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سُورَةُ البَقَرَةِ

2.सूरा अल-बक़रा

(मदीना में उतरी, आयतें 286)

परिचय

नाम और नाम रखने का कारण

इस सूरा का नाम बक़रा इसलिए है कि इसमें एक जगह ‘बक़रा’ का उल्लेख हुआ है। अरबी भाषा में ‘बक़रा’ का अर्थ होता है - गाय । क़ुरआन मजीद की हर सूरा में इतने व्यापक विषयों का उल्लेख हुआ है कि उनके लिए विषयानुसार व्यापक शीर्षक नहीं दिए जा सकते। इसलिए नबी (सल्ल०) ने अल्लाह के मार्गदर्शन से क़ुरआन की अधिकतर सूरतों के लिए विषयानुसार शीर्षक देने के बजाए नाम निश्चित किए हैं, जो केवल पहचान का काम देते हैं। इस सूरा को ‘बक़रा’ कहने का अर्थ यह नहीं है कि इसमें गाय की समस्या पर वार्ता की गई है, बल्कि इसका अर्थ केवल यह है कि 'वह सूरा जिसमें गाय का उल्लेख हुआ है’।

उतरने का समय

इस सूरा का अधिकतर हिस्सा मदीना की हिजरत के बाद मदीना वाली ज़िदंगी के बिल्कुल आरम्भ में उतरा है और बहुत कम हिस्सा ऐसा है जो बाद में उतरा और विषय की अनुकूलता की दृष्टि से इसमें शामिल कर दिया गया।

उतरने का कारण

इस सूरा को समझने के लिए पहले इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए-

1. हिजरत से पहले जब तक मक्का में इस्लाम की दावत दी जाती रही, संबोधन अधिकतर अरब के मुशरिकों (बहुदेववादियों) से था, जिनके लिए इस्लाम की आवाज़ एक नई और अनजानी आवाज़ थी। अब हिजरत के बाद वास्ता यहूदियों से पड़ा। ये यहूदी लोग तौहीद (एकेश्वरवाद), रिसालत (ईशदूतत्व), वह्य (प्रकाशना), आख़िरत (परलोक) और फ़रिश्तों को मानते थे और सैद्धांतिक रूप में उनका दीन (धर्म) वही इस्लाम था, जिसकी शिक्षा हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) दे रहे थे। लेकिन सदियों से होनेवाले निरंतर पतन ने उनको असल धर्म (मूसा-धर्म) से बहुत दूर हटा दिया था। जब नबी (सल्ल०) मदीना पहुँचे, तो अल्लाह ने आपको निर्देश दिया कि उनको असल धर्म की ओर बुलाएँ । अत: इस सूरा बक़रा की आरंभिक 141 आयतें इसी आह्वान पर आधारित हैं।

2. मदीना पहुँचकर इस्लामी आह्वान एक नए चरण में प्रवेश कर चुका था। मक्का में तो मामला केवल धर्म की बुनियादी बातों के प्रचार और धर्म अपनानेवालों के नैतिक प्रशिक्षण तक सीमित था, लेकिन जब हिजरत के बाद मदीने में एक छोटे-से इस्लामी स्टेट की बुनियाद पड़ गई, तो अल्लाह ने सभ्यता, संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान, क़ानून और राजनीति के बारे में भी मूल निर्देश देने शुरू किए और यह बताया कि इस्लाम की बुनियाद पर यह नई जीवन-व्यवस्था कैसे स्थापित की जाए? यह सूरा आयत 142 से लेकर अंत तक इन्हीं निर्देशों पर आधारित है।

3. हिजरत से पहले लोगों को इस्लाम की ओर स्वयं उन्हीं के घर में (अर्थात् मक्का में) बुलाया जाता रहा और विभिन्न क़बीलों में से जो लोग इस्लाम ग्रहण करते थे, वे अपनी-अपनी जगह रहकर ही धर्म का प्रचार करते और जवाब में अत्याचारों और मुसीबतों को झेलते रहते थे, किन्तु हिजरत के बाद जब ये बिखरे हुए मुसलमान मदीना में जमा होकर एक जत्था बन गए और उन्होंने एक छोटा-सा स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया तो स्थिति यह हो गई कि एक ओर एक छोटी-सी बस्ती थी और दूसरी ओर तमाम अरब उसकी जड़ें काट देने पर तुला हुआ था। अब इस मुट्ठी-भर लोगों के गिरोह की सफलता का ही नहीं, बल्कि उसका अस्तित्व और स्थायित्व इस बात पर निर्भर था कि एक तो वह पूरे उत्साह के साथ अपने दृष्टिकोण का प्रचार करके अधिक-से-अधिक लोगों को अपने विचारों का माननेवाला बनाने की कोशिश करे। दूसरे वह विरोधियों का असत्य पर होना इस तरह प्रमाणित और पूरी तरह स्पष्ट कर दे कि किसी भी सोचने-समझनेवाले व्यक्ति को उसमें संदेह न रहे। तीसरे यह कि जिन ख़तरों में वे चारों ओर से घिर गए थे, उनमें वे हताश न हो, बल्कि पूरे धैर्य और जमाव के साथ उन परिस्थितियों का मुक़ाबला करें। चौथे यह कि वे पूरी बहादुरी के साथ हर उस हथियारबन्द अवरोध का सशस्त्र मुक़ाबला करने के लिए तैयार हो जाएँ, जो उनके आह्वान को विफल बनाने के लिए किसी ताक़त की ओर से किया जाए। पाँचवें, उनमें इतना साहस पैदा किया जाए कि अगर अरब के लोग इस नई व्यवस्था को, जो इस्लाम स्थापित करना चाहता है, समझाने-बुझाने से न अपनाएँ, तो उन्हें अज्ञान की दूषित जीवन-व्यवस्था को शक्ति से मिटा देने में भी संकोच न हो। अल्लाह ने इस सूरा में इन पाँचों बातों के बारे में आरंभिक निर्देश दिए हैं।

4. इस्लामी आह्वान के इस चरण में एक नया गिरोह भी ज़ाहिर होना शुरू हो गया था और यह मुनाफ़िक़ों (कपटाचारियों) का गिरोह था। यद्यपि निफ़ाक़ (कपटाचार) के आरंभिक लक्षण मक्का के आखिरी दिनों में ही ज़ाहिर होने लगे थे, लेकिन वहाँ केवल इस प्रकार के मुनाफ़िक़ (कपटाचारी) पाए जाते थे, जो इस्लाम के हक़ (सत्य) होने को तो मानते थे और ईमान का इक़रार भी करते थे, लेकिन इसके लिए [किसी प्रकार की कु़रबानी देने के लिए] तैयार न थे। मदीना पहुँचकर इस प्रकार के मुनाफ़िक़ों के अलावा कुछ और प्रकार के मुनाफ़िक़ भी इस्लामी गिरोह में पाए जाने लगे [इसलिए उनके बारे में भी निर्देशों का आना ज़रूरी हुआ]।

सूरा बक़रा के उतरने के समय इन विभिन्न प्रकार के मुनाफ़िक़ों के प्रादुर्भाव का केवल आरंभ था, इसलिए अल्लाह ने उनकी ओर केवल संक्षिप्त संकेत किए हैं। बाद में जितनी-जितनी उनकी विशेषताएँ और हरकतें सामने आती गईं, उतने ही विस्तार के साथ बाद की सूरतों में हर प्रकार के मुनाफ़िकों के बारे में उनकी श्रेणियों के अनुसार अलग-अलग हिदायतें भेजी गईं।

 

