्पष्ट बात है कि जब फ़िरऔन अपनी फ़ौजों सहित अचानक एक दिन डूबा होगा तो सिर्फ़ मिस्र ही में नहीं, आसपास की तमाम क़ौमों में इस घटना की धूम मच गई होगी। मगर इसपर अलावा उन लोगों के, जिनके अपने क़रीबी रिश्तेदार डूबे थे, बाक़ी कोई न था जो उनके अपने देश में या दुनिया की दूसरी क़ौमों में मातम करता। चूंकि दुनिया उनके जुल्म से तंग आई हुई थी, इसलिए उनके इबरतनाक (शिक्षाप्रद) अंजाम पर हर व्यक्ति ने इत्मीनान का साँस लिया और हर ज़बान ने उनपर निन्दा की फटकार बरसाई। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए : टीका सूरा-44 अद-दुख़ान, टिप्पणी 25)
وَفِي عَادٍ إِذۡ أَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِمُ ٱلرِّيحَ ٱلۡعَقِيمَ ۝ 40
(41) और (तुम्हारे लिए निशानी है) आद में, जबकि हमने उनपर एक ऐसी अशुभ हवा भेज दी
مَا تَذَرُ مِن شَيۡءٍ أَتَتۡ عَلَيۡهِ إِلَّا جَعَلَتۡهُ كَٱلرَّمِيمِ ۝ 41
(42) कि जिस चीज़ पर भी वह गुज़र गई, उसे नष्ट करके रख दिया ।39
39. इस हवा के लिए शब्द ‘अक़ीम’ प्रयुक्त हुआ है, जो बाँझ औरत के लिए बोला जाता है, और शब्दकोष में उसका मूल अर्थ ‘याबिस’ (ख़ुश्क) है। अगर इसे शाब्दिक अर्थ में लिया जाए तो इसका अर्थ यह होगा कि वह ऐसी सख़्त, गर्म और ख़ुश्क हवा थी। जिस चीज़ पर से वह गुज़र गई उसे सुखाकर रख दिया, और अगर उसे मुहावरे के अर्थ में लिया जाए तो इसका अर्थ यह होगा कि बाँझ औरत की तरह वह ऐसी हवा थी जो अपने अन्दर कोई लाभ न रखती थी, न खु़शगवार थी, न बारिश लानेवाली, न पेड़ों को फलदार बनानेवाली और न उन फ़ायदों में से कोई फ़ायदा उसमें था जिनके लिए हवा का चलना अपेक्षित होता है। दूसरी जगहों पर बताया गया है कि यह सिर्फ़ अशुभ और ख़ुश्क ही न थी, बल्कि बड़ी भयानक आँधी की शक्ल में आई थी जिसने लोगों को उठा-उठाकर पटक दिया, और यह लगातार आठ दिन और सात रातों तक चलती रही, यहाँ तक कि आद कौम के पूरे इलाके को तहस-नहस करके रख दिया। (व्याख्या के लिए देखिए सूरा-41 हा-मीम अस-सन्दा, टिप्पणी 20-21; सूरा-46 अल-अहकाफ, टिप्पणी 25-28)
وَفِي ثَمُودَ إِذۡ قِيلَ لَهُمۡ تَمَتَّعُواْ حَتَّىٰ حِينٖ ۝ 42
(43) और (तुम्हारे लिए निशानी है) समूद में, जब उनसे कहा गया था कि एक ख़ास वक़्त तक मज़े कर लो।40
40. टीकाकरों में इस बात में मतभेद है कि इससे तात्पर्य कौन-सी मोहलत है। सही बात वही मालूम होती है जो हसन बसरी (रह) ने कही है, अर्थात् यह] कि यह बात हज़रत सालेह (अलैहि०) ने अपनी दावत के शुरू में अपनी क़ौम से फ़रमाई थी, और इससे उनका मतलब यह था कि अगर तुम तौबा और ईमान का रास्ता न अपनाओगे तो एक विशेष समय तक ही तुमको दुनिया में ऐश करने की मोहलत मिल सकेगी और उसके बाद तुम्हारी शामत आ जाएगी। बाद की आयता फ़-अतौ अन अमरि रचिहिम’ (फिर उन्होंने अपने रब के आदेश का उल्लंघन किया) [से इस राय का समर्थन होता है।]
