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प्यारी माँ के नाम इस्लामी सन्देश

प्यारी माँ के नाम इस्लामी सन्देश

यह लेख वास्तव में एक पत्र है, जो जनाब नसीम ग़ाज़ी फ़लाही ने अपनी माँ के नाम लिखा है। इस पत्र के महत्व को देखते हुए ही इसे एक पुस्तिका के रूप में जीवंत कर दिया गया है। जनाब नसीम ग़ाज़ी का जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ था, लेकिन उन्होंने अपने लड़कपन के दिनों में ही इस्लाम क़ुबूल कर लिया था। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने अपनी माँ को यक़ीन दिलाया है कि उनका बेटा पराया नहीं हुआ है, बल्कि बेटे के रूप में उसका दायित्व और बढ़ गया है, इस्लाम ने उसे माँ के साथ सबसे बढ़कर सद्व्यवहार की शिक्षा दी है। साथ ही उन्होंने माँ को इस्लाम की दावत भी दी है, जो उन्होंने कुछ समय बाद क़ुबूल कर ली। -संपादक

लेखक: नसीम ग़ाज़ी फ़लाही

प्रकाशक: मर्कज़ी मक्तबा इस्लामी पब्लिशर्स

बिसमिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

'कृपाशील, दयावान ईश्वर के नाम से'

दो शब्द

यह पुस्तिका वास्तव में एक ख़त है जो मैंने अपनी प्यारी माँ के नाम 1968 ई. में लिखा था। उस समय मैं एक शैक्षणिक संस्था में शिक्षा प्राप्त कर रहा था। मेरे पिता जी का पहले ही देहावसान हो चुका था, जबकि मेरी उम्र नौ साल की थी। मेरे सरपरस्त मेरे आदरणीय बड़े भाई साहब थे और इस्लाम के सम्बन्ध में उनके और मेरे विचार एक ही थे। इसलिए इस्लामी शिक्षाओं को ग्रहण करने के बाद उनकी ओर से मेरा विरोध तो क्या होता, बल्कि ईश्वर की कृपा से उनका सदैव सहयोग और संरक्षण ही मुझे मिलता रहा। किन्तु माता जी का मामला इससे बिल्कुल ही भिन्न था। उनके लिए मेरा इस्लाम ग्रहण करना असहनीय था और यह बात भी उनके लिए असहनीय थी कि मैं उनसे बिछड़कर बहुत दूर चला गया था, हालाँकि मौक़ा निकालकर प्रायः मैं घर आता रहता था। स्वाभाविक बात है कि मेरी मनोकामना यही थी कि मेरी प्यारी माँ भी इस नेमत से मालामाल हों। उधर वे इसके लिए विकल थीं कि मैं कितनी जल्द इस्लाम को त्याग दूँ। सच तो यह है कि वे मुझसे अति स्नेह रखने के कारण मेरे इस कार्य से परेशान थीं और एक मानसिक पीड़ा में ग्रस्त हो गई थीं। स्वभावत: ऐसा होना ही चाहिए था। चूँकि इस्लाम की सही शिक्षाएँ उनके सामने न थीं और आम तौर पर मुसलमान जो नमूना अपने आचरण से पेश कर रहे थे, वह भी इस्लाम के अत्यन्त विरुद्ध और भ्रमजनक था तथा इस्लाम के बारे में फैलाई गईं तरह-तरह की ग़लतफ़हमियों से भी वे प्रभावित थीं, इसलिए उनके मन में इस्लाम के प्रति कोई नर्म गोशा न था। मेरे बारे में उनके दिल में तरह-तरह के विचार आते और कभी दूसरों के द्वारा पैदा किए जाते थे, जैसा कि प्रस्तुत ख़त से विदित है। मैं यथासम्भव उनके इन विचारों और उनकी आशंकाओं को दूर करने और उनके सामने इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं को पेश करने की कोशिश करता था। यह कोशिश कभी बातचीत के द्वारा और कभी ख़त के माध्यम से होती।

मेरे जन्म के बाद हमारे ख़ानदानी पंडित जी ने मेरे भविष्य के बारे में अन्य बहुत-सी बातों के साथ मेरी माता जी को यह भी बताया था कि तुम्हारा यह बेटा बड़ा होकर तुम्हारा न रह सकेगा। अत: मेरे सत्य-ग्रहण कर लेने के बाद मेरी माता जी को पंडित जी की यह भविष्यवाणी पूरी होती प्रतीत हुई और उन्होंने कई बार मुझे उसकी याद दिलाकर समझाने की कोशिश की।