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سُورَةُ البَقَرَةِ
2. सूरा अल-बक़रा
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील और अत्यन्त दयावान है।
الٓمٓ
(1) अलिफ़-लाम-मीम1
1.   ये 'हुरूफे मुक़त्तआत' (विलग अक्षर) क़ुरआन मजीद की कुछ सूरतों के शुरू में पाए जाते हैं। जिस ज़माने में क़ुरआन मजीद उतरा है, उस ज़माने की शैलियों में इस प्रकार के विलग अक्षरों के प्रयोग का चलन था। इसलिए सुननेवाले आम तौर से जानते थे कि इन अक्षरों का अर्थ क्या है। बाद में यह शैली अरबी भाषा में समाप्त होती चली गई और इस वजह से टीकाकारों (मुफ़स्सिरों) के लिए उनका अर्थ निश्चित करना कठिन हो गया, लेकिन यह स्पष्ट है कि इन अक्षरों का अर्थ समझना कु़रआन से मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।
ذَٰلِكَ ٱلۡكِتَٰبُ لَا رَيۡبَۛ فِيهِۛ هُدٗى لِّلۡمُتَّقِينَ ۝ 1
(2) यह अल्लाह की किताब है, इसमें कोई संदेह नहीं । 2 हिदायत है उन परहेज़गार लोगों 3 के लिए
2. इसका एक सीधा-सादा अर्थ तो यह है कि "निस्संदेह यह अल्लाह की किताब है", मगर एक अर्थ यह भी हो सकता है कि यह ऐसी किताब है जिसमें संदेह की कोई बात नहीं है और जो पूर्ण रूप से सत्यज्ञान पर आधारित है, क्योंकि इसका लिखनेवाला वह है जो तमाम सच्चाइयों का ज्ञान रखता है, इसलिए सच तो यह है कि इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं ।
3. अर्थात् यह किताब है तो सरासर हिदायत व रहनुमाई, पर इससे फायदा उठाने के लिए ज़रूरी है कि आदमी में कुछ गुण पाए जाते हों। इनमें से पहला गुण यह है कि आदमी 'परहेज़गार' हो, बुराई से बचना चाहता और भलाई की तलब रखता हो।
ٱلَّذِينَ يُؤۡمِنُونَ بِٱلۡغَيۡبِ وَيُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَمِمَّا رَزَقۡنَٰهُمۡ يُنفِقُونَ ۝ 2
(3) जो ग़ैब (परोक्ष) पर ईमान 4 लाते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं,5 जो रोज़ी हमने उनको दी है, उसमें से ख़र्च करते हैं, 6
4. यह कुरआन से फ़ायदा उठाने के लिए दूसरी शर्त है। 'ग़ैब' (परोक्ष) से तात्पर्य वे वास्तविकताएँ हैं जिन्हें इंसान की इन्द्रियाँ नहीं पकड़ पाती और न कभी आम इंसान प्रत्यक्ष रूप से उनका अनुभव कर पाता है और न उसके देखने में आती हैं, जैसे अल्लाह की ज़ात, उसके गुण, फ़रिश्ते, वह्य, जन्नत, दोज़ख़ आदि । इन वास्तविकताओं को बिना देखे मानना और इस भरोसे पर मानना कि नबी उनकी ख़बर दे रहा है, ग़ैब पर ईमान लाना है। आयत का अर्थ यह है कि जो व्यक्ति इन गैर-महसूस सच्चाइयों को मानने के लिए तैयार हो, सिर्फ़ वही क़ुरआन की रहनुमाई से फ़ायदा उठा सकता है। रहा वह व्यक्ति जो मानने के लिए देखने, चखने और सूंघने को शर्त लगाए, वह इस किताब से हिदायत नहीं पा सकता।
5. यह तीसरी शर्त है। इसका अर्थ यह है कि आदमी ईमान लाने के बाद तुरन्त ही व्यावहारिक रूप से आज्ञापालन के लिए तैयार हो जाए, और व्यावहारिक आज्ञापालन की प्रथम और सदा-सर्वदा रहनेवाला सर्वप्रथम लक्षण नमाज़ है। [अगर कोई आदमी ईमान का दावा करने के बावजूद मुअज्ज़िन (अज़ान देनेवाले) की अज़ान पर लपकता नहीं, तो यह इस बात का प्रमाण है कि वह] आज्ञापालन की सीमा से बाहर हो चुका है। यहाँ यह भी समझ लेना चाहिए कि 'नमाज़ क़ायम करना' एक व्यापक पारिभाषिक शब्द है, इसका अर्थ केवल यही नहीं है कि आदमी पाबन्दी के साथ नमाज़ अदा करे, बल्कि इसका अर्थ यह है कि सामूहिक रूप से विधिवत नमाज़ की व्यवस्था स्थापित की जाए।
وَٱلَّذِينَ يُؤۡمِنُونَ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡكَ وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبۡلِكَ وَبِٱلۡأٓخِرَةِ هُمۡ يُوقِنُونَ ۝ 3
(4) जो किताब तुमपर उतारी गई है (अर्थात् क़ुरआन) और जो किताबे तुमसे पहले उतारी गई थीं उन सबपर ईमान लाते हैं,7 और आख़िरत पर यक़ीन रखते हैं।8
7. यह पाँचवीं शर्त है कि आदमी उन तमाम किताबों को सत्य पर माने जो वह्य (प्रकाशना) के ज़रिये से अल्लाह ने मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और उनसे पहले के नबियों पर विभिन्न कालों एवं देशों में उतारीं । इस शर्त के आधार पर क़ुरआन की हिदायत का दरवाज़ा उन सब लोगों पर बन्द है जो सिरे से इसकी ज़रूरत ही न समझते हों कि इंसान को अल्लाह की ओर से हिदायत मिलनी चाहिए, या इसकी ज़रूरत तो समझते हों, मगर इसके लिए वह्य और रिसालत (प्रकाशना एवं ईशदूतत्व) की ओर पलटना अनावश्यक समझते हों और स्वयं कुछ सिद्धान्त गढ़कर उन्हीं को ईश्वरीय आदेश समझ बैठे या आसमानी किताबों को भी मानते हों, मगर सिर्फ उस किताब या उन किताबों पर ईमान लाएँ जिन्हें उनके बाप-दादा मानते चले आए हैं, रहीं उसी स्रोत से निकली हुई दूसरी हिदायतें, तो वे उनको मानने से इनकार कर दें।
8. यह छठी और आखिरी शर्त है। 'आखि़रत' एक व्यापक शब्द है जो बहुत-से विश्वासों के योग के लिए बोला जाता है। इसमें निम्नलिखित विश्वास सम्मिलित हैं- (क) यह कि इंसान इस दुनिया में ग़ैर-ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि अपने तमाम कर्मों के लिए अल्लाह के सामने जवाबदेह है। (ख) यह कि दुनिया को वर्तमान व्यवस्था सदा-सर्वदा रहनेवाली नहीं है, बल्कि एक समय आने पर, जिसे केवल अल्लाह ही जानता है, इसका अंत हो जाएगा । (ग) यह कि इस दुनिया के अंत के बाद अल्लाह एक दूसरी दुनिया बनाएगा और उसमें सम्पूर्ण मावन-जाति को, जो आदिकाल से लेकर कि़यामत तक ज़मीन पर पैदा हुई थी, एक ही साथ दोबारा पैदा करेगा, और सबको जमा करके उनके कर्मों का हिसाब लेगा, और हर एक को उसके किए का पूरा-पूरा बदला देगा। (घ) यह कि अल्लाह के इस फैसले के अनुसार जो लोग नेक क़रार पाएँगे, वे जन्नत में जाएँगे और जो लोग बुरे ठहरेंगे वे दोज़ख़ में डाले जाएँगे। (ङ) यह कि सफलता और असफलता की मूल कसौटी वर्तमान जीवन की खुशहाली और बदहाली नहीं है, बल्कि वास्तव में सफल इंसान वह है जो अल्लाह के आखिरी फैसले में सफल ठहरे, और असफल वह है जो वहाँ असफल हो। धारणाओं के इस योग पर जिन लोगों को विश्वास न हो, वे कुरआन से कोई फायदा नहीं उठा सकते।
أُوْلَٰٓئِكَ عَلَىٰ هُدٗى مِّن رَّبِّهِمۡۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ ۝ 4
(5) ऐसे लोग अपने रब की ओर से सीधे रास्ते पर हैं और वही सफलता पानेवाले हैं।
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ سَوَآءٌ عَلَيۡهِمۡ ءَأَنذَرۡتَهُمۡ أَمۡ لَمۡ تُنذِرۡهُمۡ لَا يُؤۡمِنُونَ ۝ 5
(6) जिन लोगों ने (इन बातों को मानने से) इनकार कर दिया, 9 उनके लिए बराबर है, चाहे तुम उन्हें ख़बरदार करो या न करो, बहरहाल वे माननेवाले नहीं हैं।
अर्थात् वे छ: की छ: शर्ते, जिनका उल्लेख ऊपर हुआ है, पूरी न की और इन सबको या इनमें से किसी एक को भी मानने से इनकार कर दिया।
خَتَمَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ وَعَلَىٰ سَمۡعِهِمۡۖ وَعَلَىٰٓ أَبۡصَٰرِهِمۡ غِشَٰوَةٞۖ وَلَهُمۡ عَذَابٌ عَظِيمٞ ۝ 6
(7) अल्लाह ने उनके दिलों और उनके कानों पर मुहर लगा दी है 10 और उनकी आँखों पर परदा पड़ गया है। वे कठोर सज़ा के भागी हैं।
10. इसका अर्थ यह नहीं है कि अल्लाह ने मुहर लगा दी थी इसलिए उन्होंने मानने से इनकार किया, बल्कि अर्थ यह है कि जब उन्होंने उन बुनियादी बातों को रद्द कर दिया, जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है और अपने लिए कुरआन के बताए रास्ते के विरुद्ध दूसरा रास्ता पसन्द कर लिया, तो अल्लाह ने उनके दिलों और कानों पर मुहर लगा दी।
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَبِٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَمَا هُم بِمُؤۡمِنِينَ ۝ 7
(8) कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि हम अल्लाह पर और आख़िरत (परलोक) के दिन पर ईमान लाए हैं, हालाँकि वास्तव में वे ईमानवाले नहीं हैं।
يُخَٰدِعُونَ ٱللَّهَ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَمَا يَخۡدَعُونَ إِلَّآ أَنفُسَهُمۡ وَمَا يَشۡعُرُونَ ۝ 8
(9) वे अल्लाह और ईमान लानेवालों के साथ धोखेबाजी कर रहे हैं, मगर वास्तव में वे ख़ुद अपने आप ही को धोखे में डाल रहे हैं
فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٞ فَزَادَهُمُ ٱللَّهُ مَرَضٗاۖ وَلَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمُۢ بِمَا كَانُواْ يَكۡذِبُونَ ۝ 9
और उन्हें इसका एहसास नहीं है।11 (10) उनके दिलों में एक बीमारी है जिसे अल्लाह ने और अधिक बढ़ा दिया12 और जो झूठ वे बोलते हैं, उसके बदले में उनके लिए दर्दनाक सज़ा है।
11. अर्थात् वे अपने आपको इस भ्रम में डाल रहे हैं कि उनका यह कपटपूर्ण रवैया उनके लिए फायदेमंद होगा, हालाँकि वास्तव में यह उनको दुनिया में भी नुकसान पहुँचाएगा और आखिरत में भी। दुनिया में एक कपटाचारी कुछ दिनों के लिए तो लोगों को धोखा दे सकता है, मगर हमेशा उसका धोखा नहीं चल सकता। अन्ततः उसके कपटाचार का भेद खुलकर रहता है और फिर समाज में उसकी कोई साख बाक़ी नहीं रहती। रही आखिरत, तो वहाँ ईमान का ज़बानी दावा कोई क़ीमत नहीं रखता अगर कर्म उसके खिलाफ़ हो।
12. बीमारी से तात्पर्य निफ़ाक़ (कपटाचार) की बीमारी है। और अल्लाह के द्वारा इस बीमारी में बढ़ोत्तरी करने का अर्थ यह है कि वह मुनाफ़िक़ों (कपटाचारियों) को उनके निफ़ाक़ की सज़ा तुरन्त नहीं देता, बल्कि उन्हें ढोल देता है और इस ढील का नतीजा यह होता है कि मुनाफ़िक लोग अपनी चालों को ज़ाहिर में सफल होता देखकर और अधिक पूर्ण मुनाफ़िक़ बनते चले जाते हैं।
وَإِذَا قِيلَ لَهُمۡ لَا تُفۡسِدُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ قَالُوٓاْ إِنَّمَا نَحۡنُ مُصۡلِحُونَ ۝ 10
(11) जब कभी उनसे कहा गया कि धरती में बिगाड़ न पैदा करो, तो उन्होंने यही कहा कि हम तो सुधार करनेवाले हैं
أَلَآ إِنَّهُمۡ هُمُ ٱلۡمُفۡسِدُونَ وَلَٰكِن لَّا يَشۡعُرُونَ ۝ 11
(12) - ख़बरदार ! वास्तव में यही लोग बिगाड़ पैदा करनेवाले हैं, परन्तु इन्हें एहसास नहीं है।
وَإِذَا قِيلَ لَهُمۡ ءَامِنُواْ كَمَآ ءَامَنَ ٱلنَّاسُ قَالُوٓاْ أَنُؤۡمِنُ كَمَآ ءَامَنَ ٱلسُّفَهَآءُۗ أَلَآ إِنَّهُمۡ هُمُ ٱلسُّفَهَآءُ وَلَٰكِن لَّا يَعۡلَمُونَ ۝ 12
(13) और जब इनसे कहा गया कि जिस तरह दूसरे लोग ईमान लाए हैं उसी तरह तुम भी ईमान लाओ,13 तो इन्होंने यही जवाब दिया, “क्या हम मूरों की तरह ईमान लाएँ 14 ?" ख़बरदार ! सच तो यह है कि ये ख़ुद मूर्ख हैं, परन्तु ये जानते नहीं है ।
13. अर्थात् जिस तरह तुम्हारी कौम के दूसरे लोग सत्यता और निष्ठा के साथ मुसलमान हुए हैं, उसी तरह तुम भी अगर इस्लाम कबूल करते हो तो ईमानदारी के साथ सच्चे दिल से क़बूल करो।
14. वे अपने नज़दीक उन लोगों को मूर्ख समझते थे जो सच्चाई के साथ इस्लाम क़बूल करके अपने आपको कष्टों, कठिनाइयों और ख़तरों में डाल रहे थे। उनकी राय में यह बिल्कुल ही मूर्खता का काम था कि सिर्फ सत्य और सच्चाई के लिए पूरे देश की दुश्मनी मोल ले ली जाए। उनके विचार में अक्लमंदी यह थी कि आदमी सत्य और असत्य के विवाद में न पड़े, बल्कि हर मामले में मात्र अपने स्वार्थ को देखे।
وَإِذَا لَقُواْ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ قَالُوٓاْ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَوۡاْ إِلَىٰ شَيَٰطِينِهِمۡ قَالُوٓاْ إِنَّا مَعَكُمۡ إِنَّمَا نَحۡنُ مُسۡتَهۡزِءُونَ ۝ 13
से मिलते है तो कहते है कि हम ईमान लाए है और जब अकेले में अपने शैतानों15 से मिलते है, तो कहते है कि वास्तव में तो हम तुम्हारे साथ है और इन लोगों से सिर्फ़ मज़ाक़ कर रहे है
ٱللَّهُ يَسۡتَهۡزِئُ بِهِمۡ وَيَمُدُّهُمۡ فِي طُغۡيَٰنِهِمۡ يَعۡمَهُونَ ۝ 14
(15)-अल्लाह इनसे गजाक कर रहा है। वह इनकी रस्सी लंबी किए जाता है और ये अपनी उदंडता में अधों की तरह भटके चले जाते हैं।
أُوْلَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشۡتَرَوُاْ ٱلضَّلَٰلَةَ بِٱلۡهُدَىٰ فَمَا رَبِحَت تِّجَٰرَتُهُمۡ وَمَا كَانُواْ مُهۡتَدِينَ ۝ 15
(16) ये वे लोग हैं, जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही खरीद ली है, मगर यह सौदा इनके लिए लाभदायक नहीं है और ये हरगिज सही रास्ते पर नहीं है ।
مَثَلُهُمۡ كَمَثَلِ ٱلَّذِي ٱسۡتَوۡقَدَ نَارٗا فَلَمَّآ أَضَآءَتۡ مَا حَوۡلَهُۥ ذَهَبَ ٱللَّهُ بِنُورِهِمۡ وَتَرَكَهُمۡ فِي ظُلُمَٰتٖ لَّا يُبۡصِرُونَ ۝ 16
(17) इनकी मिसाल ऐसी है जैसे एक आदमी ने आग जलाई, और जब उसने सारे माहौल को रौशन कर दिया तो अल्लाह ने इनके देखने की रौशनी छीन ली, और इन्हें इस हाल में छोड़ दिया कि अधेरियों में इन्हें कुछ नज़र नहीं 16 आता।
16. अर्थ यह है कि जब एक अल्लाह के बन्दे ने रौशनी फैलाई और सत्य को असत्य से, सही को ग़लत से, सीधे रास्ते को गुमराहियों से छाँटकर बिल्कुल अलग कर दिया, तो जो लोग खुली आँखें रखते थे उनपर तो सारी सच्चाइयां खुलकर सामने आ गई, मगर ये मुनाफिक जो मन के वशीभूत हो गए थे, उनको इस रौशनी में कुछ दिखाई न पड़ा। 'अल्लाह ने देखने की रौशनी छीन ली' के शब्दों से किसी को यह भ्रम न हो कि इनके अंधेरे में भटकने की ज़िम्मेदारी खुद इनपर नहीं है। अल्लाह देखने की ताक़त उसी की छीनता है जो खुद सच्चाई का रौशन चेहरा नहीं देखना चाहता। जब उन्होंने सत्य-ज्योति से मुँह फेरकर असत्य के अंधेरे में ही भटकना चाहा, तो अल्लाह ने उनका यही भाग्य बना दिया।
صُمُّۢ بُكۡمٌ عُمۡيٞ فَهُمۡ لَا يَرۡجِعُونَ ۝ 17
(18) ये बहरे हैं, गूंगे हैं, अधे हैं, 17 ये अब न
17. सच बात सुनने के लिए बहरे, सच बोलने के लिए गूंगे, सच देखने के लिए अंधे।
أَوۡ كَصَيِّبٖ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ فِيهِ ظُلُمَٰتٞ وَرَعۡدٞ وَبَرۡقٞ يَجۡعَلُونَ أَصَٰبِعَهُمۡ فِيٓ ءَاذَانِهِم مِّنَ ٱلصَّوَٰعِقِ حَذَرَ ٱلۡمَوۡتِۚ وَٱللَّهُ مُحِيطُۢ بِٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 18
पलटेंगे। (19) या फिर इनकी मिसाल यूँ समझो कि आसमान से ज़ोर की वर्षा हो रही है और उसके साथ अंधेरी घटा और कड़क और चमक भी है, ये बिजली के कड़के सुनकर अपनी जानों के डर से कानों में उँगलियाँ ठूँसे लेते हैं और अल्लाह सत्य के इन इनकारियों को हर ओर से घेरे में लिए हुए है।18
18. अर्थात् कानों में उँगलियाँ ठूँसकर वे अपने आपको कुछ देर के लिए इस भ्रम में तो डाल सकते हैं कि विनाश से बच जाएंगे, मगर वास्तव में इस तरह वे बच नहीं सकते, क्योंकि अल्लाह अपनी तमाम ताक़तों के साथ उनपर छाया हुआ है।
يَكَادُ ٱلۡبَرۡقُ يَخۡطَفُ أَبۡصَٰرَهُمۡۖ كُلَّمَآ أَضَآءَ لَهُم مَّشَوۡاْ فِيهِ وَإِذَآ أَظۡلَمَ عَلَيۡهِمۡ قَامُواْۚ وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ لَذَهَبَ بِسَمۡعِهِمۡ وَأَبۡصَٰرِهِمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ ۝ 19
(20) चमक से इनकी हालत यह हो रही है कि मानो बहुत जल्द बिजली इनकी आँखों की रौशनी उचक ले जाएगी। जब तनिक कुछ रौशनी इन्हें महसूस होती है तो उसमें कुछ दूर चल लेते हैं और जब इनपर अँधेरा छा जाता है, तो खड़े हो जाते हैं।19 अल्लाह चाहता तो इनके सुनने और देखने की ताक़त बिल्कुल ही छीन लेता,20 निश्चय ही वह हर चीज़ की सामर्थ्य रखता है।
19. पहला उदाहरण उन कपटचारियों का था जो दिल से क़तई इनकारी थे और स्वार्थवश 'मुसलमान' बन गए थे। और यह दूसरा उदाहरण उनका है जो संदेह, दुविधा और ईमान की कमजोरी के शिकार थे, कुछ सत्य को मानते भी थे, मगर ऐसी सत्यवादिता के पक्ष में न थे कि उसके लिए तकलीफों और मुसीबतों को भी सहन कर जाएं। इस उदाहरण में वर्षा से तात्पर्य इस्लाम है जो मानवता के लिए रहमत बनकर आया। अंधेरी घटा, कड़क और चमक से तात्पर्य कठिनाइयों, परेशानियों की वह भीड़ और कड़ा संघर्ष है जो इस्लामी आन्दोलन के मुकाबले में अज्ञानियों को भारी रुकावटों के कारण सामने आ रहा था । उदाहरण के अंतिम भाग में इन मुनाफ़िकों (कपटचारियों) की इस दशा का चित्रण किया जा रहा है कि जब मामला तनिक आसान होता है तो ये चल पड़ते हैं, और जब कठिनाइयों के बादल छाने लगते हैं या ऐसे आदेश दिए जाते हैं, जिनसे उनकी मनोकामनाओं और उनके अज्ञानतापूर्ण पूर्वाग्रहों पर चोट लगती है, तो ठिठककर खड़े हो जाते हैं।
20. अर्थात् जिस तरह पहले प्रकार के मुनाफ़िक़ों के देखने को ताक़त को उसने बिल्कुल छीन ली, उसी तरह अल्लाह उनको भी सत्य के लिए अंधा-बहरा बना सकता था, मगर अल्लाह का यह नियम नहीं है कि जो किसी हद तक देखना और सुनना चाहता हो, उसे उतना भी न देखने-सुनने दे। जितना भी सत्य देखने और सत्य सुनने के लिए ये तैयार थे, उतनी ही देखने और सुनने को शक्ति अल्लाह ने उनके पास रहने दी।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱعۡبُدُواْ رَبَّكُمُ ٱلَّذِي خَلَقَكُمۡ وَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ ۝ 20
(21) लोगो! 21 बन्दगो अपनाओ अपने को जो तुम्हारा और तुमसे पहले जो लोग हो गुजरे है उन सबका पैदा करनेवाला है, तुम्हारे बचने की उम्मीद इसी 22 प्रकार हो सकती है।
21. यद्यपि क़ुरआन को दावत तमाम इंसानों के लिए आम है, किन्तु इस दावत से फ़ायदा उठाना या न उठाना लोगो को अपनी आमादगी पर और इस आमादगी के अनुसार अल्लाह की तौफीक (प्रदत्त सौभाग्य) पर निर्भर है। इसलिए पहले इंसानों में अन्तर करके स्पष्ट कर दिया गया कि किस प्रकार के लोग इस किताब के मार्गदर्शन से फायदा उठा सकते है और किस प्रकार के नहीं उठा सकते । इसके बाद अब तमाम इंसानों के सामने वह असल बात पेश की जाती है, जिसकी ओर बुलाने के लिए क़ुरआन आया है।
22. अर्थात् दुनिया में गलत देखने और गलत करने से और आखिरत में अल्लाह की सजा से बचने की उम्मीद।
ٱلَّذِي جَعَلَ لَكُمُ ٱلۡأَرۡضَ فِرَٰشٗا وَٱلسَّمَآءَ بِنَآءٗ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَأَخۡرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزۡقٗا لَّكُمۡۖ فَلَا تَجۡعَلُواْ لِلَّهِ أَندَادٗا وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ۝ 21
(22) वही तो है जिसने तुम्हारे लिए जमीन का फर्श बिछाया, आसमान की छत बनाई, ऊपर से पानी बरसाया और उसके जरिए से हर तरह की पैदावार निकालकर तुम्हारे लिए रोजी जुटाई, इसलिए जब तुम यह जानते हो तो दूसरों को अल्लाह के मुकाबले का 23 न ठहराओ।
23. अर्थात् जब तुम खुद भी इस बात को मानते हो और तुम्हें मालूम है कि ये सारे काम अल्लाह ही के हैं तो फिर तुम्हारी भन्दगी उसी के लिए खास होनी चाहिए। दूसरा कौन इसका हकदार हो सकता है कि तुम उसको बन्दगी करो। दूसरों को अल्लाह के मुकाबले का ठहराने का अर्थ यह है कि बन्दगी और इबादत के विभिन्न प्रकारों में से किसी भी प्रकार का रवैया अल्लाह के सिवा दूसरों के साथ अपनाया जाए। आगे चलकर खुद क़ुरआन ही से सविस्तार मालूम हो जाएगा कि इबादत को वे कौन-कौन-सी शक्लें हैं, जिन्हें सिर्फ अल्लाह के लिए खास होना चाहिए और जिनमें दूसरों को साझीदार ठहराना वह 'शिर्क' है जिसे रोकने के लिए क़ुरआन आया है।
وَإِن كُنتُمۡ فِي رَيۡبٖ مِّمَّا نَزَّلۡنَا عَلَىٰ عَبۡدِنَا فَأۡتُواْ بِسُورَةٖ مِّن مِّثۡلِهِۦ وَٱدۡعُواْ شُهَدَآءَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ ۝ 22
(23) और अगर तुम्हें इस मामले में संदेह है कि यह किताब जो हमने अपने बन्दे पर उतारी है. यह हमारी है या नहीं, तो इस जैसी एक ही भूरा बना लाओ, अपने सारे हिमायतियों को बुला लो एक अल्लाह को छोड़कर बाक़ी जिसको चाहो मदद ले लो, अगर तुम सच्चे हो तो यह काम
فَإِن لَّمۡ تَفۡعَلُواْ وَلَن تَفۡعَلُواْ فَٱتَّقُواْ ٱلنَّارَ ٱلَّتِي وَقُودُهَا ٱلنَّاسُ وَٱلۡحِجَارَةُۖ أُعِدَّتۡ لِلۡكَٰفِرِينَ ۝ 23
करके दिखाओ।24 (24) लेकिन अगर तुमने ऐसा न किया, और निश्चय ही कभी नहीं कर सकते, तो डरो उस आग से, जिसका ईंधन बनेंगे इंसान और पत्थर 25, जो जुटाई गई है सत्य का इनकार करनेवालों के लिए।
24. इससे पहले मक्का में कई बार यह चुनौती दी जा चुकी थी कि अगर तुम इस क़ुरआन को इंसान की लिखी पुस्तक समझते हो तो इस जैसी कोई किताब लिखकर दिखाओ। अब मदीना पहुँचकर फिर इसे दोहराया जा रहा है। (देखिए क़ुरआन, 10 : 38, 11 : 13, 17 : 88, 52 : 33-34)
25. इसमें यह सूक्ष्म संकेत है कि वहाँ सिर्फ तुम ही दोज़ख़ का ईंधन न बनोगे, बल्कि तुम्हारे वे बुत भी वहाँ तुम्हारे साथ ही मौजूद होंगे जिनकी तुम पूजा करते हो और जिनके आगे तुम माथा टेकते हो। उस समय तुम्हें खुद ही मालूम हो जाएगा कि खुदाई (ईश्वरत्व) में ये कितना दखल रखते थे।
وَبَشِّرِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ أَنَّ لَهُمۡ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُۖ كُلَّمَا رُزِقُواْ مِنۡهَا مِن ثَمَرَةٖ رِّزۡقٗا قَالُواْ هَٰذَا ٱلَّذِي رُزِقۡنَا مِن قَبۡلُۖ وَأُتُواْ بِهِۦ مُتَشَٰبِهٗاۖ وَلَهُمۡ فِيهَآ أَزۡوَٰجٞ مُّطَهَّرَةٞۖ وَهُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ ۝ 24
(25) और ऐ पैग़म्बर! जो लोग इस किताब पर ईमान ले आएँ और (इसके अनुसार) अपने कर्म ठीक कर लें, उन्हें खुशखबरी दे दो कि उनके लिए ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, उन बाग़ों के फल शक्ल में दुनिया के फलों से मिलते-जुलते होंगे। जब कोई फल उन्हें खाने को दिया जाएगा तो वे कहेंगे कि ऐसे ही फल इससे पहले दुनिया में हमको दिए जाते थे। 26 उनके लिए वहाँ पाकीज़ा बीवियाँ होंगी 27 और वे वहाँ हमेशा रहेंगे।
26. अर्थात् निराले और अनजाने फल न होंगे जिनसे वे परिचित न हों। शक्ल में उन्हीं फलों से मिलते-जुलते होंगे जिनको वे दुनिया में जानते थे। हाँ, स्वाद में वे उनसे कहीं अधिक बढ़े हुए होंगे। देखने में जैसे आम, अनार और सन्तरे ही होंगे। जन्नती हर फल को देखकर पहचान लेंगे कि यह आम है और यह अनार है और यह सन्तरा है, किन्तु स्वाद में दुनिया के आमों, अनारों और सन्तरों को उनसे कोई ताल्लुक़ न होगा।
27. मूल अरबी में अज़वाज' का शब्द प्रयुक्त हुआ है जिसका मतलब है 'जोड़े, और यह शब्द शौहर और बीवी दोनों के लिए इस्तेमाल होता है। शौहर के लिए बीवी 'ज़ौज' है और बीवी के लिए शौहर 'ज़ौज' है। मगर वहाँ ये जोड़े पवित्रता के गुण के साथ होंगे। अगर दुनिया में कोई मर्द नेक है और उसकी बीवी नेक नहीं है तो आखिरत में उनका रिश्ता कट जाएगा और उस नेक मर्द को कोई दूसरी नेक बीवी दे दी जाएगी। अगर यहाँ कोई औरत नेक है और उसका शौहर बुरा, तो वहाँ वह इस बुरे शौहर के साथ रहने से मुक्ति पा जाएगी और कोई नेक मर्द उसका जीवन साथी बना दिया जाएगा। और अगर यहाँ कोई शौहर और बीवी दोनों नेक हैं, तो वहाँ उनका यही रिश्ता हमेशा-हमेशा का रिश्ता हो जाएगा।
۞إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَسۡتَحۡيِۦٓ أَن يَضۡرِبَ مَثَلٗا مَّا بَعُوضَةٗ فَمَا فَوۡقَهَاۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ فَيَعۡلَمُونَ أَنَّهُ ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّهِمۡۖ وَأَمَّا ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ فَيَقُولُونَ مَاذَآ أَرَادَ ٱللَّهُ بِهَٰذَا مَثَلٗاۘ يُضِلُّ بِهِۦ كَثِيرٗا وَيَهۡدِي بِهِۦ كَثِيرٗاۚ وَمَا يُضِلُّ بِهِۦٓ إِلَّا ٱلۡفَٰسِقِينَ ۝ 25
(26) हाँ, अल्लाह इससे हरगिज़ नहीं शर्माता कि मच्छर या इससे भी छोटी चीज़ की उपमा दे। 28 जो लोग सत्य बात को क़बूल करनेवाले हैं, वे इन्हीं उपमाओं को देखकर जान लेते हैं कि यह सत्य है जो उनके रब ही की ओर से आया है, और जो माननेवाले नहीं हैं, वे उन्हें सुनकर कहने लगते हैं कि ऐसी उपमाओं से अल्लाह का क्या इरादा है? इस तरह अल्लाह एक ही बात से बहुतों को गुमराही में डाल देता है और बहुतों को सीधा रास्ता दिखा देता है।29 और इससे गुमराही में वह उन्ही को डालता है, जो फ़ासिक30 (अवज्ञाकारी) हैं,
28. यहाँ एक आपत्ति का उल्लेख किए बिना उसका जवाब दिया गया है। कुरआन में कई जगहों पर मंतव्य स्पष्ट करने के लिए मकड़ी, मक्खी, मच्छर आदि के जो उदाहरण दिए गए हैं उनपर विरोधियों को आपत्ति थी कि यह अल्लाह की कैसी किताब है जिसमें ऐसी छोटी-छोटी चीज़ों की उपमाएँ हैं। वे कहते थे, अगर यह अल्लाह का कलाम (वाणी) होता तो इसमें ये बेकार की बातें न होतीं।
29. अर्थात् जो लोग बात को समझना नहीं चाहते, सत्य की खोज नहीं रखते, उनकी निगाहें तो बस ऊपरी शब्दों में अटक कर रह जाती हैं और वे उन चीज़ों के उलटे नतीजे निकालकर सत्य से और अधिक दूर चले जाते हैं। इसके विपरीत जो स्वयं सत्य के अभिलाषी हैं और सही सूझ-बूझ रखते हैं, उनको इन्हीं बातों में तत्त्वदर्शिता के गुण दिखाई पड़ते हैं और उनका दिल गवाही देता है कि ऐसी तत्त्वदर्शितापूर्ण बातें अल्लाह ही की ओर से हो सकती हैं।
ٱلَّذِينَ يَنقُضُونَ عَهۡدَ ٱللَّهِ مِنۢ بَعۡدِ مِيثَٰقِهِۦ وَيَقۡطَعُونَ مَآ أَمَرَ ٱللَّهُ بِهِۦٓ أَن يُوصَلَ وَيُفۡسِدُونَ فِي ٱلۡأَرۡضِۚ أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ ۝ 26
(27) अल्लाह के अहद को मज़बूत बाँध लेने के बाद तोड़ देते हैं,31 अल्लाह ने जिसे जोड़ने का हुक्म दिया है उसे काटते हैं,32 और ज़मीन में बिगाड़ पैदा करते हैं।33 वास्तव में यही लोग घाटा उठानेवाले हैं।
31. बादशाह अपने कर्मचारियों और प्रजा के नाम जो फ़रमान या आदेश जारी करता है उनको अरबी मुहावरे में 'अह्द' से व्यक्त किया जाता है, क्योंकि उनपर अमल करना जनता के लिए अनिवार्य होता है। यहाँ 'अह्द' का शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अल्लाह के अस्द से तात्पर्य उसका वह स्थाई आदेश है जिसके अनुसार तमाम लोग सिर्फ़ उसी की बन्दगी, आज्ञापालन और उपासना करने पर लगाए गए हैं। 'मज़बूत बाँध लेने के बाद' से संकेत इस ओर है कि आदम की पैदाइश के समय सम्पूर्ण मानवजाति से इस फरमान को पाबन्दी का वचन ले लिया गया था। कुरआन 7 : 172 में इस अह्द व क़रार पर कुछ अधिक विस्तार के साथ रौशनी डाली गई है।
32. अर्थात् जिन संबंधों के बनाने और उसे दृढ़ करने पर इंसान की वैयक्तिक और सामूहिक सफलता आश्रित है और जिनको ठीक रखने का अल्लाह ने आदेश दिया है, उनपर ये लोग कुल्हाड़ी चलाते हैं।
كَيۡفَ تَكۡفُرُونَ بِٱللَّهِ وَكُنتُمۡ أَمۡوَٰتٗا فَأَحۡيَٰكُمۡۖ ثُمَّ يُمِيتُكُمۡ ثُمَّ يُحۡيِيكُمۡ ثُمَّ إِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ ۝ 27
(28) तुम अल्लाह के साथ इनकार की नीति कैसे अपनाते हो, हालाँकि तुम बेजान थे, उसने तुमको जिन्दगी दी, फिर वही तुम्हारी जान ले लेगा, फिर वही तुम्हें दोबारा ज़िन्दगी देगा, फिर उसी की ओर तुम्हें पलटकर जाना है ।
هُوَ ٱلَّذِي خَلَقَ لَكُم مَّا فِي ٱلۡأَرۡضِ جَمِيعٗا ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰٓ إِلَى ٱلسَّمَآءِ فَسَوَّىٰهُنَّ سَبۡعَ سَمَٰوَٰتٖۚ وَهُوَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ ۝ 28
(29) वही तो है जिसने तुम्हारे लिए जमीन की सारी चीजें पैदा की, फिर ऊपर की ओर रुख किया और सात आसमान 34 ठीक तौर पर तैयार किए, और वह हर चीज़ का ज्ञान रखनेवाला है।35
34. सात आसमानों को वास्तविकता क्या है, यह बताना कठिन है । इंसान हर युग में आसमान या दूसरे शब्दों में ज़मीन से परे के बारे में अपने अनुभवों और अनुमानों के अनुसार विभिन्न प्रकार के विचार अपनाता रहा है जो बराबर बदलते रहते हैं। इसलिए उनमें से किसी विचार को आधार मानकर कुरआन के इन शब्दों का अर्थ निर्धारित करना सही नहीं होगा। बस संक्षेप में इतना समझ लेना चाहिए कि या तो इससे तात्पर्य यह है कि जमीन से परे जो भी सृष्टि है उसे अल्लाह ने सात मज़बूत वर्गों में बांट रखा है या यह कि ज़मीन इस सृष्टि के जिस भाग में स्थित है, उसमें कुल सात वर्ग हैं।
35. इस वाक्य में दो अहम तथ्यों के प्रति सचेत किया गया है। एक यह कि तुम उस अल्लाह के मुकाबले में इनकार और विद्रोह की नीति अपनाने की हिम्मत कैसे करते हो जो तुम्हारी तमाम हरकतों को खबर रखता है। दूसरे यह कि जो अल्लाह तमाम तथ्यों का ज्ञान रखता है, उससे मुंह मोड़कर इसके अलावा कि तुम अज्ञानता की अंधेरियों में भटको और क्या नतीजा निकल सकता है।
وَإِذۡ قَالَ رَبُّكَ لِلۡمَلَٰٓئِكَةِ إِنِّي جَاعِلٞ فِي ٱلۡأَرۡضِ خَلِيفَةٗۖ قَالُوٓاْ أَتَجۡعَلُ فِيهَا مَن يُفۡسِدُ فِيهَا وَيَسۡفِكُ ٱلدِّمَآءَ وَنَحۡنُ نُسَبِّحُ بِحَمۡدِكَ وَنُقَدِّسُ لَكَۖ قَالَ إِنِّيٓ أَعۡلَمُ مَا لَا تَعۡلَمُونَ ۝ 29
(30) फिर तनिक36 उस समय की कल्पना करो जब तुम्हारे रब ने फरिश्तों37 से कहा था कि ''मैं ज़मीन में एक खलीफा बनानेवाला हूँ।38 उन्होंने कहा, क्या आप धरती में किसी ऐसे को नियुक्त करनेवाले हैं, जो उसकी व्यवस्था को बिगाड़ देगा और खून-खराबा करेगा?39 आपकी सराहना के साथ आपका गुणगान और आपकी पवित्रता का बखान तो हम कर ही रहे हैं।40 कहा, "मैं जानता हूँ जो कुछ तुम नहीं जानते।41
36. ऊपर के अनुच्छेद (रुकूअ) में रब की बन्दगी की दावत इस बुनियाद पर दी गई थी कि वह तुम्हारा पैदा करनेवाला है, पालनहार है, उसी की मुट्ठी में तुम्हारी ज़िन्दगी और मौत है, और जिस सृष्टि में तुम रहते हो उसका स्वामी और प्रबंधक वही है, इसलिए उसकी बन्दगी के सिवा तुम्हारे लिए और कोई दूसरा तरीक़ा सही नहीं हो सकता। अब इस रुकूअ में वही दावत इस बुनियाद पर दी जा रही है कि इस दुनिया में अल्लाह ने तुमको अपना खलीफ़ा बनाया है। ख़लीफ़ा होने की हैसियत से तुम्हारा दायित्व केवल इतना ही नहीं है कि उसकी बन्दगी करो, बल्कि यह भी है कि उसकी भेजी हुई हिदायत के मुताबिक काम करो। इस सिलसिले में इंसान की वास्तविकता और सृष्टि में उसकी हैसियत ठीक-ठीक बता दी गई है और मानव-जाति के इतिहास का वह अध्याय प्रस्तुत किया गया है जिसके जानने का कोई दूसरा साधन इंसान के पास नहीं है। इस अध्याय से जो अहम नतीजे प्राप्त होते हैं, वे उन नतीजों से बहुत अधिक मूल्यवान हैं जमीन को तहों से बिखरी हुई हड्डियां निकालकर और उन्हें अटकल और अनुमान से जोड़-जाड़कर आदमी प्राप्त करने की कोशिश करता है।
37. अरबी शब्द 'मलक' का मूल अर्थ 'पैग़ाम पहुँचानेवाला' है। इसका शाब्दिक अर्थ 'भेजा हुआ' या फ़रिश्ता है। यह मात्र ऐसी शक्तियां नहीं हैं जो पहचान न रखती हों, बल्कि ये पहचान रखनेवाली हस्तियाँ हैं जिनसे भल्लाह अपने इस महान् साम्राज्य की व्यवस्था एवं प्रशासन में काम लेता है।
41. यह फ़रिश्तों के दूसरे संदेह का जवाब है। अर्थात् कहा कि ख़लीफ़ा नियुक्त करने की ज़रूरत और रहस्य मैं जानता हूँ. तुम इसे नहीं समझ सकते। अपनी जिन सेवाओं का उल्लेख तुम कर रहे हो, वे काफ़ी नहीं हैं, बल्कि इनसे बढ़कर कुछ और चाहिए। इसी लिए धरती में एक ऐसे प्राणी के पैदा करने का इरादा किया गया है जिसे कुछ अधिकार दिए जाएँ।
41. यह फ़रिश्तों के दूसरे संदेह का जवाब है। अर्थात् कहा कि ख़लीफ़ा नियुक्त करने की ज़रूरत और रहस्य मैं जानता हूँ. तुम इसे नहीं समझ सकते। अपनी जिन सेवाओं का उल्लेख तुम कर रहे हो, वे काफ़ी नहीं हैं, बल्कि इनसे बढ़कर कुछ और चाहिए। इसी लिए धरती में एक ऐसे प्राणी के पैदा करने का इरादा किया गया है जिसे कुछ अधिकार दिए जाएँ।
41. यह फ़रिश्तों के दूसरे संदेह का जवाब है। अर्थात् कहा कि ख़लीफ़ा नियुक्त करने की ज़रूरत और रहस्य मैं जानता हूँ. तुम इसे नहीं समझ सकते। अपनी जिन सेवाओं का उल्लेख तुम कर रहे हो, वे काफ़ी नहीं हैं, बल्कि इनसे बढ़कर कुछ और चाहिए। इसी लिए धरती में एक ऐसे प्राणी के पैदा करने का इरादा किया गया है जिसे कुछ अधिकार दिए जाएँ।
41. यह फ़रिश्तों के दूसरे संदेह का जवाब है। अर्थात् कहा कि ख़लीफ़ा नियुक्त करने की ज़रूरत और रहस्य मैं जानता हूँ. तुम इसे नहीं समझ सकते। अपनी जिन सेवाओं का उल्लेख तुम कर रहे हो, वे काफ़ी नहीं हैं, बल्कि इनसे बढ़कर कुछ और चाहिए। इसी लिए धरती में एक ऐसे प्राणी के पैदा करने का इरादा किया गया है जिसे कुछ अधिकार दिए जाएँ।
41. यह फ़रिश्तों के दूसरे संदेह का जवाब है। अर्थात् कहा कि ख़लीफ़ा नियुक्त करने की ज़रूरत और रहस्य मैं जानता हूँ. तुम इसे नहीं समझ सकते। अपनी जिन सेवाओं का उल्लेख तुम कर रहे हो, वे काफ़ी नहीं हैं, बल्कि इनसे बढ़कर कुछ और चाहिए। इसी लिए धरती में एक ऐसे प्राणी के पैदा करने का इरादा किया गया है जिसे कुछ अधिकार दिए जाएँ।
41. यह फ़रिश्तों के दूसरे संदेह का जवाब है। अर्थात् कहा कि ख़लीफ़ा नियुक्त करने की ज़रूरत और रहस्य मैं जानता हूँ. तुम इसे नहीं समझ सकते। अपनी जिन सेवाओं का उल्लेख तुम कर रहे हो, वे काफ़ी नहीं हैं, बल्कि इनसे बढ़कर कुछ और चाहिए। इसी लिए धरती में एक ऐसे प्राणी के पैदा करने का इरादा किया गया है जिसे कुछ अधिकार दिए जाएँ।
41. यह फ़रिश्तों के दूसरे संदेह का जवाब है। अर्थात् कहा कि ख़लीफ़ा नियुक्त करने की ज़रूरत और रहस्य मैं जानता हूँ. तुम इसे नहीं समझ सकते। अपनी जिन सेवाओं का उल्लेख तुम कर रहे हो, वे काफ़ी नहीं हैं, बल्कि इनसे बढ़कर कुछ और चाहिए। इसी लिए धरती में एक ऐसे प्राणी के पैदा करने का इरादा किया गया है जिसे कुछ अधिकार दिए जाएँ।
41. यह फ़रिश्तों के दूसरे संदेह का जवाब है। अर्थात् कहा कि ख़लीफ़ा नियुक्त करने की ज़रूरत और रहस्य मैं जानता हूँ. तुम इसे नहीं समझ सकते। अपनी जिन सेवाओं का उल्लेख तुम कर रहे हो, वे काफ़ी नहीं हैं, बल्कि इनसे बढ़कर कुछ और चाहिए। इसी लिए धरती में एक ऐसे प्राणी के पैदा करने का इरादा किया गया है जिसे कुछ अधिकार दिए जाएँ।
وَعَلَّمَ ءَادَمَ ٱلۡأَسۡمَآءَ كُلَّهَا ثُمَّ عَرَضَهُمۡ عَلَى ٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ فَقَالَ أَنۢبِـُٔونِي بِأَسۡمَآءِ هَٰٓؤُلَآءِ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ ۝ 30
(31) इसके बाद अल्लाह ने आदम को सभी चीज़ों के नाम सिखाए,42 फिर उन्हें फ़रिश्तों के सामने पेश किया और कहा, “अगर तुम्हारा विचार सही है (कि किसी ख़लीफ़ा के मुकर्रर करने से प्रबंध बिगड़ जाएगा) तो तनिक इन चीज़ों के नाम बताओ।"
42. इंसान के जानने की शक्ल वास्तव में यही है कि वह नामों के जरिए चीजों की जानकारी को अपने दिमाग में बिठा लेता है, इसलिए इंसान की तमाम जानकारियाँ वास्तव में चीज़ों के नामों पर आधारित हैं। आदम को सारे नाम सिखाना मानो उनको सभी चीज़ों की जानकारी देना था।
قَالُواْ سُبۡحَٰنَكَ لَا عِلۡمَ لَنَآ إِلَّا مَا عَلَّمۡتَنَآۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلۡعَلِيمُ ٱلۡحَكِيمُ ۝ 31
(32) उन्होंने अर्ज़ किया, “दोष रहित तो आप ही की हस्ती है। हम तो बस उतना ही जानते हैं, जितना आपने हमको बता दिया है।43 वास्तव में सब कुछ जानने और समझनेवाला आपके सिवा कोई नहीं।"
43. ऐसा मालूम होता है कि हर फ़रिश्ते और फ़रिश्तों को हर जाति की जानकारी सिर्फ उसी विभाग तक सीमित है जिससे उसका संबंध है, जैसे हवा के प्रबंध से जो फ़रिश्ते संबद्ध हैं, वे हवा के बारे में सब कुछ जानते हैं, मगर पानी के बारे में कुछ नहीं जानते । यही हाल दूसरे विभागों के फरिश्तों का है। इंसान को इसके विपरीत व्यापक ज्ञान दिया गया है। एक एक विभाग के बारे में, चाहे वह उस विभाग के फरिश्ते से कम जानता हो, मगर कुल मिलाकर जो व्यापकता इंसान के ज्ञान को दी गई है, वह फ़रिश्तों को नहीं मिली है।
قَالَ يَٰٓـَٔادَمُ أَنۢبِئۡهُم بِأَسۡمَآئِهِمۡۖ فَلَمَّآ أَنۢبَأَهُم بِأَسۡمَآئِهِمۡ قَالَ أَلَمۡ أَقُل لَّكُمۡ إِنِّيٓ أَعۡلَمُ غَيۡبَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَأَعۡلَمُ مَا تُبۡدُونَ وَمَا كُنتُمۡ تَكۡتُمُونَ ۝ 32
(33) फिर अल्लाह ने आदम से कहा, "तुम इन्हें इन चीजों के नाम बताओ।" जब उसने उनको उन सबके बता दिए 44, तो अल्लाह ने कहा, "मैंने तुमसे कहा न था कि मैं आसमानों और ज़मीन के वे सारे तथ्य जानता हूँ जो तुमसे छिपे हुए हैं। जो कुछ तुम जाहिर करते हो, वह भी मुझे मालूम है और जो कुछ तुम छिपाते हो, उसे भी मैं जानता हूँ।"
44. यह प्रदर्शन फ़रिश्तों पहले संदेह का जवाब था, मानो इस तरीके से अल्लाह ने उन्हें बता दिया कि मैं आदम को केवल अधिकार ही नहीं दे रहा हूँ, बल्कि ज्ञान भी दे रहा हूँ। इसकी नियुक्ति से बिगाड़ की जो आशंका तुमें हुई वह इस मामले का केवल एक पहलू है। दूसरा पहलू सुधार और निर्माण का भी है और वह बिगाड़ के पहलू से अधिक वजनी और अधिक मूल्यवान है।
وَإِذۡ قُلۡنَا لِلۡمَلَٰٓئِكَةِ ٱسۡجُدُواْ لِأٓدَمَ فَسَجَدُوٓاْ إِلَّآ إِبۡلِيسَ أَبَىٰ وَٱسۡتَكۡبَرَ وَكَانَ مِنَ ٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 33
(34) फिर जब हमने फ़रिश्तों को हुक्म दिया कि आदम के आगे झुक जाओ, तो सब45 झुक गए मगर इबलीस46 ने इनकार किया । वह अपनी बड़ाई के घमंड में पड़ गया और अवज्ञाकारियों में शामिल हो गया।47
45. इसका अर्थ यह है कि धरती और उससे संबंधित सृष्टि के विभिन्न क्षेत्रों में जितने फ़रिश्ते लगे हुए हैं, इन सबको इंसान के लिए आधीन हो जाने का आदेश दिया गया। चूंकि इस क्षेत्र में अल्लाह के हुक्म से इंसान ख़लीफ़ा बनाया जा रहा था, इसलिए फरमान जारी हुआ कि सही या ग़लत, जिस काम में भी इंसान अपने उन अधिकारों को जो हम उसे दे रहे हैं, इस्तेमाल करना चाहे और हम अपनी इच्छा से उसे ऐसा कर लेने का मौका दे दें, तो तुम्हारा कर्तव्य है कि तुममें से जिस-जिसके कार्य क्षेत्र से वह काम संबंधित हो, वह अपने क्षेत्र तक उसका साथ दे। संभव है कि केवल अधीन हो जाने ही को यहाँ सजदा के नाम से व्यक्त किया गया हो, मगर यह भी संभव है कि इस अधीनता की निशानी के रूप में किसी ज़ाहिरी काम का भी आदेश दिया गया हो, और यही ज़्यादा सही मालूम होता है।
46. इबलीस शब्द का अनुवाद 'आत्यंतिक निराश' है । परिभाषा में यह उस जिन्न का नाम है जिसने अल्लाह हुक्म की नाफरमानी करके आदम और आदम को संतान के आधीन होने से इनकार कर दिया था। इसी को 'शैतान' (अश-शैतान) भी कहा जाता है । बास्तव में शैतान और इबलीरा भी केवल किसी शक्ति मात्र का नाम नहीं है, बल्कि वह भी इंसान की तरह अपनी पहचान रखनेवाली एक हस्ती है। आगे चलकर कुरआन ने स्वयं स्पष्ट कर दिया है कि वह जिन्नों में से था, जो फ़रिश्तों अलग प्राणियों का स्थाई वर्ग है।
وَقُلۡنَا يَٰٓـَٔادَمُ ٱسۡكُنۡ أَنتَ وَزَوۡجُكَ ٱلۡجَنَّةَ وَكُلَا مِنۡهَا رَغَدًا حَيۡثُ شِئۡتُمَا وَلَا تَقۡرَبَا هَٰذِهِ ٱلشَّجَرَةَ فَتَكُونَا مِنَ ٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 34
(35) फिर हमने आदम से कहा कि “तुम और तुम्हारी बीवी, दोनों जन्नत में रहो और यहाँ जी भरकर जो चाहो खाओ, मगर उस पेड़ का रुख़ न करना 48, वरना ज़ालिमों 49 में गिने जाओगे।"
48. इससे मालूम होता है कि धरती अर्थात् अपनी नियुक्ति-स्थली पर खलीफ़ा की हैसियत से भेजे जाने से पहले इन दोनों की परीक्षा लेने के उद्देश्य से इन्हें जन्नत में रखा गया था, ताकि उनके रुझानों की आज़माइश हो जाए, [और यह मालूम हो जाए] कि ये शैतान के बहलावों के मुक़ाबले में किस हद तक आदेश के पालन पर क़ायम रहते हैं । इस आज़माइश के लिए एक पेड़ को चुन लिया गया और हुक्म दिया गया कि इसके क़रीब न फटकना और इसका अंजाम भी बता दिया गया कि अगर ऐसा करोगे तो हमारी निगाह में ज़ालिम क़रार पाओगे। पेड़ के नाम और उसके गुणों का कोई उल्लेख [इसलिए] नहीं किया [गया कि उद्देश्य की दृष्टि से यह बिल्कुल अनावश्यक था]। इस परीक्षा के लिए जन्नत ही की जगह [के चुने जाने] का उद्देश्य वास्तव में इनसान के मन में यह बात बिठा देनी थी कि तुम्हारे लिए इंसान के पद को देखते हुए जन्नत ही सही और मुनासिब जगह है। [इसलिए तुम्हें ऐसा ही रवैया अपनाना चाहिए जिससे तुम अपने को इस जगह का हक़दार बना सको।]
49. 'ज़ुल्म' वास्तव में हक़ मारने को कहते हैं । जो आदमी अल्लाह की अवज्ञा करता है, वह वास्तव में तीन बड़े बुनियादी हकों को मारता है । पहला, अल्लाह का हक़, क्योंकि वह इसका हक़दार है कि उसका आज्ञापालन किया जाए । दूसरा, उन तमाम चीज़ों के हक़ जिनको उसने इस नाफ़रमानी के अपराध में इस्तेमाल किया, क्योंकि उन सबका उसपर यह हक़ था कि वह केवल इनके मालिक हो की मरज़ी के मुताबिक़ उनपर अपने अधिकारों का प्रयोग करे। तीसरा, ख़ुद अपना हक़, क्योंकि उसपर उसके व्यक्तित्व का अपना यह हक़ है कि वह [अल्लाह की नाफ़रमानी से दूर रहकर] उसे तबाही से बचाए। इन्हीं कारणों से क़ुरआन में जगह-जगह गुनाह के लिए ज़ुल्म और गुनाहगार के लिए ज़ालिम को परिभाषा प्रयोग की गई है।
فَأَزَلَّهُمَا ٱلشَّيۡطَٰنُ عَنۡهَا فَأَخۡرَجَهُمَا مِمَّا كَانَا فِيهِۖ وَقُلۡنَا ٱهۡبِطُواْ بَعۡضُكُمۡ لِبَعۡضٍ عَدُوّٞۖ وَلَكُمۡ فِي ٱلۡأَرۡضِ مُسۡتَقَرّٞ وَمَتَٰعٌ إِلَىٰ حِينٖ ۝ 35
(36) अन्तत: शैतान ने उन दोनों को उस पेड़ का प्रलोभन देकर हमारे आदेश के पालन से हटा दिया और उन्हें उस हालत से निकलवाकर छोड़ा, जिसमें वे थे। हमने हुक्म दिया कि “अब तुम सब यहाँ से उतर जाओ, तुम एक-दूसरे के शत्रु हो50 और तुम्हें एक निश्चित समय तक ज़मीन में ठहरना और वहीं गुज़र-बसर करना है।"
50. अर्थात् इंसान का शत्रु शैतान और शैतान का शत्रु इंसान है। शैतान का, इंसान का शत्रु होना तो ज़ाहिर ही है। रहा शैतान का शत्रु इंसान का होना, तो वास्तव में इंसानियत तो उससे दुश्मनी ही का तक़ाज़ा करती है, मगर [यह आदमी का अपना धोखा है कि वह] उसे अपना दोस्त बना लेता है।
فَتَلَقَّىٰٓ ءَادَمُ مِن رَّبِّهِۦ كَلِمَٰتٖ فَتَابَ عَلَيۡهِۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ۝ 36
(37) उस समय आदम ने अपने रब (प्रभु) से कुछ शब्द सीखकर तौबा की 51, जिसको उसके रब ने क़बूल कर लिया, क्योंकि वह बड़ा क्षमाशील और दयालु है।52
51. अर्थात् आदम को जब अपने अपराध का एहसास हुआ और उन्होंने अवज्ञा से फिर आज्ञापालन की ओर पलटना चाहा और उनके दिल में यह इच्छा पैदा हुई कि अपने रब से अपनी ग़लती माफ़ कराएँ, तो उन्हें वे शब्‍द न मिलते थे जिनके द्वारा वे अपनी ग़लती को माफ़ करने के लिए दुआ कर सकते । अल्लाह ने उनकी दशा पर दया की और उन्हें वे शब्द बता दिए। 'तौबा' का मूल अर्थ रुजू करना और पलटना है। बन्दे की ओर से तौबा का तात्पर्य यह है कि वह उद्दंडता से रुक गया, बन्दगी के तरीक़े की ओर पलट आया और अल्लाह की ओर से तौबा का तात्पर्य यह है कि वह अपने शर्मिंदा गुलाम की ओर रहमत के साथ फिर से मुतवज्जोह हो गया।
52. क़ुरआन इस विचार का खण्डन करता है कि गुनाह के नतीजे ज़रूरी होते हैं और वे बहरहाल इंसान को भुगतने ही होंगे। यह इंसान के अपने गुमराहकुन विचारों में से एक नज़रिया है, जो इंसान को गुमराह करनेवाला है, क्योंकि जो आदमी एक बार गुनाह भरी जिन्दगी में फँस गया, उसको यह विचार हमेशा के लिए निराश कर देता है। कुरआन इसके विपरीत यह बताता है कि भलाई का बदला और बुराई की सज़ा देना बिल्कुल अल्लाह के अधिकार में है। तुम्हें जिस भलाई पर इनाम मिलता है, वह तुम्हारी भलाई का स्वाभाविक परिणाम नहीं है, बल्कि अल्लाह की मेहरबानी है, चाहे दे, चाहे न दे। इसी तरह जिस बुराई पर तुम्हें सज़ा मिलती है, वह भी बुराई का स्वाभाविक परिणाम नहीं है कि अनिवार्य रूप से निकलकर ही रहे, बल्कि अल्लाह को इसका पूरा-पूरा अधिकार है कि वह चाहे तो माफ़ कर दे और चाहे तो सज़ा दे दे। अलबत्ता [चूँकि वह तत्त्वदर्शी है, इसलिए अपने अधिकारों का प्रयोग पूरे न्याय के साथ और लोगों के हक़ों को देखकर ही करता है।]
قُلۡنَا ٱهۡبِطُواْ مِنۡهَا جَمِيعٗاۖ فَإِمَّا يَأۡتِيَنَّكُم مِّنِّي هُدٗى فَمَن تَبِعَ هُدَايَ فَلَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُونَ ۝ 37
(38) हमने कहा कि “तुम सब यहाँ से उतर जाओ।53 फिर जो मेरी ओर से कोई हिदायत तुम्हारे पास पहुँचे, तो जो लोग मेरी उस हिदायत की पैरवी करेंगे, उनके लिए किसी डर और दुख का मौक़ा न होगा,
53. ऊपर के वाक्य में यह बताया गया है कि आदम ने तौबा को और अल्लाह ने कबूल कर ली। इसका मतलब यह हुआ कि गुनाह करने का जो दाग़ उनके दामन पर लग गया था, वह धो डाला गया । न यह दाग़ उनके दामन पर रहा, न उनको नस्ल के दामन पर और न इसकी आवश्यकता ही पड़ी कि मआज़ल्लाह (अल्लाह की पनाह !)! अल्लाह को अपना इकलौता भेजकर समस्त मानवजाति के गुनाहों के प्रायश्चित के रूप में उसे सूली पर चढ़वाना पड़ता। अब जो जन्नत से निकलने का हुक्म फिर दोहराया गया, तो इसका उद्देश्य यह था कि तौबा कबूल होने का यह तकाज़ा था कि आदम को जन्नत ही में रहने दिया जाता। उनें जमीन की खिलाफत ही के लिए पैदा किया गया था। जन्नत उनके रहने की असली जगह न थी। वहां से निकलने का हुक्म उनके लिए सज़ा की हैसियत न रखता था, मूल उद्देश्य तो उनको ज़मीन ही पर उतारने का था। हां, इससे पहले उनको उस परिक्षण के उद्देश्य से जन्नत में रखा गया था जिसका उल्लेख टिप्पणी नं० 48 में किया जा चुका है।
وَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَكَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِنَآ أُوْلَٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلنَّارِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ ۝ 38
(39) और जो इसको क़बूल करने से इनकार करेंगे और हमारी आयतों 54 को झुठलाएँगे, वे आग में जानेवाले लोग हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे।"55
54. 'आयतों' बहुवचन है 'आयत' का। आयत का वास्तविक अर्थ वह निशानी (चिह्न) है जो किसी चीज़ को ओर रहनुमाई करे। क़ुरआन में यह शब्द चार विभिन्न अर्थों में आया है-कहीं इसका तात्पर्य चिन्ह या निशानी ही है, कहीं सृष्टि की निशानियों को अल्लाह की आयत कहा गया है, क्योंकि प्रकृति के प्रत्यक्ष स्वरूप का हर रूप उस सच्चाई को ओर इशारा कर रहा है जो उस प्रत्यक्ष परदे के पीछे छिपी हुई है। कहीं नबियों के मोजिज़ों (चमत्कारों) को आयत कहा गया है, क्योंकि ये मोजिज़े वास्तव में इस बात के प्रतीक होते थे कि ये लोग सृष्टि के शासक के प्रतिनिधि हैं। कहीं अल्लाह की किताब के वाक्यों को आयत कहा गया है, क्योंकि वे न केवल सत्य की ओर रहुनमाई करते हैं, बल्कि उनके अन्दर वास्‍तव में इस पुस्तक के महिमावान रचयिता के व्यक्तित्व को निशानियाँ भी स्पष्ट रूप से महसूस होती हैं।
55. यह मानवजाति के लिए आदिकाल से लेकर क़ियामत तक के लिए अल्लाह का स्थाई फ़रमान है और इसी को तीसरे रुकूअ में अल्लाह का 'अह्द' (वचन) कहा गया है । इंसान का काम खुद रास्ता तय करना नहीं है, बल्कि बन्दा और ख़लीफ़ा होने की दोहरी हैसियतों की दृष्टि से वह इसपर लगाया गया है कि उस रास्ते पर चले जो उसका रब उसके लिए निश्चित कर दे।
يَٰبَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ ٱذۡكُرُواْ نِعۡمَتِيَ ٱلَّتِيٓ أَنۡعَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ وَأَوۡفُواْ بِعَهۡدِيٓ أُوفِ بِعَهۡدِكُمۡ وَإِيَّٰيَ فَٱرۡهَبُونِ ۝ 39
(40) ऐ इसराईल की संतान!56 तनिक विचार करो मेरी उस नेमत का जो मैंने तुमको दी थी, मेरे साथ तुम्हारा जो वचन था उसे तुम पूरा करो, तो मेरा जो वचन तुम्हारे साथ था उसे मैं पूरा करूँ, और मुझ ही से तुम डरो ।
56. इसराईल का अर्थ है अब्दुल्लाह या अल्लाह का बन्दा। यह हज़रत याकूब की उपाधि थी, जो उनको अल्लाह की ओर से दी गई थी। इन्हीं की नस्ल (अर्थात् यहूदियों) को बनी इसराईल (इसराईल अलैहि. की संतान) कहते हैं। [मदीना तैयिबा और उसके आस-पास के क्षेत्र में चूँकि यहूदियों की बड़ी तादाद आबाद थी, इसलिए] अब यहाँ से चौदहवें रुकूअ (आयत 40-121) तक निरंतर एक व्याख्यान उस क़ौम को संबोधित करते हुए चलता है, जिसमें कहीं-कहीं ईसाइयों और अरब के मुशरिकों की ओर [और कहीं-कहीं ईमानवालों को ओर] भी संबोधन हो गया है। इस व्याख्यान को पढ़ते हुए नीचे लिखी बातों को मुख्य रूप से सामने रखना चाहिए- एक, यह कि इसका अभिप्राय यह है कि पिछले पैग़म्बरों की उम्मत (समुदाय) में जो थोड़े-बहुत लोग अभी ऐसे बाक़ी हैं, जिनमें भलाई और बेहतरी के तत्त्व मौजूद हैं, उन्हें उस सच्चाई पर ईमान लाने और उस काम में शामिल होने की दावत दी जाए जिसके साथ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उठाए गए थे। दूसरे, इसका अभिप्राय आम यहूदियों तक पूरी बात पहुँचा देना और साफ़-साफ़ उनकी धार्मिक और नैतिक दशा को खोलकर रख देना है। इसका फायदा यह हुआ कि एक ओर स्वयं उस कौम में जो भले लोग मौजूद थे, उनकी आँखें खुल गई, दूसरी ओर मदीना के लोगों पर और आम तौर से अरब के मुशरिकों पर उन लोगों का जो धार्मिक और नैतिक प्रभाव था, वह समाप्त हो गया और तीसरी ओर स्वयं अपने आपको बेनक़ाब देखकर [वे इस्लाम के मुकाबले में हिम्मत हारकर रह गए।] तीसरे, पिछले चार रुकूओं (आरंभ से 39 आयत तक) में मानव-जाति को आम दावत देते हुए जो कुछ कहा गया था, उसी के सिलसिले में एक विशेष कौम का निश्चित उदाहरण लेकर बताया जा रहा है कि जो क़ौम अल्लाह को भेजी हुई हिदायत से मुंह मोड़ती है, उसका अंजाम क्या होता है। चौथे, इससे मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के माननेवालों को शिक्षा देना भी है कि वे पतन के उस गढ़े में गिरने से बचें जिसमें पिछले नबियों की पैरवी करनेवाले गिर गए।
57. थोड़ी क़ीमत से तात्पर्य दुनिया के वे फ़ायदे हैं, जिनके लिए ये लोग अल्लाह के हुक्मों और उसकी हिदायतों को रद्द कर रहे थे।
وَءَامِنُواْ بِمَآ أَنزَلۡتُ مُصَدِّقٗا لِّمَا مَعَكُمۡ وَلَا تَكُونُوٓاْ أَوَّلَ كَافِرِۭ بِهِۦۖ وَلَا تَشۡتَرُواْ بِـَٔايَٰتِي ثَمَنٗا قَلِيلٗا وَإِيَّٰيَ فَٱتَّقُونِ ۝ 40
(41) और मैंने जो किताब भेजी है उसपर ईमान लाओ। यह उस किताब के समर्थन में है जो तुम्हारे पास पहले से मौजूद थी, इसलिए सबसे पहले तुम ही उसके इनकार करनेवाले न बन जाओ। थोड़ी क़ीमत पर मेरी आयतों को न बेच डालो 57 और मेरे प्रकोप से बचो।
58. इस आयत को समझने के लिए यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि अरब के लोग सामान्यत: अनपढ़ होते थे और उनकी तुलना में [यहूदी काफ़ी पढ़े-लिखे थे] इस कारण अरबों पर यहूदियों के शिक्षित होने का रौब बहुत ज़्यादा था। फिर इनके विद्वान और इनके बुज़ुगों ने [अपने धार्मिक धौंस से उनके इस हीन भाव को और अधिक बढ़ा दिया था] | इन परिस्थितियों में जब नबी (सल्ल.) ने लोगों को इस्लाम की ओर बुलाना शुरू किया, तो स्वाभाविक बात थी कि अनपढ़ अरब अह्ले किताब यहूदियों से जाकर पूछते कि आप लोग भी एक नबी की पैरवी करनेवाले हैं और एक किताब को मानते हैं, आप हमें बताएँ कि यह साहब जो हमारे अन्दर नबी होने का दावा लेकर उठे हैं, इनके बारे में और इनकी शिक्षा के बारे में आपकी क्या राय है । [इसके उत्तर में] इनके लिए यह कहना तो कठिन था कि [आपको दावत ग़लत है, लेकिन वे इसे साफ़-साफ़ सही कहने] के लिए भी तैयार न थे । इन दोनों रास्तों के बीच उन्होंने यह तरीक़ा अपनाया था कि हर पूछनेवाले के मन में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के खिलाफ़ और आपके मिशन के खिलाफ कोई न कोई भ्रम पैदा कर देते थे, कोई आरोप आपपर मढ़ देते थे, कोई ऐसा शोशा छोड़ देते थे जिससे लोग संदेह में पड़ जाएँ। उनका यही रवैया था जिसके कारण उनसे कहा जा रहा है कि सत्य पर असत्य के परदे न डालो, अपने झूठे प्रोपेगंडे और शरारत भरे संदेहों और आपत्तियों से सत्य को दबाने और छिपाने की कोशिश न करो, और सत्य और असत्य को गड्ड-मड्ड करके दुनिया को धोखा न दो।
وَلَا تَلۡبِسُواْ ٱلۡحَقَّ بِٱلۡبَٰطِلِ وَتَكۡتُمُواْ ٱلۡحَقَّ وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ۝ 41
(42) असत्य का रंग चढ़ाकर सत्य के बारे में संदेह न पैदा करो और न जानते-बूझते सत्य को छिपाने की कोशिश करो।58
