(45) (ऐ नबी!) तिलावत करो उस किताब की जो तुम्हारी ओर वह्य के ज़रिये भेज़ी गई है और नमाज़ क़ायम करो 77, निश्चय ही नमाज़ बेहयाई और बुरे कामों से रोकती है 78 और अल्लाह का ज़िक्र इससे भी ज़्यादा बड़ी चीज़ है। 79 अल्लाह जानता है जो कुछ तुम लोग करते हो।
77. संबोधन प्रत्यक्ष में नबी (सल्ल०) से है, मगर वास्तव में संबोधन सभी ईमानवालों से है। उस समय जिन अति हतोत्साह करनेवाली परेशानियों का उनको सामना करना पड़ रहा था, उनका मुक़ाबला करने के लिए पिछली आयतों में धैर्य, जमाव और अल्लाह पर भरोसा करने की लगातार शिक्षा देने के बाद अब उन्हें व्यावहारिक उपाय यह बताया जा रहा है कि क़ुरआन का पाठ करें और नमाज कायम करें, क्योंकि यही दो चीजें ऐसी हैं जो एक मोमिन को असत्य के तूफ़ानों के मुक़ाबले में [सफल बना सकती हैं।] लेकिन क़ुरआन के पाठ और नमाज़ से यह शक्ति इनसान को उसी समय प्राप्त हो सकती है जबकि वह क़ुरआन के सिर्फ़ शब्दों के पढ़ने को काफ़ी न समझे, बल्कि उसकी शिक्षा को ठीक-ठीक समझकर अपनी आत्मा में समाहित करता चला जाए और उसकी नमाज़ सिर्फ शरीर की हरकतों तक सीमित न रहे, बल्कि उसके दिल हृदय का जाप (वज़ीफ़ा) और उसके चरित्र व आचरण की प्ररेक शक्ति बन जाए।
78. यह नमाज़ की बहुत-सी विशेषताओं में से एक महत्वपूर्ण विशेषता है जिसे परिस्थिति को अनुकूलता से यहाँ स्पष्ट करके प्रस्तुत किया गया है। स्पष्ट है कि नैतिक बुराइयों से पाक होना अपने भीतर केवल इतना ही लाभ नहीं रखता कि यह अपने आपमें उन लोगों के लिए दुनिया और आखिरत में लाभप्रद है जिन्हें यह पावनता प्राप्त हो, बल्कि उसका अनिवार्य लाभ यह भी है कि इसको उन सब लोगों पर बड़ी श्रेष्ठता मिल जाती है जो तरह-तरह की नैतिक बुराइयों में ग्रस्त हों और अज्ञानता को उस अपवित्र व्यवस्था को जो उन बुराइयों को पालती पोसती है, बाक़ी रखने के लिए इन पवित्र इनसानों के मुक़ाबले में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हों। अश्लील एवं बुरे काम जिन बुराइयों को कहते हैं, उन्हें इनसान की प्रकृति बुरा जानती है और सदा से हर कौम और हर समाज के लोग, भले ही वे व्यवहारतः कैसे ही बिगड़े हुए हों, सैद्धान्तिक रूप से उन्हें बुरा ही समझते रहे हैं। कु़रआन के उतरने के समय अरब का समाज भी इस सामान्य नियम का अपवाद न था। इस दशा में इस बिगड़े हुए समाज के भीतर किसी ऐसे आन्दोलन का उठना जिससे जुड़ते ही स्वयं उसी समाज के लोग नैतिक रूप से बदल जाएँ और अपने चरित्र व आचरण में अपने समय के लोगों से खुले तौर पर उच्च हो जाएँ, निश्चित रूप से अपना प्रभाव डाले बिना न रह सकता था। यही कारण है कि क़ुरआन ने इस अवसर पर मुसलमानों को भौतिक साधन और शक्तियाँ जुटाने के बजाय नमाज़ क़ायम करने की नसीहत की, ताकि ये मुट्ठी भर