19. मरयम
(मक्का में उतरी-आयतें 98)
परिचय
नाम
इस सूरा का नाम आयत “वज़कुर फ़िल किताबि मर-य-म" से लिया गया है।
उतरने का समय
इस सूरा के उतरने का समय हबशा की हिजरत से पहले का है। विश्वसनीय रिवायतों से मालूम होता है कि मुसलमान मुहाजिर जब नज्जाशी के दरबार में बुलाए गए थे, उस समय हजरत जाफ़र (रज़ि०) ने यही सूरा भरे दरबार में तिलावत की (पढ़ी) थी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह सूरा उस युग में उतरी थी जब क़ुरैश के सरदार मज़ाक उड़ाने, उपहास करने, लोभ देने, डराने और झूठे आरोपों का प्रचार करके इस्लामी आन्दोलन को दबाने में विफल होकर ज़ुल्मो-सितम, मार-पीट और आर्थिक दबाव के हथियार इस्तेमाल करने लगे थे। हर क़बीले के लोगों ने अपने-अपने क़बीले के नव-मुस्लिमों को तंग किया और तरह-तरह से सताकर उन्हें इस्लाम छोड़ने पर मजबूर करने की कोशिश की। इस सिलसिले में मुख्य रूप से ग़रीब लोग और वे गुलाम और दास जो क़ुरैशवालों के अधीन बनकर रहते थे, बुरी तरह पीसे गए। ये परिस्थितियाँ जब असहनीय हो गईं तो रजब, 45 आमुल-फ़ील (सन् 05 नब्वी) में नबी (सल्ल०) की अनुमति के साथ अधिकतर मुसलमान मक्का से हबशा हिजरत कर गए। पहले ग्यारह मर्दो और चार औरतों ने हबशा की राह ली। क़ुरैश के लोगों ने समुद्र-तट तक उनका पीछा किया, मगर सौभाग्य से शुऐबा के बन्दरगाह पर उनको ठीक समय पर हबशा के लिए नाव मिल गई और वे गिरफ़्तार होने से बच गए। फिर कुछ महीने के अन्दर कुछ लोगों ने हिजरत की, यहाँ तक कि 53 मर्द, 11 औरतें और 7 ग़ैर-क़ुरैशी मुसलमान हबशा में जमा हो गए और मक्का में नबी (सल्ल०) के साथ सिर्फ़ 40 आदमी रह गए थे।
इस हिजरत से मक्का के घर-घर में कोहराम मच गया, क्योंकि क़ुरैश के छोटे और बड़े परिवारों में से कोई ऐसा न था जिसके युवक इन मुहाजिरों में शामिल न हों। इसी लिए कोई घर न था जो इस घटना से प्रभावित न हुआ हो। कुछ लोग इसकी वजह से इस्लाम विरोध में पहले से अधिक कठोर हो गए और कुछ के दिलों पर इसका प्रभाव ऐसा हुआ कि अन्त में वे मुसलमान होकर रहे । चुनांँचे हज़रत उमर (रज़ि०) के इस्लाम-विरोध पर पहली चोट इसी घटना से लगी थी।
इस हिजरत के बाद क़ुरैश के सरदार सिर जोड़कर बैठे और उन्होंने तय किया कि अब्दुल्लाह-बिन-अबी-रबीआ (अबू जह्ल के माँ जाए भाई) और अम्र-बिन-आस को बहुत-से बहुमूल्य उपहार के साथ हबशा भेजा जाए और ये लोग किसी न किसी तरह नज्जाशी को इस बात पर तैयार करें कि वह मुहाजिरों को मक्का वापस भेज दे। चुनांँचे क़ुरैश के ये दोनों राजनयिक (दूत) मुसलमानों का पीछा करते हुए हबशा पहुँचे। पहले उन्होंने नज्जाशी के दरबारियों में ख़ूब उपहार बाँटकर [सबको अपने मिशन के समर्थन पर] राज़ी कर लिया, फिर नज्जाशी से मिले और उसको मूल्यवान भेंट देने के बाद उन मुहाजिरों की वापसी का निवेदन किया, जिसका उसके दरबारियों ने भरपूर समर्थन किया । मगर नज्जाशी ने बिगड़कर कहा कि “इस तरह तो मैं उन्हें हवाले नहीं करूँगा। जिन लोगों ने दूसरे देश को छोड़कर मेरे देश पर विश्वास किया और यहाँ शरण लेने के लिए आए, उनसे मैं विश्वासघात नहीं कर सकता। पहले मैं उन्हें बुलाकर जाँच करूँगा कि ये लोग उनके बारे में जो कुछ कहते हैं, उसकी वास्तविकता क्या है।” चुनांँचे नज्जाशी ने अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के साथियों को अपने दरबार में बुला भेजा। नज्जाशी का सन्देश पाकर सब मुहाजिर जमा हुए और उन्होंने आपसी मश्वरे से एक साथ होकर फ़ैसला किया कि नबी (सल्ल०) ने हमें जो शिक्षा दी है, हम तो वही बिना कुछ घटाए-बढ़ाए सामने रख देंगे, भले ही नज्जाशी हमें रखे या निकाल दे। वे दरबार में पहुँचे तो नज्जाशी के सवाल करने पर हज़रत जाफ़र-बिन-अबी तालिब (रज़ि०) ने तत्काल एक भाषण देते हुए अरब की अज्ञानता के हालात, मुहम्मद (सल्ल०) का नबी बनाए