58. इस आयत को समझने के लिए यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि अरब के लोग सामान्यत: अनपढ़ होते थे और उनकी तुलना में [यहूदी काफ़ी पढ़े-लिखे थे] इस कारण अरबों पर यहूदियों के शिक्षित होने का रौब बहुत ज़्यादा था। फिर इनके विद्वान और इनके बुज़ुगों ने [अपने धार्मिक धौंस से उनके इस हीन भाव को और अधिक बढ़ा दिया था] | इन परिस्थितियों में जब नबी (सल्ल.) ने लोगों को इस्लाम की ओर बुलाना शुरू किया, तो स्वाभाविक बात थी कि अनपढ़ अरब अह्ले किताब यहूदियों से जाकर पूछते कि आप लोग भी एक नबी की पैरवी करनेवाले हैं और एक किताब को मानते हैं, आप हमें बताएँ कि यह साहब जो हमारे अन्दर नबी होने का दावा लेकर उठे हैं, इनके बारे में और इनकी शिक्षा के बारे में आपकी क्या राय है । [इसके उत्तर में] इनके लिए यह कहना तो कठिन था कि [आपको दावत ग़लत है, लेकिन वे इसे साफ़-साफ़ सही कहने] के लिए भी तैयार न थे । इन दोनों रास्तों के बीच उन्होंने यह तरीक़ा अपनाया था कि हर पूछनेवाले के मन में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के खिलाफ़ और आपके मिशन के खिलाफ कोई न कोई भ्रम पैदा कर देते थे, कोई आरोप आपपर मढ़ देते थे, कोई ऐसा शोशा छोड़ देते थे जिससे लोग संदेह में पड़ जाएँ। उनका यही रवैया था जिसके कारण उनसे कहा जा रहा है कि सत्य पर असत्य के परदे न डालो, अपने झूठे प्रोपेगंडे और शरारत भरे संदेहों और आपत्तियों से सत्य को दबाने और छिपाने की कोशिश न करो, और सत्य और असत्य को गड्ड-मड्ड करके दुनिया को धोखा न दो।
وَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُواْ ٱلزَّكَوٰةَ وَٱرۡكَعُواْ مَعَ ٱلرَّٰكِعِينَ ۝ 42
(43) नमाज़ क़ायम करो, जकात दो,59 और जो लोग मेरे आगे झुक रहे हैं उनके साथ तुम भी झुक जाओ।
59. नमाज़ और ज़कात हर ज़माने में इस्लाम धर्म के सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं। सभी नबियों की तरह बनी इसराईल के नबियों ने भी इसकी सख्त ताकीद की थी, पर यहूदी इनसे ग़ाफ़िल हो चुके थे। के साथ नमाज़ पढ़ने को व्यवस्था इनके यहाँ लगभग छिन्न-भिन्न हो चुकी थी। क़ौम के अधिकतर लोग अपनी व्यक्तिगत नमाज़ भी छोड़ चुके थे और ज़कात देने के बजाय ये लोग सूद खाने लगे थे।
۞أَتَأۡمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلۡبِرِّ وَتَنسَوۡنَ أَنفُسَكُمۡ وَأَنتُمۡ تَتۡلُونَ ٱلۡكِتَٰبَۚ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ ۝ 43
(44) तुम दूसरों को तो नेकी का रास्ता अपनाने के लिए कहते हो, मगर अपने आपको भूल जाते हो? हालाँकि तुम किताब की तिलावत (पाठ) करते हो । क्या तुम बुद्धि से बिल्कुल ही काम नहीं लेते?
وَٱسۡتَعِينُواْ بِٱلصَّبۡرِ وَٱلصَّلَوٰةِۚ وَإِنَّهَا لَكَبِيرَةٌ إِلَّا عَلَى ٱلۡخَٰشِعِينَ ۝ 44
(45) धैर्य और नमाज़ 60 से मदद लो, निस्संदेह नमाज़ एक बड़ा ही कठिन काम है, मगर उन आज्ञाकारी बन्दों के लिए कठिन नहीं है
60. अर्थात् अगर तुम्हें नेकी के रास्ते पर चलने में कठिनाई महसूस होती है तो उस कठिनाई का इलाज धैर्य (सब्र) और नमाज़ है। इन दोनों चीज़ों से तुम्हें वह शक्ति मिलेगी जिससे यह राह आसान हो जाएगी। 'सब्र' का शाब्दिक अर्थ रोकना और बाँधना है और इससे तात्पर्य इरादे की वह मज़बूती, संकल्प की वह दृढ़ता और मनोकामनाओं पर वह नियंत्रण है जिससे एक आदमी मनोकामनाओं और बाहरी कठिनाइयों की तुलना में अपने मन और मस्तिष्क के पसन्द किए हुए रास्ते पर लगातार बढ़ता चला जाए। अल्लाह के इस कथन का अभिप्राय यह है कि इस नैतिक गुण को अपने भीतर परवान चढ़ाओ और इसको बाहर से शक्ति पहुंचाने के लिए नमाज़ की पाबंदी करो।
ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَٰقُواْ رَبِّهِمۡ وَأَنَّهُمۡ إِلَيۡهِ رَٰجِعُونَ ۝ 45
(46) जो समझते हैं कि आखिरकार उन्हें अपने रब से मिलना और उसी की ओर पलटकर जाना है।61
61. अर्थात् जो आदमी अल्लाह का आज्ञाकारी न हो और परलोक पर विश्वास न रखता हो, उसके लिए तो नमाज़ को पाबन्दी एक ऐसी मुसीबत है जिसे वह कभी गवारा ही नहीं कर सकता, किन्तु जो स्वेच्छा और लगाव के साथ अल्लाह के आगे अपने को समर्पित कर चुका हो और जिसे यह विश्वास हो कि कभी मरकर अपने रब के सामने जाना भी है, उसके लिए नमाज़ अदा करना नहीं, बल्कि नमाज़ का छोड़ना कठिन है।
يَٰبَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ ٱذۡكُرُواْ نِعۡمَتِيَ ٱلَّتِيٓ أَنۡعَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ وَأَنِّي فَضَّلۡتُكُمۡ عَلَى ٱلۡعَٰلَمِينَ ۝ 46
(47) ऐ बनी इसराईल (इसराईल की संतान) ! याद करो मेरी उस नेमत को, जो मैंने तुमको प्रदान की थी और इस बात को कि मैंने तुम्हें दुनिया की सारी क़ौमों (जातियों) पर प्रधानता प्रदान की थी।62
62. इसका यह अर्थ नहीं है कि हमेशा के लिए तुम्हें तमाम दुनिया की कौमों से श्रेष्ठ बना दिया था, बल्कि अर्थ यह है कि एक समय था जब दुनिया को कौमों में तुम्हीं वह एक क़ौम थे जिसके पास अल्लाह का दिया हुआ सत्य-ज्ञान था और जिसे दुनिया की क़ौमों का इमाम और रहनुमा बना दिया गया था, ताकि वह रब की बन्दगी के रास्ते पर सब क़ौमों को बुलाए और चलाए ।
وَٱتَّقُواْ يَوۡمٗا لَّا تَجۡزِي نَفۡسٌ عَن نَّفۡسٖ شَيۡـٔٗا وَلَا يُقۡبَلُ مِنۡهَا شَفَٰعَةٞ وَلَا يُؤۡخَذُ مِنۡهَا عَدۡلٞ وَلَا هُمۡ يُنصَرُونَ ۝ 47
(48) और डरो उस दिन से जब कोई किसी के कुछ काम न आएगा, न किसी की ओर से सिफ़ारिश कबूल होगी, न किसी को फ़िदया (अर्थदण्ड) लेकर छोड़ा जाएगा, और न अपराधियों को कहीं से मदद मिल सकेगी।63
63. बनी इसराईल के बिगाड़ का एक बहुत बड़ा कारण यह था कि आखिरत के बारे में उनके विश्वास में खराबी आ गई थी। वे इस प्रकार के ग़लत ख़यालों में पड़ गए थे कि हम अत्यंत प्रतिष्ठा प्राप्त नबियों की औलाद हैं, बड़े-बड़े वलियों, बुजुर्गों और अल्लाहवालों से संबंध रखते हैं। हमारी मुक्ति के लिए (ये संबंध) पर्याप्त हैं। इन्हीं झूठे भरोसों ने उनको दीन (धर्म) से ग़ाफ़िल और गुनाहों के चक्कर में फंसा दिया था। इसलिए नेमत याद दिलाने के साथ तुरन्त ही उनकी इन ग़लतफहमियों को दूर किया गया है।
وَإِذۡ نَجَّيۡنَٰكُم مِّنۡ ءَالِ فِرۡعَوۡنَ يَسُومُونَكُمۡ سُوٓءَ ٱلۡعَذَابِ يُذَبِّحُونَ أَبۡنَآءَكُمۡ وَيَسۡتَحۡيُونَ نِسَآءَكُمۡۚ وَفِي ذَٰلِكُم بَلَآءٞ مِّن رَّبِّكُمۡ عَظِيمٞ ۝ 48
49) याद करो वह समय64, जब हमने तुमको फ़िरऔनियों65 की दासता से छुटकारा दिलाया- उन्होंने तुम्हें बड़े अज़ाब में डाल रखा था, तुम्हारे लड़कों को मार डालते थे और तुम्हारी लड़कियों को जिन्दा रहने देते थे। और इस हालत में तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी बड़ी आज़माइश थी।66
64. यहाँ से बाद के कई स्कूओं (आयत 49-123) तक बराबर जिन घटनाओं को ओर इशारे किए गए हैं, वे सब बनी इसराईल के इतिहास की प्रसिद्धतम घटनाएँ हैं, जिन्हें उस क़ौम का बच्चा-बच्चा जानता था। इसी लिए विस्तृत विवेचन करने के बजाए एक-एक घटना की ओर थोड़ा-सा इशारा किया गया है। इस ऐतिहासिक वर्णन में वास्तव में यह दिखाना अभिप्रेत है कि एक ओर ये और ये उपकार हैं, जो अल्लाह ने तुमपर किए और दूसरी ओर ये और ये करतूत हैं, जो इन उपकारों के जवाब में तुम करते रहे।
65. यह अरबी शब्द 'आले फ़िरऔन' का अनुवाद है, इसमें फ़िरऔनी परिवार और मिस्र का शासक वर्ग दोनों शामिल हैं।
وَإِذۡ فَرَقۡنَا بِكُمُ ٱلۡبَحۡرَ فَأَنجَيۡنَٰكُمۡ وَأَغۡرَقۡنَآ ءَالَ فِرۡعَوۡنَ وَأَنتُمۡ تَنظُرُونَ ۝ 49
(50) याद करो वह समय जब हमने समुद्र फाड़कर तुम्हारे लिए रास्ता बनाया, फिर उसमें से तुम्हें सकुशल गुज़रवाया, फिर वहीं तुम्हारी आँखों के सामने फ़िरऔनियों को डुबो दिया।
وَإِذۡ وَٰعَدۡنَا مُوسَىٰٓ أَرۡبَعِينَ لَيۡلَةٗ ثُمَّ ٱتَّخَذۡتُمُ ٱلۡعِجۡلَ مِنۢ بَعۡدِهِۦ وَأَنتُمۡ ظَٰلِمُونَ ۝ 50
(51) याद करो जब हमने मूसा को चालीस दिन व रात के वादे पर बुलाया67, तो उसके पीछे तुम बछड़े को अपना माबूद (उपास्य)68 बना बैठे। उस समय तुमने बड़ा अत्याचार किया था,
67. अर्थात् मिस्र से छुटकारा पाने के बाद जब बनी इसराईल सोना प्रायद्वीप में पहुंच गए, तो हज़रत मूसा को अल्लाह ने चालीस दिन व रात के लिए तूर पहाड़ पर बुलाया, ताकि वहाँ उस क़ौम के लिए, जो अब आज़ाद हो चुकी थी, शरीअत के क़ानून और व्यावहारिक जीवन के लिए निर्देश प्रदान किए जाएँ। (देखिए बाइबिल, पुस्तक : निर्गमन, अध्याय 24.31)
68. गाय और बैल की पूजा का रोग बनी इसराईल को पड़ोसी कौमों में हर ओर फैला हुआ था। मिस्र और कनआन में इसका आम रिवाज था। हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के बाद बनी इसराईल जब पतन के शिकार हुए और धीरे धीरे किब्तियों के दास बन गए, तो उन्होंने दूसरे बहुत-से रोगों के अलावा यह एक रोग भी अपने शासकों से ले लिया। (बछड़े की पूजा का यह वृत्तांत बाइबल, पुस्तक : निर्गमन, अध्याय 32 में सविस्तार आया है)।
ثُمَّ عَفَوۡنَا عَنكُم مِّنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَ لَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ ۝ 51
(52) मगर इसपर भी हमने तुम्हें क्षमा कर दिया कि शायद अब तुम कृतज्ञ बनो।
وَإِذۡ ءَاتَيۡنَا مُوسَى ٱلۡكِتَٰبَ وَٱلۡفُرۡقَانَ لَعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ ۝ 52
(53) याद करो कि (ठीक उस समय जब तुम यह अत्याचार कर रहे थे) हमने मूसा को किताब और फुरकान (कसौटी)69 दी, ताकि तुम उसके द्वारा सीधा रास्ता पा सको।
69. फुरकान से तात्पर्य है वह चीज़ जिसके द्वारा सत्य और असत्य का अन्तर स्पष्ट हो, अर्थात् धर्म का बह ज्ञान और समझ जिससे आदमी सत्य और असत्य में अन्तर करता है।
وَإِذۡ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوۡمِهِۦ يَٰقَوۡمِ إِنَّكُمۡ ظَلَمۡتُمۡ أَنفُسَكُم بِٱتِّخَاذِكُمُ ٱلۡعِجۡلَ فَتُوبُوٓاْ إِلَىٰ بَارِئِكُمۡ فَٱقۡتُلُوٓاْ أَنفُسَكُمۡ ذَٰلِكُمۡ خَيۡرٞ لَّكُمۡ عِندَ بَارِئِكُمۡ فَتَابَ عَلَيۡكُمۡۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ۝ 53
(54) याद करो जब मूसा (यह नेमत लिए हुए पलटा, तो उस) ने अपनी क़ौम से कहा कि "लोगो ! तुमने बछड़े को अपना माबूद (पूज्य) बनाकर अपने ऊपर बड़ा अत्याचार किया है, इसलिए तुम लोग अपने पैदा करनेवाले के आगे तौबा (क्षमा याचना) करो और अपनी जानों को हलाक करो,70 इसी में तुम्हारे पैदा करनेवाले के नज़दीक तुम्हारी भलाई है।" उस समय तुम्हारे पैदा करनेवाले ने तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली कि वह बड़ा क्षमा करनेवाला और दया करनेवाला है।
70. अर्थात् अपने उन आदमियों का क़त्ल करो जिन्होंने बछड़े को माबूद (पूज्य) बनाया और उसकी पूजा की।
وَإِذۡ قُلۡتُمۡ يَٰمُوسَىٰ لَن نُّؤۡمِنَ لَكَ حَتَّىٰ نَرَى ٱللَّهَ جَهۡرَةٗ فَأَخَذَتۡكُمُ ٱلصَّٰعِقَةُ وَأَنتُمۡ تَنظُرُونَ ۝ 54
(55) याद करो जब तुमने मूसा से कहा था कि हम तुम्हारी बातों पर कदापि विश्वास न करेंगे, जब तक कि अपनी आँखों से खुले तौर पर अल्लाह को (तुमसे बातें करते) न देख लें। उस समय तुम्हारे देखते-देखते एक जबरदस्त कड़के ने तुमको आ लिया।
ثُمَّ بَعَثۡنَٰكُم مِّنۢ بَعۡدِ مَوۡتِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ ۝ 55
(56) तुम बेजान होकर गिर चुके थे, मगर फिर हमने तुमको जिला उठाया, शायद कि इस उपकार के बाद तुम कृतज्ञ बन जाओ।71
71. यह संकेत जिस घटना की ओर है उसका विवरण यह है कि चालीस दिन व रात के वादे पर जब हज़रत मूसा तूर पर तशरीफ़ ले गए थे, तो आपको हुक्म हुआ था कि अपने साथ बनी इसराईल के सत्तर प्रतिनिधि भी साथ लाएँ। फिर जब अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्सलाम) को किताब और फुरकान प्रदान की, तो आपने उसे उन प्रतिनिधियों के सामने प्रस्तुत किया। इस अवसर पर कुरआन कहता है कि उनमें से कुछ दुष्ट कहने लगे कि हम मात्र तुम्हारे कहने को कैसे मान लें कि अल्लाह ने तुमसे बातें की हैं। इसपर अल्लाह का प्रकोप आया और उन्हें सज़ा दी गई, लेकिन बाइबल कहती है कि: "उन्होंने इसराईल के ख़ुदा को देखा, उसके पाँवों के नीचे नीलमणि का चबूतरा-सा था, जो आसमान की तरह स्वच्छ था और उसने बनी इसराईल के सज्जनों पर अपना हाथ न बढ़ाया, सो उन्होंने ख़ुदा को देखा और खाया और पिया।" (निर्गमन, 24 : 10-11) मज़े की बात यह है कि इसी किताब में आगे चलकर लिखा है कि जब हज़रत मूसा (अलै०) ने ख़ुदा से अर्ज़ किया कि मुझे अपना प्रलाप दिखा दे, तो उसने कहा कि तू मुझे नहीं देख सकता। (देखें निर्गमन अध्याय 33, आयत 18-23)
وَظَلَّلۡنَا عَلَيۡكُمُ ٱلۡغَمَامَ وَأَنزَلۡنَا عَلَيۡكُمُ ٱلۡمَنَّ وَٱلسَّلۡوَىٰۖ كُلُواْ مِن طَيِّبَٰتِ مَا رَزَقۡنَٰكُمۡۚ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَٰكِن كَانُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ ۝ 56
(57) हमने तुमपर बादल की छाया की 72, 'मन्न व सलवा' का खाना तुम्हारे लिए जुटाया,73 और तुमसे कहा कि जो पाक चीजें हमने तुम्हें प्रदान की हैं, उन्हें खाओ, मगर (तुम्हारे बाप-दादाओं ने) जो कुछ किया, वह हम पर ज़ुल्म न था, बल्कि उन्होंने आप अपने ही ऊपर ज़ुल्म किया।
72. अर्थात् सीना प्रायद्वीप में जहाँ धूप से बचने के लिए कोई पनाह लेने की जगह तुम्हें मिली हुई न थी, हमने बादल से तुम्हारे बचाव का प्रबंध किया। इस अवसर पर ध्यान रहे कि बनी इसराईल लाखों की तादाद में मिस्र से निकलकर आए थे और सीना के क्षेत्र में मकान तो दूर की बात है, सिर छिपाने के लिए उनके पास खेमे तक न थे। उस ज़माने में अगर अल्लाह की ओर से एक मुद्दत तक आसमान को बादलों से आच्छादित न रखा जाता.तो यह क़ौम धूप से नष्ट हो जाती।
73. 'मन्न' और 'सलवा खाने की वे प्राकृतिक चीजें थीं, जो उस प्रवास-काल में उन लोगों को चालीस वर्ष तक बराबर मिलती रहीं। मन्न धनिए के बीज जैसी एक चीज़ थी, जो ओस की तरह गिरती और धरती पर जम जाती थी और सलवा बटेर जैसे पक्षी थे। अल्लाह की मेहरबानी से वे इतने ज्यादा थे कि एक पूरी की पूरी कौम सिर्फ इन्हीं खानों पर ज़िन्दगी बसर करती रही और उसे उपवास की मुसीबत न उठानी पड़ी। हालाँकि आज किसी भी बड़े से बड़े सभ्य देश में भी आर कुछ लाख शरणार्थी अचानक आ जाएँ, तो उनके खाने का प्रबन्ध कठिन हो जाता है। (मन्न और सलवा की विस्तृत जानकारी के लिए देखिए बाइबल, पुस्तक : निर्गमन-16 : 1-36, गिनती-11: 7-9 व 31-32; यहोशू -5:11-12)
وَإِذۡ قُلۡنَا ٱدۡخُلُواْ هَٰذِهِ ٱلۡقَرۡيَةَ فَكُلُواْ مِنۡهَا حَيۡثُ شِئۡتُمۡ رَغَدٗا وَٱدۡخُلُواْ ٱلۡبَابَ سُجَّدٗا وَقُولُواْ حِطَّةٞ نَّغۡفِرۡ لَكُمۡ خَطَٰيَٰكُمۡۚ وَسَنَزِيدُ ٱلۡمُحۡسِنِينَ ۝ 57
(58) फिर याद करो, जब हमने कहा था कि “यह बस्ती”74 जो तुम्हारे सामने है, इसमें दाखिल हो जाओ, उसकी पैदावार जिस तरह चाहो मज़े से खाओ, मगर बस्ती के दरवाज़े में झुके-झुके दाखिल होना और कहते जाना 'हित्ततुन-हित्ततुन’75, हम तुम्हारी ख़ताओं को माफ़ कर देंगे और भले लोगों पर और अधिक अनुग्रह करेंगे।"
74. अभी तक इसकी खोज नहीं हो सकी है कि इस बस्ती से अभिप्रेत कौन-सी बस्ती है। घटनाओं के जिस क्रम में इसका उल्लेख हो रहा है, वह उस काल से संबंध रखता है, जबकि बनी इसराईल अभी सीना प्रायद्वीप ही में थे। इसलिए अनुमान यही है कि यह उसी प्रायद्वीप का कोई शहर होगा, पर यह भी संभव है कि इससे तात्पर्य शत्तीम हो, जो यरीहू के सामने जार्डन नदी के पूर्वी किनारे पर आबाद था। बाइबल का बयान है कि इस शहर को बनी इसराईल ने हज़रत मूसा की ज़िन्दगी के आखिरी दौर में जीता और वहाँ बड़े दुराचार किए, जिसके नतीजे में अल्लाह ने उनपर महामारी भेजी और 24 हज़ार आदमी मर गए। (गिनती,अध्याय 25, आयत 1-8)
75. अर्थात् आदेश यह था कि अन्यायी और अत्याचारी विजेताओं की तरह अकड़ते हुए न घुसना, बल्कि अल्लाह से डरनेवालों की तरह नम्रता पूर्वक दाखिल होना, जैसे हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) मक्का-विजय के अवसर पर मक्का में दाखिल हुए। और हित्ततुन के दो अर्थ हो सकते हैं एक यह कि अल्लाह से अपनी ग़लतियों और भूल-चूक की माफी मांगते हुए जाना । दूसरे यह कि लूटमार और कत्लेआम के बजाए बस्ती के रहनेवालों में आम माफ़ी का एलान करते जाना।
فَبَدَّلَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ قَوۡلًا غَيۡرَ ٱلَّذِي قِيلَ لَهُمۡ فَأَنزَلۡنَا عَلَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ رِجۡزٗا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ بِمَا كَانُواْ يَفۡسُقُونَ ۝ 58
(59) किन्तु जो बात कही गई थी, ज़ालिमों ने उसे बदलकर कुछ और कर दिया। अन्तत: हमने जुल्म करनेवालों पर आसमान से यातना उतारी। यह सज़ा थी उन नाफरमानियो (अवज्ञाओं) की, जो वे कर रहे थे।
۞وَإِذِ ٱسۡتَسۡقَىٰ مُوسَىٰ لِقَوۡمِهِۦ فَقُلۡنَا ٱضۡرِب بِّعَصَاكَ ٱلۡحَجَرَۖ فَٱنفَجَرَتۡ مِنۡهُ ٱثۡنَتَا عَشۡرَةَ عَيۡنٗاۖ قَدۡ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٖ مَّشۡرَبَهُمۡۖ كُلُواْ وَٱشۡرَبُواْ مِن رِّزۡقِ ٱللَّهِ وَلَا تَعۡثَوۡاْ فِي ٱلۡأَرۡضِ مُفۡسِدِينَ ۝ 59
(60) याद करो, जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी की दुआ की तो हमने कहा कि अमुक चट्टान पर अपनी लाठी मारो। तो इससे बारह स्रोत फूट76 निकले और हर क़बीले ने जान लिया कि कौन-सी जगह उसके पानी लेने की है। (उस समय यह आदेश दे दिया गया कि) अल्लाह की दी हुई रोज़ी खाओ-पियो और ज़मीन में बिगाड़ न फैलाते फिरो।
76. (वह चट्टान अब तक सौना प्रायद्वीप में मौजूद है। पर्यटक उसे जाकर देखते हैं और स्रोतों की दराड़ें उसमें अब भी पाई जाती हैं।) 12 स्रोतों में यह निहित हित था कि बनी इसराईल के कबीले भी 12 ही थे। अल्लाह ने हर क़बीले के लिए अलग-अलग स्रोत निकाल दिया ताकि उनके बीच पानी पर झगड़ा न हो।
وَإِذۡ قُلۡتُمۡ يَٰمُوسَىٰ لَن نَّصۡبِرَ عَلَىٰ طَعَامٖ وَٰحِدٖ فَٱدۡعُ لَنَا رَبَّكَ يُخۡرِجۡ لَنَا مِمَّا تُنۢبِتُ ٱلۡأَرۡضُ مِنۢ بَقۡلِهَا وَقِثَّآئِهَا وَفُومِهَا وَعَدَسِهَا وَبَصَلِهَاۖ قَالَ أَتَسۡتَبۡدِلُونَ ٱلَّذِي هُوَ أَدۡنَىٰ بِٱلَّذِي هُوَ خَيۡرٌۚ ٱهۡبِطُواْ مِصۡرٗا فَإِنَّ لَكُم مَّا سَأَلۡتُمۡۗ وَضُرِبَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلذِّلَّةُ وَٱلۡمَسۡكَنَةُ وَبَآءُو بِغَضَبٖ مِّنَ ٱللَّهِۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ كَانُواْ يَكۡفُرُونَ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ وَيَقۡتُلُونَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ بِغَيۡرِ ٱلۡحَقِّۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَواْ وَّكَانُواْ يَعۡتَدُونَ ۝ 60
(61) याद करो, जब तुमने कहा था कि “ऐ मूसा! हम एक ही तरह के खाने पर सब्र (संतोष) नहीं कर सकते। अपने पालनहार से दुआ (प्रार्थना) करो कि हमारे लिए जमीन की पैदावार साग, तरकारी, गेहूँ, लहसुन, प्याज़, दाल आदि पैदा करे।”तो मूसा ने कहा, “क्या एक बेहतर चीज़ की जगह तुम घटिया दरजे की चीज़ें लेना चाहते हो?77 अच्छा, किसी शहरी आबादी में जा रहो, जो कुछ तुम माँगते हो, वहाँ मिल जाएगा।” अन्तत: नौबत यहाँ तक पहुँची कि अपमान और अपयश, गिरावट और दुर्दशा उनपर छा गई और वे अल्लाह के प्रकोप में घिर गए। यह परिणाम था इसका कि वे अल्लाह की आयतों से कुफ्त (इनकार) करने लगे78 और पैग़म्बरों को नाहक़ क़त्ल करने79 लगे। यह परिणाम था उनकी अवज्ञा का और इस बात का कि वे शरीअत की सीमाओं से निकल-निकल जाते थे।
78. आयतों से कुफ़ करने की बहुत-सी शक्लें हैं। जैसे, एक यह कि अल्लाह की भेजी हुई शिक्षाओं में से जो बात अपने विचारों या इच्छाओं के विरुद्ध पाई,उसको मानने से साफ़ इनकार कर दिया। दूसरे यह कि एक बात को यह जानते हुए कि ख़ुदा ने कही है, पूरी ढिठाई और सरकशी के साथ उसके विरुद्ध किया और अल्लाह के आदेश की कुछ परवाह न की। तीसरे यह कि अल्लाह के कथनों के अर्थ और तात्पर्य को अच्छी तरह जानने और समझने के बावजूद अपनी इच्छा के अनुसार उसे बदल डाला।
79. बनी इसराईल ने अपने इस अपराध का अपने इतिहास में स्वयं सविस्तार वर्णन किया है। उदाहरण के लिए |बाइबल में अंकित वृतांत देखिए जकरिया (जकरिया अलै०) नबी को ठीक हैकले सुलैमानी (उपासनागृह) में पत्थर मार-मारकर प्राण ले लेने की घटना, (2 इतिहास 24 : 21) यिर्मयाह नबी को पीटे जाने, कैद कर दिए जाने और रस्सी से बाँधकर कीचड़ भरे हौज़ में लटका दिए जाने की घटना (यिर्मयाह 15 : 10, 18 : 20-23; 20 : 1-18; एवं अध्याय 36-40) हज़रत यह्या (यूहन्ना) के मुबारक सिर को, तत्कालीन बादशाह द्वारा अपनी प्रेमिका के लिए, काट करके उसके सामने भेंट किए जाने की घटना, (मरक़ुस, 6 : 17-29) आदि] । स्पष्ट है कि जिस क़ौम ने अपने नाफरमान और दुराचारी लोगों को सरदारी और पेशवाई के लिए और अपने नेक और सदाचारी लोगों को जेल और फाँसी के लिए पसन्द किया हो, अल्लाह तआला उसको अपनी धिक्कार के लिए पसन्द न करता तो आखिर और क्या करता।
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَٱلَّذِينَ هَادُواْ وَٱلنَّصَٰرَىٰ وَٱلصَّٰبِـِٔينَ مَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَعَمِلَ صَٰلِحٗا فَلَهُمۡ أَجۡرُهُمۡ عِندَ رَبِّهِمۡ وَلَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُونَ ۝ 61
(62) विश्वास रखो कि अरबी नबी को माननेवाले हों या यहूदी, ईसाई हों या साबी, जो भी अल्लाह और आखिरत के दिन पर ईमान लाएगा और भला काम करेगा, उसका बदला उसके रब के पास है और उसके लिए किसी भय और रंज का मौक़ा नहीं।80
80. वार्ताक्रम को दृष्टि में रखने से यह बात अपने आप स्पष्ट हो जाती है कि यहाँ ईमान और उसके अनुसार भले कामों का विवरण देना अभिप्रेत नहीं है कि किन-किन बातों को आदमी माने और क्या-क्या काम करे तो अल्लाह के यहाँ पुरस्कार पाने का अधिकारी हो । ये चीजें अपनी-अपनी जगह पर सविस्तार आएँगी। यहाँ तो यहूदियों के इस असत्य के प्रति पाए जानेवाले दुराग्रह का खंडन अभिप्रेत है कि वे केवल यहूदी गिरोह को मुक्ति का ठेकेदार समझते थे। वे इस भ्रम में पड़े हुए थे कि उनके गिरोह से अल्लाह का कोई विशेष संबंध है जो दूसरे इंसानों से नहीं है, इसलिए जो इनके गिरोह से संबंध रखता है, वह चाहे कर्म और धारणा को दृष्टि से कैसा भी हो, बहरहाल मुक्ति उसके लिए निश्चित है और बाकी तमाम इंसान जो उनके गिरोह से बाहर हैं, वे केवल जहन्नम का ईंधन बनने के लिए पैदा हुए हैं। इस भ्रम को दूर करने के लिए कहा जा रहा है कि अल्लाह के यहाँ असल चीज़ तुम्हारी ये गिरोहबन्दियाँ नहीं हैं, बल्कि वहाँ जो चीज़ देखी जाएगी वह ईमान और भले काम हैं। जो इंसान भी यह चीज़ लेकर हाज़िर होगा, वह अपने रब से अपना बदला पाएगा। अल्लाह के यहाँ फैसला आदमी के गुणों पर होगा, न कि तुम्हारी जनगणना के रजिस्टरों पर।
وَإِذۡ أَخَذۡنَا مِيثَٰقَكُمۡ وَرَفَعۡنَا فَوۡقَكُمُ ٱلطُّورَ خُذُواْ مَآ ءَاتَيۡنَٰكُم بِقُوَّةٖ وَٱذۡكُرُواْ مَا فِيهِ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ ۝ 62
(63) याद करो वह समय जब हमने तूर को तुमपर उठाकर तुमसे दृढ़ वचन लिया था और कहा था81 कि “जो किताब हम तुम्हें दे रहे हैं, उसे मज़बूती के साथ थामना और जो हुक्म और हिदायतें इसमें लिखी हुई हैं, उन्हें याद रखना। इसी के द्वारा उम्मीद की जा सकती है कि तुम तवा (धर्म परायणता और संयम) की नीति पर चल सकोगे।”
81. इस घटना का कुरआन में विभिन्न जगहों पर जिस ढंग से उल्लेख हुआ है, उससे यह बात स्पष्ट होती है कि उस समय बनी इसराईल में यह एक जानी-पहचानी प्रसिद्ध घटना थी, लेकिन अब इसका विस्तृत विवरण प्राप्त करना कठिन है। बस संक्षेप में इस तरह समझना चाहिए कि पहाड़ के दामन में वचन लेते समय ऐसी डरावनी स्थिति पैदा कर दी गई थी कि उनको ऐसा मालूम होता था मानो पहाड़ उनपर आ पड़ेगा। ऐसा ही कुछ चित्र कुरआन 7:171 में खींचा गया है। (देखिए कुरआन सूरा 7 आराफ़, टिप्पणी न० 132)
ثُمَّ تَوَلَّيۡتُم مِّنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَۖ فَلَوۡلَا فَضۡلُ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡ وَرَحۡمَتُهُۥ لَكُنتُم مِّنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ ۝ 63
(64) मगर इसके बाद तुम अपने वचन से फिर गए, इसपर भी अल्लाह की कृपा और उसकी दया ने तुम्हारा साथ न छोड़ा, वरना तुम कभी के तबाह हो चुके होते।
وَلَقَدۡ عَلِمۡتُمُ ٱلَّذِينَ ٱعۡتَدَوۡاْ مِنكُمۡ فِي ٱلسَّبۡتِ فَقُلۡنَا لَهُمۡ كُونُواْ قِرَدَةً خَٰسِـِٔينَ ۝ 64
(65) फिर तुम्हें अपनी क़ौम के उन लोगों का किस्सा तो मालूम ही है, जिन्होंने सब्त82 का कानून तोड़ा था। हमने उन्हें कह दिया कि बन्दर बन जाओ और इस हाल में रहो कि हर ओर से तुमपर धुतकार- फटकार पड़े।83
82. सब्त अर्थात् शनिवार, बनी इसराईल के लिए यह क़ानून बनाया गया था कि वे शनिवार को आराम और इबादत के लिए ख़ास कर रखें। उस दिन किसी प्रकार का सांसारिक काम, यहाँ तक कि खाने-पकाने का काम भी न ख़ुद करें न अपने नौकरों से लें। इस बारे में यहाँ तक ताकीद भरे आदेश थे कि जो आदमी इस पवित्र दिन के मान-सम्मान को भंग करे वह हत्या के योग्य है । (देखिए निर्गमन, अध्याय 31, आयत 12-17) लेकिन जब बमी इसराईल पर नैतिक और धार्मिक पतन का युग आया तो वे खुल्लमखुल्ला सब्त का अनादर करने लगे, यहाँ तक कि उनके शहरों में खुलेआम सब्त के दिन कारोबार होने लगा।
83. इस घटना का विस्तृत विवरण आगे कुरआन 7:163-164 (रुकूअ 21) में आता है। उनके बन्दर बनाए जाने की स्थिति में मतभेद है। कुछ यह समझते हैं कि उनकी शारीरिक बनावट बिगाड़कर बन्दरों जैसी कर दी गई थी और कुछ उसका यह अर्थ लेते हैं कि उनमें बन्दरों के-से गुण पैदा हो गए थे, लेकिन कुरआन के शब्दों और शैली से ऐसा ही लगता है कि यह बिगाड़ नैतिक नहीं, बल्कि शारीरिक था। मेरा अनुमान है कि उनके दिमा! ठीक उसी हाल पर रहने दिए गए होंगे जिसमें वे पहले थे और शरीर बिगड़कर बन्दरों के-से हो गए होंगे।
فَجَعَلۡنَٰهَا نَكَٰلٗا لِّمَا بَيۡنَ يَدَيۡهَا وَمَا خَلۡفَهَا وَمَوۡعِظَةٗ لِّلۡمُتَّقِينَ ۝ 65
(66) इस तरह हमने उनके अंजाम को उस समय के लोगों और बाद की आनेवाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा और डरनेवालों के लिए नसीहत बनाकर छोड़ा।
وَإِذۡ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوۡمِهِۦٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَأۡمُرُكُمۡ أَن تَذۡبَحُواْ بَقَرَةٗۖ قَالُوٓاْ أَتَتَّخِذُنَا هُزُوٗاۖ قَالَ أَعُوذُ بِٱللَّهِ أَنۡ أَكُونَ مِنَ ٱلۡجَٰهِلِينَ ۝ 66
(67) फिर वह घटना याद करो, जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह तुम्हें एक गाय जिब्ह करने का हुक्म देता है। कहने लगे, क्या तुम हमसे मज़ाक़ करते हो? मूसा ने कहा : मैं इससे अल्लाह को पनाह माँगता हूँ कि जाहिलों (अज्ञानियों) की-सी बातें करूँ।
قَالُواْ ٱدۡعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا هِيَۚ قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٞ لَّا فَارِضٞ وَلَا بِكۡرٌ عَوَانُۢ بَيۡنَ ذَٰلِكَۖ فَٱفۡعَلُواْ مَا تُؤۡمَرُونَ ۝ 67
(68) बोले, अच्छा, अपने रब से प्रार्थना करो कि वह हमें इस गाय के बारे में कुछ विस्तार से बताए । मूसा ने कहा कि अल्लाह कहता है कि वह ऐसी गाय होनी चाहिए जो न बूढी हो, न बछिया, बल्कि औसत उम्र की हो। इसलिए जो आदेश दिया जाता है, उसका पालन करो ।
قَالُواْ ٱدۡعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا لَوۡنُهَاۚ قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٞ صَفۡرَآءُ فَاقِعٞ لَّوۡنُهَا تَسُرُّ ٱلنَّٰظِرِينَ ۝ 68
(69) फिर कहने लगे, अपने रब से यह और पूछ दो कि उसका रंग कैसा हो । मूसा ने कहा : वह कहता है पीले रंग की गाय होनी चाहिए, जिसका रंग ऐसा चटकीला हो कि देखनेवालों का जी खुश हो जाए।
قَالُواْ ٱدۡعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا هِيَ إِنَّ ٱلۡبَقَرَ تَشَٰبَهَ عَلَيۡنَا وَإِنَّآ إِن شَآءَ ٱللَّهُ لَمُهۡتَدُونَ ۝ 69
(70) फिर बोले, अपने रब से साफ़-साफ़ पूछकर बताओ कैसी गाय चाहिए? हमें इसके निर्धारण में संदेह हो गया है। अल्लाह ने चाहा, तो हम उसका पता पा लेंगे।
قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٞ لَّا ذَلُولٞ تُثِيرُ ٱلۡأَرۡضَ وَلَا تَسۡقِي ٱلۡحَرۡثَ مُسَلَّمَةٞ لَّا شِيَةَ فِيهَاۚ قَالُواْ ٱلۡـَٰٔنَ جِئۡتَ بِٱلۡحَقِّۚ فَذَبَحُوهَا وَمَا كَادُواْ يَفۡعَلُونَ ۝ 70
(71) मूसा ने जवाब दिया : अल्लाह कहता है कि वह ऐसी गाय है जिससे सेवा नहीं ली जाती, न ज़मीन जोतती है, न पानी खींचती है, सही सालिम और बेदाग़ है। इसपर वे पुकार उठे कि हाँ, अब तुमने ठीक पता बताया है। फिर उन्होंने उसे ज़िब्ह किया, वरना वे ऐसा करते मालूम न होते थे।84
84. चूँकि बनी इसराईल को मिसवालों और अपनी पड़ोसी क़ौमों से गाय की बड़ाई और पाकी और गाय-पूजा के रोग को छूत लग गई थी और इसी कारण उन्होंने मित्र से निकलते ही बछड़े को माबूद (पूज्य) बना लिया था, इसलिए उनको आदेश दिया गया कि गाय जिब्ह करें। यह परीक्षा बड़ी कड़ी परीक्षा थी। दिलों में पूरी तरह ईमान उतरा हुआ न था, इसलिए उन्होंने टालने की कोशिश की और विस्तृत विवरण [गाय के संबंध में ] पूछने लगे, किन्तु जितना-ही विस्तृत विवरण वे लेते गए, उतने ही वे घिरते चले गए, यहाँ तक कि अन्ततः उसी विशेष प्रकार की सुनहरी गाय पर, जिसे उस ज़माने में पूजा के लिए खास किया जाता था, मानो उँगली रखकर बता दिया गया कि इसे ज़िव्ह करो। बाइबल में भी इस घटना की ओर इशारा है, पर वहाँ यह उल्लेख नहीं है कि बनी इसराईल ने इस आदेश को किस-किस तरह टालने की कोशिश की थी। (देखिए पुस्तक : गिनती,19 : 1-10)
وَإِذۡ قَتَلۡتُمۡ نَفۡسٗا فَٱدَّٰرَٰٔتُمۡ فِيهَاۖ وَٱللَّهُ مُخۡرِجٞ مَّا كُنتُمۡ تَكۡتُمُونَ ۝ 71
(72) और तुम्हें याद है वह घटना जब तुमने एक आदमी की जान ली थी, फिर उसके बारे में झगड़ने और एक-दूसरे पर हत्या का आरोप थोपने लगे थे और अल्लाह ने फैसला कर लिया था कि जो कुछ तुम छिपाते हो, उसे खोलकर रख देगा।
فَقُلۡنَا ٱضۡرِبُوهُ بِبَعۡضِهَاۚ كَذَٰلِكَ يُحۡيِ ٱللَّهُ ٱلۡمَوۡتَىٰ وَيُرِيكُمۡ ءَايَٰتِهِۦ لَعَلَّكُمۡ تَعۡقِلُونَ ۝ 72
(73) उस समय हमने आदेश दिया कि मारे गए व्यक्ति की लाश पर उसके एक हिस्से से चोट लगाओ। देखो, इस तरह अल्लाह मुर्दो को जीवन देता है और तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है ताकि तुम समझो85
85. इस जगह तो यह बात बिल्कुल खुली हुई मालूम होती है कि मारे गए व्यक्ति के अन्दर दोबारा इतनी देर के लिए जान डाली गई कि वह हत्यारे का पता बता दे। लेकिन इस उद्देश्य के लिए जो उपाय बताया गया था अर्थात लाश को उसके एक हिस्से से चोट लगाओ, इसके शब्द कुछ अस्पष्ट से लगते हैं। फिर भी इसका निकटतम अर्थ वही है जो पुराने टीकाकारों ने लिया है, अर्थात् यह कि ऊपर जिस गाय के जिब्ह करने का आदेश दिया गया था उसी के गोश्त से मारे गए व्यक्ति की लाश पर चोट लगाने का आदेश दिया गया। इस तरह मानो एक पंथ दो काज हो गए। एक यह कि अल्लाह की सामर्थ्य का एक निशान उन्हें दिखाया गया, दूसरे यह कि गाय की बड़ाई और पाकी और उसके उपास्य होने पर भी एक गहरी चोट लगी कि इस कथित पूज्य के पास अगर कुछ भी शक्ति होती तो उसे ज़िब्ह करने से एक आफ़त बरपा हो जानी चाहिए थी, न कि उसका ज़िब्ह होना उलटा इस तरह फ़ायदेमंद साबित हो।
ثُمَّ قَسَتۡ قُلُوبُكُم مِّنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَ فَهِيَ كَٱلۡحِجَارَةِ أَوۡ أَشَدُّ قَسۡوَةٗۚ وَإِنَّ مِنَ ٱلۡحِجَارَةِ لَمَا يَتَفَجَّرُ مِنۡهُ ٱلۡأَنۡهَٰرُۚ وَإِنَّ مِنۡهَا لَمَا يَشَّقَّقُ فَيَخۡرُجُ مِنۡهُ ٱلۡمَآءُۚ وَإِنَّ مِنۡهَا لَمَا يَهۡبِطُ مِنۡ خَشۡيَةِ ٱللَّهِۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَٰفِلٍ عَمَّا تَعۡمَلُونَ ۝ 73
(74)- मगर ऐसी निशानियाँ देखने के बाद भी अन्तत: तुम्हारे दिल कठोर हो गए, पत्थरों की तरह कठोर, बल्कि कठोरता में कुछ उनसे भी बढ़े हुए, क्योंकि पत्थरों में से तो कोई ऐसा भी होता है जिसमें से सोते फूट बहते हैं, कोई फटता है और उसमें से पानी निकल आता है, और कोई अल्लाह के डर से काँप कर गिर भी पड़ता है। अल्लाह तुम्हारे करतूतों से बेख़बर नहीं है।
۞أَفَتَطۡمَعُونَ أَن يُؤۡمِنُواْ لَكُمۡ وَقَدۡ كَانَ فَرِيقٞ مِّنۡهُمۡ يَسۡمَعُونَ كَلَٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُۥ مِنۢ بَعۡدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ ۝ 74
(75) ऐ मुसलमानो ! अब क्या इन लोगों से तुम यह उम्मीद रखते हो कि ये तुम्हारी दावत पर ईमान ले आएँगे?86 हालाँकि उनमें से एक गिरोह की नीति यह रही है कि अल्लाह की वाणी सुनी और फिर खूब समझ-बूझकर ससंकल्प उसे विकृत किया87
86. यह संबोधन मदीने के उन नव-मुस्लिमों से है जो करीब के ज़माने ही में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर ईमान लाए थे। इन लोगों के कान में पहले से ही नुबूवत, किताब, फ़रिश्ते, आख़िरत, शरीअत आदि की जो बातें पड़ी हुई थीं, वे सब उन्होंने अपने पड़ोसी यहूदियों से ही सुनी थी, और यह भी उन्होंने यहूदियों ही से सुना था कि दुनिया में एक पैग़म्बर और आनेवाले हैं और यह कि जो लोग उनका साथ देंगे, वे सारी दुनिया पर छा जाएँगे। इस कारण अब वे आस लगाए बैठे थे कि जो लोग पहले से ही नबियों और आसमानी किताबों की पैरवी करनेवाले हैं और जिनकी दी हुई सूचनाओं के कारण ही हमको ईमान की नेमत मिली है,वे ज़रूर हमारा साथ देंगे, बल्कि इस राह में आगे-आगे रहेंगे। इसलिए यही उम्मीदें लेकर ये जोशीले नव-मुस्लिम अपने यहूदी दोस्तों और पड़ोसियों के पास जाते थे और उनको इस्लाम को दावत देते थे। फिर जब वे इस दावत का जवाब इनकार से देते तो मुनाफ़िक़ (कपटाचारी) और इस्लाम-विरोधी इससे यह दलील पेश करते थे कि मामला कुछ संदिग्ध लगता है। वरना अगर यह वास्तव में नबी होते तो आखिर कैसे संभव था कि अहले किताब के विद्वान और महात्मा और बुजुर्ग जानते-बूझते ईमान लाने से मुँह मोड़ते और ख़ामख़ाह अपना अंजाम बिगाड़ लेते। इस कारण बनी इसराईल का ऐतिहासिक हाल बताने के बाद अब इन सीधे-सादे मुसलमानों से कहा जा रहा है कि जिन लोगों की पिछली परम्पराएँ ये कुछ रही हैं, उनसे तुम कुछ बहुत ज्यादा लंबी-चौड़ी उम्मीदें न रखो, वरना जब उनके पत्थर दिलों से तुम्हारी हक की दावत टकराकर वापस आएगी तो तुम्हारे दिल टूट जाएँगे। ये लोग तो सदियों के बिगड़े हुए हैं, अल्लाह की जिन आयतों को सुनकर तुमपर कपकपी छा जाती है, उन्हीं से खेलते और मज़ाक़ उड़ाते उनकी नस्लें बीत गई हैं, सत्यधर्म को विकृत करके ये अपनी इच्छा के अनुसार ढाल चुके हैं और इसी विकृत धर्म से ये मुक्ति की आशाएँ लगाए बैठे हैं। इनसे यह उम्मीद रखना बेकार है कि सच्चाई की आवाज़ बुलंद होते ही ये हर ओर से दौड़े चले आएँगे।
87. 'एक गिरोह' से तात्पर्य उनके धार्मिक विद्वान और धर्माधिकारी हैं। 'अल्लाह की वाणी' से तात्पर्य तौरात, ज़बूर और वे दूसरी किताबें हैं,जो इन लोगों को इनके नबियों के द्वारा पहुंची। विकृत करने का अर्थ यह है कि बात को वास्तविक आशय और अर्थ से फेरकर अपनी इच्छानुसार कुछ दूसरे अर्थ और मानी पहना देना जो कहनेवाले के मंशा के खिलाफ़ हों। साथ ही शब्दों में फेर-बदल को भी 'विकृति' कहते हैं। बनी इसराईल के धार्मिक विद्वानों ने अल्लाह की वाणी में इन दोनों प्रकार की विकृतियाँ की हैं।
وَإِذَا لَقُواْ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ قَالُوٓاْ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَا بَعۡضُهُمۡ إِلَىٰ بَعۡضٖ قَالُوٓاْ أَتُحَدِّثُونَهُم بِمَا فَتَحَ ٱللَّهُ عَلَيۡكُمۡ لِيُحَآجُّوكُم بِهِۦ عِندَ رَبِّكُمۡۚ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ ۝ 75
(76) ये (अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्ल० पर) ईमान लानेवालों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम भी इन्हें मानते हैं और जब आपस में एक-दूसरे से अकेले में बातचीत होती है तो कहते हैं कि मूर्ख हो गए हो? इन लोगों को वे बातें बताते हो जो अल्लाह ने तुमपर खोली हैं ताकि तुम्हारे रब के पास तुम्हारे मुक़ाबले में इन्हें हुज्जत (प्रमाण) में पेश करें88?
88.अर्थात् वे आपस एक-दूसरे से कहते थे कि तौरात और दूसरी आसमानी किताबों में जो भविष्यवाणियाँ इस नबी के बारे में पाई जाती हैं या जो आयतें और शिक्षाएँ हमारे पवित्र ग्रंथों में ऐसी मिलती हैं जिनसे हमारे इस रवैए को पकड़ हो सकती है, उन्हें मुसलमानों के सामने बयान न करो, वरना ये तुम्हारे रब के सामने इनको तुम्हारे ख़िलाफ़ प्रमाण बनाकर पेश करेंगे। यह था अल्लाह के बारे में इन ज़ालिमों के विश्वास के बिगाड़ का हाल, मानो वे अपने नज़दीक यह समझते थे कि अगर दुनिया में वे 'विकृतियों' और सत्य पर परदा डालने की कोशिशों को छिपा ले गए तो आख़िरत में उनपर मुक़द्दमा न चल सकेगा। इसी लिए बाद के आए वाक्य में उनको सचेत किया गया है कि क्या तुम अल्लाह को बेख़बर समझते हो? 89.यह उनके आम लोगों का हाल था। किताब के इल्म (ज्ञान) से कोरे थे। कुछ न जानते थे कि अल्लाह ने अपनी किताब में दीन (धर्म) के क्या उसूल बताए हैं, नैतिकता और धर्म-विधान के क्या नियम सिखाए हैं और इंसान की सफलता-विफलता का आधार किन चीज़ों को बनाया गया है। इस ज्ञान के बिना वे अपनी कल्पित और मनगढन्त बातों को धर्म समझ बैठे थे और झूठी आशाओं पर जी रहे थे।
أَوَلَا يَعۡلَمُونَ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعۡلِنُونَ ۝ 76
(77) -और क्या ये जानते नहीं हैं कि जो कुछ ये छिपाते हैं और जो कुछ ज़ाहिर करते हैं, अल्लाह को सब बातों की ख़बर है ?
وَمِنۡهُمۡ أُمِّيُّونَ لَا يَعۡلَمُونَ ٱلۡكِتَٰبَ إِلَّآ أَمَانِيَّ وَإِنۡ هُمۡ إِلَّا يَظُنُّونَ ۝ 77
(78)—इनमें एक दूसरा गिरोह अनपढ़ों का है, जो किताब का तो ज्ञान रखते नहीं, बस अपनी बेबुनियाद उम्मीदों और कामनाओं को लिए बैठे हैं और केवल अटकल पर चले जा रहे हैं।89
فَوَيۡلٞ لِّلَّذِينَ يَكۡتُبُونَ ٱلۡكِتَٰبَ بِأَيۡدِيهِمۡ ثُمَّ يَقُولُونَ هَٰذَا مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ لِيَشۡتَرُواْ بِهِۦ ثَمَنٗا قَلِيلٗاۖ فَوَيۡلٞ لَّهُم مِّمَّا كَتَبَتۡ أَيۡدِيهِمۡ وَوَيۡلٞ لَّهُم مِّمَّا يَكۡسِبُونَ ۝ 78
(79) अत: विनाश और तबाही है उन लोगों के लिए जो अपने हाथों से धार्मिक अभिलेख लिखते हैं, फिर लोगों से कहते हैं कि यह अल्लाह के पास से आया हुआ है ताकि इसके बदले में थोड़ा-सा लाभ प्राप्त कर लें।90 उनके हाथों का यह लिखा भी उनके लिए तबाही का सामान है और उनकी यह कमाई भी उनके लिए विनाश का कारण ।
90. यह उनके धार्मिक विद्वानों के बारे में कहा जा रहा है। इन लोगों ने सिर्फ इतना ही नहीं किया कि कलामे इलाही (ईशवाणी) के अर्थों को अपनी इच्छानुसार बदला हो, बल्कि यह भी किया कि बाइबल में अपनी टीकाओं को, अपने जातीय इतिहास को, अपने अंधविश्वासों और अटकलों को, अपने कल्पित दर्शनों को और अपनी समझ से गढ़े हुए धार्मिक नियमों को कलामे इलाही (ईशवाणी) के साथ गड्ड-मड्ड कर दिया और ये सारी चीज़े लोगों के सामने इस तरह ले आए मानो ये सब अल्लाह ही की ओर से आई हुई हैं। हर ऐतिहासिक कथा, हर टीकाकार की टीका, हर दार्शनिक का ईश्वर-दर्शन, हर धर्मशास्त्री की शास्त्रगत धारणा जिसने पवित्र ग्रंथों के योग (बाइबल) में जगह पा ली, ईशवाणी (Word of God) बनकर रह गई, उसपर ईमान लाना अनिवार्य हो गया और उससे फिरने का अर्थ धर्म से फिर जाना हो गया।
وَقَالُواْ لَن تَمَسَّنَا ٱلنَّارُ إِلَّآ أَيَّامٗا مَّعۡدُودَةٗۚ قُلۡ أَتَّخَذۡتُمۡ عِندَ ٱللَّهِ عَهۡدٗا فَلَن يُخۡلِفَ ٱللَّهُ عَهۡدَهُۥٓۖ أَمۡ تَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعۡلَمُونَ ۝ 79
(80) वे कहते हैं कि दोज़ख (नरक) की आग हमें कदापि छूनेवाली नहीं, सिवाए इसके कि कुछ दिन की सज़ा मिल जाए तो मिल जाए।91 इनसे पूछो, क्या तुमने अल्लाह से कोई वचन ले लिया है, जिसका उल्लंघन वह नहीं कर सकता? या बात यह है कि तुम अल्लाह के ज़िम्मे डालकर ऐसी बातें कह देते हो जिनके बारे में तुम्हें ज्ञान नहीं है कि उसने उनका जिम्मा लिया है? आख़िर तुम्हें दोज़ख़ की आग क्यों न छुएगी ?
91.यह यहूदियों को आम ग़लतफ़हमी का बयान है, जिसके शिकार उनके आम लोग और विशिष्टजन सभी थे। वे समझते थे कि हम चाहे जो करें, बहरहाल चूंकि हम यहूदी हैं, इसलिए जहन्नम की आग हमपर हराम है और मान लो अगर हमको सज़ा दी भी गई तो बस कुछ दिन के लिए वहाँ भेजे जाएंगे और फिर सीधे जन्नत की ओर पलटा दिए जाएंगे।
بَلَىٰۚ مَن كَسَبَ سَيِّئَةٗ وَأَحَٰطَتۡ بِهِۦ خَطِيٓـَٔتُهُۥ فَأُوْلَٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلنَّارِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ ۝ 80
(81) जो भी बदी (बुराई) कमाएगा और अपनी ख़ताकारी (पापाचार) के चक्कर में पड़ा रहेगा, वह दोज़ख़ी है और दोज़ख़ ही में वह सदा रहेगा।
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ أُوْلَٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلۡجَنَّةِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ ۝ 81
(82) और जो लोग ईमान लाएँगे और भले काम करेंगे वही जन्नती हैं और जन्नत में वे हमेशा रहेंगे।
وَإِذۡ أَخَذۡنَا مِيثَٰقَ بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ لَا تَعۡبُدُونَ إِلَّا ٱللَّهَ وَبِٱلۡوَٰلِدَيۡنِ إِحۡسَانٗا وَذِي ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡيَتَٰمَىٰ وَٱلۡمَسَٰكِينِ وَقُولُواْ لِلنَّاسِ حُسۡنٗا وَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُواْ ٱلزَّكَوٰةَ ثُمَّ تَوَلَّيۡتُمۡ إِلَّا قَلِيلٗا مِّنكُمۡ وَأَنتُم مُّعۡرِضُونَ ۝ 82
(83) याद करो, इसराईल की संतान से हमने दृढ़ वचन लिया था कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत (बन्दगी) न करना और माँ-बाप के साथ, रिश्तेदारों के साथ, अनाथों और दीन-दुखियों के साथ सदव्यहवार करना, लोगों से भली बात कहना, नमाज़ कायम करना और ज़कात देना, मगर कुछ आदमियों के सिवा तुम सब इस वचन से फिर गए और अब तक फिरे हुए हो।
وَإِذۡ أَخَذۡنَا مِيثَٰقَكُمۡ لَا تَسۡفِكُونَ دِمَآءَكُمۡ وَلَا تُخۡرِجُونَ أَنفُسَكُم مِّن دِيَٰرِكُمۡ ثُمَّ أَقۡرَرۡتُمۡ وَأَنتُمۡ تَشۡهَدُونَ ۝ 83
(84) फिर तनिक याद करो, हमने तुमसे दृढ़ वचन लिया था कि आपस में एक-दूसरे का खून न बहाना और न एक-दूसरे को घर से बेघर करना । तुमने इसको स्वीकार किया था, तुम खुद इसपर गवाह हो।
ثُمَّ أَنتُمۡ هَٰٓؤُلَآءِ تَقۡتُلُونَ أَنفُسَكُمۡ وَتُخۡرِجُونَ فَرِيقٗا مِّنكُم مِّن دِيَٰرِهِمۡ تَظَٰهَرُونَ عَلَيۡهِم بِٱلۡإِثۡمِ وَٱلۡعُدۡوَٰنِ وَإِن يَأۡتُوكُمۡ أُسَٰرَىٰ تُفَٰدُوهُمۡ وَهُوَ مُحَرَّمٌ عَلَيۡكُمۡ إِخۡرَاجُهُمۡۚ أَفَتُؤۡمِنُونَ بِبَعۡضِ ٱلۡكِتَٰبِ وَتَكۡفُرُونَ بِبَعۡضٖۚ فَمَا جَزَآءُ مَن يَفۡعَلُ ذَٰلِكَ مِنكُمۡ إِلَّا خِزۡيٞ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَاۖ وَيَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ يُرَدُّونَ إِلَىٰٓ أَشَدِّ ٱلۡعَذَابِۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَٰفِلٍ عَمَّا تَعۡمَلُونَ ۝ 84
(85) मगर आज वही तुम हो कि अपने भाई-बन्धुओं की हत्या करते हो, अपनी बिरादरी के लोगों को बेघर कर देते हो, जुल्म व ज्यादती के साथ उनके खिलाफ़ जत्थेबंदियाँ करते हो और जब वे लड़ाई में पकड़े हुए तुम्हारे पास आते हैं, तो उनकी रिहाई के लिए फ़िदया (प्रतिदान) का लेन-देन करते हो, हालाँकि उन्हें उनके घरों से निकालना ही सिरे से तुमपर हराम था। तो क्या तुम किताब के एक हिस्से पर ईमान लाते हो और दूसरे हिस्से का इनकार करते हो?92 फिर तुममें से जो लोग ऐसा करें, उनकी सज़ा इसके सिवा और क्या है कि दुनिया की ज़िन्दगी में अपमानित और तिरस्कृत होकर रहें और आख़िरत (परलोक) में कठोरतम यातना की ओर फेर दिए जाएँ? अल्लाह उन हरकतों से बेखबर नहीं है जो तुम कर रहे हो ।
92. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आने से पहले यहूदी बेचैनी के साथ उस नबी के इंतिज़ार में थे जिसके भेजे जाने की भविष्यवाणियाँ उनके नबियों ने की थीं। दुआएँ माँगा करते थे कि जल्दी से वह आए तो इनकार करनेवालों का वर्चस्व समाप्त हो और फिर हमारे उत्थान का युग शुरू हो। ख़ुद मदीनावाले इस बात के गवाह थे कि नबी (सल्ल.) के आने से पहले यही उनके यहूदी पड़ोसी आनेवाले नबी की उम्मीद पर जिया करते थे और वे आए दिन यही कहा करते थे कि "अच्छा, अब तो जिस-जिसका जी चाहे हमपर ज़ुल्म कर ले, जब वह नबी आएगा तो हम इन सब ज़ालिमों को देख लेंगे।" मदीनावाले ये बातें सुने हुए थे, इसी लिए जब उन्हें नबी (सल्ल.) के हालात मालूम हुए तो उन्होंने आपस में कहा कि देखना, कहीं ये यहूदी तुमसे बाज़ी न ले जाएँ । चलो, पहले हम ही इस नबी पर ईमान ले आएँ, मगर उनके लिए यह विचित्र बात थी कि वही यहूदी जो आनेवाले नबी के इन्तिज़ार में घड़ियाँ गिन रहे थे उसके आने पर सबसे बढ़कर उसके विरोधी बन गए।
أُوْلَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشۡتَرَوُاْ ٱلۡحَيَوٰةَ ٱلدُّنۡيَا بِٱلۡأٓخِرَةِۖ فَلَا يُخَفَّفُ عَنۡهُمُ ٱلۡعَذَابُ وَلَا هُمۡ يُنصَرُونَ ۝ 85
(86) ये वे लोग हैं, जिन्होंने आख़िरत बेचकर दुनिया की ज़िन्दगी खरीद ली है, इसलिए न इनकी सज़ा में कोई कमी होगी और न इन्हें कोई मदद पहुँच सकेगी।
وَلَقَدۡ ءَاتَيۡنَا مُوسَى ٱلۡكِتَٰبَ وَقَفَّيۡنَا مِنۢ بَعۡدِهِۦ بِٱلرُّسُلِۖ وَءَاتَيۡنَا عِيسَى ٱبۡنَ مَرۡيَمَ ٱلۡبَيِّنَٰتِ وَأَيَّدۡنَٰهُ بِرُوحِ ٱلۡقُدُسِۗ أَفَكُلَّمَا جَآءَكُمۡ رَسُولُۢ بِمَا لَا تَهۡوَىٰٓ أَنفُسُكُمُ ٱسۡتَكۡبَرۡتُمۡ فَفَرِيقٗا كَذَّبۡتُمۡ وَفَرِيقٗا تَقۡتُلُونَ ۝ 86
(87) हमने मूसा को किताब दी, उसके बाद लगातार रसूल भेजे, अंत में मरयम के बेटे ईसा को रौशन निशानियाँ देकर भेजा और पाक रूह (पवित्र आत्मा) से उसकी सहायता की।93 फिर यह तुम्हारा क्या ढंग है कि जब भी कोई रसूल तुम्हारी मनेच्छा के विरुद्ध कोई चीज़ लेकर तुम्हारे पास आया, तो तुमने उसके मुक़ाबले में सरकशी ही की, किसी को झुठलाया और किसी को क़ल कर डाला !
93. 'पाक रूह' से तात्पर्य वह्य का ज्ञान भी है और जिबरील भी जो वह्य का ज्ञान लाते थे और खुद हज़रत मसीह को अपनी पवित्र आत्मा भी जिसको अल्लाह ने 'कुदसी सिफ़ात' (पवित्र गुणोंवाला) बनाया था। 'रौशन निशानियों' से तात्पर्य वे खुली-खुली निशानियाँ हैं जिन्हें देखकर हर सच्चाई पसन्द करनेवाला सत्याभिलाषी व्यक्ति यह जान सकता था कि ईसा (अलैहि.) अल्लाह के नबी हैं।
وَقَالُواْ قُلُوبُنَا غُلۡفُۢۚ بَل لَّعَنَهُمُ ٱللَّهُ بِكُفۡرِهِمۡ فَقَلِيلٗا مَّا يُؤۡمِنُونَ ۝ 87
(88) -वे कहते हैं, हमारे दिल महफूज़ (सुरक्षित) हैं।94 नहीं असल बात यह है कि उनके इनकार के कारण उनपर अल्लाह की फिटकार पड़ी है, इसलिए वे कम ही ईमान लाते हैं
94. अर्थात् हम अपने विश्वास और विचार में इतने दृढ़ हैं कि तुम चाहे कुछ कहो, हमारे दिलों पर तुम्हारी बात का असर न होगा। यह वही बात है जो तमाम ऐसे हठधर्मी लोग कहा करते हैं जिनके दिल व दिमाग़ पर अज्ञानतापूर्ण पक्षपात छाया हुआ होता है। वे इसे विश्वास की दृढ़ता का नाम देकर एक गुण समझते हैं हालाँकि इससे बढ़कर आदमी के लिए कोई अवगुण नहीं है कि वह अपने पूर्वजों के विश्वासों और विचारों पर जम जाने का निर्णय कर ले, भले ही उनका ग़लत होना कितनी ही मज़बूत दलीलों से सिद्ध कर दिया जाए।
وَلَمَّا جَآءَهُمۡ كِتَٰبٞ مِّنۡ عِندِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٞ لِّمَا مَعَهُمۡ وَكَانُواْ مِن قَبۡلُ يَسۡتَفۡتِحُونَ عَلَى ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ فَلَمَّا جَآءَهُم مَّا عَرَفُواْ كَفَرُواْ بِهِۦۚ فَلَعۡنَةُ ٱللَّهِ عَلَى ٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 88
(89) -और अब जो एक किताब अल्लाह की ओर से उनके पास आई है, उसके साथ उनका क्या बर्ताव है? इसके बावजूद कि वह उस किताब की तस्दीक़ (पुष्टि) करती है जो उनके पास पहले से मौजूद थी, इसके बावजूद कि उसके आने से पहले वे स्वयं विधर्मियों के मुकाबले में जीत और मदद की दुआएँ माँगा करते थे, मगर जब वह चीज़ आ गई, जिसे वे पहचान भी गए, तो उन्होंने उसे मानने से इंकार कर दिया।95 अल्लाह की फिटकार इन इनकार करनेवालों पर,
95. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आने से पहले यहूदी बेचैनी के साथ उस नबी के इंतिज़ार में थे जिसके भेजे जाने की भविष्यवाणियाँ उनके नबियों ने की थीं। दुआएँ माँगा करते थे कि जल्दी से वह आए तो इनकार करनेवालों का वर्चस्व समाप्त हो और फिर हमारे उत्थान का युग शुरू हो। ख़ुद मदीनावाले इस बात के गवाह थे कि नबी (सल्ल.) के आने से पहले यही उनके यहूदी पड़ोसी आनेवाले नबी की उम्मीद पर जिया करते थे और वे आए दिन यही कहा करते थे कि "अच्छा, अब तो जिस-जिसका जी चाहे हमपर ज़ुल्म कर ले, जब वह नबी आएगा तो हम इन सब ज़ालिमों को देख लेंगे।" मदीनावाले ये बातें सुने हुए थे, इसी लिए जब उन्हें नबी (सल्ल.) के हालात मालूम हुए तो उन्होंने आपस में कहा कि देखना, कहीं ये यहूदी तुमसे बाज़ी न ले जाएँ । चलो, पहले हम ही इस नबी पर ईमान ले आएँ, मगर उनके लिए यह विचित्र बात थी कि वही यहूदी जो आनेवाले नबी के इन्तिज़ार में घड़ियाँ गिन रहे थे उसके आने पर सबसे बढ़कर उसके विरोधी बन गए। और यह जो कहा कि ‘वे इसको पहचान भी गए', तो इसके बहुत-से प्रमाण उसी समय मिल गए थे। सबसे ज़्यादा भरोसेमंद गवाही उम्मुल मोमिनीन हज़रत सफ़ीया (रजि.) की है, जो खुद एक बड़े यहूदी विद्वान की बेटी और एक दूसरे विद्वान की भतीजी थीं। वे कहती हैं कि जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मदीना आए तो मेरे बाप और चचा दोनों आपसे मिलने गए। बहुत देर तक आपसे बात हुई, फिर जब घर वापस आए तो मैंने अपने कानों से इन दोनों को ये बातें करते सुना- चचा: क्या में यह वही नबी है, जिसकी खबरें हमारी किताबों में दी गई हैं? बाप : ख़ुदा की क़सम, हाँ। चचा : क्या तुमको इसपर विश्वास है? बाप : हाँ। चचा : फिर क्या इरादा है? बाप : जब तक जान में जान है उसका विरोध करूँगा, उसकी बात चलने न दूंगा। (इब्ने हिशाम, भाग 2, पृ० 165, नया एडीशन)
بِئۡسَمَا ٱشۡتَرَوۡاْ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمۡ أَن يَكۡفُرُواْ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ بَغۡيًا أَن يُنَزِّلَ ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ مِنۡ عِبَادِهِۦۖ فَبَآءُو بِغَضَبٍ عَلَىٰ غَضَبٖۚ وَلِلۡكَٰفِرِينَ عَذَابٞ مُّهِينٞ ۝ 89
(90) कैसा बुरा ज़रिया है जिससे ये अपने मन (नफ़्स) की तसल्ली हासिल करते हैं96 कि जो मार्गदर्शन अल्लाह ने भेजा है, उसको स्वीकार करने से केवल इस ज़िद के कारण इनकार कर रहे हैं कि अल्लाह ने अपने फ़ज़्ल (वह्य और रिसालत) से अपने जिस बन्दे को स्वयं चाहा, नवाज़ दिया।97 अत: अब ये प्रकोप-पर-प्रकोप के पात्र हो गए हैं और ऐसे विधर्मियों के लिए कठोर अपमानजनक यातना निश्चित है।
96.इस आयत का दूसरा अनुवाद यह भी हो सकता है, कैसी बुरी चीज़ है, जिसके लिए उन्होंने अपनी जानों को बेच डाला' अर्थात् अपने कल्याण, सौभाग्य और अपनी मुक्ति की बलि दे दी।
97.ये लोग चाहते थे कि आनेवाला नबी उनकी कौम में पैदा हो, मगर जब वह एक दूसरी कौम में पैदा हुआ, जिसे वे अपनी अपेक्षा तुच्छ समझते थे, तो वे उसके इंकार पर तत्पर हो गए, मानो उनका तात्पर्य यह था कि अल्लाह उनसे पूछकर नबी भेजता । जब उसने उनसे न पूछा और अपनी मेहरबानी से खुद जिसे चाहा, सम्मानित किया, तो वे बिगड़ बैठे
