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इस्लामी शरीअत आधुनिक काल में  (शरीअत : लेक्चर# 11)

इस्लामी शरीअत आधुनिक काल में (शरीअत : लेक्चर# 11)

डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी

अनुवादक : गुलज़ार सहराई

आधुनिक काल से अभिप्रेत आज की चर्चा के सन्दर्भ में चौदहवीं शताब्दी हिजरी के आरम्भ से लेकर आज तक यानी चौदह सौ तीस तक का ज़माना है। यह एक सौ तीस साल का अन्तराल मुस्लिम जगत् में एक कड़े मानसिक संघर्ष और राजनैतिक ऊहापोह का दौर है। इस लम्बी अवधि में वह कार्य दोबारा जारी हुआ, और दोबारा ज़िन्दा हुआ, जो अतीत में तातारियों के हमले और बग़दाद के पतन के बाद देखने में आया था। चौदहवीं शताब्दी हिजरी का जब आरम्भ हुआ तो मुस्लिम जगत् पश्चिम से पूरब तक सख़्त परेशानियों और मुश्किलों का शिकार था। सच तो यह है कि यह अन्तराल मुस्लिम जगत् के लिए अत्यन्त मुश्किलों का दौर समझा जाता है। और सच यह है कि सांसारिक पतन की दृष्टि से, राजनैतिक दुर्बलता, सैन्य असफलता और आर्थिक बदहाली के दृष्टिकोण से चौदहवीं शताब्दी हिजरी के आरम्भ का ज़माना मुस्लिम जगत् के लिए अत्यन्त कठिन दौर था। पश्चिमी शक्तियाँ एक-एककर विभिन्न इस्लामी देशों पर क़ब्ज़ा कर चुकी थीं। मुस्लिम जगत् का अधिकांश भाग प्रत्यक्ष रूप से पश्चिम के सैन्य क़ब्ज़े का शिकार था। आज़ाद मुस्लिम देश नाम मात्र थे। कुछ छोटे-छोटे राज्य इसलिए स्थानीय तौर पर आज़ाद समझे जाते थे कि या तो विभिन्न पश्चिमी शक्तियों का हित इसमें था कि इन इलाक़ों को आन्तरिक रूप से आज़ाद रहने दिया जाए, या विभिन्न पश्चिमी शक्तियों की आपस की कश्मकश ने सामयिक रूप से कुछ शासकों को आज़ाद राज्य की हैसियत से शासन का मौक़ा दे दिया था। उस ज़माने में मुस्लिम जगत् का सबसे बड़ा राज्य यानी सल्तनते-उस्मानिया तेज़ी से पतन का शिकार थी। उसको यूरोप का मर्दे-बीमार क़रार दिया जाता था। उसके यूरोपी अधिकृत क्षेत्र एक-एककर उसके हाथ से निकल रहे थे। यूरोप की तमाम बड़ी शक्तियों ने सल्तनते-उस्मानिया के ख़िलाफ़ गठबन्धन कर रखा था। न केवल गठबन्धन कर रखा था, बल्कि इस बात पर भी मतैक्य कर रखा था कि सल्तनते-उस्मानिया के पतन के बाद उसके कौन-कौन से अधिकृत क्षेत्र किन-किन पश्चिमी शक्तियों के हिस्से में आएँगे।

दूसरी तरफ़ वह उपनिवेशवादी आन्दोलन जिसका आरम्भ कमो-बेश डेढ़ दो सौ साल पहले हो चुका था, मुस्लिम जगत् पर पूरी तरह क़ाबिज़ हो चुका था। उपनिवेशवाद के दमनकारी पंजे में पूरा मुस्लिम जगत् कराह रहा था, मुस्लिम जगत् के संसाधन पश्चिमी जगत् के आर्थिक विकास के लिए प्रयुक्त हो रहे थे, मुस्लिम जगत् की हैसियत पश्चिमी देशों की पैदावर के लिए एक मार्केट और बाज़ार से ज़्यादा न थी।

यह पतन जिसकी निशानियाँ ज़िन्दगी के हर क्षेत्र में नज़र आ रही थीं, कब से शुरू हुआ? और इसके कारण क्या थे? इस्लामी इतिहास पर अगर ग़ौर किया जाए, विशेष रूप से शरीअत के लागू होने के सन्दर्भ में अगर देखा जाए तो अन्दाज़ा होता है कि यह पतन दसवीं शताब्दी हिजरी के बाद शुरू हुआ। और समय के साथ-साथ बढ़ता चला गया। दसवीं शताब्दी हिजरी (सोलहवीं शताब्दी ईसवी) तक का ज़माना हम कह सकते हैं कि इस्लामी शरीअत पर कार्यान्वयन और इस्लामी सभ्यता के उत्थान का ज़माना है। एक हज़ार साल का यह दौर मुस्लिम जगत् के नेतृत्व का दौर है। वैचारिक नेतृत्व मुसलमानों के हाथ में है, साभ्यतिक मार्गदर्शन का पर्चम मुसलमानों के हाथ में है, और थोड़ी बहुत क्षेत्रीय कमज़ोरियों के बावजूद जिनकी निशानियाँ जगह-जगह देखने में आती रहती थीं, समष्टीय रूप से मुस्लिम जगत् की दिशा उत्थान की ओर थी और मुसलमानों की शक्ति और राजनैतिक वर्चस्व का आभास पूरी दुनिया को था और सब इसे स्वीकार करते थे। व्यापार मुसलमानों के हाथ में था और प्रचलित सिक्का जिसको मुसलमान अपने वैचारिक और साभ्यतिक टकसाल में ढालते थे, दुनिया के बाज़ारों में चलता था। वैचारिक, ज्ञानपरक और लेखन सम्बन्धी मैदान में मुसलमानों के नेतृत्व को दुनिया के अधिकांश देश, सभ्यताएँ और शासक वर्ग सब स्वीकार कर रहे थे।

दसवीं शताब्दी हिजरी (सोलहवीं शताब्दी ईसवी) के बाद से मुसलमानों में वैचारिक पतन की प्रक्रिया शुरू हुई। पहले मरहले में विचार और सभ्यता में एक ठहराव की कैफ़ियत महसूस हुई, यह ठहराव वह था जिसमें मुस्लिम जगत् का वैचारिक विकास रुक चुका थी और जो कुछ प्राप्त हो चुका था अब उसी को पढ़ने-पढ़ाने में अधिकांश मुसलमान विद्वान लगे रहे। बौद्धिकता के मैदान में जो कुछ यूनानियों ने सिखाया था अब मात्र उसी को दोहराने को पर्याप्त समझा जाने लगा और उसको नए-नए ढंगों और नई-नई शैलियों में बयान करना बौद्धिकता का चरम बिन्दु समझा जाता था।

दीनी उलूम (धार्मिक ज्ञान) तफ़सीर, हदीस, फ़िक़्ह और उसूले-फ़िक़्ह के मैदानों में जो काम सातवीं-आठवीं शताब्दी हिजरी तक हो गया था उसमें कोई उल्लेखनीय पहल कुछ अपवादों के सिवा नज़र नहीं आती थी। उपमहाद्वीप के शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी (रह॰) एक अपवाद हैं। शेख़ अहमद सरहिन्दी (रह॰) एक अपवाद हैं। इसी तरह से अरब जगत् में, अरब से बाहर कुछ बहुत नुमायाँ व्यक्तित्व पैदा हुए। बौद्धिकता के मैदान में मुल्ला सद्र एक अपवाद की हैसियत रखते हैं, लेकिन इन अपवाद मिसालों के अलावा जिनकी संख्या बहुत कम है मुस्लिम जगत् में जो उमूमी प्रवृत्ति पाई जाती थी, वह एक ठहराव की प्रवृत्ति थी, जिसमें इस बात की निशानदेही स्पष्ट रूप से मौजूद थी कि वैचारिक विकास और ज्ञानपरक विकास की यह प्रक्रिया अब रुक गई है। और बहुत जल्द यह पानी stagnation (ठहराव) का शिकार हो जाएगा, इस पानी में सड़ांध पैदा हो जाएगी और इसका बहाव चूँकि रुक गया है इसलिए अब यह ज़िन्दगी का वह मूलस्रोत और उद्गम नहीं बन सकेगा जिस तरह से अतीत में रहा था।

यही वह ज़माना था जब तक़लीद (अन्धानुकरण) का रवैया मुस्लिम जगत् में बहुत मज़बूत हुआ। तक़लीद को समझने में बाद के विद्वानों से कुछ ग़लतियाँ हुई हैं। तक़लीद का एक अर्थ तो यह है कि शरीअत के किसी आदेश, या किसी इज्तिहाद, या किसी फ़तवे के सन्दर्भ में एक ग़ैर-फ़क़ीह और ग़ैर-मुज्तहिद किसी मुज्तहिद की राय पर इसलिए अमल करे कि वह ख़ुद इज्तिहाद का अमल अंजाम नहीं दे सकता। इसलिए जिस व्यक्ति के ज्ञान और तक़्वा पर उसको विश्वास है उस विश्वास की वजह से उसकी बात को बिना दलील के स्वीकार कर लिया जाए। इस हद तक तक़लीद का अमल मुसलमानों में पहले दिन से रहा है। प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) में हर व्यक्ति मुज्तहिद नहीं था। प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) की बड़ी संख्या दूसरे विद्वानों के इज्तिहाद और फ़तवे पर अमल किया करती थी। ताबिईन (सहाबा के बाद का दौर ) में बड़ी संख्या दूसरे विद्वानों ताबिईन के इज्तिहाद और फ़तवे पर अमल किया करती थी। इसलिए विशुद्ध शरीअत और फ़िक़्ह के मामलात में, पवित्र क़ुरआन और सुन्नत की समझ के मामले में इन सीमाओं के अनुसार और इस हद तक तो तक़लीद आरम्भ से रही है, लेकिन जिसको मैं यहाँ इस चर्चा के सन्दर्भ में तक़लीद कह रहा हूँ उससे मुराद यह है कि हर ज्ञान एवं कला से सम्बन्धित लेखक की बात बिना किसी आलोचना और पड़ताल के स्वीकार कर ली जाए। और इस बात के सत्यपरक होने के लिए यह दलील काफ़ी समझी जाए कि हमसे पहले अमुक लिखनेवाले ने इस तरह लिख दिया है, चाहे उसका ज्ञान और बुद्धि, उसका दीन और तक़्वा भरोसे के क़ाबिल हो या न हो।

जब तक़लीद और ज्ञान सम्बन्धी अनुपालन का यह स्वभाव पैदा हो गया तो यह स्वभाव बौद्धिकता में भी पैदा हुआ, विशुद्ध प्रयोगिकता में भी सामने आया, ज्ञान-विज्ञान के हर विभाग में सामने आया। चुनाँचे बौद्धिकता में यूनानियों का अन्धानुकरण शुरू हो गया। किसी बात के बुद्धिपरक और स्वीकार्य होने के लिए यह काफ़ी था कि अरस्तू ने कहा है या अफ़लातून ने कहा है, या अमुक यूनानी हकीम ने कहा है, यहाँ तक कि मेडिकल जैसे विशुद्ध प्रायोगिक ज्ञान में भी जिसका सम्बन्ध अनुभव से है, जिसका सम्बन्ध इंसान के अपने अवलोकन और अनुभव से है। जिसका अनुभव क्षेत्र के बदलने से बदल सकता है, मौसम के बदलने से बदल सकता है, व्यक्ति के बदलने से बदल सकता है। वहाँ एक परिकल्पना को मात्र इसलिए स्वीकार कर लेना कि अरस्तू ने कहा है, या जालीनूस ने कहा है, कोई गर्व योग्य ज्ञानपरक सोच का ढंग न था। जब ऐसा हुआ तो इससे मेडिकल के विकास पर असर पड़ा।

यही कुछ बौद्धिकता के मैदान में हुआ। यूनानियों की अनगिनत ख़ुराफ़ात, अन्धविश्वास और फुज़ूलियात को बहुत-से विद्वानों ने केवल इसलिए स्वीकार कर लिया कि वे यूनानियों से जुड़े थे। यही हाल शेष लोगों के साथ हुआ। इसका नतीजा यह निकला कि वे मुसलमान, जो अपने स्वतंत्र बौद्धिक मापदंड और तर्कशक्ति के साथ तार्किकता के मामले में शासक बन बैठता था, कि तार्किकता में क्या बात स्वीकार्य है और क्या बात अस्वीकार्य है, जो आज़ादाना रवैया इमाम ग़ज़ाली (रह॰), इमाम राज़ी (रह॰) और इमाम इब्ने-तैमिया (रह॰) का था वह ख़त्म हो गया। अब यह बात काफ़ी थी कि अमुक ने लिख दी है। यह बात बौद्धिकता में भी सामने आई। जब ऐसा हो जाए तो फिर सोच का विकास रुक जाता है, और पतन का आरम्भ शुरू हो जाता है।

दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी हिजरी तक यह रवैया और ढंग मुसलमानों में आम हो गया। यह वह ज़माना था जब पश्चिम जगत् में परिवर्तन की एक ताक़तवर और नई लहर जन्म ले रही थी, धर्म एवं संस्कृति में बड़े-बड़े परिवर्तन सामने आ रहे थे, ज्ञान-विज्ञान पर नए ढंग से ग़ौर किया जा रहा था, औद्योगिक क्रान्ति उभर रही थी, विज्ञान और प्रयोगात्मक ज्ञान के नए-नए रूप सामने आ रहे थे, पूरी दुनिया में उनका व्यापार फैल रहा था, समुद्री शक्ति फिर पश्चिमी हाथों में स्थानान्तरित हो रही थी, पुर्तगाल और स्पेन के समुद्री बेड़े दुनिया के चप्पे-चप्पे का जायज़ा ले रहे थे, यूरोप के शोधकर्ता संसार के चप्पे-चप्पे पर शोध कर रहे थे। ज़ाहिर है कि शोध की प्रक्रिया अन्धानुकरण के नतीजे में क़ायम नहीं हो सकती। शोध और अन्धानुकरण, दोनों परस्पर विरोधी चीज़ें हैं। एक ओर तक़लीद (अन्धानुकरण) की इंतिहा थी, दूसरी तरफ़ तहक़ीक़ (शोध) की इंतिहा थी। नतीजा यह निकला कि मुसलमान वैचारिक दृष्टि से सिकुड़ना शुरू हो गए और पश्चिम वैचारिक दृष्टि से फैलना शुरू हुआ। इस वैचारिक फैलाव के नतीजे में साभ्यतिक फैलाव भी हुआ। पश्चिम की धारणाएँ मुस्लिम जगत् में फैलनी शुरू हुईं। इसके नतीजे में पहले पश्चिम की सभ्यता हावी हुई, फिर पश्चिम से प्रभावित होना आरम्भ हुआ, फिर सभ्यता के हावी होने और पश्चिम से प्रभावित होने के नतीजे में राजनैतिक वर्चस्व पैदा हुआ, आख़िरकार आर्थिक और कलात्मक विकास के नतीजे में सैन्य वर्चस्व सामने आया। पश्चिमी दुनिया ने वैज्ञानिक विकास से काम लेकर अपनी सैन्य शक्ति को मज़बूत बनाया, संचार माध्यमों को बेहतर बनाया। और यों इस पूरी दुनिया पर कंट्रोल प्राप्त करने में उसने ज्ञान एवं कला से काम लिया।

यह सिलसिला दो सौ वर्ष के लगभग जारी रहा। इन दो सौ सालों में मुसलमानों के बड़े सुल्तानत तीन थे। एक तुर्की, दूसरा मिस्र, तीसरा मुग़ल भारत। अगरचे भारत में मुसलमानों की आबादी स्थानीय आबादी के मुक़ाबले में बहुत कम थी। मुसलमान बहुसंख्या में नहीं थे। लेकिन संख्या की दृष्टि से तुर्कों से भी ज़्यादा थे। और मिस्रियों से भी ज़्यादा थे। फिर वैचारिक दृष्टि से उपमहाद्वीप के मुसलमान बहुत नुमायाँ रहे हैं और अपने अस्तित्व का एहसास उनमें बहुत तीव्र रहा है। इसलिए उपमहाद्वीप के मुसलमानों का अकैडमिक काम अनेक पहलुओं से अत्यन्त महत्त्व रखता है। इस दौर के इतिहास को समझने के लिए यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है कि भारत या दक्षिण एशिया के मुसलमानों ने इस दौरान क्या सोचा, उन्होंने इस पूरे दौर में क्या रवैया अपनाया? और मामलात को किस दृष्टिकोण से देखा? तुर्की की सल्तनत उस ज़माने में मुस्लिम जगत् की सबसे बड़ी सल्तनत थी । जो पूर्वी यूरोप के बहुत-से इलाक़ों पर सम्मिलित था। मध्य पूर्व के बहुत-से देश तुर्की का हिस्सा  जो सल्तनते-उस्मानिया के राज्य की हैसियत रखते थे। इसी तरह उत्तरी अफ़्रीक़ा के बहुत-से इलाक़े कम-से-कम वैचारिक रूप से तुर्की का हिस्सा थे। इसलिए तुर्कों का अनुभव पूरे मुस्लिम जगत् पर प्रभावी हुआ। अगर किसी मैदान में तुर्कों को सफलता हुई तो वह मुस्लिम जगत् की सफलता थी। अगर कहीं तुर्कों को असफलता हुई तो वह मुस्लिम जगत् की असफलता थी।

जिस ज़माने में पश्चिमी जगत् में यह परिवर्तन जारी थे और इसके नतीजे में मुस्लिम जगत् इससे प्रभावित हो रहा था, तो मुस्लिम जगत् में विशाल स्तर पर कुछ लोगों को यह ख़याल पैदा हुआ कि मुस्लिम जगत् के इस पतन और गिरावट की प्रक्रिया को रोका जाए और पश्चिमी दुनिया के मुक़ाबले में मुस्लिम जगत् की आज़ादी और दृढ़ता को बरक़रार रखने के लिए दूरगामी कार्य किए जाएँ। यह एहसास मिस्र में भी पैदा हुआ, तुर्की में भी पैदा हुआ, मध्य पूर्व के कई देशों मैं पैदा हुआ।

इस एहसास को व्यावहारिक रूप देना, उसको एक आन्दोलन में बदलना और उसके आधार पर सुधार की कोशिश करना विद्वानों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों तथा सत्ताधारियों की ज़िम्मेदारी थी। अलबत्ता यहाँ सर्वप्रथम और मौलिक ज़िम्मेदारी इस्लामी विद्वानों की थी। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि ग्यारहवीं शताब्दी हिजरी से लेकर तेरहवीं शताब्दी हिजरी के आख़िर तक तुर्की के प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान विशेष रूप से और मुस्लिम जगत् के उलमा आम तौर से, इन चैलेंजों से निबटने में सफल नहीं हुए। उनकी बड़ी संख्या ने न केवल इस ज़रूरत का एहसास नहीं किया, बल्कि जनसाधारण की सुधार-भावना और असफलता के एहसास को भी पसन्दीदा नज़रों से नहीं देखा। यों असफलता की यह प्रक्रिया जारी रही और अपने चरम तक जा पहुँची। यह असफलता पूरे मुस्लिम जगत् की असफलता थी, लेकिन सबसे पहले यह प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों की असफलता थी।