जाने, इस्लाम की शिक्षाओं और मुसलमानों पर क़ुरैश के अत्याचारों को खोल-खोलकर बयान किया। नज्जाशी ने यह भाषण सुनकर कहा कि तनिक मुझे वह कलाम (वाणी) सुनाओ जो तुम कहते हो कि अल्लाह की ओर से तुम्हारे नबी पर उतरा है। हज़रत जाफ़र (रज़ि०) ने जवाब में सूरा मरयम का वह आरंभिक भाग सुनाया जो हज़रत यह्या और हज़रत ईसा (अलैहि०) से संबंधित है। नज्जाशी उसको सुनता रहा और रोता रहा, यहाँ तक कि उसकी दाढ़ी भीग गई। जब हज़रत जाफ़र (रजि०) ने तिलवात ख़त्म की तो उसने कहा, “निश्चय ही यह कलाम और जो कुछ ईसा लाए थे, दोनों एक ही स्रोत से निकले हैं। अल्लाह की क़सम! मैं तुम्हें उन लोगों के हवाले नहीं करूँगा"।
दूसरे दिन अम्र-बिन-आस ने नजाशी से कहा कि "तनिक इन लोगों को बुलाकर यह तो पूछिए कि मरयम के बेटे ईसा के बारे में उनका अक़ीदा (विश्वास) क्या है? ये लोग उनके बारे में एक बड़ी [भयानक] बात कहते हैं ।” नज्जाशी ने फिर मुहाजिरों को बुला भेजा और जब अम्र-बिन-आस द्वारा किया गया प्रश्न उनके सामने दोहराया तो जाफ़र-बिन-अबी तालिब (रज़ि०) ने उठकर बे-झिझक कहा कि “वे अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल हैं और उसकी ओर से एक रूह और एक कलिमा हैं जिसे अल्लाह ने कुँवारी मरयम पर डाला।" नज्जाशी ने सुनकर एक तिनका धरती से उठाया और कहा, “अल्लाह की क़सम ! जो कुछ तुमने कहा ईसा उससे इस तिनके के बराबर भी ज़्यादा नहीं थे।" इसके बाद नज्जाशी ने क़ुरैश के भेजे हुए तमाम उपहार यह कहकर वापस कर दिए कि मैं घूस नहीं लेता और मुहाजिरों से कहा तुम बिल्कुल निश्चिन्त होकर रहो।
विषय और वार्ताएँ
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को दृष्टि में रखकर जब हम इस सूरा को देखते हैं तो उसमें पहली बात उभरकर हमारे सामने यह आती है कि यद्यपि मुसलमान एक उत्पीड़ित शरणार्थी गिरोह के रूप में अपना वतन छोड़कर दूसरे देश में जा रहे थे, मगर इस दशा में भी अल्लाह ने उनको दीन के मामले में तनिक भर भी लचक दिखाने की शिक्षा न दी, बल्कि चलते वक़्त राह में काम आनेवाले सामान के रूप में यह सूरा उनके साथ की ताकि ईसाइयों के देश में ईसा (अलैहि०) की बिल्कुल सही हैसियत प्रस्तुत करें और उनका अल्लाह का बेटा होने से साफ़ साफ़ इंकार कर दें।
आयत 1 से लेकर 40 तक हज़रत यहया और ईसा का क़िस्सा सुनाने के बाद फिर इससे आगे की आयतों में समय के हालात को देखते हुए हज़रत इबाहीम (अलैहि०) का किस्सा सुनाया गया है, क्योंकि ऐसे ही हालात में वे भी अपने बाप और परिवार और देशवालों के अत्याचारों से तंग आकर वतन से निकल खड़े हुए थे। इससे एक ओर मक्का के विधर्मियों को यह शिक्षा दी गई है कि आज हिजरत करनेवाले मुसलमान इबाहीम (अलैहि०) की पोजीशन में हैं और तुम लोग उन ज़ालिमों की स्थिति में हो जिन्होंने उनको घर से निकाला था। दूसरी ओर मुहाजिरों को यह शुभ-सूचना दी गई है कि जिस तरह इब्राहीम (अलैहि०) वतन से निकलकर नष्ट न हुए, बल्कि और अधिक उच्च पद पर आसीन हो गए, ऐसा ही भला अंजाम तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।
इसके बाद नबियों का उल्लेख किया गया है, जिसमें यह बताना अभिप्रेत है कि तमाम नबी वही दीन लेकर आए थे जो मुहम्मद (सल्ल०) लाए हैं। मगर नबियों के गुज़र जाने के बाद उनकी उम्मतें बिगड़ती रही है और आज अलग-अलग उम्मतों (समुदायो) में जो गुमराहियाँ पाई जा रही हैं, ये उसी बिगाड़ का फल हैं।
आयत 67 से अन्त तक मक्का के इस्लाम-शत्रुओं की पथभ्रष्टता की कड़ी आलोचना की गई है और कलाम (वाणी) समाप्त करते हुए ईमानवालों को शुभ-सूचना सुनाई गई है कि सत्य के शत्रुओं की सारी कोशिशों के बावजूद अन्तत: तुम लोकप्रिय बनकर रहोगे।
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ذِكۡرُ رَحۡمَتِ رَبِّكَ عَبۡدَهُۥ زَكَرِيَّآ 1