मेरी माता जी समझती थीं कि इस्लाम में तो कोई ख़ूबी है नहीं, बल्कि मेरा बेटा दिल्लीवाले मौलाना के बहकावे में आ गया है। इस ख़त में मैंने उनके इस भ्रम और ग़लतफ़हमी को दूर करना चाहा था और साथ ही इस्लाम की ओर उन्हें भी आमंत्रित किया था। क्योंकि मेरी तो मनोकामना और कोशिश ही यह थी कि वे इस्लाम की नेमत से वंचित न रह जाएँ।

इस ख़त को पढ़ने के बाद उनके विरोध में कुछ कमी तो अवश्य आई, किन्तु वे सत्य ग्रहण करने के लिए तैयार न थीं। मैं बराबर उन्हें समझाने की कोशिश में लगा रहा और साथ ही उनके लिए ईश्वर से दुआएँ भी करता रहा। लगभग तीन साल के बाद ईश्वर की कृपा से उन्होंने सत्य को सच्चे दिल से ग्रहण कर लिया। परमेश्वर का लाख-लाख शुक्र है कि मेरी परम आदरणीय माँ जीवन की अन्तिम साँस तक सत्य-धर्म पर क़ायम, उससे सन्तुष्ट और ख़ुश रहीं। यह इस्लाम से उनका हार्दिक लगाव ही था कि पवित्र क़ुरआन जैसे बृहद ग्रन्थ के सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद का वे कई बार अध्ययन कर चुकी थीं। वे नातेदारों और मिलनेवालों को सत्य-धर्म और क़ुरआन की बातें बतातीं और इस्लाम की ख़ूबियाँ उनके सामने रखतीं। उनको यह तड़प थी कि काश लोग इस्लाम को समझने की कोशिश करते तथा इस्लाम के सम्बन्ध में जो ग़लतफ़हमियाँ फैली हुई हैं, उन्हें दूर करने और इस्लाम की प्यारी और मनमोहक बातों को आम लोगों तक पहुँचाने की भरपूर जिद्दोजुहद करते। उन्हें इसकी भी बड़ी चिन्ता थी कि काश! इस्लाम के माननेवाले ये मुसलमान अपने चरित्र और आचरण में, मामलात और रहन-सहन में इस्लाम का चलता-फिरता नमूना बन जाते और इस तरह न केवल वे ख़ुद सफलता प्राप्त करते, बल्कि ईश्वर के आम बन्दों के लिए भी संमार्ग की ओर आने का माध्यम और प्रेरणा-स्रोत बनते।

आह! मेरी प्यारी माँ 1996 ई. में परलोक सिधार गईं।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

"बेशक हम ईश्वर ही के हैं और बेशक हमें उसी की ओर पलटना है।

पालनहार प्रभु उनको मोक्ष प्रदान करे, उनपर दया करे, स्वर्ग में उन्हें दाख़िल करे और परलोक में अर्थात् मौत के बाद आनेवाली ज़िन्दगी में हमें उनसे अच्छी दशा में मिलाए।

इस्लाम माँ-बाप के सम्बन्ध में क्या शिक्षाएँ देता है, इसकी एक झलक लोगों के सामने आ सके और वे इससे फ़ायदा उठा सकें, इस उद्देश्य से इस निजी ख़त को प्रकाशित किया जा रहा है। ईश्वर की कृपा से इस पुस्तिका के हिन्दी और उर्दू में बहुत से एडीशन छप चुके हैं और यह भारत की अनेक भाषाओं के अलावा विदेशों में भी विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है।

ईश्वर से प्रार्थना है कि वह अपने सच्चे धर्म पर हमारे क़दमों को जमाए रखे और जब हमें मौत दे तो इस हालत में कि हम उसके प्रति आस्थावान और उसे समर्पित हों!

-नसीम ग़ाज़ी

'कृपाशील, दयावान ईश्वर के नाम से'

प्यारी अम्मी, सप्रेम आदाब!