فَعَتَوۡاْ عَنۡ أَمۡرِ رَبِّهِمۡ فَأَخَذَتۡهُمُ ٱلصَّٰعِقَةُ وَهُمۡ يَنظُرُونَ ۝ 43
(44) मगर इस चेतावनी पर भी उन्होंने अपने रब के आदेश को न माना। अन्तत: उनके देखते-देखते एक अचानक टूट पड़नेवाले अज़ाब41 ने उनको आ लिया,
41. क़ुरआन मजीद में अलग-अलग जगहों पर इस अजाब के लिए अलग-अलग शब्दों का प्रयोग किया गया है। कहीं इसे रजका (दहला देनेवाली और हिला मारनेवाली आफत) कहा गया है और वहाँ इसको सैहा (धमाके और कड़के) कहा गया है। कहीं इसके लिए तामिया (इंतिहाई सख़्त आफ़त) का शब्द इस्तेमाल किया गया है, और यहाँ इसी को साधिका कहा गया है, जिसका अर्थ विजली की तरह अचानक टूट पड़नेवाली आफ़त भी है और सात कड़क भी। शायद यह अनाव एक ऐसे भूचाल की शक्ल में आया था जिसके साथ भयानक आवाज़ भी थी।
فَمَا ٱسۡتَطَٰعُواْ مِن قِيَامٖ وَمَا كَانُواْ مُنتَصِرِينَ ۝ 44
(45) फिर न उनमें उठने की शक्ति थी और न वे अपना बचाव कर सकते थे।42
42. मूल अरबी शब्द हैं ‘मा कानू मुन्तसिरीन’। इन्तिसार’ का शब्द अरबी भाषा में दो अर्थों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। इसका एक अर्थ है, अपने आपको किसी के आक्रमण से बचाना और दूसरा अर्थ है आक्रमण करनेवाले से बदला लेना।
وَقَوۡمَ نُوحٖ مِّن قَبۡلُۖ إِنَّهُمۡ كَانُواْ قَوۡمٗا فَٰسِقِينَ ۝ 45
(46) और इन सबसे पहले हमने नूह की क़ौम को नष्ट किया, क्योंकि वे अवज्ञाकारी लोग थे।
وَٱلسَّمَآءَ بَنَيۡنَٰهَا بِأَيۡيْدٖ وَإِنَّا لَمُوسِعُونَ ۝ 46
(47) आसमान43 को हमने अपने ज़ोर से बनाया है और हम इसकी शक्ति रखते हैं।44
43. आख़िरत के पक्ष में ऐतिहासिक प्रमाणों को प्रस्तुत करने के बाद अब फिर उसी के सुबूत में लौकिक प्रमाण प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
44. मूल अरबी शब्द हैं व इन्ना ल-मूसिऊन' मूसिअ का अर्थ शक्ति और सामर्थ्य रखनेवाले के भी हो सकते हैं और फैलानेवाले के भी। पहले अर्थ की दृष्टि से इस कथन का मतलब यह है कि यह आसमान हमने किसी की मदद से नहीं, बल्कि अपने जोर से बनाया है और इसका पैदा करना हमारी सामर्थ्य से बाहर न था। फिर यह विचार तुम लोगों के दिमाग में आखिर कैसे आ गया कि हम तुम्हें दोबारा पैदा न कर सकेंगे? दूसरे अर्थ की दृष्टि से मतलब यह है कि इस महान सृष्टि को हम बस एक बार बनाकर नहीं रह गए है, बल्कि बराबर इसे फैला रहे हैं और हर क्षण इसमें हमारी पैदाइश के नए-नए करिश्मे सामने आ रहे हैं। ऐसी ज़बरदस्त पैदा करनेवाली हस्ती को आख़िर तुमने दोबारा पैदा करने में विवश क्यों समझ रखा है?