(2-3) वर्णन है1 उस रहमत का जो तेरे रब ने अपने बन्दे ज़करीया2 पर की थी, जबकि उसने अपने रब को चुपके-चुपके पुकारा।
1. तुलना के लिए सूरा-3 आले इमरान, आयत-31-41 दृष्टि में रहे, जिसमें यह क़िस्सा दूसरे शब्दों में बयान हो चुका है।
2. यह हज़रत ज़करीया, जिनका वर्णन यहाँ हो रहा है, हज़रत हारून के परिवार से थे। इनकी स्थिति ठीक-ठीक समझने के लिए ज़रूरी है कि बनी इसराईल के पुरोहितवाद (Priesthood) को अच्छी तरह समझ लिया जाए। फ़लस्तीन पर क़ब्ज़ा करने के बाद बनी इसराईल ने देश का प्रबन्ध इस तरह किया था कि हज़रत याक़ूब की सन्तान के 12 क़बीलों में तो सारा देश बाँट दिया गया और तेरहवाँ क़बीला (यानी लावी बिन याक़ूब का घराना) धार्मिक सेवाओं के लिए विशेष कर दिया गया। फिर बनी लावी में से भी असल वह परिवार जो “मक़दिस में ख़ुदाबन्द के आगे बख़ूर जलाने की ख़िदमत” और “सबसे पाक चीज़ों को मुक़द्दस बनाने” का काम करता था, हज़रत हारून का परिवार था। बाक़ी दूसरे बनी लावी मक़दिस के भीतर नहीं जा सकते थे, बल्कि ख़ुदावन्द के घर की ख़िदमत के समय सेहनों और कोठरियों में काम करते थे, सब्त (शनिवार) के दिन और ईदों के मौक़ों पर क़ुर्बानियाँ चढ़ाते थे, और मक़दिस की निगरानी में बनी हारून का हाथ बटाते थे।
‘बनी हारून’ के चौबीस परिवार थे जो बारी-बारी से मक़दिस की सेवा के लिए हाज़िर होते थे। उन्हीं परिवारों में से एक अबयाह का परिवार था जिसके सरदार हज़रत ज़करीया थे। अपने परिवार की बारी के दिनों में यही मक़दिस में जाते और ख़ुदावन्द के सामने बख़ूर जलाने की सेवा पूरी करते थे। (विस्तार के लिए देखिए बाइबल की किताब, इतिहास, पहला भाग, अध्याय 23-24)
فَخَرَجَ عَلَىٰ قَوۡمِهِۦ مِنَ ٱلۡمِحۡرَابِ فَأَوۡحَىٰٓ إِلَيۡهِمۡ أَن سَبِّحُواْ بُكۡرَةٗ وَعَشِيّٗا 10
(11) फिर वह मेहराब से7 निकलकर अपनी क़ौम के सामने आया और उसने इशारे से उनको आदेश दिया कि सुबह व शाम तस्बीह करो।8
7. मेहराब की व्याख्या के लिए देखिए, सूरा-3 आले इमरान, टिप्पणी 36
8. इस घटना का जो विवरण लूका की इंजील में बयान हुआ है, उसके महत्वपूर्ण अंश हम यहाँ नक़ल कर देते हैं ताकि लोगों के सामने क़ुरआन की रिवायतों के साथ मसीही रिवायत भी रहे । बीच में ब्रैकेट (कोष्टक) के वाक्य हमारे अपने हैं-
"यहूदियों के बादशाह हीरोदेस के ज़माने में अबियाह के दल में जकरियाह नामक एक याजक था और उसकी बीवी हारून के वंश की थी और उसका नाम इलीशिबा (Elizabeth) था और उनके औलाद न थी क्योंकि इलीशिबा बांझ थी और वे दोनों बूढ़े थे। ......ऐसा हुआ कि कहानत के चलन के अनुसार उसके नाम का क़ुरआ निकला कि ख़ुदावन्द के मकिदस में जाकर ख़ुश्बू जलाए। और लोगों को सारी जमाअत ख़ुश्बू जलाते वक़्त बाहर दुआ कर रही थी कि ख़ुदावन्द का फ़रिश्ता ख़ुश्बू के मज़बह की दाहिनी ओर खड़ा हुआ उसको दिखाई दिया। और जकरियाह उसको देखकर घबराया और उसपर दहशत गई। मगर फ़रिश्ते ने उससे कहा,ऐ जकरियाह ! ख़ौफ़ न कर, क्योंकि तेरी दुआ सुन ली गई । (हज़रत ज़करीया अलैहिस्सलाम की दुआ का ज़िक्र बाइबल में कहीं नहीं है) और तेरे लिए तेरी बीवी इलीशिबा के बेटा होगा । तू उसका नाम यूहन्ना (यानी यहया) रखना ...... वह ख़ुदावन्द के हुजूर में बुजूर्ग होगा (सूरा 3 आले इमरान में इसके लिए शब्द 'सय्यिदन' इस्तेमाल हुआ है) और हरगिज़ न मय (एक प्रकार की शराब) और न कोई अन्य शराब पिएगा। (तकिय्या) और अपनी माँ के पेट ही से रूहुलकुदस से भर जाएगा । (व आतैनाहुल हुक-म सबिय्या) और बहुत-से बनी इसराईल को ख़ुदावन्द की ओर जो उनका ख़ुदा है, फेरेगा।.... "
