41. हा-मीम अस-सजदा
(मक्का में उतरीं, आयतें 54)
परिचय
नाम
सूरा का नाम दो शब्दों को जोड़कर बना है एक हा-मीम, दूसरा अस-सजदा। अर्थ यह है कि वह सूरा जिसकी शुरुआत हा-मीम से होती है और जिसमें एक जगह सजदे की आयत आई है।
उतरने का समय
विश्वस्त रिवायतों के अनुसार इसके उतरने का समय हज़रत हमज़ा (रज़ि०) के ईमान लाने के बाद और हज़रत उमर (रज़ि०) के ईमान लाने से पहले है। मशहूर ताबिई मुहम्मद-बिन-काब अल-क़रज़ी [रिवायत करते हैं कि] एक बार क़ुरैश के कुछ सरदार मस्जिदे-हराम (काबा) में महफ़िल जमाए बैठे थे और मस्जिद के एक दूसरे कोने में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल०) अकेले मौजूद थे। उत्बा-बिन-रबीआ ने क़ुरैश के सरदारों [के मश्वरे से नबी (सल्ल०) के पास जाकर] कहा, "भतीजे ! यह काम जो तुमने शुरू किया है, इससे अगर तुम्हारा उद्देश्य धन प्राप्त करना है, तो हम सब मिलकर तुमको इतना कुछ दिए देते हैं कि तुम हममें सबसे अधिक धनवान हो जाओ। अगर इससे अपनी बड़ाई चाहते हो तो हम तुम्हें अपना सरदार बनाए लेते हैं, अगर बादशाही चाहते हो तो हम तुम्हें अपना बादशाह बना लेते हैं, और अगर तुमपर कोई जिन्न आता है तो हम अपने ख़र्च पर तुम्हारा इलाज कराते हैं।" उतबा ये बातें करता रहा और नबी (सल्ल०) चुपचाप सुनते रहे। फिर आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, "अबुल-वलीद! आपको जो कुछ कहना था, कह चुके?" उसने कहा, "हाँ।" आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, “अच्छा, अब मेरी सुनो।" इसके बाद आप (सल्ल०) ने 'बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम' (अल्लाह के नाम से जो अत्यन्त कृपाशील और दयावान है) पढ़कर इसी सूरा को पढ़ना शुरू किया और उतबा अपने दोनों हाथ पीछे ज़मीन पर टेके ध्यान से सुनता रहा। सजदे की आयत (38) पर पहुँचकर आप (सल्ल०) ने सजदा किया और फिर सिर उठाकर फ़रमाया, “ऐ अबुल-वलीद ! मेरा जवाब आपने सुन लिया। अब आप जानें और आप का काम।" उतबा उठकर क़ुरैश के सरदारों के पास वापस आया और उनसे कहा, "ख़ुदा की क़सम! मैंने ऐसा कलाम (वाणी) सुना कि कभी इससे पहले न सुना था। ख़ुदा की क़सम ! न यह शेर (कविता) है, न सेहर (जादू) है, न कहानत (ज्योतिष विद्या)। ऐ क़ुरैश के सरदारो ! मेरी बात मानो और उस आदमी को उसके हाल पर छोड़ दो। मैं समझता हूँ कि यह वाणी कुछ रंग लाकर रहेगी।" क़ुरैश के सरदार उसकी यह बात सुनते ही बोल ठटे, “वलीद के बाप! आख़िर उसका जादू तुम पर भी चल गया।‘’ (इब्ने-हिशाम, भाग 1, पृ० 313-314)
विषय और वार्ता
उतबा की इस बातचीत के जवाब में जो व्याख्यान अल्लाह की ओर से उतरा, उसमें उन बेहूदा बातों की ओर सिरे से कोई ध्यान नहीं दिया गया जो उसने नबी (सल्ल.) से कही थीं, और केवल उस विरोध को वार्ता का विषय बनाया गया है जो क़ुरआन मजीद के पैग़ाम को नीचा दिखाने के लिए मक्का के विधर्मियों की ओर से उस समय अत्यन्त हठधर्मी और दुराचार के साथ किया जा रहा था। इस अंधे और बहरे विरोध के उत्तर में जो कुछ फ़रमाया गया है, उसका सारांश यह है-
(1) यह अल्लाह की उतारी हुई वाणी है और अरबी भाषा में है। अज्ञानी लोग इसके अंदर ज्ञान का कोई प्रकाश नहीं पाते, मगर समझ-बूझ रखनेवाले उस प्रकाश को देख भी रहे हैं और उससे फ़ायदा भी उठा रहे हैं।
(2) तुमने अगर अपने दिलों पर गिलाफ़ (आवरण) चढ़ा लिए हैं और अपने कान बहरे कर लिए हैं, तो नबी के सुपुर्द यह काम नहीं है कि [वह ज़बरदस्ती तुम्हें अपनी बात सुना और समझा दे। वह तो] सुननेवालों ही को सुना सकता है और समझनेवालों ही को समझा सकता है।
(3) तुम चाहे अपनी आँखें और कान बन्द कर लो और अपने दिलों पर परदा डाल लो, लेकिन सत्य यही है कि तुम्हारा ख़ुदा बस एक ही है, और तुम किसी दूसरे के बन्दे नहीं हो।
(4) तुम्हें कुछ एहसास भी है कि यह शिर्क (बहुदेववाद) और कुफ़्र (इंकार) की नीति तुम किसके साथ अपना रहे हो? उस ख़ुदा के साथ जो तुम्हारा और सम्पूर्ण सृष्टि का पैदा करनेवाला, मालिक और रोज़ी देनेवाला है। उसका साझीदार तुम उसकी तुच्छ मख़्लूक़ात (सृष्ट चीज़ों) को बनाते हो?