ईश्वर करे आप सकुशल हों। काफ़ी दिन हुए आपका प्यार भरा पत्र मिला था, लेकिन कुछ मजबूरियों के कारण समय पर जवाब न दे सका, इसकी माफ़ी चाहता हूँ।

मेरी प्यारी माँ! जिस तरह आपका दिल मेरी याद में तड़पता है, उसी तरह मेरा दिल भी आपकी ममता और स्नेह को याद करता है। मैं अपने आपको उसी प्रकार महसूस करता हूँ जैसे जलते तवे पर कोई दाना। दिल चाहता है उड़कर आपके पास पहुँच जाऊँ, लेकिन शिक्षा की व्यस्तता रोकती है। अगर मुझे दीन की शिक्षा प्राप्त करनी न होती तो आपसे कभी जुदा न होता। दीनी शिक्षा प्राप्त करनी इतनी ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण है कि इसके लिए मैंने आपसे जुदाई गवारा कर ली, परन्तु आपकी याद बराबर आती है और सदैव आपके बारे में सोचा करता हूँ, और सोचूँ भी क्यों नहीं जबकि आपके मुझपर इतने उपकार हैं, जिनको न तो ज़बान से अदा किया जा सकता है और न उनका बदला चुकाया जा सकता है।

मेरी प्यारी अम्माँ! आपकी वे बातें जो समय-समय पर आपके मुँह से निकलती थीं – ““मेरा बेटा मेरे हाथ से निकल गया“”, “मौलाना ने मेरे लाडले को बहका दिया“”, “पंडित जी ने ठीक ही कहा था कि तुम्हारा बेटा तुम्हारा नहीं होगा, बल्कि किसी और का हो जाएगा", ये बातें मेरे दिमाग़ में घूमती रहती हैं और इसकी बड़ी चिन्ता रहती है कि आपको मेरे बारे में ये आशंकाएँ क्यों पैदा हो गई हैं। आपने मेरा कौन-सा अशोभनीय कार्य देखा है जिसके कारण आप मेरे बारे में इन आशंकाओं का शिकार हो गई हैं।

मेरी प्रिय माँ! आपको ये आशंकाएँ केवल इसलिए हुई हैं कि मैंने उस कृपाशील, दयावान ईश्वर को अपना स्वामी और पालनकर्ता बनाया है जिसने मुझे, आपको और सारे संसार को पैदा किया है। जिसने हमें अपना अपार अनुग्रह प्रदान किया। ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए हर प्रकार की सामग्री जुटाई और ज़रूरत का हर सामान दिया। और मैं उसके सन्देष्टा पर भी ईमान लाया हूँ जिसको उसने अपना मार्ग बताने के लिए नियुक्त किया। मैंने यह फैसला किया है कि मैं अपने पूरे जीवन में ईश्वर के आदेशों के अनुसार कार्य करूँगा और ईश्वर के साथ किसी दूसरे को शरीक नहीं करूँगा। मैं ईश्वर को अपना पूज्य, उपास्य, शासक, पालनहार समझता हूँ और इस बात पर विश्वास रखता हूँ कि जब उसने पैदा किया है और जीवन व्यतीत करने का सारा सामान दिया है, अन्न, जल, वस्त्र और हवा आदि चीज़ों का प्रबन्ध किया है, तो हमारे मरने के बाद एक ऐसा दिन लाएगा जिस दिन संसार में हमने जो कुछ कर्म किए हैं, उनका हिसाब लेगा। उन लोगों को जो दुनिया में उसके नियमों पर चले होंगे, स्वर्ग में स्थान देगा और जिन लोगों ने नियमों की अवहेलना की होगी उन्हें नरक में फेंकेगा। बस मेरी प्यारी माँ, मेरा यही दोष है कि मैंने फ़ैसला किया है कि मैं नरक की आग से बचने के लिए और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहूँगा और ईश्वरीय नियमों का पालन करूँगा, उन नियमों का जिनको उसने अपने सन्देशवाहकों द्वारा समय-समय पर सम्पूर्ण दुनिया में भेजा और आख़िर में उन्हीं नियमों को पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के माध्यम से सारे इनसानों की भलाई और कामयाबी के लिए भेजा है। मैंने यह इरादा किया है कि मैं वे तमाम कार्य करूँगा, जिनके करने का हमारे स्रष्टा, स्वामी, पालनहार ईश्वर ने आदेश दिया है और उन कार्यों से रुक जाऊँगा, जिनसे रुकने की उसने ताकीद की है, अर्थात् मैं मुसलमान बनकर जीवन व्यतीत करूँगा। इसलिए कि मुसलमान कहते ही उसे हैं, जो ईश्वर के आदेशों का पालन करे, और उसका कहा माने और इसी कारण मैंने वे तमाम बुराइयाँ छोड़ दी हैं जिनसे ईश्वर ने रोका है। आप जानती हैं कि मुसलमान होने से पहले मेरे अन्दर जितनी ख़राबियाँ थीं, जिन्हें देखकर आप ख़ुद भी दुखी रहती थीं, मुसलमान होने के बाद ईश्वर की कृपा से सब छूट गईं, और ये इसलिए छूटी हैं कि जब ईश्वर ने इनसे रोका है तो मैं इन्हें करने का दुस्साहस कैसे कर सकता हूँ।