وَٱلۡأَرۡضَ فَرَشۡنَٰهَا فَنِعۡمَ ٱلۡمَٰهِدُونَ ۝ 47
(48) ज़मीन को हमने बिछाया है और हम बड़े अच्छे समतल करनेवाले हैं।45
45. इसकी व्याख्या टिप्पणी 18 में हो चुकी है। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए, सूरा-27 अन-नम्‍ल, टिप्पणी 74; टीका सूरा-36 या-सीन, टिप्पणी 29; सूरा-43 अज़-जुख़रुफ़ टिप्पणी 7-10)
وَمِن كُلِّ شَيۡءٍ خَلَقۡنَا زَوۡجَيۡنِ لَعَلَّكُمۡ تَذَكَّرُونَ ۝ 48
(49) और हर चीज़ के हमने जोड़े बनाए हैं,46 शायद कि तुम इससे शिक्षा ग्रहण करो।47
46. अर्थात् दुनिया की तमाम चीजे़ं जोड़े-जोड़े के नियम पर बनाई गई हैं। दुनिया का यह सारा कारख़ाना इस नियम पर चल रहा है कि कुछ चीज़ों का कुछ चीज़ों से जोड़ लगता है और फिर उनका जोड़ लगने ही से तरह-तरह की बनावटें वुजूद में आती हैं। यहाँ कोई चीज़ भी ऐसी अकेली नहीं है कि दूसरी कोई चीज़ उसका जोड़ न हो, बल्कि हर चीज़ अपने जोड़े से मिलकर ही परिणामदायक होती है। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा-36 या-सीन, टिप्पणी 31; सूरा-43 अज़-जुखरुफ, टिप्पणी 12)
47. मतलब यह है कि सम्पूर्ण सृष्टि का जोड़े-जोड़े के नियम पर बनाया जाना और दुनिया की तमाम चीज़ों का जोड़ा-जोड़ा होना एक ऐसा तथ्य है जो आख़िरत (परलोक) के अनिवार्य होने पर खुली गवाही दे रही है। जब दुनिया की हर चीज़ का एक जोड़ा है और कोई चीज़ अपने जोड़े से मिले बिना परिणामदायक नहीं होती तो दुनिया की वह ज़िन्दगी कैसे बेजोड़ हो सकती है? उसका जोड़ा अवश्य ही आख़िरत है। वह न होटी यह बिल्कुल ही बेनतीजा होकर रह जाए। आगे की विषय-वस्तु को समझने के लिए यहाँ यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि यद्यपि यहाँ तक सारी वार्ता आख़िरत के विषय पर चली आ रही है, लेकिन इसी वार्ता और इन्हीं दलीलों से तौहीद (एकेश्वरवाद) का प्रमाण भी मिलता है। इसलिए आगे इन्हीं प्रमाणों के आधार पर तौहीद की दावत पेश की जा रही है। इसके अलावा आख़िरत को मानने का लाज़िमी नतीजा यह है कि इनसान खु़दा के प्रति बिद्रोह का रवैया छोढ़कर आजपालन और बन्दगी का रास्ता अपनाए। इसी आधार पर आख़िरत की दलीलें समाप्त करते ही तुरन्त बाद यह फ़रमाया गया, “अत: दौड़ी अल्लाह की और।”
فَفِرُّوٓاْ إِلَى ٱللَّهِۖ إِنِّي لَكُم مِّنۡهُ نَذِيرٞ مُّبِينٞ ۝ 49
(50) अतएव दौड़ो अल्लाह की ओर, मैं तुम्हारे लिए उसकी ओर से साफ़-साफ़ सचेत करनेवाला हूँ
وَلَا تَجۡعَلُواْ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَۖ إِنِّي لَكُم مِّنۡهُ نَذِيرٞ مُّبِينٞ ۝ 50
(51) और न बनाओ अल्‍लाह के साथ कोई दूसरे उपास्य, मैं तुम्हारे लिए उसकी ओर से साफ़-साफ़ सचेत करनेवाला हूँ।48