وَإِذَا قِيلَ لَهُمۡ ءَامِنُواْ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُواْ نُؤۡمِنُ بِمَآ أُنزِلَ عَلَيۡنَا وَيَكۡفُرُونَ بِمَا وَرَآءَهُۥ وَهُوَ ٱلۡحَقُّ مُصَدِّقٗا لِّمَا مَعَهُمۡۗ قُلۡ فَلِمَ تَقۡتُلُونَ أَنۢبِيَآءَ ٱللَّهِ مِن قَبۡلُ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ ۝ 90
(91) जब उनसे कहा जाता है कि जो कुछ अल्लाह ने उतारा है उसपर ईमान लाओ, तो वे कहते हैं, “हम तो केवल उस चीज़ पर ईमान लाते हैं, जो हमारे यहाँ (अर्थात् इसराईल की नस्ल में) उतरी है।" इस दायरे के बाहर जो कुछ आया है, उसे वे मानने से इनकार करते हैं, हालाँकि वह सत्य है और उस शिक्षा की पुष्टि और समर्थन कर रहा है जो उनके यहाँ पहले से मौजूद थी। अच्छा, उनसे कहो : अगर तुम उस शिक्षा ही पर ईमान रखनेवाले हो जो तुम्हारे यहाँ आई थी, तो उससे पहले अल्लाह के उन पैग़म्बरों को (जो खुद बनी इसराईल में पैदा हुए थे) क्यों क़त्ल करते रहे?
۞وَلَقَدۡ جَآءَكُم مُّوسَىٰ بِٱلۡبَيِّنَٰتِ ثُمَّ ٱتَّخَذۡتُمُ ٱلۡعِجۡلَ مِنۢ بَعۡدِهِۦ وَأَنتُمۡ ظَٰلِمُونَ ۝ 91
(92) तुम्हारे पास मूसा कैसी-कैसी स्पष्ट निशानियों के साथ आया, फिर भी तुम ऐसे ज़ालिम थे कि उसके पीठ मोड़ते ही बछड़े को माबूद (पूज्य) बना बैठे।
وَإِذۡ أَخَذۡنَا مِيثَٰقَكُمۡ وَرَفَعۡنَا فَوۡقَكُمُ ٱلطُّورَ خُذُواْ مَآ ءَاتَيۡنَٰكُم بِقُوَّةٖ وَٱسۡمَعُواْۖ قَالُواْ سَمِعۡنَا وَعَصَيۡنَا وَأُشۡرِبُواْ فِي قُلُوبِهِمُ ٱلۡعِجۡلَ بِكُفۡرِهِمۡۚ قُلۡ بِئۡسَمَا يَأۡمُرُكُم بِهِۦٓ إِيمَٰنُكُمۡ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ ۝ 92
(93) फिर तनिक उस अभिवचन को याद करो, जो तूर को तुम्हारे ऊपर उठाकर हमने तुमसे लिया था। हमने ताकीद की थी कि जो हिदायतें हम दे रहे हैं, उनकी दृढ़ता के साथ पालन करो और कान लगाकर सुनो। तुम्हारे पूर्वजों ने कहा कि हमने सुन लिया, मगर मानेगे नहीं और उनके मिथ्यावाद का यह हाल था कि दिलों में उनके बछड़ा ही बसा हुआ था। कहो : अगर तुम ईमानवाले हो, तो यह विचित्र ईमान है, जो ऐसो बुरी हरकतों का तुम्हे हुक्म देता है।
قُلۡ إِن كَانَتۡ لَكُمُ ٱلدَّارُ ٱلۡأٓخِرَةُ عِندَ ٱللَّهِ خَالِصَةٗ مِّن دُونِ ٱلنَّاسِ فَتَمَنَّوُاْ ٱلۡمَوۡتَ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ ۝ 93
(94) इनसे कहो कि अगर वास्तव में अल्लाह के नज़दीक आखिरत का घर तमाम इंसानों को छोड़कर केवल तुम्हारे ही लिए खास है, तब तो तुम्हें चाहिए कि मौत की कामना करो98, अगर तुम अपने इस विचार में सच्चे हो
98.यह एक व्यंग और अति सूक्ष्म व्यंग्य है उनको दुनियापरस्ती पर । जिन लोगों को वास्तव में आख़िरत के घर से कोई लगाव होता है, वे दुनिया पर मरे नहीं जाते और न मौत से डरते हैं, किन्तु यहूदियों का हाल इसके विपरीत था और है ।
وَلَن يَتَمَنَّوۡهُ أَبَدَۢا بِمَا قَدَّمَتۡ أَيۡدِيهِمۡۚ وَٱللَّهُ عَلِيمُۢ بِٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 94
(95)-विश्वास करो कि ये कभी इसकी कामना न करेंगे, इसलिए कि अपने हाथों जो कुछ कमाकर इन्होंने वहाँ भेजा है, उसका तकाज़ा यही है (कि ये वहाँ जाने की कामना न करें), अल्लाह इन ज़ालिमों के हाल को खूब जानता है।
وَلَتَجِدَنَّهُمۡ أَحۡرَصَ ٱلنَّاسِ عَلَىٰ حَيَوٰةٖ وَمِنَ ٱلَّذِينَ أَشۡرَكُواْۚ يَوَدُّ أَحَدُهُمۡ لَوۡ يُعَمَّرُ أَلۡفَ سَنَةٖ وَمَا هُوَ بِمُزَحۡزِحِهِۦ مِنَ ٱلۡعَذَابِ أَن يُعَمَّرَۗ وَٱللَّهُ بَصِيرُۢ بِمَا يَعۡمَلُونَ ۝ 95
(96) तुम इन्हें जीने का सबसे बढ़कर लोभी99 पाओगे, यहाँ तक कि ये इस मामले में मुशरिको (बहुदेववादियों) से भी बढ़े हुए हैं। इनमें से एक-एक आदमी यह चाहता है कि किसी तरह हज़ार वर्ष जिए, हालाँकि लंबी उम्र बहरहाल उसे अज़ाब से तो दूर नहीं फेंक सकती। जैसे कुछ काम ये कर रहे हैं, अल्लाह तो उन्हें देख ही रहा है।
قُلۡ مَن كَانَ عَدُوّٗا لِّـجِبۡرِيلَ فَإِنَّهُۥ نَزَّلَهُۥ عَلَىٰ قَلۡبِكَ بِإِذۡنِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٗا لِّمَا بَيۡنَ يَدَيۡهِ وَهُدٗى وَبُشۡرَىٰ لِلۡمُؤۡمِنِينَ ۝ 96
(97) इनसे कहो कि जो कोई जिबरील से दुश्मनी रखता हो100, उसे मालूम होना चाहिए कि जिबरील ने अल्लाह ही के आदेश से यह कुरआन तुम्हारे दिल पर उतारा है101 जो पहले आई हुई किताबों की पुष्टि एवं समर्थन करता है102 और ईमान लानेवालों के लिए हिदायत और कामयाबी को खुशखबरी बनकर आया है।103
100.यहूदी केवल नबी (सल्ल.) को और आप पर ईमान लानेवालों को ही बुरा न कहते थे, अल्लाह के प्रतिष्ठित फ़रिश्ते ज़िबरील को भी गालियाँ देते थे और कहते थे कि वह हमारा दुश्मन है, वह रहमत का नहीं, अज़ाब का फ़रिश्ता है।
101.अर्थात् इस कारण तुम्हारी गालियाँ जिबरील पर नहीं, बल्कि महिमावान अल्लाह पर पड़ती हैं।
مَن كَانَ عَدُوّٗا لِّلَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَرُسُلِهِۦ وَجِبۡرِيلَ وَمِيكَىٰلَ فَإِنَّ ٱللَّهَ عَدُوّٞ لِّلۡكَٰفِرِينَ ۝ 97
(98) (अगर जिबरील से इनकी दुश्मनी का कारण यही है, तो कह दो कि) जो अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसके रसूलों और जिबरील और मीकाईल के दुश्मन हैं, अल्लाह उन विधर्मियों का दुश्मन है।
وَلَقَدۡ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ءَايَٰتِۭ بَيِّنَٰتٖۖ وَمَا يَكۡفُرُ بِهَآ إِلَّا ٱلۡفَٰسِقُونَ ۝ 98
(99) हमने तुम्हारी ओर ऐसी आयते उतारी हैं जो साफ़ साफ़ सत्य को स्पष्ट करनेवाली है, और उनके अनुपालन का केवल वही लोग इनकार करते हैं जो फ़ासिक (नाफरमान) हैं ।
أَوَكُلَّمَا عَٰهَدُواْ عَهۡدٗا نَّبَذَهُۥ فَرِيقٞ مِّنۡهُمۚ بَلۡ أَكۡثَرُهُمۡ لَا يُؤۡمِنُونَ ۝ 99
(100) क्या हमेशा ऐसा ही नहीं होता रहा है कि जब उन्होंने कोई बचन दिया तो उनमें से एक-न-एक गिरोह ने उसे निश्चय ही पीठ पीछे कर दिया? बल्कि इनमें से अधिकतर ऐसे ही हैं, जो सच्चे दिल से ईमान नहीं लाते ।
وَلَمَّا جَآءَهُمۡ رَسُولٞ مِّنۡ عِندِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٞ لِّمَا مَعَهُمۡ نَبَذَ فَرِيقٞ مِّنَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ كِتَٰبَ ٱللَّهِ وَرَآءَ ظُهُورِهِمۡ كَأَنَّهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ ۝ 100
(101) और जब इनके पास अल्लाह की ओर से कोई रसूल उस किताब की पुष्टि और समर्थन करता हुआ आया जो इनके यहाँ पहले से मौजूद थी, तो इन किताबवालों में से एक गिरोह ने अल्लाह की किताब को इस तरह पीठ पीछे डाला, मानो कि वे कुछ जानते ही नहीं।
وَٱتَّبَعُواْ مَا تَتۡلُواْ ٱلشَّيَٰطِينُ عَلَىٰ مُلۡكِ سُلَيۡمَٰنَۖ وَمَا كَفَرَ سُلَيۡمَٰنُ وَلَٰكِنَّ ٱلشَّيَٰطِينَ كَفَرُواْ يُعَلِّمُونَ ٱلنَّاسَ ٱلسِّحۡرَ وَمَآ أُنزِلَ عَلَى ٱلۡمَلَكَيۡنِ بِبَابِلَ هَٰرُوتَ وَمَٰرُوتَۚ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنۡ أَحَدٍ حَتَّىٰ يَقُولَآ إِنَّمَا نَحۡنُ فِتۡنَةٞ فَلَا تَكۡفُرۡۖ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنۡهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِۦ بَيۡنَ ٱلۡمَرۡءِ وَزَوۡجِهِۦۚ وَمَا هُم بِضَآرِّينَ بِهِۦ مِنۡ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذۡنِ ٱللَّهِۚ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمۡ وَلَا يَنفَعُهُمۡۚ وَلَقَدۡ عَلِمُواْ لَمَنِ ٱشۡتَرَىٰهُ مَا لَهُۥ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنۡ خَلَٰقٖۚ وَلَبِئۡسَ مَا شَرَوۡاْ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمۡۚ لَوۡ كَانُواْ يَعۡلَمُونَ ۝ 101
(102) और लगे उन चीज़ों की पैरवी करने जो शैतान सुलैमान के राज्य का नाम लेकर प्रस्तुत किया करते थे।104 हालाँकि सुलैमान ने कभी कुफ्र नहीं किया, कुफ़ करनेवाले तो वे शैतान थे जो लोगों को जादूगरी की शिक्षा देते थे। वे पीछे पड़े उस चीज़ के जो बाबिल में दो फरिश्तों, हारूत और मारूत, पर उतारी गई थी, हलाँकि वे (फ़रिश्ते) जब भी किसी को उसकी शिक्षा देते थे, तो पहले स्पष्ट रूप से सचेत कर दिया करते थे कि "देख, हम मात्र एक परीक्षा हैं, तो क़ुफ़्र में न पड़।''105 फिर भी ये लोग उनसे वह चीज़ सीखते थे जिससे पति और पत्नी में जुदाई डाल दें।106 स्पष्ट था कि अल्लाह की मरज़ी के बिना वे इस ज़रिये से किसी को भी नुक़सान न पहुँचा सकते थे, मगर इसके बावजूद वे ऐसी चीज़ सीखते थे जो खुद उनके लिए लाभकारी नहीं, बल्कि हानिकारक थी और उन्हें खूब मालूम था कि जो इस चीज़ का खरीदार बना, उसके लिए आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं। कितनी बुरी पूँजी थी जिसके बदले उन्होंने अपनी जानों को बेच डाला, काश उन्हें मालूम होता !
104.शैतानों से तात्पर्य जिन्न शैतान और इंसान शैतान दोनों हो सकते हैं और दोनों ही यहाँ अभिप्रेत हैं। जब बनी इसराईल पर नैतिक और भौतिक पतन और दुर्दशा का दौर आया और गुलामी, अज्ञानता, ग़रीबी, अपमान और पस्ती ने उनके अंदर कोई बुलन्द हौसला, उत्साह और उमंग न छोड़ी तो उनका ध्यान जादू-टोने, झाड़-फूंक और तावीज़-गंडों की ओर खिंचने लगा। वे ऐसे उपाय ढूँढ़ने लगे जिनसे किसी परिश्रम और संघर्ष के बिना केवल फूंकों और मंत्रों के बल पर सारे काम बन जाया करें । उस समय शैतानों ने उनको बहकाना शुरू किया कि सुलैमान (अलैहि.) की शानदार हुकूमत और उनको आश्चर्यजनक शक्तियाँ तो सब कुछ कुंडलियों और मंत्रों का परिणाम थीं और वे हम तुम्हें बताए देते हैं। इसलिए ये लोग अप्रत्याशित नेमत समझकर इन चीज़ों पर टूट पड़े और फिर न अल्लाह की किताब से उनको कोई दिलचस्पी रही और न सत्य के किसी आवाहक की आवाज़ पर उन्होंने कान धरा ।
105. इस आयत का अर्थ निर्धारित करने में बहुत-सी बातें कही गई हैं,मगर जो कुछ मैंने समझा है वह यह है कि जिस ज़माने में बनी इसराईल की पूरी कौम बाबिल में कैदी और गुलाम बनी हुई थी, अल्लाह तआला ने दो फ़रिश्तों को इंसान के रूप में उनकी आज़माइश के लिए भेजा होगा। जिस तरह हज़रत लूत (अलै.) की कौम के पास फ़रिश्ते खूबसूरत लड़कों के रूप में गए थे, उसी तरह इन इसराईलियों के पास वे पीरों और फकीरों के रूप में गए होंगे। वहाँ एक ओर उन्होंने जादूगरी के बाज़ार में अपनी दुकान लगाई होगी और दूसरी ओर हर पहलू को स्पष्ट करने के लिए वे हरेक को सचेत भी कर देते होंगे कि देखो, हम तुम्हारे लिए आज़माइश की हैसियत रखते हैं, तुम अपना अंजाम खराब न करो। मगर इसके बावजूद लोग उनके बताए हुए जादू-टोने, झाड़-फूंक, कुंडलियों और तावीज़-गंडों पर टूट पड़ते होंगे। फ़रिश्तों के इंसान के रूप में आकर काम करने पर किसी को आश्चर्य न हो, वे अल्लाह की हुकूमत के कारिन्दे हैं। अपने मंसबी (पदेन) ज़िम्मेदारियों के सिलसिले में जिस समय जो रूप अपनाने की ज़रूरत होती है, वे उसे अपना सकते हैं। हमें क्या खबर कि इस समय भी हमारे आस-पास कितने फ़रिश्ते इनसान के रूप में आकर काम कर जाते होंगे। रहा फ़रिश्तों का एक ऐसी चीज़ सिखाना जो अपने आपमें बुरी थी, तो उसको मिसाल ऐसी है जैसे पुलिस के बेवर्दी सिपाही किसी घूसखोर हाकिम को निशान लगे सिक्के और नोट ले जाकर घूस के रूप में देते हैं, ताकि उसे ठीक उस समय (रंगे हाथों) पकड़ें जबकि वह अपराध कर रहा हो और उसके लिए निरपराध होने के बहाने की गुंजाइश बाक़ी न रहने दें।
وَلَوۡ أَنَّهُمۡ ءَامَنُواْ وَٱتَّقَوۡاْ لَمَثُوبَةٞ مِّنۡ عِندِ ٱللَّهِ خَيۡرٞۚ لَّوۡ كَانُواْ يَعۡلَمُونَ ۝ 102
(103) अगर वे ईमान और तक़्वा (परहेज़गारी) अपनाते, तो अल्लाह के यहाँ उसका जो बदला मिलता, वह उनके लिए ज़्यादा बेहतर था, काश उन्हें खबर होती !
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَقُولُواْ رَٰعِنَا وَقُولُواْ ٱنظُرۡنَا وَٱسۡمَعُواْۗ وَلِلۡكَٰفِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٞ ۝ 103
(104) ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो !107 'राअीना' न कहा करो, बल्कि 'उन्जुरना' कहो और ध्यान से बात को सुनो108, ये इनकार करनेवाले तो दुखद यातना के पात्र हैं।
107.इस रुकूअ और इसके बादवाले रुकूअ में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पैरवी अपनानेवालों को उन शरारतों से खबरदार किया गया है जो इस्लाम और इस्लामी जमाअत के खिलाफ़ यहूदियों की ओर से की जा रही थीं, उन संदेहों के जवाब दिए गए हैं जो ये लोग मुसलमानों के दिलों में पैदा करने की कोशिश करते थे और उन खास-ख़ास बातों पर विचार किया गया है जो मुसलमानों के साथ यहूदियों की बातचीत में छिड़ जाया करती थीं। इस मौके पर यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि जब नबी (सल्ल.) मदीना पहुंचे और आस-पास के इलाकों में इस्लाम की दावत फैलनी शुरू हुई, तो यहूदी जगह-जगह मुसलमानों को धार्मिक विवादों में उलझाने की कोशिश करते थे। बाल की खाल निकालने की अपनी बीमारी, संदेह पैदा करने और सवाल में से सवाल निकालने की बीमारी इन सीधे-सादे और सच्चे लोगों को भी लगाना चाहते थे और खुद नबी (सल्ल.) की मजलिस में आकर कपटपूर्ण मक्कारी की बातें करके अपनी घटिया मनोवृत्ति का प्रमाण दिया करते थे।
108.यहूदी जब प्यारे नबी (सल्ल.) को मजलिस में आते तो अपने सलाम और कलाम में हर संभव तरीक़े से अपने दिल का बुख़ार निकालने की कोशिश करते थे। [आपके प्रति अनादर व्यक्त करने के लिए] द्विअर्थी शब्द बोलते, ज़ोर से कुछ कहते और धीरे से कुछ और कह देते और दिखावटी शिष्टाचार अपनाते हुए भीतर-भीतर आपका अपमान करने में कोई कसर न छोड़ते थे। कुरआन में आगे चलकर इसके बहुत-से उदाहरण दिए गए हैं। यहाँ जिस विशेष शब्द के प्रयोग से मुसलमानों को रोका गया है, यह एक द्विअर्थी शब्द था। जब प्यारे नबी (सल्ल.) से बात करते समय यहूदियों को कभी यह कहने की ज़रूरत पड़ती कि ठहरिए, ज़रा हमें यह बात समझ लेने दीजिए, तो वे 'राजिना' कहते थे। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ तो यह था कि ज़रा हमारी रिआयत कीजिए या हमारी बात सुन लीजिए, मगर इसमें कई बातें और भी थीं, जैसे इब्रानी में उससे मिलता-जुलता एक शब्द था, जिसका अर्थ था, 'सुन, तू बहरा हो जाए' और ख़ुद अरबी में इसका एक अर्थ था घमंडी, अज्ञानी और मूर्ख। और तनिक जीभ को लचका देकर 'राअीना' भी बना लिया जाता था, जिसका अर्थ था 'ऐ हमारे चरवाहे । इसलिए मुसलमानों को आदेश दिया गया कि तुम इस शब्द के प्रयोग से बचो और इसके बजाए 'उनजुर्ना' कहा करो, अर्थात् हमारी ओर ध्यान दीजिए या तनिक हमें समझ लेने दीजिए। फिर कहा कि 'ध्यानपूर्वक बात सुनो' अर्थात् यहूदियों को तो बार-बार यह कहने की ज़रूरत इसलिए पड़ती है कि वे नबी की बात पर ध्यान नहीं देते और उनकी बातों के दौरान वे अपने ही विचारों में उलझते रहते हैं, मगर तुम्हें ध्यान से नबी की बातें सुननी चाहिए, ताकि यह कहने की ज़रूरत ही न पड़े।
مَّا يَوَدُّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ وَلَا ٱلۡمُشۡرِكِينَ أَن يُنَزَّلَ عَلَيۡكُم مِّنۡ خَيۡرٖ مِّن رَّبِّكُمۡۚ وَٱللَّهُ يَخۡتَصُّ بِرَحۡمَتِهِۦ مَن يَشَآءُۚ وَٱللَّهُ ذُو ٱلۡفَضۡلِ ٱلۡعَظِيمِ ۝ 104
(105) ये लोग, जिन्होंने सत्य संदेश को मानने से इनकार कर दिया है, चाहे अहले किताब में से हों या मुशरिक हों, कदापि यह पसन्द नहीं करते कि तुम्हारे रब की ओर से तुमपर कोई भलाई आए, पर अल्लाह जिसको चाहता है, अपनी रहमत के लिए चुन लेता है और वह बड़ा कृपाशील है।
۞مَا نَنسَخۡ مِنۡ ءَايَةٍ أَوۡ نُنسِهَا نَأۡتِ بِخَيۡرٖ مِّنۡهَآ أَوۡ مِثۡلِهَآۗ أَلَمۡ تَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٌ ۝ 105
(106) हम अपनी जिस आयत को मंसूख (निरस्त) कर देते हैं या भुला देते हैं, उसकी जगह उससे बेहतर लाते हैं या कम-से-कम वैसी ही।109
109.यह एक विशेष संदेह का उत्तर है जो यहूदी मुसलमानों के दिलों में डालने की कोशिश करते थे। उनकी आपत्ति यह थी कि अगर पिछली किताबें भी अल्लाह की ओर से आई थीं और यह क़ुरआन भी अल्लाह की ओर से है, तो उनके कुछ आदेशों की जगह इसमें दूसरे आदेश क्यों दिए गए हैं ? एक ही अल्लाह को ओर से विभिन्न समयों में विभिन्न आदेश कैसे हो सकते हैं? फिर तुम्हारा क़ुरआन यह दावा करता है कि यहूदी और ईसाई उस शिक्षा के एक भाग को भूल गए जो उन्हें दिया गया था। आखिर यह कैसे हो सकता है कि अल्लाह की दी हुई शिक्षा और वह स्मृति पटल से मिट जाए? ये सारी बातें वे जाँच-पड़ताल के लिए नहीं, बल्कि इसलिए करते थे कि मुसलमानों को क़ुरआन के अल्लाह की ओर से होने में संदेह हो जाए। इसके उत्तर में अल्लाह कहता है कि मैं मालिक हूँ, मेरे अधिकार असीम हैं, अपने जिस आदेश को चाहूँ, निरस्त कर दूं और जिस चीज़ को चाहूँ, स्मृति पटल से मिटा दूं। मगर जिस चीज़ को मैं निरस्त करता या मिटाता हूँ, उससे बेहतर चीज़ उसकी जगह पर लाता हूँ या कम-से-कम वह अपने मौक़े पर उतनी ही फ़ायदेमंद और मुनासिब होती है जितनी पहली चीज़ अपने मौक़े पर थी।
أَلَمۡ تَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۗ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِيّٖ وَلَا نَصِيرٍ ۝ 106
(107) क्या तुम जानते नहीं हो कि अल्लाह हर चीज़ की सामर्थ्य रखता है? क्या तुम्हें खबर नहीं है ज़मीन और आसमानों का शासन अल्लाह ही के लिए है और उसके सिवा कोई तुम्हारी देखभाल और सहायता करनेवाला नहीं है ?
أَمۡ تُرِيدُونَ أَن تَسۡـَٔلُواْ رَسُولَكُمۡ كَمَا سُئِلَ مُوسَىٰ مِن قَبۡلُۗ وَمَن يَتَبَدَّلِ ٱلۡكُفۡرَ بِٱلۡإِيمَٰنِ فَقَدۡ ضَلَّ سَوَآءَ ٱلسَّبِيلِ ۝ 107
(108) फिर क्या तुम अपने रसूल से उस प्रकार के प्रश्न करने और माँगें रखना चाहते हो, जैसे इससे पहले मूसा से किए जा चुके हैं ?110 हालाँकि जिस आदमी ने ईमान के रवैए को कुफ़्र के रवैए से बदल लिया, वह सीधे रास्ते से भटक गया।
110.यहूदी बाल की खाल निकाल-निकाल करके तरह-तरह के सवाल मुसलमानों से करते थे और उन्हें उकसाते थे कि अपने नबी से यह पूछो और यह पूछो और यह पूछो। इसपर अल्लाह मुसलमानों को चेतावनी दे रहा है कि इस मामले में यहूदियों का रवैया अपनाने से बचो। इसी चीज़ पर नबी (सल्ल.) ख़ुद भी मुसलमानों को बार-बार सचेत किया करते थे कि तर्क-वितर्क से और बाल की खाल निकालने से पिछली उम्मतें तबाह हो चुकी हैं, तुम इससे बचो। जिन सवालों को अल्लाह और उसके रसूल ने नहीं छेड़ा, उनकी खोज में न लगो।
وَدَّ كَثِيرٞ مِّنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَٰبِ لَوۡ يَرُدُّونَكُم مِّنۢ بَعۡدِ إِيمَٰنِكُمۡ كُفَّارًا حَسَدٗا مِّنۡ عِندِ أَنفُسِهِم مِّنۢ بَعۡدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ ٱلۡحَقُّۖ فَٱعۡفُواْ وَٱصۡفَحُواْ حَتَّىٰ يَأۡتِيَ ٱللَّهُ بِأَمۡرِهِۦٓۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ ۝ 108
(109) अहले किताब में से बहुत-से लोग यह चाहते हैं कि किसी तरह तुम्हें ईमान से फेरकर फिर कुफ़्र की ओर पलटा ले जाएँ। यद्यपि सत्य उनपर प्रकट हो चुका है, किन्तु अपने मन की ईर्ष्या के कारण तुम्हारे लिए उनकी यह इच्छा है। इसके जवाब में तुम माफ़ी और दरगुज़र से काम लो111, यहाँ तक कि अल्लाह खुद ही अपना फैसला लागू कर दे। इत्मीनान रखो कि अल्लाह हर चीज़ की सामर्थ्य रखता है।
111.अर्थात् उनकी दुश्मनी ,और जलन को देखकर भड़को नहीं, अपना सन्तुलन न खो बैठो। इनसे बहसें और मुनाज़रे (शास्त्रार्थ) करने और झगड़ने में अपने बहुमूल्य समय और अपनी प्रतिष्ठा को नष्ट न करो । धैर्य के साथ देखते रहो कि अल्लाह क्या करता है। बेकार की बातों में अपनी ताक़त लगाने के बजाय अल्लाह की याद और भलाई के कामों में उन्हें लगाओ कि यह अल्लाह के यहाँ काम आनेवाली चीज़ है, न कि वह ।
وَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُواْ ٱلزَّكَوٰةَۚ وَمَا تُقَدِّمُواْ لِأَنفُسِكُم مِّنۡ خَيۡرٖ تَجِدُوهُ عِندَ ٱللَّهِۗ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعۡمَلُونَ بَصِيرٞ ۝ 109
(110) नमाज़ कायम करो और ज़कात दो। तुम अपनी आखिरत के लिए जो भलाई कमाकर आगे भेजोगे, अल्लाह के यहाँ उसे मौजूद पाओगे। जो कुछ तुम करते हो, वह सब अल्लाह की नज़र में है।
وَقَالُواْ لَن يَدۡخُلَ ٱلۡجَنَّةَ إِلَّا مَن كَانَ هُودًا أَوۡ نَصَٰرَىٰۗ تِلۡكَ أَمَانِيُّهُمۡۗ قُلۡ هَاتُواْ بُرۡهَٰنَكُمۡ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ ۝ 110
(111) उनका कहना है कि कोई आदमी जन्नत में न जाएगा, जब तक कि वह यहूदी न हो या (ईसाइयों के विचार के अनसार) ईसाई न हो। ये उनकी तमन्नाएँ हैं।112 उनसे कहो, अपना प्रमाण प्रस्तुत करो, अगर तुम अपने दावे में सच्चे हो ।
112.अर्थात् वास्तव में ये हैं तो उनकी मात्र मनोकामनाएँ और तमन्नाएँ, मगर वे इन्हें बयान इस तरह कर रहे हैं कि मानो सचमुच यही कुछ होनेवाला है।
بَلَىٰۚ مَنۡ أَسۡلَمَ وَجۡهَهُۥ لِلَّهِ وَهُوَ مُحۡسِنٞ فَلَهُۥٓ أَجۡرُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦ وَلَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُونَ ۝ 111
(112) (सच तो यह है कि न तुम्हारी कुछ विशेषता है, न किसी और की ।) सत्य यह है कि जो भी अपनी हस्ती को अल्लाह की इताअत (आज्ञापालन) में सौंप दे और अमली तौर पर नेक रवैया अपनाए, उसके लिए उसके रब के पास उसका बदला है और ऐसे लोगों के लिए किसी डर या रंज का कोई मौक़ा नहीं।
وَقَالَتِ ٱلۡيَهُودُ لَيۡسَتِ ٱلنَّصَٰرَىٰ عَلَىٰ شَيۡءٖ وَقَالَتِ ٱلنَّصَٰرَىٰ لَيۡسَتِ ٱلۡيَهُودُ عَلَىٰ شَيۡءٖ وَهُمۡ يَتۡلُونَ ٱلۡكِتَٰبَۗ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعۡلَمُونَ مِثۡلَ قَوۡلِهِمۡۚ فَٱللَّهُ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ فِيمَا كَانُواْ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَ ۝ 112
(113) यहूदी कहते हैं : ईसाइयों के पास कुछ नहीं। ईसाई कहते हैं : यहूदियों के पास कुछ नहीं-हालाँकि दोनों ही किताब पढ़ते हैं और इसी प्रकार के दावे उन लोगों के भी हैं, जिनके पास किताब का ज्ञान नहीं है।113 ये मतभेद जिनमें ये लोग पड़े हुए इनका फैसला अल्लाह क़ियामत के दिन कर देगा।
113.अर्थात् अरब के मुशरिक (अनेकेश्वरवादी)।
وَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّن مَّنَعَ مَسَٰجِدَ ٱللَّهِ أَن يُذۡكَرَ فِيهَا ٱسۡمُهُۥ وَسَعَىٰ فِي خَرَابِهَآۚ أُوْلَٰٓئِكَ مَا كَانَ لَهُمۡ أَن يَدۡخُلُوهَآ إِلَّا خَآئِفِينَۚ لَهُمۡ فِي ٱلدُّنۡيَا خِزۡيٞ وَلَهُمۡ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٞ ۝ 113
(114) और उस व्यक्ति से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह की इबादतगाहों में उसके नाम की याद से रोके और उनको वीरान करने पर उतर आए? ऐसे लोग इस क़ाबिल हैं कि उन इबादतगाहों में कदम न रखें और अगर वहाँ जाएँ भी, तो डरते हुए जाएँ।114 इनके लिए तो दुनिया में रुसवाई (अपमान) है और आख़िरत में बड़ी यातना।
114.अर्थात् बजाए इसके कि इबादतगाहें इस प्रकार के ज़ालिम लोगों के कब्जे और अधिकार में हों और ये उनके मुतवल्ली (ज़िम्मेदार) हों, होना यह चाहिए कि ख़ुदा को माननेवाले और ख़ुदा से डरनेवाले लोगों के हाथ में अधिकार हो और वहीं इबादतगाहों के ज़िम्मेदार रहें, ताकि ये शरारती लोग अगर वहाँ जाएँ भी, तो उन्हें डर हो कि शरारत करेंगे तो सज़ा पाएँगे-यहाँ एक सूक्ष्म संकेत मक्का के इस्लाम-विरोधियों के उस अत्याचार की ओर भी है कि उन्होंने अपनी क़ौम के उन लोगों को, जो इस्लाम ला चुके थे, अल्लाह के घर में इबादत करने से रोक दिया था।
وَلِلَّهِ ٱلۡمَشۡرِقُ وَٱلۡمَغۡرِبُۚ فَأَيۡنَمَا تُوَلُّواْ فَثَمَّ وَجۡهُ ٱللَّهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ وَٰسِعٌ عَلِيمٞ ۝ 114
(115) पूरब और पश्चिम सब अल्लाह के हैं। जिस ओर भी तुम रुख करोगे, उसी ओर अल्लाह का रुख है।115 अल्लाह बड़ी समाईवाला और सब कुछ जाननेवाला है।116
115.अर्थात् अल्लाह न पूर्वी है, न पश्चिमी । वह सभी दिशाओं और जगहों का स्वामी है, किन्तु खुद किसी दिशा या किसी जगह में ठहरा हुआ नहीं है, इसलिए उसकी इबादत के लिए किसी दिशा या जगह को निश्चित करने का अर्थ यह नहीं है कि अल्लाह वहाँ या उस ओर रहता है। और न यह कोई झगड़ने और बहस करने की बात है कि पहले तुम वहाँ या उस ओर इबादत करते थे, अब तुमने उस जगह या दिशा को क्यों बदल दिया।
116.अर्थात् अल्लाह सीमित, संकीर्ण हृदय, संकीर्ण दृष्टि और संकीर्ण साधनोंवाला नहीं है, जैसा कि तुम लोगों ने अपने जैसा विचार करके उसे समझ रखा है, बल्कि उसका ईश्वरत्व (खुदाई) भी व्यापक है और उसका दृष्टिकोण और उसका कृपाक्षेत्र भी व्यापक है, और यह भी जानता है कि उसका कौन-सा बन्दा कहाँ, किस समय और किस नीयत से उसको याद कर रहा है।
وَقَالُواْ ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ وَلَدٗاۗ سُبۡحَٰنَهُۥۖ بَل لَّهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ كُلّٞ لَّهُۥ قَٰنِتُونَ ۝ 115
(116) उनका कहना है कि अल्लाह ने किसी को बेटा बनाया है, अल्लाह पाक है इन बातों से। सच्ची बात यह है कि ज़मीन और आसमानों की तमाम मौजूद चीज़े उसकी मिल्कियत हैं। सब के सब उसी के फरमान की पाबन्द हैं।
بَدِيعُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ وَإِذَا قَضَىٰٓ أَمۡرٗا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ ۝ 116
(117) वह आसमानों और ज़मीन का आविष्कारक (पहली बार पैदा करनेवाला) है और जिस बात का वह फ़ैसला करता है, उसके लिए बस यह हुक्म देता है कि 'हो जा' और वह हो जाती है।
وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعۡلَمُونَ لَوۡلَا يُكَلِّمُنَا ٱللَّهُ أَوۡ تَأۡتِينَآ ءَايَةٞۗ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِم مِّثۡلَ قَوۡلِهِمۡۘ تَشَٰبَهَتۡ قُلُوبُهُمۡۗ قَدۡ بَيَّنَّا ٱلۡأٓيَٰتِ لِقَوۡمٖ يُوقِنُونَ ۝ 117
(118) नासमझ कहते हैं कि अल्लाह खुद हमसे बात क्यों नहीं करता या कोई निशानी हमारे पास क्यों नहीं आती?117 ऐसी ही बातें इनसे पहले के लोग भी किया करते थे। इन सब (अगले-पिछले गुमराहों) की मनोवृत्तियाँ एक जैसी हैं।118 विश्वास करनेवालों के लिए तो हम निशानियाँ साफ़-साफ़ ज़ाहिर कर चुके है।119
117.उनका मतलब यह था कि ख़ुदा, या तो खुद हमारे सामने आकर कहे कि यह मेरी किताब है और ये मेरे आग आदेश है, तुम लोग इनकी पैरवी करो, या फिर हमें कोई ऐसी निशानी दिखाई जाए जिससे हमें विश्वास हो जाए कि मुहम्मद (सल्ल.) जो कुछ कह रहे हैं, वह ख़ुदा की ओर से है।
118.अर्थात् आज के गुमराहों ने कोई आपत्ति और कोई माँग ऐसी नहीं घड़ी है जो इनसे पहले के गुमराह पेश न कर चुके हों । प्राचीन काल से आज तक गुमराही का एक ही स्वभाव है और वह बार-बार एक ही प्रकार के संदेह, आपत्ति और प्रश्न दोहराती रहती है।
إِنَّآ أَرۡسَلۡنَٰكَ بِٱلۡحَقِّ بَشِيرٗا وَنَذِيرٗاۖ وَلَا تُسۡـَٔلُ عَنۡ أَصۡحَٰبِ ٱلۡجَحِيمِ ۝ 118
(119) (इससे बढ़कर निशानी क्या होगी कि हमने तुमको सत्य-ज्ञान के साथ खुशखबरी देनेवाला और डरानेवाला बनाकर भेजा।120 अब जो लोग जहन्नम से रिश्ता जोड़ चुके हैं, उनकी ओर से तुम ज़िम्मेदार और जवाबदेह नहीं हो।
120.अर्थात् दूसरी निशानियों का क्या उल्लेख, सर्वाधिक स्पष्ट निशानी तो मुहम्मद (सल्ल.) का अपना व्यक्तित्व है। आपकी नुबूवत से पहले के हालात और उस कौम और मुल्क के हालात, जिसमें आप पैदा हुए, और वे हालात जिनमें आप पले-बढ़े और चालीस वर्ष ज़िन्दगी बसर की और फिर वह महान कार्य जो नबी होने के बाद आपने किया, यह सब कुछ एक ऐसी रौशन निशानी है जिसके बाद किसी और निशानी की ज़रूरत नहीं रहती।
وَلَن تَرۡضَىٰ عَنكَ ٱلۡيَهُودُ وَلَا ٱلنَّصَٰرَىٰ حَتَّىٰ تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمۡۗ قُلۡ إِنَّ هُدَى ٱللَّهِ هُوَ ٱلۡهُدَىٰۗ وَلَئِنِ ٱتَّبَعۡتَ أَهۡوَآءَهُم بَعۡدَ ٱلَّذِي جَآءَكَ مِنَ ٱلۡعِلۡمِ مَا لَكَ مِنَ ٱللَّهِ مِن وَلِيّٖ وَلَا نَصِيرٍ ۝ 119
(120) यहूदी और ईसाई तुमसे हरगिज़ राज़ी न होंगे, जब तक तुम उनके तरीके पर न चलने लगो।121 साफ़ कह दो कि रास्ता बस वही है जो अल्लाह ने बताया है। वरना अगर उस ज्ञान के बाद, जो तुम्हारे पास आ चुका है, तुम उनकी इच्छाओं पर चले, तो अल्लाह की पकड़ से बचानेवाला कोई मित्र और सहायक तुम्हारे लिए नहीं है।
121.तात्पर्य यह है कि इन लोगों की नाराज़ी का कारण केवल यह है कि तुमने अल्लाह की आयतों और उसके दीन (धर्म) के साथ वह कपटपूर्ण और धोखाधड़ी भरा ढंग क्यों न अपनाया, ख़ुदापरस्ती के पर्दे में वह खुदपरस्ती क्यों न की, धार्मिक सिद्धान्त और आदेशों को अपनी कल्पनाओं या अपनी इच्छाओं के दालने में उस दुस्साहस से क्यों न काम लिया, वह पाखण्ड और गेहूँ दिखाकर जौ बेचने की नीति क्यों न अपनाई जो खुद उनका अपना तरीका है। इसलिए उन्हें राजी करने की चिन्ता छोड़ दो, क्योंकि जब तक तुम उनकी तरह के रंग-ढंग न अपना लो,दीन (धर्म) के साथ वही मामला न करने लगो, जो स्वयं ये करते हैं और विश्वास और कर्म की उन्हीं गुमराहियों में न पड़ जाओ, जिनमें ये पड़े हुए हैं, उस समय तक इनका तुमसे राज़ी होना असंभव है।
ٱلَّذِينَ ءَاتَيۡنَٰهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ يَتۡلُونَهُۥ حَقَّ تِلَاوَتِهِۦٓ أُوْلَٰٓئِكَ يُؤۡمِنُونَ بِهِۦۗ وَمَن يَكۡفُرۡ بِهِۦ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ ۝ 120
(121) जिन लोगों को हमने किताब दी है, वे उसे इस तरह पढ़ते हैं जैसा कि पढ़ने का हक है। वे इस (क़ुरआन) पर सच्चे दिल से ईमान ले आते हैं122, और जो इसके साथ इंकार की नीति अपनाएँ, वस्तुत: वही नुकसान उठानेवाले हैं।
122.यह अहले किताब के भले लोगों की तरफ़ इशारा है कि ये लोग चूँकि ईमानदारी और सच्चाई के साथ खुदा की उस किताब को पढ़ते हैं जो इनके पास पहले से मौजूद थी, इसलिए वे इस कुरआन को सुनकर या पढ़कर इसपर ईमान ले आते हैं।
يَٰبَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ ٱذۡكُرُواْ نِعۡمَتِيَ ٱلَّتِيٓ أَنۡعَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ وَأَنِّي فَضَّلۡتُكُمۡ عَلَى ٱلۡعَٰلَمِينَ ۝ 121
122) ऐ बनी इसराईल!123 याद करो मेरी वह नेमत, जो मैंने तुम्हें दी थी और यह कि मैंने तुम्हें दुनिया की तमाम क़ौमों पर श्रेष्ठता प्रदान की थी।
123.यहाँ से एक दूसरा आख्यान आरंभ होता है, जिसे समझने के लिए निम्न बातों को अच्छी तरह मस्तिष्क में बिठा लेना चाहिए- (1) हज़रत नूह के बाद हज़रत इबराहीम (अलै०) पहले नबी हैं जिनको अल्लाह ने इस्लाम की विश्वव्यापी दावत फैलाने के लिए नियुक्त किया था। उन्होंने पहले स्वयं इराक़ से मिस्र तक और शाम (सीरिया) व फ़लस्तीन से अरब-रेगिस्तान के विभिन्न भागों तक वर्षों गश्त लगाकर अल्लाह की बंदगी और आज्ञापालन (अर्थात् इस्लाम) की ओर लोगों को बुलाया। फिर अपने इस मिशन के प्रचार के लिए विभिन्न क्षेत्रों में खलीफ़ा (प्रतिनिधि) नियुक्त किए। पूर्वीय जार्डन में अपने भतीजे हज़रत लूत (अलै०) को, शाम व फ़लस्तीन में अपने बेटे हज़रत इसहाक़ (अलै०) को और अरब के भीतरी भाग में अपने बड़े बेटे हज़रत इसमाईल (अलै०) को तैनात किया। फिर अल्लाह के हुक्म से मक्का में उस घर का निर्माण किया जिसका नाम काबा है और अल्लाह ही के हुक्म से वह इस मिशन का केन्द्र कहलाया। (2) हज़रत इबराहीम (अलै.) की नस्ल से दो बड़ी शाखाएँ निकलीं-एक, हज़रत इसमाईल (अलै.) की औलाद जो अरब में रही, दूसरे हज़रत इसहाक़ (अलै.) की औलाद जो बनी इसराईल के नाम से मशहूर हुई । इसी शाखा में जब पस्ती और गिरावट का युग आया, तो पहले यहूदी मत पैदा हुआ और फिर ईसाई मत ने जन्म लिया। (3) हज़रत इबराहीम (अलै०) का असल काम दुनिया को अल्लाह के आज्ञापालन की ओर बुलाना और अल्लाह की ओर से आई हुई हिदायत के अनुसार इंसानों के व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन की व्यवस्था को ठीक करना था। यही सेवा थी जिसके लिए वे दुनिया के इमाम व पेशवा बनाए गए थे। उनके बाद नेतृत्व और सरदारी का यह पद उनकी नस्ल की उस शाखा को मिला जो हज़रत इसहाक़ (अलै०) और हज़रत याकूब (अलै.) से चली और बनी इसराईल कहलाई। इसी में नबी पैदा होते रहे, इसी को सीधे रास्ते का ज्ञान दिया गया। इसी के सुपुर्द यह सेवा की गई कि इस सीधे रास्ते की ओर दुनिया की क़ौमों का मार्गदर्शन करे और यही वह नेमत थी जिसे अल्लाह तआला बार-बार इस नस्ल के लोगों को याद दिला रहा है। इस शाखा ने हज़रत सुलैमान के ज़माने में बैतुल मक्दिस को अपना केन्द्र बनाया, इसलिए जब तक यह शाखा नेतृत्व और सरदारी के पद पर कायम रही, बैतुल मक्दिस ही अल्लाह की ओर बुलाने का केन्द्र और खुदापरस्तों का क़िबला रहा। (4) क़ुरआन की इस सूरा के पिछले दस रुकूओं में अल्लाह ने बनी इसराईल को संबोधित करके उनके अपराधों की ऐतिहासिक चार्जशीट और उनकी वह वर्तमान परिस्थिति, जो कुरआन उतरते समय थी, ज्यों की त्यों प्रस्तुत कर दी है और उनको बता दिया है कि तुम हमारी उस नेमत की बड़ी ही नाक़द्री कर चुके हो जो हमने तुम्हें दी थी। तुमने सिर्फ यही नहीं किया कि नेतृत्व और सरदारी के पद का हक़ अदा करना छोड़ दिया, बल्कि स्वयं भी सत्य और सच्चाई से फिर गए, और अब बहुत ही थोड़े भले लोगों के सिवा तुम्हारी पूरी उम्मत में कोई योग्यता शेष नहीं रही है। (5) इसके बाद अब उन्हें बताया जा रहा है कि नेतृत्व कोई ऐसी मीरास नहीं है जो हज़रत इबराहीम (अलै०) से खूनी रिश्ता होने की वजह से स्वतः हासिल हो जाए, बल्कि यह सच्ची बंदगी और आज्ञापालन का फल है। चूँकि तुम अपने कर्तव्य को न पहचानने और सत्य को भुला देने के कारण इस पद का के अधिकार पूरी तरह खो चुके हो, इसलिए अब तुम्हें इस पद से हटाया जाता है। (6) साथ ही इशारों-इशारों में यह भी बता दिया जाता है कि जो गैर-इसराईली क़ौमें मूसा और ईसा (अलै.) के वास्ते से हज़रत इबराहीम (अलै०) के साथ अपना संबंध जोड़ती हैं, वे भी सब-की-सब इबराहीमी तरीके से पूरी तरह हटी हुई हैं, साथ ही अरब के मुशरिक भी, जो इबराहीम और इसमाईल (अलै०) से अपने संबंध पर गर्व करते हैं, मात्र वंश और गोत्र के गर्व को लिए बैठे हैं, वरना इबराहीम व गु इसमाईल (अलै.) के तरीके से अब उनको दूर का वास्ता भी नहीं रहा है, इसलिए इनमें से भी कोई नेतृत्व के पद का अधिकारी नहीं है। (7) फिर यह बात कही जाती है कि अब हमने इबराहीम की दूसरी शाखा बनी इसमाईल में वह रसूल पैदा किया है जिसके लिए इबराहीम और इसमाईल ने दुआ की थी। इसका तरीका वही है, जो इबराहीम, इसमाईल, इसहाक़, याकूब और दूसरे तमाम नबियों (अलै.) का था, इसलिए अब नेतृत्व और सरदारी के (8) नेतृत्व परिवर्तन की घोषणा होने के साथ ही स्वाभाविक रूप से किबले के परिवर्तन की घोषणा भी होनी ज़रूरी थी। जब तक बनी इसराईल के नेतृत्व का दौर था, बैतुल मक्दिस दावत का केन्द्र रहा और वही सत्य के अनुयायियों का किबला भी रहा। खुद नबी (सल्ल.) और आपकी पैरवी करनेवाले भी उस समय तक बैतुल मक्दिस ही को किबला बनाए रहे, मगर जब बनी इसराईल इस पद से विधिवत रूप से हटा दिए गए, तो बैतुल मक्दिस को केन्द्रीयता अपने आप समाप्त हो गई । इसलिए यह घोषणा की गई कि अब वह स्थान अल्लाह के दोन (धर्म) का केन्द्र है, जहाँ से इस रसूल की दावत प्रकट हुई है। और चूंकि शुरू में इबराहीम (अलै०) को दावत का केन्द्र भी यही जगह थी, इसलिए अहले किताब और मुशरिक, किसी के लिए भी यह मान लेने के सिवा कोई रास्ता नहीं है कि किबला होने का ज़्यादा हक़ काबा ही को पहुंचता है। हठधर्मों की बात दूसरी है कि वे सत्य को सत्य जानते हुए भी आपत्ति किए चले जाएँ। (9) मुहम्मद (सल्ल.) के यथार्थ अनुयायियों के धार्मिक नेतृत्व और काबा की केन्द्रीयता की घोषणा करने के बाद ही अल्लाह ने इस सूरा के रुकूअ इक्कीस (आयत 153) से लेकर सूरा के अंत तक लगातार इस समुदाय को वे हिदायतें दी हैं, जिनपर उसे अमल करना चाहिए।
وَٱتَّقُواْ يَوۡمٗا لَّا تَجۡزِي نَفۡسٌ عَن نَّفۡسٖ شَيۡـٔٗا وَلَا يُقۡبَلُ مِنۡهَا عَدۡلٞ وَلَا تَنفَعُهَا شَفَٰعَةٞ وَلَا هُمۡ يُنصَرُونَ ۝ 122
(123) और डरो उस दिन से, जब कोई किसी के तनिक काम न आएगा, न किसी से फ़िदया (प्रतिदान) क़बूल किया जाएगा, न कोई सिफारिश ही आदमी को लाभ पहुँचा सकेगी और न अपराधियों को कहीं से कोई मदद पहुँच सकेगी।
۞وَإِذِ ٱبۡتَلَىٰٓ إِبۡرَٰهِـۧمَ رَبُّهُۥ بِكَلِمَٰتٖ فَأَتَمَّهُنَّۖ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامٗاۖ قَالَ وَمِن ذُرِّيَّتِيۖ قَالَ لَا يَنَالُ عَهۡدِي ٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 123
(124) याद करो कि जब इबराहीम को उसके रब ने कुछ बातों में आज़माया124 और वह उन सब में पूरा उतर गया, तो उसने कहा : "मैं तुझे सब लोगों का पेशवा बनानेवाला हूँ।" इबराहीम ने कहा : ''और क्‍या मेरी औलाद से भी यही वादा है?'' उसने जवाब दिया, ''मेरा वादा ज़ालिमों के लिए नहीं है।"125
124.कुरआन में विभिन्न स्थानों पर उन तमाम कड़ी आज़माइशों का विवरण आया है, जिनसे गुज़रकर हज़रत इबराहीम ने अपने आपको इस बात के योग्य सिद्ध किया था कि उन्हें मानवजाति का इमाम व रहनुमा बनाया जाए। जिस समय से सत्य उनपर उद्घाटित हुआ, उस समय से लेकर मरते दम तक उनका पूरा जीवन साक्षात त्याग-ही-त्याग था। दुनिया में जितनी चीजें ऐसी हैं जिनसे इंसान मुहब्बत करता है, उनमें से कोई चीज़ ऐसी न थी जिसको हज़रत इबराहीम ने सत्य के लिए क़ुरबान न किया हो और दुनिया में जितने खतरे ऐसे हैं जिनसे आदमी डरता है उनमें से कोई खतरा ऐसा न था जिसे उन्होंने सत्य के रास्ते में न झेला हो।
125.अर्थात् यह वादा तुम्हारी सन्तान के केवल उस भाग से संबंधित है जो नेक और भला हो। इनमें से जो ज़ालिम होंगे, उनके लिए यह वादा नहीं है। यहाँ ज़ालिम से तात्पर्य केवल इंसानों पर ही जुल्म करनेवाला नहीं है, बल्कि सत्य और सच्चाई पर जुल्म करनेवाला भी है।
وَإِذۡ جَعَلۡنَا ٱلۡبَيۡتَ مَثَابَةٗ لِّلنَّاسِ وَأَمۡنٗا وَٱتَّخِذُواْ مِن مَّقَامِ إِبۡرَٰهِـۧمَ مُصَلّٗىۖ وَعَهِدۡنَآ إِلَىٰٓ إِبۡرَٰهِـۧمَ وَإِسۡمَٰعِيلَ أَن طَهِّرَا بَيۡتِيَ لِلطَّآئِفِينَ وَٱلۡعَٰكِفِينَ وَٱلرُّكَّعِ ٱلسُّجُودِ ۝ 124
(125) और यह कि हमने इस घर (काबे) को लोगों के लिए केन्द्र और शान्ति-स्थल ठहराया था अधिकारी केवल वे लोग हैं जो इस रसूल की पैरवी करें। और लोगों को आदेश दिया था कि इबराहीम जहाँ इबादत के लिए खड़ा होता है उस जगह को स्थाई रूप से नमाज़ की जगह बना लो, और इबराहीम और इसमाईल को ताकीद की थी कि मेरे इस घर को तवाफ़ (परिक्रमा) और एतिकाफ़ और रुकूअ और सजदा करनेवालों के लिए पाक रखो।126
126.पाक रखने का तात्पर्य केवल यही नहीं है कि कूड़े-करकट से उसे पाक रखा जाए। खुदा के घर की असल पाकी यह है कि उसमें खुदा के किसी का नाम न लिया जाए। जिसने ख़ुदा के घर में खुदा के सिवा किसी दूसरे को स्वामी, उपास्य, ज़रूरतें पूरी करनेवाला और फ़रियाद सुननेवाले की हैसियत से पुकारा, उसने वास्तव में उसे गन्दा कर दिया। यह आयत बड़ी सूक्ष्म शैली से कुरैश के मुशरिकों के अपराध की ओर इशारा कर रही है कि ये ज़ालिम लोग इबराहीम और इसमाईल (अलै०) के वारिस होने पर गर्व तो करते हैं, मगर विरासत का हक़ अदा करने के बजाए उलटा उस हक़ को कुचल रहे हैं। इसलिए जो वादा इबराहीम (अलै.) से किया गया था, उससे जिस तरह बनी इसराईल अलग हो गए हैं उसी तरह ये मुशरिक बनी इसराईल भी उससे दूर हैं।
وَإِذۡ قَالَ إِبۡرَٰهِـۧمُ رَبِّ ٱجۡعَلۡ هَٰذَا بَلَدًا ءَامِنٗا وَٱرۡزُقۡ أَهۡلَهُۥ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ مَنۡ ءَامَنَ مِنۡهُم بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۚ قَالَ وَمَن كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُۥ قَلِيلٗا ثُمَّ أَضۡطَرُّهُۥٓ إِلَىٰ عَذَابِ ٱلنَّارِۖ وَبِئۡسَ ٱلۡمَصِيرُ ۝ 125
(126) और यह कि इबराहीम ने दुआ की : “ऐ मेरे रब ! इस नगर को शान्ति का नगर बना दे और इसके रहनेवालों में से जो अल्लाह और आखिरत को मानें, उन्हें हर प्रकार के फलों की रोज़ी दे।" जवाब में उसके रब ने फ़रमाया “और जो न मानेगा, दुनिया की कुछ दिनों वाली ज़िन्दगी का सामान तो मैं उसे भी दूँगा,127 मगर आखिरकार उसे जहन्नम के अज़ाब की ओर घसीटूंगा, और वह सबसे बुरा ठिकाना है।"
127.हज़रत इबराहीम (अलै०) ने जब नेतृत्व और सरदारी के पद के बारे में पूछा था, तो कहा गया था कि इस पद का वादा तुम्हारी औलाद के सिर्फ़ ईमानवालों और नेक लोगों के लिए है, ज़ालिम इससे अलग हैं। इसके बाद जब हज़रत इबराहीम (अलै०) रोज़ी के लिए दुआ करने लगे, तो पिछले आदेश को दृष्टि में रखकर उन्होंने सिर्फ अपनी मोमिन औलाद ही के लिए दुआ की, मगर अल्लाह ने जवाब में इस भ्रम को तुरन्त दूर कर दिया और उन्हें बताया कि भली इमामत (सरदारी) और चीज़ है और दुनिया को रोज़ी दूसरी चीज़ । भली इमामत सिर्फ नेक ईमानवालों को मिलेगी, किन्तु दुनिया की रोज़ी खुदा को माननेवालों और न माननेवालों सबको दी जाएगी। इससे यह बात अपने आप निकल आई कि अगर किसी को दुनिया को रोज़ी बहुत ज़्यादा मिल रही हो, तो वह इस भ्रम में न रहे कि अल्लाह उससे राज़ी भी है और वही अल्लाह की ओर से पेशवा बनने का अधिकारी भी है।
وَإِذۡ يَرۡفَعُ إِبۡرَٰهِـۧمُ ٱلۡقَوَاعِدَ مِنَ ٱلۡبَيۡتِ وَإِسۡمَٰعِيلُ رَبَّنَا تَقَبَّلۡ مِنَّآۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡعَلِيمُ ۝ 126
(127) और याद करो इबराहीम और इसमाईल जब उस घर की दीवारें उठा रहे थे, तो दुआ करते जाते थे : “ऐ हमारे रब ! हमसे यह सेवा कबूल कर ले, तू सबकी सुननेवाला और सब कुछ जाननेवाला है।
رَبَّنَا وَٱجۡعَلۡنَا مُسۡلِمَيۡنِ لَكَ وَمِن ذُرِّيَّتِنَآ أُمَّةٗ مُّسۡلِمَةٗ لَّكَ وَأَرِنَا مَنَاسِكَنَا وَتُبۡ عَلَيۡنَآۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ۝ 127
(128) ऐ रब ! हम दोनों को अपना मुस्लिम (आज्ञाकारी) बना, हमारी नस्ल से एक ऐसी कौम उठा जो तेरी मुस्लिम हो, हमें अपनी इबादत के तरीके बता और हमारी कोताहियों को क्षमा कर, तू बड़ा क्षमा करनेवाला और दया करनेवाला है।
رَبَّنَا وَٱبۡعَثۡ فِيهِمۡ رَسُولٗا مِّنۡهُمۡ يَتۡلُواْ عَلَيۡهِمۡ ءَايَٰتِكَ وَيُعَلِّمُهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ وَٱلۡحِكۡمَةَ وَيُزَكِّيهِمۡۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡحَكِيمُ ۝ 128
(129) और ऐ रब ! उन लोगों में खुद उन्हीं की कौम में से एक रसूल उठाइयो, जो उन्हें तेरी आयते सुनाए, उनको किताब और हिकमत (तत्त्वदर्शिता) की शिक्षा दे और उनकी जिन्दगियाँ सँवारे ।128 तू बड़ा प्रभुत्वशाली और तत्त्वदर्शी है।129
128.ज़िन्दगी संवारने में विचार, चरित्र, आदत, रहन-सहन, सभ्यता, राजनीति, तात्पर्य यह कि हर चीज़ को सँवारना शामिल है।
129.इससे यह बताना अभिप्रेत है कि मुहम्मद (सल्ल.) का प्रकट होना वास्तव में हज़रत इबराहीम (अलै०) की दुआ का जवाब है।
وَمَن يَرۡغَبُ عَن مِّلَّةِ إِبۡرَٰهِـۧمَ إِلَّا مَن سَفِهَ نَفۡسَهُۥۚ وَلَقَدِ ٱصۡطَفَيۡنَٰهُ فِي ٱلدُّنۡيَاۖ وَإِنَّهُۥ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ ۝ 129
(130) अब कौन है, जो इबराहीम के तरीके से नफ़रत करे? जिसने स्वयं अपने-आपको मूर्खता और अज्ञानता में ग्रस्त कर लिया हो उसके सिवा कौन यह हरकत कर सकता है? इबराहीम तो वह व्यक्ति है जिसको हमने दुनिया में अपने काम के लिए चुन लिया था और आख़िरत में उसकी गिनती भले लोगों में होगी।
إِذۡ قَالَ لَهُۥ رَبُّهُۥٓ أَسۡلِمۡۖ قَالَ أَسۡلَمۡتُ لِرَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ ۝ 130
(131) उसका हाल यह था कि जब उसके रब ने उससे कहा : “मुस्लिम हो जा"130, तो उसने तुरन्त कहा : “मैं सृष्टि के स्वामी का 'मुस्लिम' (आज्ञाकारी) हो गया।"
130.मुस्लिम : वह जो खुदा के आगे सर झुका दे, खुदा ही को अपना मालिक, स्वामी, शासक और उपास्य मान ले, जो अपने आपको पूरे तौर पर खुदा के सुपुर्द कर दे और उस हिदायत (मार्गदर्शन) के अनुसार दुनिया में ज़िन्दगी बसर करे, जो खुदा की ओर से आई हो। इस धारणा और इस नीति का नाम 'इस्लाम' है और यही तमाम नबियों का दीन (धर्म) था जो शुरू दिन से दुनिया के विभिन्न देशों और क़ौमों में आए।
وَوَصَّىٰ بِهَآ إِبۡرَٰهِـۧمُ بَنِيهِ وَيَعۡقُوبُ يَٰبَنِيَّ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصۡطَفَىٰ لَكُمُ ٱلدِّينَ فَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسۡلِمُونَ ۝ 131
(132) इसी तरीके पर चलने की हिदायत उसने अपनी औलाद को की थी और इसी की वसीयत याकूब131 अपनी औलाद को कर गया था। उसने कहा था कि “मेरे बच्चो, अल्लाह ने तुम्हारे लिए यही दीन (धर्म)132 पसन्द किया है, इसलिए मरते दम तक आज्ञाकारी ही रहना।”
131.हज़रत याकूब (अलै.) का उल्लेख मुख्य रूप से इसलिए किया कि बनी इसराईल सीधे उन्हीं की औलाद थे।
132.दीन (धर्म) अर्थात् जीवन-पद्धति, जीवन-व्यवस्था, वह क़ानून, जिसपर इंसान दुनिया में अपने विचार पद्धति और कार्य-प्रणाली की नींव रखे।
أَمۡ كُنتُمۡ شُهَدَآءَ إِذۡ حَضَرَ يَعۡقُوبَ ٱلۡمَوۡتُ إِذۡ قَالَ لِبَنِيهِ مَا تَعۡبُدُونَ مِنۢ بَعۡدِيۖ قَالُواْ نَعۡبُدُ إِلَٰهَكَ وَإِلَٰهَ ءَابَآئِكَ إِبۡرَٰهِـۧمَ وَإِسۡمَٰعِيلَ وَإِسۡحَٰقَ إِلَٰهٗا وَٰحِدٗا وَنَحۡنُ لَهُۥ مُسۡلِمُونَ ۝ 132
(133) फिर क्या तुम उस समय मौजूद थे जब याकूब इस संसार से विदा हो रहा था ? उसने मरते समय अपने बेटों से पूछा : “बच्चो ! मेरे बाद तुम किसकी बन्दगी करोगे?" उन सबने उत्तर दिया : "हम उसी एक खुदा की बन्दगी करेंगे जिसे आपने और आपके बुजुर्गों-इबराहीम, इसमाईल और इसहाक़ ने खुदा माना है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं।133
133.बाइबल में हज़रत याकूब (अलै०) की मृत्यु का हाल बड़े विस्तार से लिखा गया है, किन्तु आश्चर्य है कि इस वसीयत का कोई उल्लेख नहीं है, अलबत्ता तलमूद में जो विस्तृत वसीयत लिखी हुई है, उसका विषय कुरआन के बयान से बहुत मिलता-जुलता है। उसमें हज़रत याकूब (अलैहिस्सलाम)के ये शब्द हमें मिलते हैं-- "खुदावन्द, अपने ख़ुदा की बन्दगी करते रहना, वह तुम्हें उसी तरह तमाम आफ़तों से बचाएगा, जिस तरह तुम्हारे बाप-दादा को बचाता रहा है.....अपने बच्चों को ख़ुदा से मुहब्बत करने और उसके आदेश का पालन करने की शिक्षा देना, ताकि उनकी ज़िन्दगी की मोहलत लम्बी हो.....।" जवाब में उनके लड़कों ने कहा : "जो कुछ आपने निर्देश दिया है, हम उसके अनुसार काम करेंगे। खुदा हमारे साथ हो।" तब याकूब (अलै०) ने कहा : “अगर तुम खुदा की सीधी राह से दाएं-बाएँ न मुड़ोगे, तो खुदा ज़रूर तुम्हारे साथ रहेगा।"
تِلۡكَ أُمَّةٞ قَدۡ خَلَتۡۖ لَهَا مَا كَسَبَتۡ وَلَكُم مَّا كَسَبۡتُمۡۖ وَلَا تُسۡـَٔلُونَ عَمَّا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ۝ 133
(134) वे कुछ लोग थे, जो गुज़र गए। जो उन्होंने कमाया, वह उनके लिए है और जो कुछ तुम कमाओगे, वह तुम्हारे लिए है। तुमसे यह न पूछा जाएगा कि वे क्या करते थे ?134
134.अर्थात् यद्यपि तुम उनकी औलाद सही, किन्तु वास्तव में तुम्हें उनसे कोई वास्ता नहीं । उनका नाम लेने का तुम्हें क्या अधिकार है, जबकि तुम उनके तरीके से फिर गए। अल्लाह के यहाँ तुमसे यह नहीं पूछा जाएगा कि तुम्हारे बाप-दादा क्या करते थे, बल्कि यह पूछा जाएगा कि तुम स्वयं क्या करते रहे । और यह जो फ़रमाया कि "जो कुछ उन्होंने कमाया, वह उनके लिए है और जो कुछ तुम कमाओगे, वह तुम्हारे लिए है", यह कुरआन की विशेष वर्णन-शैली है। हम जिस चीज़ को कर्म या अमल कहते हैं, कुरआन अपनी भाषा में उसे कसब या कमाई कहता है। हमारा हर काम अपना एक अच्छा या बुरा नतीजा रखता है, जो अल्लाह की खुशी या नाराज़ी के रूप में सामने आएगा। वहीं नतीजा हमारी कमाई है। चूंकि कुरआन की निगाह में वास्तविक महत्व उसी नतीजे का है, इसलिए अकसर वह हमारे कामों को कर्म और काम शब्दों से व्यक्त करने के बजाए 'कसब' (कमाई) के शब्द से व्यक्त करता है।
وَقَالُواْ كُونُواْ هُودًا أَوۡ نَصَٰرَىٰ تَهۡتَدُواْۗ قُلۡ بَلۡ مِلَّةَ إِبۡرَٰهِـۧمَ حَنِيفٗاۖ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ۝ 134
(135) यहूदी कहते हैं : यहूदी हो, तो सीधा मार्ग पाओगे। ईसाई कहते हैं : ईसाई हो, तो हिदायत मिलेगी। इनसे कहो, “नहीं, बल्कि सबको छोड़कर इबराहीम का तरीक़ा। और इबराहीम मुशरिकों में से न था।“135
135.इस उत्तर की सूक्ष्मता समझने के लिए दो बातें दृष्टि में रखिए: एक यह कि यहूदी मत और ईसाई मत दोनों बाद की पैदावार हैं। यहूदी मत अपने इस नाम और अपनी धार्मिक विशेषताओं और रस्म-रिवाजों के साथ तीसरी चौथी सदी ईसा पूर्व में पैदा हुआ और ईसाई मंत जिन धारणाओं और प्रमुख धार्मिक विचारों के योग का नाम है, वह तो हज़रत मसीह (अलै०) के भी एक मुद्दत बाद अस्तित्व में आया है। अब यह प्रश्न स्वत: पैदा होता है कि अगर आदमी के हिदायत पर होने का आश्रय यहूदी मत या ईसाई मत के अपनाने पर ही है, तो हज़स्त इबराहीम (अलै०), दूसरे नबी और नेक लोग जो इन मतों के जन्म से सदियों पहले पैदा हुए थे और उनको खुद यहूदी और ईसाई भी हिदायत पाया हुआ मानते हैं, वे आख़िर किस चीज़ से हिदायत पाते थे? स्पष्ट है कि वह यहूदी मत और ईसाई मत न था, इसलिए यह बात आप-से-आप स्पष्ट हो गई कि इंसान के हिदायत पाने का आश्रय उन धार्मिक विशेषताओं पर नहीं है, जिनकी वजह से ये ईसाई और यहूदी आदि विभिन्न सम्प्रदाय बने हैं, बल्कि वास्तव में इसका आश्रय उस विश्वव्यापी सन्मार्ग के अपनाने पर है, जिससे हर ज़माने में इंसान हिदायत पाते रहे हैं [न कि यहूदी और ईसाई मत पर)। दूसरे यह कि खुद यहूदियों और ईसाइयों के अपने पवित्र ग्रंथ इस बात पर गवाह हैं कि हज़रत इबराहीम एक अल्लाह के सिवा किसी दूसरे की पूजा, बन्दगी और आज्ञापालन के कायल न थे, इसलिए यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यहूदी मत और ईसाई मत दोनों उस सीधे रास्ते से हट गए हैं, जिसपर हज़रत इबराहीम (अलै०) चलते थे, क्योंकि इन दोनों में शिर्क को मिलावट हो गई है।
قُولُوٓاْ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيۡنَا وَمَآ أُنزِلَ إِلَىٰٓ إِبۡرَٰهِـۧمَ وَإِسۡمَٰعِيلَ وَإِسۡحَٰقَ وَيَعۡقُوبَ وَٱلۡأَسۡبَاطِ وَمَآ أُوتِيَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَمَآ أُوتِيَ ٱلنَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمۡ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّنۡهُمۡ وَنَحۡنُ لَهُۥ مُسۡلِمُونَ ۝ 135
(136) मुसलमानो ! कहो, “हम ईमान लाए अल्लाह पर और उस हिदायत पर जो हमारी ओर उतारी गई है और जो इबराहीम, इसमाईल, इसहाक, याकूब, और याकूब की औलाद की ओर उतारी गई थी और जो मूसा और ईसा और दूसरे तमाम पैग़म्बरों को उनके रब की ओर से, दी गई थी। हम उनके बीच कोई अंतर नहीं करते136, और हम अल्लाह के मुस्लिम (आज्ञापालक) हैं।"
136.पैगम्बरों के बीच अंतर न करने का अर्थ यह है कि हम उनके बीच इस दृष्टि से अंतर नहीं करते कि अमुक सत्य पर था और अमुवः सत्य पर न था, या यह कि हम अमुक को मानते हैं या अमुक को नहीं मानते । स्पष्ट है कि खुदा की ओर से जितने भी पैग़म्बर आए हैं,सब के सब एक ही सच्चाई और एक ही सन्मार्ग की ओर बुलाने आए हैं, इसलिए जो आदमी सही अर्थों में सत्यवादी है, उसके लिए तमाम पैग़म्बरों को सत्य पर माने बिना कोई रास्ता नहीं। जो लोग किसी पैग़म्बर को मानते और किसी का इनकार करते हैं, वे वास्तव में उस पैग़म्बर के भी अनुयायी नहीं हैं, जिसे वे मानते हैं। क्योंकि उन्होंने वास्तव में उस विश्वव्यापी सन्मार्ग को नहीं पाया है, जिसे हज़रत मूसा या ईसा (अलै०) या किसी दूसरे पैग़म्बर ने प्रस्तुत किया था, बल्कि वे केवल बाप-दादा की अनुकरण में एक पैग़म्बर को मान रहे हैं। उनका वास्तविक धर्म वंशवाद संबंधी पक्षपात और बाप-दादा का अंधानुकरण है, न कि किसी पैग़म्बर को पैरवी।