(5) अच्छा, नहीं मानते तो ख़बरदार हो जाओ कि तुमपर उसी तरह का अज़ाब टूट पड़ने को तैयार है जैसा आद और समूद जातियों पर आया था।
(6) बड़ा ही अभागा है वह इंसान जिसके साथ ऐसे जिन्नों और इंसानों में से शैतान लग जाएँ जो उसकी मूर्खताओं को उसके सामने सुन्दर बनाकर पेश करें। इस तरह के नादान लोग आज तो यहाँ एक-दूसरे को बढ़ावे-चढ़ावे दे रहे हैं, लेकिन क़ियामत के दिन इनमें से हर एक कहेगा कि जिन लोगों ने मुझे बहकाया था, वे मेरे हाथ लग जाएँ तो उन्हें पाँव तले रौंद डालूँ।
(7) यह क़ुरआन एक अटल किताब है। इसे तुम अपनी घटिया चालों और अपने झूठ के हथियारों से हरा नहीं सकते।
(8) तुम कहते हो कि यह क़ुरआन किसी अजमी (गैर-अरबी) भाषा में आना चाहिए था, लेकिन अगर अजमी भाषा में उसे भेजते तो तुम ही लोग कहते कि यह भी विचित्र उपहास है, अरब क़ौम के मार्गदर्शन के लिए अजमी भाषा में वार्तालाप किया जा रहा है । इसका अर्थ यह है कि तुम्हें वास्तव में मार्गदर्शन अभीष्ट ही नहीं है।
(9) कभी तुमने यह भी सोचा कि अगर वास्तव में सत्य यही सिद्ध हुआ कि यह क़ुरआन अल्लाह की ओर से है तो इसका इंकार करके तुम किस अंजाम का सामना करोगे।
(10) आज तुम नहीं मान रहे हो, मगर बहुत जल्द तुम अपनी आँखों से देख लोगे कि इस क़ुरआन की दावत (पैग़ाम) पूरी दुनिया पर छा गई है और तुम स्वयं उससे पराजित हो चुके हो।
विरोधियों को यह उत्तर देने के साथ उन समस्याओं की ओर भी ध्यान दिया गया है जो इस कठिन रुकावटों के माहौल में ईमानवालों के और ख़ुद नबी (सल्ल०) के सामने थीं। ईमानवालों को यह कहकर हिम्मत बंधाई गई कि तुम वास्तव में बेसहारा नहीं हो, बल्कि जो आदमी ईमान की राह पर मज़बूती से जम जाता है, अल्लाह के फ़रिश्ते उसपर उतरते हैं और दुनिया से लेकर आख़िरत तक उसका साथ देते हैं। नबी (सल्ल०) को बताया गया कि [दावत की राह में रुकावट बनी चट्टानें देखने में बड़ी कठोर नज़र आती हैं, किन्तु अच्छे चरित्र और सुशीलता का हथियार वह हथियार है जो उन्हें तोड़कर और पिघलाकर रख देगा। सब्र के साथ उससे काम लो, और जब कभी शैतान उत्तेजना पैदा करके किसी दूसरे हथियार से काम लेने पर उकसाए. तो अल्लाह से पनाह माँगो।
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قُلۡ إِنَّمَآ أَنَا۠ بَشَرٞ مِّثۡلُكُمۡ يُوحَىٰٓ إِلَيَّ أَنَّمَآ إِلَٰهُكُمۡ إِلَٰهٞ وَٰحِدٞ فَٱسۡتَقِيمُوٓاْ إِلَيۡهِ وَٱسۡتَغۡفِرُوهُۗ وَوَيۡلٞ لِّلۡمُشۡرِكِينَ 5
(6-7) ऐ नबी! इनसे कहो, मैं तो एक इनसान हूँ तुम जैसा। 5 मुझे वह्य के ज़रिये से बताया जाता है कि तुम्हारा ख़ुदा तो बस एक ही ख़ुदा है, 6 इसलिए तुम सीधे उसी का रुख़ अपनाओ 7 और उसी से क्षमा चाहो। 8 तबाही है उन मुशारिकों के लिए जो ज़कात नहीं देते 9 और आख़िरत के इनकारी हैं।
5. अर्थात् मेरे बस में यह नहीं है कि तुम्हारे दिलों पर चढ़े हुए ग़िलाफ़ उतार दूँ। तुम्हारे बहरे कान खोल दूं और उस परदे को फाड़ दूँ जो तुमने स्वयं ही मेरे और अपने बीच डाल लिया है। मैं तो एक इनसान हूँ। उसी को समझा सकता हूँ जो समझने के लिए तैयार हो, उसी को सुना सकता हूँ जो सुनने के लिए तैयार हो।
6. अर्थात् वास्तविकता बहरहाल यही है कि तुम्हारे बहुत-से ख़ुदा नहीं हैं, बल्कि एक ही ख़ुदा है। और यह कोई दर्शन नहीं है जो मैंने अपने सोच-विचार से बनाया हो, जिसके सही और ग़लत होने की समान रूप से संभावना हो, बल्कि यह वास्तविकता वह्य के द्वारा खोली गई है, जिसमें किसी प्रकार की ग़लती की कोई संभावना तक नहीं है।
7. अर्थात किसी और की बन्दगी और उपासना न करो, किसी और को मदद के लिए न पुकारो, किसी और के नियम और विधान को ऐसा न मानो जिसका अनुपालन अनिवार्य हो।
8. क्षमा उस बेवफ़ाई की जो अब तक तुम अपने ख़ुदा से करते रहे, उस शिर्क और इनकार और अवज्ञा की जो तुम अब तक करते रहे हो।