इन परिस्थितियों में तुर्की के कुछ शासकों को यह ख़याल हुआ, जिसमें बहुत-से लोग उनके साथ शरीक थे कि तुर्की की शासन व्यवस्था को, फ़ौज की व्यवस्था को, ब्यूरोक्रेसी के और स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था को सुख-शान्ति के लिए काम करनेवाली एजेंसियों को एक नए ढंग से संगठित किया जाए और इस नए संगठन में पश्चिमी देशों के अनुभवों से लाभ उठाया जाए। चुनाँचे जर्मनी और फ़्रांस के अनुभवों से फ़ायदा उठाए जाने की बात की जाने लगी। यहाँ तुर्की के प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों का यह कर्त्तव्य था कि वह सामने आते और तुर्क क़ौम का नेतृत्व और उस्मानी ख़ुलफ़ा का मार्गदर्शन करते  कि शरीअत के उद्देश्यों और लक्ष्य के दृष्टिकोण से वे कौन-से परिवर्तन हैं जो शासन व्यवस्था में आने चाहिएँ और वे कौन-से परिवर्तन हैं जो कुछ लोगों के ख़याल में व्यावहारिक हैं, लेकिन शरीअत के दृष्टिकोण से आपत्तिजनक हैं, अत: उनसे बचा जाए। यह एक दुखद वास्तविकता है कि प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों ने न केवल यह कि ऐसी कोई कोशिश नहीं की, बल्कि समष्टीय रूप से संगठनों की पूरी प्रक्रिया का विरोध किया। संगठनों के समर्थन और विरोध का यह सिलसिला एक अर्से तक जारी रहा। वह वर्ग जो प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों के मार्गदर्शन से सन्तुष्ट नहीं था, उसकी संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि हो रही थी, और इस अविश्वास एवं असन्तोष के कुछ कारण भी थे।

इन हालात में तुर्की के शासक वर्ग ने संगठनों का एक नक़्शा संकलित किया। इस नक़्शे के अनुसार बहुत-से परिवर्तन तुर्की में किए जानेवाले थे। इन परिवर्तनों में कुछ परिवर्तन इस्लामी दृष्टिकोण से आपत्तिजनक मालूम होते थे, कुछ परिवर्तन आपत्तिजनक नहीं थे, लेकिन ज़रूरी भी नहीं थे, कुछ परिवर्तन ज़रूरी और लाभदायक थे। इन तीनों तरह के परिवर्तनों के संग्रह को ‘तंज़ीमात’ के नाम से उसमानी हुकूमत ने लागू करना चाहा। प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों ने इस पूरे पैकेज का विरोध किया। जो लोग उसके समर्थक थे उनकी नज़रें उन पहलुओं पर ज़्यादा रही होंगी जो तुर्कों और सल्तनते-उस्मानिया के लिए लाभप्रद थे। उन्होंने महसूस किया कि उलमा एक लाभप्रद चीज़ का विरोध कर रहे हैं। जिन उलमा ने विरोध में नुमायाँ हिस्सा लिया, उनकी नज़रें यक़ीनन उन पहलुओं पर थीं जो शरीअत से टकराते या ग़ैर-ज़रूरी थे। उन्होंने विरोध इसलिए किया कि यह ग़ैर-शरई या अनावश्यक परिवर्तन हैं। ग़रज़ दोनों वर्गों ने मात्र पश्चिमी संगठनों के समर्थन या विरोध में अपनी-अपनी भूमिका निभाई।

इस स्थिति में प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों का यह कर्त्तव्य था कि वे गम्भीरतापूर्वक विचार करते, यह फ़ैसला करते कि ‘तंज़ीमात’ के सकारात्मक पहलू क्या हैं? नकारात्मक पहलू क्या हैं, जो पहलू नकारात्मक हैं वे कौन-कौन-से हैं, नकारात्मक पहलुओं को नकारात्मक क़रार दिए जाने के तर्क क्या हैं? यह एक दुख की बात है, लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि तुर्की के प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान अपनी ज़िम्मेदारियों को प्रभावशाली ढंग से अदा नहीं कर पाए।

इसके कारणों पर अगर ग़ौर किया जाए तो पता चलता है कि इसके कारणों में एक बड़ा महत्त्वपूर्ण कारण शिक्षा व्यवस्था का प्रकार था। मुस्लिम जगत् में फ़िक़्ह और शरीअत की शिक्षा की व्यवस्था ऐसी रही है कि इसके नतीजे में एक विद्यार्थी फ़िक़ही जुज़ईआत (छोटे-छोटे आंशिक मामलों) का माहिर तो हो जाता था, उसको फ़िक़ही जुज़ईआत तो याद हो जाते थे जो एक बहुत लाभदायक और ज़रूरी कार्य है, लेकिन शरीअत के सिद्धान्त, आम नियमों एवं आदेशों, और शरीअत के उद्देश्यों के अनुसार मुस्लिम समाज के लक्ष्य, मुस्लिम समाज का विश्वव्यापी चरित्र, पवित्र क़ुरआन के अस्ल नियमों और बुनियादों से प्रायः लोग अनभिज्ञ रहते थे। यह बात कि किसी मामले से सम्बन्धित शरई आदेश में अरकान और ‘मुस्तहबात’ और आदाब कौन-कौन-से हैं? शरीअत के सम्बन्धित आदेशों पर अमल किया जाए तो शर्तें कौन-कौन-सी होंगी? ये महारतें तो प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों को प्राप्त थीं, और बहुत गहराई के साथ प्राप्त थीं, लेकिन ये महारतें उन पारम्परिक फ़िक़ही समस्याओं तक सीमित थीं जिनके बारे में प्राचीन फ़ुक़हा और मुज्तहिदीन ने इज्तिहाद से काम लिया था।

लेकिन यह बात कि पश्चिमी शक्तियाँ अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के मैदान में क्यों आगे बढ़ रही हैं? इस मामले में मुस्लिम जगत् के व्यापार को और अधिक संगठित करने और बढ़ावा देने के लिए अगर पश्चिमी अनुभवों से फ़ायदा उठाया जाए, तो उन अनुभवों में कौन-सी चीज़ें हैं जो शरीअत से मेल खाती हैं? कौन-सी चीज़ें हैं जो मेल नहीं खातीं? यह फ़ैसला करना एक मुज्तहिदाना सूझ-बूझ का तक़ाज़ा था। अफ़सोस यह है कि ऐसी मुज्तहिदाना सूझ-बूझ प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों की एक बड़ी संख्या में मौजूद नहीं थी। बहुत-से उलमा तो वे थे जो सिरे से इज्तिहाद की ज़रूरत ही को नहीं मानते थे, उनके ख़याल में इज्तिहाद का दरवाज़ा एक ज़माना हुआ बन्द हो चुका था। वह इज्तिहाद का अर्थ केवल यह समझते थे कि इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) या इमाम शाफ़िई (रह॰) के काम को दरकिनार करके नए सिरे से उन्हीं की तरह शरीअत की व्याख्या के सिद्धान्त संकलित किए जाएँ।

आंशिक मामलों में इज्तिहाद या नए पहलुओं में इज्तिहाद की कल्पना शायद उनके ज़ेहनों में नहीं रही थी। इसलिए यहाँ प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान सही मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं कर सके। कुछ ऐसे मामलों का उन्होंने विरोध किया जिसका नुक़सान इस्लाम को भी हुआ, मुसलमानों को भी हुआ, तुर्कों को भी हुआ। उदाहरण के रूप में पश्चिमी दुनिया में प्रिंटिंग प्रेस काफ़ी समय पहले प्रचलित हो चुका था। जब तुर्की में प्रिंटिंग प्रेस लगाने का प्रस्ताव आया जो पश्चिमी जगत् के कई सौ साल बाद आया, जब पश्चिमी जगत् में हज़ारों किताबें छपकर घर-घर और गली-गली वितरित हो चुकी थीं, उस समय कुछ तुर्क शासकों को यह ख़याल हुआ कि तुर्की में भी प्रिंटिंग प्रेस लगाया जाए। प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। प्रेस लगाने को इस्लाम के लिए ख़तरा समझा, मुस्लिम जगत् के हितों के ख़िलाफ़ समझा। क्यों समझा? किन आधारों पर समझा? यह अल्लाह बेहतर जानता है। काफ़ी वाद-विवाद के बाद प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों ने प्रिंटिंग प्रेस लगाने की अनुमति इस शर्त पर दी कि इस प्रिंटिंग प्रेस में इस्लामी किताबें नहीं छापी जाएँगी। पवित्र क़ुरआन प्रकाशित नहीं होगा। तफ़सीर, हदीस की किताबें प्रकाशित नहीं होंगी। फ़िक़्ह और शरीअत की किताबें प्रकाशित नहीं होंगी। गोया प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों ने ख़ुद यह रास्ता खुला छोड़ा कि प्रिंटिंग प्रेस की सुहूलत से इस्लाम के ख़िलाफ़ या ग़ैर-इस्लामी लेख हज़ारों लाखों की संख्या में छाप-छापकर बाँटने में तो कोई हरज नहीं है, लेकिन इस्लाम के सन्देश पर बनी कोई किताब प्रकाशित करके वितरित करना और घर-घर पहुँचाना दुरुस्त नहीं। नतीजा जो निकलना था वह ज़ाहिर है।

इस एक मिसाल से अन्दाज़ा किया जा सकता है कि तुर्की में प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों ने किस अन्दाज़ से ‘तंज़ीमात’ को देखा होगा, और उसमानी ख़ुलफ़ा का क्या और किस अन्दाज़ से ‘मार्गदर्शन’ किया होगा। नतीजा यह निकला कि ‘तंज़ीमात’ के नाम से पश्चिम की नक़्क़ाली की एक प्रक्रिया का आरम्भ हो गया। उस ज़माने के उसमानी शासकों ने यह समझा कि अगर पश्चिमी लिबास अपना लिया जाए या उसकी कोई बदली हुई शक्ल अपना ली जाए तो तुर्क फ़ौजों में वही संगठन पैदा हो जाएगा जो जर्मनी या फ़्रांस की सेनाओं में था। यह एक ऐसी हास्यास्पद बात थी, जिसका हास्यास्पद होना आज स्पष्ट है। फ़ौज के संगठन के लिए न हथियारों को बेहतर बनाया जाए, न प्रशिक्षण को बेहतर बनाया जाए, न जंग की परिकल्पना पर ग़ौर किया जाए, न जंग की कार्य-विधि में कोई बेहतरी लाई जाई, केवल सिपाहियों के लिबास में प्राचीन तुर्की शलवार की जगह पतलून पहना दी जाए, तो फ़ौज जर्मनी के ख़िलाफ़ लड़ने में सफल हो जाएगी। इस तरह की बहुत-सी हास्यास्पद चीज़ों पर आधारित जिसमें कुछ चीज़ें लाभदायक भी थीं ‘तंज़ीमात’ की व्यवस्था को अपना लिया गया। नतीजा वही निकला जो निकलना चाहिए था, पश्चिम की नक़्क़ाली की एक प्रक्रिया शुरू हो गई। जब किसी क़ौम में नक़्क़ाली का काम शुरू हो जाए तो फिर वह नक़्क़ाली हर चीज़ में होती है। और जैसे-जैसे नक़्क़ाल नक़्ल करता जाता है, उसकी अन्धानुकरण की मानसिकता मज़बूत-से-मज़बूत होती चली जाती है। अनुकरण करनेवाला अनुकरण करके मुज्तहिद का मुक़ाबला नहीं कर सकता। ‘तक़लीद’ का मैदान अलग है, इज्तिहाद का मैदान अलग है। नेतृत्व का मैदान मुज्तहिद के हाथ में होता है। मुक़ल्लिद (अनुकरणकर्ता) के हाथ में नहीं होता। एक मुक़ल्लिद अपने से कमतर मुक़ल्लिदों का लीडर तो हो सकता है, किसी मुज्तहिद का लीडर नहीं हो सकता। जो सैन्य कलाओं में इज्तिहाद से काम लेगा वह नेतृत्व का कर्त्तव्य अंजाम देगा। अस्करी मुक़ल्लिद अस्करी मुज्तहिद का मुक़ाबला नहीं कर सकता। यह बात न तुर्क उलमा की समझ में आई और न तुर्क शासकों की समझ में आई।

चुनाँचे नतीजा यह निकला कि ‘तंज़ीमात’ के इस सारे शोर-शराबे के बावजूद, ज़ाहिरी परिवर्तनों के इस मुज़ाहरे के बावजूद तुर्कों की शिकस्त का सिलसिला जारी रहा। एक इलाक़े के बाद दूसरा इलाक़ा, दूसरे के बाद तीसरा इलाक़ा, एक राज्य के बाद दूसरा राज्य उनके हाथ से निकलता रहा। और पूर्वी यूरोप के अधिकांश उसमानी राज्यों और अधिकृत क्षेत्रों से वे तेरहवीं शताब्दी हिजरी ख़त्म होते-होते वंचित हो गए। कुछ इक्का-दुक्का इलाक़े रह गए जो पूर्वी यूरोप में तुर्कों के क़ब्ज़े में रहे, जहाँ मुसलमानों की उल्लेखनीय संख्या आबाद थी। यही कैफ़ियत मध्य पूर्व और उत्तरी अफ़्रीक़ा के अनेक देशों के साथ हुई। ये सब इलाक़े एक-एककर तुर्कों के हाथ से निकल गए। किसी पर फ़्रांस ने क़ब्ज़ा कर लिया, किसी पर इंग्लैंड ने क़ब्ज़ा कर लिया, किसी पर इटली ने क़ब्ज़ा कर लिया या अगर क़ब्ज़ा नहीं किया तो व्यावहारिक रूप से वे तुर्कों के हाथ में नहीं रहे। या तो आज़ाद रहे या वे सामयिक तौर पर स्वायत्त हो गए। यह स्थानीय आज़ादी और सामयिक स्वायत्तता भी इसलिए थी कि या तो विभिन्न पश्चिमी शक्तियों ने अपने हित में समझा कि अमुक इलाक़े को अस्थायी रूप से स्वायत्त रखा जाए या दो बड़ी पश्चिमी शक्तियों के दरमियान संघर्ष से बचने के लिए किसी इलाक़े को एक दरमियानी इलाक़े की या बफ़र ज़ोन की हैसियत दे दी गई (बफ़र ज़ोन एक ऐसा निर्दिष्ट या प्राकृतिक रूप से मौजूद क्षेत्र होता है जो एक संरक्षित क्षेत्र और उसके आस-पास के बाहरी क्षेत्रों के बीच स्थित होता है, जिसका उद्देश्य मुख्य संरक्षित क्षेत्र को नकारात्मक प्रभावों से बचाना है) जो दो बड़ी शक्तियों के दरमियान कश्मकश को रोकने के लिए बर्दाश्त कर लिया गया था। इस तरह के कुछ इक्का-दुक्का नाम मात्र को आज़ाद राज्यों के अलावा कोई आज़ाद राज्य मुस्लिम जगत् में बरक़रार नहीं रहा।

ज़ाहिर है कि यह सियासी ग़ुलामी सैन्य पराजयों और सैन्य असफलताओं के नतीजे में सामने आई। वे सैन्य विफलताएँ जो दो सौ, ढाई सौ साल पहले शुरू हुई थीं, वे उन्नीसवीं शताब्दी ईस्वी के बाद तक जारी रहीं। इन सैन्य विफलताओं का एक मात्र या बहुत बड़ा कारण मुसलमानों का पिछड़ा सैन्य संगठन और कमतर प्रकार के हथियार थे। कमतर प्रकार के हथियार इसलिए कि मुसलमान फ़ौजें प्राचीन ढंग से हथियार तैयार करती थीं और उसी को काफ़ी समझती थीं। इसके मुक़ाबले में पश्चिमी देशों में बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक और कलात्मक शोध हो रहे थे। बड़े पैमाने पर विनाशकारी हथियार बनाए जा रहे थे।

आज पश्चिमी दुनिया शिकायत करती है कि मास क्लिंग या बड़े पैमाने पर तबाही फैलानेवाले हथियार बनाए जा रहे हैं। ये लोग यह भूल जाते हैं कि मास डिस्ट्रक्शन के ये हथियार सबसे पहले पश्चिमी दुनिया ने बनाए थे। और इन्हीं हथियारों की मदद से मुस्लिम जगत् पर उनका क़ब्ज़ा हुआ, और जमा रहा। इस तरह के जवाबी हथियार बनाने की कोशिश मुस्लिम जगत् में या तो सिरे से हुई नहीं या हुई तो सफल नहीं हुई। इसलिए कि यह कोशिश समय गुज़रने के बाद बहुत देर में शुरू हुई थी। भारत में टीपू सुलतान मरहूम ने कोशिश की थी कि अपनी फ़ौजों को नए अन्दाज़ से संगठित करें। नौसेना तैयार करें। उन्होंने आधुनिक हथियार बनाने की, बड़ी तोपें बनाने की और प्राप्त करने की कोशिश शुरू की थी, लेकिन उनके पास समय थोड़ा था, जल्द ही वे शहीद हो गए। यों उनकी यह कोशिश सफल नहीं हुई।

यह अत्यन्त आश्चर्य की बात है कि सल्तनते-मुग़लिया ने अकबर के ज़माने से औरंगज़ेब के ज़माने तक ऐसी कोई कोशिश नहीं की, न इसपर ग़ौर किया न इसपर सोचा। मुग़्लों के सैन्य संगठन का रंग-ढंग वही था जो पाँच सौ वर्षों से चला आ रहा था। उसमें कोई सुधार नहीं हुआ। यह एक बहुत बड़ी भीड़ होती थी, जो लाखों की संख्या में एक जगह से दूसरी जगह स्थानान्तरित होती थी। विभिन्न सरदारों की अपनी-अपनी फ़ौज होती थी। विभिन्न जागीरदारों के अपने अपने सिपाही होते थे। किसी का प्रशिक्षण किस ढंग का किसी का किस ढंग का। उनका नेतृत्व अधिकांश नौजवान और भोगविलास के आदी नवाबों और शहज़ादों के हाथ में होता था। यानी फ़ौज के क्रम की वह परिकल्पना जो पश्चिम में शुरू हुई थी, उससे लाभ उठाने की कोशिश मुस्लिम जगत् में किसी ने नहीं की। इसपर तो न कोई पैसा जा रहा था, न संसाधन दरकार थे। यह काम अकबर भी कर सकता था, जहाँगीर भी कर सकता था, शाहजहाँ भी कर सकता था, लेकिन उनमें से किसी ने यह ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण काम नहीं किया।

