(3) सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए, और अच्छे कर्म करते रहे, और एक-दूसरे को हक़ की नसीहत और सब्र की ताकीद करते
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1. ज़माने का शब्द बीते हुए समय के लिए भी प्रयुक्त होता है और बीतते हुए समय के लिए भी। यहाँ चूँकि पूर्ण रूप से ज़माने की क़सम खाई गई है, इसलिए दोनों प्रकार के समय इसके अर्थ में शामिल हैं। बीते हुए समय की क़सम खाने का अर्थ यह है कि मानव इतिहास इस बात की गवाही दे रहा है कि जो लोग भी [ईमान, अच्छे कर्म, हक़ और सब्र की नसीहत करते रहने की विशेषताओं से ख़ाली थे, वे घाटे में पड़कर रहे और गुज़रते हुए ज़माने की क़सम खाने का अर्थ समझने के लिए पहले यह बात अच्छी तरह समझ लीजिए कि जो ज़माना अब गुज़र रहा है, वह वास्तव में वह समय है जो एक-एक आदमी और एक-एक क़ौम को दुनिया में काम करने के लिए दिया गया है। अगर समय के गुज़रने की रफ़्तार की तेज़ी को सामने रखा जाए और इस बात पर विचार किया जाए कि हम जो कुछ भी अच्छा या बुरा काम करते हैं और जिन कामों में भी हम व्यस्त रहते हैं, सब कुछ उम्र की उस सीमित अवधि ही में पूरा हो जाता है जो दुनिया में हमको काम करने के लिए दी गई है, तो हमें महसूस होता है कि हमारी अस्ल पूँजी तो यही समय है जो तेज़ी से गुज़र रहा है।
इमाम राज़ी (रह०) ने किसी बुज़ुर्ग का कथन नक़्ल किया है कि "मैंने सूरा अस्र का अर्थ एक बर्फ़ बेचनेवाले से समझा जो बाजार में आवाज़ लगा रहा था कि दया करो उस आदमी पर जिसकी पूँजी घुली जा रही है, दया करो उस आदमी पर जिसकी पूँजी घुली जा रही है। उसकी यह बात सुनकर मैंने कहा, यह है 'वल अस्र इन्नल इंसान का अर्थ। उम्र की जो मुद्दत इंसान को दी गई है, वह बर्फ़ के घुलने की तरह तेज़ी से गुज़र रही है। इसको अगर बर्बाद किया जाए, या ग़लत कामों में ख़र्च कर डाला जाए, तो यही इंसान का घाटा है।" अतएव गुज़रते हुए ज़माने की क़सम खाकर जो बात इस सूरा में कही गई है उसका अर्थ यह है कि यह तेज़ रफ़्तार ज़माना गवाही दे रहा है कि इन चार गुणों से ख़ाली होकर इंसान जिन कामों में भी अपनी उम्र की मोहलत को लगा रहा है, वे सब-के-सब घाटे के सौदे हैं। लाभ में केवल वे लोग हैं जो इन चारों गुणों से सुसज्जित होकर दुनिया में काम करें। इंसान का शब्द यहाँ जाति वाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग किया गया है और वह व्यक्तियों, गिरोहों, क़ौमों और पूरी मानव जाति पर समान रूप से चरितार्थ है, अतः यह आदेश कि उपर्युक्त चार गुणों से जो भी ख़ाली हो वह घाटे में है, हर दशा में सिद्ध होगा, चाहे इन गुणों से ख़ाली कोई आदमी हो, या कोई क़ौम, या दुनिया भर के इंसान। 'घाटा' शाब्दिक दृष्टि से 'लाभ' का विलोम है। क़ुरआन मजीद इसी शब्द को अपनी विशेष परिभाषा बनाकर 'फ़लाह' (सफलता) के मुक़ाबले में इस्तेमाल करता है, और जिस तरह उसको 'सफलता' की धारणा मात्र दुनिया की ख़ुशहाली का समानार्थी नहीं है, बल्कि दुनिया से लेकर आख़िरत तक इंसान की वास्तविक सफलता पर छाई हुई है, इसी तरह उसके घाटे की धारणा भी केवल दुनिया की विफलता या दुर्दशा का समानार्थी नहीं है, बल्कि दुनिया से लेकर आख़िरत तक इंसान की वास्तविक विफलता और असफलता पर हावी है। ('फ़्लाह' और घाटा दोनों की क़ुरआनी धारणा की व्याख्या के लिए देखिए, टीका सूरा-7 अल-आराफ़, टिप्पणी-9; सूरा-8 अल-अनफ़ाल, टिप्पणी-30; सूरा-19 यूनुस, टिप्पणी-23; सूरा-17 बनी-इसराईल, टिप्पणी-102; सूरा-22 