9. यहाँ ज़कात के अर्थ में टीकाकारों के बीच मतभेद हैं। कुछ के नज़दीक इस जगह पर ज़कात से तात्पर्य मन की वह पाकीज़गी है जो तौहीद के अक़ीदे (एकेश्वरवाद को धारणा) और खु़दा के आदेशानुपालन से प्राप्त होती है। इस टीका की दृष्टि से आयत का अनुवाद यह होगा कि विनाश है उन मुशरिकों के लिए जो पावनता नहीं अपनाते। कुछ दूसरे टीकाकार जिनमें क़तादा, सुद्दी, हसन बसरी, ज़ुह्हाक, मुक़ातिल और इब्नुस्साइब जैसे टीकाकार शामिल हैं, इस शब्द को यहाँ भी ‘माल की ज़कात’ ही के अर्थ में लेते हैं। इस टीका की दृष्टि से आयत का अर्थ यह है कि विनाश है उन लोगों के लिए जो शिर्क करके ख़ुदा का और ज़कात न देकर बन्दों का हक़ मारते हैं।
وَجَعَلَ فِيهَا رَوَٰسِيَ مِن فَوۡقِهَا وَبَٰرَكَ فِيهَا وَقَدَّرَ فِيهَآ أَقۡوَٰتَهَا فِيٓ أَرۡبَعَةِ أَيَّامٖ سَوَآءٗ لِّلسَّآئِلِينَ 9
(10) उसने (धरती को बुजूद में लाने के बाद) ऊपर से उसपर पहाड़ जमा दिए और उसमें बरकतें रख दीं11 और उसके अन्दर सब मांगनेवालों 11अ के लिए हर एक की मांग और आवश्यकता के अनुसार ठीक अन्दाज़े से ख़ुराक का सामान जुटा दिया। 12 ये सब काम चार दिन में हो गए,13
11. ज़मीन की बरकतों से तात्पर्य वे असीम और अनगिनत संसाधन हैं जो करोड़ों साल से बराबर उसके पेट से निकलते चले आ रहे हैं और सूक्ष्म कीड़ों से लेकर इनसान की सर्वोत्तम सामाजिकता तक की रोज़ बढ़ती हुई ज़रूरतों को पूरी किए चले जा रहे हैं।
11अ. अर्थात् उन तमाम मख़लूक़ात (सृष्टि) के लिए जो ख़ुराक को तलब रखती थीं।
12. इस वाक्य की टीका में टीकाकारों के कई कथन हैं। हमारे नज़दीक आयत का सही अर्थ यह है कि ज़मीन में आदि से लेकर क़ियामत तक जिस-जिस प्रकार की जितनी मख़लूक़ (सृष्टि) भी अल्लाह पैदा करनेवाला था, हर एक की माँग और आवश्यकता के ठीक अनुसार भोज्य सामग्री का पूरा हिसाब लगाकर उसने ज़मीन के भीतर रख दिया।
13. इस जगह की व्याख्या में टीकाकारों को आमतौर से यह मुश्किल पेश आई है कि अगर ज़मीन की रचना के दो दिन और उसमें पहाड़ जमाने और बरकतें रखने और भोज्य सामग्री पैदा करने के चार दिन माने जाएँ, तो आगे आसमानों की पैदाइश दो दिनों में होने का जो उल्लेख किया गया है, उसकी दृष्टि से और अधिक दो दिन मिलाकर आठ दिन बन जाते हैं, हालाँकि अल्लाह ने कई स्थानों पर क़ुरआन में स्पष्ट किया है कि ज़मीन और आसमान की रचना कुल छ: दिनों में हुई है। इसी कारण लगभग तमाम ही टीकाकार यह कहते हैं कि ये चार दिन ज़मीन की रचना के दो दिन समेत हैं। अर्थात् दो दिन ज़मीन की रचना के और दो दिन ज़मीन के भीतर उन बाक़ी चीज़ों की पैदाइश के जिनका ऊपर उल्लेख हुआ है, इस तरह कुल चार दिनों में ज़मीन अपने संसाधनों समेत पूर्ण हो गई। लेकिन यह बात क़ुरआन मजीद के प्रत्यक्ष शब्दों के भी विरुद्ध है और वास्तव में वह मुश्किल भी सिर्फ़ काल्पनिक मुश्किल है जिससे बचने के लिए यह अर्थ लेने की ज़रूरत महसूस की गई है। ज़मीन की रचना के दो दिन वास्तव में उन दोनों से अलग नहीं हैं, जिनमें कुल मिलाकर पूरी सृष्टि बनी है। आगे की आयतों पर विचार कीजिए। इनमें ज़मीन और आसमान दोनों की रचना का एक जगह उल्लेख हुआ है, और फिर यह बताया गया है कि अल्लाह ने दो दिनों में सात आसमान बना दिए। इन सात आसमानों से पूरी सृष्टि मुराद है, जिसका एक भाग हमारी यह ज़मीन भी है। फिर जब सृष्टि के दूसरे अनगिनत तारों और ग्रहों की तरह यह ज़मीन भी उन दो दिनों के अन्दर एक ग्रह का रूप धारण कर चुकी, तो अल्लाह ने चार दिनों के अन्दर उसमें वह सब कुछ सामग्री तथा संसाधन पैदा कर दिए, जिनका ऊपर की आयत में उल्लेख किया गया है।
ثُمَّ ٱسۡتَوَىٰٓ إِلَى ٱلسَّمَآءِ وَهِيَ دُخَانٞ فَقَالَ لَهَا وَلِلۡأَرۡضِ ٱئۡتِيَا طَوۡعًا أَوۡ كَرۡهٗا قَالَتَآ أَتَيۡنَا طَآئِعِينَ 10
(11) फिर उसने आसमान की ओर रुख़ किया जो उस समय सिर्फ़ धुआँ था।14 उसने आसमान और ज़मीन से कहा, “अस्तित्त्व ग्रहण करो, चाहे तुम चाहो या न चाहो।” दोनों ने कहा, “हम आ गए फ़रमाबरदारों की तरह।”15