यही कैफ़ियत विज्ञान और टेक्नोलॉजी के नतीजे में बननेवाले संसाधनों की थी। यूरोपीय शक्तियों के संचार माध्यम बहुत तेज़ और विकासशील थे। मुसलमानों के पास वे संसाधन मौजूद नहीं थे। उनके हथियार बहुत ज़्यादा प्रभावकारी थे। मुसलमानों के हथियार प्रभावकारी नहीं थे। ऐसे हथियारों के मुक़ाबले में निजी बहादुरी या व्यक्तिगत वीरता काम नहीं देती। निश्चय ही व्यक्तिगत वीरता और निजी बहादुरी बहुत प्रभावकारी भूमिका निभाती है, लेकिन जहाँ एक हथियार से सौ आदमियों को क़त्ल किया जा सकता हो, वहाँ दस आदमी अगर बहुत बहादुर भी होंगे तो क्या कर लेंगे? एक व्यक्ति के पास बम है जो पाँच सौ आदमियों को क़त्ल कर सकता है। दूसरी तरफ़ दो सौ आदमी बहुत बहादुर भी बैठे हुए हों तो इस एक आदमी का मुक़ाबला करने में मुश्किल महसूस करेंगे।

इन साधनों के आधार पर पश्चिम का वर्चस्व मुस्लिम जगत् में बढ़ता चला गया। यह वर्चस्व शुरू में तो राजनीति, सैन्य मामलों, व्यापार और अर्थव्यवस्था के मैदान में था और इतना ज़्यादा ख़तरनाक नहीं था, लेकिन धीरे-धीरे क्रमशः इसका असर मुसलमानों की मानसिकता पर, मुसलमानों के विचारों पर और आख़िरकार सभ्यता एवं संस्कृति पर पड़ना शुरू हुआ और नतीजा यह निकला कि मुस्लिम जगत् के अधिकांश भागों में शिक्षित और प्रभावकारी लोगों की बड़ी संख्या ने पश्चिम की धारणाओं और पश्चिम के विचारों को एक तय-शुदा सिद्धान्त और स्वीकार्य मानदंड के तौर पर अपना लिया। समय गुज़रने के साथ-साथ हुकूमतों पर इस रवैये के प्रभाव पड़ने लगे। विभिन्न मुस्लिम हुकूमतों में विशेष रूप से सल्तनते-उस्मानिया में ऐसे क़ानून लागू किए जाने लगे जो प्रत्यक्ष रूप से पश्चिमी क़ानून की भौंडी नक़्ल थे। अभी तक ऐसा तो नहीं हुआ था कि किसी इस्लामी क़ानून को बाक़ायदा निरस्त किया गया हो। इस्लामी क़ानून के निरस्त होने का मरहला तो बहुत बाद में आया, यह सिलसिला अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी और वलन्देज़ी (The Dutch) उपनिवेशवाद ने शुरू किया। पश्चिमी उपनिवेशवाद के बाद फिर तुर्की में मुस्तफ़ा कमाल पाशा और उसके माननेवालों ने यही रवैया दूसरे मुस्लिम देशों में अपनाया। लेकिन तेरहवीं शताब्दी हिजरी  के अन्त तक, बल्कि चौदहवीं शताब्दी हिजरी के आरम्भ तक भी किसी मुस्लिम हुकूमत ने किसी इस्लामी क़ानून को निरस्त तो नहीं किया, लेकिन ऐसे बहुत-से क़ानून धीरे-धीरे जारी होने शुरू हो गए जिन्होंने धीरे-धीरे इस्लामी क़ानून की जगह ले ली। और यों इस्लामी क़ानून या आदेशों का दायरा सीमित होता चला गया। यह काम सल्तनते-उस्मानिया में शुरू हुआ। क़ानून के नाम से शरीअत के मुक़ाबले पर नए-नए आदेश लागू किए जाते रहे। यह क़ानून शुरू-शुरू में व्यापार और अर्थव्यवस्था से सम्बन्धित थे, और विशेष रूप से उन ग़ैर-मुस्लिमों से सम्बन्धित थे जो सल्तनते-उस्मानिया में आबाद थे। सल्तनते-उस्मानिया की कमज़ोरी से फ़ायदा उठाते हुए, बल्कि सल्तनते-उस्मानिया की आर्थिक मजबूरी का शोषण करते हुए विभिन्न यूरोपीय शक्तियों की यह माँग रहती थी कि सल्तनते-उस्मानिया में आबाद अमुक ग़ैर-मुस्लिम गिरोह के लिए अलग क़ानून बनाए जाएँ। अमुक ग़ैर-मुस्लिम इलाक़े के लिए ख़ास क़ानून लागू किए जाएँ। सल्तनते-उस्मानिया कुछ तो अपनी मजबूरी की वजह से, और कुछ इस वजह से कि वे यह महसूस करने लगे थे, कि उलमा शरीअत के आदेश जिस ढंग से बयान कर रहे हैं, जिस ढंग से उनको लागू करना चाहते हैं, उससे शासकों के लिए समस्याएँ और मुश्किलें पैदा हो रही हैं। उससे धीरे-धीरे यह स्थिति पैदा होने लगी कि इस्लामी क़ानून के सामने, इस्लामी क़ानून के समानान्तर ग़ैर-इस्लामी क़ानून भी लागू होने लगे। ये ग़ैर-इस्लामी क़ानून जिसके लिए क़ानून की शब्दावली सल्तनते-उस्मानिया में प्रयुक्त होनी शुरू हुई, विभिन्न पश्चिमी क़ानूनों की नक़्ल थे और किसी एक या दूसरे पश्चिमी देशों से लेकर लागू किए गए थे।

इस पूरे दौर में शिक्षा और सभ्यता एवं संस्कृति की कैफ़ियत भी पतन की ओर अग्रसर रही। सभ्यता और संस्कृति वस्तुतः शिक्षा का परिणाम होती है। समाज में जो स्तर शिक्षा का होगा वही स्तर सभ्यता एवं संस्कृति का होगा। निश्चय ही साभ्यतिक विकास तथा सांस्कृतिक विकास में भौतिक संसाधनों का महत्त्व होता है, लेकिन भौतिक संसाधनों की हैसियत दूसरे दर्जे की है। सर्वप्रथम हैसियत सभ्यता एवं संस्कृति के मामले में शिक्षा और विचारधारा को प्राप्त होती है। परिवर्तन जो भी पैदा होता है वह सबसे पहले लोगों के दिलो-दिमाग़ में पैदा होता है। बाह्य जगत् से नहीं। इसलिए जैसे-जैसे पश्चिम से ये नए विचार आते गए वे शिक्षा एवं संस्कृति पर भी प्रभाव डालते गए, जनसाधारण के विचारों को भी उन्होंने प्रभावित किया।

दूसरी तरफ़ शिक्षा की जो सामान्य व्यवस्था थी, जो अभी तक प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों के हाथ में थी, उसमें किसी परिवर्तन या किसी संशोधन की आवश्यकता प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों ने महसूस नहीं की। अभी तक प्राचीन और आउट डेटेड यूनानी मंतिक़ (तर्कशास्त्र) और फ़लसफ़ा (दर्शन) ही को शिक्षा व्यवस्था की जान और मान समझा जाता था। इन विषयों के बारे में भी बाद के इस्लामी विद्वानों की किताबें और उनके फ़ुटनोट्स, व्याख्याओं और सारांशों पर ही ज्ञान एवं कला का सारा दारोमदार चला आता था। इस प्राचीन तर्कशास्त्र और दर्शन की हर ज्ञानवान प्रशंसा करता नज़र आता था, वह तर्कशास्त्र और दर्शन जो यूनान से चला आ रहा था, जिसके आधार पर न विज्ञान का विकास हो सकता था, न शिक्षा का विकास हो सकता था, न शेष सामूहिक और मानवीय ज्ञान-विज्ञान विकास पा सकते थे। जिसको यूरोपवासियों ने एक लम्बा अन्तराल हुआ, छोड़ दिया था। वहाँ विज्ञान और दर्शन नए-नए ढंग से काम कर रहा था। वैज्ञानिक विकास ने नए-नए नमूने और उदाहरण सफलताओं के क़ायम कर दिए थे। इससे लाभान्वित होने के लिए मुस्लिम जगत् ने कोई क़दम उठाने की ज़रूरत महसूस नहीं की, बल्कि प्राचीन तर्कशास्त्र, प्राचीन दर्शन, और प्राचीन भौतिकी के नाम पर जो पूँजी चली आ रही थी वह मुसलमानों में ज्यों-की-त्यों जारी रही। इस दौर में, यानी पतन के समय के आख़िरी ज़माने में, बारहवीं शताब्दी हिजरी, तेरहवीं शताब्दी हिजरी में जो किताबें लिखी गईं उनमें से बड़ी संख्या का सम्बन्ध इसी वैचारिक बंजरपन और बौद्धिक वीराने से था, जो दर्शन के नाम से मुसलमानों में जारी था। यह बहस दीनी दर्सगाहों में, क़ाहिरा में भी हो रही थी, इस्तंबोल में भी हो रही थी, भारत में भी हो रही थी, कि धरती अचल है और सूरज उसकी ओर घूम रहा है और ज़मीन सृष्टि की धुरी है और सृष्टि के तमाम ग्रह (सूरज सहित) उसके आसपास घूम रहे हैं। किसी ग़लत-फ़हमी के नतीजे में उसको पवित्र क़ुरआन का मंशा भी कुछ लोगों ने समझ लिया और यों यह बात ग़लत तौर पर अक़ीदे का हिस्सा भी बन गई। कुछ लोगों की नज़र में यह सब मामले दीन का हिस्सा थे। इसका नतीजा यही निकलना था कि नेतृत्व और मार्गदर्शन के पद से इस्लामी विद्वान और फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्री) समय-समय पर और धीरे-धीरे हटते गए, और व्यवहारतः नेतृत्व और मार्गदर्शन का पद उस वर्ग के हाथ में आता गया जो पश्चिमी विचारों से प्रभावित था, और पश्चिमी शिक्षा के नतीजे में तैयार हुआ था।

इसका नतीजा यह निकला है कि मुस्लिम जगत् गत दो सौ वर्षों से एक ऐसे कठिन संघर्ष से दो-चार है जिसमें एक ओर जनसाधारण हैं, मुसलमानों की अधिकांश संख्या है, जो इस्लाम पर अमल करती है, आंशिक रूप से शरीअत के आदेशों का पालन करती है। जिसके विचार और धारणाएँ बड़ी हद तक मुसलमानों की परम्पराओं को प्रदर्शित करती हैं। जिसकी तमन्नाएँ, जिसकी आरज़ुएँ हर जगह एक समान हैं। जो इस्लामी सभ्यता के पुनरुत्थान की एक ख़ास परिकल्पना भविष्य के बारे में रखते हैं। यह वर्ग एक तरफ़ है।

दूसरी तरफ़ शासक और प्रभावशाली वर्ग है, जिसकी बड़ी संख्या पश्चिमी धारणाएँ न केवल रखती है, बल्कि पश्चिमी धारणाओं को बढ़ावा देने में दिन-प्रतिदिन प्रयासरत है। ये शासक और प्रभावशाली अल्पसंख्यक जीवन के सभी मामलों को आम तौर से पश्चिमवालों के दृष्टिकोण से देखते हैं, जिसके नज़दीक ज्ञान वह है जो पश्चिम में है। शिक्षा वह है जो पश्चिमी यूनिवर्सिटियों में है। सभ्यता एवं संस्कृति वह है जो दुनिया के पश्चिमी देशों में है। इस वर्ग के नज़दीक मुस्लिम जगत् के भविष्य का दारोमदार इसपर है कि पूरब की हर प्राचीन परम्परा को समाप्त करके पश्चिम की तमाम धारणाओं को ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया जाए। मुस्तफ़ा कमाल ने यही नुस्ख़ा आज़माया, बू-रक़ीबा ने भी यही नुस्ख़ा आज़माना चाहा, अल्बानिया में यही नुस्ख़ा आज़माया गया, मुस्लिम जगत् के अनेक देशों में इस नुस्ख़े पर अमल हुआ। लेकिन नतीजा सिवाए इस संघर्ष को और कठिन बनाने का और कुछ नहीं निकला। जनसाधारण की अधिकांश संख्या ने इस नुस्ख़े को स्वीकार नहीं किया। शासकों ने जनसाधारण के ज़ेहन और स्वभाव को समझने की कोशिश नहीं की। यों यह कश्मकश समय के साथ-साथ तेज़ से तेज़-तर होती चली जा रही है।

अब कुछ समय से इस कश्मकश ने शिद्दत अपना ली है। इस्लामी कट्टरवाद की शब्दावली पूरी दुनिया में प्रयुक्त होती है, जानी जाती है, पहचानी जाती है। इस्लामी कट्टरता को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए पश्चिम और पूरब के शासकों की आवाज़ एक है। मुस्लिम जगत् की हुकूमतें यह सोचे बिना कि कट्टरता क्यों पैदा हुई? जो कट्टरपन्थी कहलाते हैं वे क्या चाहते हैं? उनके विचार और धारणाएँ क्या हैं? वे इस रास्ते पर चलने पर क्यों मजबूर हुए? यह सब सोचे बिना मुस्लिम जगत् के शासकों ने पश्चिम का बताया हुआ नुस्ख़ा आज़माने का फ़ैसला किया है। वे सख़्ती और शिद्दत के साथ राज्य की पूरी शक्ति से इस कट्टरवाद को ख़त्म करना चाहते हैं। शिद्दत का जवाब और अधिक शिद्दत से देना चाहते हैं। इसका नतीजा अधिक शिद्दत के रूप में निकलता है। और यह सिलसिला बढ़ता चला जा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि पश्चिम के कुछ प्रभावकारी वर्ग यही चाहते हों, और मुस्लिम जगत् को आपस में टकराकर तबाही का शिकार कर देना चाहते हों।

ये दो वर्ग जब से अलग-अलग अस्तित्व में आए हैं, जिनके दरमियान खाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और चौड़ी-से-चौड़ी होती चली जा रही है। उस समय से मुस्लिम जगत् पर सेक्युलरिज़्म का वर्चस्व भी बढ़ता चला जा रहा है। सेक्युलरिज़्म यानी दीनी और धार्मिक शिक्षाओं को सामूहिक जीवन से निकाल दिया जाए। क़ानून, राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज का धार्मिक शिक्षा और दीनी मार्गदर्शन से कुछ सम्बन्ध न हो। यह धारणा पश्चिमवालों में आज से चार-सौ साल साढ़े चार सौ साल पहले पैदा हुई। क्यों पैदा हुई? इसपर मुस्लिम जगत् में किसी ने ग़ौर नहीं किया। पाकिस्तान में भी ग़ौर नहीं किया। पाकिस्तान का शासक वर्ग भी इस मुद्दे को समझना नहीं चाहता। अल्लामा इक़बाल ने जिस अभिभाषण में पाकिस्तान की कल्पना पेश की थी, उसी अभिभाषण में यह बहस भी की थी कि पश्चिम में धर्म के सुधार और सेक्युलरिज़्म की यह धारणा क्यों पैदा हुई। और मुस्लिम जगत् में यह क्यों पैदा नहीं होना चाहिए। सम्भवतः अल्लामा इक़बाल यह समझ रहे थे कि आइन्दा जब वह राज्य अस्तित्व में आएगा जिसकी वे दावत दे रहे हैं, तो उस राज्य में यह सवालात पैदा होंगे। इसलिए अपने जीवन के इस अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अभिभाषण में पहले उन्होंने इन सवालों का जवाब दिया। उसके बाद एक अलग राज्य के प्रस्ताव पर चर्चा की।

सेक्युलरिज़्म मुस्लिम जगत् में सबसे पहले तुर्की में आया। तुर्की में ज़मीन उसके लिए अनुकूल थी। चुनाँचे बहुत आसानी से इस्लामी क़ानून को एक-एककर निरस्त किया गया। मुस्तफ़ा कमाल ने सबसे पहले इस्लामी शिक्षण संस्थाएँ बन्द कीं, दीनी प्रशिक्षण की संस्थाएँ समाप्त कीं, औक़ाफ़ को सरकारी मिल्कियत में लेकर ख़त्म कर दिया। और एक-एककर उन तमाम सभ्यतागत निशानियों का नामो-निशान मिटा देने की कोशिश की जो तुर्की की इस्लामी हैसियत को नुमायाँ करती थीं। जब तुर्की में सेक्युलरिज़्म के प्रभाव बढ़ना शुरू हुए और यह पहले विश्वयुद्ध से बहुत पहले शुरू हो गया था। ‘तंज़ीमात’ के ज़माने से शुरू हो गया था। इसका अनिवार्य नतीजा यह निकलना था कि तुर्क क़ौमियत (राष्ट्रीयता) की धारणा भी नुमायाँ हो। उसकी वजह यह है कि जब दीनी शिक्षा को राजनीति और अर्थव्यवस्था से, हुकूमत और क़ानून के सदनों से निकाला जाएगा तो मुस्लिम समाज की वह धारणा जो विभिन्न नस्लों और इलाक़ों से सम्बन्ध रखनेवाले मुसलमानों को इकट्ठा करती है, वह आपसे-आप कमज़ोर पड़ जाएगी। जैसे-जैसे सेक्युलर विचारधाराओं को बढ़ावा मिलता जाएगा मुस्लिम समाज को एकजुट करनेवाला नज़रिया ख़त्म होता जाएगा। वह नज़रिया जिसके आधार पर मुस्लिम समाज की एकता क़ायम है।

मुस्लिम समाज क्या है? मुस्लिम समाज एक दीनी सन्देश का ध्वजावाहक वह अन्तर्मानवीय दल है जो इस सन्देश पर ईमान भी रखता हो और अमल भी करता हो। जिसपर इससे पहले एक लेक्चर में विस्तार से चर्चा हुई है। अगर दीन की वह हैसियत ख़त्म कर दी जाए, जो समाज और सामूहिकता को व्यापकता उपलब्ध करती है तो मुस्लिम समाज की धारणा आपसे-आप समाप्त हो जाएगी। जब मुस्लिम समाज की धारणा तुर्की में कमज़ोर पड़ी तो वह नज़रिया समाप्त हो गया जिसने ख़िलाफ़ते-उस्मानिया के वासियों को एकजुट कर रखा था। अब एक नए नज़रिए की ज़रूरत पेश आई। आख़िर एक एकजुट करनेवाले नज़रिए की ज़रूरत तो थी, वह नज़रिया तुर्की नेशनलिज़्म के द्वारा उपलब्ध करने की कोशिश की गई। चुनाँचे उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से ऐसे-ऐसे सहित्यकार और कवि तुर्की में पैदा होने शुरू हो गए, जो तुर्क नेशनलिज़्म के ध्वजावाहक थे। ज़ियागो कल्प, प्रसिद्ध कवि जिसके अल्लामा इक़बाल ने भी हवाले दिए हैं। तुर्की नेशनलिज़्म के वैचारिक संस्थापकों में से माना जाता है। उसके यहाँ तुर्क राष्ट्रीयता का यह स्वर बहुत बुलन्द है। ज़ियागो ने उन तमाम तुर्क चिन्तकों के सन्देश को अपनी शाइरी में पूरी तरह समोया है जो इससे पहले ज़रा धीमे सुरों में तुर्क नेशनलिज़्म की बात करते थे और जिन्होंने तुर्क नेशनलिज़्म के बढ़ावे में इससे पहले हिस्सा लिया था।