فَإِنۡ ءَامَنُواْ بِمِثۡلِ مَآ ءَامَنتُم بِهِۦ فَقَدِ ٱهۡتَدَواْۖ وَّإِن تَوَلَّوۡاْ فَإِنَّمَا هُمۡ فِي شِقَاقٖۖ فَسَيَكۡفِيكَهُمُ ٱللَّهُۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡعَلِيمُ ۝ 136
(137) फिर अगर वे उसी तरह ईमान लाएँ, जिस तरह तुम लाए हो, तो हिदायत पर हैं, और अगर इससे मुँह फेरें, तो खुली बात है कि वे हठधर्मी में पड़ गए हैं। इसलिए इत्मीनान रखो कि उनके मुकाबले में अल्लाह तुम्हारी सहायता के लिए काफ़ी है। वह सब कुछ सुनता और जानता है।
صِبۡغَةَ ٱللَّهِ وَمَنۡ أَحۡسَنُ مِنَ ٱللَّهِ صِبۡغَةٗۖ وَنَحۡنُ لَهُۥ عَٰبِدُونَ ۝ 137
(138) कहो : "अल्लाह के रंग में रंग जाओ।137 उसके रंग से अच्छा और किसका रंग होगा? और हम उसी की बन्दगी करनेवाले लोग हैं।"
137.इस आयत के दो अनुवाद हो सकते हैं। एक यह कि हमने अल्लाह का रंग अपना लिया. दूसरे यह कि -अलाह के रंग में रंग जाओ। ईसाई मत के प्रादुर्भाव से पहले यहूदियों के यहाँ यह रस्म थी कि जो आदमी उनके धर्म में दाखिल होता, उसे नहलाते थे और इस नहलाने का मतलब उनके यहाँ यह था कि मानो उसके गुनाह धुल गए और उसने ज़िन्दगी का एक नया रंग अपना लिया। यही चीज़ बाद में ईसाइयों ने अपना ली। इसको परिभाषा में वे बपतिस्मा कहते हैं और यह बपतिस्मा न केवल उन लोगों को दिया जाता है, जो उनके धर्म में दाखिल होते हैं, बल्कि बच्चों को भी दिया जाता है। इसी के बारे में कुरआन कहता है, इस रस्मी बपतिस्मा में क्या रखा है ? अल्लाह के रंग में रंग जाओ,जो किसी पानी से नहीं चढ़ता, बल्कि उसकी बन्दगी का तरीका अपनाने से चढ़ता है।
قُلۡ أَتُحَآجُّونَنَا فِي ٱللَّهِ وَهُوَ رَبُّنَا وَرَبُّكُمۡ وَلَنَآ أَعۡمَٰلُنَا وَلَكُمۡ أَعۡمَٰلُكُمۡ وَنَحۡنُ لَهُۥ مُخۡلِصُونَ ۝ 138
(139) ऐ नबी ! इनसे कहो : "क्या तुम अल्लाह के बारे में हमसे झगड़ते हो? हालाँकि वही हमारा रत्न भी है और तुम्हारा रब भी।138 हमारे कर्म हमारे लिए हैं, तुम्हारे कर्म तुम्हारे लिए, और हम अल्लाह ही के लिए अपनी बंदगी को खालिस कर चुके हैं।139
138.अर्थात् हम यही तो कहते हैं कि अल्लाह ही हम सबका रब है और उसी का आज्ञापालन होना चाहिए। क्या यह भी कोई ऐसी बात है कि इसपर तुम हमसे झगड़ा करो? झगड़े का अगर कोई मौका है भी, तो वह हमारे लिए है, न कि तुम्हारे लिए, क्योंकि अल्लाह के सिवा दूसरों को बन्दगी का अधिकारी तुम ठहरा रहे हो, न कि हम? 'अतुहाज्जून-ना फ़िल्लाहि' का एक अनुवाद यह भी हो सकता है कि 'क्या तुम्हारा झगड़ा हमारे साथ अल्लाह के मार्ग में है।' इस दशा में अर्थ यह होगा कि अगर वास्तव में तुम्हारा यह झगड़ा स्वार्थपरता पर नहीं है, बल्कि खुदा के वास्ते है, तो यह बड़ी आसानी से तय हो सकता है।
139.अर्थात् तुम अपने कर्मों के ज़िम्मेदार हो और हम अपने कर्मों के । तुमने अगर अपनी बन्दगी को बाँट रखा है और अल्लाह के साथ दूसरों को भी ख़ुदाई (ईश्वरत्व) में भागीदार बनाकर उनकी बन्दगी और उनका आज्ञापालन करते हो, तो तुम्हें ऐसा करने का अधिकार है, इसका अंजाम खुद देख लोगे। हम तुम्हें ज़बरदस्ती इससे रोकना नहीं चाहते। लेकिन हमने अपनी बन्दगी, इताअत (आज्ञापालन) को बिलकुल अल्लाह ही के लिए खालिस कर दिया है। अगर तुम मान लो कि हमें भी ऐसा करने का अधिकार है, तो खामखाह का यह झगड़ा आप ही ख़त्म हो जाए।
أَمۡ تَقُولُونَ إِنَّ إِبۡرَٰهِـۧمَ وَإِسۡمَٰعِيلَ وَإِسۡحَٰقَ وَيَعۡقُوبَ وَٱلۡأَسۡبَاطَ كَانُواْ هُودًا أَوۡ نَصَٰرَىٰۗ قُلۡ ءَأَنتُمۡ أَعۡلَمُ أَمِ ٱللَّهُۗ وَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّن كَتَمَ شَهَٰدَةً عِندَهُۥ مِنَ ٱللَّهِۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَٰفِلٍ عَمَّا تَعۡمَلُونَ ۝ 139
(140) या फिर क्या तुम्हारा कहना यह है कि इबराहीम, इसमाईल, इसहाक, याकूब और याकूब की औलाद सब के सब यहूदी धे या ईसाई थे? कहो : “तुम अधिक जानते हो या अल्लाह ?"140 उस व्यक्ति से बढ़कर ज़ालिम और कौन होगा, जिसके ज़िम्मे अल्लाह की ओर से एक गवाही हो और वह उसे छुपाए? तुम्हारी हरकतों से अल्लाह बेख़बर तो नहीं है।141
140.यह संबोधन यहूदियों और ईसाइयों के उन नासमझ लोगों से है जो वास्तव में अपने नज़दीक यह समझते थे कि ये महान नबी सब-के-सब यहूदी या ईसाई थे।
141.यह संबोधन उनके धर्माधिकारियों और विद्वानों से है, जो स्वयं भी इस सच्चाई को जानते थे कि यहूदी मत और ईसाई मत अपनी वर्तमान विशेषताओं के साथ बहुत बाद में पैदा हुए हैं, किन्तु इसके बावजूद वे सत्य को अपने ही सम्प्रदायों तक सीमित समझते थे और आम लोगों को इस भ्रम में डाले रखते थे कि नबियों के मुद्दतों बाद जो धारणाएँ, जो तरीके और जो नए कायदे कानून उनके धर्मशास्त्रियों, सूफ़ियों और दार्शनिकों ने गढ़े और बनाए, उन्हीं की पैरवी पर इंसान की सफलता और मुक्ति आश्रित है। उन विद्वानों से जब पूछा जाता था कि अगर यही बात है, तो हज़रत इबराहीम, इसहाक़, याकूब आदि नबी (अलैहित) आखिर तुम्हारे इन सम्प्रदायों में से किससे संबंध रखते थे, तो वे इसका जवाब टाल जाते थे, क्योंकि वे यह तो कह नहीं सकते थे कि इन बुजुर्गों का संबंध हमारे ही सम्प्रदाय से था। [दूसरी तरफ़ वे वास्तविक सच्चाई को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी नहीं कर सकते थे। क्योंकि इस स्थिति में उनकी दलील की जड़ ही कट जाती थी।
تِلۡكَ أُمَّةٞ قَدۡ خَلَتۡۖ لَهَا مَا كَسَبَتۡ وَلَكُم مَّا كَسَبۡتُمۡۖ وَلَا تُسۡـَٔلُونَ عَمَّا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ۝ 140
(141)-वे कुछ लोग थे जो गुज़र चुके। उनकी कमाई उनके लिए थी और तुम्हारी कमाई तुम्हारे लिए, तुमसे उनके कर्मों के बारे में पूछा नहीं जाएगा।"
۞سَيَقُولُ ٱلسُّفَهَآءُ مِنَ ٱلنَّاسِ مَا وَلَّىٰهُمۡ عَن قِبۡلَتِهِمُ ٱلَّتِي كَانُواْ عَلَيۡهَاۚ قُل لِّلَّهِ ٱلۡمَشۡرِقُ وَٱلۡمَغۡرِبُۚ يَهۡدِي مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٖ ۝ 141
(142) नादान लोग जरूर कहेंगे : “इन्हें क्या हुआ कि पहले ये जिस किबले (उपासना-दिशा) की ओर चेहरा करके नमाज़ पढ़ते थे, उससे एकाएक फिर गए?142 ऐ नबी ! इनसे कहो, “पूरब और पश्चिम सब अल्लाह के हैं। अल्लाह जिसे चाहता है, सीधा मार्ग दिखा देता है ।“143
142.नबी (सल्ल.) हिजरत के बाद मदीना तैयबा में सोलह या सत्तरह महीने तक बैतुल-मक्दिस की ओर रुख़ करके नमाज़ पढ़ते रहे, फिर काबे की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ने का आदेश आया, जिसका विस्तृत वर्णन आगे आता है।
143.यह उन नादानों की आपत्ति का पहला जवाब है। उनके दिमाग़ तंग थे, नज़र सीमित थी। वे दिशा और जगह के दास बने हुए थे। उनका गुमान यह था कि खुदा किसी विशेष दिशा में बंदी है, इसलिए सबसे पहले उनको अज्ञानतापूर्ण आपत्तियों को रद्द करने में यही कहा गया कि पूरब और पश्चिम सब अल्लाह के हैं। किसी दिशा को क़िब्ला बनाने का अर्थ यह नहीं है कि अल्लाह उसी ओर है। जिन लोगों को अल्लाह ने सन्मार्ग दिखाया है, वे इस किस्म की संकीर्णताओं से बहुत ऊँचे होते हैं । (देखिए टिप्पणी न० 115,116)
وَكَذَٰلِكَ جَعَلۡنَٰكُمۡ أُمَّةٗ وَسَطٗا لِّتَكُونُواْ شُهَدَآءَ عَلَى ٱلنَّاسِ وَيَكُونَ ٱلرَّسُولُ عَلَيۡكُمۡ شَهِيدٗاۗ وَمَا جَعَلۡنَا ٱلۡقِبۡلَةَ ٱلَّتِي كُنتَ عَلَيۡهَآ إِلَّا لِنَعۡلَمَ مَن يَتَّبِعُ ٱلرَّسُولَ مِمَّن يَنقَلِبُ عَلَىٰ عَقِبَيۡهِۚ وَإِن كَانَتۡ لَكَبِيرَةً إِلَّا عَلَى ٱلَّذِينَ هَدَى ٱللَّهُۗ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُضِيعَ إِيمَٰنَكُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِٱلنَّاسِ لَرَءُوفٞ رَّحِيمٞ ۝ 142
(143) और इसी तरह तो हमने तुम (मुसलमानों) को एक 'उम्मते वसत' (उत्तम समुदाय) बनाया है, ताकि तुम दुनिया के लोगों पर गवाह हो और रसूल तुमपर गवाह हो । 144 पहले जिस ओर तुम रुख़ करते थे, उसको तो हमने सिर्फ यह देखने के लिए क़िबला निर्धारित किया था कि कौन रसूल की पैरवी करता है और कौन उलटा फिर जाता है।145 यह मामला था तो बड़ा कठोर, लेकिन उन लोगों के लिए कुछ भी कठोर सिद्ध न हुआ, जो अल्लाह को हिदायत पाए हुए थे। अल्लाह तुम्हारे इस ईमान को कदापि अकारथ न करेगा, विश्वास रखो कि वह लोगों के लिए बहुत मेहरबान और दयावान है।
144.यह मुहम्मद (सल्ल.) की उम्मत को इमामत (नेतृत्व) का एलान है। इसी तरह का संकेत दोनों ओर है : अल्लाह की उस रहनुमाई की ओर भी, जिससे मुहम्मद (सल्ल.) की पैरवी अपनानेवालों को सोधो राह मालूम हुई और वे 'उम्मते वसत' करार दिए गए और किब्ले के परिवर्तन को ओर भी, जो वास्तव में यह अर्थ रखता है कि अल्लाह ने बनी इसराईल को दुनिया के नेतृत्व के पद से विधिवत हटाया और मुहम्मद (सल्ल.) की उम्मत को उसपर ला बिठाया। 'उम्‍मते वसत' से अभिप्रेत एक ऐसे उत्त्व और उत्तम गिरोह से है, जो न्याय और इनसाफ़ और मध्यम मार्ग का अनुयायी हो, जिसे दुनिया की कौमों के बीच प्रधानता प्राप्त हो, जिसका संबंध सबके साथ समान अधिकार और सच्चाई का संबंध हो और अनुचित और नामुनासिब ताल्लुक किसी से न हो। फिर यह जो कहा कि तुम्हें उम्मने वसत' इसलिए बनाया गया है कि "तुम लोगों पर गवाह हो और रसूल तुमपर गवाह हो" तो इससे तात्पर्य यह है कि आखिरत (परलोक) में जब पूरी मानवजाति का इकट्ठा हिसाब लिया जाएगा, उस समय रसूल हमारे ज़िम्मेदार नुमाइन्दे की हैसियत से तुमपर गवाही देगा कि सही चिंतन, अच्छे कर्म और न्यायिक व्यवस्था को जो शिक्षा हमने उसे दी थी, वह उसने तुम तक बिना कमी-बेशी के पूरी-की-पूरी पहुंचा दी और व्यावहारिक रूप में उसके अनुसार काम करके दिखा दिया। इसके बाद रसूल के स्थानापन्न होने को हैसियत से तुमको आम इंसानों पर गवाह की हैसियत से उठना होगा और यह गवाही देनी होगी कि रसूल ने जो कुछ तुम्हें पहुंचाया था, वह तुमने उन्हें पहुंचाने में और जो कुछ रसूल ने तुम्हें दिखाया था, वह तुमने उन्हें दिखाने में अपनी हद तक कोई कोताही नहीं की। इस तरह किसी आदमी या गिरोह का इस दुनिया में खुदा की ओर से गवाही के पद पर नियुक्त होना ही वास्तव में उसका नेतृत्व और पेशवाई पर पदासीन किया जाना है। इसमें जहाँ श्रेष्ठता और बड़ाई है, वहीं ज़िम्मेदारी का बहुत बड़ा बोझ भी है। इसका अर्थ यह है कि जिस तरह अल्लाह के रसूल (सल्ल.) इस उम्मत के लिए ईशपरायणता, सच्चाई, न्याय और सत्यवादिता को जिंदा गवाही बने, उसी तरह इस उम्मत को भी पूरी दुनिया के लिए ज़िंदा गवाही बनना चाहिए। फिर इसका अर्थ यह भी है कि जिस तरह ख़ुदा की हिदायत हम तक पहुँचाने के लिए अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की ज़िम्मेदारी बड़ी कठिन थी, यहाँ तक कि अगर वह इसमें तनिक भी कोताही करते तो खुदा के यहाँ पकड़े जाते, उसी तरह दुनिया के आम इंसानों तक इस हिदायत और मार्गदर्शन को पहुँचाने की अत्यंत कठिन ज़िम्मेदारी हमपर आ पड़ती है। अगर हमने इसमें कोई कोताही की, तो कल बहुत बुरी तरह पकड़े जाएंगे और यही नेतृत्व का अहं हमें वहाँ ले डूबेगा।
145.अर्थात् इसका उद्देश्य यह देखना था कि कौन लोग हैं जो अज्ञानता के पक्षपात में और खाक व खून की गुलामी में पड़े हुए हैं और कौन हैं जो इन बन्धनों से आजाद होकर सच्चाइयों को पा लेते हैं। एक ओर अरबवाले अपने देश और वंश के घमंड में पड़े हुए थे और अरब के काबा को छोड़कर बाहर के बैतुल मक्दिस को किबला बनाना उनकी इस जातिवाद के बुत पर असहनीय चोट थी, दूसरी ओर बनी इसराईल अपनी नस्लपरस्ती के घमंड में फंसे हुए थे और अपने बाप-दादा के क़िबले के सिवा किसी दूसरे क़िबले को सहन कर लेना उनके लिए कठिन था। स्पष्ट है कि ये बुत जिन लोगों के दिलों में बसे हुए हों, वे उस रास्ते पर कैसे चल सकते थे जिसकी ओर अल्लाह का रसूल (सल्ल.) उन्हें बुला रहा था, इसलिए अल्लाह ने इन बुतपरस्तों को निष्ठावान सत्यवादियों से अलग छाँट देने के लिए पहले बैतुल मक्दिस को किबला निर्धारित किया, ताकि जो लोग अरबवाद के बुत की पूजा करते हैं, वे अलग हो जाएँ, फिर इस किबले को छोड़कर काबा को किबला बनाया, ताकि जो इसराईलवाद के पुजारी हैं, वे भी अलग हो जाएँ। इस तरह केवल वे लोग रसूल के साथ रह गए, जो किसी बुत के पुजारी न थे, केवल खुदा के पुजारी थे।
قَدۡ نَرَىٰ تَقَلُّبَ وَجۡهِكَ فِي ٱلسَّمَآءِۖ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبۡلَةٗ تَرۡضَىٰهَاۚ فَوَلِّ وَجۡهَكَ شَطۡرَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِۚ وَحَيۡثُ مَا كُنتُمۡ فَوَلُّواْ وُجُوهَكُمۡ شَطۡرَهُۥۗ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ لَيَعۡلَمُونَ أَنَّهُ ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّهِمۡۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَٰفِلٍ عَمَّا يَعۡمَلُونَ ۝ 143
(144) ऐ नबी ! यह तुम्हारे मुँह का बार-बार आसमान की ओर उठना हम देख रहे हैं। लो, हम उसी किबले की ओर तुम्हें फेरे देते हैं जिसे तुम पसन्द करते हो। मस्जिदे हराम (प्रतिष्ठित मस्जिद) की ओर रुख फेर दो। अब जहाँ कहीं तुम हो, उसी की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ा करो।146 ये लोग, जिन्हें किताब दी गई थी, ख़ूब जानते हैं कि (क़िबला बदलने का) यह आदेश उनके रब ही की ओर से है और सत्य पर आधारित है, मगर इसके बावजूद जो कुछ ये कर रहे हैं, अल्लाह उससे बेखबर नहीं है।
146.यह है वह मूल आदेश जो किबला बदलने के बारे में दिया गया था, यह आदेश रजब या शाबान सन् 02 हि में उतरा । इने साद की रिवायत है कि नबी (सल्ल.) बिश्श बिन बरा बिन मारूर के यहाँ दावत पर गए हुए थे, वहाँ जुहर का वक़्त हो गया और आप लोगों को नमाज़ पढ़ाने खड़े हुए। दो रकअतें पढ़ा चुके थे कि तीसरी रक्अत में यकायक वह्य के ज़रिए से यह आयत उतरी और उसी समय आप और आपकी पैरवी में जमाअत के सभी लोग बैतुल मक्दिस से काबा के रुख फिर गए। इसके बाद मदीना और उसके चारों ओर इसकी आम घोषणा करा दी गई । बरा बिन आज़िब कहते हैं कि एक जगह घोषणा की आवाज़ इस हालत में पहुंची कि लोग रुकूअ में थे। आदेश सुनते ही सब-के-सब उसी हालत में काबा की ओर मुड़ गए और यह जो फरमाया कि “हम तुम्हारे मुँह का बार-बार आसमान की ओर उठना देख रहे हैं और यह कि हम उसी किबला की ओर तुम्हें फेरे देते हैं जिसे तुम पसन्द करते हो” इससे साफ़ मालूम होता है कि किबला बदलने का आदेश आने से पहले नबी (सल्ल.) इसके इन्तिज़ार में थे। आप खुद यह महसूस कर रहे थे कि बनी इसराईल को सरदारी का युग समाप्त हो चुका है और इसके साथ ही बैतुल मक्दिस की केन्द्रीय हैसियत भी ख़त्म हुई। अब वास्तविक इबराहीमी केन्द्र की ओर रुख करने का समय आ गया है। मस्जिदे हराम का अर्थ है प्रतिष्ठा और आदरवाली मस्जिद। इससे तात्पर्य वह इबातदगाह है, जिसके बीच में खाना काबा स्थित है।
وَلَئِنۡ أَتَيۡتَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ بِكُلِّ ءَايَةٖ مَّا تَبِعُواْ قِبۡلَتَكَۚ وَمَآ أَنتَ بِتَابِعٖ قِبۡلَتَهُمۡۚ وَمَا بَعۡضُهُم بِتَابِعٖ قِبۡلَةَ بَعۡضٖۚ وَلَئِنِ ٱتَّبَعۡتَ أَهۡوَآءَهُم مِّنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَكَ مِنَ ٱلۡعِلۡمِ إِنَّكَ إِذٗا لَّمِنَ ٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 144
(145) तुम इन अहले किताब के पास चाहे कोई निशानी ले आओ, संभव नहीं कि ये तुम्हारे क़िबले का अनुसरण करने लगें, और न तुम्हारे लिए यह संभव है कि उनके क़िबले का अनुसरण करो, और इनमें से कोई गिरोह भी दूसरे के क़िबले की पैरवी के लिए तैयार नहीं है, और अगर तुमने उस ज्ञान के बाद, जो तुम्हारे पास आ चुका है, उनकी इच्छाओं का पालन किया, तो निश्चय ही तुम्हारी गिनती ज़ालिमों में होगी।147
147.अर्थ यह है कि क़िबले के बारे में जो हुज्जत और बहस ये लोग करते हैं, उसका फैसला न तो इस तरह हो सकता है कि तर्क से उन्हें सन्तुष्ट कर दिया जाए, क्योंकि ये पक्षपात और हठधर्मी में पड़े हुए हैं, और किसी तर्क से भी उस किबले को छोड़ नहीं सकते जिसे ये अपनी गिरोहबन्दी के पूर्वाग्रह और पक्षपात के कारण पकड़े हुए हैं। और न इसका फैसला इस तरह हो सकता है कि तुम इनके क़िबले को अपना लो, क्योंकि इनका कोई एक क़िबला नहीं है जिसपर ये सारे गिरोह एक राय हों और इसे अपना लेने से क़िबले का झगड़ा चुक जाए। फिर पैग़म्बर को हैसियत से तुम्हारा यह काम है ही नहीं कि तुम लोगों को राज़ी करते फिरो और उनसे लेन-देन के तरीके पर समझौता किया करो। तुम्हारा काम तो यह है कि जो ज्ञान हमने तुमको दिया है, सबसे निश्चिन्त होकर केवल उसी पर दृढ़तापूर्वक डट जाओ।
ٱلَّذِينَ ءَاتَيۡنَٰهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ يَعۡرِفُونَهُۥ كَمَا يَعۡرِفُونَ أَبۡنَآءَهُمۡۖ وَإِنَّ فَرِيقٗا مِّنۡهُمۡ لَيَكۡتُمُونَ ٱلۡحَقَّ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ ۝ 145
(146) जिन लोगों को हमने किताब दी है, वे इस जगह को (जिसे क़िबला बनाया गया है) ऐसा पहचानते हैं, जैसा अपनी औलाद को पहचानते हैं148, मगर उनमें से एक गिरोह जानते-बूझते सत्य को छिपा रहा है।
148.यह अरब का मुहावरा है । जिस चीज़ को आदमी यक़ीन के साथ जानता हो और उसके बारे में किसी तरह का शक-संदेह न रखता हो, उसे यूँ कहते हैं कि वह उस चीज़ को ऐसा पहचानता है, जैसा अपनी औलाद को पहचानता है। यहूदियों और ईसाइयों के धार्मिक विद्वान वास्तव में यह बात अच्छी तरह जानते थे कि काबा को हज़रत इबराहीम (अलै०) ने बनाया था और इसके विपरीत बैतुल मक्दिस इसके 1300 वर्ष बाद हज़रत सुलैमान के हाथों निर्मित हुआ। इस ऐतिहासिक घटना में उनके लिए कणभर किसी संदेह की गुंजाइश न थी।
ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّكَ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡمُمۡتَرِينَ ۝ 146
(147) यह निश्चय ही एक सच्ची बात है तुम्हारे रब की ओर से, इसलिए इसके बारे में तुम कदापि किसी संदेह में न पड़ो।
وَلِكُلّٖ وِجۡهَةٌ هُوَ مُوَلِّيهَاۖ فَٱسۡتَبِقُواْ ٱلۡخَيۡرَٰتِۚ أَيۡنَ مَا تَكُونُواْ يَأۡتِ بِكُمُ ٱللَّهُ جَمِيعًاۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ ۝ 147
(148) हर एक के लिए एक रुख़ है जिसकी ओर वह मुड़ता है। अत: तुम भलाइयों की ओर अग्रसरता दिखाओ।149 जहाँ भी तुम होगे, अल्लाह तुम्हें पा लेगा। उसकी कुदरत (सामर्थ्य) से कोई चीज़ बाहर नहीं।
149.तात्पर्य यह है कि नमाज़ जिसे पढ़नी होगी, उसे बहरहाल किसी-न-किसी दिशा की ओर तो रुख करना ही होगा, मगर असल चीज़ वह रुख नहीं है जिस ओर तुम मुड़ते हो, बल्कि असल चीज़ वे भलाइयाँ हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए तुम नमाज़ पढ़ते हो, इसलिए दिशा और जगह की बहस में पड़ने के बजाए तुम्हें चिन्ता भलाइयों के हासिल करने की ही होनी चाहिए।
وَمِنۡ حَيۡثُ خَرَجۡتَ فَوَلِّ وَجۡهَكَ شَطۡرَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِۖ وَإِنَّهُۥ لَلۡحَقُّ مِن رَّبِّكَۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَٰفِلٍ عَمَّا تَعۡمَلُونَ ۝ 148
(149) तुम्हारा गुज़र जिस जगह से भी हो, वहीं से अपना रुख (नमाज़ के समय) मस्जिदे हराम की ओर फेर दो, क्योंकि यह तुम्हारे रब का बिलकुल ही सत्य पर आधारित निर्णय है और अल्लाह तुम लोगों के कर्मों से बेख़बर नहीं है
وَمِنۡ حَيۡثُ خَرَجۡتَ فَوَلِّ وَجۡهَكَ شَطۡرَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِۚ وَحَيۡثُ مَا كُنتُمۡ فَوَلُّواْ وُجُوهَكُمۡ شَطۡرَهُۥ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَيۡكُمۡ حُجَّةٌ إِلَّا ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ مِنۡهُمۡ فَلَا تَخۡشَوۡهُمۡ وَٱخۡشَوۡنِي وَلِأُتِمَّ نِعۡمَتِي عَلَيۡكُمۡ وَلَعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُونَ ۝ 149
(150) और जहाँ से भी तुम्हारा गुज़र हो, अपना रुख मस्जिदे हराम ही की ओर फेरा करो, और जहाँ भी तुम हो, उसी की ओर मुंह करके नमाज़ पढ़ो, ताकि लोगों को तुम्हारे विरुद्ध झगड़ने की कोई दलील न मिले150- हाँ, उनमें से जो ज़ालिम हैं, उनकी ज़बान किसी हाल में बन्द न होगी। तो उनसे तुम न डरो, बल्कि मुझसे डरो-और इसलिए कि मैं तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दूँ।151 और इस आशा152 में कि मेरे इस आदेश का पालन करने पर तुम उसी तरह सफलता का मार्ग पाओगे,
150.अर्थात् हमारे इस आदेश की पूरी पाबन्दी करो। कभी ऐसा न हो कि तुममें से कोई आदमी तय की हुई दिशा के अलावा किसी दूसरी दिशा की ओर नमाज़ पढ़ते देखा जाए। वरना तुम्हारे दुश्मनों को तुमपर यह आपत्ति करने का मौका मिल जाएगा कि क्या खूब उम्मते वसत (उत्तम समुदाय) है, कैसे अच्छे सत्यवादिता के गवाह बने हैं, जो यह भी कहते जाते हैं कि यह आदेश हमारे रब की ओर से आया है और फिर उसका उल्लंघन भी करते जाते हैं।
151.[इस बात का संबंध इस वाक्य से है कि “उसी की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ो, ताकि लोगों को तुम्हारे खिलाफ कोई दलील और प्रमाण न मिले।'' ] नेमत से तात्पर्य वही नेतृत्व और पेशवाई की नेमत है, जो बनी इसराईल से छीन करके इस उम्मत (समुदाय) को दी गई थी। दुनिया में एक उम्मत के सीधे रास्ते पर मत चलने का यह सर्वश्रेष्ठ फल है कि वह अल्लाह के आदेश से दुनिया की क़ौमों की रहनुमा व पेशवा बनाई जाए और मानवजाति को खुदापरस्ती और नेकी के रास्ते पर चलाने की खिदमत उसके सुपुर्द की जाए। अल्लाह यहाँ यह फरमा रहा है कि किबला बदलने का यह आदेश वास्तव में इस पद पर तुम्हें विराजमान किए जाने का प्रतीक है। अत: तुम्हें इसलिए भी हमारे इस आदेश का पालन करना चाहिए कि कहीं नाशुक्री और नाफरमानी करने से यह पद तुमसे छीन न लिया जाए। इसकी पैरवी करोगे, तो यह नेमत तुमपर पूरी कर दी जाएगी।
كَمَآ أَرۡسَلۡنَا فِيكُمۡ رَسُولٗا مِّنكُمۡ يَتۡلُواْ عَلَيۡكُمۡ ءَايَٰتِنَا وَيُزَكِّيكُمۡ وَيُعَلِّمُكُمُ ٱلۡكِتَٰبَ وَٱلۡحِكۡمَةَ وَيُعَلِّمُكُم مَّا لَمۡ تَكُونُواْ تَعۡلَمُونَ ۝ 150
(151) जिस तरह (तुम्हें इस चीज़ से सफलता मिली कि) हमने तुम्हारे बीच स्वयं तुममें से एक रसूल भेजा, जो तुम्हें हमारी आयतें सुनाता है, तुम्हारे जीवन को सँवारता है, तुम्हें किताब और हिकमत (समझ) की शिक्षा देता है, और तुम्हें वे बातें सिखाता है जो तुम न जानते थे।
فَٱذۡكُرُونِيٓ أَذۡكُرۡكُمۡ وَٱشۡكُرُواْ لِي وَلَا تَكۡفُرُونِ ۝ 151
(152) अत: तुम मुझे याद रखो, मैं तुम्हें याद रखूगा, और मेरा शुक्र अदा करो, नाशुक्री न करो।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱسۡتَعِينُواْ بِٱلصَّبۡرِ وَٱلصَّلَوٰةِۚ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلصَّٰبِرِينَ ۝ 152
(153) ऐ लोगो153 जो ईमान लाए हो, सब्र (धैर्य) और नमाज़ से मदद लो | अल्लाह सब्र करनेवालों के साथ है।154
153.नेतृत्व के पद पर नियुक्त करने के बाद अब इस समुदाय को ज़रूरी हिदायतें दी जा रही हैं। तमाम दूसरी बातों से पहले उन्हें जिस बात पर सावधान किया जा रहा है, वह यह है कि यह कोई फूलों का बिस्तर नहीं है, जिसपर आप लोग लिटाए जा रहे हों। यह तो एक महान् और खतरों से भरी हुई सेवा है, जिसका बोझ उठाने के साथ ही तुमपर हर प्रकार की मुसीबतों की वर्षा होगी, कड़ी आज़माइशों में डाले जाओगे, तरह-तरह के नुकसान उठाने पड़ेंगे और जब धीरज व दृढ़ता और संकल्प व स्थायित्व के साथ इन सभी कठिनाइयों का मुकाबला करते हुए ख़ुदा की राह में बढ़े चले जाओगे, तब तुमपर अनुकंपाओं की वर्षा होगी।
154.अर्थात् इस भारी सेवा का बोझ उठाने के लिए जिस ताक़त की ज़रूरत है, वह तुम्हें दो चीज़ों से प्राप्त होगी-एक यह कि सब (धैर्य) का गुण अपने भीतर परवान चढ़ाओ, दूसरे यह कि नमाज़ के अमल से अपने आपको मज़बूत करो। आगे चलकर बहुत-सी जगहों पर इस बात की व्याख्या मिलेगी कि धैर्य बहुत-से महत्वपूर्ण नैतिक गुणों का एक व्यापक नाम है और वास्तव में यह कामयाबी की वह कुंजी है, जिसके बिना कोई आदमी किसी उद्देश्य में भी सफल नहीं हो सकता। इसी तरह आगे चलकर नमाज़ के बारे में भी विस्तार से मालूम होगा कि वह किस-किस तरह एक-एक मुसलमान और मुसलमानों की जमाअत को इस बड़े काम के लिए तैयार करती है।
وَلَا تَقُولُواْ لِمَن يُقۡتَلُ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ أَمۡوَٰتُۢۚ بَلۡ أَحۡيَآءٞ وَلَٰكِن لَّا تَشۡعُرُونَ ۝ 153
(154) और जो लोग अल्लाह की राह में मारे जाएँ, उन्हें मुर्दा न कहो, ऐसे लोग तो वास्तव में जिन्दा हैं, मगर तुम उनकी ज़िन्दगी को जान नहीं पाते।155
155.मौत का शब्द और उसकी कल्पना इंसान के मन-मस्तिष्क पर एक हतोत्साह करनेवाला प्रभाव डालती है। इसलिए इस बात से मना किया गया कि अल्लाह के रास्ते में होनेवाले शहीदों को मुर्दा कहा जाए, क्योंकि इससे जमाअत के लोगों में जिहाद व युद्ध की भावना और प्राणोत्सर्जन की आत्मा के शिथिल पड़ जाने की आशंका है। इसके बजाए आदेश दिया गया कि ईमानवाले अपने मन-मस्तिष्क में यह धारणा रखें कि जो आदमी खुदा की राह में जान देता है, वह वास्तव में अमर जीवन पाता है । यह धारणा सत्यानुकूल भी है और इससे साहस और वीरता को आत्मा भी ताज़ा होती और ताज़ा रहती है।
وَلَنَبۡلُوَنَّكُم بِشَيۡءٖ مِّنَ ٱلۡخَوۡفِ وَٱلۡجُوعِ وَنَقۡصٖ مِّنَ ٱلۡأَمۡوَٰلِ وَٱلۡأَنفُسِ وَٱلثَّمَرَٰتِۗ وَبَشِّرِ ٱلصَّٰبِرِينَ ۝ 154
(155;156) और हम अवश्य तुम्हें डर, भूख, जान व माल के नुक़सान और आमदनियों के घाटे में डालकर तुम्हारी आज़माइश करेगे। इन परिस्थितियों में जो लोग धीरज रखें और जब कोई मुसीबत पड़े तो कहें कि "हम अल्लाह ही के हैं और अल्लाह ही की ओर हमें पलटकर जाना है156, उन्हें शुभ सूचना दे दो।
156.कहने से अभिप्रेत केवल ज़बान से ये बोल अदा कर देना नहीं है, बल्कि दिल से इस बात का कायल होना है कि "हम अल्लाह ही के हैं" इसलिए अल्लाह की राह में हमारी जो चीज़ भी कुरबान हुई, वह मानो ठीक जगह खर्च हुई, जिसकी चीज़ थी उसी के काम आ गई और यह कि “अल्लाह ही की ओर हमें पलटना है",
ٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَٰبَتۡهُم مُّصِيبَةٞ قَالُوٓاْ إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّآ إِلَيۡهِ رَٰجِعُونَ ۝ 155
0
أُوْلَٰٓئِكَ عَلَيۡهِمۡ صَلَوَٰتٞ مِّن رَّبِّهِمۡ وَرَحۡمَةٞۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُهۡتَدُونَ ۝ 156
(157) उनपर उनके रब की ओर से बड़ी कृपाएँ होंगी, उसकी रहमत उनपर साया करेगी और ऐसे ही लोग सत्य-मार्ग पर चलनेवाले हैं।
۞إِنَّ ٱلصَّفَا وَٱلۡمَرۡوَةَ مِن شَعَآئِرِ ٱللَّهِۖ فَمَنۡ حَجَّ ٱلۡبَيۡتَ أَوِ ٱعۡتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيۡهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَاۚ وَمَن تَطَوَّعَ خَيۡرٗا فَإِنَّ ٱللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ ۝ 157
(158) निस्संदेह सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं। अत: जो व्यक्ति अल्लाह के घर का हज या उमरा करे157 उसके लिए कोई गुनाह की बात नहीं कि वह इन दोनों पहाड़ियों के बीच तेज़ रफ़्तार से फेरा (सई) लगाए158 और जो पूरी स्वेच्छा और रुचि के साथ कोई भलाई का काम करेगा159 अल्लाह को उसका ज्ञान है और वह उसका कद्र करनेवाला है।
157.ज़िलहिज्जा की निश्चित तारीखों में काबा की जो जियारत (दर्शन) की जाती है, उसका नाम 'हज' है और इन तारीखों से हटकर दूसरे किसी ज़माने में जो ज़ियारत की जाए , वह 'उमरा' है।
158.सफा और मरवा मस्जिदे हराम के पास दो पहाड़ियाँ हैं, जिनके बीच में दौड़ना उन तरीकों में था, जो अल्लाह ने हज के लिए हज़रत इबराहीम को सिखाए थे। बाद में जब मक्का और आस-पास के सभी इलाकों में अनेकेश्वरवाद की अज्ञानता फैल गई,तो सफा पर 'इसाफ़' और मरवा पर 'नाइला' के थान बना लिए गए और उनके चारों ओर तवाफ (परिक्रमा) होने लगा, फिर जब नबी (सल्ल.) के जरिये से इस्लाम की रौशनी अरबबालों तक पहुंची, तो मुसलमानों के दिलों में यह सवाल खटकने लगा कि क्या सफ़ा और मरवा की सई हज के असली तरीकों में से है या केवल अनेकेश्वरवाद के युग की पैदावार है और यह कि इस सई से कहीं हम अनेकेश्वरवादपूर्ण कर्म करने के अपराधी तो नहीं हो जाएंगे। साथ ही हज़रत आइशा (रजि.) को रिवायत से मालूम होता है कि मदीनावालों के दिलों में पहले ही से सफा और मरवा के बीच सई के बारे में नापसंदीदगी मौजूद थी, क्योंकि वे 'मनात' के प्रति श्रद्धा रखते थे और इसाफ और नाइला को नहीं मानते थे। इन्हीं वजहों से ज़रूरी हुआ कि मस्जिदे हराम को किबला निर्धारित करने के मौके पर उन भ्रमों को दूर कर दिया जाए और लोगों को बता दिया जाए कि इन दोनों जगहों के बीच सई करना हज के असली तरीक़ों में से है और यह कि इन स्थानों की पावनता खुदा की ओर से है, न कि अज्ञानकाल के लोगों की मनगढ़त।
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكۡتُمُونَ مَآ أَنزَلۡنَا مِنَ ٱلۡبَيِّنَٰتِ وَٱلۡهُدَىٰ مِنۢ بَعۡدِ مَا بَيَّنَّٰهُ لِلنَّاسِ فِي ٱلۡكِتَٰبِ أُوْلَٰٓئِكَ يَلۡعَنُهُمُ ٱللَّهُ وَيَلۡعَنُهُمُ ٱللَّٰعِنُونَ ۝ 158
(159) जो लोग हमारी उतारी हुई स्पष्ट शिक्षाओं और आदेशों को छिपाते हैं, हालाँकि हम उन्हें सारे इंसानों के मार्गदर्शन के लिए अपनी किताब में बयान कर चुके हैं, यकीन जानो कि अल्लाह की भी उनपर फिटकार है और तमाम फिटकारनेवाले भी उन्हें फिटकारते हैं।160
160.यहूदी धार्मिक विद्वानों का सबसे बड़ा कुसूर यह था कि उन्होंने अल्लाह की किताब के ज्ञान को फैलाने के बजाए उसको रिब्बियों और धार्मिक पेशावरों के एक सीमित वर्ग में कैद कर रखा था। फिर जब सामान्य अज्ञानता के कारण उनके अन्दर गुमराहियाँ फैलीं, तो उनके धार्मिक विद्वानों ने, न केवल यह कि सुधार लाने
إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُواْ وَأَصۡلَحُواْ وَبَيَّنُواْ فَأُوْلَٰٓئِكَ أَتُوبُ عَلَيۡهِمۡ وَأَنَا ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ۝ 159
(160) अलबत्ता जो इस रवैये से बाज़ आ जाएँ और अपनी नीति का सुधार कर लें और जो कुछ छिपाते थे, उसे बयान करने लगें, उनको मैं क्षमा कर दूंगा, और मैं बड़ा क्षमा करनेवाला और दया करनेवाला हूँ।
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَمَاتُواْ وَهُمۡ كُفَّارٌ أُوْلَٰٓئِكَ عَلَيۡهِمۡ لَعۡنَةُ ٱللَّهِ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ وَٱلنَّاسِ أَجۡمَعِينَ ۝ 160
(161) जिन लोगों ने कुल का रवैया161 अपनाया और कुफ़ की हालत ही में जान दी, उनपर अल्लाह और फ़रिश्तों और सारे इंसानों की फिटकार है ।
161.'क़ुफ़्र' का वास्तविक अर्थ 'छिपाना है। इसी से इंकार का भाव पैदा हुआ और यह शब्द 'ईमान' के मुकाबले में बोला जाने लगा। ईमान का अर्थ है मानना, क़बूल करना, मान लेना । इसके विपरीत क़ुफ़्र का अर्थ है न मानना, रद्द कर देना, इनकार करना । कुरआन के अनुसार कुफ़ के रवैये के अलग-अलग रूप हैं : एक यह कि इंसान सिरे से खुदा ही को न माने या उसके सम्प्रभुत्व को स्वीकार न करे और उसको अपना और सारी सृष्टि का मालिक और पूज्य मानने से इनकार कर दे या उसे अकेला मालिक और पूज्य न माने । दूसरे यह कि अल्लाह को तो माने, मगर उसके आदेश और उसके मार्गदर्शन को ज्ञान और कानून का एक मात्र स्रोत मानने से इनकार कर दे। तीसरे यह कि सैद्धान्तिक रूप से इस बात को भी मान ले कि उसे अल्लाह ही की हिदायत पर चलना चाहिए, मगर अल्लाह अपनी हिदायतों और अपने हुक्मों को पहुंचाने के लिए जिन पैग़म्बरों को माध्यम बनाता है, उन्हें स्वीकार न करे। चौथे यह कि पैग़म्बरों के बीच भेदभाव करके और अपनी पसन्द या अपने पक्षपात के आधार पर इनमें से किसी को माने और किसी को न माने । पाँचवें यह कि पैग़म्बरों ने ख़ुदा की ओर से धारणाओं, नैतिकता और जीवन-विधानों के बारे में जो शिक्षाएँ दी हैं, उनको या उनमें से किसी चीज़ को स्वीकार न करे। छठे यह कि सैद्धांतिक रूप में तो इन सब चीज़ों को मान ले, पर व्यावहारिक रूप से अल्लाह के आदेशों की जान-बूझकर अवज्ञा करे और इस अवज्ञा पर अड़ा भी रहे और दुनिया की ज़िन्दगी में अपने रवैए की नींव आज्ञापालन पर नहीं बल्कि अवज्ञा ही पर रखे। इसके अतिरिक्त कहीं-कहीं कुरआन में कुत का शब्द नेमत के इनकार और नाशुक्री (कृतघ्नता) के अर्थ में भी प्रयुक्त हुआ है और कृतज्ञता के मुकाबले में बोला गया है।
خَٰلِدِينَ فِيهَا لَا يُخَفَّفُ عَنۡهُمُ ٱلۡعَذَابُ وَلَا هُمۡ يُنظَرُونَ ۝ 161
(162) इसी फिटकार की मार की स्थिति में वे हमेशा रहेंगे, न उनकी सज़ा में कमी होगी और न उन्हें फिर कोई दूसरी मोहलत दी जाएगी।
وَإِلَٰهُكُمۡ إِلَٰهٞ وَٰحِدٞۖ لَّآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلرَّحۡمَٰنُ ٱلرَّحِيمُ ۝ 162
(163) तुम्हारा खुदा एक ही खुदा है। उस रहमान (कृपाशील) और रहीम (दयावान) के सिवा कोई और खुदा नहीं है ।
إِنَّ فِي خَلۡقِ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَٱخۡتِلَٰفِ ٱلَّيۡلِ وَٱلنَّهَارِ وَٱلۡفُلۡكِ ٱلَّتِي تَجۡرِي فِي ٱلۡبَحۡرِ بِمَا يَنفَعُ ٱلنَّاسَ وَمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مِن مَّآءٖ فَأَحۡيَا بِهِ ٱلۡأَرۡضَ بَعۡدَ مَوۡتِهَا وَبَثَّ فِيهَا مِن كُلِّ دَآبَّةٖ وَتَصۡرِيفِ ٱلرِّيَٰحِ وَٱلسَّحَابِ ٱلۡمُسَخَّرِ بَيۡنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلۡأَرۡضِ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يَعۡقِلُونَ ۝ 163
(164) (इस सत्य को पहचानने के लिए अगर कोई निशानी और पहचान चाहिए तो) जो लोग बुद्धि से काम लेते हैं, उनके लिए आसमानों और जमीन की बनावट में, रात और दिन के निरन्तर एक-दूसरे के बाद आने में, उन नावों में जो इंसान के लाभ की चीजें लिए हुए नदियों और समुद्रों में चलती-फिरती हैं, वर्षा के उस पानी में जिसे अल्लाह ऊपर से बरसाता है, फिर उसके जरिये से मुर्दा जमीन को जीवन प्रदान करता है और (अपनी इसी व्यवस्था के कारण) ज़मीन में हर प्रकार के जीवधारियों को फैलाता है, हवाओं के चलने में और उन बादलों में, जो आसमान और जमोन के बीच आज्ञापालक बनाकर रखे गए हैं, अनगिनत निशानियाँ हैं।162
162.अर्थात् अगर इंसान सृष्टि के इस कारखाने को, जो रात-दिन उसकी आँखों के सामने चल रहा है, केवल जानवरों की तरह न देखे, बल्कि बुद्धि से काम लेकर उस व्यवस्था पर विचार करे और पूर्वाग्रह या पक्षपात मुक्त होकर सोचे, तो ये निशानियाँ जो उसके देखने में आ रही हैं, इस नतीजे पर पहुंचाने के लिए बिल्कुल काफ़ी हैं कि यह शानदार व्यवस्था एक ही सर्वशक्तिमान तत्त्वदर्शी के आधीन है, तमाम अधिकार और सत्ता बिल्कुल उसी एक के हाथ में है, किसी दूसरे के स्वायत्ततापूर्ण हस्तक्षेप या भागीदारी के लिए इस व्यवस्था में तनिक भी गुंजाइश नहीं, इसलिए वास्तव में वही एक ख़ुदा सम्पूर्ण सृष्टि का अल्लाह है।
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَتَّخِذُ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَندَادٗا يُحِبُّونَهُمۡ كَحُبِّ ٱللَّهِۖ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَشَدُّ حُبّٗا لِّلَّهِۗ وَلَوۡ يَرَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓاْ إِذۡ يَرَوۡنَ ٱلۡعَذَابَ أَنَّ ٱلۡقُوَّةَ لِلَّهِ جَمِيعٗا وَأَنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلۡعَذَابِ ۝ 164
(165) (परन्तु अल्लाह के एक होने का प्रमाण बननेवाली इन खुली-खुली निशानियों के होते हुए भी) कुछ लोग ऐसे हैं जो अल्लाह के सिवा दूसरों को उसका समकक्ष और प्रतिद्वन्द्वी ठहराते हैं163, और उनके प्रति ऐसे आसक्त हैं, जैसा अल्लाह के प्रति आसक्ति होनी चाहिए, हालाँकि ईमान रखनेवाले लोगों को सबसे बढ़कर अल्लाह प्रिय होता है ।164 "क्या ही अच्छा होता, जो कुछ अज़ाब को सामने देखकर उन्हें सूझनेवाला है वह आज ही इन ज़ालिमों को सूझ जाए कि सारी शक्तियाँ और सारे अधिकार अल्लाह ही के क़ब्जे में हैं और यह कि अल्लाह सज़ा देने में भी बहुत कठोर है।
163.अर्थात् ईश्वरत्व के जो अल्लाह के लिए मुख्य है, उनमें से कुछ को दूसरों से जोड़ते हैं और ख़ुदा होने को हैसियत से बन्दों पर अल्लाह तआला के जो अधिकार हैं वे सब या उनमें से कुछ अधिकार ये लोग उन दूसरे बनावटी उपास्यों को दे देते हैं, जैसे कार्य-कारण के सिलसिले पर शासन, ज़रूरतें पूरी करना, कठिन क्षणों में पार लगाना, फरयाद सुनना, दुआएँ सुनना और खुली-छिपी हर बात को जानना, ये सब अल्लाह के मुख्य गुण हैं। इसी तरह 'मालिकुल मुल्क' (साधाज्य का शासक) होने की हैसियत से यह अल्लाह ही का पद है कि अपनी प्रजा के लिए हलाल व हराम की सीमाएँ निश्चित करे, उनके कर्तव्यों और अधिकारों का निर्धारण करे और उनको करने, न करने के आदेश दे। साथ ही यह केवल अल्लाह का अधिकार है कि बन्दे उसका सम्प्रभुत्त्व माने, उसके आदेश को कानून का.स्रोत स्वीकार करें और उसी को करने और न करने के आदेशों का देनेवाला समझें । जो आदमी अल्लाह के इन गुणों में से किसी गुण को भी किसी दूसरे से जोड़ देता है और उसके इन अधिकारों में से कोई एक अधिकार भी किसी दूसरे को दे देता है, वह वास्तव में उसे खुदा के समकक्ष और प्रतिद्वंद्वी बनाता है। इसी तरह जो व्यक्ति या जो संस्था इन गुणों में से किसी गुण का दावेदार हो और इन अधिकारों में से किसी अधिकार की इंसानों से माँग करता हो, वह भी वास्तव में ख़ुदा का समकक्ष और प्रतिद्वंद्वी बनता है, चाहे मुख से खुदा होने का दावा करे या न करे।
164.अर्थात् ईमान का तकाज़ा यह है कि आदमी के लिए अल्लाह की प्रसन्नता को हर दूसरे की प्रसन्नता पर प्राथमिकता प्राप्त हो और किसी चीज़ की मुहब्बत भी इंसान के दिल में यह दर्जा और स्थान प्राप्त न करे कि वह अल्लाह की मुहब्बत पर उसे कुरबान न कर सके।
إِذۡ تَبَرَّأَ ٱلَّذِينَ ٱتُّبِعُواْ مِنَ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُواْ وَرَأَوُاْ ٱلۡعَذَابَ وَتَقَطَّعَتۡ بِهِمُ ٱلۡأَسۡبَابُ ۝ 165
(166) जब वह सजा देगा, उस समय हालत यह होगी कि वहीं पेशवा और रहनुमा, जिनकी दुनिया में पैरवी की गई थी, अपने पैरवी करनेवालों से संबंध न होने का प्रदर्शन करेंगे, मगर सज़ा पाकर रहेंगे और उनके समस्त माध्यमों और संसाधनों का क्रम कट जाएगा।
وَقَالَ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُواْ لَوۡ أَنَّ لَنَا كَرَّةٗ فَنَتَبَرَّأَ مِنۡهُمۡ كَمَا تَبَرَّءُواْ مِنَّاۗ كَذَٰلِكَ يُرِيهِمُ ٱللَّهُ أَعۡمَٰلَهُمۡ حَسَرَٰتٍ عَلَيۡهِمۡۖ وَمَا هُم بِخَٰرِجِينَ مِنَ ٱلنَّارِ ۝ 166
(167) और वे लोग जो दुनिया में उनकी पैरवी करते थे, कहेंगे कि काश ! हमको फिर एक मौक़ा दिया जाता तो जिस तरह आज ये हमसे संबंध न होने का प्रदर्शन कर रहे हैं, हम भी इनसे असंबद्ध होकर दिखा देते।165 यूँ अल्लाह इन लोगों के वे काम, जो ये दुनिया में कर रहे हैं, उनके सामने इस तरह लाएगा कि ये हसरतों और शर्मिदगियों के साथ हाथ मलते रहेंगे, मगर आग से निकलने की कोई राह न पाएँगे।
165.यहाँ मुख्य रूप से रास्ता भटकानेवाले नेताओं और लीडरों और उनके नादान अनुयायियों के अंजाम का इसलिए उल्लेख किया गया है कि जिस ग़लती में पड़कर पिछले समुदाय भटक गए, उससे मुसलमान होशियार रहें और रास्ता दिखानेवालों में अन्तर करना सीखें और ग़लत रास्ता बतानेवालों के पीछे चलने से बचें।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ كُلُواْ مِمَّا فِي ٱلۡأَرۡضِ حَلَٰلٗا طَيِّبٗا وَلَا تَتَّبِعُواْ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيۡطَٰنِۚ إِنَّهُۥ لَكُمۡ عَدُوّٞ مُّبِينٌ ۝ 167
(168) लोगो ! ज़मीन में जो हलाल और पाक चीजें हैं उन्हें खाओ और शैतान के बताए हुए रास्तों पर न चलो।166 वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।
166.अर्थात् खाने-पीने के मामले में उन तमाम पाबन्दियों को तोड़ डालो जो अंधविश्वासों और अज्ञानतापूर्ण रस्मों के कारण लगी हुई हैं।
إِنَّمَا يَأۡمُرُكُم بِٱلسُّوٓءِ وَٱلۡفَحۡشَآءِ وَأَن تَقُولُواْ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعۡلَمُونَ ۝ 168
(169) तुम्हें बुरी और गन्दी बातों का हुक्म देता है और यह सिखाता है कि तुम अल्लाह के नाम पर वे बातें कहो जिनके बारे में तुम्हें ज्ञान नहीं है (कि वे अल्लाह ने कही हैं)।167
167.अर्थात् इन अंधविश्वासपूर्ण रस्मों और पाबन्दियों के बारे में यह विचार कि ये सब धार्मिक बातें हैं जो खुदा की ओर से सिखाई गई हैं, वास्तव में शैतानी चालों का करिश्मा है, इसलिए कि वास्तव में इनके अल्लाह की ओर से होने का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है।
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّبِعُواْ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُواْ بَلۡ نَتَّبِعُ مَآ أَلۡفَيۡنَا عَلَيۡهِ ءَابَآءَنَآۚ أَوَلَوۡ كَانَ ءَابَآؤُهُمۡ لَا يَعۡقِلُونَ شَيۡـٔٗا وَلَا يَهۡتَدُونَ ۝ 169
(170) उनसे जब कहा जाता है कि अल्लाह ने जो आदेश उतारे हैं उनकी पैरवी करो, तो जवाब देते हैं कि हम तो उसी तरीके की पैरवी करेंगे जिसपर हमने अपने बाप-दादा को पाया है।168 अच्छा, अगर उनके बाप-दादा ने बुद्धि से कुछ भी काम न लिया हो और सीधा रास्ता न पाया हो, तो क्या फिर भी ये उन्हीं की पैरवी किए चले जाएँगे?
168.अर्थात् उन पाबन्दियों के लिए उनके पास कोई प्रमाण और कोई तर्क इसके सिवा नहीं है कि बाप-दादा से यूँ ही होता चला आया है। अज्ञानी समझते हैं कि किसी तरीके की पैरवी के लिए यह तर्क बिल्कुल काफी है।
وَمَثَلُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ كَمَثَلِ ٱلَّذِي يَنۡعِقُ بِمَا لَا يَسۡمَعُ إِلَّا دُعَآءٗ وَنِدَآءٗۚ صُمُّۢ بُكۡمٌ عُمۡيٞ فَهُمۡ لَا يَعۡقِلُونَ ۝ 170
(171) ये लोग जिन्होंने ख़ुदा के बताए हुए तरीक़े पर चलने से इनकार कर दिया है, इनकी हालत बिलकुल ऐसी है जैसे चरवाहा जानवरों को पुकारता है और वे हाँक-पुकार की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं सुनते।169 ये बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं, इसलिए कोई बात इनकी समझ में नहीं आती।
169.इस मिसाल के दो पहलू हैं। एक यह कि इन लोगों की हालत उन बुद्धिहीन जानवरों की-सी है, जिनके झुण्ड अपने-अपने चरवाहों के पीछे चले जाते हैं और बिना समझे-बूझे उनकी आवाज़ों पर हरकत करते हैं। और दूसरा पहलू यह है कि उनको बुलाते समय ऐसा लगता है कि मानो जानवरों को पुकारा जा रहा है जो केवल आवाज़ सुनते हैं, मगर कुछ नहीं समझते कि कहनेवाला उनसे क्या कहता है। अल्लाह ने ऐसे व्यापक शब्दों का प्रयोग किया है कि ये दोनों पहलू इनमें आ जाते हैं।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُلُواْ مِن طَيِّبَٰتِ مَا رَزَقۡنَٰكُمۡ وَٱشۡكُرُواْ لِلَّهِ إِن كُنتُمۡ إِيَّاهُ تَعۡبُدُونَ ۝ 171
(172) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो ! अगर तुम वास्तव में अल्लाह ही की बन्दगी करनेवाले हो, तो जो पाक चीजें हमने तुम्हें प्रदान की हैं उन्हें बेझिझक खाओ और अल्लाह का शुक्र अदा करो।170
170.अर्थात् अगर तुम ईमान लाकर सिर्फ अल्लाह के कानून की पैरवी करनेवाले बन चुके हो, जैसा कि तुम्हारा दावा है, तो फिर वह सारी छूत-छात और अज्ञानता-युग के वे सारे बन्धन और पाबन्दियाँ तोड़ डालो जो पंडितों और पुरोहितों ने, रिब्बियों और पादरियों ने, योगियों और संन्यासियों ने और तुम्हारे बाप-दादा ने स्थापित की थीं। जो कुछ ख़ुदा ने हराम किया है उससे तो ज़रूर बचो, मगर जिन चीज़ों को खुदा ने हलाल किया है, उन्हें बिना किसी संकोच और रुकावट के खाओ-पियो। इसी विषय की ओर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की वह हदीस भी संकेत करती है, जिसमें आपने फरमाया कि "जिसने वही नमाज़ पढ़ी जो हम पढ़ते हैं और उसी किबले की ओर रुख किया, जिसकी ओर हम रुख करते हैं और हमारे ज़बीहे (ज़िब्ह किए हुए जानवर) को खाया, वह मुसलमान है।" अर्थ यह है कि नमाज़ पढ़ने और किबले की ओर रुख करने के बावजूद एक व्यक्ति उस समय तक इस्लाम में विलीन नहीं होता, जब तक कि वह खाने-पीने के मामले में पिछली अज्ञानता की पाबन्दियों को तोड़ न दे।
إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيۡكُمُ ٱلۡمَيۡتَةَ وَٱلدَّمَ وَلَحۡمَ ٱلۡخِنزِيرِ وَمَآ أُهِلَّ بِهِۦ لِغَيۡرِ ٱللَّهِۖ فَمَنِ ٱضۡطُرَّ غَيۡرَ بَاغٖ وَلَا عَادٖ فَلَآ إِثۡمَ عَلَيۡهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٌ ۝ 172
(173) अल्लाह की ओर से अगर कोई पाबन्दी तुमपर है तो वह यह है कि मुरदार न खाओ, खून से और सुअर के मांस से बचो और कोई ऐसी चीज़ न खाओ जिसपर अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो।171 हाँ, जो आदमी मजबूरी की हालत में हो और वह उनमें से कोई चीज़ खा ले, बिना इसके कि वह क़ानून तोड़ने का इरादा रखता हो या ज़रूरत की हद से आगे बढ़ जाए, तो उसपर कुछ गुनाह नहीं, अल्लाह क्षमा करनेवाला और दया करनेवाला है।172
171.यह आदेश उस जानवर के मांस पर भी लागू होता है, जिसे ख़ुदा के सिवा किसी और के नाम पर ज़िब्‍ह किया गया हो और उस खाने पर भी लागू होता है जो अल्लाह के सिवा किसी और के नाम पर, मन्नत स्वरूप पकाया जाए । सच तो यह है कि जानवर हो या अन्न या और कोई खाने की चीज़, वास्तव में उसका स्वामी अल्लाह ही है और अल्लाह ही ने वह चीज़ हमको दी है। इसलिए नेमत को स्वीकारने या सदका या मन्नत व नियाज़ और चढ़ावे के रूप में अगर किसी का नाम इन चीज़ों पर लिया जा सकता है, तो वह सिर्फ अल्लाह ही का नाम है। इसके सिवा किसी दूसरे का नाम लेना यह अर्थ रखता है कि हम खुदा के बजाय या ख़ुदा के साथ उसकी श्रेष्ठता भी स्वीकार कर रहे हैं और उसको भी नेमतें देनेवाला समझते हैं।
172.इस आयत में हराम चीज़ के उपभोग की अनुमति तीन शर्तों के साथ दी गई है- -एक यह कि वाकई मजबूरी की हालत हो, जैसे भूख या प्यास से जान पर बन गई हो, या बीमारी की वजह से जान का खतरा हो और इस हालत में हराम चीज़ के सिवा और कोई चीज़ मिल न रही हो। -दूसरे यह कि खुदा के कानून को तोड़ने की इच्छा दिल में मौजूद न हो। -तीसरे यह कि ज़रूरत की हद से आगे न बढ़ा जाए। जैसे-हराम चीज़ के कुछ लुक्मे या कुछ बूंदें या कुछ घूंट अगर जान बचा सकते हों, तो इनसे ज़्यादा इस चीज़ का इस्तेमाल न होने पाए।
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكۡتُمُونَ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَيَشۡتَرُونَ بِهِۦ ثَمَنٗا قَلِيلًا أُوْلَٰٓئِكَ مَا يَأۡكُلُونَ فِي بُطُونِهِمۡ إِلَّا ٱلنَّارَ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ ٱللَّهُ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمۡ وَلَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝ 173
(174) सच तो यह है कि जो लोग उन आदेशों को छिपाते हैं जो अल्लाह ने अपनी किताब में उतारे हैं और थोड़े से सांसारिक लाभों पर उन्हें भेंट चढ़ाते हैं, वे वास्तव में अपने पेट आग से भर रहे हैं।173 क़ियामत के दिन अल्लाह कदापि इनसे बात न करेगा, न उन्हें पाक-साफ़ ठहराएगा।174 और उनके लिए पीड़ादायक सज़ा है।
173.अर्थ यह है कि आम लोगों में ये जितनी अंधविश्वासपूर्ण बातें फैली हुई हैं और झूठी रस्मों और अनुचित पाबन्दियों के जो नए-नए कर्म-कांड बन गए हैं, इन सबकी ज़िम्मेदारी उन विद्वानों पर है, जिनके पास ईश्वरीय पुस्तक का ज्ञान था, मगर उन्होंने जनता तक इस ज्ञान को न पहुँचाया। फिर जब लोगों में अज्ञानता के कारण ग़लत परम्पराएँ प्रचलित होने लगीं, तब भी वे ज़ालिम मुँह में घुनघुनियाँ भरकर बैठे रहे (अर्थात् चुपकी साधे रहे)। बल्कि इनमें से बहुतों ने अपना हित इसी में देखा कि अल्लाह की किताब के आदेश पर परदा ही पड़ा रहे।
174.यह वास्तव में उन पेशवाओं (धार्मिक नेताओं) के झूठे दावों का खंडन और उन ग़लतफ़हमियों का रद्द है, जो उन्होंने आम लोगों में अपने बारे में फैला रखी हैं। वे हर संभव तरीके से लोगों के दिलों में यह विचार बिठाने की कोशिश करते हैं कि इनकी हस्तियाँ बड़ी ही पाक-साफ़ और पवित्र हैं और जो उनके दामन को थाम लेगा, उसको सिफ़ारिश करके वे अल्लाह के यहाँ उसे माफ़ करा लेंगे। उत्तर में अल्लाह फ़रमाता है कि हम उन्हें कदापि मुंह न लगाएँगे और न उन्हें पाक-साफ क़रार देंगे।
أُوْلَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشۡتَرَوُاْ ٱلضَّلَٰلَةَ بِٱلۡهُدَىٰ وَٱلۡعَذَابَ بِٱلۡمَغۡفِرَةِۚ فَمَآ أَصۡبَرَهُمۡ عَلَى ٱلنَّارِ ۝ 174
(175) ये वे लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही खरीदी और मग़ाफ़िरत (मुक्ति) के बदले अज़ाब मोल ले लिया। कैसा विचित्र है इनका साहस कि नरक की यातना सहने को तैयार हैं !
ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ نَزَّلَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّۗ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ ٱخۡتَلَفُواْ فِي ٱلۡكِتَٰبِ لَفِي شِقَاقِۭ بَعِيدٖ ۝ 175
(176) यह सब कुछ इस वजह से हुआ कि अल्लाह ने तो ठीक-ठीक सत्य के अनुसार किताब उतारी थी, मगर जिन लोगों ने किताब में विभेद पैदा किए वे अपने झगड़ों में सत्य से बहुत दूर निकल गए।
۞لَّيۡسَ ٱلۡبِرَّ أَن تُوَلُّواْ وُجُوهَكُمۡ قِبَلَ ٱلۡمَشۡرِقِ وَٱلۡمَغۡرِبِ وَلَٰكِنَّ ٱلۡبِرَّ مَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةِ وَٱلۡكِتَٰبِ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ وَءَاتَى ٱلۡمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِۦ ذَوِي ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡيَتَٰمَىٰ وَٱلۡمَسَٰكِينَ وَٱبۡنَ ٱلسَّبِيلِ وَٱلسَّآئِلِينَ وَفِي ٱلرِّقَابِ وَأَقَامَ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَى ٱلزَّكَوٰةَ وَٱلۡمُوفُونَ بِعَهۡدِهِمۡ إِذَا عَٰهَدُواْۖ وَٱلصَّٰبِرِينَ فِي ٱلۡبَأۡسَآءِ وَٱلضَّرَّآءِ وَحِينَ ٱلۡبَأۡسِۗ أُوْلَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ صَدَقُواْۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُتَّقُونَ ۝ 176
(177) नेकी यह नहीं है कि तुमने अपने चेहरे पूरब की ओर कर लिए या पच्छिम की ओर175, बल्कि नेकी यह है कि आदमी अल्लाह को और आखिरत के दिन को और फ़रिश्तों को और अल्लाह की उतारी हुई किताब और उसके पैग़म्बरों को दिल से माने और अल्लाह की मुहब्बत में अपना मनभाता माल रिश्तेदारों और यतीमों पर, मिस्कीनों और मुसाफ़िरों पर, मदद के लिए हाथ फैलानेवालों पर और दासों की रिहाई पर खर्च करे, नमाज़ क़ायम करे और ज़कात दे। और नेक वे लोग हैं कि जब वचन दें तो उसे निभाएँ, और तंगी व मुसीबत के समय में और सत्य और असत्य की लड़ाई में धैर्य से काम लें। ये हैं सच्चे लोग और यही लोग तक़वा वाले हैं।
175.पूरब और पश्चिम की ओर मुँह करने को तो केवल उदाहरण के रूप में कहा गया है । वस्तुत: अभीष्ट यह मन में बिठाना है कि धर्म की कुछ बाह्य रस्मों को अदा कर देना और मात्र नियम की ख़ानापुरी के तौर पर कुछ तैशुदा धार्मिक कामों को पूरा कर देना और तकवा (ईश-भय) की कुछ जानी-पहचानी शक्लों का प्रदर्शन कर देना वह वास्तविक नेकी नहीं है, जो अल्लाह के यहाँ वज़न और मूल्य रखती है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلۡقِصَاصُ فِي ٱلۡقَتۡلَىۖ ٱلۡحُرُّ بِٱلۡحُرِّ وَٱلۡعَبۡدُ بِٱلۡعَبۡدِ وَٱلۡأُنثَىٰ بِٱلۡأُنثَىٰۚ فَمَنۡ عُفِيَ لَهُۥ مِنۡ أَخِيهِ شَيۡءٞ فَٱتِّبَاعُۢ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَأَدَآءٌ إِلَيۡهِ بِإِحۡسَٰنٖۗ ذَٰلِكَ تَخۡفِيفٞ مِّن رَّبِّكُمۡ وَرَحۡمَةٞۗ فَمَنِ ٱعۡتَدَىٰ بَعۡدَ ذَٰلِكَ فَلَهُۥ عَذَابٌ أَلِيمٞ ۝ 177