14. इस जगह पर तीन बातों को स्पष्ट करना ज़रूरी है। एक यह कि आसमान से तात्पर्य यहाँ पूरी सृष्टि है, जैसा कि बाद के वाक्यों से स्पष्ट है। दूसरे यह कि धुएँ से तात्पर्य पदार्थ की वह आरंभिक स्थिति है, जिसमें वह सृष्टि का रूप देने से पहले एक बिखरे हुए रूपहीन अंशों की धूल की तरह वातावरण में फैला हुआ था। तीसरे यह कि ‘फिर उसने आसमान की ओर रुख किया’ वाक्य में ‘सुम-म’ (फिर) का शब्द समय के किसी क्रम के लिए नहीं, बल्कि वर्णन क्रम के लिए प्रयुक्त हुआ है। (और व्याख्या के लिए देखिए सूरा-39 ज़ुमर, टिप्पणी 12) चुनांचे आगे कहा जाता है कि “उसने आसमान और ज़मीन से कहा कि अस्तित्त्व में आ जाओ और उन्होंने कहा, “हम आ गए फ़रमाबरदारों की तरह।” इससे यह बात स्पष्ट हो जाती हैं कि इस आयत का अर्थ यह नहीं है कि ज़मीन बनाने के बाद और उसमें आबादी की व्यवस्था करने के बाद उसने आसमान बनाए, बल्कि इस आयत और बाद की आयतों में उल्लेख उस समय का हो रहा है जब न ज़मीन थी, न आसमान था, बल्कि सृष्टि रचना का आरंभ किया जा रहा था।
15. इन शब्दों में अल्लाह ने अपने पैदा करने के तरीक़े की दशा को ऐसे ढंग से बयान किया है, जिससे अल्लाह की सृजन-शक्ति और इनसान की कारीगरी का अंतर बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है। सृष्टि का पदार्थ धुएँ के रूप में फैला हुआ था। अल्लाह ने चाहा कि उसे वह रूप दे जो अब सृष्टि की है। इस उद्देश्य के लिए उसे किसी इनसान कारीगर की तरह बैठकर ज़मीन और चाँद, सूरज और दूसरे तारे और ग्रह घड़ने नहीं पड़े, बल्कि उसने सृष्टि की उस रूप-रेखा को, जो उसके मन में थी, बस यह आदेश दे दिया कि वह अस्तित्व में आ जाए, अर्थात् धुएँ की तरह फैला हुआ तत्त्व उन आकाश गंगाओं, तारों और ग्रहों के रूप में ढल जाए जिन्हें वह पैदा करना चाहता था। उधर आदेश हुआ और इधर वह तत्त्व सिकुड़ और सिमटकर फ़रमाबरदारों की तरह अपने स्वामी की बनाई हुई रूप-रेखा के अनुसार ढलता चला गया, यहाँ तक कि 48 घंटों में ज़मीन समेत सारी सृष्टि बनकर तैयार हो गई। अल्लाह की सृजन-विधि की इसी दशा को क़ुरआन मजीद में दूसरी कई जगहों पर इस तरह बयान फ़रमाया गया है कि अल्लाह जब किसी काम का निर्णय करता है तो बस उसे आदेश देता है कि हो जा, और वह हो जाता है। (देखिए सूरा-2 बक़रा, आयत 117; सूरा-3 आले इमरान, आयत 47,59; सूरा-16 अन-नल, आयत 40; सूरा-19 मरयम, आयत 35; सूरा-36 या-सीन, आयत 82; सूरा-40 अल-मोमिन, आयत 68)
فَأَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِمۡ رِيحٗا صَرۡصَرٗا فِيٓ أَيَّامٖ نَّحِسَاتٖ لِّنُذِيقَهُمۡ عَذَابَ ٱلۡخِزۡيِ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَاۖ وَلَعَذَابُ ٱلۡأٓخِرَةِ أَخۡزَىٰۖ وَهُمۡ لَا يُنصَرُونَ 15
(16) अन्ततः हमने कुछ अशुभ दिनों में प्रचंड तूफ़ानी हवा उनपर भेज दी, 20 ताकि उन्हें दुनिया ही की ज़िन्दगी में अपमान और रुसवाई के अज़ाब का मज़ा चखा दें,21 और आख़िरत का अज़ाब तो इससे भी अधिक रुसवा करनेवाला है। वहाँ कोई उनकी सहायता करनेवाला न होगा।
20. ‘अशुभ दिनों’ का अर्थ यह नहीं है कि वे दिन अपने आप में अशुभ थे और अनाव इसलिए आया कि ये अशुभ दिन आद क़ौमों पर आ गए थे। यह अर्थ अगर होता तो अज़ाब दूर तथा नज़दीक की सारी ही क़ौमों पर आ जाता। इसलिए सही अर्थ यह है कि उन दिनों में चूँकि इस क़ौमों पर खु़दा का अज़ाब आया, इस कारण वे दिन आद जाति के लिए अशुभ थे। इस आयत को दिनों के अशुभ और शुभ होने की दलील बनाना सही नहीं हैं। क़ुरआन मजीद में दूसरी जगहों पर इस अज़ाब का जो विवरण आया है, वह यह है कि यह हवा बराबर सात रात और आठ दिन तक चलती रही। इसके जोर से लोग इस तरह गिर-गिरकर मर गए, और मर- मरकर गिर पड़े जैसे खजूर के खोखले तने गिरे पड़े हों। (सूरा-69 अल-हाक़्क़ा, आयत 7) जिस चीज़ पर से भी यह हवा गुज़र गई, उसको ध्वस्त करके रख दिया। (सूरा-51 अज़-ज़ारियात, आयत 42) जिस समय यह हवा आ रही थी, उस समय आद जाति के लोग ख़ुशियाँ मना रहे थे कि ख़ूब घटा घिरकर आई है, वर्षा होगी और सूखे धानों में पानी पड़ जाएगा। मगर वह आई तो इस तरह आई कि उसने उनके पूरे क्षेत्र को तबाह करके रख दिया। (सूरा-46 अल-अहक़ाफ़, आयत 24-25)