"ज़करियाह ने फ़रिश्ते से कहा, मैं इस बात को किस तरह जानूं ? क्योंकि मैं बूढ़ा हूँ और मेरी बीवी वृद्धा है। फ़रिश्ते ने उससे कहा : मैं जिबील हूँ. ...देख जिस दिन तक ये बातें वाके न हो लें तू चुप रहेगा और बोल न सकेगा इसलिए कि तूने मेरी बातों का, जो अपने वक़्त पर पूरी होंगी, यक़ीन न किया । (यह बयान क़ुरआन से अलग है) और लोग जकरियाह को राह देखते और ताज्जुब करते थे कि उसे मतिदस में क्यों देर लगी। जब वह बाहर आया तो उनसे बोल न सका। वे समझ गए कि उसने मदिस में कोई दर्शन पाया है। वह उनसे इशारे से बात करता रहा क्योंकि वह गूंगा हो रहा ।" (लूका,अध्याय 1, आयत 5-22)
(11) फिर वह मेहराब से7 निकलकर अपनी क़ौम के सामने आया और उसने इशारे से उनको आदेश दिया कि सुबह व शाम तस्बीह करो।8
8. इस घटना का जो विवरण लूका की इंजील में बयान हुआ है, उसके महत्वपूर्ण अंश हम यहाँ नक़ल कर देते हैं ताकि लोगों के सामने क़ुरआन की रिवायतों के साथ मसीही रिवायत भी रहे। बीच में ब्रैकेट (कोष्टक) के वाक्य हमारे अपने हैं- “यहूदियों के बादशाह हीरोदेस के ज़माने में अबियाह के दल में ज़करियाह नामक एक याजक था और उसकी बीवी हारून के वंश की थी और उसका नाम इलीशिबा (Elizabeth) था और उनके औलाद न थी क्योंकि इलीशिबा बांझ थी और वे दोनों बूढ़े थे। ......ऐसा हुआ कि कहानत के चलन के अनुसार उसके नाम का क़ुरआ निकला कि ख़ुदावन्द के मक़दिस में जाकर ख़ुशबू जलाए। और लोगों को सारी जमाअत ख़ुशबू जलाते वक़्त बाहर दुआ कर रही थी कि ख़ुदावन्द का फ़रिश्ता ख़ुशबू के मज़बह की दाहिनी ओर खड़ा हुआ उसको दिखाई दिया। और ज़करियाह उसको देखकर घबराया और उसपर दहशत छा गई। मगर फ़रिश्ते ने उससे कहा, ऐ ज़करियाह! ख़ौफ़ न कर, क्योंकि तेरी दुआ सुन ली गई। (हज़रत ज़करीया अलैहिस्सलाम की दुआ का ज़िक्र बाइबल में कहीं नहीं है) और तेरे लिए तेरी बीवी इलीशिबा के बेटा होगा। तू उसका नाम यूहन्ना (यानी यहया) रखना ...... वह ख़ुदावन्द के सामने बुज़ुर्ग होगा (सूरा 3 आले इमरान में इसके लिए शब्द ‘सय्यिदन’ इस्तेमाल हुआ है) और हरगिज़ न मय (एक प्रकार की शराब) और न कोई अन्य शराब पिएगा। (तक़ीय्या) और अपनी माँ के पेट ही से रूहुलक़ुद्स से भर जाएगा। (व आतैनाहुल हुक-म सबिय्या) और बहुत-से बनी इसराईल को ख़ुदावन्द की ओर जो उनका ख़ुदा है, फेरेगा।.... “ज़करियाह ने फ़रिश्ते से कहा, मैं इस बात को किस तरह जानूं? क्योंकि मैं बूढ़ा हूँ और मेरी बीवी वृद्धा है। फ़रिश्ते ने उससे कहा: मैं जिबरील हूँ. ...देख जिस दिन तक ये बातें पूरी न हो लें तू चुप रहेगा और बोल न सकेगा इसलिए कि तूने मेरी बातों का, जो अपने वक़्त पर पूरी होंगी, यक़ीन न किया। (यह बयान क़ुरआन से अलग है) और लोग ज़करियाह की राह देखते और ताज्जुब करते थे कि उसे मक़दिस में क्यों देर लगी। जब वह बाहर आया तो उनसे बोल न सका। वे समझ गए कि उसने मक़दिस में कोई दर्शन पाया है। वह उनसे इशारे से बात करता रहा क्योंकि वह गूंगा हो रहा।”(लूका,अध्याय 1, आयत 5-22)
وَسَلَٰمٌ عَلَيۡهِ يَوۡمَ وُلِدَ وَيَوۡمَ يَمُوتُ وَيَوۡمَ يُبۡعَثُ حَيّٗا 14
(15) सलाम उसपर जिस दिन कि वह पैदा हुआ और जिस दिन वह मरे और जिस दिन वह ज़िन्दा करके उठाया जाए।12
12. हज़रत यहया के जो हालात विभिन इनजीलों में बिखरे हुए हैं, उन्हें जमा करके हम यहाँ उनकी पवित्र जीवनी की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं जिसमें सूरा-3 आले इमरान और इस सूरा के संक्षिप्त संकेतों को स्पष्ट किया जा सकेगा। लूक़ा के बयान के अनुसार हज़रत यहया हज़रत ईसा से छ: महीने बड़े थे। लगभग 30 साल की उम्र में नुबूवत के पद पर व्यावहारिक रूप से आसीन हुए और युहन्ना की रिवायत के अनुसार उन्होंने जार्डन के पूर्वी इलाक़े में अल्लाह को ओर बुलाने का काम शुरू किया। वे कहते थे- “मैं निर्जन स्थान में एक पुकारनेवाले की आवाज़ हूँ कि तुम ख़ुदावन्द की राह को सीधा करो।” (युहन्ना 1: 23) मरकुस का बयान है कि वे लोगों से गुनाहों की तौबा कराते थे और तौबा करनेवालों को बपतिस्मा देते दे। अर्थात् तौबा के बाद नहलाते