48. ये वाक्य यद्यपि अल्लाह ही की वाणी हैं, मगर इन्हें व्यक्त करनेवाला अल्लाह नहीं बल्कि नबी (सल्‍ल०) हैं। मानी बात वास्तव में यूं है कि अल्लाह अपने नवी के मुख से यह कहलवा रहा है कि दौड़ो अल्लाह की और मैं तुम्हें उसकी और से सचेत करता हूँ। इस वार्ताशैली के अनेक उदाहरण क़ुरआन मजीद में मौजूद हैं, जिनमें वाणी तो अल्लाह ही की होती है, मगर कहनेवाले कहीं फ़रिश्ते होते हैं और कहीं नबी (सल्ल०) और इस बात को स्पष्ट किए बिना कि यहाँ कहनेवाला कौन है, संदर्भ से अपने आप यह बात प्रकट हो जाती है कि अल्लाह अपनी यह वाणी किसके मुख से अदा कर रहा है। उदाहरण के रूप में देखिए सूरा-19 मरयम, आयत 64-65; सूरा-37 अस्सारतात, आयत 159-167: सूरा-42 अश-शूरा, आयत 10
كَذَٰلِكَ مَآ أَتَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا قَالُواْ سَاحِرٌ أَوۡ مَجۡنُونٌ ۝ 51
(52) यूँ ही होता रहा है, इससे पहले की क़ौमों के पास भी कोई रसूल ऐसा नहीं आया जिसे उन्‍होंने यह न कहा हो कि यह जादूगर है या दीवाना।49
49. अर्थात आज पहली बार ही यह घटना नहीं बटी है कि अल्लाह के भेजे हुए रसूल की जवान से आख़िरत की ख़बर और तीहीद की दावत सुनकर लोग उसे जादूगर और मजनून (दीवाना) कह रहे हैं। रिसालत का पूरा इतिहास गवाह है कि जब से मानव जाति की हिदायत के लिए रसूल आने शुरू हुए हैं आज तक जाहिल लोग इसी एक मूर्खता को एक ही तरीक से दोहराए चले जा रहे हैं।
أَتَوَاصَوۡاْ بِهِۦۚ بَلۡ هُمۡ قَوۡمٞ طَاغُونَ ۝ 52
(53) क्या इन सबने आपस में इसपर कोई समझौता कर लिया है? नहीं, बल्कि ये सब उद्दंड लोग हैं।50
50. अर्थात् हज़ारों वर्ष तक हर समय में अलग अलग देशों में और कामों में नबियों की दावत के मुक़ाबले में एक ही रवैया अपनाना कुछ इस आधार पर तो न हो सकता था कि एक कांफ्रेंस करके इन सब अगली-पिछली नस्लों ने आपस में यह तय कर लिया हो कि जब कोई नबी आकर यह दावत पेश करे तो उसका यह उत्तर दिया जाए। वास्तव में उसके रवैये में यह समानता होने का कोई कारण इसके सिवा नहीं है कि सरकशी और सीमोल्लंघन करना इन सबका संयुक्त गुण है। चूँकि हर ज़माने में जाहिल लोग ख़ुदा की बन्दगी से आजाद और उसकी पूछ-गछ से निडर होकर दुनिया में बे-नकेल के ऊँट की तरह जीने के इच्छुक रहे हैं, इसलिए और सिर्फ़ इसी लिए जिसने भी उनको ख़ुदा की बन्दगी और ईशपरायण जीवन की ओर बुलाया उसको वे एक ही लगा-बँधा उत्तर देते रहे। इस कथन से एक और महत्त्वपूर्ण वास्तविकता पर भी रौशनी पड़ती है, और वह यह है कि गुमराही और हिदायत, भलाई और बुराई, ज़ुल्म और इनसाफ़ और ऐसे ही दूसरे कर्मों के जो उत्प्रेरक तत्व इनसान के भीतर मौजूद हैं, वे सदैव, हर समय में और धरती के हर कोने में एक ही तरह प्रकट होते हैं, चाहे साधनों की तरक़्क़ी से उसकी शक्लें जाहिर में कितनी ही अलग दीख पड़ती हों।
فَتَوَلَّ عَنۡهُمۡ فَمَآ أَنتَ بِمَلُومٖ ۝ 53
(54) अत: ऐ नबी ! इनसे मुँह फेर लो, तुमपर कुछ मलामत नहीं।51