जब तुर्क नेशनलिज़्म अच्छी तरह फलने-फूलने लगा तो सल्तनते-उस्मानिया के अरब इलाक़ों से तुर्कों की दिलचस्पी कमज़ोर हुई, जब यह दिलचस्पी कमज़ोर हुई तो पश्चिमी शक्तियों को भी मौक़ा मिला, पश्चिमी शक्तियों ने एक-एककर मुस्लिम जगत् के अरब इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लिया। उनके हित में भी था कि यहाँ अरब नेशनलिज़्म बढ़ावा पाए। अरब नेशनलिज़्म के बढ़ावे से तरन्त लक्ष्य यह प्राप्त होता था कि उनके क़ब्ज़े को औचित्य मिलाता था, उस्मानियों से सम्बन्ध ख़त्म होता था, मुस्लिम समाज से सम्बन्ध कमज़ोर पड़ता था, मुस्लिम समाज की धारणा मिट जाती था। इसलिए अरब राष्ट्रीयता की भावनाओं को बढ़ावा दिया गया। मुस्लिम जगत् में जो शक्तियाँ पश्चिमी शक्तियों की चाटुकार थीं, उन्होंने भी अरब नेशनलिज़्म को बढ़ावा देने में भरपूर भूमिका निभाई। यह अरब नेशनलिज़्म अरब क़ौमों की मुहब्बत में शुरू नहीं हुआ था, यह मुसलमानों और ख़ुद अरबों की सामाजिक एकता को टुकड़े-टुकड़े करने के लिए था। यह सल्तनते-उस्मानिया को ख़त्म करने के लिए था। यह मुस्लिम समाज की एकता और अन्तर्राष्ट्रीयता को टुकड़े-टुकड़े करने के लिए था। चुनाँचे इसके वे परिणाम बहुत जल्द ज़ाहिर होने लगे और बहुत जल्द अपने अस्ल रूप में सामने आ गए।

तुर्क नेशनलिज़्म और सेक्युलरिज़्म का यों तो समाज के हर वर्ग पर असर हुआ। ज़िन्दगी के हर क्षेत्र में इसके प्रभाव पैदा हुए, लेकिन इसका एक महत्त्वपूर्ण नतीजा यह भी निकला कि मुस्लिम जगत् के विभिन्न इलाक़ों में अरबी लिपि को ख़त्म करने की आवाज़ें बुलन्द होने लगीं। उसके मुक़ाबले में रोमन लिपि को रिवाज देने की बात हर जगह की जाने लगी। सबसे पहले तुर्की में लिपि बदली गई। और अरबी लिपि के बजाय जिसमें तुर्की ज़बान पिछले एक हज़ार साल से लिखी जा रही थी रोमन लिपि अपना ली गई। और यों एक फ़ैसले से पूरी तुर्क क़ौम जाहिल क़रार पाई। तुर्क क़ौम अपनी विरासत से कटकर रह गई। मैंने ख़ुद अपनी आँखों से तुर्की में ऐसे हज़ारों व्यक्ति देखे हैं जो तुर्क साहित्य के उस पूरे भंडार से इस तरह अनजान हैं, जिस तरह उदाहरणार्थ जर्मन क़ौम तुर्क विरासत से अनभिज्ञ है। जो हैसियत हमारे लिए अब संस्कृत रखती है, वही हैसियत अब तुर्क क़ौम के लिए उसकी प्राचीन विरासत रखती है। प्राचीन विरासत जो एक हज़ार साल में तैयार हुई थी, जो अरबी और फ़ारसी के बाद इस्लामी ज्ञान-विज्ञान और इस्लामी सभ्यता का सबसे बड़ा भंडारगृह थी, वह तुर्क क़ौम के लिए ख़त्म हो गई। और यही मुस्तफ़ा कमाल और उसके समर्थकों का उद्देश्य था कि तुर्क क़ौम को उसके इस्लामी अतीत से काटकर एक नया स्वरचित और कृत्रिम पश्चिमी अतीत पैदा किया जाए। जो तुर्की के सम्बन्ध को इस्लाम से काटकर पश्चिम से जोड़ दे।

यही रवैया मध्य एशिया के राज्यों में अपनाया गया। मध्य एशिया में अरब लिपि ख़त्म हुई, पहले वहाँ रूस की सिरिलिक लिपि जारी हुई। रूस और सोवियत यूनियन के पतन के बाद उम्मीद थी कि वहाँ दोबारा अरबी लिपि का आरम्भ हो जाएगा। लेकिन बूढ़े पश्चिम ने जो नुस्ख़ा तुर्कों को सिखाया था, वही नुस्ख़ा सेंट्रल एशिया के मुसलमानों को सिखाया और उन्होंने वहाँ रोमन लिपि अपनानी शुरू कर दी। फिर यही बात इंडोनेशिया और मलयेशिया में हुई, यहाँ भी अरबी लिपि मौजूद थी। अरबी लिपि को ख़त्म करके रोमन लिपि वहाँ भी अपना ली गई। और भी अनेक देशों में ऐसा हुआ।

शुरू में यह कहा जाता था कि अरबी लिपि आधुनिक अपेक्षाएँ पूरी नहीं करती, इसलिए रोमन लिपि अपनाना अनिवार्य है। यह न केवल अत्यन्त अज्ञानतापूर्ण बात थी, बल्कि अत्यन्त ही कायरता की बात थी। दूसरे शब्दों में तर्क का सारांश यह था कि चूँकि पश्चिमवालों ने प्रिंटिंग प्रेस ईजाद कर लिया है, प्रिंटिंग प्रेस सारे-का-सारा अंग्रेज़ी अक्षरों के आधार पर काम करता है और हम चूँकि इतने अयोग्य और नाकारा हैं कि हम अरबी अक्षरों पर आधारित कोई प्रेस ईजाद नहीं कर सकते, इसलिए हमें रोमन लिपि अपना लेनी चाहिए। हालाँकि अनुभव ने कुछ वर्षों के अन्दर-अन्दर थोड़े ही अर्से के बाद यह बात ग़लत साबित कर दी। आज अरब दुनिया में, ईरान में, आधुनिकतम प्रेस भी काम कर रहे हैं, कंप्यूटर भी काम कर रहे हैं, और आसानी से सब काम कर रहे हैं। कलीदी तख़्ता या कीबोर्ड जिसको पाकिस्तान में भी एक ज़माने में बहुत समस्या बनाया गया और इसके आधार पर रोमन लिपि को अपनाने की दावत दी गई, वह समस्या हल हो गई। यह किसी ने न सोचा कि अगर यूरोप अपनी अधूरी लिपि के आधार पर यह सब कुछ कर सकता है तो हम अपनी पूर्ण लिपि के आधार पर यह क्यों नहीं कर सकते। बजाय इसके कि हमारे बुद्धिजीवी और सत्ताधारी लोग कुछ वैचारिक आज़ादी का प्रदर्शन करते थोड़े-से आधुनिकतावादी होने का प्रदर्शन करते, जिस इज्तिहाद की वह प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों को दावत देते रहते हैं, ख़ुद भी उस इज्तिहाद से काम लेते तो ये समस्याएँ हल हो सकती थीं। लेकिन सम्भवतः समस्या किसी वास्तविक या काल्पनिक मुश्किल की नहीं थी, बल्कि अस्ल लक्ष्य यह था कि मुसलमानों को उनके अतीत से काट दिया जाए। उनको प्राचीन इस्लामी और दीनी विरासत से वंचित कर दिया जाए। वह उद्देश्य तुर्की में भी पूरा हो गया, मध्य एशिया में भी पूरा हो गया, और जहाँ-जहाँ अरबी लिपि ख़त्म की गई है, वहाँ यह लक्ष्य पूरे तौर पर प्राप्त किया जा चुका है।

सेक्युलरिज़्म का एक बड़ा नतीजा मुस्लिम जगत् में हर जगह यह निकला है कि मुस्लिम समाज सख़्त कश्मकश का शिकार होकर रह गए हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण समस्या या धारणा जिसको माने बिना सेक्युलरिज़्म अस्तित्व में नहीं आ सकता, वह यह है कि धर्म को एक व्यक्तिगत मामला क़रार दिया जाए। धर्म का सम्बन्ध राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज और क़ानून से ख़त्म कर दिया जाए। पश्चिमी दुनिया में इसकी शायद ज़रूरत भी थी और यह काम आसान भी था। इसलिए कि पश्चिमी दुनिया जिस धर्म की अनुयायी थी, उस धर्म की किताबों में क़ानून, अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज से सम्बन्धित कुछ मार्गदर्शन नहीं मिलता। चारों इंजीलें हों, या ‘नए नियम’ की पूरी पुस्तक। उसमें सिरे से कोई बहस क़ानून के बारे में मौजूद नहीं है। उसमें अर्थव्यवस्था और समाज के बारे में, राजनीति और शासन के बारे में कोई निर्देश नहीं है। इसलिए अगर पश्चिमी दुनिया ने यह समझा कि धर्म इन मैदानों में मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं करता, तो वह ऐसा समझने में शायद सही हों, इसलिए कि सचमुच उनका धर्म इन मामलों में कोई मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं करता था। फिर धर्म के नाम पर उनके यहाँ एक हज़ार साल तक जो अत्याचार एवं दमनपूर्ण व्यवस्था प्रचलित रही है, और धर्म के नाम पर धार्मिक वर्ग की लीडरशिप जिस अन्दाज़ से क़ायम रही है उसकी प्रतिक्रिया यही होनी थी कि धर्म को व्यक्तिगत मामला क़रार दिया जाए और सामूहिकता के दायरे से निकाल दिया जाए।

लेकिन जहाँ धर्म का आधार ही क़ानून पर हो, जहाँ नैतिकता और क़ानून इतने गहरे तौर पर एक-दूसरे से सम्बद्ध हों, जहाँ, धार्मिक तथा आध्यात्मिक जीवन की सफलता का एकमात्र आधार क़ानून पर कार्यान्वयन हो, जहाँ आध्यात्मिकता और क़ानूनवाद साथ-साथ चल रहे हों, वहाँ यह कहना कि क़ानून, राज्य और राजनीति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं, यह अज्ञानता और हठधर्मी भी है और बहुत बड़ी त्रासदी भी। चूँकि वह वर्ग जो आज शासन-व्यवस्था चला रहा है उसमें काफ़ी लोग, बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हैं, जो इस्लामी परम्पराओं से अनभिज्ञ हैं। शरीअत का विवरण जानने से न दिलचस्पी रखते हैं और न उनकी व्यस्तताएँ इस बात की अनुमति देती हैं कि वे गम्भीरतापूर्वक शरीअत को समझने की कोशिश करें। वे जिस धार्मिक अवधारणा से परिचित हैं, वह मसीही धार्मिक अवधारणा है। धर्म की मसीही अवधारणा के अनुसार धर्म को व्यक्तिगत मामला ही होना चाहिए। पश्चिमवालों की कोशिश यही रही कि धर्म को व्यक्तिगत मामला क़रार दिलवाकर, पूरे मुस्लिम जगत् की इस एकता और एकजुटता को ख़त्म कर दिया जाए, जो मुस्लिम समाज से जुड़ाव और इस्लामी शरीअत पर ईमान के आधार पर पैदा होती है।

आज जो वर्ग मुस्लिम जगत् में प्रभावशाली है, वह शासन की बागडोर संभाले हुए हो या दूसरे मामलों में प्रभावकारी हो, वह पश्चिम की शिक्षा की धारणा और पश्चिम के शिक्षा-स्तर ही को सफलता की कुंजी समझता है। अगर पश्चिम के शिक्षा मानक या शिक्षा की धारणा से मुराद विज्ञान और टेक्नोलॉजी की शिक्षा हो तो शायद इस ग़लत-फ़हमी से इतनी बड़ी ख़राबियाँ पैदा न हों। ख़राबियाँ वहाँ पैदा होती हैं, जहाँ पश्चिम की शिक्षा की धारणा, शिक्षा के मानक और शिक्षा के पाठ्यक्रम को सामाजिक विज्ञान और मानवीय ज्ञान के मैदान में अपनाया जाता है। सामूहिक ज्ञान का सम्बन्ध किसी क़ौम के सामूहिक दर्शन से होता है। मानवीय ज्ञान का सम्बन्ध किसी क़ौम के अक़ीदों और विचारधाराओं से होता है। ये क़ौम के अक़ीदे और विचारधाराएँ हैं, ये किसी क़ौम की सामूहिक धारणाएँ हैं जिनके नतीजे में इंसानी और सामूहिक ज्ञान का गठन होता है।

हमारे यहाँ मुस्लिम जगत् में पिछले दो सौ वर्षों से जिस आधुनिक शिक्षा की चर्चा है वह यही सामूहिक और मानवीय ज्ञान की शिक्षा है। अंग्रेज़ी साहित्य, अंग्रेज़ी लिटरेचर, दर्शन, अंग्रेज़ी क़ानून, अंग्रेज़ी धारणाओं ही के पढ़ने-पढ़ाने पर पिछले दो सौ वर्षों से मुस्लिम जगत् में ज़ोर दिया जा रहा है। यह बात शायद आपमें से बहुत कम लोगों के ज्ञान में होगी कि सर सैयद अहमद ख़ान ने जब अलीगढ़ कॉलेज क़ायम किया तो वे इस बात के कट्टर विरोधी थे कि यहाँ विज्ञान और टेक्नोलॉजी की शिक्षा दी जाए। वे अलीगढ़ कॉलेज में विज्ञान और टेक्नोलॉजी की शिक्षा देने के हमेशा विरोधी रहे। चुनाँचे अलीगढ़ कॉलेज में एक लम्बे समय तक इंजीनियरिंग, विज्ञान और मेडिकल के विभाग क़ायम नहीं हो सके। वहाँ जो विभाग क़ायम थे उनमें ज़्यादा ज़ोर अंग्रेज़ी भाषा एवं साहित्य, सोशल साइंसेज़ और ह्यूमैनिटीज़ पर दिया जाता। ख़ुद सर सैयद कहते थे कि पहले हमारी क़ौम में पूरी तरह सिविलाइज़ेशन आ जाने दें (यह उनके अपने शब्द थे) उसके बाद फिर शेष कामों की ओर ध्यान दिया जाएगा। सैर सैयद ऐसा क्यों समझते थे? यह अल्लाह बेहतर जानता है, लेकिन इसका नतीजा यह निकला कि आधुनिक शिक्षा प्राप्त वर्ग जो चाहे मुसलमानों के क़ायम की हुई संस्थाओं में पढ़ता रहा हो, या ग़ैर-मुस्लिमों की संस्थाओं में पढ़ता हो, वह अपनी मानसिक बनावट की दृष्टि से आम पश्चिमी शिक्षित इंसान से भिन्न नहीं। एक पश्चिमी शिक्षित इतिहासकार जिस ढंग से इतिहास को देखता है, उसी अन्दाज़ से एक आधुनिक मुसलमान इतिहासकार को भी देखता है। किसी देश की आर्थिक समस्याओं को जिस तरह एक पश्चिमी शिक्षित अर्थशास्त्री देखता है, उसी तरह एक मुसलमान अर्थशास्त्री भी देखता है। गोया यह वर्ग अपने अस्तित्व से, अपने रवैये से तर्ज़े-अमल से, इस तसव्वुर को दिन-ब-दिन मज़बूत-से-मज़बूततर बना रहा है कि इस्लामी परम्पराओं के पास, शरीअत के पास, अर्थव्यवस्था, और शेष मामलों में कोई मार्गदर्शन मौजूद नहीं है। इस्लाम इन मामलों में मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं करता।

दूसरी तरफ़ हमारा जो वर्ग दीनी शिक्षा से सम्बन्धित है वह इस बात पर शिद्दत से ज़ोर देता रहा है कि आधुनिक दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है, जो कुछ भी सोचा जा रहा है, जो कुछ भी लिखा जा रहा है उससे पूरी तरह मुँह फेर लेना चाहिए। इस वर्ग के अधिकांश व्यक्तियों की राय में दुनिया में जो भी ज्ञान-विज्ञान प्रचलित हैं उनसे अनभिज्ञ रहने में ही दीन और दुनिया की भलाई है, अत: दीनी तालीमी संस्थाओं को दुनिया से कटकर अलग जज़ीरों के रूप में रहना चाहिए। यही धारणा है जो सेक्युलरिज़्म को पुष्ट करने का काम करती है। यह धार्मिक संस्थाओं का अलग अस्तित्व और उसपर आग्रह। दूसरी तरफ़ आधुनिक संस्थाओं का पश्चिमी परम्पराओं पर क़ायम रहना और इस्लामी धारणाओं को अनदेखा किए चले जाना, इन दोनों रवैयों के नतीजे में सेक्युलरिज़्म को बढ़ावा मिलता चला जा रहा है।

सेक्युलरिज़्म को बढ़ावा मिलने के नतीजे में मुस्लिम जगत् में तेज़ी से वह प्रवृत्ति मज़बूत हुई है, जिसके तहत दीनी मार्गदर्शन को सामूहिक मामलों से निकाल दिया गया है। यह जो स्त्री-पुरुष की समता का पश्चिमी और अनैतिक प्रकार की धारणा आम है। यह जो इस्लामी धारणाओं को समझने में मुश्किल पेश आ रही है। यह जो हिजाब का विरोध मुस्लिम जगत् में भी हो रहा है, मुस्लिम जगत् से बाहर भी हो रहा है। इस्लामी क़ानून को आउट डेटेड और रूढ़िवादी क़रार दिया जा रहा है। विभिन्न इस्लामी आदेशों पर जो आपत्तियाँ की जा रही हैं। ब्याज की उपयोगिता पर लेख प्रकाशित हो रहे हैं। क़िमार (जुआ) और ‘ग़रर’ (धोखे के कारोबार) के बचाव में लेख और शोधपत्र प्रकाशित हो रहे हैं। यह सब कुछ एक दो दिन में नहीं हुआ। यह इस दो सौ वर्षों की अकर्मण्यता के परिणाम हैं।

आज हमारा प्रभावशाली वर्ग इस्लामी क़ानून को आउट डेटेड क़रार देता है, रूढ़िवादी और पुरातनपन्थी क़रार देता है। उसका कहना है कि चूँकि ये क़ानून प्राचीन हैं, चौदह सौ वर्ष पुराने हैं इसलिए ये आज के ज़माने का साथ नहीं दे सकते। इस्लामी सभ्यता चौदह सौ वर्ष पुरानी है इसलिए आज की दुनिया में इसकी कोई जगह नहीं। चाहे ज़बान से वे यह बात न कहते हों, लेकिन बहुत-से लोगों के दिल की गहराइयों में यही भावना पाई जाती है।