इनसान नैतिकता की वह शक्ति अपने भीतर पैदा कर लें जो लोगों के दिल जीत ले और तीर व तलवार के बिना दुश्मनों को हरा दे । नमाज़ को यह विशेषता जो इस आयत में बयान की गई है, उसके दो पहलू हैं। एक इसकी अनिवार्य विशेषता है अर्थात् यह कि वह अश्लील और बुरे कामों से रोकती है और दूसरा इसकी अभीष्ट विशेषता है, अर्थात् इसका पढ़नेवाला सच में अश्लील और बुरे काम से रुक जाए। जहाँ तक रोकने का ताल्लुक़ है, नमाज़ अनिवार्य रूप से यह काम करती है। जो आदमी भी नमाज़ की शक्ल पर तनिक भी विचार करेगा, वह मानेगा कि इनसान को बुराइयों से रोकने के लिए जितने ब्रेक भी लगाने सम्भव हैं, उनमें सबसे ज़्यादा प्रभावी नमाज़ ही हो सकती है। अब रहा यह सवाल कि आदमी नमाज़ की पाबन्दो अपनाने के बाद व्यावहारिक रूप से भी बुराइयों से रुकता है या नहीं, तो यह बात उस आदमी पर निर्भर करती है जो मन के सुधार की यह दीक्षा ले रहा है। वह उससे लाभ उठाने की नीयत रखता हो और इसकी कोशिश करे तो नमाज़ के सुधारात्मक प्रभाव उसपर पड़ेंगे ही, वरना नहीं। जो आदमी नमाज़ पढ़ता तो है मगर न उससे फ़ायदा उठाने की नीयत रखता है, न इसकी कोशिश करता है। उसके बारे में तो यह कहना ज़्यादा सही है कि वह वास्तव में नमाज़ नहीं पढ़ता। चुनांचे इमरान बिन हुसैन की रिवायत है कि नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया, जिसे उसकी नमाज़ ने अश्लील और बुरे कामों से न रोका, उसकी नमाज़ नहीं है।” (इब्ने अबी हातिम) इब्ने अब्बास नबी (सल्ल०) का यह इर्शाद नक़ल करते हैं- “जिसकी नमाज़ ने उसे अश्लील और बुरे कामों से न रोका, उसको उसकी नमाज़ ने अल्लाह से और अधिक दूर कर दिया।” (इब्ने अबी हातिम, तबरानी)
79. इसके कई अर्थ हो सकते हैं-
एक यह कि अश्लील कामों से रोकना तो एक छोटी चीज़ है, अल्लाह के ज़िक्र (स्मरण) अर्थात् नमाज़ की बरकतें तो इससे बहुत बढ़कर हैं। वह नेकियों पर उभारनेवाली और भलाइयों में आगे बढ़कर हिस्सा लेने पर उभारनेवाली चीज़ भी है।
दूसरा अर्थ यह है कि अल्लाह की याद अपने आप में बहुत बड़ी चीज़ है। इंसान का कोई कर्म इससे बढ़कर नहीं है।
तीसरा अर्थ यह है कि अल्लाह का तुम्हें याद करना तुम्हारे उसको याद करने से ज़्यादा बड़ी चीज़ है। क़ुरआन में अल्लाह का इर्शाद है कि "तुम मुझे याद करो, मैं तुम्हें याद करूँगा।" सूरा-2 बकरा 152 । अतः जब बन्दा नमाज़ में अल्लाह को याद करेगा तो अनिवार्य रूप से अल्लाह भी उसे याद करेगा और यह सौभाग्य कि अल्लाह किसी बन्दे को याद करे, इस बात से कहीं बढ़कर है कि बन्दा अल्लाह को याद करे। [चौथा अर्थ यह है कि] अल्लाह की याद नमाज़ तक सीमित नहीं है, बल्कि [हर भला कर्म चूँकि] अल्लाह की याद ही का नतीजा होता है, इसलिए अल्लाह की याद एक मोमिन की पूरी जिंदगी पर हावी होती है।