मेरी प्यारी अम्माँ! मैंने जिस धर्म (इस्लाम) को अपनाया है उसे ईश्वर ने तमाम मनुष्यों के लिए भेजा है और इसमें पूरे जीवन के लिए आदेश दिए गए हैं। इसी लिए उसने अपनी किताब क़ुरआन में बड़े विस्तार से बता दिया है कि हम उपासना कैसे करें, आपस के मामलों के क्या ढंग होने चाहिएँ, राजनीति में भाग कैसे लें, राज्य कैसे करें, आपस में मेल-मिलाप कैसे रखें, किस शिष्टता और अख़लाक़ के साथ लोगों से मिलें, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, सोने-जागने, चलने-फिरने, ख़ामोश रहने और बोलने, शादी-विवाह, आपसी सम्बन्ध अर्थात् हर बात के बारे में उसने स्पष्ट कर दिया है कि कैसे क्या किया जाए। ईश्वर ने और उसके पैग़म्बर ने हमें साफ़-साफ़ यह भी बता दिया है कि हम अपने माँ-बाप, भाई-बहन, पति-पत्नी, पड़ोसी, दोस्त, दुश्मन या अपने और पराए के साथ किस प्रकार का व्यवहार करें। अब जबकि मैंने यह फैसला कर लिया है कि ईश्वर के बताए हुए रास्ते पर चलूँगा और ठीक उसी प्रकार जीवन व्यतीत करूँगा, जैसे वह चाहता है, तो स्पष्ट है कि माँ-बाप के सम्बन्ध में भी उसी से रहनुमाई हासिल करूँगा और उनके साथ मेरा व्यवहार उसी प्रकार का होगा जिसकी शिक्षा ईश्वर और उसके पैग़म्बर ने दी है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि आपके सामने स्पष्ट कर दूँ कि ईश्वर और उसके पैग़म्बर ने माँ-बाप के साथ किस तरह के व्यवहार का आदेश दिया है। यह बात भी बतानी ज़रूरी है कि माँ-बाप के साथ सद्व्यवहार करने के बारे में जो निर्देश इस्लाम ने दिए हैं उसमें मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम दोनों प्रकार के माँ-बाप शामिल हैं, इस्लाम ने धर्म के आधार पर उनमें कोई फ़र्क़ नहीं किया है।

ईश्वर ने अपनी पवित्र किताब क़ुरआन में अनेक स्थानों पर इस बात का आदेश दिया है कि माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। अर्थात उनसे अच्छे से अच्छे ढंग से पेश आओ। उन्हें परेशान न करो, बल्कि उनका कहना मानो, उनको धन्यवाद दो और इसी बात का आदेश मुसलमानों को ईश्वर के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने भी दिया है। एक अवसर पर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से किसी आदमी ने पूछा, “ईश्वर को कौन-सा काम सबसे अधिक प्रिय है?" हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया, “वह नमाज़ जो नियत समय पर पढ़ी जाए।" उसने पूछा, “इसके बाद कौन-सा कार्य ईश्वर को सबसे ज़्यादा पसन्द है?" फ़रमाया “"माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करना।" इसी प्रकार एक बार हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास एक आदमी आया और उसने कहा कि “मैं हिजरत (ईश्वर के लिए घर-बार छोड़ने) और जिहाद (ईश्वर की राह में प्राण निछावर करने) के लिए आपके हाथ पर बैअत करता हूँ (वचन देता हूँ) और यह केवल पुण्य (सवाब) समझकर कर रहा हूँ।” तो हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उस व्यक्ति से पूछा कि "“क्या तुम्हारे माँ-बाप में से कोई ज़िन्दा है?" उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, "हाँ! ईश्वर की कृपा है कि दोनों ज़िन्दा हैं।” हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उस आदमी को जिहाद और हिजरत करने के बजाय माँ-बाप की सेवा और अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया और बताया कि तुम्हारा जिहाद और हिजरत यही है। इसी प्रकार एक बार ईश्वर के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा कि "“माँ-बाप ही तुम्हारा स्वर्ग हैं और वे ही तुम्हारा नरक।" यानी अगर तुम अपने माँ-बाप का कहना मानोगे, उनकी सेवा करोगे, उनके साथ भलाई और नर्मी से पेश आओगे, उनके कृतज्ञ और आभारी होगे तो स्वर्ग में प्रवेश करोगे। और अगर ऐसा नहीं किया, बल्कि उनकी अवज्ञा की, उन्हें सताया और बुरा-भला कहा तो नरक की भड़कती हुई आग में जाओगे। इसी तरह ईश्वर के पैग़म्बर ने विभिन्न अवसरों पर माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने पर लोगों को उभारा है।