इसके बावजूद प्राचीन सभ्यताओं से दिलचपसी उस वर्ग में असाधारण रूप से पाई जाती है। वह मिस्र में फ़िरऔनों की सभ्यता हो या पाकिस्तान में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के अवशेष हों, या कुछ इलाक़ों में प्राचीन बुद्धिस्टों के अवशेष हों, कुछ देशों में प्राचीन रोमन प्रभाव हों, उनकी हिफ़ाज़त और उनकी सुरक्षा इस्लामी निशानियों से बढ़कर की जाती है। आज पाकिस्तान में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के अवशेषों की सुरक्षा के लिए संस्थाएँ क़ायम हैं। हुकूमत के फ़ंड मौजूद हैं। अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों और संस्थाओं के फ़ंड मौजूद हैं। लेकिन मुहम्मद-बिन-क़ासिम की पहली मस्जिद, जो पहली बार उपमहाद्वीप में बनाई गई, उसकी सुरक्षा, उसके पुनर्निर्माण या उसको सजाने-संवारने के लिए पाकिस्तान सरकार के पास फ़ंड नहीं है। सिंध सरकार के पास संसाधन नहीं। सिंध सरकार में, और केन्द्र सरकार में ऐसे लोग शामिल होते और उच्च पदों पर आसीन होते रहे जो सिंध के नाम पर वोट लेते रहे, जिनको सिंध के व्यक्तित्व और पहचान की सुरक्षा का हमेशा ख़याल रहा। उन्होंने भी सिंध की इस प्राचीनतम मस्जिद को, सिंध की विरासत नहीं समझा। वह सिंध की विरासत मोहनजोदड़ो ही को समझते हैं। इस्लामी सभ्यता के प्रति उनदासीनता और प्राचीन सभ्यताओं से दिलचस्पी सेक्युलरिज़्म के स्वाभाविक परिणाम और अनिवार्य प्रभाव हैं।

आज स्थिति यह है कि मानव इतिहास की दो शक्तिशाली सभ्यताएँ, पश्चिमी सभ्यता और इस्लामी सभ्यता इस समय परस्पर संघर्षरत हैं। ये दोनों सभ्यताएँ, अपनी विशालता, व्यापकता और सैन्य शक्ति की दृष्टि से मानव इतिहास की बहुत नुमायाँ सभ्यताएँ हैं। जितना राजनैतिक प्रभाव और पहुँच इन दोनों सभ्यताओं को प्राप्त रही है, किसी और सभ्यता को प्राप्त नहीं रही। ये दोनों सभ्यताएँ एक सोच और दर्शन पर आधारित हैं। इन दोनों के पीछे विचारों और विचारधाराओं की एक पूरी व्यवस्था मौजूद है। इन दोनों सभ्यताओं ने जो-जो ज्ञान और तत्त्वदर्शिता पैदा की हैं वे पूरी तरह इन दोनों सभ्यताओं की समर्थक और संरक्षक हैं।

आज पश्चिमी सभ्यता इन सभी मैदानों में बहुत प्रभावी मालूम होती है। उसकी तुलना में इस्लामी सभ्यता को वह वर्चस्व प्राप्त नहीं है। इस्लामी सभ्यता का बचाव करनेवाली आवाज़ें बहुत कमज़ोर महसूस होती हैं। कभी-कभी शासकों की तरफ़ से भी प्रतिरोध की ये आवाज़ें उठ जाती हैं, अगरचे ऐसा कम होता है, लेकिन ऐसी आवाज़ें ज़्यादा-तर जनसाधारण की तरफ़ से उठती हैं। और उन आवाज़ों को ख़ामोश कर देना पश्चिमवालों का मामूल होता है। यह कश्मकश बराबर की सतह पर नहीं है। दोनों पक्षों के भौतिक संसाधनों में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। ये दोनों पक्ष इस समय बराबर के पक्ष नहीं हैं। भौतिक दृष्टि से, संसाधनों की दृष्टि से, उनके मध्य बहुत गहरा अन्तर पाया जाता है। अलबत्ता ये दोनों सभ्यताएँ एक दृष्टि से बराबर हैं, वह यह कि इन दोनों सभ्यताओं के समर्थक उस निश्चय एवं संकल्प से भरपूर हैं जो निश्चय और संकल्प किसी प्रबल सभ्यता के अनुयायियों में पाया जाता है। जो आवाज़ें इस्लामी सभ्यता के पुनरुत्थान और अस्तित्व के लिए उठ रही हैं, वे आवाज़ें उठानेवाले अपने संकल्प एवं साहस में पश्चिमी सभ्यता के ध्वजावाहकों से कम नहीं हैं। एक दृष्टि से इस्लामी सभ्यता को वर्चस्व आज भी प्राप्त है। वह नैतिक वर्चस्व है। सोच और विचारधारा की व्यापकता का वर्चस्व है। वह विचारों और विचारधाराओं में सामंजस्य और एकजुटता का पहलू है। इस पहलू से मुस्लिम जगत् में आज भी बहुत-से ऐसे नुमायाँ भेदभाव पाए जाते हैं जो पश्चिमवालों को प्राप्त नहीं हैं।

मुस्लिम जगत् और पश्चिम से सम्बन्धों के बारे में चर्चा करते हुए यह ऐतिहासिक तथ्य नज़रों से ओझल नहीं होना चाहिए कि पश्चिमवालों की पहल मुस्लिम जगत् में जब भी हुई है, व्यापार और आर्थिक ख़ुशहाली के नाम पर हुई है। इसके विपरीत इस्लामी सभ्यता को पश्चिम जगत् और पूरबी दुनिया में जब भी पहल हुई, वह नैतिकता, मूल्यों और आध्यात्मिक उद्देश्यों के नाम पर हुई। इस्लामी सभ्यता जहाँ भी गई वह उन आध्यात्मिक मूल्यों को लेकर गई। उस नैतिक सन्देश को लेकर गई, उस चरित्र और इंसानी समता को लेकर गई जिसका इस्लाम ध्वजावाहक है। मुसलमानों के क़दम जहाँ भी पहुँचे, पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक, वहाँ जो-जो लोग उनसे प्रभावित हुए उनकी ज़िन्दगी में आज भी वे प्रभाव महसूस होते हैं। प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के क़दम जहाँ तक पहुँचे, वह इलाक़ा आज भी मुस्लिम बहुल इलाक़ा है। जो इलाक़े प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने फ़तह किए हैं, प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के हाथों फ़तह हुए हैं, वे इलाक़े आज भी मुस्लिम बहुल इलाक़े हैं। प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने उनमें से किसी को ज़बरदस्ती मुसलमान नहीं किया। ये लोग प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के बहुत बाद के ज़माने में मुसलमान हुए हैं। ये तमाम इलाक़े सीरिया, इराक़, मिस्र, ईरान ये कई सौ साल तक ग़ैर-मुस्लिम बहुल इलाक़े रहे, लेकिन नैतिकता और चरित्र का जो दीप प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के हाथों रौशन हुआ था उससे ये सब लोग रौशनी प्राप्त करते रहे। बहुत जल्द एक ज़माना ऐसा आया कि ये सारे इलाक़े इस्लामी सभ्यता के इलाक़े बन गए। उसके मुक़ाबले में पश्चिमी सभ्यता आर्थिक विकास और भौतिक ख़ुशहाली के नाम पर अस्तित्व में आई थी। इस आर्थिक विकास और ख़ुशहाली के लाभ पश्चिम को तो प्राप्त हुए लेकिन मुस्लिम जगत् को ये लाभ या तो प्राप्त नहीं हुए या बहुत सीमित और सामयिक साबित हुए। अलबत्ता वे प्रभाव जिनका प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध पश्चिम के हितों और वर्चस्व से था, वे बहुत भरपूर भी साबित हुए और टिकाऊ भी।

ईस्ट इंडिया कंपनी जब भारत में आई थी तो किस नाम से आई थी? ईस्ट इंडिया कंपनी ने जब यहाँ के शासकों से व्यापारिक रिआयतें प्राप्त कीं तो भौतिक लाभ और आर्थिक ख़ुशहाली, व्यापारिक सरगर्मी के नाम पर ही ये सब लाभ प्राप्त किए। यह बात कहने में आज कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जिन मुसलमान शासकों ने ईस्ट इंडिया कंपनी को रिआयतें प्रदान कीं, उन्होंने अपनी मानसिक दूरी का अच्छा नमूना पेश नहीं किया। तुरन्त और विभिन्न भौतिक लाभों की ख़ातिर, जो प्राप्त भी नहीं हुए, उन्होंने एक ऐसा फ़ैसला किया जिसके नतीजे में ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में जगह-जगह अपने केन्द्र क़ायम करने में सफल हो गई। यह केन्द्र समय बीतने के साथ-साथ फ़ौजी छावनियों और कैम्पों में परिवर्तित हो गए और आख़िरकार पूरे भारत पर क़ब्ज़ा करने में सफल हो गए।

तेल की कंपनियाँ अरब देशों में गईं, वर्ल्ड बैंक दुनिया के दूसरे देशों में आया। वैश्वीकरण (Globlalisation) के नाम पर दुनिया में जो कुछ हो रहा है वह सब के सामने है। डब्ल्यू.टी.ओ. (WTO) के नाम पर क्या-क्या हो रहा है? आई.एस.ओ. (ISO) के नाम से जो संस्थाएँ हैं वे जो कुछ कर रही हैं सब आर्थिक विकास के नाम पर हो रहा है।

आज हमारा शासक और प्रभावशाली वर्ग इस अस्पष्ट आर्थिक ख़ुशहाली पर इसी तरह ख़ुशी महसूस करता है जिस तरह आज से दो सौ साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन पर हुआ था। अगर ईस्ट इंडिया कंपनी के इतिहास का और आज के ग्लोबलाइज़ेशन, डब्लयू.टी.ओ. और आई.एस.ओ. का जायज़ा लिया जाए, तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट रूप से अन्दाज़ा हो जाता है कि दोनों की धारणाओं में समानता है। एक-दूसरे से ये इतने क़रीब हैं कि ऐसा मालूम होता है कि उसी प्राचीन अनुभव और आज़माए हुए नक़्शे को सामने रखकर नया नक़्शा बनाया गया है। बहरहाल ये वे परिणाम थे जो सेक्युलरिज़्म के नतीजे में आख़िरकार सामने आए।

सेक्युलरिज़्म में सबसे आरम्भिक क़दम जिन क़ौमों ने उठाया, उनमें तुर्कों का नाम बहरहाल शामिल है। तुर्कों की अकर्मण्यताओं का ख़मियाज़ा पूरे मुस्लिम जगत् को भुगतना पड़ा। लेकिन तुर्कों का यह ढीलापन मात्र शासकों की कमी नहीं थी। सबसे पहले यह तुर्क इस्लामी विद्वानों की कमी थी। विद्वावों ने इन समस्याओं का हल पेश करने में कोताही की, जिनको तुरन्त हल करने की ज़रूरत थी। जिनका इस्लामी हल प्रस्तावित करना इन विद्वानों की ज़िम्मेदारी भी थी, पदगत कर्त्तव्य भी था, क़ौमी और मिल्ली ज़िम्मेदारी भी थी। वे ऐसा करने में सफल नहीं रहे, असफल रहे। यह राजनेताओं की भी कोताही थी। ये साहित्यकारों और पत्रकारों की भी कमी थी और आम शिक्षित वर्गों की कमी भी थी। इस पूरी कमी का जो नतीजा निकला वह सल्तनते-उस्मानिया की हार और टूट-फूट के नतीजे में निकला। मुस्लिम जगत् में सेक्युलरिज़्म के बढ़ावे के रूप में निकला। सेक्युलरिज़्म के नतीजे में क्षेत्रीय नेशनलिज़्म के राक्षस ने अपना सिर उठाया। इस राक्षस ने मुस्लिम जगत् को लहु-लुहान कर डाला। मुस्लिम जगत् छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित हो गया। और भी विभाजन-दर-विभाजन की योजनाएँ बनाई जा रही हैं। क्षेत्रीय नेशनलिज़्म की कोख से जन्म लेनेवाले ये सारे फ़ित्ने भी मुसलमानों को सबक़ सिखाने में सफल नहीं हुए। आज भी मुस्लिम जगत् के अनेक इलाक़ों में सेक्युलरिज़्म और नेशनलिज़्म का वही नुस्ख़ा आज़माया जा रहा है, जो दो सौ साल पहले आज़माया गया था। जो पिछली शताब्दी हिजरी के शुरू में आज़माया गया था। और आज इक्कीसवीं शताब्दी ईसवी में और पंद्रहवीं शताब्दी हिजरी में भी आज़माया जा रहा है।

जब यह सेक्युलरिज़्म की परिकल्पना मुस्लिम जगत् के प्रभावकारी वर्ग में फैल गई तो फिर इस्लामी क़ानूनों में भी संशोधनों का आरम्भ शुरू हुआ। यह बात आश्चर्यजनक भी है और महत्त्वपूर्ण भी है कि उपनिवेशवाद के दौर में मुस्लिम देशों में आम तौर से, इस्लामी क़ानून में किसी संशोधन की कोशिश नहीं हुई। इक्का-दुक्का आवाज़ें उठती रहीं, लेकिन वे बहुत अप्रभावी और मामूली आवाज़ें थीं। उसके मुक़ाबले में जो आवाज़ें उठीं, वे इस्लामी क़ानून के लागू होने की आवाज़ें थीं। इस्लाम के पारिवारिक और व्यक्तिगत क़ानूनों के आधार पर क़ानूनसाज़ी की आवाज़ें थीं जिनमें मुस्लिम जगत् के तमाम वर्गों ने हिस्सा लिया। उपमहाद्वीप की मिसाल अगर हम सामने रखें तो नज़र आता है कि मुहम्मद अली जिनाह, अल्लामा इक़बाल, मौलाना शिबली नामानी, मौलाना अशरफ़ अली थानवी, मुफ़्ती किफ़ायतुल्लाह साहब, मुहम्मद अहमद काज़मी और उन जैसे बहुत-से लोगों ने ये कोशिशें कीं और वे इन कोशिशों में सफल हुए कि इस्लाम के व्यक्तिगत क़ानून, अंग्रेज़ी अदालतों और अंग्रेज़ी क़ानूनसाज़ संस्थाओं के द्वारा लागू कराए जाएँ, लेकिन जैसे ही आज़ादी का अमल मुकम्मल हुआ और मुस्लिम जगत् के विभिन्न देश आज़ाद हुए तो एक दम से ये आवाज़ें बहुत मज़बूत हो गईं कि इस्लाम के व्यक्तिगत क़ानून में संशोधन किया जाए। इस्लाम के बारे में बहुत-से आदेशों के बारे में शक-सन्देहों को हवा देने का कार्य ज़ोर-शोर से बढ़ गया। चुनाँचे बहुत-से लुभावने शीर्षकों को प्रयोग करते हुए पश्चिमी धारणाओं को बढ़ावा देने की कोशिशें तेज़ी से की जाने लगी हैं। पश्चिमवालों का यह तरीक़ा रहा है कि वह अपने हर काम के लिए अच्छे शीर्षक तराशते हैं। इन अच्छे शीर्षकों के विवरण जितने भी घटिया और अस्वीकार्य हों, उनका शीर्षक हमेशा स्वीकार्य और आकर्षक होता है। चुनाँचे पश्चिमी देशों में मौजूद सामाजिक ऊहापोह, परिवार की संस्था का बिखरना, आम बेशर्मी, स्त्री-पुरुष के मध्य सम्बन्ध में बिगाड़, इन तमाम ख़राबियों का नाम वहाँ स्त्री-पुरुष समानता है। समता के नाम से कोई इनकार नहीं कर सकता कि स्त्री-पुरुष के मध्य समता होनी चाहिए। महिलाओं को वही अधिकार मिलने चाहिएँ, जो पुरुषों को मिलते हैं। पुरुषों के अधिकार एवं कर्त्तव्य वैसे ही होने चाहिएँ जैसे स्त्रियों के अधिकार एवं कर्त्तव्य हैं। इससे कोई व्यक्ति इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इस शीर्षक के अन्तर्गत जो बातें बयान की जाती हैं वे इस्लामी धारणाओं की दृष्टि से पूर्णतः अस्वीकार्य हैं। शरीअत ने कुछ परिस्थितियों में बहुपत्नीत्व की अनुमति दी है। बहुपत्नीत्व को शरीअत ने इस तरह अप्रिय क़रार नहीं दिया जिस तरह पश्चिमी सभ्यता में क़रार दिया जाता है। शरीअत ने कुछ निहितार्थों के तहत तलाक़ का अधिकार पुरुषों को दिया है। यह मौलिक रूप से पुरुष का अधिकार है कि वह तलाक़ के अधिकार का प्रयोग करे। निकाह में वली (संरक्षक) बनने का अधिकार बाप को, चाचा को, या बड़े भाई को प्राप्त है। तलाक़-शुदा औरत (परित्यक्ता) को नफ़क़ा (गुज़ारा-भत्ता) कितना दिया जाए और कैसे दिया जाए? यतीम पोते की विरासत क्या और कैसे हो? ये वे मामले हैं जहाँ शरीअत के स्पष्ट आदेश मौजूद हैं, शरीअत के निर्धारित और तय-शुदा सिद्धान्तों पर यह आदेश आधारित हैं। इन सबकी उपेक्षा करके मात्र न्याय और समता के पश्चिमी नारों से प्रभावित होकर पश्चिमी गुमराहियों को आम किया जाए, यह उपनिवेशवाद के दौर में नहीं हुआ था। यह बात मुस्लिम जगत् के कई देशों में आज़ादी के बाद ही सम्भव हुई।

मुस्लिम जगत् के अनेक देशों में ये धारणाएँ एक-एककर फैलाई गईं जिसके अनुसार उन सभी क़ानूनों के बारे में एक अविश्वास का वातावरण पैदा हुआ। इस अविश्वास के माहौल में इन क़ानूनों में संशोधनों का काम आसान हो गया। चुनाँचे कई देशों में ऐसे-ऐसे संशोधन किए गए जो इस्लामी इतिहास में कभी सोचे भी नहीं गए। उनमें से अधिकांश सशोधनों का मूल स्रोत केवल पश्चिमी क़ानून थे। यह स्रोत या तो स्विटज़रलैंड का सिविल कोड था, या फ़्रांस का कोड नापोलियाँ था, या अंग्रेज़ी क़ानून थे।