21. यह अपमान और रुसवाई का अज़ाब उनके उस अहंकार और घमंड का जवाब था जिसके कारण वे ज़मीन में किसी हक़ के बगैर बड़े बन बैठे थे और ताल ठोंक-ठोंककर कहते थे कि हमसे अधिक शक्तिशाली कौन है। अल्लाह ने उनको इस तरह अपमानित किया कि उनकी आबादी के बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया, उनकी संस्कृति को मिट्टी में मिलाकर रख दिया और उनका थोड़ा हिस्सा जो बाक़ी रह गया, वह दुनिया की उन्हीं क़ौमों के आगे अपमानित और रुसवा हुआ, जिनपर कभी ये लोग अपना रौब जताते थे। (आद जाति के क़िस्से के विवरण के लिए देखिए सूरा-7 आराफ़, आयत 65-72; सूरा-11 हूद, आयत 50-60; सूरा-23 अल-मुअमिनून, आयत 31-41; सूरा-26 अश-शुअरा, आयत 123 से 139; सूरा-29 अल-अन्कबूत आयत 38)
حَتَّىٰٓ إِذَا مَا جَآءُوهَا شَهِدَ عَلَيۡهِمۡ سَمۡعُهُمۡ وَأَبۡصَٰرُهُمۡ وَجُلُودُهُم بِمَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ 19
(20) उनके अगलों को पिछलों के आने तक रोक रखा जाएगा,24 फिर जब सब वहाँ पहुँच जाएँगे तो उनके कान और उनकी आँख और उसके जिस्म की खालें उनपर गवाही देंगी कि वे दुनिया में क्या कुछ करते रहे हैं।25
24. अर्थात् ऐसा नहीं होगा कि एक-एक नस्ल और एक-एक पीढ़ी का हिसाब करके उसका फ़ैसला एक के बाद एक किया जाता रहे, बल्कि तमाम अगली-पिछली नस्लें एक ही समय में जमा की आएँगी और उन सबका इकट्ठा हिसाब किया जाएगा। इसलिए कि एक आदमी अपनी ज़िन्दगी में जो कुछ भी अच्छे-बुरे कर्म करता है, उसके प्रभाव उसकी ज़िन्दगी के साथ समाप्त नहीं हो जाते, बल्कि उसके मरने के बाद भी लम्बी मुद्दत तक चलते रहते हैं और वह उन प्रभावों के लिए ज़िम्मेदार होता है। इसी तरह एक नस्ल अपने ज़माने में जो कुछ भी करती है, उसके प्रभाव बाद की नस्लों में सदियाँ जारी रहते हैं और अपनी इस विरासत के लिए वह ज़िम्मेदार होती है। हिसाब-किताब और न्याय के लिए इन सारे ही प्रभावों और नतीजों का जायजा लेना और उनकी गवाहियाँ जुटाना ज़रूरी है। इसी वजह से क़ियामत के दिन नस्ल पर नस्ल आती जाएगी और ठहराई जाती रहेगी। अदालत का काम उस समय शुरू होगा जब अगले-पिछले सब जमा हो जाएँगे। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा-7 आराफ़, टिप्पणी 30)
25. हदीसों में इसकी व्याख्या यह आई है कि जब कोई बड़ा अपराधी अपने अपराधों का इनकार ही करता चला जाएगा और तमाम गवाहियों को भी झुठलाने पर तुल जाएगा, तो फिर अल्लाह के हुक्म से उसके शरीर के अंग एक-एक करके गवाही देंगे कि उसने उनसे क्या-क्या काम लिए थे। यह विषय हज़रत अनस, हज़रत अबू मूसा अशअरी, हज़रत अबू सईद खुदरी और हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने नबी (सल्ल) से उल्लिखित किया है और मुस्लिम, नसई, इले-जरीर, इले-अबी हातिम, बज्ज़ार आदि हदीस के आलिमों ने इन हदीसों को बयान किया है। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा-36 या-सीन, टिप्पणी 55) यह आयत उन बहुत-सी आयतों में से एक है, जिनसे यह सिद्ध होता है कि आख़िरत की दुनिया केवल एक आध्यात्मिक दुनिया नहीं होगी, बल्कि ईसान वहाँ दोबारा उसी तरह शरीर व आत्मा के साथ ज़िंदा किए जाएँगे जिस तरह वे अब इस दुनिया में हैं। यही नहीं उनको शरीर भी वही दिया जाएगा, जिसमें अब वे रहते हैं। वही तमाम तत्तव और अणु (Atoms), जिनसे उनके बदन इस दुनिया में बनाए गए थे, क़ियामत के दिन जमा कर दिए जाएंगे ओर वे अपने इन्हीं पिछले जिस्मों के साथ उठाए जाएंगे, जिनके अन्दर रहकर वे दुनिया में काम कर चुके थे। स्पष्ट है कि इनसान के अंग वहाँ उसी रूप में तो गवाही दे सकते हैं जबकि वे वही अंग हों जिनसे उसने अपनी पहली ज़िन्दगी में कोई अपराध किया था। इस विषय पर क़ुरआन मजीद की नीचे लिखी आयतें भी पक्का सुबूत हैं- सूरा-17 बनी इस्राईल, आयत 49-51, 98; सूरा-23 अल-मुमिनून, आयत 35-38, 82-83; सूरा-24 अन-नूर, आयत 24; सूरा-41 अस्सज्दा, आयत 10; सूरा-36 या-सीन, आयत 65, 78, 79; सूरा-37 अस्साफ़्फात, आयत 16-18; सूरा-56 अल-वाक़िआ, आयत 47-50; सूरा-79 अन-नाज़िआत, आयत 10-14