अल-हज्ज, टिप्पणी-17; सूरा-23 अल-मोमिनून, टिप्पणी-1, 2, 11, 50; सूरा-31 लुक़मान, टिप्पणी-4; सूरा-29 अज़-ज़ुमर, टिप्पणी-34) इसके साथ ही यह बात भी अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि यद्यपि क़ुरआन के नज़दीक सच्ची सफलता आख़िरत में इंसान की कामयाबी और वास्तविक घाटा वहाँ उसकी नाकामी है। लेकिन इस दुनिया में भी जिस चीज़ का नाम लोगों ने सफलता रख छोड़ा है, वह वास्तव में सफलता नहीं है, बल्कि उसका अंजाम ख़ुद इसी दुनिया में घाटा है और जिस चीज़ को लोग घाटा समझते हैं, वह वास्तव में घाटा नहीं है, बल्कि इस दुनिया में भी वही सफलता का ज़रिया है। [(व्याख्या के लिए देखिए, टीका] सूरा-17 अन-नह्ल, टिप्पणी-99; सूरा-19 मरयम, टिप्पणी-53; सूरा-20 ता-हा, टिप्पणी-105; सूरा-92 अल-लैल, टिप्पणी-3-5) अतएव जब क़ुरआन पूरे ज़ोर के साथ क़तई तौर पर कहता है कि 'वास्तव में इंसान बड़े घाटे में है तो इसका अर्थ दुनिया और आख़िरत दोनों का घाटा है और जब वह कहता है कि इस घाटे से केवल वे लोग बचे हुए हैं जिनके अंदर निम्नलिखित चार गुण पाए जाते हैं, तो इसका अर्थ दोनों जहानों में घाटे से बचना और सफलता पाना है।
अब हमें उन चारों गुणों को देखना चाहिए जिनके पाए जाने पर इस सूरा के अनुसार इंसान का घाटे से बचा रहना निर्भर है। इनमें पहला गुण ईमान है। यह शब्द यद्यपि कुछ जगहों पर क़ुरआन मजीद में सिर्फ़ ईमान को मौखिक रूप से स्वीकार करने के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है, लेकिन वास्तव में इस शब्द को सच्चे दिल से मानने और विश्वास करने के अर्थ ही में प्रयुक्त किया गया है, और अरबी भाषा में भी इस शब्द का यही अर्थ है। शब्दकोष में 'आ मन लहू (ईमान लाया)' का अर्थ है 'सद्द-क़हू व अअ्त-म-द अलैहि' (इसकी पुष्टि की और इसपर विश्वास किया) और 'आ-म-न बिही' का अर्थ 'ऐ-क़-न बिही' (इसपर विश्वास किया)। क़ुरआन वास्तव में जिस ईमान को वास्तविक ईमान कहता है उसको (सूरा-59 अल-हुजुरात, आयत-15; सूरा-41 हा-मीम सजदा, आयत-30; सूरा-8 अल-अनफ़ाल, आयत-2; सूरा-2 अल-बक़रा, आयत-165; सूरा-4 अन-निसा, आयत-65 और 136) में पूरी तरह स्पष्ट कर दिया गया है।
अब रहा यह प्रश्न कि ईमान लाने से किन चीज़ों पर ईमान लाना तात्पर्य है, तो क़ुरआन मजीद में पूरी तरह इस बात को भी खोल खोलकर बयान कर दिया गया है। इससे तात्पर्य एक तो अल्लाह को मानना है। केवल उसके अस्तित्व को मानना नहीं, बल्कि उसे इस रूप से मानना है कि वही एक अल्लाह है, ख़ुदाई में कोई उसका शरीक नहीं है। वही इसका हक़दार है कि इंसान उसकी इबादत, बन्दगी और आज्ञापालन करे। वही भाग्य का बनाने और बिगाड़नेवाला है। बन्दे को उसी से दुआ माँगनी चाहिए और उसी पर भरोसा करना चाहिए, वही आदेश देने और मना करने वाला है। बन्दे का कर्तव्य है कि उसके आदेश का पालन करे और जिस चीज़ से उसने मना किया है, उससे रुक जाए।
दूसरे, रसूल को मानना, इस रूप में कि वह अल्लाह तआला का नियुक्त किया हुआ मार्गदर्शक और रहनुमा है और जिस चीज़ की भी शिक्षा उसने दी है, वह अल्लाह की ओर से है, सत्य और मानने योग्य है। रसूल पर ईमान लाने में फ़रिश्तों, नबियों और ईश्वरीय किताबों पर और स्वयं क़ुरआन पर भी ईमान लाना शामिल है, क्योंकि यह उन शिक्षाओं में से है जो अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने दी हैं।