यहाँ एक बात बहुत अजीब है। वह यह कि ये पश्चिमी क़ानून जिनको लागू करने की दावत हमारा एक वर्ग देता रहा है। इन पश्चिमी क़ानूनों के चयन में भी इस वर्ग ने किसी नए पन या आलोचनात्मक क्षमता का सुबूत नहीं दिया। पश्चिमी जगत् के जो इलाक़े फ़्रांस के प्रभावाधीन थे वहाँ फ़्रांसीसी क़ानून ही को मानक समझा जाता है। जो चीज़ फ़्रांस में हुई है वह सत्य और सच्चाई का उच्चतम मापदंड है। न्याय और इंसाफ़ के उच्चतम स्तर की व्यवस्था पर इस वर्ग के निकट फ़्रांसीसी ही पूरा उतरता है। अत: उसे अपना लिया जाए। इसके विपरीत हमारे यहाँ हर वह चीज़ जो इंग्लैंड या अमेरिका में हुई उसे अपना लेने को आधुनिकता और विकास का चरम माना जाता है। इससे पता यह चला कि इन धारणाओं का ज्ञानपरक अध्ययन किसी ने नहीं किया। मात्र निजी जानकारी और दूसरों से प्रभावित होने की वजह से इन धारणाओं को स्वीकार करने की दावत दी जा रही है। अगर इन धारणाओं की किसी ज़ाती ख़ूबी की वजह से यह माँग की गई होती तो कम-से-कम एक मिसाल तो ऐसी मिलती कि किसी ज्ञानवान ने अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, जर्मन, इतालवी इन तमाम क़ानूनों का एक आलोचनात्मक और तुलनात्मक जायज़ा लिया होता। अध्ययन करने के बाद, जायज़ा लेने के बाद किसी एक धारणा को प्रिय क़रार दिया गया होता। फिर उस धारणा का इस्लामी धारणाओं से मुक़ाबला किया गया होता और फिर यह साबित किया गया होता कि इन धारणाओं में क्या ख़ूबी है और इस्लामी धारणाओं में क्या ख़राबी है? अगर ऐसा किया गया होता तो फिर सचमुच इसमें जान होती कि पश्चिमी क़ानून का अमुक सिद्धान्त अनुपालन योग्य है। फिर इस दावे का कोई आधार होता, लेकिन ऐसा कहीं नहीं हुआ, न फ़्रांसीसियों के मुरीदों ने ऐसा किया। वहाँ फ़्रांस ने जो नतीजा लिखकर दिया उसपर कार्यान्वयन की दावत दे दी गई। यहाँ अंग्रेज़ ने जो नतीजा लिखकर दिया उसपर कार्यान्वयन की दावत दी जा रही है।

यह स्थिति है जो पिछले सौ-सवा-सौ वर्षों से मुस्लिम जगत् के सामने है। लेकिन इस नकारात्मक स्थिति के साथ-साथ मुस्लिम जगत् में आज बहुत-से ऐसे सकारात्मक पहलू भी मौजूद हैं जो एक अत्यन्त सुखद इस्लामी भविष्य के द्योतक हैं। उनसे एक ऐसे इस्लामी भविष्य की शुभसूचना मिलती है जहाँ इस्लामी शरीअत के आदेशों के आधार पर क़ानून बनाए गए हों। सामूहिक जीवन के ढंग और शरीअत की व्यवस्था के आधार पर क़ायम हुए हों। ज़िन्दगी के तमाम मामलों का एक नया तरीक़ा दुनिया के सामने रखा जा रहा हो। दुनिया को सफलता के साथ यह बताया जा रहा हो कि इस्लाम के आदेश और धारणाएँ आज भी इसी तरह प्रभावशाली और स्वीकार्य हैं जिस तरह अतीत में प्रभावशाली और स्वीकार्य थीं।

इस्लामी सभ्यता और पश्चिमी सभ्यता के दरमियान संघर्ष की यह दास्तान बज़ाहिर हतोत्साहित करनेवाली मालूम होती है। प्रकट में ऐसा लगता है कि शायद भविष्य की लगामें मुसलमानों के हाथों से छूट चुकी हैं, लेकिन मामलात को ज़रा ग़ौर से देखा जाए तो मालूम होता है कि ऐसा नहीं है। इस पूरे संघर्ष के दौरान मुसलमानों का बहुत बड़ा वर्ग, जनसाधारण की बहुत बड़ी संख्या न केवल आशान्वित रही है, बल्कि उन कठिनाइयों और कष्टों के समुद्रों से गुज़रने के नतीजे में उनका ईमान इस्लामी शरीअत पर पहले से बहुत ज़्यादा मज़बूत हुआ है। आधुनिक शिक्षा प्राप्त वर्ग की एक बहुत बड़ी संख्या नए सिरे से इस्लामी शरीअत की तरफ़ आकर्षित हुई है और एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा पैदा हुआ है जो जहाँ पश्चिम को अच्छी तरह समझता है वहाँ इस्लामी शरीअत पर ईमान और शरीअत को नए सिरे से लागू करने के लिए अपने संकल्प में किसी भी दूसरे उत्साहित निष्ठावान मुसलमान से कम नहीं है।

पश्चिमी सभ्यता के साथ इस टकराव के नतीजे में फ़िक़्हे-इस्लामी के बहुत-से विशेषज्ञों ने पश्चिमी क़ानून से लाभ भी उठाया है, पश्चिमी क़ानून की शैलियों को प्रयोग भी किया है, और इस्लामी क़ानून को पेश करने के और आधुनिक शिक्षित वर्ग के लिए आसान बनाने के लिए पश्चिमी क़ानून की क्रम शैली और वर्णन शैली से मदद भी ली है। ऐसा मालूम होता है कि वह समय क़रीब आ रहा है जब मुस्लिम जगत् के चिन्तक पश्चिमी क़ानून, पश्चिमी सभ्यता और पश्चिमी विचारधारा के अध्ययन के सिलसिले में वही अन्दाज़ अपनाएँगे जो अपने-अपने ज़माने में हुज्जतुल-इस्लाम इमाम ग़ज़ाली (रह॰), इमाम फ़ख़रुद्दीन राज़ी (रह॰), और शैख़ुल-इस्लाम अल्लामा इब्ने-तैमिया (रह॰) ने अपनाया था। इन लोगों ने इस ज़माने में प्रचलित पश्चिमी सभ्यता यानी यूनानी धारणाओं, यूनानी विचारों और यूनानी बौद्धिकता का अत्यन्त गहरा बौद्धिक और तार्किक अध्ययन किया। उसके नकारात्मक पहलुओं की ज्ञानपरक ढंग से निशानदेही की। उनका तार्किक रूप से खंडन किया और इस्लामी दृष्टिकोण को बौद्धिक रूप से साबित करने में एक नुमायाँ भूमिका निभाई।

ऐसा मालूम होता है कि अल्लामा इक़बाल ने जिस चीज़ की दावत दी थी। 1925 में जिस ज़रूरत का इज़हार किया था अब इस ज़रूरत की पूर्ति का सामान उपलब्ध हो चुका है। वैचारिक और ज्ञानपरक दृष्टि से हालात पहले से कहीं ज़्यादा अब इस बात के लिए अनुकूल हैं कि वह कार्य किया जाए जिसका एहसास अल्लामा इक़बाल को 1925 में हुआ था। 1925 में उन्होंने लिखा था कि जो व्यक्ति वर्तमान समय के jurisprudence (न्यायशास्त्र) पर आलोचनात्मक दृष्टि डालकर इस्लामी आदेशों के शाश्वत होने को साबित करेगा वह मानवजाति का सबसे बड़ा सेवक और शायद इस शताब्दी का मुजद्दिद होगा। फिर अल्लामा ने लिखा, ׅ“इस समय इस्लाम धर्म शायद ज़माने की कसौटी पर कसा जा रहा है।” उन हालात में मुसलमान विद्वान इस ज़रूरत का एहसास तो करते रहे जिसका एहसास अल्लामा इक़बाल ने किया, लेकिन आज से कुछ दशकों पहले वह साज़ो-सामान मौजूद नहीं था। वह मसाला और संसाधन मौजूद नहीं थे, जो इस काम के लिए अनिवार्य थे। चौदहवीं शताब्दी के आरम्भ में ऐसे लोग लगभग विलुप्त  हो गए थे, जो पश्चिमी क़ानून, पश्चिमी सभ्यता और पश्चिमी विचारधारा की आत्मा को पूरे तौर पर समझते हों। पश्चिमी भाषाओं से प्रत्यक्ष रूप से परिचित हों। और उन सब प्रतिभाओं के साथ-साथ इस्लामी शरीअत को उसके मूल स्रोतों की रौशनी में प्रत्यक्ष रूप से मुज्तहिदाना अन्दाज़ से समझते हों। यानी पश्चिम से आलोचनात्मक रूप से परिचित हों और शरीअत के आदेशों में मुज्तहिदाना बसीरत (गहरी सूझ-बूझ) रखते हों।

आज ऐसे लोग सामने आ रहे हैं। अतीत में यह जानकारी यक-तरफ़ा थी या कम थी। पश्चिमवाद को जाननेवाले अलग थे और शरीअत को जाननेवाले अलग थे। आज ऐसे लोग विलुप्त नहीं हैं। आज इस ज़रूरत का एहसास बढ़ रहा है। अरब दुनिया में बहुत-से ऐसे ज्ञान सामने आए हैं जिन्होंने पश्चिमी विचारों का विशेष रूप से फ़्रांसीसी क़ानूनी धारणाओं का आलोचनात्मक अध्ययन किया है। इस्लामी शरीअत से उनकी तुलना की है और इस्लामी शरीअत के बहुत-से आदेशों और धारणाओं का सर्वोपरि होना, बौद्धिक और ज्ञानपरक तर्कों से बयान किया है। उस्ताद अबदुर्रज़्ज़ाक़ सनहुरी, उस्ताद अबदुल-क़ादिर औदा शहीद, मुस्तफ़ा अहमद अज़-ज़रक़ा और इस सतह के अनेक लोगों ने जो ज्ञानपरक प्रयास किए हैं, वे फ़िक़्हे-इस्लामी के इतिहास में प्रवृत्ति बनानेवाला चरित्र और स्थान रखते हैं।

फ़िक़्हे-इस्लामी के पुनः संकलन का कार्य भी चौदहवीं शताब्दी हिजरी में बड़े पैमाने पर हुआ है। बतौर संकलित क़ानून के बहुत-से विद्वानों ने फ़िक़्हे-इस्लामी पर किताबें तैयार की हैं। उर्दू ज़बान में भी यह काम हुआ है। अरबी में भी हुआ है। अंग्रेज़ी में भी हुआ है। सरकारी सतह पर भी हुआ है और ग़ैर-सरकारी सतह पर भी हुआ है। शायद आपके ज्ञान में हो कि जामिआ अल-अज़हर ने आज से पच्चीस-तीस साल पहले इस्लामी क़ानून की धारा के अनुसार क्रम का काम कराया था। और यह काम कई भागों में प्रकाशित रूप में मौजूद है। लीबिया में भी यह काम हुआ है। इस्लामी क़ानून के कलात्मक ढंग से संकलन का काम सत्तर के दशक में लीबिया में हुआ। मुस्लिम जगत् के पहली पंक्ति के विद्वानों ने इसमें भाग लिया और उनका प्रयास आज प्रकाशित रूप में मौजूद हैं। पाकिस्तान में भी यह काम हुआ है। लगभग हर मुस्लिम देश में किसी-न-किसी स्तर पर, फ़िक़्हे-इस्लामी के संकलन का कार्य हुआ है।

सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय काम जो चौदहवीं शताब्दी हिजरी में हुआ है, जिसमें फ़िक़्हे-इस्लामी को आधुनिक शिक्षा प्राप्त वर्ग के लिए आम कर दिया गया है, वह आधुनिक ढंग पर इन किताबों का संकलन और लेखन है, जिसने अरब दुनिया में पूरे पुस्तकालयों के पुस्तकालय तैयार कर दिए हैं। अरब दुनिया की लाइब्रेरियाँ इन किताबों से भर दी हैं जो फ़िक़्हे-इस्लामी और शरीअते-इस्लामी के विभिन्न पहलुओं को एक नए और आधुनिक ढंग से बयान करती हैं। फ़िक़्हे-इस्लामी की धारणाओं पर अलग-अलग किताबें तैयार हुई हैं। यह शैली आधुनिक पश्चिमी क़ानून की शैली है। प्राचीन इस्लामी फ़ुक़हा ने फ़िक़्हे-इस्लामी की बहसों से इस ढंग से बहस नहीं की थी, लेकिन आधुनिक अरब लेखकों ने मराक़श (मोरक्को) से लेकर खाड़ी देशों तक और इराक़ से लेकर सूडान तक इस विषय पर सैकड़ों नहीं हज़ारों भाग तैयार कर दिए हैं। फ़िक़्हे-इस्लामी के दायरतुल-मआरिफ़ (विश्वकोश) सामने आए हैं। यों फ़िक़्हे-इस्लामी के एक एक पहलू को अरब शोध कर्ताओं ने खंगालकर रख दिया है। अब उनके शोधों के प्रभाव पाकिस्तान, तुर्की, इंडोनेशिया, मलयेशिया और दूसरे ग़ैर-अरब देशों तक पहुँच रहे हैं और नए ढंग का यह काम अंग्रेज़ी ज़बान में भी हो रहा है।

चौदहवीं शताब्दी हिजरी के आरम्भ में फ़िक़्हे-इस्लामी और शरीअत के विषय पर शायद एक किताब भी अंग्रेज़ी या किसी पश्चिमी भाषा में मौजूद न हो, जो किसी सही विचार रखनेवाले मुसलमान ने ठोस आधार पर लिखी हो जिसकी मदद से एक पश्चिमी पाठक फ़िक़्हे-इस्लामी और शरीअते-इस्लामी के दृष्टिकोण तक प्रत्यक्ष रूप से पहुँच सके। आज ऐसी किताबें सैकड़ों की संख्या में उपलब्ध हैं। ये किताबें फ़्रांसीसी, अंग्रेज़ी और दूसरी पश्चिमी भाषाओं में उपलब्ध हैं। फ़िक़्हे-इस्लामी पर आपत्तियाँ प्राच्यविदों की तरफ़ से भी होती रही हैं और पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित उनके शिष्यों की तरफ़ से भी होती रही हैं। जिनका जवाब अरब दुनिया में विस्तारपूर्वक दिया गया है। ऐसी किताबें लिखी गईं जिनसे प्राच्यविदों ही की तर्क-शैली से काम लेकर उन ग़लत-फ़हमियों को स्पष्ट किया गया है, जो कुछ प्राच्यविदों की तरफ़ से पैदा होती हैं। प्राच्यविदों की कुछ आपत्तियाँ कम-समझी पर आधारित हैं। कुछ आपत्तियाँ दृष्टिकोण के मतभेदों की वजह से पैदा होती हैं। कुछ मतभेद इसलिए पैदा हुए हैं कि प्राच्यविद इन बुनियादों से सहमत नहीं हैं जिनपर इस्लामी फ़िक़्ह और शरीअत की इमारत खड़ी है। कुछ प्राच्यविद ऐसे भी हैं जिनकी नीयत के बारे में सन्देह करने की बड़ी बुनियादें और औचित्य मौजूद हैं।

चौदहवीं शताब्दी हिजरी में एक लम्बे अनतराल के बाद फ़िक़्हे-इस्लामी के बहुत-से आदेशों पर एक नए ढंग से कार्यान्वयन भी शुरू हुआ है। अगरचे इस मैदान में मुस्लिम जगत् के आधुनिक मुस्लिम देशों की कार्यकुशलता ज़्यादा उत्साहित करनेवाली नहीं है, लेकिन इतनी हतोत्साहित करनेवाली भी नहीं जितनी बहुत-से लोग समझते हैं। पाकिस्तान का अनुभव इस्लामी संविधान बनाने के मैदान में, मित्र देश सऊदी अरब का फ़िक़्हे-इस्लामी के एक विशाल मैदान को असंकलित क़ानून के तौर पर लागू करने के मामले में सूडान का अनुभव और अनेक मुस्लिम देशों का अनुभव इस मामले में अत्यन्त उत्साहवर्धक है। कुछ मुस्लिम देश, जहाँ इस्लामी क़ानून को संकलित करने के मामले में काफ़ी महत्वपूर्ण काम हुआ है, ऐसे भी हैं जिनके बारे में आम तौर पर मालूमात की कमी है। वहाँ फ़िक़्हे-इस्लामी के नव-संकलन और इस्लामी शरीअत को आधुनिक ढंग से लागू करने का अनुभव काफ़ी सुखद है। मुस्लिम देशों ब्रुनेई, उर्दुन (जॉर्डन), और कई दूसरे देशों में, इस सन्दर्भ में ख़ासी पहल हुई है।

इस पहल में जो चीज़ सबसे नुमायाँ है वह यह है कि अतीत के विपरीत आज के दौर में शरीअत को लागू करना आम तौर पर संकलन के द्वारा हो रहा है। अतीत में फ़िक़्हे-इस्लामी की हैसियत लगभग वह थी जो अंग्रेज़ी इतिहास में common law की रही है। अंग्रेज़ी कॉमन लॉ एक असंकलित क़ानून था। जिसके आधार पर इंग्लैंड की व्यवस्था एक लम्बे समय तक चलती रही है। इंग्लैंड की अदालतें इसी असंकलित क़ानून पर कार्यान्वयन करती रही हैं। लगभग यही कैफ़ियत बारह सौ साल तक फ़िक़्हे-इस्लामी की रही है। लेकिन पिछले डेढ़ दो-सौ वर्षों के दौरान इस ज़रूरत का एहसास हुआ है कि फ़िक़्हे-इस्लामी के आदेशों को संकलित करके क़ानून के तौर पर लागू किया जाए।

दूसरी बड़ी नुमायाँ प्रवृत्ति जो फ़िक़्हे-इस्लामी के इतिहास में एक नई प्रवृत्ति है और दरअस्ल यह प्रवृत्ति इस्लाम के आरम्भिक दौर यानी पहली और दूसरी शताब्दी हिजरी की परम्परा से ज़्यादा क़रीब है। वह यह है कि किसी निर्धारित फ़िक़ही मसलक की पाबन्दी और पैरवी करने के बजाय पब्लिक लॉ की हद तक आम फ़िक़ही रायों से लाभान्वित हुआ जाए और तमाम बड़े-बड़े फ़ुक़हाए-मुज्तहिदीन, जिनमें प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) और ताबिईन भी शामिल हैं उनके इज्तिहाद को सामने रखकर आधुनिक काल की समस्याओं का हल पेश किया जाए। इस काम में ज्ञानपरक सहायता उपलब्ध करने की ग़रज़ से उस दौर में सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) और ताबिईन के इज्तिहादात पर भी काम हुआ है। सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) और ताबिईन के इज्तिहादात पर मोटी-मोटी किताबें तैयार हो गईं हैं। यह मालूमात जो हदीस और फ़िक़्ह की प्राचीन किताबों में बिखरी हुई थीं, हज़ारों पृष्ठों पर बिखरी हुई थीं, उनको एक जगह कर दिया गया है। और अरब दुनिया के एक नामवर ज्ञानवान डॉक्टर रव्वास क़िलाजी ने, हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) अब्दुल्लाह इब्ने-अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत अली इब्ने-तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु), सहाबा में से, ताबिईन में से बड़े-बड़े ताबिईन, तबा-ताबिईन, इन सबके इज्तिहादात को और फ़िक़ही ख़यालात को अलग-अलग भागों में इकट्ठा कर दिया है। दर्जनों भागों पर आधारित यह भंडार आज इज्तिहादी कार्य को एक नए ढंग से शुरू करने में ज़रूरी ज्ञानपरक मार्गदर्शन कर सकता है। आज दुनिया के विभिन्न मुस्लिम देशों में जो राज्य क़ानून तैयार हो रहे हैं उन सबमें प्रवृत्ति यही है कि किसी एक निर्धारित फ़िक़ही मसलक की पैरवी करने की बजाय तमाम फ़िक़ही मसलकों को सामने रखा जाए। विशेष रूप से मामलात और व्यापार के मैदान में यह कोशिश बहुत नुमायाँ रही है। आज इस्लामी बैंकिंग पर काम हो रहा है। इस्लामी इंश्योरेंस और तकाफ़ुल के क़ानून बन रहे हैं। इन सब क़ानूनों में किसी निर्धारित फ़िक़ही मसलक की पैरवी नहीं हो रही, बल्कि तमाम दुनिया के पहली पंक्ति के विद्वान विभिन्न अकैडमियों और ज्ञान की सभाओं में बैठकर इस समय सामूहिक चिन्तन-मनन कर रहे हैं और पूरे फ़िक़्हे-इस्लामी के संग्रह को सामने रखकर यह काम कर रहे हैं।