إِنَّ ٱلَّذِينَ قَالُواْ رَبُّنَا ٱللَّهُ ثُمَّ ٱسۡتَقَٰمُواْ تَتَنَزَّلُ عَلَيۡهِمُ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ أَلَّا تَخَافُواْ وَلَا تَحۡزَنُواْ وَأَبۡشِرُواْ بِٱلۡجَنَّةِ ٱلَّتِي كُنتُمۡ تُوعَدُونَ 29
(30) जिन लोगों ने 32 कहा कि अल्लाह हमारा रब है और फिर वे इसपर जमे रहे, 33 निश्चय ही उनपर फ़रिश्ते उतरते हैं 34 और उनसे कहते हैं कि न डरो, न ग़म करो, 35 और प्रसन्न हो जाओ उस जन्नत की शुभ-सूचना से जिसका तुमसे वादा किया गया है।
32. यहाँ तक इस्लाम-विरोधियों को उनकी हठधर्मी और सत्य-विरोध के परिणामों पर सचेत करने के बाद ईमानवालों और नबी (सल्ल०) की और बात का रुख़ मुड़ता है।
33. वहाँ केवल संयोग से कभी अल्लाह को अपना रब कहकर नहीं रह गए और न इस ग़लती में पड़े कि अल्लाह को अपना रब कहते भी जाएँ और साथ-साथ दूसरों को अपना रब बनाते भी जाएँ, बल्कि एक बार यह अक़ीदा (धारणा) अपनाने के बाद फिर सारी उम्र उस पर जमे रहे, इसके विरुद्ध कोई दूसरी धारणा न अपनाया, न इस धारणा के साथ किसी असत्य धारणा की मिलावट की और अपने व्यावहारिक जीवन में भी एकेश्वरवाद (तौहीद) के तक्राजों को पूरा करते रहे। हज़रत उमर (रज़ि०) ने मिंबर पर एक बार यह आयत तिलावत की और फ़रमाया, “अल्लाह की क़सम! जमे रहनेवाले वे हैं जो अल्लाह के आज्ञापालन पर मजबूती के साथ जम गए, लोमड़ियों की तरह इधर से उधर और उधर से इधर दौड़ते न फिरे।” (इब्ने-जरीर) हज़रत उस्मान (रजि०) फ़रमाते हैं, “अपने कर्म को अल्लाह के लिए ख़ालिस कर लिया।” (कश्शाफ़) हज़रत अली (रजि०) फ़रमाते हैं, “अल्लाह की ओर से डाली हुई ज़िम्मेदारियों को फ़रमाँबरदारी के साथ अदा करते रहे।” (कश्शाफ़)
34. फ़रिश्तों का यह उतरना आवश्यक नहीं है कि किसी महसूस शक्ल में हो और ईमानवाले उन्हें आँखों से देखें या उनकी आवाज़ कानों से सुनें। यद्यपि अल्लाह, जो बड़ी शानवाला है, जिसके लिए चाहे फ़रिश्तों को एलानिया भी भेज देता है। लेकिन सामान्य रूप से ईमानवालों पर, मुख्य रूप से कठिन घड़ियों में, जबकि सत्य के शत्रुओं के हाथों वे बहुत तंग हो रहे हों, उनका उतरना गैर महसूस तरीक़े से होता है और उनकी बातें कान के पदों से टकराने के बजाय दिल की गहराइयों में शान्ति और सन्तोष बनकर उतरती हैं । यद्यपि फ़रिश्ते मौत के वक्त भी ईमानवालों का स्वागत करने आते हैं और क़ब्र (बरज़ख़ की दुनिया) में भी वे उनकी आवभगत करते हैं, और जिस दिन क्रियामत कायम होगी, उस दिन भी हश्र की शुरूआत से लेकर जन्नत में पहुँचने तक वे बराबर उनके साथ लगे रहेंगे, मगर उनका यह साथ उसी दुनिया के लिए मुख्य नहीं है, बल्कि इस दुनिया में भी वह जारी है। यहाँ वार्ता क्रम साफ़ बता रहा है कि सत्य और असत्य के संघर्ष में जिस तरह असत्यवादियों के साथी शैतान और दुष्ट होते हैं, उसी तरह ईमानवालों के साथी फ़रिश्ते हुआ करते हैं।
35. ये बड़े व्यापक शब्द हैं जो दुनिया से लेकर आख़िरत तक हर मरहले में ईमानवालों के लिए तसल्ली का एक नया विषय अपने भीतर रखते हैं। इस दुनिया में फ़रिश्तों की इस नसीहत देने का अर्थ यह है कि असत्य शक्तियाँ चाहे कितनी ही प्रबल और ज़बरदस्त हों उनसे कदापि भयभीत न हो और सत्यवादिता के कारण जो तकलीफे़ं और महरूमियाँ भी तुम्हें सहनी पड़ें, उनपर कोई रंज न करो, क्योंकि आगे तुम्हारे लिए वह कुछ है जिसके मुक़ाबले में दुनिया की हर नेमत तुच्छ है । यही शब्द जब मौत के समय फ़रिश्ते कहते हैं, तो उनका मतलब यह होता है कि आगे जिस मंज़िल की ओर तुम जा रहे हो, वहाँ तुम्हारे लिए किसी भय को जगह नहीं है, क्योंकि वहाँ जन्नत तुम्हारे इन्तिज़ार में है और दुनिया में जिनको छोड़कर तुम जा रहे हो, उनके लिए तुम्हें दुखी होने की कोई ज़रूरत नहीं। क्योंकि यहाँ हम तुम्हारे सरपरस्त व साथी हैं। बरज़ख़ और हश्र के मैदान में जब फ़रिश्ते यही शब्द कहेंगे तो इसका अर्थ यह होगा कि यहाँ तुम्हारे लिए चैन ही चैन है। दुनिया की ज़िन्दगी में जो हालात तुमपर गुज़रे उनका ग़म न करो और आख़िरत में जो कुछ पेश आनेवाला है उसका भय न करो, इसलिए कि हम तुम्हें उस जन्नत की ख़ुशख़बरी दे रहे हैं जिसका तुमसे वादा किया जाता रहा है।