(178) ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो ! तुम्हारे लिए हत्या के मुक़दमों में क़िसास176 का आदेश लिख दिया गया है । आज़ाद आदमी ने हत्या की हो तो उस आज़ाद ही से बदला लिया जाए, गुलाम हत्यारा हो तो उस गुलाम ही की हत्या की जाए और औरत यह जुर्म कर बैठे तो उस औरत ही से क़िसास177 लिया जाए। हाँ, अगर किसी हत्यारे के साथ उसका भाई कुछ नर्मी करने के लिए तैयार हो178, तो सामान्य नियम179 के अनुसार खूँबहा (अर्थदंड) का निपटारा होना चाहिए और हत्यारे पर अनिवार्य है कि भले तरीक़े से खूबहा अदा करे। यह तुम्हारे रब की ओर से छूट और रहमत (दयालुता) है। इसपर भी जो ज़्यादती करे180, उसके लिए पीड़ादायक सज़ा है
176.किसास अर्थात् खून का बदला, यह कि आदमी के साथ वही किया जाए जो उसने दूसरे आदमी के साथ किया, मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि हत्यारे ने जिस तरीके से किसी की हत्या की है, उसी तरीके से उसको हत्या भी की जाए, बल्कि अर्थ केवल यह है कि जान लेने का जो काम उसने मकतूल के साथ किया है, वही उसके साथ किया जाए।
177.अज्ञानता काल में लोगों का तरीक़ा यह था कि अगर उनका कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति दूसरे गिरोह के किसी छोटे आदमी के हाथों मारा गया हो, तो वे असली हत्यारे की हत्या को पर्याप्त नहीं समझते थे, बल्कि उनकी इच्छा यह होती थी कि हत्यारे के क़बीले का भी कोई वैसा ही प्रतिष्ठित व्यक्ति मारा जाए या उसके कई आदमी उनके मारे गए व्यक्ति पर भेंट चढ़ाए जाएं। इसके विपरीत अगर वह व्यक्ति जिसकी हत्या की गई है उनकी दृष्टि में कोई सामान्य व्यक्ति और हत्यारा कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति होता, तो वे इस बात को कभी पसन्द न करते थे कि मारे गए व्यक्ति के बदले में हत्यारे की जान ली जाए। और यह हालत कुछ प्राचीन अज्ञानता काल ही में न थी, वर्तमान समय में जिन कौमों को अति सुसभ्य समझा जाता है, उनके बाकायदा सरकारी एलानों तक में कभी-कभी यह बात बिना किसी शर्म के दुनिया को सुनाई जाती है कि हमारा एक आदमी मारा जाएगा, तो हम हत्यारे की कौम के पचास आदमियों की जान ले लेंगे। प्राय: ये खबरें हमारे कान सुनते हैं कि एक व्यक्ति की हत्या पर पराजित क़ौम के इतने बन्धक गोली से उड़ाए गए। एक सुसभ्य क़ौम ने इसी बीसवीं सदी में अपने एक आदमी सरली स्टीक के क़त्ल का बदला पूरी मिस्त्री कौम से लेकर छोड़ा। दूसरी ओर इन कथित सुसभ्य कौमों की बाकायदा अदालतों तक कार तरीक़ा रहा है कि अगर हत्यारा शासक वर्ग का आदमी हो और मारे गए व्यक्ति का ताल्लुक़ शासित वर्ग से हो, तो उनके जज किसास का फ़ैसला करने से बचते हैं। यही खराबियाँ हैं, जिनके रोकने का आदेश अल्लाह ने इस आयत में दिया है। वह फरमाता है कि मारे गए व्यक्ति के बदले में हत्यारे और सिर्फ हत्यारे ही की जान ली जाए, यह ख्याल किए बिना कि हत्यारा कौन है और वह कौन है जिसकी हत्या की गई।
وَلَكُمۡ فِي ٱلۡقِصَاصِ حَيَوٰةٞ يَٰٓأُوْلِي ٱلۡأَلۡبَٰبِ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ ۝ 178
(179) -सूझ-बूझ रखनेवालो! तुम्हारे लिए किसास में ज़िन्दगी है।181 आशा है कि तुम इस क़ानून की ख़िलाफ़वज़ों से बचोगे।
181.यह एक दूसरी अज्ञानता का खंडन है । यह अज्ञानता पहले भी बहुत-से दिमाग़ों में मौजूद थी और आज भी बहुत अधिक पाई जाती है। जिस तरह अज्ञान-काल के लोगों का एक गिरोह प्रतिशोध की दिशा में न्यायिक सीमोल्लंघन की ओर चला गया, उसी तरह एक दूसरा गिरोह क्षमा कर देने के मामले में दूसरी सीमा तक चला गया है और उसने मृत्युदंड के विरुद्ध इतना प्रचार किया है कि बहुत-से लोग उसे एक घिनौनी चीज़ समझने लगे हैं और दुनिया के बहुत-से देशों ने इसे बिल्कुल ख़त्म कर दिया है । कुरआन इसी पर अक्लवालों को संबोधित करके सचेत करता है कि किसास में समाज की ज़िन्दगी है। जो समाज इंसानी जान का सम्मान न करनेवालों की जान को प्रतिष्ठित समझता है, वह वास्तव में अपनी आस्तीन में साँप पालता है। तुम एक हत्यारे की जान बचाकर बहुत-से निर्दोष व्यक्तियों की जानें खतरे में डालते हों।
كُتِبَ عَلَيۡكُمۡ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ ٱلۡمَوۡتُ إِن تَرَكَ خَيۡرًا ٱلۡوَصِيَّةُ لِلۡوَٰلِدَيۡنِ وَٱلۡأَقۡرَبِينَ بِٱلۡمَعۡرُوفِۖ حَقًّا عَلَى ٱلۡمُتَّقِينَ ۝ 179
(180) तुमपर अनिवार्य किया गया है कि जब तुममें से किसी की मौत का वक़्त आए और वह अपने पीछे माल छोड़ रहा हो, तो माँ-बाप और रिश्तेदारों के लिए सामान्य नियम के अनुसार वसीयत करे। यह हक़ है मुत्तक़ी लोगों पर।182
182. यह आदेश उस ज़माने में दिया गया था, जबकि विरासत के बँटवारे के लिए अभी कोई क़ानून नहीं बना था। उस समय हर व्यक्ति पर अनिवार्य किया गया कि वह अपने वारिसों के हिस्से वसीयत के ज़रिए निश्चित कर जाए, ताकि उसके मरने के बाद न तो परिवार में झगड़े हों और न किसी हक़दार का हक़ मारा जाए। बाद में जब विरासत के बंटवारे के लिए अल्लाह ने स्वयं एक नियम बना दिया (जो आगे कुरआन को सूरा-4 में आनेवाला है) तो नबी (सल्ल.) ने यह कायदा तय कर दिया कि वारिसों के जो हिस्से अल्लाह ने निश्चित कर दिए हैं, उनमें वसीयत से कमी-बेशी नहीं की जा सकती, और गैर-वारिस के हक़ में कुल जायदाद के एक तिहाई से अधिक की वसीयत न करनी चाहिए। और मुस्लिम तथा गैर-मुस्लिम एक-दूसरे के वारिस नहीं हो सकते । इन आदेशों के स्पष्टीकरण के बाद अब इस आयत का उद्देश्य यह सुनिश्चित होता है कि आदमी अपना कम-से-कम दो तिहाई माल तो इसलिए छोड़ दे कि उसके मरने के बाद नियमानुसार उसके वारिसों में बँट जाए और अधिक-से-अधिक एक तिहाई माल की हद तक उसे अपने उन गैर-वारिस रिश्तेदारों के हक़ में वसीयत करनी चाहिए, जो उसके अपने घर में या उसके परिवार में सहायता के लायक हों, या जिन्हें वह परिवार के बाहर मदद का मुहताज पाता हो, या जनहित के कामों में से जिसकी भी वह मदद करना चाहे। बाद के लोगों ने वसीयत के इस आदेश को मात्र एक सिफ़ारिशी आदेश समझ लिया, यहाँ तक कि वसीयत का तरीका आम तौर से समाप्त हो होकर रह गया, लेकिन कुरआन मजीद में इसे एक 'हक़' करार दिया गया है, जो खुदा की ओर से नेक और परहेज़गार लोगों पर लागू होता है। अगर इस हक़ को अदा करना शुरू कर दिया जाए, तो बहुत से वे प्रश्न स्वयं ही हल हो जाएँ जो मीरास के बारे में लोगों को उलझन में डालते हैं। जैसे-उन पोतों और नवासों का मामला जिनके माँ-बाप दादा और नाना की ज़िन्दगी में ही मर जाते हैं।
فَمَنۢ بَدَّلَهُۥ بَعۡدَ مَا سَمِعَهُۥ فَإِنَّمَآ إِثۡمُهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ يُبَدِّلُونَهُۥٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٞ ۝ 180
(181) फिर जिन्होंने वसीयत सुनी और बाद में उसे बदल डाला, तो इसका गुनाह उन बदलनेवालों पर होगा। अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है।
فَمَنۡ خَافَ مِن مُّوصٖ جَنَفًا أَوۡ إِثۡمٗا فَأَصۡلَحَ بَيۡنَهُمۡ فَلَآ إِثۡمَ عَلَيۡهِۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ ۝ 181
(182) हाँ, जिसको यह डर हो कि वसीयत करनेवाले ने अनजाने में या जान-बूझकर हक़ मारा है, और फिर मामले से ताल्लुक़ रखनेवालों के बीच वह सुधार करे, तो उसपर कुछ गुनाह नहीं है। अल्लाह क्षमा करनेवाला और दया करनेवाला है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ ۝ 182
(183) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो ! तुमपर रोज़े अनिवार्य कर दिए गए, जिस तरह तुमसे पहले नबियों के अनुयायियों पर अनिवार्य किए गए थे। इससे आशा है कि तुममें तक़वा (ईश-भय, संयम) का गुण पैदा होगा।183
183.इस्लाम के अधिकांश आदेशों की तरह रोज़े को भी क्रमवार अनिवार्य किया गया है। नबी (सल्ल.) ने में मुसलमानों को केवल हर महीने तीन दिन के रोज़े रखने की हिदायत फरमाई थी, मगर ये रोज़े अनिवार्य न थे। फिर सन् 02 हि० में रमज़ान के रोज़ों का यह आदेश कुरआन में आया, मगर उसमें इतनी रिआयत रखी गई कि जो लोग रोज़े को सहन करने की शक्ति रखते हों और फिर भी रोज़ा न रखें, वे हर रोजे के बदले एक मिस्कीन को खाना खिला दिया करें। बाद में दूसरा आदेश आया और यह सामान्य रिआयत निरस्त कर दी गई। लेकिन बीमार और मुसाफ़िर और गर्भवती या दूध पिलानेवाली औरत और ऐसे बूढ़े लोगों के लिए जिनमें रोज़ा रखने की शक्ति न हो, इस रिआयत को पहले की तरह बाक़ी रहने दिया गया और उन्हें आदेश दिया गया कि बाद में जब यह विवशता दूर हो जाए, तो क़ज़ा के उतने रोज़े रख लें, जितने रमज़ान में उनसे छूट गए हैं।
أَيَّامٗا مَّعۡدُودَٰتٖۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوۡ عَلَىٰ سَفَرٖ فَعِدَّةٞ مِّنۡ أَيَّامٍ أُخَرَۚ وَعَلَى ٱلَّذِينَ يُطِيقُونَهُۥ فِدۡيَةٞ طَعَامُ مِسۡكِينٖۖ فَمَن تَطَوَّعَ خَيۡرٗا فَهُوَ خَيۡرٞ لَّهُۥۚ وَأَن تَصُومُواْ خَيۡرٞ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ۝ 183
(184) कुछ निश्चित दिनों के रोज़े हैं। अगर तुममें से कोई बीमार हो या सफ़र पर हो, तो दूसरे दिनों में उतनी ही तादाद पूरी कर ले और जो लोग रोज़ा रखने में समर्थ हों, (फिर न रखें) तो वे फ़िदया (प्रतिदान) दें। एक रोज़े का फ़िदया एक मिस्कीन को खाना खिलाना है और जो आदमी अपनी खुशी से कुछ ज़्यादा भलाई करे184, तो यह उसी के लिए बेहतर है। लेकिन अगर तुम समझो तो तुम्हारे लिए अच्छा यही है कि रोज़ा रखो !185
184.अर्थात् एक से अधिक व्यक्तियों को खाना खिलाए, या यह कि रोज़ा भी रखे और मिस्कीन (दीन-दुखी) को खाना भी खिलाए।
185.यहाँ तक वह आरंभिक आदेश है, जो रमज़ान के रोज़ों के बारे में सन् 02 हित में बद्र की लड़ाई से पहले उतरा था। इसके बाद आयतें इसके एक साल बाद उतरी और विषय को अनुकूलता को देखते हुए बयान के इसी क्रम में जोड़ दी गई।
شَهۡرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِيٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلۡقُرۡءَانُ هُدٗى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰتٖ مِّنَ ٱلۡهُدَىٰ وَٱلۡفُرۡقَانِۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهۡرَ فَلۡيَصُمۡهُۖ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوۡ عَلَىٰ سَفَرٖ فَعِدَّةٞ مِّنۡ أَيَّامٍ أُخَرَۗ يُرِيدُ ٱللَّهُ بِكُمُ ٱلۡيُسۡرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ ٱلۡعُسۡرَ وَلِتُكۡمِلُواْ ٱلۡعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُواْ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَىٰكُمۡ وَلَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ ۝ 184
(185) रमज़ान वह महीना है जिसमें कुरआन उतारा गया, जो इंसानों के लिए सर्वथा मार्गदर्शन है और ऐसी स्पष्ट शिक्षाओं पर आधारित है जो सीधा रास्ता दिखानेवाली और सत्य-असत्य का अन्तर खोलकर रख देनेवाली हैं। इसलिए अब से जो आदमी इस महीने को पाए, उसपर अनिवार्य है कि इस पूरे महीने के रोज़े रखे। और जो कोई बीमार हो या सफ़र पर हो, तो वह दूसरे दिनों में रोज़ों की तादाद पूरी कर ले।186 अल्लाह तुम्हारे साथ नमीं करना चाहता है, सख्ती करना नहीं चाहता। इसलिए यह तरीक़ा तुम्हें बताया जा रहा है ताकि तुम रोज़ों की तादाद पूरी कर सको और जो मार्गदर्शन अल्लाह ने तुम्हें प्रदान किया है, उसपर अल्लाह की किब्रियाई (बड़ाई) को प्रदर्शित और अंगीकार करो और कृतज्ञ बनो।187
186.सफ़र की हालत में रोज़ा रखना या न रखना आदमी की अपनी इच्छा पर छोड़ दिया गया है। नबी (सल्ल.) के साथ जो सहाबा सफ़र में जाया करते थे, उनमें कोई रोज़ा रखता था और कोई न रखता था और दोनों गिरोहों में से कोई दूसरे पर आपत्ति न करता था। स्वयं प्यारे नबी (सल्ल.) भी कभी सफ़र में रोज़ा रखते थे और कभी नहीं। एक सफ़र के मौके पर एक आदमी बदहाल होकर गिर गया और उसके चारों ओर लोग जमा हो गए। नबी (सल्ल.) ने यह हाल देखकर मालूम किया : क्या मामला है ? बताया गया कि रोज़े से है। फ़रमाया : यह नेकी नहीं है। लड़ाई के मौके पर तो आप आदेश देकर रोज़े से रोक दिया करते थे, ताकि शत्रु से लड़ने में कमज़ोरी न महसूस हो । हज़रत उमर (रजि.) की रिवायत है कि हम नबी (सल्ल.) के साथ दो बार रमज़ान में लड़ाई पर गए। पहली बार बद्र की लड़ाई में और अन्तिम बार मक्का-विजय के अवसर पर, और दोनों बार हमने रोज़े छोड़ दिए। सामान्य सफ़र के मामले में यह बात कि कितनी दूरी के सफ़र पर रोज़ा छोड़ा जा सकता है, नबी (सल्ल.) के किसी कथन से स्पष्ट नहीं होती और सहाबा किराम (रजि.) का व्यवहार इस बारे में अलग-अलग है। सही यह है कि जिस दूरी को सामान्य रूप से सफ़र समझा जाता है और जिसपर मुसाफिरों जैसी हालत इंसान पर छा जाती है, वह रोज़ा न रखने के लिए काफ़ी है। इसपर सभी सहमत हैं कि जिस दिन आदमी सफ़र की शुरुआत कर रहा हो, उस दिन का रोजा न रखने का उसे अधिकार है, चाहे तो घर से खाना खाकर चले और चाहे तो घर से निकलते ही खा ले । दोनों व्यवहार सहाबा के यहाँ मिलते हैं। यह बात कि अगर किसी शहर पर दुश्मन का हमला हो, तो क्या लोग अपनी जगह पर ठहरे होने के बाद भी युद्ध के लिए रोज़ा छोड़ सकते हैं, उलमा का इसमें मतभेद है।
187. अर्थात् जो लोग रमज़ान में किसी शरई मजबूरी के कारण रोज़े न रख सकें, उनके लिए अल्लाह ने दूसरे दिनों में उसकी क़ज़ा कर लेने का रास्ता भी खोल दिया है, ताकि कुरआन की जो नेमत उसने तुमको दी है, उसका शुक्र अदा करने के बहुमूल्य अवसर से तुम वंचित न रह जाओ। यहाँ यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि रमज़ान के रोज़ों को केवल इबादत और केवल तक़वा की ट्रेनिंग ही नहीं कहा गया है, बल्कि इन्हें इससे आगे बढ़कर मार्गदर्शन की उस महान नेमत पर अल्लाह के प्रति कृतज्ञता दर्शाना भी ठहराया गया है, जो कुरआन की शक्ल में उसने हमें प्रदान की है। सच तो यह है कि एक बुद्धिमान व्यक्ति के लिए किसी नेमत के प्रति कृतज्ञता प्रकाशन की सबसे अच्छी शक्ल अगर कोई हो सकती है, तो वह केवल यही है कि वह अपने आपको उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ज्यादा-से-ज़्यादा तैयार करे, जिसके लिए देनेवाले ने वह नेमत प्रदान की हो। कुरआन हमको इसलिए प्रदान किया गया है कि हम अल्लाह को प्रसन्नता का रास्ता जानकर खुद उसपर चलें और दुनिया को उसपर चलाएँ। इस उद्देश्य के लिए हमको तैयार करने का बेहतरीन तरीका रोज़ा है, इसलिए कुरआन के उतरने के महीने में हमारी रोज़ेदारी सिर्फ इबादत ही नहीं है और सिर्फ नैतिक प्रशिक्षण भी नहीं है, बल्कि उसके साथ स्वयं कुरआन की इस नेमत की भी सही और उचित कृतज्ञता प्रकट करनी है।
وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌۖ أُجِيبُ دَعۡوَةَ ٱلدَّاعِ إِذَا دَعَانِۖ فَلۡيَسۡتَجِيبُواْ لِي وَلۡيُؤۡمِنُواْ بِي لَعَلَّهُمۡ يَرۡشُدُونَ ۝ 185
(186) और ऐ नबी ! मेरे बन्दे अगर तुमसे मेरे बारे में पूछे, तो उन्हें बता दो कि मैं उनसे करीब ही हूँ। पुकारनेवाला जब मुझे पुकारता है, मैं उसकी पुकार सुनता और जवाब देता हूँ। इसलिए उन्हें चाहिए कि मेरी पुकार पर लपके और मुझपर ईमान लाए।188 (यह बात तुम उन्हें सुना दो) शायद कि वे सीधा रास्ता पा लें।189
188.अर्थात् यद्यपि तुम मुझे देख नहीं सकते और न अपनी चेतना से मुझको महसूस कर सकते हो। फिर भी मैं अपने हर बन्दे से इतना करीब हूँ कि जब वह चाहे, मुझसे विनय कर सकता है और अपनी प्रार्थनाओं का उत्तर पा सकता है । जिन अस्तित्वहीन और अधिकाररहित को तुमने अपनी नादानी से 'इलाह' (पूज्य-प्रभु) और रब बना रखा है, उनके पास तो तुम्हें दौड़-दौड़कर जाना पड़ता है और फिर भी वे तुम्हारी नहीं सुन सकते, मगर मैं असीम ष्टि का सर्वशक्तिमान अकेला शासक, तमाम अधिकारों और तमाम शक्तियों का मालिक, तुमसे इतना करीब हूँ कि तुम स्वयं बिना किसी माध्यम और वसीले और सिफ़ारिश के सीधे हर वक़्त और हर जगह मुझ तक अपनी अर्ज़ियाँ पहुँचा सकते हो, इसलिए तुम अपनी इस मूर्खता को छोड़ दो कि एक-एक अधिकारहीन बनावटी खुदा के दर पर मारे-मारे फिरते हो । मेरी पुकार पर लपककर मेरा दामन पकड़ लो।
189.अर्थात् तुम्हारे ज़रिए से यह सच्चाई मालूम करके उनकी आँखें खुल जाएँ और वे उस सही रवैए की ओर आ जाएँ, जिसमें उनकी अपनी ही भलाई है।
أُحِلَّ لَكُمۡ لَيۡلَةَ ٱلصِّيَامِ ٱلرَّفَثُ إِلَىٰ نِسَآئِكُمۡۚ هُنَّ لِبَاسٞ لَّكُمۡ وَأَنتُمۡ لِبَاسٞ لَّهُنَّۗ عَلِمَ ٱللَّهُ أَنَّكُمۡ كُنتُمۡ تَخۡتَانُونَ أَنفُسَكُمۡ فَتَابَ عَلَيۡكُمۡ وَعَفَا عَنكُمۡۖ فَٱلۡـَٰٔنَ بَٰشِرُوهُنَّ وَٱبۡتَغُواْ مَا كَتَبَ ٱللَّهُ لَكُمۡۚ وَكُلُواْ وَٱشۡرَبُواْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكُمُ ٱلۡخَيۡطُ ٱلۡأَبۡيَضُ مِنَ ٱلۡخَيۡطِ ٱلۡأَسۡوَدِ مِنَ ٱلۡفَجۡرِۖ ثُمَّ أَتِمُّواْ ٱلصِّيَامَ إِلَى ٱلَّيۡلِۚ وَلَا تُبَٰشِرُوهُنَّ وَأَنتُمۡ عَٰكِفُونَ فِي ٱلۡمَسَٰجِدِۗ تِلۡكَ حُدُودُ ٱللَّهِ فَلَا تَقۡرَبُوهَاۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ ءَايَٰتِهِۦ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمۡ يَتَّقُونَ ۝ 186
(187) तुम्हारे लिए रोजों के जमाने में रातों को अपनी बीवियों के पास जाना हलाल कर दिया गया है। वे तुम्हारे लिए लिबास है और तुम उनके लिए लिबास हो।190 अल्लाह को मालूम हो गया कि तुम लोग चुपके चुपके अपने आपसे खियानत कर रहे थे, मगर उसने तुम्हारा अपराध क्षमा कर दिया और तुम्हें छोड़ दिया। अब तुम अपनी बीवियों के साथ सहवास करो और जो आनन्द अल्लाह ने तुम्हारे लिए वैध कर दिया है, उसे प्राप्त करो191 और रातो को खाओ-पियो192 यहाँ तक कि तुमको रात की स्याही की धारी से सुबह की सफेदी की धारी स्पष्ट दिखाई देने लगे।193 तब यह सब काम छोड़कर रात तक अपना रोज़ा पूरा करो।194 और जब तुम मस्जिदों में एतिकाफ़ (एकान्तवास) में बैठे हो, तो बीवियों से सहवास न करो।195 ये अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ हैं, इनके क़रीब न फटकना।196 इस तरह अल्लाह अपने आदेश लोगों के लिए खोल-खोलकर बयान करता है, आशा है कि वे ग़लत रवैये से बचेंगे।
190.अर्थात् जिस तरह लिबास और शरीर के बीच कोई परदा नहीं रह सकता, बल्कि दोनों का आपसी संबंध और मिलना बिल्कुल अभिन्न होता है, उसी तरह तुम्हारा और तुम्हारी बीवियों का ताल्लुक़ भी है।
191.शुरू में यद्यपि इस प्रकार का कोई स्पष्ट आदेश मौजूद नहीं था कि रमज़ान की रातों में कोई व्यक्ति अपनी बीवी से सहवास न करे, लेकिन लोग अपनी जगह यही समझते थे कि ऐसा करना वैध नहीं है। फिर उसके अवैध या अप्रिय होने का विचार दिल में लिए हुए कभी-कभी अपनी बीवियों के पास चले जाते थे। यह मानों अपनी अन्तरात्मा के साथ ख़ियानत करना था और इससे आशंका थी कि एक अपराध और पाप की मनोवृत्ति उनके भीतर पलती रहेगी। इसलिए अल्लाह ने पहले इस खियानत पर चेतावनी दी और फिर फ़रमाया कि यह काम तुम्हारे लिए वैध है, इसलिए अब इसे बुरा काम समझते हुए न करो, बल्कि अल्लाह की इजाज़त से फायदा उठाते हुए दिल और अन्तरात्मा की पूरी पाकी के साथ करो।
195.एतिकाफ़ (एकान्तबास) में होने का मतलब यह है कि आदमी रमज़ान के आखिरी दस दिन मस्जिद में रहे और ये दिन अल्लाह के ज़िक्र और उसकी याद के लिए खास कर दे। इस एतिकाफ़ की हालत में आदमी अपनी इंसानी ज़रूरतों के लिए मस्जिद से बाहर जा सकता है, पर अनिवार्य है कि वह अपने आपको वासनापूर्ण रसास्वादन से रोके रखे।
196.यह नहीं फ़रमाया कि इन सीमाओं से आगे न बढ़ना, बल्कि यह कहा कि इनके करीब न फटकना इसका अर्थ यह है कि जिस जगह से मासियत (पाप) की सीमा शुरू होती है, ठीक उसी जगह के आखरी किनारों पर घूमते रहना आदमी के लिए खतरनाक है । भलाई इसमें है कि आदमी सीमा से दूर ही रहे, ताकि भूले से भी क़दम उसके पार न चला जाए । यही बात उस हदीस में बयान हुई है जिसमें नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया कि "हर बादशाह की हिमा होती है और अल्लाह को हिमा उसको वे सीमाएँ हैं जो हराम व हलाल का अन्तर करती हैं, तो जो जानवर उसके क़रीब चरता रहेगा तो संभव है कि वह एक दिन उसमें प्रवेश कर जाए।" हिमा उस चरागाह को कहते हैं जिसे कोई रईस या बादशाह पब्लिक के लिए निषिद्ध कर देता है।
196.यह नहीं फ़रमाया कि इन सीमाओं से आगे न बढ़ना, बल्कि यह कहा कि इनके करीब न फटकना इसका अर्थ यह है कि जिस जगह से मासियत (पाप) की सीमा शुरू होती है, ठीक उसी जगह के आखरी किनारों पर घूमते रहना आदमी के लिए खतरनाक है । भलाई इसमें है कि आदमी सीमा से दूर ही रहे, ताकि भूले से भी क़दम उसके पार न चला जाए । यही बात उस हदीस में बयान हुई है जिसमें नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया कि "हर बादशाह की हिमा होती है और अल्लाह को हिमा उसको वे सीमाएँ हैं जो हराम व हलाल का अन्तर करती हैं, तो जो जानवर उसके क़रीब चरता रहेगा तो संभव है कि वह एक दिन उसमें प्रवेश कर जाए।" हिमा उस चरागाह को कहते हैं जिसे कोई रईस या बादशाह पब्लिक के लिए निषिद्ध कर देता है।
196.यह नहीं फ़रमाया कि इन सीमाओं से आगे न बढ़ना, बल्कि यह कहा कि इनके करीब न फटकना इसका अर्थ यह है कि जिस जगह से मासियत (पाप) की सीमा शुरू होती है, ठीक उसी जगह के आखरी किनारों पर घूमते रहना आदमी के लिए खतरनाक है । भलाई इसमें है कि आदमी सीमा से दूर ही रहे, ताकि भूले से भी क़दम उसके पार न चला जाए । यही बात उस हदीस में बयान हुई है जिसमें नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया कि "हर बादशाह की हिमा होती है और अल्लाह को हिमा उसको वे सीमाएँ हैं जो हराम व हलाल का अन्तर करती हैं, तो जो जानवर उसके क़रीब चरता रहेगा तो संभव है कि वह एक दिन उसमें प्रवेश कर जाए।" हिमा उस चरागाह को कहते हैं जिसे कोई रईस या बादशाह पब्लिक के लिए निषिद्ध कर देता है।
196.यह नहीं फ़रमाया कि इन सीमाओं से आगे न बढ़ना, बल्कि यह कहा कि इनके करीब न फटकना इसका अर्थ यह है कि जिस जगह से मासियत (पाप) की सीमा शुरू होती है, ठीक उसी जगह के आखरी किनारों पर घूमते रहना आदमी के लिए खतरनाक है । भलाई इसमें है कि आदमी सीमा से दूर ही रहे, ताकि भूले से भी क़दम उसके पार न चला जाए । यही बात उस हदीस में बयान हुई है जिसमें नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया कि "हर बादशाह की हिमा होती है और अल्लाह को हिमा उसको वे सीमाएँ हैं जो हराम व हलाल का अन्तर करती हैं, तो जो जानवर उसके क़रीब चरता रहेगा तो संभव है कि वह एक दिन उसमें प्रवेश कर जाए।" हिमा उस चरागाह को कहते हैं जिसे कोई रईस या बादशाह पब्लिक के लिए निषिद्ध कर देता है।
196.यह नहीं फ़रमाया कि इन सीमाओं से आगे न बढ़ना, बल्कि यह कहा कि इनके करीब न फटकना इसका अर्थ यह है कि जिस जगह से मासियत (पाप) की सीमा शुरू होती है, ठीक उसी जगह के आखरी किनारों पर घूमते रहना आदमी के लिए खतरनाक है । भलाई इसमें है कि आदमी सीमा से दूर ही रहे, ताकि भूले से भी क़दम उसके पार न चला जाए । यही बात उस हदीस में बयान हुई है जिसमें नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया कि "हर बादशाह की हिमा होती है और अल्लाह को हिमा उसको वे सीमाएँ हैं जो हराम व हलाल का अन्तर करती हैं, तो जो जानवर उसके क़रीब चरता रहेगा तो संभव है कि वह एक दिन उसमें प्रवेश कर जाए।" हिमा उस चरागाह को कहते हैं जिसे कोई रईस या बादशाह पब्लिक के लिए निषिद्ध कर देता है।
196.यह नहीं फ़रमाया कि इन सीमाओं से आगे न बढ़ना, बल्कि यह कहा कि इनके करीब न फटकना इसका अर्थ यह है कि जिस जगह से मासियत (पाप) की सीमा शुरू होती है, ठीक उसी जगह के आखरी किनारों पर घूमते रहना आदमी के लिए खतरनाक है । भलाई इसमें है कि आदमी सीमा से दूर ही रहे, ताकि भूले से भी क़दम उसके पार न चला जाए । यही बात उस हदीस में बयान हुई है जिसमें नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया कि "हर बादशाह की हिमा होती है और अल्लाह को हिमा उसको वे सीमाएँ हैं जो हराम व हलाल का अन्तर करती हैं, तो जो जानवर उसके क़रीब चरता रहेगा तो संभव है कि वह एक दिन उसमें प्रवेश कर जाए।" हिमा उस चरागाह को कहते हैं जिसे कोई रईस या बादशाह पब्लिक के लिए निषिद्ध कर देता है।
196.यह नहीं फ़रमाया कि इन सीमाओं से आगे न बढ़ना, बल्कि यह कहा कि इनके करीब न फटकना इसका अर्थ यह है कि जिस जगह से मासियत (पाप) की सीमा शुरू होती है, ठीक उसी जगह के आखरी किनारों पर घूमते रहना आदमी के लिए खतरनाक है । भलाई इसमें है कि आदमी सीमा से दूर ही रहे, ताकि भूले से भी क़दम उसके पार न चला जाए । यही बात उस हदीस में बयान हुई है जिसमें नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया कि "हर बादशाह की हिमा होती है और अल्लाह को हिमा उसको वे सीमाएँ हैं जो हराम व हलाल का अन्तर करती हैं, तो जो जानवर उसके क़रीब चरता रहेगा तो संभव है कि वह एक दिन उसमें प्रवेश कर जाए।" हिमा उस चरागाह को कहते हैं जिसे कोई रईस या बादशाह पब्लिक के लिए निषिद्ध कर देता है।
وَلَا تَأۡكُلُوٓاْ أَمۡوَٰلَكُم بَيۡنَكُم بِٱلۡبَٰطِلِ وَتُدۡلُواْ بِهَآ إِلَى ٱلۡحُكَّامِ لِتَأۡكُلُواْ فَرِيقٗا مِّنۡ أَمۡوَٰلِ ٱلنَّاسِ بِٱلۡإِثۡمِ وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ۝ 187
(188) और तुम लोग न तो आपस में एक-दूसरे के माल अनुचित ढंग से खाओ और न अधिकारियों के आगे उनको इस काम के लिए पेश करो कि तुम्हें दूसरों के माल का कोई हिस्सा जान-बूझकर अन्यायपूर्ण ढंग से खाने का मौक़ा मिल जाए।197
197.इस आयत का एक अर्थ तो यह है कि अधिकारियों को घूस देकर अवैध लाभ उठाने की कोशिश न करो और दूसरा अर्थ यह है कि जब तुम खुद जानते हो कि माल दूसरे आदमी का है, तो सिर्फ इसलिए कि उसके पास अपनी मिल्कियत का कोई सुबूत नहीं है या इस वजह से कि किसी ऐंच-पेंच से तुम उसे खा सकते हो, इसका मुक़द्दमा न्यायालय में न ले जाओ। हो सकता है कि न्यायाधिकारी मुक़द्दमे की रिपोर्ट की दृष्टि से वह माल तुमको दिलवा दे। लेकिन न्यायालय से उसकी मिल्कियत का अधिकार पा लेने के बावजूद वास्तव में तुम उसके वैध मालिक न बन जाओगे। हदीस में आता है कि नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया- “मैं बहरहाल एक इंसान ही तो हूँ । हो सकता है कि तुम एक मुक़द्दमा मेरे पास लाओ और तुममें से एक पक्ष दूसरे के मुकाबले में ज़्यादा तेज़ बोलनेवाला हो और उसकी दलीलें सुनकर मैं उसके पक्ष में फैसला दे दूँ। मगर यह समझ लो कि अगर इस तरह अपने किसी भाई के हक में से कोई चीज़ तुमने मेरे फैसले के द्वारा प्राप्त की, तो वास्तव में दोज़ख़ का एक टुकड़ा तुम प्राप्त करोगे।"
۞يَسۡـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلۡأَهِلَّةِۖ قُلۡ هِيَ مَوَٰقِيتُ لِلنَّاسِ وَٱلۡحَجِّۗ وَلَيۡسَ ٱلۡبِرُّ بِأَن تَأۡتُواْ ٱلۡبُيُوتَ مِن ظُهُورِهَا وَلَٰكِنَّ ٱلۡبِرَّ مَنِ ٱتَّقَىٰۗ وَأۡتُواْ ٱلۡبُيُوتَ مِنۡ أَبۡوَٰبِهَاۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمۡ تُفۡلِحُونَ ۝ 188
189) ऐ नबी ! लोग तुमसे चाँद की घटती-बढ़ती शक्लों के बारे में पूछते हैं। कहो : ये लोगों के लिए तिथियों के निर्धारण की और हज की निशानियाँ हैं।198 यह भी इनसे कहो : यह कोई नेकी का काम नहीं है कि तुम अपने घरों में पीछे की ओर से प्रवेश करते हो, नेकी तो वास्तव में यह है कि आदमी अल्लाह की नाराज़ी से बचे। इसलिए तुम अपने घरों में दरवाज़े ही से आया करो। अलबत्ता अल्लाह से डरते रहो, शायद कि तुम्हें सफलता मिल जाए।199
198.चाँद का घटना बढ़ना एक ऐसा दृश्य है, जिसने हर युग में इनसान के ध्यान को अपनी ओर खींचा है और उसके बारे में तरह-तरह के अंधविश्वास और रीति-रिवाज दुनिया की कौमों में पाए जाते रहे हैं और अब तक पाए जाते हैं। अरबों में भी इस तरह के विचार |और अंधविश्वास भरी रस्में ] पाई जाती थीं। इन्हीं चीज़ों को वास्तविकता नबी (सल्ल.) से मालूम की गई। जवाब में अल्लाह ने बताया कि यह घटता-बढ़ता चाँद तुम्हारे लिए इसके सिवा कुछ नहीं कि एक प्राकृतिक जंतरी है, जो आसमान में प्रकट होकर दुनिया भर के लोगों को एक ही समय में उनकी तारीखों (तिथियों) का हिसाब बताती रहती है। हज का उल्लेख मुख्य रूप से इसलिए किया गया कि अरबों के धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन में इसका महत्व सबसे बढ़कर था। साल के चार महीने हज और उमरे से जुड़े हुए थे। इन महीनों में लड़ाइयाँ बन्द रहतीं । रास्तों में कोई खतरा न होता और शान्ति के कारण व्यापार और कारोबार में उन्नति होती थी।
199.जो अंधविश्वास भरी रस्में अरब में पाई जाती थीं, उनमें से एक रस्म यह भी थी कि जब हज के लिए एहराम बाँध लेते, तो अपने घरों में दरवाज़े से दाखिल न होते थे, बल्कि पीछे से दीवार कूदकर या दीवार में खिड़की-सी बनाकर दाखिल होते थे, साथ ही यह भी कि यात्रा से वापस आकर भी घरों में पीछे से दाखिल हुआ करते थे। इस आयत में न केवल इस रस्म का खंडन किया गया है, बल्कि तमाम अंधविश्वासों पर यह कहकर चोट लगाई गई है कि नेकी वास्तव में अल्लाह से डरने और उसके आदेशों के उल्लंघन से म बचने का नाम है, उन निरर्थक रस्मों से नेकी का कोई. संबंध नहीं, जो केवल बाप-दादा के अन्धानुकरण में अपनाई जा रही हैं।
وَقَٰتِلُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ يُقَٰتِلُونَكُمۡ وَلَا تَعۡتَدُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلۡمُعۡتَدِينَ ۝ 189
(190) और तग अल्लाह की राह में उन लोगों से लड़ो, जो तुमसे लड़ते हैं,200 मगर ज़्यादती न करो कि अल्लाह ज़्यादती करनेवालों को पसन्द नहीं करता।201
200.अर्थात् जो लोग अल्लाह के काम में तुम्हारा रास्ता रोकते हैं, और इस कारण तुम्हारे शत्रु बन गए हैं कि तुम अल्लाह के आदेशानुसार जीवन-व्यवस्था में सुधार लाना चाहते हो और सुधार के इस काम में रुकावट पैदा करने के लिए दमन-चक्र चला रहे हैं, उनसे लड़ो। इससे पहले जब तक मुसलमान कमज़ोर और बिखरे हुए थे, उनको केवल प्रचार (तबलीग़) का आदेश था और विरोधियों के अन्याय व अत्याचार पर धीरज रखने की बात कही जाती थी। अब मदीना में उनका छोटा-सा नगरीय राज्य बन जाने के बाद पहली बार आदेश दिया जा रहा है कि जो लोग सुधार की इस राह में हथियारबन्द रुकावटें डालते हैं, उनको तलवार का जवाब तलवार से दो। इसके बाद ही बद्र को लड़ाई हुई और लड़ाइयों का सिलसिला शुरू हो गया।
201.अर्थात् तुम्हारी लड़ाई न तो अपने भौतिक उद्देश्यों के लिए हो, न उन लोगों पर हाथ उठाओ जो सत्य धर्म के रास्ते में रुकावटें नहीं पैदा करते और न लड़ाई में अज्ञानता के तरीके अपनाओ। औरतों, बच्चों, बूढ़ों और घायलों पर हाथ उठाना, दुश्मन के क़त्ल किए गए लोगों के नाक-कान या अन्य कोई अंग काटना, खेतों और चौपायों को ख़ामवाह नुकसान पहुंचाना और दूसरे तमाम अत्याचार और बर्बरतापूर्ण कार्य 'सीमा से आगे बढ़ने' को परिभाषा में आते हैं और हदीस में इन सभी कामों से रोका गया है। आयत का न अभिप्राय यह है कि ताक़त का इस्तेमाल वहीं किया जाए, जहाँ वह अनिवार्य हो और उसी हद तक किया जाए , जितनी उसकी ज़रूरत हो।
وَٱقۡتُلُوهُمۡ حَيۡثُ ثَقِفۡتُمُوهُمۡ وَأَخۡرِجُوهُم مِّنۡ حَيۡثُ أَخۡرَجُوكُمۡۚ وَٱلۡفِتۡنَةُ أَشَدُّ مِنَ ٱلۡقَتۡلِۚ وَلَا تُقَٰتِلُوهُمۡ عِندَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ حَتَّىٰ يُقَٰتِلُوكُمۡ فِيهِۖ فَإِن قَٰتَلُوكُمۡ فَٱقۡتُلُوهُمۡۗ كَذَٰلِكَ جَزَآءُ ٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 190
(191) उनसे लड़ो जहाँ भी तुम्हारी उनसे मुठभेड़ हो जाए और उन्हें निकालो, जहाँ से उन्होंने तुम्हें निकाला है, इसलिए कि क़त्ल यद्यपि बुरा है, पर फ़ितना उससे भी अधिक बुरा है।202 और मस्जिदे हराम (काबा) के क़रीब जब तक वे तुमसे न लड़ें तुम भी न लड़ो, मगर जब वे वहाँ लड़ने से न चूकें, तो तुम भी बिना संकोच के उन्हें मारो कि ऐसे विधर्मियों की यही सज़ा है।
202.यहाँ 'फितने' का शब्द उसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, जिसमें अंग्रेज़ी का शब्द Persecution प्रयुक्त होता है, अर्थात् किसी गिरोह या आदमी को केवल इस कारण अन्याय व अत्याचार का निशाना बनाना कि उसने समय के प्रचलित विचारों और सिद्धान्तों के स्थान पर कुछ दूसरे विचारों और सिद्धान्तों को सत्य पाकर अपना लिया है और आलोचना और प्रचार-प्रसार के द्वारा समाज में पाई जानेवाली व्यवस्था में सुधार लाने की कोशिश करता है। आयत का अभिप्राय यह है कि निस्सन्देह इंसानी खून बहाना बहुत बुरा काम है, लेकिन जब कोई इंसानी गिरोह ज़बरदस्ती बलपूर्वक अपने विचारों को दूसरों पर थोपे और लोगों को सत्य ग्रहण करने से ज़बरदस्ती रोके. तो वह क़त्ल के मुकाबले में ज़्यादा बड़ी बुराई करता है और ऐसे गिरोह को बलपूर्वक हटा देना बिल्कुल उचित है।
فَإِنِ ٱنتَهَوۡاْ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ ۝ 191
(192) फिर अगर वे रुक जाएँ, तो जान लो कि अल्लाह क्षमा करनेवाला और दया करनेवाला है।203
203.अर्थात् तुम जिस ख़ुदा पर ईमान लाए हो, उसका गुण यह है कि बुरे से बुरा अपराधी और पापी को भी क्षमा कर देता है, जबकि वह अपने विद्रोहपूर्ण रवैए से रुक जाए । यही गुण तुम अपने भीतर भी पैदा करो। जब तक कोई गिरोह अल्लाह के रास्ते में रुकावटें पैदा करे,बस उसी वक़्त तक उससे तुम्हारी लड़ाई भी रहे और जब वह अपना रवैया छोड़ दे, तो तुम्हारा हाथ भी फिर उसपर न उठे।
وَقَٰتِلُوهُمۡ حَتَّىٰ لَا تَكُونَ فِتۡنَةٞ وَيَكُونَ ٱلدِّينُ لِلَّهِۖ فَإِنِ ٱنتَهَوۡاْ فَلَا عُدۡوَٰنَ إِلَّا عَلَى ٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 192
(193) तुम उनसे लड़ते रहो, यहाँ तक कि फ़ितना बाक़ी न रहे और दीन अल्लाह के लिए हो जाए।204 फिर अगर वे रुक जाएँ, तो समझ लो कि ज़ालिमों के अलावा और किसी पर हाथ उठाना सही नहीं है।205
204.यहाँ 'फ़ितने से तात्पर्य वह हालत है जिसमें 'दीन' अल्लाह के बजाय किसी और के लिए हो और लड़ाई का उद्देश्य यह है कि यह फ़ितना ख़त्म हो जाए, और 'दीन' केवल अल्लाह के लिए हो। अरबी भाषा में 'दीन' का अर्थ 'आज्ञापालन' है और परिभाषा में इससे तात्पर्य जीवन को वह व्यवस्था है, जो किसी को सबसे ऊँचा मानकर उसके आदेशों और कानूनों की पैरवी में अपनाई जाए। तो समाज को वह हालत, जिसमें बन्दों पर बन्दों का प्रभुत्व और शासन चले और जिसमें अल्लाह के कानून के अनुसार जीवन बिताना संभव न रहे 'फ़ितने' की हालत है और इस्लामी लड़ाई होती ही इसलिए है कि इस 'फ़ितने की जगह ऐसी स्थिति पैदा हो, जिसमें बन्दे केवल खुदा के कानून के अनुयायी बनकर रहें।
205. रुक जाने से तात्पर्य इनकार करनेवाले विरोधियों का अपने इनकार और बहुदेववाद से रुक जाना नहीं, बल्कि 'फि़तने' से रुक जाना है। इंकारी, बहुदेववादी और अनीश्वरवादी, सभी को अधिकार है कि अपना जो विश्वास रखता है, रखे और जिसकी चाहे उपासना करे या न करे, लेकिन उसे यह अधिकार कदापि नहीं है कि ख़ुदा को ज़मीन पर अल्लाह के कानून के बजाय अपने झूठे क़ानून लागू करे और खुदा के बन्दों को अल्लाह के अलावा किसी का बन्दा बनाए। [इस 'फ़ितने' की जड़ काटने का हर संभव यत्न किया जाएगा। और यह जो फ़रमाया कि अगर वे रुक जाएँ, तो ज़ालिमों के सिवा किसी पर हाथ उठाना सही नहीं, तो इससे यह संकेत मिलता है कि जब असत्य पर आधारित व्यवस्था के स्था पर सत्य व्यवस्था स्थापित हो जाए. तो आम लोगों को तो माफ कर दिया जाएगा, लेकिन ऐसे लोगों को सजा देने में सत्यवादियों की नीति बिल्कुल सही होगी, जिन्होंने अपने सत्ता-काल में सत्य पर आधारित व्यवस्था का रास्ता रोकने के लिए अन्याय व अत्याचार की हद कर दी हो । चुनाँचे बद्र की लड़ाई के कैदियों में से उक़बा बिन अबी मुऐत और नज़र बिन हारिस का क़त्ल और मक्का विजय के बाद नबी (सल्ल.) का 17 आदमियों को आम माफी से भी अलग कर देना और फिर उनमें से चार को मौत की सज़ा देना इसी अनुमति की वजह से था।
ٱلشَّهۡرُ ٱلۡحَرَامُ بِٱلشَّهۡرِ ٱلۡحَرَامِ وَٱلۡحُرُمَٰتُ قِصَاصٞۚ فَمَنِ ٱعۡتَدَىٰ عَلَيۡكُمۡ فَٱعۡتَدُواْ عَلَيۡهِ بِمِثۡلِ مَا ٱعۡتَدَىٰ عَلَيۡكُمۡۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلۡمُتَّقِينَ ۝ 193
(194) हराम (प्रतिष्ठित) महीने का बदला हराम महीना ही है और तमाम प्रतिष्ठाओं का लिहाज़ बराबरी के साथ होगा।206 इसलिए जो तुमपर हाथ उठाए तुम भी उसी तरह उसपर हाथ उठाओ, अलबत्ता अल्लाह से डरते रहो और यह जान रखो कि अल्लाह उन्हीं लोगों के साथ है जो उसकी सीमाओं का उल्लंघन करने से बचते हैं।
206.अरबों में हज़रत इबराहीम के समय से यह नियम चला आ रहा था कि ज़ीक़ादा, ज़िलहिज्जा और मुहर्रम के तीन महीने हज के लिए ख़ास थे और रजब का महीना उमरे के लिए ख़ास किया गया था, और इन चार महीनों में लड़ाई, हत्या और लूट-पाट वर्जित की गई थी, ताकि काबा की ज़ियारत करनेवाले अम्न व अमान के साथ अल्लाह के घर तक जाएँ और अपने घरों को वापस हो सकें। इस कारण इन महीनों को हराम (प्रतिष्ठित) महीना कहा जाता था, अर्थात् हुर्मतवाले महीने। आयत का उद्देश्य यह है कि प्रतिष्ठित महीने की प्रतिष्ठा का लिहाज़ विधर्मी करें, तो मुसलमान भी करें और अगर वे इस प्रतिष्ठा को नज़रअंदाज़ करके किसी प्रतिष्ठित महीने में मुसलमानों पर हाथ उठा दें, तो फिर मुसलमान भी प्रतिष्ठित महीने में बदला लेने का हक़ रखते हैं।
وَأَنفِقُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَا تُلۡقُواْ بِأَيۡدِيكُمۡ إِلَى ٱلتَّهۡلُكَةِ وَأَحۡسِنُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُحۡسِنِينَ ۝ 194
(195) अल्लाह की राह में खर्च करो और अपने हाथों अपने आपको तबाही में न डालो।207 अच्छे-से-अच्छा तरीका अपनाओ कि अल्लाह अच्छे-से-अच्छा तरीका अपनानेवालों को पसंद करता है।208
207.आयत का अर्थ यह है कि अगर तुम खुदा के दीन को सरबुलंद करने के लिए अपना माल खर्च न करोगे और उसके मुकाबले में अपने स्वार्थ को प्रिय रखोगे, तो यह तुम्हारे लिए दुनिया में भी विनाश का कारण होगा और आख़िरत में भी। दुनिया में तुम शत्रुओं के हाथों ज़लील और अपमानित होकर रहोगे और आख़िरत में तुमसे सख्त पूछ-गछ होगी।
208.कर्म की एक श्रेणी यह है कि आदमी के सुपुर्द जो सेवा हो, उसे बस कर दे और दूसरी श्रेणी यह है कि उसे भले तरीक़े से करे और उसे पूरा करने का हर संभव यत्न करे। पहली श्रेणी मात्र आज्ञापालन की श्रेणी है, जिसके लिए सिर्फ 'तक़वा' और डर काफ़ी हो जाता है और दूसरी श्रेणी एहसान की श्रेणी है जिसके लिए मुहब्बत और गहरे दिली लगाव की ज़रूरत होती है।
وَأَتِمُّواْ ٱلۡحَجَّ وَٱلۡعُمۡرَةَ لِلَّهِۚ فَإِنۡ أُحۡصِرۡتُمۡ فَمَا ٱسۡتَيۡسَرَ مِنَ ٱلۡهَدۡيِۖ وَلَا تَحۡلِقُواْ رُءُوسَكُمۡ حَتَّىٰ يَبۡلُغَ ٱلۡهَدۡيُ مَحِلَّهُۥۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوۡ بِهِۦٓ أَذٗى مِّن رَّأۡسِهِۦ فَفِدۡيَةٞ مِّن صِيَامٍ أَوۡ صَدَقَةٍ أَوۡ نُسُكٖۚ فَإِذَآ أَمِنتُمۡ فَمَن تَمَتَّعَ بِٱلۡعُمۡرَةِ إِلَى ٱلۡحَجِّ فَمَا ٱسۡتَيۡسَرَ مِنَ ٱلۡهَدۡيِۚ فَمَن لَّمۡ يَجِدۡ فَصِيَامُ ثَلَٰثَةِ أَيَّامٖ فِي ٱلۡحَجِّ وَسَبۡعَةٍ إِذَا رَجَعۡتُمۡۗ تِلۡكَ عَشَرَةٞ كَامِلَةٞۗ ذَٰلِكَ لِمَن لَّمۡ يَكُنۡ أَهۡلُهُۥ حَاضِرِي ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلۡعِقَابِ ۝ 195
(196) अल्लाह की प्रसन्नता के लिए जब हज और उमरे की नीयत करो, तो उसे पूरा करो और अगर कहीं घिर जाओ तो जो कुरबानी उपलब्ध हो, अल्लाह के हुजूर में पेश करो।209 और अपने सिर न मूंडो जब तक कि कुरबानी अपनी जगह न पहुँच जाए।210 मगर जो आदमी रोगी हो या जिसके सिर में कोई तकलीफ़ हो और इस कारण अपना सिर मुंडवा ले तो उसे चाहिए कि प्रतिदान (फ़िदया) के रूप में रोजे रखे या सदक़ा दे या कुरबानी करे।211 फिर अगर तुम्हें अम्न हासिल हो जाएं212 (और तुम हज से पहले मक्का पहुँच जाओ) तो जो व्यक्ति तुममें से हज का ज़माना आने तक उमरे का लाभ उठाए, वह यथा सामर्थ्य क़ुरबानी दे और अगर कुरबानी उपलब्ध न हो, तो तीन रोजे हज के ज़माने में और सात घर पहुँचकर, इस तरह पूरे दस रोजे रख ले। यह रियायत उन लोगों के लिए है जिनके घर-बार मस्जिदे हराम (काबा) के क़रीब न हों।213 अल्लाह के इन आदेशों की अवज्ञा से बचो और अच्छी तरह जान लो कि अल्लाह कड़ी सज़ा देनेवाला है।
209.अर्थात् अगर रास्ते में कोई ऐसी वजह पेश आ जाए, जिससे आगे जाना असंभव हो और मजबूर होकर रुक जाना पड़े, तो ऊँट, गाय, बकरी में से जो जानवर भी उपलब्ध हो, अल्लाह के लिए कुरबान कर दो।
210.इस बात में मतभेद है कि कुरबानी के अपनी जगह पहुँच जाने का क्या अर्थ है। हनफ़ी फुकहा (धर्मशास्त्रियों) के नज़दीक इससे तात्पर्य हरम है, अर्थात् अगर आदमी रास्ते में रुक जाने पर मजबूर हो, तो अपनी कुरबानी का जानवर या उसकी कीमत भेज दे, ताकि उसकी ओर से हरम की सीमाओं में कुरबानी की जाए । और इमाम मालिक और शाफ़ई (रह.) के नज़दीक इसका अर्थ यह है कि जहाँ आदमी घिर गया हो, उसे चाहिए कि वहीं कुरबानी कर दे। सिर मुंडने से तात्पर्य हजामत है। मतलब यह है कि जब तक कुरबानी न कर लो, हजामत न बनवाओ।
ٱلۡحَجُّ أَشۡهُرٞ مَّعۡلُومَٰتٞۚ فَمَن فَرَضَ فِيهِنَّ ٱلۡحَجَّ فَلَا رَفَثَ وَلَا فُسُوقَ وَلَا جِدَالَ فِي ٱلۡحَجِّۗ وَمَا تَفۡعَلُواْ مِنۡ خَيۡرٖ يَعۡلَمۡهُ ٱللَّهُۗ وَتَزَوَّدُواْ فَإِنَّ خَيۡرَ ٱلزَّادِ ٱلتَّقۡوَىٰۖ وَٱتَّقُونِ يَٰٓأُوْلِي ٱلۡأَلۡبَٰبِ ۝ 196
(197) हज के महीने सबको मालूम हैं। जो व्यक्ति इन निश्चित महीनों में हज की नीयत करे, उसे सावधान रहना चाहिए कि हज के दौरान में उससे कोई वासनामय कार्य214, कोई बुरा काम215, कोई लड़ाई-झगड़े की बात216 न होने पाए, और जो नेक काम तुम करोगे, वह अल्लाह के ज्ञान में होगा। हज-यात्रा के लिए रास्ते का सामान (पाथेय) साथ ले जाओ और सबसे बेहतर रास्ते का सामान परहेज़गारी है। तो ऐ सूझ-बूझवालो ! अवज्ञा से बचो।217
214.एहराम की हालत में पति और पत्नी को न केवल सहवास से रोक दिया गया है, बल्कि उनमें आपस में कोई ऐसी बातचीत भी न होनी चाहिए, जो काम-वासना पर आधारित हो।
215.अवज्ञा और पाप के तमाम काम, यद्यपि अपने आपमें अवैध हैं, लेकिन एहराम की हालत में इनका गुनाह बहुत बड़ा है।
لَيۡسَ عَلَيۡكُمۡ جُنَاحٌ أَن تَبۡتَغُواْ فَضۡلٗا مِّن رَّبِّكُمۡۚ فَإِذَآ أَفَضۡتُم مِّنۡ عَرَفَٰتٖ فَٱذۡكُرُواْ ٱللَّهَ عِندَ ٱلۡمَشۡعَرِ ٱلۡحَرَامِۖ وَٱذۡكُرُوهُ كَمَا هَدَىٰكُمۡ وَإِن كُنتُم مِّن قَبۡلِهِۦ لَمِنَ ٱلضَّآلِّينَ ۝ 197
(198) और अगर हज के साथ-साथ तुम अपने रब का 'अनुग्रह' भी खोजते जाओ, तो इसमें कोई हरज नहीं।218 फिर जब अरफ़ात से चलो तो मशअरे हराम (मुज़दलफा) के पास ठहरकर अल्लाह को याद करो और उस तरह याद करो, जिस तरह उसने तुम्हें निर्देश दिया है, वरना इससे पहले तो लोग भटके हुए थे।219
218.यह भी पुराने अरबों का अज्ञानता से भरा एक विचार था कि हज की यात्रा के समय रोज़ी कमाने के लिए काम करने को वे बुरा समझते थे, क्योंकि उनके नज़दीक रोज़ी कमाने का काम दुनियादारी का एक काम था और हज जैसे एक धार्मिक कार्य के करते समय यह करना ग़लत था। कुरआन इस विचार को रद्द करता है और उन्हें बताता है कि एक खुदापरस्त आदमी जब ख़ुदा के कानून का मान-सम्मान ध्यान में रखते हुए अपनी रोज़ी के लिए जिद्दोजुहद करता है, तो वास्तव में अपने रब का अनुग्रह तलाश करता है, और कोई गुनाह नहीं अगर वह अपने रब की प्रसन्नता के लिए यात्रा करते हुए उसका अनुग्रह भी खोजता जाए।
219.अर्थात् अज्ञानता के समय में अल्लाह की इबादत के साथ जिन दूसरे अनेकेश्वरवादी और अज्ञानतापूर्ण कामों की मिलावट होती थी, उन सबको छोड़ दो और अब जो मार्गदर्शन अल्लाह ने तुम्हें दिया है, उसके मुताबिक एकाग्र होकर अल्लाह की इबादत करो।
ثُمَّ أَفِيضُواْ مِنۡ حَيۡثُ أَفَاضَ ٱلنَّاسُ وَٱسۡتَغۡفِرُواْ ٱللَّهَۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ ۝ 198
(199) फिर जहाँ से सब लोग पलटते हैं, वहीं से तुम भी पलटो और अल्लाह से माफ़ी चाहो220, निश्चय ही वह क्षमा करनेवाला और दया करनेवाला है।
220.हज़रत इबराहीम और इसमाईल (अलैहिमुस्सलाम) के समय से अरबों में हज का प्रचलित तरीक़ा यह था कि 9 जिलहिज्जा को मिना से अरफ़ात जाते थे और रात को वहाँ से पलटकर मुज़दलफ़ा में ठहरते थे। मगर बाद के ज़माने में जब धीरे धीरे कुरैश का पुरोहितवाद स्थापित हो गया, तो उन्होंने कहा : हम हरमवाले (काबे वाले) हैं, हमारे पद से यह बात गिरी हुई है कि हम आम अरबवालों के साथ अरफात तक जाएँ। अतएव उन्होंने अपने लिए यह विशिष्टता का ढंग अपनाया कि मुज़दलफ़ा तक जाकर हो पलट आते और आम लोगों को अरफात तक जाने के लिए छोड़ देते थे। फिर यही श्रेष्ठता बनो खुज़ाआ, बनी किनाना और उन दूसरे कबोलों को भी प्राप्त हो गई, जिनके साथ कुरैश के शादी-ब्याह के रिश्ते थे। इसी गर्व और अहंकार का बुत इस आयत में तोड़ा गया है। उनको आदेश दिया जा रहा है कि और सब लोग जहाँ तक जाते हैं,उन्हीं के साथ जाओ, उन्हीं के साथ ठहरो, उन्हीं के साथ पलटो और अब तक अज्ञानता के गर्व और घमंड के कारण इबराहीमी सुन्नत की जो अवज्ञा तुम करते रहे हो, उसपर अल्लाह से क्षमा-याचना करो।
فَإِذَا قَضَيۡتُم مَّنَٰسِكَكُمۡ فَٱذۡكُرُواْ ٱللَّهَ كَذِكۡرِكُمۡ ءَابَآءَكُمۡ أَوۡ أَشَدَّ ذِكۡرٗاۗ فَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِي ٱلدُّنۡيَا وَمَا لَهُۥ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ مِنۡ خَلَٰقٖ ۝ 199
(200) फिर जब अपने हज के कार्य पूरे कर चुको, तो जिस तरह पहले अपने बाप-दादों को याद करते थे, उसी तरह अब अल्लाह को याद करो, बल्कि उससे भी बढ़कर ।221 (मगर अल्लाह को याद करनेवाले लोगों में भी बहुत अन्तर है) उनमें से कोई तो ऐसा है जो कहता है कि ऐ हमारे रब ! हमें दुनिया ही में सब कुछ दे दे। ऐसे आदमी के लिए आखिरत में कोई हिस्सा नहीं ।
221.अरबवाले हज पूरा कर लेने के बाद मिना में सभाएं करते थे, जिनमें हर क़बीले के लोग अपने बाप-दादा के कारनामे गर्व के साथ बयान करते और अपनी बड़ाई की डींगें मारते थे। इसपर कहा जा रहा है कि इन अज्ञानतापूर्ण बातों को छोड़ो। पहले जो समय बेकार की बातों में लगाया करते थे, अब उसे अल्लाह की याद और उसके 'ज़िक' (प्रभु-स्मरण) में लगाओ। इस ज़िक्र से तात्पर्य मिना में ठहरने के समय का ज़िक्र है।
وَمِنۡهُم مَّن يَقُولُ رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِي ٱلدُّنۡيَا حَسَنَةٗ وَفِي ٱلۡأٓخِرَةِ حَسَنَةٗ وَقِنَا عَذَابَ ٱلنَّارِ ۝ 200
(201) और कोई कहता है कि ऐ हमारे रब ! हमें दुनिया में भी भलाई दे और आखिरत में भी भलाई दे, और आग के अज़ाब से हमें बचा ।
أُوْلَٰٓئِكَ لَهُمۡ نَصِيبٞ مِّمَّا كَسَبُواْۚ وَٱللَّهُ سَرِيعُ ٱلۡحِسَابِ ۝ 201
(202) ऐसे लोग अपनी कमाई के अनुसार (दोनों जगह) हिस्सा पाएँगे और अल्लाह को हिसाब चुकाते कुछ देर नहीं लगती।
۞وَٱذۡكُرُواْ ٱللَّهَ فِيٓ أَيَّامٖ مَّعۡدُودَٰتٖۚ فَمَن تَعَجَّلَ فِي يَوۡمَيۡنِ فَلَآ إِثۡمَ عَلَيۡهِ وَمَن تَأَخَّرَ فَلَآ إِثۡمَ عَلَيۡهِۖ لِمَنِ ٱتَّقَىٰۗ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّكُمۡ إِلَيۡهِ تُحۡشَرُونَ ۝ 202
(203) ये गिनती के कुछ दिन हैं जो तुम्हें अल्लाह की याद में बसर करने चाहिएँ । फिर जो कोई जल्दी करके दो ही दिन में वापस हो गया तो कोई हरज नहीं, और जो कुछ देर ज़्यादा ठहरकर पलटा तो भी कोई हरज नहीं।222 बस शर्त यह है कि ये दिन उसने तक्वे (परहेज़गारी) के साथ बसर किए हों-अल्लाह की अवज्ञा से बचो और खूब जान रखो कि एक दिन उसके सामने तुम्हारी पेशी होनेवाली है।
222.अर्थात् तशरीक (1 जिलहिज्जा से 13 ज़िलहिज्जा तक) के दिनों में मिना से मक्के की ओर वापसी, चाहे 12 ज़िलहिज्जा को हो या 13वीं तारीख को, दोनों शक्लों में कोई हरज नहीं। असल महत्व इसका नहीं कि तुम ठहरे कितने दिन, बल्कि इसका है कि जितने दिन भी ठहरे, उनमें अल्लाह के साथ तुम्हारे ताल्लुक़ का क्या हाल रहा, अल्लाह को याद करते रहे या मेलों-ठेलों में लगे रहे।
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يُعۡجِبُكَ قَوۡلُهُۥ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا وَيُشۡهِدُ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا فِي قَلۡبِهِۦ وَهُوَ أَلَدُّ ٱلۡخِصَامِ ۝ 203
(204) इंसानों में कोई तो ऐसा है, जिसकी बातें दुनिया की ज़िन्दगी में तुम्हें बहुत भली मालूम होती हैं और अपनी नेक नीयती पर वह बार-बार खुदा को गवाह ठहराता है223, मगर वास्तव में वह सत्य का सबसे बुरा दुश्मन224 होता है।
223.अर्थात् कहता है : खुदा गवाह है कि मैं केवल भलाई चाहता हूँ, अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि केवल सत्य और सच्चाई के लिए या लोगों को भलाई के लिए काम कर रहा हूँ।
224.अरबी में “अ-लदुल ख्रिसाम" शब्द प्रयुक्त हुआ है, जिसका अर्थ है,“वह दुश्मन जो तमाम दुश्मनों से ज़्यादा टेढ़ा हो।” अर्थान् जो सत्य के विरोध में यथासंभव हर आघात से काम ले, किसी झूठ, किसी बेईमानी, किसी विद्रोह, वादाखिलाफ़ी और किसी टेढ़ी-से-टेढ़ी चाल को इस्तेमाल करने में झिझक न करे।
وَإِذَا تَوَلَّىٰ سَعَىٰ فِي ٱلۡأَرۡضِ لِيُفۡسِدَ فِيهَا وَيُهۡلِكَ ٱلۡحَرۡثَ وَٱلنَّسۡلَۚ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ ٱلۡفَسَادَ ۝ 204
(205) जब उसे सत्ता मिल जाती है225 तो धरती पर उसकी सारी दौड़-धूप इसलिए होती है कि बिगाड़ फैलाए, खेतों को नष्ट करे और इंसानी नस्ल को तबाह करे-हालाँकि अल्लाह (जिसे वह गवाह बना रहा था) बिगाड़ को कदापि पसन्द नहीं करता ।-
وَإِذَا قِيلَ لَهُ ٱتَّقِ ٱللَّهَ أَخَذَتۡهُ ٱلۡعِزَّةُ بِٱلۡإِثۡمِۚ فَحَسۡبُهُۥ جَهَنَّمُۖ وَلَبِئۡسَ ٱلۡمِهَادُ ۝ 205
(206) और जब उससे कहा जाता है कि अल्लाह से डर, तो अपनी प्रतिष्ठा का विचार उसको गुनाह पर जमा देता है। ऐसे आदमी के लिए तो बस जहन्नम ही पर्याप्त है और वह बहुत बुरा ठिकाना है ।
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَشۡرِي نَفۡسَهُ ٱبۡتِغَآءَ مَرۡضَاتِ ٱللَّهِۚ وَٱللَّهُ رَءُوفُۢ بِٱلۡعِبَادِ ۝ 206
(207) दूसरी ओर इंसानों ही में कोई ऐसा भी है जो अल्लाह की प्रसन्नता की चाह में अपनी जान खपा देता है और ऐसे बन्दों पर अल्लाह बहुत मेहरबान है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱدۡخُلُواْ فِي ٱلسِّلۡمِ كَآفَّةٗ وَلَا تَتَّبِعُواْ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيۡطَٰنِۚ إِنَّهُۥ لَكُمۡ عَدُوّٞ مُّبِينٞ ۝ 207
(208) ऐ ईमान लानेवालो ! तुम पूरे-के-पूरे इस्लाम में आ जाओ226 और शैतान की पैरवी न करो कि वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।
226.अर्थात् किसी अपवाद और विशेषाधिकार के बिना अपना पूरा जीवन इस्लाम के अन्तर्गत ले आओ। तुम्हारे विचार, तुम्हारे दृष्टिकोण, तुम्हारे ज्ञान-विज्ञान, तुम्हारे तौर-तरीके, तुम्हारे मामले और तुम्हारी दौड़-धूप और काम के रास्ते सब-के-सब बिलकुल इस्लाम के अधीन हों। ऐसा न हो कि तुम अपने जीवन को अलग-अलग भागों में बाँटकर कुछ भागों में इस्लाम की पैरवी करो और कुछ भागों को उसकी पैरवी से अलग कर लो।