ईश्वर ने एक जगह पवित्र क़ुरआन में कहा है, “अपने माँ-बाप के साथ अच्छे से अच्छा सुलूक करो। अगर माँ-बाप में से कोई एक या दोनों तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें कोई अप्रिय बात न कहो और न उन्हें झिड़को।” अर्थात् उन्हें मारना-पीटना, बुरा-भला कहना, तकलीफ़ देना तो दूर की बात है, उन्हें कोई ऐसी बात भी नहीं कही जा सकती जिसे वे बुरा समझें। अगर वे कभी कोई ऐसी बातें करें जो तुम्हें पसन्द न हों तो उन्हें बरदाश्त और गवारा करो और उन्हें झिड़को मत, उनको हर समय ख़ुश और प्रसन्न रखो, रुष्ट और अप्रसन्न न करो।

एक बार ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा कि “ईश्वर की ख़ुशी बाप की ख़ुशी में है और ईश्वर की नाराज़ी बाप की नाराज़ी में है।” यानी अगर तुम बाप का कहना मानोगे, उनकी आज्ञा का पालन करोगे, उनको प्रसन्न करोगे तो ईश्वर भी प्रसन्न होगा और अगर तुम उनको अप्रसन्न व नाराज़ करोगे तो ईश्वर भी नाराज़ और अप्रसन्न होगा। माँ-बाप को ख़ुश रखने के लिए हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बहुत ज़ोर दिया है, माँ-बाप की दिल व जान से सेवा करने की ताकीद भी की है और उनपर प्राण निछावर करने पर उभारा है और बताया है कि इंसान माँ-बाप की सेवा करके लोक और परलोक में कामयाब हो सकता है। माँ-बाप की सेवा के कारण आदमी को लम्बी आयु और अधिक जीविका मिलती है।

ईश्वर के पैग़म्बर ने बताया है कि अपने माँ-बाप की आज्ञा का पालन करो। जब कोई काम करो चाहे वह कितना ही महान और बड़ा हो, अपने माँ-बाप से आज्ञा ले लो। माँ-बाप का आज्ञापालन स्वर्ग के दरवाज़ों को खोलता है, यानी जो उनकी आज्ञा का पालन दिल से करेगा उसके लिए स्वर्ग के दरवाज़े खुल जाएँगे और वह उनमें प्रवेश करेगा और जो उनका कहना नहीं मानेगा, उनकी आज्ञा का पालन करने से मुख मोड़ेगा, वह नरक में जाएगा।

 

ईश्वर ने अपनी पवित्र किताब क़ुरआन में निर्देश दिया है कि माँ-बाप से अच्छी बात करो, उनके साथ मान-सम्मान से पेश आओ। ऐसा न हो कि तुम उनका सम्मान न करो और सख़्त बात करो, बल्कि उनके पास नम्रतापूर्वक आओ, उनके सामने बड़े न बनो।

एक बार ईश्वर के दूत हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के एक मित्र हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपने एक दोस्त से कहा कि अगर तुम अपने माँ-बाप के साथ नम्रता से बातचीत करोगे, उनके खाने-पीने का ख़्याल रखोगे तो स्वर्ग में अवश्य जाओगे, बशर्ते कि तुम गुनाहे-कबीरा अर्थात बड़े गुनाहों से बचते रहो। इसी प्रकार पैग़म्बर के एक और साथी हज़रत अबू-हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने एक आदमी से कहा कि तुम न तो अपने बाप का नाम लेना और न उनसे आगे चलना और न उनसे पहले बैठना। इसी प्रकार बहुत-सी जगहों पर माँ-बाप के साथ मान-सम्मान और आदर-सत्कार का आदेश दिया गया है।

ईश्वर के सन्देष्टा हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने माँ-बाप से प्रेम करने को बड़ा श्रेष्ठ कर्म बताया है और उसका बड़ा सवाब (पुण्य) बताया है। अगर कोई सदाचारी औलाद अपने माँ-बाप पर प्रेम भरी एक नज़र भी डाले तो ईश्वर उसको स्वीकृत हज के बराबर बदला देता है।