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُلۡحِدُونَ فِيٓ ءَايَٰتِنَا لَا يَخۡفَوۡنَ عَلَيۡنَآۗ أَفَمَن يُلۡقَىٰ فِي ٱلنَّارِ خَيۡرٌ أَم مَّن يَأۡتِيٓ ءَامِنٗا يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِۚ ٱعۡمَلُواْ مَا شِئۡتُمۡ إِنَّهُۥ بِمَا تَعۡمَلُونَ بَصِيرٌ 39
(40) जो लोग48 हमारी आयतों को उलटे अर्थ पहनाते हैं,49 वे हमसे कुछ छिपे हुए नहीं है।50 स्वयं ही सोच लो कि क्या वह व्यक्ति बेहतर है जो आग में झोंका जानेवाला है या वह जो क़ियामत के दिन शान्ति की स्थिति में हाज़िर होगा? करते रहो जो कुछ तुम चाहो, तुम्हारी सारी हरकतों को अल्लाह देख रहा है ।
48. आम लोगों को कुछ वाक्यों में यह समझाने के बाद कि मुहम्मद (सल्ल.) जिस तौहीद और आख़िरत के अक़ीदे की ओर दावत दे रहे हैं, वही बुद्धिसंगत है, अब सम्बोधन फिर विरोधियों से होता है।
49. मूल अरबी शब्द है ‘यलहिदू न फ़ी आयातिना’ (हमारी आयतों में ‘इलहाद’ करते हैं)। ‘इलहाद’ का अर्थ हैं- विमुख होना, पलटना, सीधी राह की और मुड़ना,टेढा रास्ता अपनाना। अल्लाह की आयतों में इलहाद का अर्थ यह है कि आदमी सीधी बात में से टेढ़ निकालने की कोशिश करे। अल्लाह की आयतों का एक सही और स्पष्ट अर्थ तो न ले, बाक़ी हर तरह के ग़लत अर्थ लेकर स्वयं भी गुमराह हो और दूसरों को भी गुमराह करता रहे। मक्का के इस्लाम-विरोधी क़ुरआन मजीद के पैग़ाम को नीचा दिखाने के लिए जो चालें चल रहे थे, उनमें से एक यह भी थी।
50. इन शब्दों में एक बड़ी धमकी छिपी हुई है। सत्ताधारी शासक का यह कहना कि फ़ुलाँ आदमी जो हरकतें कर रहा है, वे मुझसे छिपी हुई नहीं हैं, आपसे आप यह अर्थ अपने भीतर रखता है कि वह बचकर नहीं जा सकता।
وَلَوۡ جَعَلۡنَٰهُ قُرۡءَانًا أَعۡجَمِيّٗا لَّقَالُواْ لَوۡلَا فُصِّلَتۡ ءَايَٰتُهُۥٓۖ ءَا۬عۡجَمِيّٞ وَعَرَبِيّٞۗ قُلۡ هُوَ لِلَّذِينَ ءَامَنُواْ هُدٗى وَشِفَآءٞۚ وَٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ فِيٓ ءَاذَانِهِمۡ وَقۡرٞ وَهُوَ عَلَيۡهِمۡ عَمًىۚ أُوْلَٰٓئِكَ يُنَادَوۡنَ مِن مَّكَانِۭ بَعِيدٖ 43
(44) अगर हम इसको अजमी (गै़र-अरबी) क़ुरआन बनाकर भेजते तो ये लोग कहते, “क्यों न इसकी आयतें खोलकर बयान की गईं हैं। कैसी विचित्र बात है कि वाणी अजमी है और सुननेवाले अरबी।”54 इनसे कहो, यह क़ुरआन ईमान लानेवालों के लिए तो मार्गदर्शन और रोग-मुक्ति (शिफ़ा) है, मगर जो लोग ईमान नहीं लाते, उनके लिए यह कानों की डाट और आँखों की पट्टी है। उनका हाल तो ऐसा है जैसे उनको दूर से पुकारा जा रहा हो।55
54. यह उस हठधर्मी का एक और नमूना है जिससे नबी (सल्ल०) का मुक़ाबला किया जा रहा था। इस्लाम-विरोधी कहते थे कि मुहम्मद (सल्ल०) अरब हैं, अरबी उनकी मातृभाषा है। वे अगर अरबी में क़ुरआन प्रस्तुत करते हैं तो यह कैसे समझा जा सकता है कि यह वाणी उन्होंने स्वयं नहीं गढ़ ली है, बल्कि उनपर अल्लाह ने उतारा है। उनकी इस वाणी को अल्लाह की उतारी हुई वाणी तो उस समय माना जा सकता था, जब ये किसी ऐसी भाषा में अचानक धुआँधार भाषण देना शुरू कर देते, जिसे ये नहीं जानते। जैसे, फ़ारसी या रूमी या यूनानी। इसपर अल्लाह फ़रमाता है कि अब उनकी अपनी भाषा में क़ुरआन भेजा गया है, जिसे ये समझ सकें, तो इनको यह आपत्ति है कि एक अरब के द्वारा अस्वों के लिए अरबी भाषा में यह वाणी क्यों उतारी गई। लेकिन अगर किसी दूसरी भाषा में यह भेजा जाता तो उस समय यही लोग यह आपत्ति करते कि यह मामला भी ख़ूब है। अरब क़ौम में एक अरब को रसूल बनाकर भेजा गया है, मगर वाणी उसपर ऐसी भाषा में उतारी गई है जिसे न रसूल समझता है, न क़ौम।