थे, ताकि आत्मा और शरीर दोनों पाक हो जाएं। यहूदिया और यरूशलम के अधिकतर लोग उनके श्रद्धालु हो गए थे और उनके पास जाकर बपतिस्मा लेते थे। (मरकुस 1:45) इसी आधार पर उनका नाम युहन्ना बपतिस्मा देनेवाला (John the Baptist) प्रसिद्ध हो गया था। सामान्य रूप से बनी इसराईल उनकी नुबूबत स्वीकार कर चुके थे (मती 21:26)। मसीह (अलैहि०) का कथन था कि ‘जो औरतों से पैदा हुए हैं, उनमें युहन्ना बपतिस्मा देनेवाले से बड़ा कोई नहीं हुआ। (मत्ती 11: 11) वह ऊँट के बालों की पोशाक पहने और चमड़े का पटका कमर से बांधे रहते थे और उनका भोजन टिड्डियाँ और जंगली शहद था (मत्ती 3:4)। इस फकोराना जीवन के साथ वे मुनादी करते फिरते थे कि तौबा करो, क्योंकि आसमान को बादशाहो करीब आ गई है (मत्ती 3:2)। अर्थात् मसौह (अलैहि०) को नुबूवत को शुरुआत होनेवाली है। इसी आधार पर उनको सामान्य रूप से हज़रत मसीह का ‘अरहास’ (पुष्टि करनेवाले) कहा जाता है, और यही बात उनके बारे में क़ुरआन में कही गई है कि- ‘मुसद्दिक़म बिकलिमतिम मिनल्लाहि (आले इमरान-4)। वे लोगों को रोज़े और नमाज़ पर उभारते थे (मत्ती 9 : 14, लूक़ा 5:33, लूका 11 : 1)। वे लोगों से कहते थे कि जिसके पास दो कुरते हों, वे उसको जिसके पास न हो, बाँट दे और जिसके पास खाना हो, वह भी ऐसा ही करें (लूका 3:10)। बनी इसराईल के बिगड़े हुए उलमा फरेसी और सदूको उनके पास बपतिस्मा लेने तो डॉटकर फरमाया, “ऐ साँप के बच्चो। तुमको किसने जता दिया कि आनेवाले गजब (प्रकोप) से भागो? ..... अपने दिलों में यह कहने का ख़्याल न करो कि अब्राहम हमारा बाप है अब पेड़ों की जड़ों पर कुल्हाड़ा रखा हुआ है, अत: जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में डाला जाता है।”(पती 3:7-10) उनके ज़माने में यहूदी शासक हीरो डायटी पास, जिसके राज्य में वे हक की दावत की ख़िदमत अंजाम देते थे, सिर से पैर तक रूमी सभ्यता में जूला हुआ था और उसकी वजह से सारे देश में भ्रष्टाचार फैल रहा था। उसने स्वयं अपने भाई फ्लिप को बीवी हीरोदयास को अपने घर में डाल रखा था। हज़रत यहया ने इसपर होरोद को मलामत की और उसके दुराचरण के विरुद्ध आवाज उठाई। इस अपराध में हीरोद ने उनको गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। और अन्ततः उसी बदकार औरत के कहने पर उसकी नाचनेवाली बेटी ने जब उस भाग्यहीन से हज़रत यहया का सर माँगा। तो उसने कैद खाने से उनका सर कटवा कर मँगवाया और एक थाल में रखवाकर उस नाचनेवाली को भेंट कर दिया। (मत्ती 14 : 3-12, मरकुस 6:17-29, लूक़ा 3:19-20)
وَٱذۡكُرۡ فِي ٱلۡكِتَٰبِ مَرۡيَمَ إِذِ ٱنتَبَذَتۡ مِنۡ أَهۡلِهَا مَكَانٗا شَرۡقِيّٗا 15
(16-17) और ऐ नबी। इस किताब में मरयम का हाल जमा करो13, जबकि वह अपने लोगों से अलग होकर पूर्वी ओर कोना पकड़े बैठी थी14 और परदा डालकर उससे छिप बैठी थी। इस हालत में हमने उसके पास अपनी रूह (अर्थात फ़रिश्ते) को भेजा और वह उसके सामने एक, पूरे इनसान के रूप में प्रकट हो गया।
13. तुलना के लिए देखिए सूरा-3 आले इमरान, टिप्पणी 42 और 55, सूरा-4 अन-निसा, टिप्पणी 190-191
14. सूरा-3 आले इमरान में दूसरी बातों के साथ यह भी बताया जा चुका है कि हज़रत मरयम बैतुल-मक़दिस को एक मेहराब में एकान्तवासी हो गई थीं। अब यहाँ यह बताया जा रहा है कि वह मेहराब जिसमें हज़रत मरयम एकान्तवासी थीं, बैतुल-मक़दिस के पूर्वी हिस्से में स्थित थी और उन्होंने एकान्तवासियों के आम तरीक़े के अनुसार एक परदा लटकाकर अपने आपको देखनेवालों की निगाहों से सुरक्षित कर लिया था। जिन लोगों ने सिर्फ़ बाइबल से समानता के लिए पूर्वी जगह से तात्पर्य नासरा लिया है उन्होंने ग़लती की है, क्योंकि नासरा यरुशलम के उत्तर में है, न कि पूरब में।
يَٰٓأُخۡتَ هَٰرُونَ مَا كَانَ أَبُوكِ ٱمۡرَأَ سَوۡءٖ وَمَا كَانَتۡ أُمُّكِ بَغِيّٗا 27