فَإِن زَلَلۡتُم مِّنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَتۡكُمُ ٱلۡبَيِّنَٰتُ فَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ۝ 208
(209) जो साफ़-साफ़ हिदायतें (आदेश) तुम्हारे पास आ चुकी हैं, अगर उनको पा लेने के बाद फिर तुम विचलित हुए, खूब जान रखो कि अल्लाह सर्वशक्तिमान और तत्वदर्शी और ज्ञाता है।227
227.अर्थात् वह ज़बरदस्त ताक़त भी रखता है और यह भी जानता है कि अपने अपराधियों को सज़ा किस तरह दे।
هَلۡ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن يَأۡتِيَهُمُ ٱللَّهُ فِي ظُلَلٖ مِّنَ ٱلۡغَمَامِ وَٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ وَقُضِيَ ٱلۡأَمۡرُۚ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرۡجَعُ ٱلۡأُمُورُ ۝ 209
(210) (इन सारे उपदेशों और हिदायतों के बाद भी लोग सीधे न हों तो) क्या अब वे इसके इन्तिज़ार में हैं कि अल्लाह बादलों का छत्र लगाए, फ़रिश्तों के परे साथ लिए स्वयं सामने आ मौजूद हो और फैसला ही कर डाला जाए228?–अन्तत: सारे मामले तो अल्लाह ही के समक्ष पेश होनेवाले हैं।
228.ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं। इनसे एक महत्वपूर्ण तथ्य पर रौशनी पड़ती है। इस दुनिया में इंसान की सारी आज़माइश सिर्फ इस बात की है कि वह सत्य को देखे बिना मानता है या नहीं और मानने के बाद इतनी नैतिक शक्ति रखता है या नहीं कि अवज्ञा का अधिकार रखने के बाद भी आज्ञापालन अपनाए। इसी कारण यहाँ कहा जा रहा है कि उस वक़्त का इन्तिज़ार न करो जब अल्लाह और उसकी सल्तनत के कार्यकर्ता फ़रिश्ते स्वयं सामने आ जाएँगे, क्योंकि फिर तो फैसला ही कर डाला जाएगा। ईमान लाने और आज्ञापालन में सिर झुका देने का वास्तविक महत्व और मूल्य उसी समय तक है, जब तक वास्तविकता को तुम्हारी इन्द्रियाँ नहीं पकड़ पातीं, और तुम मात्र तर्क से उसको मान करके अपनी बुद्धिमत्ता का और मात्र समझाने-बुझाने से उसकी पैरवी और आज्ञापालन अपना करके अपनी नैतिक शक्ति का प्रमाण देते हो, वरना जब खुली सच्चाई सामने आ जाए और तुम सिर की आँखों से देख लो कि यह अल्लाह अपने महान सिंहासन पर आसीन है, और यह सारी सृष्टि का राज्य उसके आदेश पर चल रहा है, और ये फ़रिश्ते ज़मीन व आसमान के प्रबन्ध में लगे हुए हैं, और यह तुम्हारी हस्ती उसकी कुदरत के कब्जे में पूरी बेबसी के साथ जकड़ी हुई है, उस वक्त अगर तुम ईमान लाए और आज्ञापालन पर तैयार हुए, तो इस ईमान और आज्ञापालन का मूल्य ही क्या है? उस वक़्त तो कोई कट्टर से कट्टर इनकार करनेवाला और बुरे से बुरा अपराधी और अवज्ञाकारी भी इनकार और अवज्ञा का साहस नहीं कर सकता । ईमान लाने और आज्ञापालन स्वीकार करने की मोहलत बस उसी वक़्त तक है, जब तक कि परदा उठने की वह घड़ी नहीं आती। जब वह घड़ी आ गई, तो फिर न मोहलत है,न आज़माइश, बल्कि वह फैसले का वक्‍़त है।
سَلۡ بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ كَمۡ ءَاتَيۡنَٰهُم مِّنۡ ءَايَةِۭ بَيِّنَةٖۗ وَمَن يُبَدِّلۡ نِعۡمَةَ ٱللَّهِ مِنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَتۡهُ فَإِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلۡعِقَابِ ۝ 210
(211) बनी इसराईल से पूछो कैसी खुली-खुली निशानियाँ हमने उन्हें दिखाई हैं (और फिर यह भी उन्हीं से पूछ लो कि) अल्लाह की नेमत पाने के बाद जो क़ौम उसको दुर्भाग्य से बदलती है, उसे अल्लाह कैसी कठोर सज़ा देता है।229
229.इस प्रश्न के लिए बनी इसराईल का चुनाव दो कारणों से किया गया है। एक यह कि पुरानी निशानियों के बेज़बान खंडहरों के मुकाबले में एक जीती-जागती क़ौम ज़्यादा बेहतर शिक्षा और अनुभव प्राप्त करने का सामान है। दूसरे यह कि बनी इसराईल वह कौम है, जिसको ग्रन्थ और नुबूवत (ईशदूतत्व) की मशाल देकर दुनिया की रहनुमाई के पद पर नियुक्त किया गया था और फिर उसने दुनियापरस्ती, निफ़ाक़ (कपटाचार) और इल्म व अमल (ज्ञान व व्यवहार) की गुमराहियों में पड़कर इस नेमत से अपने आपको वंचित कर लिया, इसलिए जो गिरोह इस कौम के बाद इमामत के पद पर नियुक्त हुआ है, उसको सबसे अच्छी शिक्षा अगर किसी के अंजाम से मिल सकती है, तो वह यही क़ौम है।
زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُواْ ٱلۡحَيَوٰةُ ٱلدُّنۡيَا وَيَسۡخَرُونَ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْۘ وَٱلَّذِينَ ٱتَّقَوۡاْ فَوۡقَهُمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِۗ وَٱللَّهُ يَرۡزُقُ مَن يَشَآءُ بِغَيۡرِ حِسَابٖ ۝ 211
(212) जिन लोगो ने इंकार का रास्ता अपनाया है, उनके लिए सांसारिक जीवन अति प्रिय और मनपसंद बना दिया गया है। ऐसे लोग ईमान का रास्ता अपनानेवालों का मज़ाक़ उड़ाते हैं, परन्तु क़ियामत के दिन परहेज़गार (संयमी) लोग ही उनके मुक़ाबले में ऊँची जगह पर होंगे। रही दुनिया की रोज़ी, तो अल्लाह को अधिकार है, जिसे चाहे बे-हिसाब (अनगिनत) दे।
كَانَ ٱلنَّاسُ أُمَّةٗ وَٰحِدَةٗ فَبَعَثَ ٱللَّهُ ٱلنَّبِيِّـۧنَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ لِيَحۡكُمَ بَيۡنَ ٱلنَّاسِ فِيمَا ٱخۡتَلَفُواْ فِيهِۚ وَمَا ٱخۡتَلَفَ فِيهِ إِلَّا ٱلَّذِينَ أُوتُوهُ مِنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَتۡهُمُ ٱلۡبَيِّنَٰتُ بَغۡيَۢا بَيۡنَهُمۡۖ فَهَدَى ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لِمَا ٱخۡتَلَفُواْ فِيهِ مِنَ ٱلۡحَقِّ بِإِذۡنِهِۦۗ وَٱللَّهُ يَهۡدِي مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٍ ۝ 212
(213) शुरू में सब लोग एक ही तरीक़े पर थे। (फिर यह हालत बाक़ी न रही और मतभेद उभर आए) तब अल्लाह ने नबी भेजे जो सीधा रास्ता चलने पर शुभ-सूचना देनेवाले और टेढ़ा रास्ता चलने के नतीजों से डरानेवाले थे और उनके साथ सत्य-ग्रंथ उतारा, ताकि सत्य के बारे में लोगों के बीच जो मतभेद पैदा हो गए थे, उनका फैसला करे-(और इन मतभेदों के उभरने का कारण यह न था कि शुरू में लोगों को सत्य बताया नहीं गया था। नही) मतभेद उन लोगों ने किया जिन्हें सत्य का ज्ञान दिया जा चुका था। उन्होंने खुले ओदश पा लेने के बाद केवल इसलिए सत्य को छोड़कर अलग-अलग तरीके निकाले कि वे आपस में ज्‍़यादती करना चाहते थे।230 तो जो लोग नबियों पर ईमान ले आए, उन्हें अल्लाह ने अपनी अनुमति से उस सत्य का रास्ता दिखा दिया, जिसमें लोगों ने मतभेद किया था। अल्लाह जिसे चाहता है, सीधा रास्ता दिखा देता है
230.अनभिज्ञ लोग जब अपनी अटकल से 'मज़हब' का इतिहास तैयार करते हैं, तो कहते हैं कि इंसान ने अपनी ज़िन्दगी की शुरुआत 'शिर्क' (बहुदेववाद) की अंधियारियों से को, फिर तरक्की के मरहलों को धीरे-धीरे तय करते हुए यह अंधियारी छटती गई और रौशनी बढ़ती गई, यहाँ तक कि आदमी तौहीद (एकेश्वरवाद) तक आ पहुँचा। इसके विपरीत कुरआन यह बताता है कि दुनिया में इंसान की ज़िन्दगी की शुरुआत पूरी रौशनी में हुई है। अल्लाह ने सबसे पहले जिस इंसान को पैदा किया था उसको यह भी बता दिया था कि सच्चाई क्या है और तेरे लिए सही रास्ता कौन सा है। इसके बाद एक मुद्दत तक आदम की नस्ल सीधे रास्ते पर चलती रही और एक समुदाय बनी रही। फिर लोगों ने नए-नए रास्ते निकाले और अलग-अलग तरीके ईजाद कर लिए, इस कारण नहीं कि उनको सच्चाई नहीं बताई गई थी, बल्कि इस कारण कि सत्य को जानने के बाद भी कुछ लोग अपने जाइज़ हक से बढ़कर विशेषाधिकार और लाभ प्राप्त करना चाहते थे और आपस में एक-दूसरे पर जुल्म, सरकशी और ज़्यादती करने के इच्छुक थे। इसी ख़राबी को दूर करने के लिए अल्लाह ने नबियों को भेजना शुरू किया। ये नबी इसलिए नहीं भेजे गए थे कि हर एक अपने नाम से एक नए धर्म की बुनियाद डाले और अपना एक नया समुदाय बना ले, बल्कि उनके भेजे जाने का उद्देश्य यह था कि लोगों के सामने इस खोए हुए सत्य मार्ग को स्पष्ट करके उन्हें फिर से एक समुदाय बना दें।
أَمۡ حَسِبۡتُمۡ أَن تَدۡخُلُواْ ٱلۡجَنَّةَ وَلَمَّا يَأۡتِكُم مَّثَلُ ٱلَّذِينَ خَلَوۡاْ مِن قَبۡلِكُمۖ مَّسَّتۡهُمُ ٱلۡبَأۡسَآءُ وَٱلضَّرَّآءُ وَزُلۡزِلُواْ حَتَّىٰ يَقُولَ ٱلرَّسُولُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مَعَهُۥ مَتَىٰ نَصۡرُ ٱللَّهِۗ أَلَآ إِنَّ نَصۡرَ ٱللَّهِ قَرِيبٞ ۝ 213
(214) फिर क्या231 तुम लोगों ने यह समझ रखा है कि यूँ ही जन्नत में दाखिला तुम्हें मिल ईमानवाले चीख उठे कि अल्लाह की मदद कब आएगी?-(उस वक़्त उन्हें सांत्वना दी गई कि) हाँ, अल्लाह की मदद क़रीब है।
231.ऊपर की आयत और इस आयत के बीच में एक पूरी दास्तान की दास्तान है, जिसे कहे बिना छोड़ दिया गया है, क्योंकि यह आयत स्वयं उसकी ओर संकेत कर रही है और कुरआन को मक्की सूरतों में (जो सूरा बकरा से पहले उतरी थो) वह दास्तान सविस्तार बयान भी हो चुकी है। नबी जब कभी दुनिया में आए, उन्हें और उनपर ईमान लानेवाले लोगों का अल्लाह के बाग़ी और सरकश बन्दों से कड़ा मुकाबला हुआ और उन्होंने अपनी जाने जोखिम में डालकर मिथ्यावादी धर्म के स्थान पर सत्य-धर्म स्थापित करने के लिए संघर्ष किया, [जब कहीं, वे जन्नत के हक़दार हुए। अल्लाह को जन्नत इतनी सस्ती नहीं है कि तुम अल्लाह और उसके दीन के लिए कोई कष्ट न सहन करो और वह तुम्हें मिल जाए।
يَسۡـَٔلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَۖ قُلۡ مَآ أَنفَقۡتُم مِّنۡ خَيۡرٖ فَلِلۡوَٰلِدَيۡنِ وَٱلۡأَقۡرَبِينَ وَٱلۡيَتَٰمَىٰ وَٱلۡمَسَٰكِينِ وَٱبۡنِ ٱلسَّبِيلِۗ وَمَا تَفۡعَلُواْ مِنۡ خَيۡرٖ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِهِۦ عَلِيمٞ ۝ 214
(215) लोग तुमसे पूछते हैं हम क्या खर्च करें? जवाब दो कि जो माल भी तुम खर्च करो, अपने माँ-बाप पर, नातेदारों पर, अनाथों और निर्धनों और यात्रियों पर खर्च करो। और जो भलाई भी तुम करोगे, अल्लाह उसे जानता होगा।
كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلۡقِتَالُ وَهُوَ كُرۡهٞ لَّكُمۡۖ وَعَسَىٰٓ أَن تَكۡرَهُواْ شَيۡـٔٗا وَهُوَ خَيۡرٞ لَّكُمۡۖ وَعَسَىٰٓ أَن تُحِبُّواْ شَيۡـٔٗا وَهُوَ شَرّٞ لَّكُمۡۚ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ وَأَنتُمۡ لَا تَعۡلَمُونَ ۝ 215
(216) तुम्हें युद्ध का आदेश दिया गया है और वह तुम्हें अप्रिय है-हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें अप्रिय हो और वही तुम्हारे लिए बेहतर हो और हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें प्रिय हो और वही तुम्हारे लिए बुरी हो। अल्लाह जानता है, तुम नहीं जानते ।
يَسۡـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلشَّهۡرِ ٱلۡحَرَامِ قِتَالٖ فِيهِۖ قُلۡ قِتَالٞ فِيهِ كَبِيرٞۚ وَصَدٌّ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَكُفۡرُۢ بِهِۦ وَٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ وَإِخۡرَاجُ أَهۡلِهِۦ مِنۡهُ أَكۡبَرُ عِندَ ٱللَّهِۚ وَٱلۡفِتۡنَةُ أَكۡبَرُ مِنَ ٱلۡقَتۡلِۗ وَلَا يَزَالُونَ يُقَٰتِلُونَكُمۡ حَتَّىٰ يَرُدُّوكُمۡ عَن دِينِكُمۡ إِنِ ٱسۡتَطَٰعُواْۚ وَمَن يَرۡتَدِدۡ مِنكُمۡ عَن دِينِهِۦ فَيَمُتۡ وَهُوَ كَافِرٞ فَأُوْلَٰٓئِكَ حَبِطَتۡ أَعۡمَٰلُهُمۡ فِي ٱلدُّنۡيَا وَٱلۡأٓخِرَةِۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلنَّارِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ ۝ 216
(217) लोग पूछते हैं : प्रतिष्ठित महीने में लड़ना कैसा है? कहो : इसमें लड़ना बहुत बुरा है. मगर खुदा के रास्ते से लोगों को रोकना और अल्लाह से इनकार का रवैया अपनाना और प्रतिष्ठित मस्जिद (काबा) का रास्ता खुदापरस्तों पर बन्द करना और हरम (मक्का) के रहनेवालों को वहाँ से निकालना अल्लाह के नज़दीक इससे भी ज्यादा बुरा है, और फ़ितना खून बहाने से ज़्यादा सख्त है।232 वे तो तुमसे लड़े ही जाएँगे, यहाँ तक कि अगर उनका बस चले तो तुम्हें इस दीन से फेर ले जाएँ। (और यह खूब समझ लो कि) तुममें से जो कोई अपने दीन से फिरेगा और कुफ़ (इनकार) की हालत में जान देगा, उसके कर्म लोक-परलोक दोनों में बर्बाद हो जाएंगे। ऐसे सब लोग जहन्नमी हैं और हमेशा जहन्‍नम ही में रहेंगे233,
232.यह बात एक घटना से ताल्लुक़ रखती है। रजब सन् 02 हिजरी में नबी (सल्ल.) ने आठ आदमियों की एक टुकड़ी नखला की ओर भेजी थी (जो मक्का और ताइफ के बीच एक जगह है) और उसको हिदायत कर दी थी कि कुरैश को चलत-फिरत और उनकी भविष्य की योजनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करे। लड़ाई को कोई इजाज़त आपने नहीं दी थी, लेकिन इन लोगों को रास्ते में कुरैश का एक छोटा-सा व्यापारिक काफ़िला मिला और उसपर इन्होंने धावा बोलकर एक आदमी को कत्ल कर दिया और बाक़ी लोगों को उनके माल सहित गिरफ्तार करके मदीना ले आए। यह कार्रवाई ऐसे वक्त हुई, जबकि रजब खत्म और शाबान का महीना शुरू हो रहा था और इस बात में सन्देह था कि हमला रजब (अर्थात् प्रतिष्ठित महीने) ही में हुआ है या नहीं? लेकिन कुरैश ने और परदे के पीछे से मिले हुए यहूदियों और मदीना के मुनाफिको (कपटाचारियों) ने मुसलमानों के विरुद्ध प्रचार करने के लिए इस घटना को खूब उछाला और कड़ी आपत्तियाँ शुरू कर दी कि ये लोग चले हैं बड़े अल्लाह वाले बनकर और हाल यह है कि प्रतिष्ठित महीने तक में खून बहाने से नहीं चूकते। इन्हों आपत्तियों का उत्तर इस आयत में दिया गया है। उत्तर का सार यह है कि बेशक प्रतिष्ठित महीने में लड़ना बड़ी बुरी हरकत है, किन्तु इसपर आपत्ति करना उन लोगों के मुँह को शोभा नहीं देता जिन्होंने निरंतर तेरह वर्ष अपने सैकड़ों भाइयों पर केवल इसलिए अत्याचार के पहाड़ तोड़े कि वे एक खुदा पर ईमान लाए थे।
233.मुसलमानों में से कुछ भोले-भाले लोग जिनके मन पर नेकी और समझौता-पसंदी का एक ग़लत विचार छाया हुआ था, वे मक्का के ईकारियों और यहूदियों की उपरोक्त आपत्तियों से प्रभावित हो गए थे, इस आयत में उन्हें समझाया गया है कि तुम अपनी इन बातों से यह आशा न करो कि तुम्हारे और उनके बीच सफाई हो जाएगी। उनकी आपत्तियाँ सफ़ाई के उद्देश्य से हैं ही नहीं, वे तो असल में कीचड़ उछालना चाहते हैं। उन्हें यह बात खल रही है कि तुम इस दीन पर ईमान क्यों लाए हो और इसकी ओर दुनिया को बुलाते क्यों हो? तो जब तक वे अपने इंकार पर अड़े हुए हैं और तुम इस दीन पर कायम हो, तुम्हारे और उनके बीच सफ़ाई किसी प्रकार न हो सकेगी। उनकी ओर से होशियार रहो, ये तुम्हारे सब से बुरे शत्रु हैं, क्योंकि वे। तुम्हें सच्चे दोन से फेरकर आखिरत के हमेशा के अज़ाब में धकेल देने पर तुले हुए हैं।
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَٱلَّذِينَ هَاجَرُواْ وَجَٰهَدُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ أُوْلَٰٓئِكَ يَرۡجُونَ رَحۡمَتَ ٱللَّهِۚ وَٱللَّهُ غَفُورٞ رَّحِيمٞ ۝ 217
(218) इसके विपरीत जो लोग ईमान लाए हैं और जिन्होंने ख़ुदा की राह में अपना पर, बार छोड़ा और जिहाद234 किया है, वे अल्लाह की रहमत के वैध उम्मीदवार हैं और अल्लाह इनकी कोताहियों को क्षमा करनेवाला और अपनी रहमत से उन्हें नवाज़नेवाला है।
234.जिहाद का अर्थ है किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अपनी ओर से भरसक प्रयत्ल कर डालना। यह केवल सुख का समनार्थी नहीं है, लड़ाई के लिए तो 'क़िताल' का शब्द प्रयुक्त होता है। 'जिहाद' तो इससे व्यापक अर्थ रखता है और इसमें हर प्रकार का यल शामिल है। मुजाहिद वह आदमी है जो हर समय अपने उद्देश्य की धुन में लगा हो, दिमाग़ से उसी के लिए उपाय सोचे, मुख और क़लम से उसी का प्रचार करे, हाथ-पाँव से उसी के लिए दौड़-धूप और परिश्रम करे, अपने समस्त संभावित संसाधन उसको आगे बढ़ाने में लगा दे और हर अवरोध का पूरी शक्ति के साथ मुक़ाबला करे जो इस राह में खड़ा हो, यहाँ तक कि जब जान की बाज़ी लगाने की ज़रूरत हो तो उसमें भी संकोच न करे । इसका नाम है 'जिहाद' और अल्लाह के रास्ते का जिहाद यह है कि यह सब कुछ केवल अल्लाह की प्रसन्नता के लिए हो और इस उद्देश्य से किया जाए कि अल्लाह का दीन उसकी ज़मीन पर स्थापित हो और अल्लाह का कलिमा (बोल) सारे कलिमों पर छा जाए। इसके अतिरिक्त और कोई लक्ष्य मुजाहिद की दृष्टि में न हो।
۞يَسۡـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلۡخَمۡرِ وَٱلۡمَيۡسِرِۖ قُلۡ فِيهِمَآ إِثۡمٞ كَبِيرٞ وَمَنَٰفِعُ لِلنَّاسِ وَإِثۡمُهُمَآ أَكۡبَرُ مِن نَّفۡعِهِمَاۗ وَيَسۡـَٔلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَۖ قُلِ ٱلۡعَفۡوَۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلۡأٓيَٰتِ لَعَلَّكُمۡ تَتَفَكَّرُونَ ۝ 218
(219) पूछते हैं : शराब और जुए का क्या हुक्म है ? कहो : इन दोनों चीज़ों में बड़ी खराबी है। यापि इनमें लोगों के लिए कुछ लाभ भी हैं, मगर इनका गुनाह उनके लाभ से बहुत ज़्यादा है।235 पूछते हैं : हम अल्लाह रास्ते में क्या ख़र्च करे? कहो : जो कुछ तुम्हारी ज़रूरत से ज़्यादा हो। इस तरह अल्लाह तुम्हारे लिए साफ़ साफ आदेश देता है, शायद कि तुम दुनिया और आख़िरत (लोक-परलोक) दोनों की चिन्ता करो।
235(अ) इस आयत से आजकल अजीब-अजीब अर्थ निकाले जा रहे हैं, हालांकि आयत के शब्दों से साफ़ पता चलता है कि लोग अपने माल के मालिक थे। सवाल यह कर रहे थे कि हम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्ति के लिए क्या ख़र्च करें? फरमाया गया कि पहले उससे अपनी ज़रूरतें पूरी करो, फिर जो ज्यादा बचे, उसे अल्लाह की राह में खर्च करो, यह अपनी मर्जी से किया गया खर्च है जो बन्दा अपने रब की राह में अपनी ख़ुशी से करता है ।। से रोक दिया गया। फिर शराब और जुए और इस प्रकार की तमाम चीज़ों को बिलकुल हराम कर दिया गया। (देखिए क़ुरआन 4 : 43;5: 90)
فِي ٱلدُّنۡيَا وَٱلۡأٓخِرَةِۗ وَيَسۡـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلۡيَتَٰمَىٰۖ قُلۡ إِصۡلَاحٞ لَّهُمۡ خَيۡرٞۖ وَإِن تُخَالِطُوهُمۡ فَإِخۡوَٰنُكُمۡۚ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ ٱلۡمُفۡسِدَ مِنَ ٱلۡمُصۡلِحِۚ وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ لَأَعۡنَتَكُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٞ ۝ 219
(220) पूछते हैं : यतीमों के साथ क्या मामला किया जाए? कहो ; जिस तरीके में उनके लिए भलाई हो, वही अपनाना बेहतर है।236 अगर तुम अपना और उनका ख़र्च और रहना-सहना एक साथ रखो, तो इसमें कोई हरज नहीं, आखिर वे तुम्हारे भाई-बन्द ही तो हैं। बुराई करनेवाले और भलाई करनेवाले, दोनों का हाल अल्लाह पर रौशन है। अल्लाह चाहता तो इस मामले में तुमपर सख्ती करता, लेकिन वह प्रभुत्त्वशाली होने के साथ-साथ तत्त्वदर्शी भी है।
236.इस आयत के उतरने से पहले कुरआन में यतीमों के अधिकारों की रक्षा के बारे में बार-बार कड़े आदेश आ चुके थे और यहाँ तक कह दिया गया था कि 'यतीम के माल के पास न फटको' और यह कि "जो लोग यतीमों का माल जुल्म के साथ खाते हैं, वे अपने पेट आग से भरते हैं।" इन कड़े आदेशों की वजह से वे लोग, जिनकी देख-रेख में यतीम बच्चे थे, इतने डर गए थे कि उन्होंने उनका खाना-पीना तक अपने से अलग कर दिया था और इतनी सावधानी बरतने के बाद भी उन्हें डर था कि कहीं यतीमों के माल का कोई हिस्सा उनके माल में न मिल जाए। इसी लिए उन्होंने नबी (सल्ल.) से मालूम किया कि इन बच्चों के साथ हमारे मामले की सही सूरत क्या है।
وَلَا تَنكِحُواْ ٱلۡمُشۡرِكَٰتِ حَتَّىٰ يُؤۡمِنَّۚ وَلَأَمَةٞ مُّؤۡمِنَةٌ خَيۡرٞ مِّن مُّشۡرِكَةٖ وَلَوۡ أَعۡجَبَتۡكُمۡۗ وَلَا تُنكِحُواْ ٱلۡمُشۡرِكِينَ حَتَّىٰ يُؤۡمِنُواْۚ وَلَعَبۡدٞ مُّؤۡمِنٌ خَيۡرٞ مِّن مُّشۡرِكٖ وَلَوۡ أَعۡجَبَكُمۡۗ أُوْلَٰٓئِكَ يَدۡعُونَ إِلَى ٱلنَّارِۖ وَٱللَّهُ يَدۡعُوٓاْ إِلَى ٱلۡجَنَّةِ وَٱلۡمَغۡفِرَةِ بِإِذۡنِهِۦۖ وَيُبَيِّنُ ءَايَٰتِهِۦ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمۡ يَتَذَكَّرُونَ ۝ 220
(221) तुम मुशरिक (अनेकेश्वरवादी) औरतों से कदापि विवाह न करना, जब तक कि वे ईमान न लाएँ । एक मोमिन (एकेश्वरवादी) लौंडी उच्च खानदानी मुशरिक औरत से बेहतर है, भले ही वह तुम्हें बहुत पसन्द हो। और अपनी औरतों के विवाह मुशरिक मर्दो से कभी न करना, जब तक किवे ईमान न लाएँ। एक मोमिन गुलाम उच्च खानदान वाले मुशरिक मर्द से बेहतर है, भले ही वह तुम्हे बहुत पसन्द हो । ये लोग तुम्हें आग की ओर बुलाते है237 और अल्लाह अपनी अनुमति से तुमको जन्नत और मगफिरत (क्षमा) की ओर बुलाता है, और वह अपने आदेश खोलकर लोगों के सामने बयान करता है, उम्मीद है कि वे शिक्षा लेंगे और जो समझाया जा रहा है उसे स्वीकार करेंगे।
237.यह है सबब और मसलेहत उस आदेश की जो मुशरिकों के साथ शादी ब्याह का ताल्लुक न रखने के बारे में उपर बयान हुआ था। औरत और मर्द के बीच विवाह का संबंध केवल एक वासनात्मक संबंध नहीं है, बल्कि वह एक गहरा सांस्कृतिक, नैतिक और हार्दिक संबंध है। मोमिन और मुशरिक के बीच अगर यह हार्दिक संबंध हो, तो जहाँ इस बात की संभावना है कि मोमिन पति या पत्नी के प्रभाव से मुशरिक पति या पत्ली के विचारों और तौर तरीको से न सिर्फ मोमिन पति या पत्नी, बल्कि उसके परिवार और दोनों की नस्ल तक प्रभावित हो जाएगी और अधिक संभावना इसी बात की है कि ऐसे जोड़ों से इस्लाम और कुत व शिर्क का एक ऐसा सम्मिश्रण उस घर और उस परिवार में तैयार होगा,जिसे और मुस्लिम चाहे जितना पसन्द करें, मगर इस्लाम किसी तरह पसन्द करने के लिए तैयार नहीं है।
وَيَسۡـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلۡمَحِيضِۖ قُلۡ هُوَ أَذٗى فَٱعۡتَزِلُواْ ٱلنِّسَآءَ فِي ٱلۡمَحِيضِ وَلَا تَقۡرَبُوهُنَّ حَتَّىٰ يَطۡهُرۡنَۖ فَإِذَا تَطَهَّرۡنَ فَأۡتُوهُنَّ مِنۡ حَيۡثُ أَمَرَكُمُ ٱللَّهُۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلتَّوَّٰبِينَ وَيُحِبُّ ٱلۡمُتَطَهِّرِينَ ۝ 221
(222) पूछते हैं : माहवारी (हैज़) का क्या हुक्म है ? कहो ; वह एक गंदगी की हालत है।238 इसमें औरतों से अलग रहो और उनके क़रीब न जाओ, जब तक वे पाक साफ़ न हो जाएँ।239 फिर जब वे पाक हो जाएँ तो उनके पास जाओ, उस तरह जैसा कि अल्लाह ने तुमको आदेश दिया है।240 अल्लाह उन लोगों को पसन्द करता है, जो बुराई से रुके रहे और पाकीजगी अपनाएँ।
238, मूल अरबी शब्द 'अजा' प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ गन्दगी भी है और बीमारी भी। माहवारी सिर्फ एक गन्दगी ही नहीं है, बल्कि चिकित्साशास्त्र की दृष्टि से वह एक ऐसी हालत है जिसमें औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले में बीमारी से अधिक क़रीब होती है।
239."औरतों से अलग रहो" और "उनके क़रीब न जाओ" का अर्थ यह नहीं है कि माहवारी वाली औरत के साथ एक फर्श पर बैठने या एक जगह खाना खाने से भी बचा जाए और उसे बिल्कुल अछूत बनाकर रख दिया जाए, जैसा कि यहूदियों, हिन्दुओं और कुछ दूसरी जातियों में परम्परा पाई जाती है । नबी (सल्ल.) ने इस आदेश का जो स्पष्टीकरण किया है उससे मालूम होता है कि इस हालत में सिर्फ संभोग से बचना चाहिए, बाकी तमाम ताल्लुक़ात पहले की तरह ही बाक़ी रखे जाएँ।
نِسَآؤُكُمۡ حَرۡثٞ لَّكُمۡ فَأۡتُواْ حَرۡثَكُمۡ أَنَّىٰ شِئۡتُمۡۖ وَقَدِّمُواْ لِأَنفُسِكُمۡۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّكُم مُّلَٰقُوهُۗ وَبَشِّرِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ۝ 222
(223) तुम्हारी औरतें तुम्हारी खेतियाँ हैं। तुम्हें अधिकार है, जिस तरह चाहो, अपनी खेती में जाओ241 मगर अपने भविष्य की चिन्ता करो242 और अल्लाह की नाराजी से बचो, खब जान लो कि तुम्हें एक दिन उससे मिलना है। और ऐ नबी । जो तुम्हारे आदेशों को मान लें उन्हें (सफलता और सौभाग्य की) शुभ-सूचना दे दो।
241.अर्थात् स्वभावतः अल्लाह ने औरतों को मों के लिए सैरगाह नहीं बनाया है, बल्कि इन दोनों के बीच खेत और किसान का-सा संबंध है। खेत में किसान सिर्फ सैर करने नहीं जाता, बल्कि इसलिए जाता है कि उससे पैदावार हासिल करे। इंसानी नस्ल के किसान को भी इनसानियत की इस खेती में इसलिए जाना चाहिए कि उससे वह नस्ल की पैदावार हासिल करे। अल्लाह की शरीअत को इससे बहस नहीं कि तुम इस खेत में खेती किस तरह करते हो, हाँ उसकी माँग तुमसे यह है कि जाओ खेत ही में और इस उद्देश्य के लिए जाओ कि उससे पैदावार हासिल करनी है।
242.व्यापक शब्दों का प्रयोग हुआ है जिनके दो अर्थ लिए जा सकते हैं और दोनों का समान महत्व है। एक यह कि अपनी नस्ल बाकी रखने की कोशिश करो, ताकि तुम्हारे दुनिया छोड़ने से पहले तुम्हारी जगह दूसरे काम करनेवाले पैदा हों। दूसरे यह कि जिस आनेवाली नस्ल को तुम अपनी जगह छोड़नेवाले हो, उसको धर्म, चरित्र और मनुष्यता के जौहरों से सुसज्जित करने की कोशिश करो। बाद के वाक्य में इस बात पर भी चेतावनी दे दी गई है कि अगर इन दोनों कर्तव्यों के अदा करने में तुमने जान-बूझकर कोताही की तो अल्लाह तुमसे पूछगच्छ करेगा।
وَلَا تَجۡعَلُواْ ٱللَّهَ عُرۡضَةٗ لِّأَيۡمَٰنِكُمۡ أَن تَبَرُّواْ وَتَتَّقُواْ وَتُصۡلِحُواْ بَيۡنَ ٱلنَّاسِۚ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٞ ۝ 223
(224) अल्लाह के नाम को ऐसी कसमें खाने के लिए इस्तेमाल न करो, जिनका अभिप्राय नेकी और तक़वा (परहेज़गारी और संयम) और अल्लाह के बन्दों की भलाई के कामों से रुके रहना हो ।243 अल्लाह तुम्हारी सारी बातें सुन रहा है और सब कुछ जानता है।
243.सहीह हदीसों से मालूम होता है कि जिस व्यक्ति ने किसी बात को कसम खाई हो और बाद में उसपर स्पष्ट हो जाए कि इस क़सम के तोड़ देने ही में भलाई है, उसे कसम तोड़ देनी चाहिए और कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित-मूल्य) अदा करना चाहिए। क़सम तोड़ने का कफ़्फ़ारा दस ग़रीबों को खाना खिलाना या उन्हें कपड़े पहनाना या एक गुलाम आज़ाद करना या तीन दिन के रोज़े रखना है । (देखिए क़ुरआन 5 : 89)
لَّا يُؤَاخِذُكُمُ ٱللَّهُ بِٱللَّغۡوِ فِيٓ أَيۡمَٰنِكُمۡ وَلَٰكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا كَسَبَتۡ قُلُوبُكُمۡۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٞ ۝ 224
(225) जो निरर्थक क़समें तुम बे-इरादा खा लिया करते हो, उनपर अल्लाह पकड़ नहीं करता,244 परन्तु जो कसमें तुम सच्चे दिल से खाते हो, उनकी पूछगच्छ वह ज़रूर करेगा। अल्लाह बहुत क्षमा करनेवाला और सहनशील है।
244.अर्थात् यूँ ही बे-इरादा जो कसमें मुख से निकल जाती हैं, ऐसी कसमों पर न कफ्फारा है और न उनपर पकड़ होगी।
لِّلَّذِينَ يُؤۡلُونَ مِن نِّسَآئِهِمۡ تَرَبُّصُ أَرۡبَعَةِ أَشۡهُرٖۖ فَإِن فَآءُو فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ ۝ 225
(226) जो लोग अपनी औरतों से ताल्लुक़ न रखने की क़सम खा बैठते हैं, उनके लिए चार महीने की मुहलत है।245 अगर उन्होंने रुजू कर लिया तो अल्लाह क्षमा करनेवाला और दयावान है।246
245.शरीअत की परिभाषा में इसको 'ईला' कहते हैं । मियाँ और बीवी के बीच ताकात हमेशा अच्छे तो नहीं रह सकते । बिगाड़ के कारण तो पैदा होते ही रहते हैं, लेकिन ऐसे बिगाड़ को अल्लाह की शरीअत पसन्द नहीं करती कि दोनों एक-दूसरे के साथ क़ानूनी तौर पर मियाँ बीवी के रिश्ते में तो बंधे रहें, पर व्यवहारतः एक-दूसरे से इस तरह अलग रहें कि मानो वे पति-पत्नी नहीं हैं। ऐसे बिगाड़ के लिए अल्लाह ने चार महीने का समय निश्चित कर दिया कि या तो इस बीच अपने ताल्लुकात ठीक कर लें, वरना मियाँ-बीवी का रिश्ता ही काट दें, ताकि दोनों एक दूसरे से आज़ाद होकर जिससे निबाह कर सकें, उसके साथ निकाह कर लें। आयत में चूँकि 'कसम खा लेने' के शब्द इस्तेमाल हुए हैं, इसलिए हनफ़ी और शाफ़ई धर्मशास्त्रियों ने इस आयत का उद्देश्य यह समझा है कि जहाँ पति ने पत्नी से मियाँ बीवी का ताल्लुक न रखने की कसम खाई हो, केवल वहीं यह हुक्म लागू होगा, परन्तु मालिको विद्वानों की राय यह है कि भले ही क़सम खाई गई हो या न खाई गई हो, दोनों हालतों में ताल्लुक तोड़ने के लिए यही चार महीने की मुद्दत है। एक कथन इमाम अहमद का भी इसी के समर्थन में है। (बिदायतुल मुज्तहिद, भाग 2, पृ० 88, एडीशन मिस्र 1339 हि०)
246.कुछ धर्मशास्त्रियों (कहा) ने एसका अर्थ यह लिया है कि अगर इस परत के आधा अपनी कसम तोड़ दें और फिर से पति-पत्नी का संबंध स्थापित कर लें,गो जसपर कसम तोड़ने का कफ़्फ़ारा नहीं है। अल्‍लाह वैसे ही क्षमा कर देगा, लेकिन अधिकतर धर्मशास्त्रियों की राय यह है कि क़सम तोड़ने का कफ़्फ़ारा देना होगा। ‘क्षमा करनेवाला और दयावान’ कहने का अर्थ यह नहीं है कि कफ़्फ़ारे से तुम्‍हें क्षमा कर दिया गया, बल्कि इसका अर्थ यह है कि अल्लाह तुम्हारे कफ़्फ़ारे को स्वीकार कर लेगा और संबंध-विच्छेद की अवधि में जो ज्‍़यादती दोनों ने एक-दूसरे पर की हो, उसे क्षमा कर दिया जाएगा।
وَإِنۡ عَزَمُواْ ٱلطَّلَٰقَ فَإِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٞ ۝ 226
(227) और अगर उन्‍होंने ही की ठान ली हो247 तो जाने रहें कि अल्‍लाह सब कुछ सुनता और जानता है।248
247.हज़रत उसमान, इब्‍ने मसऊद, ज़ैद बिन साबित (रजि़.) के निकट रूजुअ का मौका चार महीने के अन्दर ही है। इस मुदत का गुज़र जाना स्वयं इस बात का प्रमाण है कि पति ने तलाक़ का इरादा कर लिया है, इसलिए मुद्दत गुज़रते ही तलाक़ स्वतः हो जाएगी और वह एक तलाक़ बाइन होगी, अर्थात् इद्दत के दौरान शौहर को रुजूअ का हक़ न होगा। अलबत्‍ता अगर ये दोनों चाहें तो दोबारा निकाह कर सकते हैं। हनफ़ी फुक़हा ने इसी राय को अपनाया है। सईद बिन मुसयिब, मकहूल, ज़ोहरी आदि के नज़दीक भी चार महीने की मुद्दत बीत जाने के बाद अपने आप तलाक़ हो जाएगी, मगर यह तलाक़ रजई होगी, बाइन न होगी। । अर्थात् मुद्दत में रुजूअ किया जा सकेगा, निकाह की ज़रूरत न होगी। इसके विपरीत हजरत आइशा, अनू दरदा और मदीना के अधिकतर फु़क़हा की राय यह है कि चार महीने की मुद्दत बीतने के बाद मामला अदालत में पेश होगा और अदालत पति को आदेश देगी कि या तो उस औरत से रूजूअ करे या उसे तलाक़ दे। इमाम मालिक व शाफ़ई ने इसी राय को अपनाया है।
248.अर्थात् अगर तुमने पत्नी को अनुचित बात पर छोड़ा है तो अल्लाह के प्रति निडर न बनो, वह तुम्हारी ज़्यादती से अनभिज्ञ नहीं है।
وَٱلۡمُطَلَّقَٰتُ يَتَرَبَّصۡنَ بِأَنفُسِهِنَّ ثَلَٰثَةَ قُرُوٓءٖۚ وَلَا يَحِلُّ لَهُنَّ أَن يَكۡتُمۡنَ مَا خَلَقَ ٱللَّهُ فِيٓ أَرۡحَامِهِنَّ إِن كُنَّ يُؤۡمِنَّ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۚ وَبُعُولَتُهُنَّ أَحَقُّ بِرَدِّهِنَّ فِي ذَٰلِكَ إِنۡ أَرَادُوٓاْ إِصۡلَٰحٗاۚ وَلَهُنَّ مِثۡلُ ٱلَّذِي عَلَيۡهِنَّ بِٱلۡمَعۡرُوفِۚ وَلِلرِّجَالِ عَلَيۡهِنَّ دَرَجَةٞۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ۝ 227
(228) जिन औरतों को तलाक़ सलाह दी गई हो, तो तीन बार माहवारी के दिनों के आने तक अपने आपको रोके रखे, और उसके लिए यह जाइज़ नहीं है कि अल्‍लाह ने उसके रहत (गर्भाशय) में जो कुछ पैदा फ़रमाया हो, उसे छिपाएँ । उन्‍हें हरगिज़ ऐसा न करना चाहिए, अगर वह अल्‍लाह और आखि़रत के दिन पर ईमान रखती है। उनके शौहर ताल्लुक़ात ठीक कर लेने पर तैयार हो, तो वह इस इद्दत के दौरान में उन्हें फिर अपनी पत्‍नी के रूप में वापस ले लेने के हक़दार हैं।249औरतों के लिए भी सामान्य नियम के अनुसार वैसे ही हक हैं, जैसे मर्दो के हक़ उनपर है, अलबत्ता मर्दो को उनपर एक दर्जा हासिल है, और सबपर अल्लाह प्रभावकारी प्रभुत्त्व रखनेवाला, तत्त्वदर्शी और ज्ञाता मौजूद है।
249.यह आदेश मात्र उस स्थिति के लिए है जिसमें पति ने पत्नी को एक या दो तलाक़ें दी हो, (इस स्थिति में तलाक़ रजई होती है और इद्दत के दौरान में शौहर रुजूअ कर सकता है ।] तीन तलाकें देने की स्थिति में शौहर को रुजूअ का हक़ नहीं है।'
ٱلطَّلَٰقُ مَرَّتَانِۖ فَإِمۡسَاكُۢ بِمَعۡرُوفٍ أَوۡ تَسۡرِيحُۢ بِإِحۡسَٰنٖۗ وَلَا يَحِلُّ لَكُمۡ أَن تَأۡخُذُواْ مِمَّآ ءَاتَيۡتُمُوهُنَّ شَيۡـًٔا إِلَّآ أَن يَخَافَآ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِۖ فَإِنۡ خِفۡتُمۡ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيۡهِمَا فِيمَا ٱفۡتَدَتۡ بِهِۦۗ تِلۡكَ حُدُودُ ٱللَّهِ فَلَا تَعۡتَدُوهَاۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ ٱللَّهِ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ ۝ 228
(229) तलाक़ दो बार है, फिर या तो सीधी तरह औरत को रोक लिया जाए या भले तरीक़े से उसको विदा कर दिया जाए।250 और विदा करते हुए ऐसा करना तुम्हारे लिए जाइज़ नहीं है कि जो कुछ तुम उन्‍हें दे चुके हो, उसमें से कुछ वापस ले लो।251 अलबत्ता यह अपवाद है कि पति पत्नी को अल्लाह की निर्धारित सीमाओं पर क़ायम न रह सकने का डर हो । ऐसी स्थिति में अगर तुम्हे यह डर हो की वे दोनों अल्लाह की निर्धारित सीमाओं पर क़ायम न रहेंगे, तो उन दोनों के बीच यह मामला हो जाने में हरज नहीं कि औरत अपने पति को कुल मुआवजा देकर जुदाई हासिल कर ले।252 ये अल्‍लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ है, इनसे आगे न बढ़ो। और जो लोग अल्‍लाह की सीमाओं से आगे बढ़ जाएं, वही ज़ालिम है।
250.अरब अज्ञानता-काल में पति अपनी पत्नी को अनगिनत तलाक़ देने का अधिकार रखता था। जिस औरत से उसका पति बिगड़ जाता उसको वह बार-बार तलाक देकर रुजूअ करता रहता था, ताकि न तो वह बेचारी उसके साथ रह सके और न उससे मुक्त होकर किसी और से निकाह ही कर सके । क़ुरआन की यह आयत इसी ज़ुल्म का दरवाज़ा बन्द करती है। इस आयत की रौशनी में एक मर्द निकाह के बंधन में बंधी अपनी बीवी पर अधिक-से-अधिक दो ही बार रजई तलाक़ (ऐसी तलाक़ जिसके बाद रुजूअ किया जा सके यानी फिर बीवी के रूप में रखा जा सके) का हक़ इस्तेमाल कर सकता है। जो आदमी अपनी बीवी को दो बार तलाक़ देकर उससे रुजूअ कर चुका हो, वह अपनी उम्र में जब कभी उसको तीसरी बार तलाक़ देगा, औरत उससे सदा के लिए जुदा हो जाएगी। तलाक़ का सही तरीका जो कुरआन व हदीस से मालूम होता है, वह यह है कि औरत को पाकी की हालत में एक बार तलाक दी जाए, फिर एक तलाक देने के बाद अगर चाहे तो दूसरी पाकी की हालत में दोबारा एक तलाक़ और दे दे, वरना बेहतर यही है कि पहली ही तलाक़ पर बस करे। इस स्थिति में शौहर को यह अधिकार रहता है कि इद्दत (तलाक के बाद की अवधि) गुज़रने से पहले-पहले जब चाहे, रुजू कर ले और अगर इद्दत गुज़र भी जाए तो दोनों के लिए मौक़ा बाकी रहता है कि फिर आपसी रजामंदी से दोबारा निकाह कर लें । लेकिन तीसरी पाकी में तीसरी बार तलाक देने के बाद न तो शौहर को रुजू का अधिकार बाकी रहता है और न इसका ही कोई मौक़ा रहता है कि दोनों का फिर निकाह हो सके । रही यह स्थिति कि एक ही समय में तीन तलाकें दे डाली जाएँ, जैसा कि आजकल जाहिलों का आम तरीका है, तो यह शरीअत की दृष्टि से भारी गुनाह है । नबी (सल्ल०) ने इसकी बड़ी निन्दा की है और हज़रत उमर (रजि०) से यहाँ तक साबित है कि जो आदमी एक ही समय में अपनी बीवी को तीन तलाकें देता था, आप उसको दुरें लगाते थे।
251.अर्थात् सर और ना खेचर और कपड़े आदि जो पति अपनी पत्नी को दे चुका हो, उनमें से कोई वस्तु भी उसे वापस मांगने का अधिकार नहीं है। यह बास वैसे भी इस्लाम के मैतिक सिखांतों के विरुद्ध है कि कोई व्यक्ति जिसी ऐश्वो चोर को जिसे लार दूसरे व्यक्ति को घर या उपहार के रूप में दे चुका हो, वापस मांगे। इस घटिया कार्य को हदीस में उस कुत्ते की हरकत की तरह बताया गया है जो अपनी ही उलटी को स्वयं चाट ले, और ख़ास तौर पर एक पति के लिए तो यह बड़ी ही शर्मनाक बात है कि वह तलाक़ देकर विदा करते समय अपनी पत्नी से वह सब कुछ रखवा लेना चाहे जो उसने कभी उसे स्वयं दिया था। इसके विपरीत इस्लाम ने ये शिष्टाचार सिखाए हैं कि आदमी जिस औरत को तलाक़ दे, उसे विदा करते समय कुछ न कुछ देकर विदा करे, जैसा कि आगे आयत 241 में कहा गया है।
فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُۥ مِنۢ بَعۡدُ حَتَّىٰ تَنكِحَ زَوۡجًا غَيۡرَهُۥۗ فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا جُنَاحَ عَلَيۡهِمَآ أَن يَتَرَاجَعَآ إِن ظَنَّآ أَن يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِۗ وَتِلۡكَ حُدُودُ ٱللَّهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوۡمٖ يَعۡلَمُونَ ۝ 229
(230) फिर अगर (दो बार तलाक़ देने के बाद पति से औरत को तीसरी बार) तलाक़ दे दी, तो वह औरत फिर उसके लिए हलाल न होगी, अलावा इसके कि उसका निकाह किसी दूसरे आदमी से हो और वह उसे तलाक दे दे।253 तब अगर पहला पति और यह औरत दोनों यह समझे कि अल्लाह को निर्धारित सीमाओं पर क़ायम रहेगे, तो उनके लिए एक-दूसरे की ओर रुजू कर लेने में कोई हरज नहीं। ये अल्लाह की निर्धारित सीमाएँ हैं, जिनको वह उन लोगों के मार्गदर्शन के लिए स्पष्ट कर रहा है जो (उसकी सीमाओं के उल्लंघन का अंजाम) जानते हैं।
253.अर्थात् किसी वक्त ख़ुद अपनी मर्जी से तलाक़ दे दे। सही हदीसों से मालूम होता है कि और कोई आदमी अपनी तलाक़शुदा बीवी को अपने लिए केवल हलाल करने के लिए किसी से षड्यंत्र के रूप में उसका निकाह कराए और पहले से यह तय कर ले कि वह निकाह के बाद उसे तलाक़ दे देगा, तो यह पूर्णतया एक अवैध और धर्म विरुद्ध कर्म है। ऐसा निकाह, निकाह न होगा; बल्कि सिर्फ एक बदकारी होगी और ऐसे षड्यंत्रकारी निकाह व तलाक़ से औरत हरगिज़ अपने पिछले शौहर के लिए हलाल न होगी। नबी (सल्ल०) ने इस तरीक़े से हलाला करने और हलाला करानेवाले पर लानत फ़रमाई है।
وَإِذَا طَلَّقۡتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَبَلَغۡنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمۡسِكُوهُنَّ بِمَعۡرُوفٍ أَوۡ سَرِّحُوهُنَّ بِمَعۡرُوفٖۚ وَلَا تُمۡسِكُوهُنَّ ضِرَارٗا لِّتَعۡتَدُواْۚ وَمَن يَفۡعَلۡ ذَٰلِكَ فَقَدۡ ظَلَمَ نَفۡسَهُۥۚ وَلَا تَتَّخِذُوٓاْ ءَايَٰتِ ٱللَّهِ هُزُوٗاۚ وَٱذۡكُرُواْ نِعۡمَتَ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡ وَمَآ أَنزَلَ عَلَيۡكُم مِّنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَٱلۡحِكۡمَةِ يَعِظُكُم بِهِۦۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ ۝ 230
(231) और जब तुम औरतों को तलाक़ दे दो और उनकी इद्दत पूरी होने को आ जाए, तो या भले तरीक़े से उन्हें रोक लो या भले तरीके से विदा कर दो। केवल सताने के लिए उन्हें न रोके रखना कि यह ज़्यादती होगी। और जो ऐसा करेगा, वह वास्तव में खुद अपने ही ऊपर ज़ुल्म करेगा।254 अल्लाह को आयतों का खेल न बनाओ। भूल न जाओ कि अल्लाह ने कितनी बड़ी नेमत तुम्हे प्रदान की है। वह तुम्हें नसीहत करता है कि जो किताब और हिकमत (तत्त्वदर्शिता) उसने तुमपर उतारी है, उसके आदर का ध्यान रखो।255अल्लाह से डरो और ख़ूब जान लो कि अल्लाह को हर बात की ख़बर है।
254.अर्थात् ऐसा करना सही नहीं है कि एक व्यक्ति अपनी बीवी को तलाक़ दे और इद्दत गुज़रने से पहले सिर्फ़ इसलिए रुजू कर ले उसे फिर सताने और परेशान करने का मौक़ा हाथ आ जाए। अल्लाह हिदायत फ़रमाता है कि रुजूअ करते हो तो इस नीयत से करो कि अब भले तरीके से रहना है, वरना बेहतर यह है कि सज्जनतापूर्ण ढंग से विदा कर दो। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए टिप्पणी न० 250)
255.अर्थात् इस सच्चाई को न भुलाओ कि अल्लाह ने तुम्हें किताब और हिकमत (तत्त्वदर्शिता) की शिक्षा देकर दुनिया की रहनुमाई के महान पद पर नियुक्त किया है। तुम 'उम्मते वस्त' बनाए गए हो, तुम्हें नेकी और सच्चाई का गवाह बनाकर खड़ा किया गया है। तुम्हारा यह काम नहीं है कि हौले-बहानों से काम लेकर अल्लाह की आयतों का खेल बनाओ, क़ानून के शब्दों से कानून की भावना के विपरीत अवैध लाभ उठाओ और दुनिया को सीधा रास्ता दिखाने के बजाय स्वयं अपने घरों में ज़ालिम और बद-राह बनकर रहो।
وَإِذَا طَلَّقۡتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَبَلَغۡنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعۡضُلُوهُنَّ أَن يَنكِحۡنَ أَزۡوَٰجَهُنَّ إِذَا تَرَٰضَوۡاْ بَيۡنَهُم بِٱلۡمَعۡرُوفِۗ ذَٰلِكَ يُوعَظُ بِهِۦ مَن كَانَ مِنكُمۡ يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِۗ ذَٰلِكُمۡ أَزۡكَىٰ لَكُمۡ وَأَطۡهَرُۚ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ وَأَنتُمۡ لَا تَعۡلَمُونَ ۝ 231
(232) जब तुम अपनी औरतों को तलाक़ दे चुको और वे अपनी इद्दत (अवधि) पूरी कर लें, तो फिर इसमें बाधा न बनो कि वे अपने प्रस्तावित शौहरों से निकाह कर लें, जबकि वे सामान्य रीति से आपस में निकाह करने पर राजी हों।256 तुम्हें नसीहत की जाती है कि ऐसी हरकत कदापि न करना, अगर तुम अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान लानेवाले हो। तुम्हारे लिए शिष्ट और पाकीज़ा तरीक़ा यही है कि इससे बचो। अल्लाह जानता है, तुम नहीं जानते।
256.अर्थात् किसी औरत को उसके शौहर ने तलाक़ दे दी हो और इद्दत (प्रतिज्ञा अवधि) के भीतर उससे रुजूअ न किया हो (अर्थात् इद्दत के अन्दर पति ने तलाक़ को रद्द करके पुनर दाम्पत्य संबंध न बनाया हो) फिर इद्दत गुज़र जाने के बाद वे दोनों आपस में दोबारा निकाह करने पर तैयार हों, तो औरत के रिश्तेदारों को इसमें बाधक नहीं बनना चाहिए। (स्पष्ट रहे कि दोबारा निकाह की यह अनुमति सिर्फ़ दो तलाक़ तक है] साथ ही इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि जो आदमी अपनी बीवी को तलाक दे चुका हो और औरत इद्दत के बाद उससे आज़ाद होकर कहीं दूसरी जगह अपना निकाह करना चाहती हो तो उस पहले शौहर को ऐसी नीच हरकत न करनी चाहिए कि उसके निकाह में बाधक बने और यह कोशिश करता फिरे कि जिस औरत को उसने छोड़ा है, उसे कोई निकाह में लाना स्वीकार न करे।
۞وَٱلۡوَٰلِدَٰتُ يُرۡضِعۡنَ أَوۡلَٰدَهُنَّ حَوۡلَيۡنِ كَامِلَيۡنِۖ لِمَنۡ أَرَادَ أَن يُتِمَّ ٱلرَّضَاعَةَۚ وَعَلَى ٱلۡمَوۡلُودِ لَهُۥ رِزۡقُهُنَّ وَكِسۡوَتُهُنَّ بِٱلۡمَعۡرُوفِۚ لَا تُكَلَّفُ نَفۡسٌ إِلَّا وُسۡعَهَاۚ لَا تُضَآرَّ وَٰلِدَةُۢ بِوَلَدِهَا وَلَا مَوۡلُودٞ لَّهُۥ بِوَلَدِهِۦۚ وَعَلَى ٱلۡوَارِثِ مِثۡلُ ذَٰلِكَۗ فَإِنۡ أَرَادَا فِصَالًا عَن تَرَاضٖ مِّنۡهُمَا وَتَشَاوُرٖ فَلَا جُنَاحَ عَلَيۡهِمَاۗ وَإِنۡ أَرَدتُّمۡ أَن تَسۡتَرۡضِعُوٓاْ أَوۡلَٰدَكُمۡ فَلَا جُنَاحَ عَلَيۡكُمۡ إِذَا سَلَّمۡتُم مَّآ ءَاتَيۡتُم بِٱلۡمَعۡرُوفِۗ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعۡمَلُونَ بَصِيرٞ ۝ 232
(233) जो बाप चाहते हो कि उनकी सन्तान दूध पिलाने की पूरी मुद्दत तक दूध पिए, तो माएँ अपने बच्चों को पूरे दो साल दूध पिलाएँ ।257 ऐसी स्थिति में बच्चे के बाप को सामान्य रीति से उन्हें खाना-कपड़ा देना होगा, मगर किसी पर उसकी सामर्थ्य से अधिक बोझ न डालना चाहिए। न तो माँ को इस वजह से कष्ट डाला जाए कि बच्चा उसका है, और न बाप ही इस वजह से तंग किया जाए कि बच्चा उसका है—दूध पिलानेवाली का यह हक़ जैसा बच्चे के बाप पर है, वैसा ही उसके वारिस पर भी है258 लेकिन अगर दोनों पक्ष आपसी रज़ामंदी और मशविरे से दूध छुड़ाना चाहें, तो ऐसा करने में कोई दोष नहीं। और अगर तुम्हारा विचार अपनी औलाद को किसी औरत से दूध पिलाने का हो, तो इसमें भी कोई हरज नहीं, बस शर्त यह है कि उसका जो कुछ मुआवजा तय करो, वह सामान्य रीति से अदा करो। अल्लाह से डरो और जान रखो कि जो कुछ तुम करते हो, सब अल्लाह की नज़र में है।
257.यह उस स्थिति का आदेश है जबकि पति-पत्नी एक दूसरे से अलग हो चुके हों, चाहे तलाक के ज़रिए से या खुलअ या फ़स्त्र (निकाह तोड़ने) और जुदाई डाल देने के ज़रिए से, और औरत की गोद में दूध-पीता बच्चा हो।
258.अर्थात् अगर बाप मर जाए तो जो उसकी जगह बच्चे का सरपरस्त हो, उसे यह हक़ अदा करना होगा।
وَٱلَّذِينَ يُتَوَفَّوۡنَ مِنكُمۡ وَيَذَرُونَ أَزۡوَٰجٗا يَتَرَبَّصۡنَ بِأَنفُسِهِنَّ أَرۡبَعَةَ أَشۡهُرٖ وَعَشۡرٗاۖ فَإِذَا بَلَغۡنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيۡكُمۡ فِيمَا فَعَلۡنَ فِيٓ أَنفُسِهِنَّ بِٱلۡمَعۡرُوفِۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِيرٞ ۝ 233
(234) तुममें से जो लोग मर जाएँ, उनके पीछे अगर उनकी बीवियाँ जिंदा हों, तो वे अपने आपको चार महीने दस दिन रोके रखें।259 फिर जब उनकी इद्दत पूरी हो जाए, तो उन्हें अधिकार है,अपने मामले में सामान्य रीति से जो चाहे करें, तुमपर इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं । अल्लाह तुम सबके कामों की खबर रखता है।
259. शौहर की मृत्यु की यह इद्दत उन औरतों के लिए भी है जिनसे उनके शौहरों ने शारीरिक संबंध न बनाए हों। हाँ, गर्भवती महिला इससे अलग हैं। उसके लिए शौहर की मृत्यु की इद्दत बच्चा जनने तक है, चाहे शौहर की मृत्यु के बाद ही बच्चा पैदा हो जाए या इसमें कई महीने लगें। “अपने आपको रोके रखें" से तात्पर्य केवल यही नहीं है कि वे इस मुद्दत में निकाह न करें, बल्कि इससे तात्पर्य अपने आपको ज़ीनत (शृंगार) से भी रोके रखना है। अतः हदीसों में स्पष्ट रूप से ये आदेश मिलते हैं कि इद्दत के ज़माने में औरत को रंगीन कपड़े और गहने पहनने से, मेहंदी, सुरमा, खुशबू और खि़ज़ाब लगाने से और बालों को साज-सज्जा से बचना चाहिए। हाँ, इस मामले में मतभेद है कि क्या उस अवधि में औरत घर से निकल सकती है या नहीं ? उमर, उसमान, इब्ने उमर, जैद बिन साबित, इब्ने मसऊद, उम्मे सलमा, सईद बिन मुसय्यिब (रजि.), इबराहीम, नखई, मुहम्मद बिन सीरीन ये सब हज़रात और चारों इमाम (रह०) इस बात को मानते हैं कि इद्दत के ज़माने में औरत को उसी घर में रहना चाहिए जहाँ उसके शौहर को मृत्यु हुई हो। दिन के वक़्त किसी ज़रूरत से वह बाहर जा सकती है, परन्तु निवास उसका उसी घर में होना चाहिए। इसके विपरीत हज़रत आइशा, इब्ने अब्बास, हज़रत अली, जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रजि.), अता, ताऊस, हसन बसरी, उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ (रह०) और तमाम अहलुज़्ज़ाहिर इस बात को मानते हैं कि औरत अपनी इद्दत का ज़माना जहाँ चाहे गुज़ार सकती है और उस ज़माने में सफर भी कर सकती है।
وَلَا جُنَاحَ عَلَيۡكُمۡ فِيمَا عَرَّضۡتُم بِهِۦ مِنۡ خِطۡبَةِ ٱلنِّسَآءِ أَوۡ أَكۡنَنتُمۡ فِيٓ أَنفُسِكُمۡۚ عَلِمَ ٱللَّهُ أَنَّكُمۡ سَتَذۡكُرُونَهُنَّ وَلَٰكِن لَّا تُوَاعِدُوهُنَّ سِرًّا إِلَّآ أَن تَقُولُواْ قَوۡلٗا مَّعۡرُوفٗاۚ وَلَا تَعۡزِمُواْ عُقۡدَةَ ٱلنِّكَاحِ حَتَّىٰ يَبۡلُغَ ٱلۡكِتَٰبُ أَجَلَهُۥۚ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا فِيٓ أَنفُسِكُمۡ فَٱحۡذَرُوهُۚ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ حَلِيمٞ ۝ 234
(235) इद्दत के ज़माने में भले ही तुम उन विधवा औरतों के साथ मंगनी का इरादा संकेत रूप में व्यक्त कर दो, चाहे दिल में छिपाये रखो, दोनों शक्लों में कोई हरज नहीं। अल्लाह जानता है कि उनका विचार तो तुम्हारे दिल में आएगा ही। लेकिन देखो, गुप्त रूप से कोई समझौता न करना। अगर कोई बात करनी है तो सामान्य रीति से करो और निकाह का नाता जोड़ने का निश्चय उस समय तक न करो, जब तक कि इद्दत पूरी न हो जाए। खूब समझ लो कि अल्लाह तुम्हारे दिलों का हाल तक जानता है, इसलिए उससे डरो और यह भी जान लो कि अल्लाह सहनशील है, (छोटी-छोटी बातों को) क्षमा कर देता है।
لَّا جُنَاحَ عَلَيۡكُمۡ إِن طَلَّقۡتُمُ ٱلنِّسَآءَ مَا لَمۡ تَمَسُّوهُنَّ أَوۡ تَفۡرِضُواْ لَهُنَّ فَرِيضَةٗۚ وَمَتِّعُوهُنَّ عَلَى ٱلۡمُوسِعِ قَدَرُهُۥ وَعَلَى ٱلۡمُقۡتِرِ قَدَرُهُۥ مَتَٰعَۢا بِٱلۡمَعۡرُوفِۖ حَقًّا عَلَى ٱلۡمُحۡسِنِينَ ۝ 235
(236) तुमपर कुछ गुनाह नही, अगर अपनी औरतों को तलाक़ दे दो इससे पहले कि हाथ लगाने की नौबत आए या मह्र निश्चित हो । ऐसी स्थिति में उन्हें कुछ न कुछ देना ज़रूर चाहिए ।260 समुद्ध व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार और ग़रीब आदमी अपनी सामर्थ्य के अनुसार सामान्य रीति से दे। यह हक़ है नेक आदमियों पर ।
260.इस तरह रिश्ता जोड़ने के बाद तोड़ देने से बहरहाल औरत को कुछ न कुछ नुकसान तो पहुंचता ही है, इसलिए अल्लाह ने आदेश दिया कि यथा सामर्थ्य उसकी पूर्ति करो।
وَإِن طَلَّقۡتُمُوهُنَّ مِن قَبۡلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ وَقَدۡ فَرَضۡتُمۡ لَهُنَّ فَرِيضَةٗ فَنِصۡفُ مَا فَرَضۡتُمۡ إِلَّآ أَن يَعۡفُونَ أَوۡ يَعۡفُوَاْ ٱلَّذِي بِيَدِهِۦ عُقۡدَةُ ٱلنِّكَاحِۚ وَأَن تَعۡفُوٓاْ أَقۡرَبُ لِلتَّقۡوَىٰۚ وَلَا تَنسَوُاْ ٱلۡفَضۡلَ بَيۡنَكُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعۡمَلُونَ بَصِيرٌ ۝ 236
(237) और अगर तुमने हाथ लगाने से पहले तलाक़ दी हो, लेकिन महर निश्चित की जा चुकी हो, तो ऐसी स्थिति में आधा महर देना होगा। यह और बात है कि औरत नर्मी बरते (और महर न ले) या वह मर्द, जिसके अधिकार में निकाह की बागडोर है, नर्मी से काम ले (और पूरा महर दे दे) और तुम (अर्थात् मर्द) नर्मी से काम लो, तो यह तक़वा (ईश-परायणता) के अधिक अनुकूल है। आपस के मामलों में उदारता और विशाल हृदयता को न भूलो।261 तुम्हारे कामों को अल्लाह देख रहा है।
261.अर्थात् इंसानी ताल्लुकात को बेहतर और सुखद बनाने के लिए लोगों का आपस में उदारतापूर्ण व्यवहार करना ज़रूरी है। अगर हर एक आदमी ठीक-ठीक अपने कानूनी हक ही पर अड़ा रहे, तो सामाजिक जीवन कभी सुखद नहीं हो सकता।
حَٰفِظُواْ عَلَى ٱلصَّلَوَٰتِ وَٱلصَّلَوٰةِ ٱلۡوُسۡطَىٰ وَقُومُواْ لِلَّهِ قَٰنِتِينَ ۝ 237
(238) अपनी नमाजों की देखभाल262 करो, मुख्य रूप से ऐसी नमाज़ की जो नमाज खूबियों को समाहित किए हुए हो।263 अल्लाह के आगे इस तरह खड़े हो, जैसे आज्ञापालक दास खड़े होते है।
262.रहन-सहन और सामाजिक नियम बताने के बाद अल्लाह तआला इस बयान को नमाज की ताकीद पर समाप्त करता है, क्योंकि नमाज़ ही वह चीज है जो इंसान के भीतर अल्लाह का डर, नेकी और साफ-सुथरी भावना और अल्लाह के आदेशों के पालन की स्‍पिृट पैदा करती है और उसे सच्चाई पर क़ायम रखती है। यह चीज़ न हो जो इंसान कभी अल्लाह के क़ानूनों की पाबन्दी पर क़दम नहीं जमाए रख सकता और अन्ततः उसी नाफ़रमानी की धारा में बह निकलता है जिसपर यहूदी बह निकले।
263.मूल अरबी शब्द 'सलातुल नुस्ता' प्रयुक्त हुआ है। कुछ टीकाकारों ने इससे तात्पर्य सुबह नमाज़ ली है, कुछ ने जहर, कुछ ने मगरिब और कुछ ने इशा। लेकिन इनमें से कोई कथन भी नबी (सल्ल.) से नकल नहीं किया गया है, सिर्फ अर्थ निकालनेवालों ने इसका यह अर्थ निकाला है। सबसे ज्यादा कथन अस की नमाज़ के लिए मिलते हैं और कहा जाता है कि नबी (सल्ल.) ने इसी नमाज़ को 'सलातुल वुस्ता' (बीच की नमाज) बताया है। लेकिन जिस घटना से यह नतीजा निकाला जाता है, वह केवल यह है कि 'अहजाब की लड़ाई' के मौके पर नबी (सल्ल.) को मुशरिकों के हमलों ने इतना अधिक व्यस्त रखा कि सूरज डूबने को आ गया और आप अस को नमाज़ न पढ़ सके। उस समय आपने फ़रमाया कि "अल्लाह इन लोगों की कलें और इनके घर आग से भर दे, इनके कारण हमारी 'सलातुल वुस्ता' छूट गई।" इससे यह समझा गया कि आपने अस को नमाज़ को 'सलातुल वुस्ता' फरमाया है, हालाँकि इसका यह अर्थ हमारे नज़दीक ज्‍़यादा ठीक है कि इस व्यस्तता के कारण इतनी उच्च श्रेणी की नमाज़ हमसे छूट गई, असमय पढ़नी पड़ेगी, जल्दी-जल्दी अदा करनी होगी, विनम्रतापूर्वक इतमीनान और सुकून के साथ न एढ़ सकेंगे। 'वुस्ता' का अर्थ बीच वाली चीज़ भी है और ऐसी चीज़ भी जो उच्च और श्रेष्ठ हो। 'सलातुल वुस्ता' से तात्पर्य बीच की नमाज़ भी हो सकती है और ऐसी नमाज़ भी जो सही समय पर, विनम्रता के साथ और अल्लाह की ओर पूरा ध्यान लगाकर पढ़ी जाए और जिसमें नमाज़ की तमाम खूबियाँ मौजूद हों। बाद का वाक्य कि "अल्लाह के आगे आज्ञापालक दास की तरह खड़े हो" स्वयं इसकी व्याख्या कर रहा है।