ईश्वर ने अपनी किताब में आदेश दिया है कि माल के सबसे ज़्यादा हक़दार माँ-बाप हैं। इंसान के पास जो धन-दौलत है वह उसे अनेक कामों में ख़र्च करता है। ईश्वर के नज़दीक सबसे अधिक हक़दार माँ-बाप हैं कि उनकी धन-दौलत से सहायता की जाए, उनके बाद किसी और को कुछ दिया जाए। माँ-बाप पर दिल खोल कर ख़र्च करने और कंजूसी न करने के बारे में एक क़िस्सा आता है, जिसे सुनकर या पढ़कर दिल भर आता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

एक बार हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास एक आदमी आया और उसने अपने बाप की शिकायत की कि वे जब चाहते हैं मेरा माल ले लेते हैं। हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उस आदमी के बाप को बुलाया। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बुलाने पर एक कमज़ोर बूढ़ा आदमी लाठी टेकता हुआ आया। हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उस बूढ़े आदमी से पूछा तो उसने कहा, “ऐ ईश्वर के पैग़म्बर! एक समय था जब यह कमज़ोर और बेबस था और मुझमें शक्ति थी। मैं मालदार था और यह ख़ाली हाथ और निर्धन था। मैंने कभी अपनी चीज़ लेने से इसे नहीं रोका। आज मैं कमज़ोर हूँ और यह शक्तिशाली और ताक़तवर है। मैं ख़ाली हाथ हूँ और यह मालदार। अब यह अपना माल मुझसे बचा-बचाकर रखता है।“ बूढ़े की यह बात सुनकर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रो पड़े और बूढ़े के लड़के से कहा, “तू और तेरा माल तेरे बाप का है।“

पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के इस कथन से साफ़ स्पष्ट हो गया कि इंसान जो कुछ है या उसके पास जो कुछ है वह सब उसके माँ-बाप के आशीर्वादों, कोशिशों और उनके प्रयास व प्रयत्न के ही कारण है। इसलिए उसे स्वयं भी अपने माँ-बाप के अधीन रहना चाहिए, उनके आज्ञापालन की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए और अपना माल भी अपने माँ-बाप पर ख़र्च करना चाहिए और उन्हें लेने से भी नहीं रोकना चाहिए।

पवित्र क़ुरआन में एक जगह है कि माँ-बाप के लिए ईश्वर से प्रार्थना भी करनी चाहिए कि ऐ पालनहार! ऐ हमारे प्रभु! उनपर दया कर। उन्होंने हमारे लिए बड़ी कठिनाइयाँ झेली हैं। हमारा पालन-पोषण बड़ी मेहनत से किया है। इसलिए तू भी उनपर अपनी बहुत-बहुत कृपा कर।

चूँकि माँ ने बाप से अधिक कठिनाइयाँ उठाई हैं, इसलिए माँ इस बात की अधिक हक़दार है कि बाप से ज़्यादा उसके साथ अच्छा व्यवहार किया जाए। ईश्वरीय ग्रन्थ क़ुरआन में इसके बारे में भी बताया गया है और दया स्वरूप हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने भी स्पष्ट कर दिया है कि बाप के मुक़ाबले में माँ सेवा की ज़्यादा हक़दार है। एक आदमी ने हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछा कि ““मेरे अच्छे व्यवहार का सबसे अधिक हक़दार कौन है?“ तो ईश्वर के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया, “तेरी माँ।”“ उस आदमी ने कहा कि ““फिर कौन है?'' पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जवाब दिया, "तेरी माँ।”“ उस आदमी ने कहा कि ““फिर कौन है?" हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा, “तेरी माँ।" उस आदमी ने चौथी बार पूछा कि ““फिर कौन है?” हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा, “तेरा बाप।“

इसी प्रकार एक अवसर पर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि ““स्वर्ग माँ के पैरों के नीचे है।“ अर्थात् यदि तुम माँ की सेवा दिल व जान से करोगे, उनके साथ अच्छा व्यवहार करोगे, उन्हें प्रसन्न रखोगे तो स्वर्ग में जाओगे। अर्थात् उनकी सेवा करके तुम स्वर्ग पा सकते हो। इसी प्रकार अनेक जगहों पर माँ की सेवा का विशेष रूप से उल्लेख है।

अगर माँ-बाप में से किसी एक या दोनों की मृत्यु हो जाए, उस अवस्था में भी ईश्वर और उसके सन्देष्टा ने आदेश दिया है कि उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहें कि ऐ प्रभु! तू उन्हें क्षमा कर, उन्हें आराम में रख और स्वर्ग में दाख़िल कर।