(28) ऐ हारून की बहन।19 न तेरा बाप कोई बुरा आदमी था, और न तेरी माँ ही कोई बदकार औरत थी।”19अ
19. इन शब्दों के दो अर्थ हो सकते हैं। एक यह कि उन्हें प्रत्यक्ष अर्थ में लिया जाए और यह समझा जाए कि हज़रत मरयम का कोई भाई हारून नाम का हो। दूसरे यह कि अरबी मुहावरे के अनुसार ‘हारून की बहन’ का अर्थ हारून के परिवार की लड़की’ ली जाए क्योंकि अरबी में यह एक जानी-पहचानी शैली है। जैसे मुज़र कबीले के आदमी को ‘ऐ मुज़र के भाई’ और हमदान क़बीले के आदमी को ‘ऐ हमदान के भाई’ कहकर पुकारते हैं। पहले अर्थ के पक्ष में प्राथमिकता का तर्क यह है कि कुछ रिवायतों में स्वयं नबी (सल्ल०) से यही अर्थ नक़ल किए गए हैं और दूसरे अर्थ के समर्थन में तर्क यह है कि परिस्थिति इस बात का तकाज़ा करती है। क्योंकि इस घटना से क़ौम में जो बेचैनी पैदा हो गई थी, उस कारण प्रत्यक्ष में यह नहीं मालूम होता कि हारून नामी एक गुमनाम आदमी की कुंवारी बहन गोद में बच्चा लिए हुए आई थी, बल्कि जिस चीज़ ने लोगों की एक भीड़ को हज़रत मरयम के चारों ओर जमा कर दिया था, वह यही हो सकती थी कि बनी इसराईल के पवित्रतम घराने, हारून के घराने की एक लड़की इस हालत में पाई गई। यद्यपि एक मरफूअ हदीस (यानी वह हदीस जो नबी सल्ल० से सम्बंध हो) की मौजूदगी में कोई दूसरा अर्थ सिद्धांत रूप से ध्यान देने योग्य नहीं हो सकता, लेकिन हदीस-ग्रन्थ मुस्लिम, नसई, तिर्मिज़ी आदि में यह हदीस जिन शब्दों में नक़ल हुई है उससे यह अर्थ नहीं निकलता कि इन शब्दों का अर्थ अनिवार्य रूप से ‘हारून की बहन’ ही है। मुग़ीरह बिन शोबा (रज़ि०) की रिवायत में जो कुछ बयान हुआ है, वह यह है कि नजरान के ईसाइयों ने हज़रत मुग़ीरह (रज़ि०) के सामने यह आपत्ति रखी कि क़ुरआन में हज़रत मरयम को हारून की बहन कहा गया है, हालांकि हज़रत हारून उनसे सैंकड़ों वर्ष पहले गुज़र चुके थे। हज़रत मुग़ीरह (रज़ि०) उनकी आपत्ति का उत्तर न दे सके और उन्होंने आकर नबी (सल्ल०) के सामने यह क़िस्सा दोहराया। इसपर नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया कि “तुमने यह उत्तर क्यों न दिया कि बनी इसराईल अपने नाम नबियों और भले लोगों के नाम पर रखते थे।” नबी (सल्ल०) के इस कथन से केवल यह बात निकलती है कि निरुत्तर होने के बजाय यह उत्तर देकर आपत्ति समाप्त की जा सकती थी।
19अ. जो लोग हज़रत ईसा (अलैहि०) की मोजिज़ों भरी (चामत्कारिक) पैदाइश (जन्म) के इनकारी हैं वे आख़िर इस बात का क्या यथोचित कारण बता सकते हैं कि हज़रत मरयम का बच्चा लिए हुए आने पर क़ौम क्यों चढ़ आई और उनपर व्यंग्य और निंदा की बौछार उसने क्यों की?
وَٱلسَّلَٰمُ عَلَيَّ يَوۡمَ وُلِدتُّ وَيَوۡمَ أَمُوتُ وَيَوۡمَ أُبۡعَثُ حَيّٗا 32
(33) सलाम है मुझपर जबकि मैं पैदा हुआ और जबकि मैं मरूं और जबकि ज़िन्दा करके उठाया जाऊँ।’’21
21. यह है वह ‘निशानी’ जो हज़रत ईसा (अलैहि०) की हस्ती में बनी इसराईल के सामने पेश की गई। अल्लाह बनी इसराईल को उनके लगातार दुराचारों पर शिक्षाप्रद सज़ा देने से पहले उनपर युक्ति पूरी करना चाहता था। इसके लिए उसने यह उपाय खोजा कि बनी हारून की एक ऐसी नेक और दीनदार लड़की को जो बैतुल-मक़दिस में एकान्तवासी और हज़रत ज़करीया के प्रशिक्षण में थी, कुंवारेपन की हालत में गर्भवती कर दिया, ताकि जब वह बच्चा लिए हुए आए तो सारी क़ौम में हलचल पैदा हो जाए और लोगों का ध्यान एक साथ उनपर आकृष्ट हो जाए। फिर इस उपाय के नतीजे में जब एक भीड़ हज़रत मरयम पर टूट पड़ी तो अल्लाह ने उस नये बच्चे से कलाम कराया, ताकि जब यही बच्चा बड़ा होकर नुबूवत के पद पर आसीन हो तो क़ौम में हज़ारों आदमी इस बात की गवाही देनेवाले मौजूद रहे कि उसके व्यक्तित्व में वे अल्लाह का एक स्तब्ध कर देनेवाला मोजिज़ा देख चुके हैं। यही कारण है कि जब जवान होकर हज़रत ईसा ने नबी का काम शुरू किया और इस क़ौम ने न सिर्फ उनका इनकार किया, बल्कि उनकी जान की दुश्मन हो गई और उनकी माँ पर दुष्कर्म का आरोप लगाने से भी न चुकी तो अल्लाह ने उसको ऐसी सज़ा दी जो किसी क़ौम को नहीं दी गई। (और अधिक व्याख्या के लिए देखिए सूरा 3 आले इमरान, टिप्पणी 44,53, मूग-4 अन-निसा, टिप्पणी 212-213, सूरा- 21 अल अंबिया, टिप्पणी 88,89,90, सूरा-23 अल मोमिनून, टिप्पणी 43)