यों सामूहिक इज्तिहाद की प्राचीन इस्लामी परम्परा आज नए सिरे से ज़िन्दा हो रही है। वह प्राचीन इस्लामी परम्परा जिसके नमूने प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के इज्तिहादात और फ़िक़्ह के आरम्भिक संकलन में विशेष रूप से नज़र आते हैं। इस सामूहिक इज्तिहाद के नतीजे में जो काम हुआ है वह अत्यन्त उल्लेखनीय और ऐतिहासिक काम है। इस्लामी दस्तूर, इस्लाम के प्रशासनिक क़ानून और राजनैतिक विचारों का एक बिलकुल नए ढंग से संकलन हुआ है। आज से पहले, गोया चौदहवीं शताब्दी से पहले इस्लाम के दस्तूरी क़ानून इकट्ठा नहीं थे। जिन लोगों ने ‘अल-अहकामुस-सुल्तानिया' या ‘सियासते-शरईया’ के शीर्षक से किताबें तैयार की थीं वे एक लाभकारी ज्ञानपरक काम तो ज़रूर थीं, लेकिन उनसे वे क़ानूनी और प्रशासनिक माँगें पूरी नहीं हो सकती थीं जो एक संविधान और क़ानून की किताब से पूरे होने चाहिएँ। चुनाँचे बीसवीं शताब्दी के मध्य में जब एक के बाद एक मुस्लिम देश आज़ाद होने शुरू हुए तो इस्लामी संविधान बनाने के लिए आवाज़ें हर जगह बुलन्द हुईं। पाकिस्तान, इंडोनेशिया, सूडान, शाम, इराक़, मिस्र इन सब देशों में इस्लामी संविधान बनाने पर चर्चा का आरम्भ हुआ। हर स्तर पर इस्लामी संविधान और राज्य तथा शासन के विषयों पर बहस हुई। बहुत-से विद्वानों ने इस्लामी संविधान के आदेशों को नई भाषा और नए ढंग से संकलित करने का आरम्भ किया। पाकिस्तानवालों का काम इस मैदान में सबसे नुमायाँ रहा। यहाँ यह काम व्यक्तिगत स्तर पर भी हुआ और सामूहिक स्तर पर भी। यों बीसवी शताब्दी में या चौदहवीं शताब्दी हिजरी के विद्वानों ने फ़िक़्हे-इस्लामी का एक ऐसा अध्याय नए ढंग से संकलित करके रख दिया जो फ़िक़्हे-इस्लामी के इतिहास की एक नुमायाँ कोशिश क़रार दिया जा सकता है।

आज इस्लाम की राजनैतिक धारणाएँ, फ़िक़्हे-इस्लामी के राजनैतिक आदेश, शरीअते-इस्लामी के संवैधानिक नियम एवं सिद्धान्त स्पष्ट और निर्धारित रूप से लगभग तय-शुदा हैं। मुस्लिम जगत् के हर इलाक़े में और हर मसलक और राय रखनेवालों के बीच इसपर मतैक्य मौजूद है कि इस्लामी राज्य से क्या मुराद है? इस्लामी संविधान के मौलिक आदेश क्या हैं? इस्लामी राज्य में शासकों और जनसाधारण के सम्बन्धों का प्रकार किया है? इन विषयों पर बहुत-सी दस्तावेज़ात तैयार हुई हैं। सैकड़ों से बढ़कर हज़ारों किताबें लिखी गई हैं और यह पहलू इतना स्पष्ट और खुलकर सामने आ गया है कि अब किसी को यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि फ़िक़्हे-इस्लामी के संवैधानिक अध्यायों का नवसंकलन होना चाहिए। यह नवसंकलन हो चुका। इस नवसंकलन की प्रक्रिया से इस्लामी विद्वान बीसवीं ईसवी और चौदहवीं शताब्दी हिजरी में निवृत हो चुके हैं।

यही कैफ़ियत आजकल इस्लाम के आर्थिक आदेशों, व्यापारिक आदेशों और पूँजीनिवेश के आदेशों के बारे में कही जा सकती है। आजकल वह प्रक्रिया जारी है जिसके नतीजे में इस्लामी शरीअत के इस अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विभाग का नवसंकलन हो रहा है। आज पूरी दुनिया में इसपर चिन्तन-मनन हो रहा है। दुनिया के हर मुस्लिम देश में विद्वान इन समस्याओं पर लिख रहे हैं। व्यापार एवं अर्थव्यवस्था और मालियात के मामले में पश्चिमी धारणाओं से इस्लामी आदेशों की तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है। नई आवश्यकताओं के सामने फ़िक़्हे-इस्लामी के आदेशों को नए ढंग और नई शैली से बयान किया जा रहा है। और यह प्रस्तुति मात्र वैचारिक अथवा शैक्षिक ढंग की नहीं हो रही है, बल्कि यह फ़िक़्हे-इस्लामी को एक ज़िन्दा क़ानून के तौर पर एक सक्रिय व्यवस्था के तौर पर परिचित करा रही है। इनमें से हर आदेश पर कार्यान्वयन हो रहा है। मुस्लिम जगत् में भी और मुस्लिम जगत् से बाहर भी। पश्चिमी दुनिया भी इस्लाम की व्यापारिक और आर्थिक व्यवस्था की तरफ़ आकर्षित हो रही है। पश्चिमी दुनिया ने यह महसूस करना शुरू कर दिया है कि इस्लाम की शरीअत व्यापार और आर्थिक मामलों के बारे में एक ऐसा मार्गदर्शन उपलब्ध कर रही है जो उनकी बहुत-सी समस्याओं का हल है। आज ऐसे पश्चिमी विद्वान मौजूद हैं जो गम्भीरतापूर्वक इस्लामी शरीअत के व्यापारिक और आर्थिक आदेशों को समझना चाहते हैं। आज ऐसे पश्चिमी चिन्तक और विद्वान सामने आ रहे हैं जो इस्लाम के व्यापारिक क़ानूनों, इस्लाम के आर्थिक आदेशों और पूँजीनिवेश के नियमों के कुछ मुसलमानों से ज़्यादा समर्थक हैं।

ये कुछ वे मामलात हैं जिनपर फ़िक़्हे-इस्लामी का पक्ष और इस्लामी शरीअत का दृष्टिकोण नए अन्दाज़ से सफलता के साथ बयान किया जा रहा है। कुछ समस्याएँ वे हैं जो अब भी शोध और अध्ययन चाहती हैं। ये वे मामलात हैं जिनपर पश्चिमवालों की ओर से बहुत अधिक आपत्तियाँ की जा रही हैं। मुस्लिम समाज में महिलाओं का चरित्र क्या होना चाहिए? यह समस्या पश्चिमवालों और मुसलमानों के दरमियान काफ़ी वाद-विवाद का विषय बनी हुई है। मुश्किल यह है कि बहुत-से मुस्लिम देशों में क़ुरआन एवं हदीस के स्पष्ट इस्लामी आदेशों और फुक़हा की मुत्तफ़क़ अलैह (सर्वसम्मत) इज्तिहादी विचारधाराओं को कुछ स्थानीय रिवाजों से मिलाया जा रहा है। किसी मुस्लिम देश का स्थानीय रिवाज और चीज़ है और शरीअत के स्पष्ट आदेश और इस्लामी फ़ुक़हा के मुत्तफ़क़ अलैह इज्तिहादात अलग चीज़ हैं। ज़रूरी नहीं कि किसी मुस्लिम देश के पिछले रिवाज को आज इक्कीसवीं शताब्दी में ज्यों-का-त्यों बरक़रार रखने की कोशिश की जाए। इसका अर्थ यह नहीं कि मुसलमान अकारण अपने रिवाजों को छोड़ दें, मात्र पश्चिम की नक़्ल में अपने पारम्परिक तौर-तरीक़ों को छोड़ दें। जिस देश में जो रिवाज और तौर-तरीक़ा है अगर वह शरीअत के अनुसार है, अगर वह न्याय और इंसाफ़ के अनुसार है, अगर उससे इंसानों के मध्य समता और सम्मान के सिद्धान्त प्रभावित नहीं हो रहे, अगर वह आधुनिक काल में शरीअत के उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक एवं सहयोगी है, तो इस रिवाज को बाक़ी रखना चाहिए। मुसलमानों को इसका बचाव करना चाहिए, लेकिन इसके बावजूद इस रस्मो-रिवाज की हैसियत शरीअत के स्पष्ट आदेशों की नहीं है। फुक़हा के मुत्तफ़क़ अलैह (सर्वसम्मत) इज्तिहाद का दर्जा किसी भी रिवाज को प्राप्त नहीं है। अगर किसी स्थानीय रिवाज की वजह से शरीअत बदनाम हो रही हो, अगर किसी स्थानीय रिवाज और तौर-तरीक़े से कुछ लोग विमुख और बदगुमान हो रहे हों, तो उस स्थानीय रिवाज को शरीअत की ख़ातिर क़ुर्बान कर देना चाहिए। शरीअत का उद्देश्य हर चीज़ से बढ़कर है। हर स्थानीय रिवाज, हर स्थानीय तौर-तरीक़ा शरीअत की आन के लिए क़ुर्बान किया जा सकता है। आज जो समस्याएँ पश्चिमी सभ्यता ने बहुत ज़ोर-शोर से उठाई हैं उनमें महिलाओं की हैसियत के अलावा इस्लाम में सज़ाओं के आदेशों के बारे में कहा जा रहा है कि बहुत सख़्त हैं। इर्तिदाद (इस्लाम छोड़ देने) की सज़ा के बारे में सन्देह व्यक्त किए जा रहे हैं। विरासत के कुछ आदेशों के बारे में कुछ सन्देह पैदा किए जा रहे हैं। हिजाब के क़ानून और नियमों के बारे में संकोच का प्रदर्शन किया जा रहा है।

ये सब वे मामलात हैं जिसमें इस्लाम और मुसलमानों का पक्ष विशुद्ध तार्किक अन्दाज़ में बयान करने की ज़रूरत है। यहाँ न दूसरों से प्रभावित होना दरकार है, न पश्चिम से प्रभावित होने की वजह से इस्लामी आदेशों में फेर-बदल करना चाहिए, दूसरी तरफ़ न किसी स्थानीय रिवाज या व्यक्तिगत इज्तिहाद को शरीअत का दर्जा देना चाहिए। किसी फ़क़ीह का इज्तिहाद अगर शरीअत की बदनामी का कारण बन रहा है तो उसको छोड़ देना चाहिए। अगर किसी मुज्तहिद की राय पुनरावलोकन की अपेक्षा करती है तो उसका पुनरावलोकन किया जाना चाहिए। जो चीज़ स्थायी हैसियत रखती है, जो हर वक़्त, हर ज़माने में अनुपालन के लिए अनिवार्य है वह केवल पवित्र क़ुरआन और प्रमाणित सुन्नत के स्पष्ट आदेश हैं।

उनके बाद अगर किसी सिद्धान्त को स्थायित्व प्राप्त है तो वह इस्लाम के महान विद्वानों और मुज्तहिदीन के सर्वसम्मत फ़ैसले हैं। अगर कोई चीज़ इजमाए-उम्मत (मुस्लिम विद्वानों के मतैक्य) से साबित है तो उसको बरक़रार रहना चाहिए। इजमाए-उम्मत मुसलमानों की एकता का ज़मानती है। सामुदायिक एकजुटता की ज़मानत जिस चीज़ ने दी है वह इजमाए-उम्मत है। अत: इजमाए-उम्मत के बारे में, इस्लामी उल्लेखों की निरन्तरता के बारे में, किसी ख़ुशामद या समझौते से काम नहीं लेना चाहिए। अगर एक बार इस्लामी सोच की निरन्तरता और फ़िक़्हे-इस्लामी के स्थायित्व के बारे में ख़ुशामद का रवैया अपना लिया जाए तो फिर उसकी चोट एक-एककर शरीअत के दूसरे पहलुओं पर पड़ेगी। आख़िरकार उसके नतीजे में वे समस्याएँ पैदा होंगी, वे मुश्किलात सामने आएँगी जिनको हल करना बहुत मुश्किल होगा।

आज मुस्लिम जगत् के हर इलाक़े और हर देश में किसी-न-किसी स्तर पर शरीअत के आदेशों को लागू करने और राज्य और समाज के इस्लामी पुनर्गठन के पक्ष में आवाज़ें बुलन्द हो रही हैं। कहीं ये आवाज़ें बहुत धीमी हैं, कहीं बहुत ज़ोर-शोर से सामने आ रही हैं। हुकूमतों का रवैया अलग-अलग जगह अलग-अलग है। कुछ हुकूमतें इस्लाम और शरीअत से बिलकुल बेपरवाह मालूम होती हैं, कुछ का रवैया सख़्त विरोधी और इस्लाम दुश्मनी पर आधारित मालूम होता है। कुछ हुकूमतें इस्लामी मूल्यों की ध्वजावाहक या कम-से-कम दावेदार हैं। और कुछ हुकूमतें वे हैं जो इस्लाम के बारे में अनिश्चितता का शिकार हैं। इस्लाम के लागू होने की जिन मुस्लिम देशों में कोशिशें हुई हैं, उनमें पाकिस्तान, सऊदी अरब, सूडान, ईरान, यमन, लीबिया, मलयेशिया, ब्रुनेई, अफ़ग़ानिस्तान, जॉर्डन और पाकिस्तानी कश्मीर शामिल हैं। इन सब देशों में किसी-न-किसी हद तक किसी-न-किसी मैदान में, व्यावहारिक रूप से इस्लामी क़ानून लागू हैं और उनपर कार्यान्वयन हो रहा है। इन देशों में से चार देश ऐसे हैं जिनमें इस्लाम को लागू करने की कोशिशें अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय हैं। इन कोशिशों का एक आलोचनात्मक और शोधपरक अध्ययन अपरिहार्य है, ताकि उनके तजरिबात की रौशनी में आगे के लिए दिशानिर्देशों का निर्धारण किया जा सके। चौदहवीं शताब्दी हिजरी में जो काम हुआ, उसमें जो-जो कमज़ोरियाँ पैदा हुईं जहाँ-जहाँ कोताहियाँ हुईं, उनकी भरपाई करने के लिए इन कोशिशों की आलोचनात्मक समीक्षा करना अपरिहार्य है।

ये चार देश जिनकी कोशिशें बहुत नुमायाँ हैं। उनमें सबसे पहले सऊदी अरब का काम उल्लेखनीय है। फिर पाकिस्तान, फिर ईरान और फिर सूडान शामिल हैं। ईरान में इस्लामी इंक़िलाब का आना चौदहवीं शताब्दी के बिलकुल आख़िरी और पंद्रहवीं शताब्दी के पहले साल की सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे नुमायाँ घटना है। यह इंक़िलाब शिया मुज्तहिदीन, तबक़ए-रूहानियाँ और ईरान प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों के हाथों अमल में आया। यह पहला मौक़ा था कि राजनैतिक स्वतंत्रता के बाद पहली बार इस्लामी विद्वानों ने एक राजनैतिक आन्दोलन का सफल नेतृत्व किया, और सत्ता अपने हाथ में ले ली। अतीत में ऐसा तो हर जगह हुआ कि जिहाद के आन्दोलनों में और आज़ादी के आन्दोलनों में इस्लामी विद्वान आगे-आगे रहे। जिहाद के सारे आन्दोलन इस्लामी विद्वानों ने चलाए। स्वतंत्रता संग्राम के किसी आन्दोलन में पश्चिमी शिक्षा प्राप्त वर्ग शामिल नहीं रहा। आज़ादी के आन्दोलन दोनों ने मिलकर चलाए। इस्लामी विद्वान और आधुनिक शिक्षा प्राप्त नेता साथ-साथ मिलकर यह काम करते रहे हैं।

यह बात उल्लेखनीय है कि आज़ादी के तमाम आन्दोलनों में, मराक़श (मोरक्को) से लेकर इंडोनेशिया तक और इराक़ से लेकर सूडान तक, दीन (इस्लाम) और इस्लाम के पुनरुत्थान का हवाला बहुत नुमायाँ रहा। इस्लामी विद्वानों का चरित्र इन सब आन्दोलनों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और मौलिक रहा है, लेकिन जैसे ही राजनैतिक आज़ादी प्राप्त हुई वे उद्घोषणाएँ, वे वादे और वे घोषणापत्र पीठ-पीछे डाल दिए गए, जिन्होंने जनसाधारण को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल किया था। जिन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलनों में नया ख़ून और नया रंग-ढंग शामिल किया था। जो जनसाधारण के लिए एकमात्र प्रेरक शक्ति की हैसियत रखते थे।

यहाँ हमें यह भी देखना चाहिए कि इस्लामी विद्वानों का स्थान और पद एक पारम्परिक मुस्लिम समाज में क्या रहा है? क्या इस्लामी विद्वानों को राजनैतिक नेतृत्व का पद संभालना चाहिए? क्या अतीत में इस्लामी विद्वानों ने कभी यह माँग की है कि सत्ता की बागडोर उनके हाथ में दे देना शरीअत को लागू करने के लिए अनिवार्य शर्त है?