तीसरे, आख़िरत को मानना, इस हैसियत से कि इंसान को दोबारा जीवित होकर उठना है। अपने उन कर्मों का, जो उसने दुनिया की इस ज़िंदगी में किए हैं, अल्लाह को हिसाब देना है और इस हिसाब-किताब में जो लोग नेक क़रार पाएँ उन्हें इनाम और जो बुरे क़रार पाएँ उनको सज़ा मिलनी है।
ईमान के बाद दूसरा गुण जो इंसान को घाटे से बचाने के लिए ज़रूरी है वह सालिहात (नेक कामों) पर अमल करना है। 'सालिहात' शब्द में तमाम नेकियों आ जाती हैं, इसमें नेकी और भलाई की कोई क़िस्म छूटी नहीं रह जाती। लेकिन क़ुरआन के अनुसार कोई काम भी उस वक़्त तक सालेह (नेक) नहीं हो सकता जब तक उसकी जड़ में ईमान मौजूद न हो और वह उस निर्देश के अनुसार न किया जाए जो अल्लाह और उसके रसूल ने दिया है।
इसके बाद दो और गुण जो घाटे से बचने के लिए ज़रूरी हैं, वे ये हैं कि ईमान लाने और भले काम करनेवाले लोग एक-दूसरे को हक़ की नसीहत और सब की ताकीद करें। इसका अर्थ यह है कि एक तो ईमान लाने और भले कर्म करनेवालों को अलग-अलग व्यक्ति बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनको मिल-जुलकर एक मोमिन और सालेह समाज अस्तित्त्व में लाना चाहिए। दूसरे इस समाज के हर व्यक्ति को अपना यह दायित्व महसूस करना चाहिए कि वह समाज को बिगड़ने न दे। इसलिए उसके तमाम व्यक्तियों का यह कर्तव्य बनता है कि वे एक-दूसरे को सत्य और सब्र (धैर्य) पर उभारें। 'सत्य' का शब्द 'असत्य' का विलोम है और सामान्य रूप से यह दो अर्थों में प्रयुक्त होता है। एक सही, सच्ची और न्याय और इंसाफ़ के अनुकूल एवं सत्यता के अनुरूप बात, चाहे वह अक़ीदे और ईमान से ताल्लुक़ रखती हो या दुनिया के मामलों से दूसरा, वह हक़ (अधिकार) जिसका अदा करना इंसान पर अनिवार्य हो, चाहे वह अल्लाह का हक़ हो या बन्दों का हक़ या स्वयं अपने आप का हक़ इसलिए एक-दूसरे को सत्य की नसीहत करने का अर्थ यह है कि ईमानवालों के समाज में जब और जहाँ भी असत्य सर उठाए सत्य बात कहनेवाले उसके मुक़ाबले में उठ खड़े हों और समाज का हर व्यक्ति केवल स्वयं ही सत्यवादिता और सच्चाई और न्याय और इंसाफ़ पर क़ायम रहने और हक़दारों के हक़ों को अदा करने पर बस न करे, बल्कि दूसरों को भी इस तरीक़े की ताकीद करे। यह वह चीज़ है जो समाज को नैतिक गिरावट और पतन से बचाने की ज़मानत देती है। अगर यह स्प्रिट किसी समाज में मौजूद न रहे तो वह घाटे से नहीं बच सकता, और इस घाटे में वे लोग भी अन्ततः पड़कर रहते हैं जो अपनी जगह सत्य पर जमे हों मगर अपने समाज में सत्य को पद-दलित होते देखते रहें। यही बात है जो सूरा-5 अल-माइदा (आयत-78-79) में फ़रमाई गई है।
फिर इसी बात को सूरा-7 अल-आराफ़ (आयत-163-166) और सूरा-8 अल-अनफ़ाल (आयत-25) में भी बयान फ़रमाया गया है। इसी लिए नेकियों का हुक्म देने और बुराइयों से रोकने को मुसलमानों का कर्तव्य बताया गया है (सूरा-3 आले-इमरान, आयत-104) और उस समुदाय को सर्वश्रेष्ठ उम्मत कहा गया है जो यह दायित्व निभाए (सूरा-3 आले-इमरान, आयत-110) हक़ की नसीहत के साथ दूसरी चीज़ जो ईमानवालों और उसके समाज को घाटे से बचाने के लिए ज़रूरी शर्त बताई गई है वह यह है कि इस समाज के लोग एक-दूसरे को सब पर उभारते रहें। अर्थात् सत्य का पालन और उसके समर्थन में जो कठिनाई सामने आती है और इस राह में जिन कष्टों से, जिन कठिनाइयों से, जिन विपदाओं से और जिन नुक़सानों और अभावों से इंसान को सामना करना पड़ता है, उनके मुक़ाबले में वे एक-दूसरे को जमे रहने की तलक़ीन करते रहें। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए टीका सूरा-76 अद-दह्र, टिप्पणी-16; सूरा-90 अल-बलद, टिप्पणी-14)