وَٱذۡكُرۡ فِي ٱلۡكِتَٰبِ مُوسَىٰٓۚ إِنَّهُۥ كَانَ مُخۡلَصٗا وَكَانَ رَسُولٗا نَّبِيّٗا 50
(51) और उल्लेख करो इस किताब में पूसा का। वह एक चुना हुआ 29 आदमी था और रसूल-नबी 30 था।
29. मूल अरबी में शब्द ‘मुख़लसन’ प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ ख़ालिस (विशिष्ट) किया हुआ है। अर्थ यह है कि हज़रत मूसा एक ऐसे आदमी थे जिनको अल्लाह ने विशेष रूप से अपना बना लिया था।
30. ‘रसूल’ का अर्थ है ‘भेजा हुआ’। क़ुरआन में यह शब्द तो उन फ़रिश्तों के लिए प्रयुक्त हुआ है जो अल्लाह की ओर से किसी विशेष कार्य के लिए भेजे जाते हैं या फिर उन इनसानों को इस नाम से याद किया गया है जिन्हें अल्लाह ने अपने बन्दों को ओर अपना सन्देश पहुँचाने के लिए लगाया। नबी के अर्थ में भाषा विशेषज्ञों में मतभेद है। कुछ इसको ‘नबा से बना हुआ कहते हैं जिसका अर्थ ख़बर है, और इस मूल की दृष्टि से नबी का अर्थ ‘ख़बर देनेवाला’ है, कुछ के निकट यह नबू से निकला है, अर्थात ऊँचाई और बुलन्दी और इस अर्थ की दष्टि से नबी का अर्थ है ‘उच्च और महान पदवाला। ज़हरी ने क़सई से एक तीसरा कथन भी नक़ल किया है और वह यह है कि यह शब्द मूल में नबई है जिसका अर्थ तरीक़ा और रास्ता है और नबियों को नबी इसलिए कहा गया है कि वे अल्लाह की ओर जाने का रास्ता हैं। अतः किसी आदमी को रसूल नबी कहने का अर्थ या तो ‘ऊँचे पदोंवाला या पैग़म्बर’ ‘अल्लाह की ओर से ख़बर देनेवाला पैग़म्बर’ या ‘फिर वह पैग़म्बर जो अल्लाह का रास्ता बतानेवाला है। क़ुरआन मजीद में ये दोनों शब्द सामान्यतः समानार्थी प्रयुक्त हुए हैं। फिर हम देखते हैं कि एक ही व्यक्तित्व को कहीं केवल रसूल कहा गया है और कहीं केवल नबी और कहीं मूल और नबी एक साथ। लेकिन कुछ जगहों पर रसूल और नबी के शब्द इस तरह भी प्रयुक्त हुए हैं जिससे व्यक्त होता है कि इन दोनों में पद का या काम का या काम के स्वरूप को देखते हुए कोई पारिभाषिक अन्तर है। जैसे सूरा 22 हज, आयत 53 में फ़रमाया गया है, “हमने नहीं भेजा तुमसे पहले कोई रसूल और न कोई नबी, मगर ......।”ये शब्द स्पष्ट रूप से व्यक्त करते हैं कि रसूल और नबी दो अलग-अलग पारिभाषिक शब्द है जिनके बीच अर्थ का कोई अन्तर अवश्य है। इसी आधार पर टीकाकारों में यह वार्ता चल पड़ी है कि इस अन्तर का स्वरूप क्या है। लेकिन सत्य तो यह है कि निश्चित प्रमाणों के साथ कोई भी नबी और रसूल की अलग-अलग हैसियतों को निश्चित नहीं कर सका है। अधिक से अधिक जो बात विश्वास से कही जा सकती है, वह यह है कि रसूल का शब्द नबी की तुलना में मुख्य है, अर्थात् हर रसूल नबी भी होता है मगर हर नबी रसूल नहीं होता। या दूसरे शब्दों में नबियों में से रसूल शब्द उन महान हस्तियों के लिए बोला गया है जिनको सामान्य नबियों के मुक़ाबले में अधिक महत्त्वपूर्ण पद सुपुर्द किया गया था। इसी का समर्थन इस हदीस से भी होता है जो इमाम अहमद ने हज़रत अबू उमामा (रज़ि०) से और हाकिम ने हज़रत अबूज़र (रज़ि०) से नक़ल की है कि नबी (सल्ल०) से रसूलों की तादाद पूछी गई तो आपने 313 या 315 बताई और नबियों की तादाद पूछी गई तो आपने एक लाख चौबीस हज़ार बताई। यद्यपि इस हदीस की सनदें कमज़ोर हैं,मगर कई सनदों से एक बात का नक़ल होना उसकी कमज़ोरी को बड़ी हद तक दूर कर देता है।
وَٱذۡكُرۡ فِي ٱلۡكِتَٰبِ إِدۡرِيسَۚ إِنَّهُۥ كَانَ صِدِّيقٗا نَّبِيّٗا 55