ईश्वर ने जहाँ माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने, उनकी सेवा और आज्ञापालन करने, उनको आराम पहुँचाने की ताकीद की है, वहीं उसने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अगर माँ-बाप तुम्हें उन बातों का आदेश दें जिनसे ईश्वर ने रोका है तो उस समय माँ-बाप की बात न मानो। होना भी यही चाहिए। स्पष्ट है कि अगर माँ-बाप अवैध और ग़लत बात का आदेश देंगे तो उसे कैसे माना जाएगा? हाँ, सही और सत्य बात में उनका पूर्ण आज्ञापालन किया जाएगा।

मेरी प्यारी माँ! मैं पहले कह चुका हूँ और फिर अर्ज़ कर रहा हूँ कि मैंने यह फ़ैसला किया है कि मैं वही काम करूँगा जिनका आदेश ईश्वर या उसके सन्देष्टा ने दिया है। इसी लिए मैं माँ-बाप के साथ भी वही व्यवहार करूँगा जो उसने करने को कहा है। और माँ-बाप के बारे में उसने जो आदेश दिए हैं, वे मैंने आपके सामने रख दिए हैं और इन्हीं पर मैं अमल करने की कोशिश करूँगा। मुझे आशा है कि अगर आप ध्यानपूर्वक इन बातों को पढ़ेंगी और इनपर विचार करेंगी और यह समझेंगी कि मेरा बेटा जो कह रहा है वह सत्य है तो आप अवश्य ही पुकार उठेंगी कि नहीं, नहीं! मेरा यह ख़्याल ग़लत है कि ““मेरे बेटे को मौलाना ने बहका दिया है, अब वह मेरा नहीं रहा”, बल्कि मौलाना ने तो उसे मेरा बेटा बना दिया और कभी न जुदा होनेवाला जिगर का टुकड़ा बना दिया है। उसे बहकाया नहीं, बल्कि सत्य-मार्ग पर लगा दिया है। और पंडित जी का कहना सरासर ग़लत और बेबुनियाद है कि “यह आप का नहीं होगा।"

मेरी अच्छी माँ! आप विश्वास रखिए कि मैं आपका हूँ और आपका ही रहूँगा। आप दिल से बिल्कुल ही उन आशंकाओं को निकाल फेंकिए जो आपके दिल में जगह पकड़ गई हैं।

मैंने पहले भी आपको बताया था कि इस्लाम ही केवल वह धर्म है जो मानव-जाति को सत्य-मार्ग दिखाता है। यह धर्म ईश्वर की ओर से भेजा हुआ है जिसमें जीवन के हर क्षेत्र के लिए आदेश दिए गए हैं। इस्लाम धर्म का यह पहलू जो माँ-बाप से सम्बन्ध रखता है, आपके सामने है। इसपर विचार करने से आप अच्छी तरह समझ सकती हैं कि इस्लाम कैसा धर्म है। इसकी शिक्षाएँ कितनी मूल्यवान, ठोस और उचित हैं। बस यूँ समझ लीजिए कि इसी प्रकार के आदेश जीवन के हर मामले में दिए गए हैं और मनुष्य का पथ-प्रदर्शन किया गया है।

मेरी प्यारी माँ! आपने मेरी देखभाल और पालन-पोषण के लिए कितने कष्ट उठाए हैं, कितनी मुसीबतें और कठिनाइयाँ झेली हैं इसका मुझे पूरा एहसास है। आपने मेरे लिए दु:ख उठाए हैं, मुझे महीनों पेट में लिए-लिए फिरीं और वे तमाम कष्ट उठाए जो उस समय पेश आए जब मैंने इस दुनिया में क़दम रखा। मैं गोश्त का एक लोथड़ा था, बिल्कुल बेबस और मजबूर। लेकिन आपने मांस के इस टुकड़े का दिल व जान से पालन-पोषण किया। मैं कुछ बड़ा हुआ तो मेरी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध किया और मेरे सुधार की चिन्ता की। मैं अगर बीमार पड़ा तो आप बेचैन हो गईं। मेरे लिए रातों की नींद और दिन का आराम निछावर किया। मुझे अच्छे से अच्छा खिलाया और कितने ही अवसर पर स्वयं भूखी रहीं। मुझे अच्छे से अच्छा पहनाया और स्वयं मोटा-झोटा पहनकर रहीं। सचमुच आपके मुझपर कितने उपकार हैं, ज़बान बयान करने में असमर्थ है। इन उपकारों का बदला तो क्या धन्यवाद का हक़ भी अदा नहीं किया जा सकता। तभी तो ईश्वर ने क़ुरआन में माँ के साथ विशेष रूप से आदर-सत्कार और सेवा का आदेश दिया है।