51. इस आयत में दीन के प्रचार का एक नियम बयान किया गया है, जिसको अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। सत्य की दावत देनेवाला एक व्यक्ति जब किसी व्यक्ति के सामने उचित तर्कों के साथ अपनी दावत साफ़-साफ़ पेश कर दे और उसके सन्देहों, आपत्तियों और तर्कों का उत्तर भी दे दे तो सत्य को स्पष्ट करने का जो कर्त्तव्य उसके ज़िम्मे था, उससे वह मुक्त हो जाता है। इसके बाद भी अगर वह व्यक्ति अपने विश्वास और विचार पर जमा रहे तो इसकी कोई ज़िम्मेदारी सत्य की दावत देनेवाले पर नहीं आती।
وَذَكِّرۡ فَإِنَّ ٱلذِّكۡرَىٰ تَنفَعُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ۝ 54
(55) अलबत्ता नसीहत करते रहो, क्योंकि नसीहत ईमान लानेवालों के लिए लाभदायक है।52
52. इस आयत में सत्य-प्रचार का दूसरा नियम बताया गया है। सत्य की दावत देने का मूल उद्देश्य उन सौभाग्यवती आत्माओं तक ईमान की नेमत पहुँचाना है जो इस नेमत का मूल्य जानते हों और उसे स्वयं प्राप्त करना चाहें। मगर दावत देनेवाले को यह मालूम नहीं होता कि मानव-समाज के हज़ारों-लाखों लोगों में वे सौभाग्यवती आत्माएँ कहाँ हैं, इसलिए उसका काम यह है कि अपनी आम दावत का सिलसिला बराबर जारी रखे, ताकि जहाँ-जहाँ भी ईमान क़ुबूल करनेवाले लोग मौजूद हों, वहाँ उसकी आवाज़ पहुँच जाए। यही लोग उसकी असल दौलत हैं। इन्हीं की खोज उसका असल काम है और इन्हीं को समेट समेटकर ख़ुदा के रास्ते पर ला खड़ा करना उसका मक़सद होना चाहिए।
وَمَا خَلَقۡتُ ٱلۡجِنَّ وَٱلۡإِنسَ إِلَّا لِيَعۡبُدُونِ ۝ 55
(56) मैंने जिन्न और इंसानों को इसके सिवा किसी काम के लिए पैदा नहीं किया है कि वे मेरी बन्दगी करें।53
53. अर्थात् मैंने इनको दूसरों की बन्दगी के लिए नहीं, बल्कि अपनी बन्दगी के लिए पैदा किया है। मेरी बन्दगी तो इनको इसलिए करनी चाहिए कि मैं इनका पैदा करनेवाला हूँ। दूसरे किसी ने जब इनको पैदा नहीं किया है तो उसको क्या हक़ पहुँचता है कि ये उसकी बन्दगी करें, और इनके लिए यह कैसे जायज़ हो सकता है कि इनका पैदा करनेवाला तो हूँ मैं और ये बन्दगी करते फिरें दूसरों की। ‘इबादत’ का शब्द इस आयत में केवल नमाज, रोज़े और इसी प्रकार को दूसरी इबादतों के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है, [बल्कि इसके अर्थ में उपासना, आज्ञापालन और भक्ति सब कुछ शामिल है।] (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए, टीका सूरा-34 सबा, टिप्पणी 63; सूरा-39 अज़-ज़ुमर, टिप्‍पणी 2; सूरा-88 अज-जासिया, टिप्पणी 30)। एक और बात जो गौण रूप से इस आयत से स्पष्ट प्रकट होती है, वह यह है कि जिन्न इनसानों से अलग एक स्थाई मख़लूक (सृष्ट जीव) है। इसी तथ्य पर क़ुरआन मजीद की निम्नलिखित आयतें भी गवाहियाँ जुटाती हैं जिनके बाद इस बात से इनकार की कोई गुंजाइश बाक़ी नहीं रहती। सूरा-6 