فَإِنۡ خِفۡتُمۡ فَرِجَالًا أَوۡ رُكۡبَانٗاۖ فَإِذَآ أَمِنتُمۡ فَٱذۡكُرُواْ ٱللَّهَ كَمَا عَلَّمَكُم مَّا لَمۡ تَكُونُواْ تَعۡلَمُونَ ۝ 238
(239) अशान्ति को स्थिति हो, तो चाहे पैदल हो या सवार, जैसे भी संभव हो, नमाज़ पढ़ो और जब शान्ति हो जाए तो अल्लाह को उस तरीके से याद करो जो उसने तुम्हें सिखा दिया है, जिसे तुम पहले नहीं जानते थे।
وَٱلَّذِينَ يُتَوَفَّوۡنَ مِنكُمۡ وَيَذَرُونَ أَزۡوَٰجٗا وَصِيَّةٗ لِّأَزۡوَٰجِهِم مَّتَٰعًا إِلَى ٱلۡحَوۡلِ غَيۡرَ إِخۡرَاجٖۚ فَإِنۡ خَرَجۡنَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيۡكُمۡ فِي مَا فَعَلۡنَ فِيٓ أَنفُسِهِنَّ مِن مَّعۡرُوفٖۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٞ ۝ 239
(240) तुममें से264 जिन लोगों का देहान्त हो और पीछे बीवियाँ छोड़ रहे हों, उनको चाहिए कि अपनी बीवियों के हित में यह वसीयत कर जाएँ कि एक साल तक उनको खाना-कपड़ा दिया जाए और वे घर से न निकाली जाएँ, फिर अगर वे स्वयं निकल जाएँ, तो अपने निज के मामले में सामान्य रीति से वे जो कुछ भी करें, उसकी कोई ज़िम्मेदारी तुमपर नहीं है, अल्लाह को सबपर प्रभावकारी प्रभुत्व प्राप्त है और तत्त्वदर्शी और जाननेवाला है।
264.भाषा का क्रम ऊपर समाप्त हो चुका था, यह वाणी उसके पूरक और परिशिष्ट के रूप में है।
وَلِلۡمُطَلَّقَٰتِ مَتَٰعُۢ بِٱلۡمَعۡرُوفِۖ حَقًّا عَلَى ٱلۡمُتَّقِينَ ۝ 240
(241) इसी तरह जिन औरतों को तलाक़ दी गई हो, उन्हें भी उचित ढंग से कुछ-न-कुछ देकर विदा किया जाए। यह हक़ है परहेज़गारों पर ।
كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمۡ ءَايَٰتِهِۦ لَعَلَّكُمۡ تَعۡقِلُونَ ۝ 241
(242) इस तरह अल्लाह अपने आदेश तुम्हें साफ़-साफ़ बताता है। आशा है कि तुम समझ-बूझकर काम करोगे।
۞أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ خَرَجُواْ مِن دِيَٰرِهِمۡ وَهُمۡ أُلُوفٌ حَذَرَ ٱلۡمَوۡتِ فَقَالَ لَهُمُ ٱللَّهُ مُوتُواْ ثُمَّ أَحۡيَٰهُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَذُو فَضۡلٍ عَلَى ٱلنَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَشۡكُرُونَ ۝ 242
(243) तुमने265 उन लोगों की दशा पर भी कुछ विचार किया, जो मौत के डर से अपने घर-बार छोड़कर निकले थे और हजारों की तादाद में थे? अल्लाह ने उनसे फ़रमाया, मर जाओ, फिर उसने उनको दोबारा जीवन प्रदान किया266, सच तो यह है कि अल्लाह इंसान पर बड़ी कृपा करनेवाला है, मगर अधिकतर लोग कृतज्ञता नहीं दर्शाते ।
265.यहाँ से व्याख्यान का एक दूसरा क्रम शुरू होता है जिसमें मुसलमानों को अल्लाह की राह में जिहाद और माली कुर्बानियाँ करने पर उभारा गया है और उन्हें उन कमजोरियों से बचने का आदेश दिया गया है जिनकी वजह से अन्ततः बनी इसराईल पतन के गढ़े में गिरे। इस प्रसंग को समझने के लिए यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि मुसलमान उस समय मक्का से निकाले जा चुके थे, साल-डेढ़ साल से मदीना में शरण लिए हुए थे और विरोधियों के अत्याचारों से तंग आकर खुद बार-बार माँग कर चुके थे कि हमें लड़ने की इजाज़त दी जाए। मगर जब उन्हें लड़ाई का हुक्म दे दिया गया तो अब उनमें से कुछ लोग कसमसा रहे थे, जैसा कि स्कूअ छब्बीस के अंत (आयत 216) में कहा गया है। इसलिए यहाँ बनी इसराईल के इतिहास को दो महत्वपूर्ण घटनाओं से उन्हें शिक्षा लेने को कहा गया है।
266.यह संकेत बनी इसराईल के निकलने की घटना की ओर है । सूरा माइदा को आयत नम्बर 20 में अल्लाह तआला ने इसका सविस्तार वर्णन किया है। ये लोग बहुत बड़ी तादाद में मिस्र से निकले थे। जंगलों और बियाबानों में बेघर फिर रहे थे, स्वयं एक ठिकाना पाने के लिए बेचैन थे, लेकिन जब अल्लाह की इजाजत - से हज़रत मूसा ने उनको आदेश दिया कि ज़ालिम कनआनियों को फलस्तीन की धरती से निकाल दो और उस क्षेत्र पर विजय प्राप्त कर लो, तो उन्होंने भीरुता दिखाई और आगे बढ़ने से इंकार कर दिया। अन्ततः अल्लाह ने उन्हें चालीस साल तक जमीन में मारा-मारा फिरने के लिए छोड़ दिया, यहाँ तक कि उनकी एक नस्ल समाप्त हो गई और दूसरी नस्ल रेगिस्तान की गोद में पलकर उठी, तब अल्लाह तआला ने उन्हें कनआनियों पर ग़लबा अता किया। मालूम होता है कि इसी मामले को मौत और दोबारा जीवन के शब्दों से व्यक्त किया गया है।
وَقَٰتِلُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٞ ۝ 243
(244)-मुसलमानो! अल्लाह की राह में जंग करो और ख़ूब जान रखो कि अल्लाह सुननेवाला और जाननेवाला है।
مَّن ذَا ٱلَّذِي يُقۡرِضُ ٱللَّهَ قَرۡضًا حَسَنٗا فَيُضَٰعِفَهُۥ لَهُۥٓ أَضۡعَافٗا كَثِيرَةٗۚ وَٱللَّهُ يَقۡبِضُ وَيَبۡصُۜطُ وَإِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ ۝ 244
(245) तुममें कौन है जो अल्लाह को अच्छा क़र्ज़267 दे, ताकि अल्लाह उसे कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर वापस करे? घटाना भी अल्लाह के अधिकार में है और बढ़ाना भी, और उसी की ओर तुम्हें पलटकर जाना है।
267.अरबी में "क़र्ज़न हसनन्” प्रयुक्त हुआ है, जिसका उर्दू अनुवाद “क़तें हसन" और हिन्दी में “अच्छा क़र्ज़" किया गया है। इससे अभिप्राय ख़ालिस नेकी के जज्‍़बे से निःस्वार्थ भाव के साथ अल्लाह की राह में माल ख़र्च करना है। इसे अल्लाह अपने ज़िम्मे क़र्ज़ ठहराता है और वादा करता है कि मैं न केवल मूल अदा करूंगा, बल्कि इससे कई गुना ज़्यादा दूंगा।
أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلۡمَلَإِ مِنۢ بَنِيٓ إِسۡرَٰٓءِيلَ مِنۢ بَعۡدِ مُوسَىٰٓ إِذۡ قَالُواْ لِنَبِيّٖ لَّهُمُ ٱبۡعَثۡ لَنَا مَلِكٗا نُّقَٰتِلۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِۖ قَالَ هَلۡ عَسَيۡتُمۡ إِن كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلۡقِتَالُ أَلَّا تُقَٰتِلُواْۖ قَالُواْ وَمَا لَنَآ أَلَّا نُقَٰتِلَ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَقَدۡ أُخۡرِجۡنَا مِن دِيَٰرِنَا وَأَبۡنَآئِنَاۖ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيۡهِمُ ٱلۡقِتَالُ تَوَلَّوۡاْ إِلَّا قَلِيلٗا مِّنۡهُمۡۚ وَٱللَّهُ عَلِيمُۢ بِٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 245
(246) फिर तुमने उस मामले पर भी विचार किया जो मूसा के बाद बनी इसराईल के सरदारों को पेश आया था? उन्होंने अपने नबी से कहा : हमारे लिए एक बादशाह नियुक्त कर दो ताकि हम अल्लाह की राह में जंग करें।268 नबी ने पूछा : कहीं ऐसा तो न होगा कि तुमको जंग का हुक्म दिया जाए और फिर तुम जंग न करो। वे कहने लगे : भला यह कैसे हो सकता है कि हम अल्लाह की राह में न लड़ें, जबकि हमें अपने घरों से निकाल दिया गया है और हमारे बाल-बच्चे हमसे जुदा कर दिए गए हैं, मगर जब उनको जंग का हुक्म दिया गया तो थोड़े-से लोगों के सिवा वे सब पीठ फेर गए, और अल्लाह उनमें से एक-एक ज़ालिम को जानता है।
268.यह लगभग एक हज़ार वर्ष ईसा पूर्व की घटना है । उस वक़्त बनी इसराईल पर अमालिक़ा हावी हो गए थे और उन्होंने इसराइलियों से फ़लस्तीन के बड़े भागों को छीन लिया था। समोएल नबी उस ज़माने में बनी इसराईल के बीच शासन कर रहे थे, मगर वह बहुत बूढ़े हो चुके थे, इसलिए बनी इसराईल के सरदारों ने यह ज़रूरत महसूस की कि कोई और आदमी इनका शासक हो जिसके नेतृत्व में वे जंग कर सकें। लेकिन उस समय बनी इसराईल में इतनी अधिक अज्ञानता आ चुकी थी और वे और मुस्लिम लोगों के तौर-तरीकों से इतने प्रभावित हो चुके थे कि खिलाफत और बादशाही का अन्तर उनके मस्तिष्क से निकल चुका था। इसलिए उन्होंने जो निवेदन किया, वह खलीफा नियुक्त करने का नहीं था, बल्कि एक बादशाह मुकर्रर करने का था। इस सिलसिले में बाइबल की किताब शमूएल प्रथम में जो विवरण आया है वह इस प्रकार है- "शमूएल जिन्दगी भर इसराईलियों पर हुकूमत करता रहा..... तब सब इसराईली बुजुर्ग जमा होकर रामा में शमूएल के पास आए और उससे कहने लगे कि देख, तू बूढ़ा है और तेरे बेटे तेरी राह पर नहीं पलो। अब तू किसी को हमारा बादशाह मुकर्रर कर दे जो और क्रीमों की तरह हम पर हुकूमत करे... यह बात शमूएल को मुरी लगी और शमूएल ने खुदावन्द से दुआ की और ख़ुदावंद ने शमूएल से कहा कि जो कुछ ये लोग तुझसे कहते हैं, तू उसको मान, क्योंकि उन्होंने तेरा नहीं, बल्कि मेरा तिरस्कार किया है कि मैं उनका बादशाह न. रहू... और शमूएल ने उन लोगों को जो उससे बादशाह तलब कर रहे थे, खुदावन्द की सब बातें कह सुनाई और उसने कहा कि जो बादशाह तुमपर हुकूमत करेगा, उसका तरीका यह होगा कि वह तुम्हारे बेटों को लेकर अपने रथों के लिए और अपनी सेना में नौकर रखेगा और वे उसके रथों के आगे दौड़ेंगे और वह उनको हज़ार-हज़ार के सरदार और पचास-पचास के जमादार बनाएगा और कुछ से हल जुतवाएगा और फसल कटवाएगा और अपने लिए लड़ाई के हथियार और रथों के साज़ बनवाएगा और तुम्हारी बेटियों को लेकर उनसे सुगंधद्रव्य, रसोई और रोटियाँ बनवाएगा और तुम्हारे खेतों, अंगूर और जैतून के बागों को, जो अच्छे-से-अच्छे होंगे, लेकर अपने सेवकों को देगा और तुम्हारे खेतों और अंगूर के बागों का दसवां हिस्सा लेकर अपने अधिकारियों और सेवकों को देगा और तुम्हारे नौकर-चाकरों, लौंडियों और तुम्हारे सुन्दर युवकों और तुम्हारे गधों को लेकर अपने काम पर लगाएगा और वह तुम्हारी भेड़-बकरियों का भी दसवां हिस्सा लेगा। तुम लोग उसके दास बन जाओगे और तुम उस दिन उस बादशाह की वजह से, जिसे तुमने अपने लिए चुना होगा, फ़रियाद करोगे, लेकिन उस दिन ख़ुदावन्द तुमको जवाब न देगा। तो भी लोगों ने शमूएल की बात न सुनी और कहने लगे : नहीं, हम तो बादशाह चाहते हैं, जो हमारे ऊपर हो, ताकि हम भी और कौमों की तरह हों और हमारा बादशाह हमपर हुकूमत करे और हमारे आगे-आगे चले और हमारी ओर से जंग करे।.. खुदावन्द ने शमूएल को फरमाया : तू उनकी बात मान ले और उनके लिए एक बादशाह नियुक्त कर।" (7:15 से 8 : 22) "फिर शमूएल लोगों से कहने लगा. .. .. जब तुमने देखा कि बनी अमून का बादशाह नाहश तुमपर चढ़ आया तो तुमने मुझसे कहा कि हमपर कोई बादशाह राज करे, हालाँकि तुम्हारा खुदा तुम्हारा बादशाह था तो अब उस बादशाह को देखो जिसे तुमने चुन लिया और जिसके लिए तुमने निवेदन किया था। देखो, खुदावन्द ने तुमपर बादशाह नियुक्त कर दिया है। अगर तुम खुदावन्द से डरते और उसकी उपासना करते और उसकी बात मानते रहो और खुदा के आदेश का उल्लंघन न करो, और तुम और वह बादशाह भी जो तुमपर राज करता है, दोनों अपने खुदा के पैरवी करनेवाले बने रहो, तब तो भला होगा, परन्तु अगर तुमने खुदा की बात न मानी, बल्कि खुदा के आदेशों का उल्लंघन किया तो खुदा का हाथ तुम्हारे खिलाफ़ होगा, जैसे वह तुम्हारे बाप-दादा के खिलाफ़ होता था।... और तुम जान लोगे और देख भी लोगे कि तुमने बादशाह मांगकर ख़ुदा की नज़र में बहुत बड़ी बुराई की है। अब रहा मैं, सो खुदा न करे कि तुम्हारे लिए दुआ करने से बाज़ आकर खुदा का गुनाहगार ठहरूं, बल्कि मैं वही राह, जो अच्छी और सीधी है, तुमको बताऊंगा।" (1-शमूएल 12 : 12-23) किताब शमूएल के उक्त विवरणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि बादशाही के कायम होने की यह मांग अल्लाह और उसके नबी को पसन्द न थी। अब रहा यह प्रश्न कि कुरआन मजीद में इस जगह पर बनी इसराईल के सरदारों की इस मांग की निन्दा क्यों नहीं की गई, तो इसका उत्तर यह है कि अल्लाह ने यहाँ इस घटना का उल्लेख जिस उद्देश्य से किया है, उससे यह बात कोई सम्बन्ध नहीं रखती कि उनकी मांग सही थी या न थी। यहाँ तो यह बताना अभिप्रेत है कि बनी इसराईल कितने भीरु और डरपोक हो गए थे और उनमें कितनी स्वार्थपरायणता आ गई थी और उनके अन्दर नैतिक अनुशासन को कितनी कमी थी, जिसकी वजह से आखिरकार वे गिर गए, और इसे बताने का उद्देश्य यह है कि मुसलमान इससे शिक्षा लें और अपने भीतर ये कमजोरियां पलने न दें।
وَقَالَ لَهُمۡ نَبِيُّهُمۡ إِنَّ ٱللَّهَ قَدۡ بَعَثَ لَكُمۡ طَالُوتَ مَلِكٗاۚ قَالُوٓاْ أَنَّىٰ يَكُونُ لَهُ ٱلۡمُلۡكُ عَلَيۡنَا وَنَحۡنُ أَحَقُّ بِٱلۡمُلۡكِ مِنۡهُ وَلَمۡ يُؤۡتَ سَعَةٗ مِّنَ ٱلۡمَالِۚ قَالَ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصۡطَفَىٰهُ عَلَيۡكُمۡ وَزَادَهُۥ بَسۡطَةٗ فِي ٱلۡعِلۡمِ وَٱلۡجِسۡمِۖ وَٱللَّهُ يُؤۡتِي مُلۡكَهُۥ مَن يَشَآءُۚ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٞ ۝ 246
(247) उनके नबी ने उनसे कहा कि अल्लाह ने तालूत269 को तुम्हारे लिए बादशाह नियुक्त किया है। यह सुनकर वे बोले : “हम पर बादशाह बनने का वह कैसे हकदार हो गया? उसके क़ाबले में बादशाही के हम ज़्यादा हक़दार हैं। वह तो कोई बड़ा मालदार आदमी नहीं है।” नबी ने जवाब दिया : “अल्लाह ने तुम्हारे मुकाबले में उसी को चुना है और उसको मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की योग्यताएँ भरपूर प्रदान की हैं और अल्लाह को अधिकार है कि अपना मुल्क जिसे चाहे दे, अल्लाह बड़ी समाईवाला है और वह सब कुछ जानता है ।"
269. बाइबल में इसका नाम शाऊल लिखा है। यह कवीला बिन्यामीन (बिन यमौन) का एक तीस वर्षीय नवजवान था। बनी इसराईल में इससे सुन्दर कोई आदमी न था और ऐसा लम्बा-तडंगा था कि लोग इसके कंधे तक आते थे। [अल्लाह के इशारे पर शमूएल नबी उसे अपने घर लाए, तेल को कुम्मी लेकर उसके सर पर उंडेली और उसे चूमा और कहा कि "खुदावन्द ने तुझे मसह (स्पर्श) किया, ताकि तू उसकी मीरास का पेशवा हो।" इसके बाद उन्होंने बनी इसराईल की आम सभा करके उसको बादशाही का एलान किया। (1 शमूएल, अध्याय 9 10) यह बनी इसराईल में दूसरा व्यक्ति था, जिसको खुदा के हुक्म से 'मसह' करके पेशवाई के पद पर नियुक्त किया गया। इससे पहले हज़रत हारून मुख्य पुरोहित (Cheif Priest) की हैसियत से मसह किए गए थे। इसके बाद तीसरे मसह किए हुए या मसीह हजरत दाऊद (अले.) हुए और चौथे मसीह हजरत ईसा (अलै.)। लेकिन तालूत के बारे में ऐसी कोई बात कुरआन या हदीस में नहीं है कि वह नबूवत के पद पर भी आसीन हुआ था। सिर्फ बादशाही के लिए नियुक्त किया जाना, इस बात के लिए पर्याप्त नहीं है कि उसे नबी माना जाए।
وَقَالَ لَهُمۡ نَبِيُّهُمۡ إِنَّ ءَايَةَ مُلۡكِهِۦٓ أَن يَأۡتِيَكُمُ ٱلتَّابُوتُ فِيهِ سَكِينَةٞ مِّن رَّبِّكُمۡ وَبَقِيَّةٞ مِّمَّا تَرَكَ ءَالُ مُوسَىٰ وَءَالُ هَٰرُونَ تَحۡمِلُهُ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗ لَّكُمۡ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ ۝ 247
(248) इसके साथ उनके नबी ने उनको यह भी बताया कि "अल्लाह की ओर से उसके बादशाह नियुक्त होने की पहचान यह है कि उसके दौर में वह संदूक़ तुम्हें वापस मिल जाएगा, जिसमें तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारे लिए दिल की शान्ति का सामान है, जिसमें मूसा के लोगों और हारून के लोगों की छोड़ी हुई बरकतवाली चीजें हैं और जिसको इस बात फरिश्ते संभाले हुए है।270 अगर तुम ईमानवाले हो, तो यह तुम्हारे लिए बहुत बड़ी निशानी है।
270.बाइबल का बयान इस विषय में कुरआन से कुछ भिन्न है। फिर भी उससे मूल पटना के विवरणों पर काफी रौशनी पड़ती है। इससे मालूम होता है कि यह संदूक जिसे बनी इसराईल 'वाचा का संदूक' कहते थे. एक जंग के मौके पर पलिश्ती (बहुदेववादियों) ने बनी इसराईल से छीन लिया था, लेकिन यह मुशरिकों के जिस शहर और जिस बस्ती में रखा गया, वहाँ महामारियाँ फूट पड़ी। अन्ततः उन्होंने मारे डर के उसे एक बैलगाड़ी पर रखकर गाड़ी को हाँक दिया । (। शमूएल, अध्याय 4 तथा 51 7:1) शायद इसी मामले की ओर कुरआन इन शब्दों में इशारा करता है कि उस समय वह संदूक फरिश्तों की सुरक्षा में था, क्योंकि वह गाड़ी बिना किसी गाड़ीबान के हांक दी गई थी और अल्लाह के हुक्म से यह फरिश्तों ही का काम था कि वे उसे हाँक कर बनी इसराईल की ओर ले आए । रहा यह कहना कि "इस संदूक में तुम्हारे लिए मन की शान्ति का सामान है" तो बाइबल के बयान से इसकी वास्तविकता यह जान पड़ती है कि बनी इसराईल उसको बड़ा पवित्र और अपने लिए विजय और मदद का निशान समझते थे। जब वह उनके हाथ से निकल गया तो पूरी कौम की हिम्मत टूट गई और हर इसराईली यह सोचने लगा कि अल्लाह की रहमत हमसे फिर गई है और अब हमारे बुरे दिन आ गए हैं। तो उस संदूक का वापस आना इस कौम के लिए दिल के अत्यंत संतोष और शक्ति का कारण था। यह एक ऐसा साधन था जिससे उनकी टूटी हुई हिम्मते फिर बंध सकती थीं। "मूसा के लोगों और हारून के लोगों की छोड़ी हुई बरकतवाली चीजें" जो इस संदूक में रखी हुई थी इनसे तात्पर्य पत्थर की वे तख्तियाँ हैं, जो सीना पहाड़ पर अल्लाह ने हज़रत मूसा (अलै.) को दी थीं। इसके अलावा तौरात को वह मूल प्रति भी उसमें थी, जिसे हज़रत मूसा (अलै०) ने खुद लिखवाकर बनी लावी के सुपुर्द किया था, साथ ही एक बोतल में 'मन्न' भी भरकर उसमें रख दिया गया था, ताकि आगे की नस्लें अल्लाह के उस उपकार को याद करें जो रेगिस्तान में उसने इनके बाप-दादा पर किया था और शायद हज़रत मूसा (अलै.) की वह लाठी भी इसके भीतर थी जो अल्लाह के महान चमत्कारों का प्रतीक थी
فَلَمَّا فَصَلَ طَالُوتُ بِٱلۡجُنُودِ قَالَ إِنَّ ٱللَّهَ مُبۡتَلِيكُم بِنَهَرٖ فَمَن شَرِبَ مِنۡهُ فَلَيۡسَ مِنِّي وَمَن لَّمۡ يَطۡعَمۡهُ فَإِنَّهُۥ مِنِّيٓ إِلَّا مَنِ ٱغۡتَرَفَ غُرۡفَةَۢ بِيَدِهِۦۚ فَشَرِبُواْ مِنۡهُ إِلَّا قَلِيلٗا مِّنۡهُمۡۚ فَلَمَّا جَاوَزَهُۥ هُوَ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مَعَهُۥ قَالُواْ لَا طَاقَةَ لَنَا ٱلۡيَوۡمَ بِجَالُوتَ وَجُنُودِهِۦۚ قَالَ ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَٰقُواْ ٱللَّهِ كَم مِّن فِئَةٖ قَلِيلَةٍ غَلَبَتۡ فِئَةٗ كَثِيرَةَۢ بِإِذۡنِ ٱللَّهِۗ وَٱللَّهُ مَعَ ٱلصَّٰبِرِينَ ۝ 248
(249) फिर जब तालूत फौज लेकर चला, तो उसने कहा : “एक नदी पर अल्लाह की ओर से तुम्हारी परीक्षा होनेवाली है। जो उसका पानी पिएगा, वह मेरा साथी नहीं। मेरा साथी सिर्फ वह है जो इससे प्यास न बुझाए; हाँ, एक-आध चुल्लू कोई पी ले, तो पी ले।" मगर एक छोटे से गिरोह के सिवा उन सबने उस नदी से खूब पानी पिया।271 फिर जब तालूत और उसके साथी मुसलमान नदी पार करके आगे बढ़े, तो उन्होंने तालूत से कह दिया कि आज हममें जालूत और उसकी फ़ौजों का मुकाबला करने की ताक़त नहीं।272 लेकिन जो लोग यह समझते थे कि उन्हें एक दिन अल्लाह से मिलना है, उन्होंने कहा : “कई बार ऐसा हुआ है कि एक छोटे गिरोह ने अल्लाह के हुक्म से एक बड़े गिरोह पर विजय पाई है। अल्लाह सब करनेवालों का साथी है।"
271.संभव है कि इससे अभिप्रेत जार्डन नदी हो या कोई और नदी या नाला। तालूत बनी इसराईल की फौज को लेकर उसके पार उतरना चाहता था, मगर चूँकि उसे मालूम था कि उसकी क़ौम के भीतर नैतिक अनुशासन बहुत कम रह गया है, इसलिए उसने उपयोगी लोगों और अनुपयोगी लोगों को अलग-अलग करने के लिए इस परीक्षा से गुज़ारा । स्पष्ट है कि जो लोग थोड़ी देर के लिए अपनी प्यास तक न रोक सकें, उनपर क्या भरोसा किया जा सकता है कि उस दुश्मन के मुकाबले में बहादुरी दिखाएंगे जिससे पहले ही वे हार चुके हैं।
272.संभवतः ऐसा कहनेवाले वही लोग होंगे जिन्होंने नदी पर पहले ही अपनी बेसब्री का प्रदर्शन कर दिया था।
وَلَمَّا بَرَزُواْ لِجَالُوتَ وَجُنُودِهِۦ قَالُواْ رَبَّنَآ أَفۡرِغۡ عَلَيۡنَا صَبۡرٗا وَثَبِّتۡ أَقۡدَامَنَا وَٱنصُرۡنَا عَلَى ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 249
(250) और जब वे जालूत और उसकी फौजों के क़ाबले पर निकले, तो उन्होंने दुआ की : "ऐ हमारे रब ! हमपर धैर्य उंडेल दे, हमारे क़दम जमा दे और इंकार करनेवाले गिरोह पर हमें विजय प्रदान कर।"
فَهَزَمُوهُم بِإِذۡنِ ٱللَّهِ وَقَتَلَ دَاوُۥدُ جَالُوتَ وَءَاتَىٰهُ ٱللَّهُ ٱلۡمُلۡكَ وَٱلۡحِكۡمَةَ وَعَلَّمَهُۥ مِمَّا يَشَآءُۗ وَلَوۡلَا دَفۡعُ ٱللَّهِ ٱلنَّاسَ بَعۡضَهُم بِبَعۡضٖ لَّفَسَدَتِ ٱلۡأَرۡضُ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ ذُو فَضۡلٍ عَلَى ٱلۡعَٰلَمِينَ ۝ 250
(251) अन्तत: अल्लाह के हुक्म से उन्होंने इंकार करनेवालों को मार भगाया और दाऊद273 ने जालूत को क़त्ल कर दिया और अल्लाह ने उसे सल्तनत और सूझबूझ से विभूषित किया और जिन-जिन चीज़ों का चाहा, उसको ज्ञान दिया—अगर अल्लाह इस तरह इंसानों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के ज़रिये से हटाता न रहता तो धरती की व्यवस्था बिगड़ जाती।274 लेकिन दुनिया के लोगों पर अल्लाह की बढ़ी मेहरबानी है (की वह इस तरह बिगाड़ को दूर करने का प्रबंध करता रहता है।)
273.दाऊद (अलै०) उस समय एक कमसिन नवजवान थे। संयोग से तालूत (शाऊल) को फौज में ठीक उस समय पहुंचे जबकि पलिश्तियों की फ़ौज का भारी-भरकम पहलवान जालूत (गोलियत) बनी इसराईल की फौज को ललकार रहा था और इसराईलियों में से किसी में साहस नहीं पैदा हो रहा था कि उसके मुक़ाबले को निकले । हज़रत दाऊद यह रंग देखकर बिना प्रतीक्षा किए हुए उसके मुक़ाबले पर मैदान में जा पहुंचे और उसको क़त्ल कर दिया। इस घटना ने उन्‍हें तमाम इसराईलियों की आँखों का नारा बना दिया। तालूत (शाऊल) ने अपनी बेटी उनसे ब्याह दी और अन्‍तत: वही इसराईलियों के शासक हुए। (विस्तार के लिए देखिए बाइबल, पुस्तक शमूएल प्रथम, अध्याय 17 व 18)
274.अर्थात् अल्लाह ने धरती की व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह नियम बना रखा है कि वह इंसानों के अलग-अलग गिरोहों को एक विशेष सीमा तक तो धरती में सत्ता और शक्ति प्राप्त करने देता है, किन्‍तु जब कोई गिरोह हद से बढ़ने लगता है, तो किसी दूसरे गिरोह द्वारा वह उसका ज़ोर तोड़ देता है। अगर कहीं ऐसा होता कि एक कौम और एक पार्टी ही की सत्‍ता धरती में सदैव बाक़ी रखी जाती और उसका अत्याचार और अन्याय कभी ख़त्म न होता तो निश्चित ही अल्‍लाह की धरती में घोर तबाही और फ़साद बरपा हो जाता|
تِلۡكَ ءَايَٰتُ ٱللَّهِ نَتۡلُوهَا عَلَيۡكَ بِٱلۡحَقِّۚ وَإِنَّكَ لَمِنَ ٱلۡمُرۡسَلِينَ ۝ 251
(252) ये अल्लाह की आयतें हैं जो हग ठीक-ठीक तुमको सुना रहे हैं, और (ऐ मुहम्‍मद) तुम निश्चय ही उन लोगों में से हो जो रसूल बनाकर भेजे गए हैं।
۞تِلۡكَ ٱلرُّسُلُ فَضَّلۡنَا بَعۡضَهُمۡ عَلَىٰ بَعۡضٖۘ مِّنۡهُم مَّن كَلَّمَ ٱللَّهُۖ وَرَفَعَ بَعۡضَهُمۡ دَرَجَٰتٖۚ وَءَاتَيۡنَا عِيسَى ٱبۡنَ مَرۡيَمَ ٱلۡبَيِّنَٰتِ وَأَيَّدۡنَٰهُ بِرُوحِ ٱلۡقُدُسِۗ وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَا ٱقۡتَتَلَ ٱلَّذِينَ مِنۢ بَعۡدِهِم مِّنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَتۡهُمُ ٱلۡبَيِّنَٰتُ وَلَٰكِنِ ٱخۡتَلَفُواْ فَمِنۡهُم مَّنۡ ءَامَنَ وَمِنۡهُم مَّن كَفَرَۚ وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَا ٱقۡتَتَلُواْ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يَفۡعَلُ مَا يُرِيدُ ۝ 252
(253) ऐ रसूल (जो हमारी ओर से इंसानों के मार्गदर्शन पर लगाए गए) हमने इनको एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर रूतबे दिए। इनमें कोई ऐसा था जिससे अल्लाह ने ख़ुद बातें कीं, किसी को उसने दूसरी हैसियतों से ऊंचे रूतबे दिए, और आखि़र में ईसा बिन मरयम को खुली निशानियाँ दीं और पवित्रात्‍मा से उसकी सहायता की। अगर अल्लाह चाहता तो संभव न था कि इन रसूलों के बाद जो लोग स्‍पष्‍ट निशानियाँ देख चुके थे, वे आपस में लड़ते, मगर (अल्लाह यह नहीं चाहता था कि वह लोगों को बलपूर्वक विभेद से रोके, इस कारण) उन्होंने आपस में विभेद किया। फिर कोई ईमान लाया और किसी ने इंकार का रास्ता अपनाया। हाँ, अल्लाह चाहता तो वे कदापि न लड़ते, मगर अल्लाह जो चाहता है, करता है।275
275. अर्थ यह है कि रसूलों द्वारा ज्ञान प्राप्त हो जाने के बाद जो विभेद लोगों के बीच पैदा हुए और विभेदों से बढ़कर लड़ाइयों तक जो नौबतें पहुंची, तो उसका कारण यह नहीं था कि अल्लाह विवश था और उसके पास इन विभेदों और लड़ाइयों को रोकने की शक्ति न थी। नहीं, अगर वह चाहता तो किसी में साहस न था कि नबियों को दावत से मुँह मोड़ सकता और इंकार और विद्रोह के रास्ते पर चल सकता और उसकी धरती में बिगाड़ पैदा कर सकता। मगर वह यह चाहता ही नहीं था कि इंसानों से इरादे और इख्तियार की आज़ादी छीन ले और उन्हें एक खास तरीके पर चलने पर मजबूर कर दे। उसने परीक्षा के उद्देश्य से उन्हें धरती पर पैदा किया था, इसलिए उसने उनको अक़ीदे और अमल की राहों में चुनाव की आज़ादी दे दी और नबियों को लोगों पर कोतवाल बनाकर नहीं भेजा कि ज़बरदस्ती उन्हें ईमान व इताअत की ओर खींच लाएं, बल्कि इसलिए भेजा कि दलीलों और खुली गवाहियों से लोगों को सच्चाई की ओर बुलाने की कोशिश करें। तो जितने ज़्यादा विभेद और लड़ाइयों के हंगामे हुए, वे सब इस वजह से हुए कि अल्लाह ने लोगों को इरादे की जो आज़ादी दी थी उससे काम लेकर लोगों ने अलग-अलग राहें अपना ली.न कि इस वजह से कि अल्लाह उनको सच्चाई पर चलाना चाहता था, मगर (अल्लाह की पनाह) उसे सफलता न हुई।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَنفِقُواْ مِمَّا رَزَقۡنَٰكُم مِّن قَبۡلِ أَن يَأۡتِيَ يَوۡمٞ لَّا بَيۡعٞ فِيهِ وَلَا خُلَّةٞ وَلَا شَفَٰعَةٞۗ وَٱلۡكَٰفِرُونَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ ۝ 253
(254) ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो ! जो कुछ धन-सामग्री हमने तुमको दी है, उसमें से खर्च करों276 इससे पहले कि वह दिन आए, जिसमें न क्रय-विक्रय होगा, न दोस्ती काम आएगी और न सिफ़ारिश चलेगी, और ज़ालिम असल में वही हैं जो इंकार की नीति अपनाते हैं।277
276. अर्थात् अल्लाह के रास्ते में खर्च करना है । कहा यह जा रहा है कि जिन लोगों ने ईमान का रास्ता अपनाया है, उन्हें उस उद्देश्य के लिए जिसपर वे ईमान लाए हैं,माली क़ुर्बानियाँ सहनी चाहिए।
277.यहाँ इंकार की नीति अपनानेवालों से तात्पर्य या तो वे लोग हैं जो अल्लाह के आदेशों का पालन करने से इनकार करें और अपने माल को उसको प्रसन्नता से अधिक प्रिय समझें, या वे लोग हैं जो उस दिन में विश्वास न रखते हों जिसके आने का डर दिलाया गया है। या फिर वे लोग हैं जो इस धोखे में पड़े हों कि आखिरत में उन्हें किसी-न-किसी तरह निजात खरीद लेने का और दोस्ती व सिफारिश से काम निकाल ले जाने का अवसर मिल ही जाएगा।
ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلۡحَيُّ ٱلۡقَيُّومُۚ لَا تَأۡخُذُهُۥ سِنَةٞ وَلَا نَوۡمٞۚ لَّهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِۗ مَن ذَا ٱلَّذِي يَشۡفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذۡنِهِۦۚ يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيۡءٖ مِّنۡ عِلۡمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَۚ وَسِعَ كُرۡسِيُّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفۡظُهُمَاۚ وَهُوَ ٱلۡعَلِيُّ ٱلۡعَظِيمُ ۝ 254
(255) अल्लाह, वह शाश्वत जीवंत-सत्ता, जो समूची सृष्टि को सँभाले हुए है, उसके सिवा कोई खुदा नहीं है।278 वह न सोता है और न उसे ऊँघ लगती है।279 ज़मीन और आसमानों में जो कुछ है, उसी का है।280 कौन है जो उसके यहाँ उसकी अनुमति के बिना सिफ़ारिश कर सके?281 जो कुछ बन्दों के सामने है, उसे भी वह जानता है और जो कुछ उनसे ओझल है, उसे भी वह जानता है और उसके ज्ञान में से कोई चीज़ उनकी पकड़ में नहीं आ सकती, सिवाय इसके किकिसी चीज का ज्ञान वह स्वयं ही उनको देना चाहे।282 उसकी हुकूमत (शासना)283 आसमानों और जमीन पर काई हुई है और उनकी सुरक्षा (देखभाला उसके लिए कोई थका देनेवाला काम नहीं है। बस वही एक महान और सर्वोपरि सत्ता है।284
278.अर्थात् नादान लोगों ने अपनी जगह चाहे कितने ही ख़ुदा और उपास्य बना रखे हों, लेकिन सच्ची बात यह है कि ख़ुदाई पूरी की पूरी बिना किसी की शिर्कत के उस शाश्वत सत्ता की है जो किसी के दिए हुए जीवन से नहीं, बल्कि आप अपने ही जीवन से जीवित है और जिसके बलबूते पर ही सृष्टि की यह सारी व्यवस्था स्थित है। अपने साम्राज्य में प्रभुत्व के तमाम अधिकारों का स्वामी वह स्वयं ही है। कोई दूसरा न उसके गुणों में उसका साझी है,न उसके अधिकारों में और न उसके हक़ों में । इसलिए उसको छोड़कर या उसके साथ साझी ठहराकर ज़मीन या आसमान में जहाँ भी किसी और को उपास्य (खुदा) बनाया जा रहा है, एक झूठ गढ़ा जा रहा है और सच्चाई के विरुद्ध लड़ाई लड़ी जा रही है।
279.यह उन लोगों के विचारों का खंडन है जो सर्व जगत् के स्वामी की सत्ता को अपनी त्रुटिपूर्ण हस्तियों पर अनुमान करते हैं और उसकी ओर वे कमजोरियाँ जोड़ देते हैं जो इंसानों के साथ खास हैं। जैसे बाइबल का यह बयान कि ख़ुदा ने छः दिन में ज़मीन व आसमान को पैदा किया और सातवें दिन आराम किया।
283.मूल अरबी शब्द 'कुर्सी प्रयुक्त हुआ है, जिसे आम तौर से हुकूमत और सत्ता के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उर्दू और हिन्दी भाषा में भी प्रायः कुर्सी कहकर शासनाधिकार समझा जाता है।
284.यह आयत 'आयतुल कुर्सी के नाम से प्रसिद्ध है और इसमें अल्लाह की ऐसी मुकम्मल मारफ़त (विशिष्टतापूर्ण पहचान) प्रदान की गई है जिसका उदाहरण कहीं नहीं मिलता। इसी कारण हदीस में इसको कुरआन की सर्वश्रेष्ठ आयत बनाया गया है। इस जगह यह प्रश्न पैदा होता है कि यहाँ अल्लाह की ज़ात और सिफ़ात (गुणों) का उल्लेख किस ताल्लुक से हुआ है। इसको समझने के लिए एक बार फिर उस व्याख्यान पर निगाह डाल लीजिए जो स्कूज 32 (आयत 243) से चला आ रहा है। पहले मुसलमानों को सच्चे दोन को कायम करने के रास्ते में जान व माल से जिहाद करने पर उकसाया गया है और उन कमजोरियों से बचने की ताकीद की गई है जिनके शिकार बनी इसराईल हो चुके थे। फिर यह वास्तविकता समझाई गई है कि जीत और सफलता का आश्रय तादाद और साधन-सामग्री की अधिकता पर नहीं होता, बल्कि ईमान, धैर्य, अनुशासन और दढ निश्चय के आधार पर होता है। फिर लड़ाई के साथ अल्लाह की जो तत्वदर्शिता जुड़ी हुई है उसकी ओर संकेत किया गया है, अर्थात यह कि सृष्टि की व्यवस्था बाकी रखने के लिए वह हमेशा इंसानों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता रहता है, वरना अगर एक ही गिरोह को सत्ता व अधिकार का हमेशा का पट्टा मिल जाता तो दूसरों के लिए जीना भी दूभर हो जाता। फिर इस शंका को दूर किया गया है जो अनजान लोगों के दिलों में प्रायः खटकता है कि अगर अल्लाह ने अपने पैग़म्बर मतभेदों को मिटाने और झगड़ों का दरवाजा बन्द करने के लिए ही भेजे थे और उनके आने के बाद भी विरोध और विभेद न मिटे, न झगड़े दूर हुए, तो क्या अल्लाह इतना विवश था कि उसने इन खराबियों को दूर करना चाहा और न कर सका। इसके उत्तर में बताया गया कि विभेदों को ताकत से रोक देना और मानवजाति को एक विशेष मार्ग पर जबरदस्ती चलाना अल्लाह चाहता ही नहीं था वरना इंसान की क्या मजाल थी कि उसके चाहने के विरुद्ध चलता। फिर एक वाक्य में उस मूल विषय की ओर संकेत कर दिया गया जिससे भाषण की शुरुआत हुई थी। इसके बाद अब यह कहा जा रहा है कि इंसानों की धारणाएँ, मत, पंथ और मज़ाहिब भले ही बहुत ज़्यादा अलग-अलग हों, बहरहाल सच्चाई जिसपर जमीन व आसमान को व्यवस्था चल रही है, यह है जिसका इस आयत में उल्लेख किया गया है। इंसानों की ग़लतफ़हमियों से तनिक भी इस सच्चाई में कोई अन्तर नहीं आता, मगर अल्लाह यह नहीं चाहता कि उसके मानने पर ज़बरदस्ती लोगों को मजबूर किया जाए । जो उसे मान लेगा, वह स्वयं ही लाभ में रहेगा और जो उससे मुंह फेरेगा, वह आप अपना नुकसान उठाएगा।
284.यह आयत 'आयतुल कुर्सी के नाम से प्रसिद्ध है और इसमें अल्लाह की ऐसी मुकम्मल मारफ़त (विशिष्टतापूर्ण पहचान) प्रदान की गई है जिसका उदाहरण कहीं नहीं मिलता। इसी कारण हदीस में इसको कुरआन की सर्वश्रेष्ठ आयत बनाया गया है। इस जगह यह प्रश्न पैदा होता है कि यहाँ अल्लाह की ज़ात और सिफ़ात (गुणों) का उल्लेख किस ताल्लुक से हुआ है। इसको समझने के लिए एक बार फिर उस व्याख्यान पर निगाह डाल लीजिए जो स्कूज 32 (आयत 243) से चला आ रहा है। पहले मुसलमानों को सच्चे दोन को कायम करने के रास्ते में जान व माल से जिहाद करने पर उकसाया गया है और उन कमजोरियों से बचने की ताकीद की गई है जिनके शिकार बनी इसराईल हो चुके थे। फिर यह वास्तविकता समझाई गई है कि जीत और सफलता का आश्रय तादाद और साधन-सामग्री की अधिकता पर नहीं होता, बल्कि ईमान, धैर्य, अनुशासन और दढ निश्चय के आधार पर होता है। फिर लड़ाई के साथ अल्लाह की जो तत्वदर्शिता जुड़ी हुई है उसकी ओर संकेत किया गया है, अर्थात यह कि सृष्टि की व्यवस्था बाकी रखने के लिए वह हमेशा इंसानों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता रहता है, वरना अगर एक ही गिरोह को सत्ता व अधिकार का हमेशा का पट्टा मिल जाता तो दूसरों के लिए जीना भी दूभर हो जाता। फिर इस शंका को दूर किया गया है जो अनजान लोगों के दिलों में प्रायः खटकता है कि अगर अल्लाह ने अपने पैग़म्बर मतभेदों को मिटाने और झगड़ों का दरवाजा बन्द करने के लिए ही भेजे थे और उनके आने के बाद भी विरोध और विभेद न मिटे, न झगड़े दूर हुए, तो क्या अल्लाह इतना विवश था कि उसने इन खराबियों को दूर करना चाहा और न कर सका। इसके उत्तर में बताया गया कि विभेदों को ताकत से रोक देना और मानवजाति को एक विशेष मार्ग पर जबरदस्ती चलाना अल्लाह चाहता ही नहीं था वरना इंसान की क्या मजाल थी कि उसके चाहने के विरुद्ध चलता। फिर एक वाक्य में उस मूल विषय की ओर संकेत कर दिया गया जिससे भाषण की शुरुआत हुई थी। इसके बाद अब यह कहा जा रहा है कि इंसानों की धारणाएँ, मत, पंथ और मज़ाहिब भले ही बहुत ज़्यादा अलग-अलग हों, बहरहाल सच्चाई जिसपर जमीन व आसमान को व्यवस्था चल रही है, यह है जिसका इस आयत में उल्लेख किया गया है। इंसानों की ग़लतफ़हमियों से तनिक भी इस सच्चाई में कोई अन्तर नहीं आता, मगर अल्लाह यह नहीं चाहता कि उसके मानने पर ज़बरदस्ती लोगों को मजबूर किया जाए । जो उसे मान लेगा, वह स्वयं ही लाभ में रहेगा और जो उससे मुंह फेरेगा, वह आप अपना नुकसान उठाएगा।
284.यह आयत 'आयतुल कुर्सी के नाम से प्रसिद्ध है और इसमें अल्लाह की ऐसी मुकम्मल मारफ़त (विशिष्टतापूर्ण पहचान) प्रदान की गई है जिसका उदाहरण कहीं नहीं मिलता। इसी कारण हदीस में इसको कुरआन की सर्वश्रेष्ठ आयत बनाया गया है। इस जगह यह प्रश्न पैदा होता है कि यहाँ अल्लाह की ज़ात और सिफ़ात (गुणों) का उल्लेख किस ताल्लुक से हुआ है। इसको समझने के लिए एक बार फिर उस व्याख्यान पर निगाह डाल लीजिए जो स्कूज 32 (आयत 243) से चला आ रहा है। पहले मुसलमानों को सच्चे दोन को कायम करने के रास्ते में जान व माल से जिहाद करने पर उकसाया गया है और उन कमजोरियों से बचने की ताकीद की गई है जिनके शिकार बनी इसराईल हो चुके थे। फिर यह वास्तविकता समझाई गई है कि जीत और सफलता का आश्रय तादाद और साधन-सामग्री की अधिकता पर नहीं होता, बल्कि ईमान, धैर्य, अनुशासन और दढ निश्चय के आधार पर होता है। फिर लड़ाई के साथ अल्लाह की जो तत्वदर्शिता जुड़ी हुई है उसकी ओर संकेत किया गया है, अर्थात यह कि सृष्टि की व्यवस्था बाकी रखने के लिए वह हमेशा इंसानों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता रहता है, वरना अगर एक ही गिरोह को सत्ता व अधिकार का हमेशा का पट्टा मिल जाता तो दूसरों के लिए जीना भी दूभर हो जाता। फिर इस शंका को दूर किया गया है जो अनजान लोगों के दिलों में प्रायः खटकता है कि अगर अल्लाह ने अपने पैग़म्बर मतभेदों को मिटाने और झगड़ों का दरवाजा बन्द करने के लिए ही भेजे थे और उनके आने के बाद भी विरोध और विभेद न मिटे, न झगड़े दूर हुए, तो क्या अल्लाह इतना विवश था कि उसने इन खराबियों को दूर करना चाहा और न कर सका। इसके उत्तर में बताया गया कि विभेदों को ताकत से रोक देना और मानवजाति को एक विशेष मार्ग पर जबरदस्ती चलाना अल्लाह चाहता ही नहीं था वरना इंसान की क्या मजाल थी कि उसके चाहने के विरुद्ध चलता। फिर एक वाक्य में उस मूल विषय की ओर संकेत कर दिया गया जिससे भाषण की शुरुआत हुई थी। इसके बाद अब यह कहा जा रहा है कि इंसानों की धारणाएँ, मत, पंथ और मज़ाहिब भले ही बहुत ज़्यादा अलग-अलग हों, बहरहाल सच्चाई जिसपर जमीन व आसमान को व्यवस्था चल रही है, यह है जिसका इस आयत में उल्लेख किया गया है। इंसानों की ग़लतफ़हमियों से तनिक भी इस सच्चाई में कोई अन्तर नहीं आता, मगर अल्लाह यह नहीं चाहता कि उसके मानने पर ज़बरदस्ती लोगों को मजबूर किया जाए । जो उसे मान लेगा, वह स्वयं ही लाभ में रहेगा और जो उससे मुंह फेरेगा, वह आप अपना नुकसान उठाएगा।
284.यह आयत 'आयतुल कुर्सी के नाम से प्रसिद्ध है और इसमें अल्लाह की ऐसी मुकम्मल मारफ़त (विशिष्टतापूर्ण पहचान) प्रदान की गई है जिसका उदाहरण कहीं नहीं मिलता। इसी कारण हदीस में इसको कुरआन की सर्वश्रेष्ठ आयत बनाया गया है। इस जगह यह प्रश्न पैदा होता है कि यहाँ अल्लाह की ज़ात और सिफ़ात (गुणों) का उल्लेख किस ताल्लुक से हुआ है। इसको समझने के लिए एक बार फिर उस व्याख्यान पर निगाह डाल लीजिए जो स्कूज 32 (आयत 243) से चला आ रहा है। पहले मुसलमानों को सच्चे दोन को कायम करने के रास्ते में जान व माल से जिहाद करने पर उकसाया गया है और उन कमजोरियों से बचने की ताकीद की गई है जिनके शिकार बनी इसराईल हो चुके थे। फिर यह वास्तविकता समझाई गई है कि जीत और सफलता का आश्रय तादाद और साधन-सामग्री की अधिकता पर नहीं होता, बल्कि ईमान, धैर्य, अनुशासन और दढ निश्चय के आधार पर होता है। फिर लड़ाई के साथ अल्लाह की जो तत्वदर्शिता जुड़ी हुई है उसकी ओर संकेत किया गया है, अर्थात यह कि सृष्टि की व्यवस्था बाकी रखने के लिए वह हमेशा इंसानों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता रहता है, वरना अगर एक ही गिरोह को सत्ता व अधिकार का हमेशा का पट्टा मिल जाता तो दूसरों के लिए जीना भी दूभर हो जाता। फिर इस शंका को दूर किया गया है जो अनजान लोगों के दिलों में प्रायः खटकता है कि अगर अल्लाह ने अपने पैग़म्बर मतभेदों को मिटाने और झगड़ों का दरवाजा बन्द करने के लिए ही भेजे थे और उनके आने के बाद भी विरोध और विभेद न मिटे, न झगड़े दूर हुए, तो क्या अल्लाह इतना विवश था कि उसने इन खराबियों को दूर करना चाहा और न कर सका। इसके उत्तर में बताया गया कि विभेदों को ताकत से रोक देना और मानवजाति को एक विशेष मार्ग पर जबरदस्ती चलाना अल्लाह चाहता ही नहीं था वरना इंसान की क्या मजाल थी कि उसके चाहने के विरुद्ध चलता। फिर एक वाक्य में उस मूल विषय की ओर संकेत कर दिया गया जिससे भाषण की शुरुआत हुई थी। इसके बाद अब यह कहा जा रहा है कि इंसानों की धारणाएँ, मत, पंथ और मज़ाहिब भले ही बहुत ज़्यादा अलग-अलग हों, बहरहाल सच्चाई जिसपर जमीन व आसमान को व्यवस्था चल रही है, यह है जिसका इस आयत में उल्लेख किया गया है। इंसानों की ग़लतफ़हमियों से तनिक भी इस सच्चाई में कोई अन्तर नहीं आता, मगर अल्लाह यह नहीं चाहता कि उसके मानने पर ज़बरदस्ती लोगों को मजबूर किया जाए । जो उसे मान लेगा, वह स्वयं ही लाभ में रहेगा और जो उससे मुंह फेरेगा, वह आप अपना नुकसान उठाएगा।
284.यह आयत 'आयतुल कुर्सी के नाम से प्रसिद्ध है और इसमें अल्लाह की ऐसी मुकम्मल मारफ़त (विशिष्टतापूर्ण पहचान) प्रदान की गई है जिसका उदाहरण कहीं नहीं मिलता। इसी कारण हदीस में इसको कुरआन की सर्वश्रेष्ठ आयत बनाया गया है। इस जगह यह प्रश्न पैदा होता है कि यहाँ अल्लाह की ज़ात और सिफ़ात (गुणों) का उल्लेख किस ताल्लुक से हुआ है। इसको समझने के लिए एक बार फिर उस व्याख्यान पर निगाह डाल लीजिए जो स्कूज 32 (आयत 243) से चला आ रहा है। पहले मुसलमानों को सच्चे दोन को कायम करने के रास्ते में जान व माल से जिहाद करने पर उकसाया गया है और उन कमजोरियों से बचने की ताकीद की गई है जिनके शिकार बनी इसराईल हो चुके थे। फिर यह वास्तविकता समझाई गई है कि जीत और सफलता का आश्रय तादाद और साधन-सामग्री की अधिकता पर नहीं होता, बल्कि ईमान, धैर्य, अनुशासन और दढ निश्चय के आधार पर होता है। फिर लड़ाई के साथ अल्लाह की जो तत्वदर्शिता जुड़ी हुई है उसकी ओर संकेत किया गया है, अर्थात यह कि सृष्टि की व्यवस्था बाकी रखने के लिए वह हमेशा इंसानों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता रहता है, वरना अगर एक ही गिरोह को सत्ता व अधिकार का हमेशा का पट्टा मिल जाता तो दूसरों के लिए जीना भी दूभर हो जाता। फिर इस शंका को दूर किया गया है जो अनजान लोगों के दिलों में प्रायः खटकता है कि अगर अल्लाह ने अपने पैग़म्बर मतभेदों को मिटाने और झगड़ों का दरवाजा बन्द करने के लिए ही भेजे थे और उनके आने के बाद भी विरोध और विभेद न मिटे, न झगड़े दूर हुए, तो क्या अल्लाह इतना विवश था कि उसने इन खराबियों को दूर करना चाहा और न कर सका। इसके उत्तर में बताया गया कि विभेदों को ताकत से रोक देना और मानवजाति को एक विशेष मार्ग पर जबरदस्ती चलाना अल्लाह चाहता ही नहीं था वरना इंसान की क्या मजाल थी कि उसके चाहने के विरुद्ध चलता। फिर एक वाक्य में उस मूल विषय की ओर संकेत कर दिया गया जिससे भाषण की शुरुआत हुई थी। इसके बाद अब यह कहा जा रहा है कि इंसानों की धारणाएँ, मत, पंथ और मज़ाहिब भले ही बहुत ज़्यादा अलग-अलग हों, बहरहाल सच्चाई जिसपर जमीन व आसमान को व्यवस्था चल रही है, यह है जिसका इस आयत में उल्लेख किया गया है। इंसानों की ग़लतफ़हमियों से तनिक भी इस सच्चाई में कोई अन्तर नहीं आता, मगर अल्लाह यह नहीं चाहता कि उसके मानने पर ज़बरदस्ती लोगों को मजबूर किया जाए । जो उसे मान लेगा, वह स्वयं ही लाभ में रहेगा और जो उससे मुंह फेरेगा, वह आप अपना नुकसान उठाएगा।
284.यह आयत 'आयतुल कुर्सी के नाम से प्रसिद्ध है और इसमें अल्लाह की ऐसी मुकम्मल मारफ़त (विशिष्टतापूर्ण पहचान) प्रदान की गई है जिसका उदाहरण कहीं नहीं मिलता। इसी कारण हदीस में इसको कुरआन की सर्वश्रेष्ठ आयत बनाया गया है। इस जगह यह प्रश्न पैदा होता है कि यहाँ अल्लाह की ज़ात और सिफ़ात (गुणों) का उल्लेख किस ताल्लुक से हुआ है। इसको समझने के लिए एक बार फिर उस व्याख्यान पर निगाह डाल लीजिए जो स्कूज 32 (आयत 243) से चला आ रहा है। पहले मुसलमानों को सच्चे दोन को कायम करने के रास्ते में जान व माल से जिहाद करने पर उकसाया गया है और उन कमजोरियों से बचने की ताकीद की गई है जिनके शिकार बनी इसराईल हो चुके थे। फिर यह वास्तविकता समझाई गई है कि जीत और सफलता का आश्रय तादाद और साधन-सामग्री की अधिकता पर नहीं होता, बल्कि ईमान, धैर्य, अनुशासन और दढ निश्चय के आधार पर होता है। फिर लड़ाई के साथ अल्लाह की जो तत्वदर्शिता जुड़ी हुई है उसकी ओर संकेत किया गया है, अर्थात यह कि सृष्टि की व्यवस्था बाकी रखने के लिए वह हमेशा इंसानों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता रहता है, वरना अगर एक ही गिरोह को सत्ता व अधिकार का हमेशा का पट्टा मिल जाता तो दूसरों के लिए जीना भी दूभर हो जाता। फिर इस शंका को दूर किया गया है जो अनजान लोगों के दिलों में प्रायः खटकता है कि अगर अल्लाह ने अपने पैग़म्बर मतभेदों को मिटाने और झगड़ों का दरवाजा बन्द करने के लिए ही भेजे थे और उनके आने के बाद भी विरोध और विभेद न मिटे, न झगड़े दूर हुए, तो क्या अल्लाह इतना विवश था कि उसने इन खराबियों को दूर करना चाहा और न कर सका। इसके उत्तर में बताया गया कि विभेदों को ताकत से रोक देना और मानवजाति को एक विशेष मार्ग पर जबरदस्ती चलाना अल्लाह चाहता ही नहीं था वरना इंसान की क्या मजाल थी कि उसके चाहने के विरुद्ध चलता। फिर एक वाक्य में उस मूल विषय की ओर संकेत कर दिया गया जिससे भाषण की शुरुआत हुई थी। इसके बाद अब यह कहा जा रहा है कि इंसानों की धारणाएँ, मत, पंथ और मज़ाहिब भले ही बहुत ज़्यादा अलग-अलग हों, बहरहाल सच्चाई जिसपर जमीन व आसमान को व्यवस्था चल रही है, यह है जिसका इस आयत में उल्लेख किया गया है। इंसानों की ग़लतफ़हमियों से तनिक भी इस सच्चाई में कोई अन्तर नहीं आता, मगर अल्लाह यह नहीं चाहता कि उसके मानने पर ज़बरदस्ती लोगों को मजबूर किया जाए । जो उसे मान लेगा, वह स्वयं ही लाभ में रहेगा और जो उससे मुंह फेरेगा, वह आप अपना नुकसान उठाएगा।
284.यह आयत 'आयतुल कुर्सी के नाम से प्रसिद्ध है और इसमें अल्लाह की ऐसी मुकम्मल मारफ़त (विशिष्टतापूर्ण पहचान) प्रदान की गई है जिसका उदाहरण कहीं नहीं मिलता। इसी कारण हदीस में इसको कुरआन की सर्वश्रेष्ठ आयत बनाया गया है। इस जगह यह प्रश्न पैदा होता है कि यहाँ अल्लाह की ज़ात और सिफ़ात (गुणों) का उल्लेख किस ताल्लुक से हुआ है। इसको समझने के लिए एक बार फिर उस व्याख्यान पर निगाह डाल लीजिए जो स्कूज 32 (आयत 243) से चला आ रहा है। पहले मुसलमानों को सच्चे दोन को कायम करने के रास्ते में जान व माल से जिहाद करने पर उकसाया गया है और उन कमजोरियों से बचने की ताकीद की गई है जिनके शिकार बनी इसराईल हो चुके थे। फिर यह वास्तविकता समझाई गई है कि जीत और सफलता का आश्रय तादाद और साधन-सामग्री की अधिकता पर नहीं होता, बल्कि ईमान, धैर्य, अनुशासन और दढ निश्चय के आधार पर होता है। फिर लड़ाई के साथ अल्लाह की जो तत्वदर्शिता जुड़ी हुई है उसकी ओर संकेत किया गया है, अर्थात यह कि सृष्टि की व्यवस्था बाकी रखने के लिए वह हमेशा इंसानों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता रहता है, वरना अगर एक ही गिरोह को सत्ता व अधिकार का हमेशा का पट्टा मिल जाता तो दूसरों के लिए जीना भी दूभर हो जाता। फिर इस शंका को दूर किया गया है जो अनजान लोगों के दिलों में प्रायः खटकता है कि अगर अल्लाह ने अपने पैग़म्बर मतभेदों को मिटाने और झगड़ों का दरवाजा बन्द करने के लिए ही भेजे थे और उनके आने के बाद भी विरोध और विभेद न मिटे, न झगड़े दूर हुए, तो क्या अल्लाह इतना विवश था कि उसने इन खराबियों को दूर करना चाहा और न कर सका। इसके उत्तर में बताया गया कि विभेदों को ताकत से रोक देना और मानवजाति को एक विशेष मार्ग पर जबरदस्ती चलाना अल्लाह चाहता ही नहीं था वरना इंसान की क्या मजाल थी कि उसके चाहने के विरुद्ध चलता। फिर एक वाक्य में उस मूल विषय की ओर संकेत कर दिया गया जिससे भाषण की शुरुआत हुई थी। इसके बाद अब यह कहा जा रहा है कि इंसानों की धारणाएँ, मत, पंथ और मज़ाहिब भले ही बहुत ज़्यादा अलग-अलग हों, बहरहाल सच्चाई जिसपर जमीन व आसमान को व्यवस्था चल रही है, यह है जिसका इस आयत में उल्लेख किया गया है। इंसानों की ग़लतफ़हमियों से तनिक भी इस सच्चाई में कोई अन्तर नहीं आता, मगर अल्लाह यह नहीं चाहता कि उसके मानने पर ज़बरदस्ती लोगों को मजबूर किया जाए । जो उसे मान लेगा, वह स्वयं ही लाभ में रहेगा और जो उससे मुंह फेरेगा, वह आप अपना नुकसान उठाएगा।
لَآ إِكۡرَاهَ فِي ٱلدِّينِۖ قَد تَّبَيَّنَ ٱلرُّشۡدُ مِنَ ٱلۡغَيِّۚ فَمَن يَكۡفُرۡ بِٱلطَّٰغُوتِ وَيُؤۡمِنۢ بِٱللَّهِ فَقَدِ ٱسۡتَمۡسَكَ بِٱلۡعُرۡوَةِ ٱلۡوُثۡقَىٰ لَا ٱنفِصَامَ لَهَاۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ۝ 255
(256) दीन के मामले में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं है।285 सही बात ग़लत विचारों से अलग छाँटकर रख दी गई है। अब जो कोई ताग़ूत286 का इनकार करके अल्लाह पर ईमान ले आया, उसने एक ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटनेवाला नहीं और अल्लाह (जिसका सहारा उसने लिया है) सब कुछ सुनने और जाननेवाला है।
285.अर्थात् किसी को ईमान लाने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। यहाँ 'दीन' से तात्पर्य अल्लाह से संबंधित वह धारणा है जो ऊपर आयतुल कुर्सी में बयान हुई है और जीवन की वह पूर्ण व्यवस्था है जो इस धारणा पर निर्मित है। आयत का अर्थ यह है कि इस्लाम की यह धारणा संबंधी नैतिक और व्यावहारिक व्यवस्था किसी पर ज़बरदस्ती नहीं हूँसी जा सकती। यह ऐसी चीज़ ही नहीं है जो किसी के सिर ज़बरदस्ती मढी जा सके।
286.'ताग़ूत' शब्दकोष की दृष्टि से हर उस व्यक्ति को कहा जाएगा जो अपनी वैध सीमा से आगे निकल गया हो। क़ुरआन की परिभाषा में तागत से तात्पर्य वह दास है... जो आज्ञापालन की सीमाओं से आगे निकलकर स्वयं स्वामी और खुदा होने का दम भरे और अल्लाह के बन्दों से अपनी बन्दगी कराए। अल्लाह के मुक़ाबले में एक बन्दे की सरकशी के तीन दर्जे हैं- पहला दर्जा यह है कि एक व्यक्ति सैद्धान्तिक रूप से उसके आज्ञापालन ही को सत्य माने, मगर व्यवहार में उसके आदेशों का उल्लंघन करे। इसका नाम 'फिस्क' है। दूसरा दर्जा यह है कि वह उसके आज्ञापालन से सिद्धांतत: विमुख होकर या तो स्वतंत्र हो जाए या उसके सिवा किसी और की बंदगी करने लगे। यह कुफ़ है। तीसरा दर्जा यह है कि वह मालिक से बाग़ी होकर उसके राज्य और उसकी प्रजा में स्वयं अपना आदेश चलाने लगे। इस आखिरी दर्जे पर जो व्यक्ति पहुँच जाए, उसी का नाम तागूत है और कोई आदमी सही अर्थों में अल्लाह पर ईमान लानेवाला नहीं हो सकता जब तक कि वह उस ताग़ूत इनकारी न हो।
ٱللَّهُ وَلِيُّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ يُخۡرِجُهُم مِّنَ ٱلظُّلُمَٰتِ إِلَى ٱلنُّورِۖ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ أَوۡلِيَآؤُهُمُ ٱلطَّٰغُوتُ يُخۡرِجُونَهُم مِّنَ ٱلنُّورِ إِلَى ٱلظُّلُمَٰتِۗ أُوْلَٰٓئِكَ أَصۡحَٰبُ ٱلنَّارِۖ هُمۡ فِيهَا خَٰلِدُونَ ۝ 256
(257) जो लोग ईमान लाते हैं, उनका हिमायती और सहायक अल्लाह है और वह उनको अंधेरों से रौशनी में निकाल लाता है ।287 और जो लोग इनकार का रास्ता अपनाते हैं, उनके हिमायती और मददगार व सहायक ताग़ूत288 है, और वे उन्हें रौशनी से अंधेरों की ओर खींच ले जाते हैं। ये आग में जानेवाले लोग हैं, जहाँ ये हमेशा रहेंगे।
287.अंधेरों से तात्पर्य अज्ञानता के अँधेरे हैं जिनमें भटककर इंसान अपनी सफलता के मार्ग से दूर निकल जाता है और वास्तविकता के विरुद्ध चलकर अपनी तमाम ताक़तों और कोशिशों को ग़लत रास्तों में लगाने लगता है, और नूर से तात्पर्य सत्य-ज्ञान है जिसकी रौशनी में इंसान अपनी और सृष्टि की वास्तविकता और अपने जीवन के उद्देश्य को साफ़-साफ़ देखकर विवेक के आधार पर व्यवहार के एक सही रास्ते पर चल पड़ता है।
288.'ताग़ूत' यहाँ बहुवचन 'तवागीत' के अर्थों में प्रयुक्त किया गया है, अर्थात् अल्लाह से मुँह मोड़कर इंसान एक ही तागूत के चंगुल में नहीं फंसता, बल्कि बहुत-से तागूत उसपर हावी हो जाते हैं। एक तागूत शैतान है जो उसके सामने नित नए झूठे प्रलोभनों का सदाबहार सब्जबाग़ पेश करता है। दूसरा तागूत आदमी का अपना मन है जो उसे भावनाओं और इच्छाओं का दास बनाकर जीवन के टेढ़े-सीधे रास्तों में खींचे-खींचे लिए फिरता है। और अनगिनत तागूत बाहर की दुनिया में फैले हुए हैं। बीवी और बच्चे, रिश्ते-नातेदार, बिरादरी और खानदान, मित्र और पहचान के लोग, समाज और कौम, लीडर और रहनुमा, हुकूमत और हाकिम, ये सब उसके लिए तागूत ही तागूत होते हैं जिनमें से हर एक उससे अपने स्वार्थों का पालन कराता है, और अनगिनत स्वामियों का यह दास सारी उम्र इसी चक्कर में फंसा रहता है कि किस स्वामी को ख़ुश करे और किसकी नाराज़ी से बचे।
أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِي حَآجَّ إِبۡرَٰهِـۧمَ فِي رَبِّهِۦٓ أَنۡ ءَاتَىٰهُ ٱللَّهُ ٱلۡمُلۡكَ إِذۡ قَالَ إِبۡرَٰهِـۧمُ رَبِّيَ ٱلَّذِي يُحۡيِۦ وَيُمِيتُ قَالَ أَنَا۠ أُحۡيِۦ وَأُمِيتُۖ قَالَ إِبۡرَٰهِـۧمُ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَأۡتِي بِٱلشَّمۡسِ مِنَ ٱلۡمَشۡرِقِ فَأۡتِ بِهَا مِنَ ٱلۡمَغۡرِبِ فَبُهِتَ ٱلَّذِي كَفَرَۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 257