55. दूर से जब किसी को पुकारा जाता है तो उसके कान में एक आवाज़ तो पड़ती है, मगर उसकी समझ में वह नहीं आता कि कहनेवाला क्या कह रहा है। यह ऐसा अनुपम उदाहरण है जिससे हठधर्म विरोधियों की मानसिकता का पूरा चित्र निगाहों के सामने खिंच जाता है। स्वाभाविक बात यह है कि जो आदमी किसी तास्सुब (पक्षपात) में नहीं पड़ा होता, उससे अगर आप बातें करें तो वह उसे सुनता है, समझने का यत्न करता है, और उचित बात होती है तो खुले दिल से उसको स्वीकार कर लेता है। इसके विपरीत जो आदमी आपके विरुद्ध न सिर्फ पक्षपात, बल्कि बैर और द्वेष रखता हो, उसको आप अपनी बात समझाने का चाहे कितना ही प्रयत्न करें, वह सिरे से उसकी ओर ध्यान ही न करेगा। आपकी सारी बात सुनकर भी उसकी समझ में कुछ न आएगा कि आप इतनी देर तक क्या कहते रहे हैं, और आपको भी यूँ महसूस होगा कि जैसे आपकी आवाज़ उसके कान के पर्दो से उचटकर बाहर ही बाहर गुज़रती रही है, दिल और दिमाग़ तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं पा सकी।
۞إِلَيۡهِ يُرَدُّ عِلۡمُ ٱلسَّاعَةِۚ وَمَا تَخۡرُجُ مِن ثَمَرَٰتٖ مِّنۡ أَكۡمَامِهَا وَمَا تَحۡمِلُ مِنۡ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلۡمِهِۦۚ وَيَوۡمَ يُنَادِيهِمۡ أَيۡنَ شُرَكَآءِي قَالُوٓاْ ءَاذَنَّٰكَ مَامِنَّا مِن شَهِيدٖ 46
(47) उस घड़ी का ज्ञान60 अल्लाह ही की ओर फिरता है,61 वही उन सारे फलों को जानता है जो अपने गाभों में से निकलते हैं, उसी को मालूम है कि कौन-सी मादा गर्भवती हुई है और किसने बच्चे को जन्म दिया है।62 फिर जिस दिन वह इन लोगों को पुकारेगा कि कहाँ हैं मेरे वे शरीक? ये कहेंगे, “हम निवेदन कर चुके हैं आज हममें से कोई इसकी गवाही देनेवाला नहीं है।”63
60. ‘उस घड़ी’ से तात्पर्य क़ियामत है, अर्थात् वह घड़ी जब बुराई करनेवालों को उनकी बुराई का बदला दिया जाएगा और उन नेक इनसानों की मदद की जाएगी जिनके साथ बुराई की गई है।
61. अर्थात् अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता कि वह घड़ी कब आएगी। यह जवाब है विरोधियों के इस सवाल का कि हमपर बुराई का दष्परिणाम पड़ने की जो धमकी दी जा रही है, वह आख़िर कब पूरी होगी। अल्लाह ने उनके सवाल को नक़ल किए बिना उसका जवाब दिया है।
62. इस कथन से श्रोताओं को दो बातों का एहसास दिलाया गया है। एक यह कि केवल एक क़ियामत ही नहीं, बरिक परोक्ष के तमाम मामलों का ज्ञान अल्लाह ही के लिए विशिष्ट है। कोई दूसरा परोक्ष का जाननेवाला नहीं है। दूसरे यह कि जो ख़ुदा छोटी-छोटी बातों का इतना विस्तृत ज्ञान रखता है, उसकी दृष्टि से किसी व्यक्ति के कर्मों का चूक जाना सम्भव नहीं है। इसलिए किसी को भी उसकी ख़ुदाई (ईश्वरत्त्व) में निडर होकर मनमानी नहीं करनी चाहिए। इसी दूसरे अर्थ की दृष्टि से इस वाक्य का ताल्लुक़ बाद के वाक्यों से जुड़ता है। इस कथन के तुरन्त बाद जो कुछ फ़रमाया गया है उसपर विचार कीजिए तो वार्ता-क्रम से स्वतः यह विषय सामने आता नज़र आएगा कि क़ियामत के आने की तारीख़ मालूम करने की चिन्ता में कहाँ पड़े हो, चिन्ता इस बात की करो कि जब वह आएगी तो अपनी इन गुमराहियों का तुम्हें क्या परिणाम भुगतना पड़ेगा। यही बात है जो एक अवसर पर नबी (सल्ल०) ने क्रियामत की तारीख़ पूछनेवाले एक आदमी से फ़रमाई थी। एक बार नबी (सल्ल०) सफ़र में कहीं तशरीफ़ ले जा रहे थे। रास्ते में एक आदमी ने दूर से पुकारा, ऐ मुहम्मद! आप (सल्ल0) ने फ़रमाया, “बोलो, क्या कहना है?” उसने कहा, “क़ियामत कब आएगी?” आप (सल्ल०) ने जवाब दिया, “ऐ अल्लाह के बन्दे! वह तो बहरहाल आनी ही है। तूने उसके लिए क्या तैयारी की?”
63. अर्थात् अब हमपर वास्तविकता खुल चुकी है और हमें मालूम हो चुका है कि जो कुछ हम समझे बैठे थे, वह सरासर ग़लत था। अब हमारे बीच कोई एक आदमी भी इस बात को स्वीकार नहीं करता कि ख़ुदाई में कोई दूसरा भी आपका शरीक है। हम निवेदन कर चुके हैं के शब्द इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि कियामत के दिन बार बार हर मरहले में सत्य के इनकारियों से कहा जाएगा कि दुनिया में तुम ख़ुदा के रसूलों का कहा मानने से इनकार करते रहे ,अब बोलो,सत्य पर वे थे या तूम और हर अवसर पर सत्य के इनकारी इस बात को मानते चले जाएँगे कि वास्तव में सत्य वही था, जो उन्होंने बताया था और मालती हमारी थी कि उस ज्ञान को छोड़कर अपनी अज्ञानता पर अड़े रहे।