अल-अनआम, आयत 100, 128; सूरा-7 अल-आराफ़, आयत 38, 179; सूरा-11 हूद आयत 119; सूरा-15 अल-हिज्र, आयत 27-333; सूरा-17 बनी इसराईल, आयत 88; सूरा-18 अल-कहफ़, आयत 50, सूरा-32 अस-सज्दा, आयत 13; सूरा-34 सबा, आयत 41; सूरा-38 साद, आयत 72-76; सूरा-41 हा-मीम अस-सज्दा, आयत 25; सूरा-46 अल-अहकाफ़, आयत 183; सूरा-55 अर-रहमान, आयत 15,39, 56; (इस समस्या पर विस्तृत विवेचन के लिए देखिए टीका सूरा-21 अंबिया, टिप्पणी 21; सूरा-अन-नम्ल, टिप्पणी 23, 45; सूरा-34 सबा, टिप्पणी 24)
مَآ أُرِيدُ مِنۡهُم مِّن رِّزۡقٖ وَمَآ أُرِيدُ أَن يُطۡعِمُونِ ۝ 56
(57) मैं उनसे कोई रोज़ी नहीं चाहता और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे खिलाएँ।54
54. अर्थात् मैं इनकी उपासना का मुहताज नहीं हूँ, बल्कि मेरी उपासना करना स्वयं उनकी अपनी प्रकृति का तक़ाज़ा है, इसी के लिए ये पैदा किए गए हैं और अपनी प्रकृति से लड़ने में इनका अपना नुक़सान है। और यह जो फ़रमाया कि “मैं इनसे रोज़ी नहीं चाहता और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे खिलाएँ” इसमें एक सूक्ष्म व्यंग्य है। ख़ुदा से विमुख लोग दुनिया में जिन-जिन की उपासना और बन्दगी कर रहे हैं, वे सब वास्तव में अपने इन बन्दों के मुहताज हैं। ये उनकी खु़दाई न चलाएँ तो एक दिन भी वह न चले। वे इनको रोज़ी देनेवाले नहीं, बल्कि उलटे ये उनको रोज़ी पहुँचाते हैं। सारे उपास्यों में अकेला एक सर्वोच्च अल्लाह ही वह वास्तविक उपास्य है जिसकी खु़दाई अपने बल-बूते पर चल रही है, जो अपने बन्दों से कुछ लेता नहीं, बल्कि वही अपने बन्दों को सब कुछ देता है।
إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلرَّزَّاقُ ذُو ٱلۡقُوَّةِ ٱلۡمَتِينُ ۝ 57
(58) अल्लाह तो ख़ुद ही रोज़ी देनेवाला है, बड़ी शक्तिवाला और ज़बरदस्त है।55
55. मूल में अरबी शब्द 'मतीन' प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ है मज़बूत और अडिग, जिसे कोई हिला न सकता हो।
فَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُواْ ذَنُوبٗا مِّثۡلَ ذَنُوبِ أَصۡحَٰبِهِمۡ فَلَا يَسۡتَعۡجِلُونِ ۝ 58
(59) अतएव जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है,56 उनके हिस्से का भी वैसा ही अज़ाब तैयार है, जैसा उन्हीं जैसे लोगों को उनके हिस्से का मिल चुका है, उसके लिए ये लोग मुझसे जल्दी न मचाएँ।57
56. ज़ुल्म से तात्पर्य यहाँ वास्तविकता और सच्चाई पर जु़ल्म करना और स्वयं अपनी प्रकृति पर ज़ुल्म करना है।
57. यह उत्तर है इस्लाम विरोधियों की इस मांग का कि वह बदले का दिन कहाँ आते-आते रह गया है, आख़िर वह आ क्यों नहीं जाता?
فَوَيۡلٞ لِّلَّذِينَ كَفَرُواْ مِن يَوۡمِهِمُ ٱلَّذِي يُوعَدُونَ ۝ 59
(60) अन्त में तबाही है इनकार करनेवालों के लिए उस दिन जिससे उन्हें डराया जा रहा है।