ऐ मेरी माँ! आपने मुझे दुनिया में आराम पहुँचाया है। मैं दुनिया में तो आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ, परन्तु मेरी अभिलाषा और दिली इच्छा है कि आपको मृत्यु के बाद आनेवाले जीवन में जो कि सदैव रहनेवाला जीवन है, पूर्ण सुख मिले, जिसका प्रारंभिक कारण मैं बन सकूँ। आपको वह रास्ता बताऊँ जिसपर चलकर परलोक में सदा का आराम और सदैव का सुख है— वह रास्ता इस्लाम ही है। इसी पर चलकर दुनिया में कामयाबी और परलोक में मुक्ति और प्रभु का सामीप्य प्राप्त हो सकता है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप भी इसी मार्ग को अपनाएँ और इसी के अनुसार जीवन व्यतीत करें। घर पर अनेक बार मैंने आपको समझाया और इस तरफ़ बुलाया है, लेकिन आपने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। हालाँकि आप जानती हैं कि मैं आपसे कोई बदला नहीं चाहता और न मुझे कोई और सांसारिक लोभ है, बल्कि मेरी दिली इच्छा है कि मैं अपनी माँ को उस भड़कती हुई आग से बचा लूँ जो मुझे दिखाई दे रही है, और आप जिस मार्ग पर चल रही हैं वह मार्ग आपको उसी आग की तरफ़ ले जा रहा है, लेकिन आपको इसका एहसास नहीं। अर्थात् आप एक ट्रेन पर सवार हैं, वह गाड़ी जिस मार्ग से जानेवाली है उसमें एक पुल ऐसा भी है जिसपर पटरियाँ उखड़ी पड़ी हैं।  मुझे इसकी जानकारी है और मैं यह अच्छी तरह समझ रहा हूँ कि यह ट्रेन मंज़िल तक पहुँचने के बजाय रास्ते ही में उलट जाएगी और इसके सब यात्री घायल हो जाएँगे या मृत्यु के घाट उतर जाएँगे, और मेरे पास एक ख़ूबसूरत सी कार है जो मुझे आसानी से मंज़िल पर पहुँचा देगी। मैं बार-बार हर स्टेशन पर आपके पास जाता हूँ और पुकार-पुकारकर कहता हूँ, “ऐ मेरी माँ, उतर आइए इस ट्रेन से, उतर आइए, यह रास्ते में उलट जानेवाली है। चली आइए मेरी कार में, इसी में भलाई है।" लेकिन अफ़सोस आप हैं कि बराबर इंकार किए जा रही हैं, मैं हूँ कि बराबर बुला रहा हूँ। तो अगर आप वह ख़तरनाक पुल (मौत) आने से पहले-पहले मेरी कार में आ जाती हैं और ट्रेन छोड़ देती हैं तो आप सकुशल मंज़िल तक पहुँच जाएँगी, वरना पुल आते ही दूसरे लोगों के साथ आप भी हलाक हो जाएँगी। और उस समय कहेंगी कि काश, मैंने अपने बेटे की बात पर ध्यान दिया होता और उसकी कार में बैठ गई होती! अतः आप जीवन की जिस गाड़ी पर सवार हैं वह रास्ते में उलट जानेवाली है और मंज़िल तक नहीं पहुँचाएगी। और अगर आप उस गाड़ी पर आ गईं जिसपर मैं सवार हूँ, यानी इस्लाम की गाड़ी, तो कुशलतापूर्वक पहुँच जाएँगी।

ये मेरी कुछ भावनाएँ हैं जो दिल में उमड़ रही हैं, जो मैंने आपके सामने पेश कर दी हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह आपके दिल में ये बातें उतार दे और आपको सही मार्ग पर चलाए ताकि आप मृत्यु के पश्चात् आनेवाली हमेशा की ज़िन्दगी में उसकी दया और कृपा की पात्र बन सकें। और इस तरह हम सब स्वर्ग में एक साथ रहने के हक़दार बन जाएँ जैसा कि क़ुरआन में परमेश्वर ने यह ख़ुशख़बरी दी है कि ईश्वर को माननेवाले और उसके आदेशों के अनुसार ज़िन्दगी गुज़ारनेवाले लोग अपने “सदाचारी माँ-बाप और बीवी-बच्चों के साथ सदैव स्वर्ग में एक साथ रहेंगे।" (13:23)

मुझे आशा है कि आप मेरी बातों पर गंभीरता के साथ ज़रूर विचार करेंगी। मैं यक़ीन दिलाता हूँ कि मैं आपके साथ कभी विश्वासघात नहीं कर सकता।

आपका आज्ञाकारी बेटा

-नसीम ग़ाज़ी

स्रोत

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