(56) और इस किताब में इदरीस का उल्लेख33 करो। वह एक सच्चा इनसान और एक नबी था
33. हज़रत इदरीस (अलैहि०) के बारे में मतभेद है। कुछ के निकट वह बनी इसराईल में से कोई नबी थे मगर अधिकतर लोग इस ओर गए हैं कि हज़रत नूह (अलैहि०) से भी पहले गुज़रे हैं। नबी (सल्ल०) से कोई सही हदीस हमें ऐसी नहीं मिली जिससे उनके व्यक्तित्व के निर्धारण में कोई सहायता मिलती हो। अलबत्ता क़ुरआन का एक संकेत इसका समर्थन करता है कि वह हज़रत नूह (अलैहि०) से पहले के हैं, क्योंकि बादवाली आयत में यह फ़रमाया गया कि ये नबी (जिनका उल्लेख ऊपर गुज़रा है) आदम की औलाद, नूह की औलाद, इब्राहीम की औलाद और इसराईल की औलाद से हैं। स्पष्ट है कि हज़रत यहया, ईसा और मूसा (अलैहि०) तो बनी इसराईल में से हैं, हज़रत इस्माईल, हज़रत इसहाक़ और हज़रत याक़ूब इबाहीम (अलैहि०) की सन्तान में से हैं और हज़रत इब्राहीम नूह (अलैहि०) की सन्तान में से हैं, इसके बाद केवल हज़रत इदरीस (अलैहि०) ही रह जाते हैं जिनके बारे में यह समझा जा सकता है कि आदम की सन्तान से हैं। टीकाकारों का सामान्य विचार यह है कि बाइबल में जिन बुजुर्ग का नाम हनोक (Enoch) बताया गया है कि वहौ हज़रत इदरीस हैं। इनके बारे में बाइबल का बयान यह है- “और हनोक 65 वर्ष का था जब उससे मतूशेलह पैदा हुआ और मतूशेलह के जन्म के बाद हनोक 300 वर्ष तक ख़ुदा के साथ-साथ चलता रहा और वह गायब हो गया, क्योंकि ख़ुदा ने उसे उठा लिया (उत्पत्ति, अध्याय 5, आयत 21-24)। तलमूद की इसराईली रिवायतों में उनके हालात अधिक विस्तार से बताए गए हैं। उनका सार यह है कि हज़रत नूह से पहले जब आदम की संतान में बिगाड़ की शुरुआत हुई तो अल्लाह के फ़रिश्ते ने हनोक को, जो लोगों से अलग-थलग संन्यासी जीवन बीता रहे थे, पुकारा कि “ऐ हनोक। उठो, अकेलेपन के जीवन से निकलो और ज़मीन के रहनेवालों में चल-फिरकर उनकों वह रास्ता बताओ जिनपर उनको चलना चाहिए और वे तरीक़े बताओ जिनपर उन्हें व्यवहार करना चाहिए। यह आदेश पाकर वे निकले और उन्होंने जगह-जगह लोगों को जमा करके उपदेश व नसीहत की और ईसानी नस्ल ने उनका अनुपालन करके अल्लाह की बन्दगी अपना ली। हनोक 353 वर्ष तक इनसानी नस्ल पर शासन करते रहे। उनका शासन न्याय और सत्यवादिता का शासन था। उनके समय में धरती पर अल्लाह की रहमतें बरसती रहीं। (The Talmud Selection, PP. 18-21)
۞فَخَلَفَ مِنۢ بَعۡدِهِمۡ خَلۡفٌ أَضَاعُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَٱتَّبَعُواْ ٱلشَّهَوَٰتِۖ فَسَوۡفَ يَلۡقَوۡنَ غَيًّا 58
(59) फिर उनके बाद वे बुरे लोग उनके उत्तराधिकारी हुए जिन्होंने नमाज़ को नष्ट किया35 और मनोकामनाओं के पीछे चले36, अत: क़रीब है कि गुमराही के परिणाम का सामना उन्हें करना पड़े,
35. अर्थात् नमाज़ पढ़नी छोड़ दी या नमाज़ मे ग़फ़लत और बे परवाई बरतने लगे। यह हर उम्मत के पतन और गिरावट का सर्वप्रथम क़दम है। नमाज़ वह सर्वप्रथम सम्पर्क है जो मोमिन का ज़िन्दा और अमली ताल्लुक़ अल्लाह के साथ रात व दिन जोड़े रखता है और उसे ईश्वरवादिता के केन्द्र और धुरी से बिछड़ने नहीं देता। यह बन्धन टूटते ही आदमी अल्लाह से दूर, और दूर होता चला जाता है, यहाँ तक कि व्यावहारिक संबंध से गुज़रकर उसका काल्पनिक संबंध भी अल्लाह के साथ बाक़ी नहीं रहता। इसी लिए अल्लाह ने यहाँ यह बात एक मूल सिद्धान्त के रूप में कही है कि पिछले तमाम नबियों की उम्मतों का बिगाड़ नमाज़ नष्ट करने से शुरू हुआ है।
36. यह अल्लाह से ताल्लुक़ की कमी और उसके न होने का अनिवार्य फल है। नमाज़ के नष्ट होने से दिल अल्लाह की मदद से ग़ाफ़िल रहने लगे, तो ज्यों-ज्यों यह ग़फ़लत बढ़ती गई, मनोकामनाओं की दासता में भी बढ़ोत्तरी होती चली गई, यहाँ तक कि उनके चरित्र और मामलों का हर भाग अल्लाह के आदेशों के बजाय अपने मनमाने तरीक़ों का पाबन्द होकर रहा।