यह अध्ययन इसलिए भी ज़रूरी है कि आज दुनिया के अनेक मुस्लिम देशों में आम तौर से और पाकिस्तान में विशेष रूप से मुस्लिम विद्वानों की अनेक राजनैतिक पार्टियाँ काम कर रही हैं, जिनमें से कुछ को सरकार के पदों पर वर्षों आसीन रहने का मौक़ा भी मिला है। कुछ ने प्रशासनिक पद लम्बे-लम्बे समय तक संभाले रखे हैं। पाकिस्तान में कमो-बेश 20 वर्ष एक प्रसिद्ध दीनी जमाअत जिसका सम्बन्ध इस्लामी विद्वानों से रहा है और है, वह हुकूमतों में लगातार शरीक रही है, लेकिन इस सच्चाई को स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए कि शरीअत को लागू करने, शरीअत के उद्देश्यों की पूर्ति और शरीअत के आधार पर व्यवस्था के पुनर्गठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के कार्य में इस्लामी विद्वानों की इस साझेदारी के वे परिणाम सामने नहीं आए जिनके जनसाधारण प्रतीक्षक हैं।

अतीत में इस्लामी विद्वानों का स्थान और पद मुस्लिम समाज में हमेशा एक शिक्षक, एक प्रशिक्षक, और एक ग़ैर-सरकारी लोकपाल का रहा है। जो इस्लामी विद्वान हुकूमत से जुड़े नहीं रहे, जिन्होंने सरकारी पदभार नहीं संभाले, वे जनसाधारण में शिक्षा एवं प्रशिक्षण की ज़िम्मेदारियाँ अंजाम दिया करते थे और ग़ैर-सरकारी रूप से लोकपाल का कर्त्तव्य निभाया करते थे। जो इस्लामी विद्वान हुकूमतों से जुड़े, वे प्रायः क़ज़ा (न्यायाधीश का पद) और इफ़्ता (फ़तवा देने का विभाग) ही के पद पर आसीन होते थे, या लोकपाल की ज़िम्मेदारियाँ अंजाम दिया करते थे। इस सीमित अदालती ज़िम्मेदारी के अलावा इस्लामी विद्वानों ने अतीत में 1300 साल के लम्बे समय तक ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जिसका उद्देश्य हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में लेना हो। हमारे उपमहाद्वीप में इस्लाम के पुनरुत्थान के कई नुमायाँ प्रयास हुए, जिनमें से कुछ अत्यन्त सफल रहे, उनमें से किसी प्रयास में तत्कालीन इस्लामी विद्वानों ने हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में लेने की बात नहीं की। हज़रत मुजद्दिद अल्फ़-सानी, शैख़ अहमद सरहिन्दी ने एक सफल नवीनीकरणवादी और सुधारवादी प्रक्रिया का नेतृत्व किया जिसके परिमाम राजनैतिक जीवन में भी सामने आए, प्रशासनिक मामलों में भी सामने आए, हुकूमत की पॉलिसी में भी परिवर्तन हुआ, हुकूमत के लोगों के रवैये और स्वभाव में भी परिवर्तन हुआ। लेकिन मुजद्दिद अल्फ़-सानी, उनके उत्तराधिकारी, उनके उत्तराधिकारियों के उत्तराधिकारियों के किसी लेख में यह इशारा भी नहीं मिलता कि उन्होंने किसी सरकारी पद को प्राप्त करने कोशिश ज़ाहिर की हो। उनका चरित्र केवल एक शिक्षक, एक प्रशिक्षक तथा ग़ैर-सरकारी लोकपाल का रहा। उनके शिष्यों या उनसे प्रभावित लोगों में से कुछ लोग न्यायाधीन के पद पर ज़रूर आसीन हुए, जो प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों की एक महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी समझा जाता था।

मुफ़्ती के पद पर हमेशा प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान आसीन रहे। सरकारी लोकपाल संस्था भी प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों के हाथ में रही। शुरू से, प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के ज़माने से ही ऐसा रहा, लेकिन इन इस्लामी विद्वानों का चरित्र सीमित और निर्धारित था। क़ाज़ी (न्यायाधीश) का चरित्र फ़िक़्ह की किताबों में निर्धारित है। मुफ़्ती की ज़िम्मेदारियाँ निर्धारित हैं। ये ज़िम्मेदारियाँ प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान निभाते रहे हैं और सफल तरीक़े से निभाते रहे हैं। आज ज़रूरत इस बात की है कि पिछले कमो-बेश सौ वर्षों के इस अनुभव पर नए सिरे से ग़ौर किया जाए और यह देखा जाए कि क्या आधुनिक काल के अन्दाज़ की राजनैतिक पार्टियाँ गठित करना और उनके द्वारा इस्लामी शरीअत के लक्ष्य को प्राप्त करना ज़्यादा लाभकारी और प्रभावशाली है या प्राचीन इस्लामी परम्पराओं को पुनर्जीवित करना ही इस्लामी शरीअत के उद्देश्यों की पूर्ति की ज़मानत है।

आधुनिक काल की सबसे बड़ी समस्या जो इस्लामी शरीअत के विशेषज्ञों और इस्लामी विद्वानों के लिए एक चैलेंज की हैसियत रखती है, उसका सम्बन्ध इक़तिसाद और व्यापार के मैदान से है। पश्चिम जगत् में व्यापार का विस्तार दिन-प्रतिदिन हो रहा है। उसके प्रभाव और परिणाम सामने आ रहे हैं। सामूहिक पूँजीनिवेश, अत्यन्त जटिल और विस्तृत पैमाने पर शुरू हो गया है। उत्पाद इतने व्यापक स्तर पर हो रहा है जिसकी आज से सौ साल पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। बैंकिंग और व्यापार की अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ इतनी प्रभावशाली हो गई हैं कि हुकूमतों के प्रभाव और पहुँच से ज़्यादा उन अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को प्रभाव और पहुँच प्राप्त हो गई है। वे काम जो पहले औपनिवेशिक शक्तियाँ किया करती थीं, वे काम आज अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक संस्थाएँ कर रही हैं। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक संस्थाएँ उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए काम करती नज़र आ रही हैं जो आज से सौ साल पहले औपनिवेशिक हुकूमतें किया करती थीं। इन हालात में मुस्लिम जगत् के लिए इस मैदान में आना अत्यन्त अनिवार्य है। जब तक बड़े पैमाने पर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, अन्तर्राष्ट्रीय बैंकिंग, सामूहिक पूँजीनिवेश और बड़े उद्योगों के मैदान में मुसलमान इस्लामी शरीअत के अनुसार हिस्सा नहीं लेंगे, उस समय तक यह चैलेंज ज्यों-का-त्यों रहेगा। मुसलमान इससे निवृत नहीं हो सकेंगे।

इस स्थिति के परिणाम आज यह निकल रहे हैं कि मुस्लिम जगत् की मंडियों पर दूसरे व्यापारियों का क़ब्ज़ा हो रहा है। स्थानीय अर्थव्यवस्थाएँ पतन की ओर अग्रसर हैं। फ़िक़्हे-इस्लामी के आदेश जो प्राचीन ढंग से संकलित हुए थे, आज अप्रभावी होते महसूस होते हैं। नए आदेशों का संकलन और उनके महत्त्व का एहसास अभी तक इतना विशाल स्तर पर नहीं हुआ जितना कि ज़रूरत है। अभी तक इन तमाम मैदानों में पश्चिमी धारणाओं और पश्चिमी विचारों ही का पालन हो रहा है। अनेक अरब देशों में जहाँ इस्लामी शरीअत के अनुसार अदालतें काम करती हैं, वहाँ बहुत-से मामलात अदालतों और प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों के कार्यक्षेत्र से बाहर हैं। ये वे मामलात हैं जिनका सम्बन्ध सामूहिक पूँजी निवेश और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से है। ये मामलात कई देशों में शरीअत के कार्यक्षेत्र से बाहर हैं। इसके लिए व्यवस्था की शब्दावली प्रयोग की जाती है। व्यवस्था एक वैकल्पिक क़ानून की हैसियत रखती है। इस व्यवस्था को चलाने के लिए वैकल्पिक अदालती संस्थाएँ काम कर रही हैं। विकल्प केन्द्र काम कर रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि वहाँ के प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान और विशेषज्ञ उन समस्याओं का अभी तक ऐसा हल प्रस्तावित नहीं कर सके कि जो पूर्ण रूप से शरीअत के अनुसार भी हो और वहाँ की हुकूमतें उसके आधार पर अपने मामलों को संगठित भी कर सकें। सऊदी अरब में प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों का असाधारण प्रभाव और पहुँच है। वहाँ अभी तक फ़िक़्हे-हंबली पर असंकलित ढंग से अमल हो रहा है। और असंकलित क़ानून का यह प्राचीन इस्लामी रिवाज आंशिक रूप से अभी तक जारी है। वहाँ भी व्यवस्था के नाम से वे सारे क़ानून व्यावहारिक रूप से लागू हैं जो दूसरे अरब देशों में प्रचलित हैं। व्यापार अर्थव्यवस्था, आयात-निर्यात, इन मामलात से जो व्यवस्थाएँ सऊदी अरब में लागू हैं, उनमें और दूसरे अरब देशों के क़ानूनों में कोई फ़र्क़ नहीं है।

ये सब क़ानून और व्यवस्थाएँ पश्चिमी धारणाओं और क़ानून से ली गई हैं। क्या उसका मतलब यह नहीं कि हमने यह स्वीकार कर लिया है कि सामूहिक पूँजी निवेश, बैंकिंग और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के बारे में शरीअत कोई आदेश नहीं देती। शरीअत के निर्देश यहाँ काम नहीं कर रहे हैं। अगर ऐसा नहीं है तो फिर यह उन प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों की असफलता है जो इस मामले में हुकूमतों को और हुकूमतों के कर्मचारियों को सन्तुष्ट नहीं कर सके। यह इसी तरह की ढिलाई है जो आज से दो सौ साल पहले तुर्की के प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों से हुई थी। मुझे ख़तरा है कि कहीं वह इतिहास दोबारा न दोहराया जाए, अल्लाह न करे ऐसा हो, जो तुर्की में दोहराया गया था।

शरीअत के रास्ते में आज जहाँ ये रुकावटें हैं जिनका मैंने कुछ मिनट में इशारा किया, इनके अलावा कुछ रुकावटें और भी हैं। मैं नेशलिज़्म का ज़िक्र कर चुका हूँ। यह राक्षस आज भी मौजूद है। सेक्युलरिज़्म का राक्षस भी पूरे तौर पर मुस्लिम जगत् पर हावी है। शासक वर्ग के बहुत-से लोग, शासक गिरोहों में एक प्रभावशाली संख्या जाने-अनजाने वैचारिक या व्यावहारिक रूप से सेक्युलरिज़्म की ध्वजावाहक है। दूसरी तरफ़ प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों की एक बड़ी संख्या अभी तक प्राचीन जड़ता और अनुकरण का शिकार है। उनमें से बहुत-से लोगों के विचार में बाद के फुक़हा ने जिस मामले में जो राय दे दी है वह फ़ाइनल और आख़िरी है। हर समस्या का हल उनके नज़दीक इब्ने-आबिदीन और उनकी किताब रद्दुल-मुहतार में मौजूद है। मैं ख़ुदा न ख़ास्ता इब्ने-आबिदीन शामी के स्थान और रुतबे का इनकार नहीं कर रहा हूँ। वे अपने ज़माने के सबसे बड़े फुक़हा में से थे। उनकी किताब (रद्दुल-मुहतार) फ़िक़ही गहरी समझ का एक शाहकार है। लेकिन स्थायित्व किसी मुज्तहिद के इज्तिहाद को नहीं है, अल्लाह की शरीअत को है। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत को स्थायित्व है, किसी की राय को स्थायित्व नहीं।

आज ऐसी अनगिनत समस्याएँ सामने आ गई हैं — यह बात मान लेनी चाहिए — जिनका जवाब इब्ने-आबिदीन ने अपनी किताबों में नहीं लिखा। इब्ने-आबिदीन की किताबों से लाभ उठाया जा सकता है। इब्ने-आबिदीन की इज्तिहाद-शैली से मार्गदर्शन लिया जा सकता है। इब्ने-आबिदीन के तर्कों से फ़ायदा उठाया जा सकता है, लेकिन इब्ने-आबिदीन का इज्तिहाद वहाँ काफ़ी नहीं। इब्ने-आबिदीन का नाम केवल बतौर मिसाल ले रहा हूँ, यह न समझा जाए कि इब्ने-आबिदीन का नाम बार-बार लेने में कोई ख़ास तत्त्वदर्शिता या निहितार्थ है। यह नाम उदाहरण के रूप में लिया है। फिर एक बड़ी रुकावट ख़ुद शरीअत के ज्ञान की कमी है। अगरचे यह कमी आज पहले के मुक़ाबले में बहुत हद तक दूर हो गई है। चौदहवीं शताब्दी हिजरी के आरम्भ में जो कैफ़ियत थी उसमें और आज की स्थिति में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ पैदा हो गया है। लेकिन अभी तक जिस तरह की ज़रूरत है उस अन्दाज़ से शरीअत की शिक्षा आम नहीं हुई।

इन सबसे बढ़कर सामाजिक बिगाड़ है, जो पश्चिमी शिक्षा का अनिवार्य परिणाम है। इसके नतीजे में परिवार की संस्था टूट-फूट का शिकार है। सामाजिक मूल्य बिगाड़ का शिकार हैं। और वे तमाम धारणाएँ, आदतें और रिवाज एक-एककर ख़त्म हो रहे हैं जिन्होंने मुस्लिम समाज को एक मुस्लिम समुदाय के तौर पर क़ायम रखा हुआ था।

मैं यह बात पहले भी कह चुका हूँ कि आधुनिक काल में इस्लामी शरीअत को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा है उनमें इस्लामी शब्दावलियों पर हमला भी एक बड़ी महत्त्वपूर्ण चीज़ है। अतीत में भी इस तरह की स्थिति पेश आई थी। जब बातिनियत (रहस्यवाद) ने विभिन्न शब्दावलियों पर हमला किया। पैग़म्बरी, रिसालत, जन्नत, जहन्नम, फ़रिश्ते इन सब शब्दावलियों को ग़लत अर्थ दिए गए और उन ग़लत अर्थों के द्वारा बातिनियों (रहस्यवादियों) ने मुसलमानों को ‘ज़ंदक़ा’ (अधर्म) का निशाना बनाना चाहा, लेकिन बातिनी इसमें सफल नहीं हो सके। बहुत जल्द इस फ़ित्ने का ख़ातिमा हो गया। लेकिन जो आजकल का नया ज़ंदक़ा है जो आधुनिक ज़ंदक़ा है वह भी शब्दावलियों पर हमले में बातिनियत से भिन्न नहीं। आज ख़िलाफ़त, इमामत, इज्तिहाद, इमारत और ऐसी सब शब्दावलियों पर हमले किए जा रहे हैं। पहले एक फ़र्ज़ी शब्दावली गढ़ ली जाती है, फिर उस शब्दावली को आलोचना का निशाना बनाया जाता है। जब वह धारणा बिगड़ जाती है तो फिर अस्ल इस्लामी शब्दावली को निशाना बनाया जाता है। यों एक-एककर इस्लामी शब्दावलियों की धारणा को मिटाया जा रहा है। शब्दों और अर्थों के रिश्ते को जब तोड़ दिया जाए तो फिर धारणाएँ मिट जाती हैं। प्राचीन बातिनियत और आधुनिक ज़ंदक़ा दोनों में जो समानता है, वह यही है कि शब्दों और अर्थों के रिश्ते को तोड़ दिया जाए। दीनी शब्दावलियों के अर्थ में सन्दिग्ध तत्त्वों की मिलावट कर दी जाए। दीनी शब्दावलियों पर हमले के लिए चोर दरवाज़े पैदा किए गए, और उन चोर दरवाज़ों से काम लेकर मुसलमानों के दीन पर डाके डाले गए।

मैं पहले बता चुका हूँ कि आधुनिक काल में शरीअते-इस्लामी और फ़िक़्हे-इस्लामी के नव संकलन का एक ख़ास अन्दाज़ पैदा हुआ है, जिसकी तरफ़ अरब और उसके बाहर की दुनिया में अनेक विद्वानों ने ध्यान दिया है। यह काम नुमायाँ तौर पर मिस्र में शुरू हुआ। मिस्र में अनेक विद्वानों ने जिनमें हाफ़िज़ सबरी, उस्ताज़ अली अब्दुल्लाह अल-हुसैन और दूसरे विद्वान शामिल थे। डॉक्टर अबदुर्रज़्ज़ाक़ सिंहूरी जैसे विद्वान शामिल थे। उस्ताद मुस्तफ़ा ज़रक़ा जैसे फ़ुक़हा भी शामिल थे। इन सब लोगों ने अपने-अपने अन्दाज़ में फ़िक़्हे-इस्लामी के नए संकलन का काम किया। उपमहाद्वीप में अल्लामा इक़बाल ने इसका एहसास किया। मौलाना शिबली को भी इसका एहसास था। दूसरे विद्वानों ने भी इस ज़रूरत का एहसास किया। इस एहसास के नतीजे में फ़िक़्हे-इस्लामी के नए संकलन का काम शुरू हुआ। और जैसा कि मैंने बताया, दस्तूरी फ़िक़्ह का नव संकलन हुआ। इस्लामी संविधान बनाने का काम आगे बढ़ा। पाकिस्तान, सीरिया, सूडान, इंडोनेशिया में यह काम हुआ। इसके बाद नव संकलन की यह प्रक्रिया इस्लामी बैंकिंग, इस्लामी तकाफ़ुल और इंश्योरेंस इस्लामी आदेश के रूप में सामने आई। फिर शरीअत की शिक्षा को नए ढंग से जारी करने की ज़रूरत का एहसास हुआ। सीरिया और मिस्र में शरीआ कॉलेज और संकाय (faculties) क़ायम हुए। इन संकायों ने नए ढंग से फ़िक़्ह और क़ानून को पढ़ाने का काम शुरू किया। एक ज़माना था कि क़ानून और शरीअत यानी पश्चिमी क़ानून और शरीअत दोनों के कॉलेज एक जगह क़ायम किए गए। छात्रों को पश्चिमी क़ानून की शिक्षा भी दी गई और शरीअत की शिक्षा भी दी गई। यह एक अत्यन्त इंक़िलाबी क़दम था, जिसके परिणाम बहुत दूरगामी हुए। बाद में शरीअत से नावाक़िफ़, अयोग्य और जाहिल नेतृत्व ने इन अनुभवों को ख़त्म करने की कोशिश की। और एक-एककर विभिन्न अरब देशों में क़ानून और शरीअत की शिक्षा की संस्थाएँ दोबारा अलग-अलग कर दी गईं। सेक्युलरिज़्म के वे प्रशिक्षण स्थल जो इन प्रथक संस्थाओं के रूप में मौजूद थे और शरीअत और क़ानून के कॉलेजों की एक साथ स्थापना से ख़त्म होते महसूस होते थे, उनको दोबारा कई देशों में ज़िन्दा कर दिया गया और वह प्रयोग जो सफलता से बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में शुरू किया गया, बीसवीं शताब्दी के आख़िर में समाप्त कर दिया गया है।

आज ज़रूरत इस बात की है कि शरीअत की शिक्षा के इस सारे अनुभव से भरपूर लाभ उठाया जाए और यह देखा जाए कि बीसवीं शताब्दी में क्या-क्या अनुभव हुए हैं। परिणामों के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं का अध्ययन करके नए ढंग से शरीअत की शिक्षा पर कार्यान्वयन शुरू किया जाए।

आधुनिक काल में जहाँ शरीअत की नई शिक्षा शोध, लेखन और विधि निर्माण के अनुभव हुए वहाँ एक नए तरह से शरीअत के उद्देश्यों का पुनरुत्थान भी हुआ। शरीअत के उद्देश्यों के विषय पर चिन्तन-मनन बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में शुरू हो गया था। चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मुफ़्ती मुहम्मद अब्दा की निजी दिलचपसी की वजह से अरब दुनिया में इमाम शातबी की ‘अल-मुवाफ़क़ात’ को पढ़ाने का कार्य शुरू हुआ। उसके बाद पश्चिम जगत् यानी मराक़श और ट्यूनीशिया के पहली पंक्ति के दो इस्लामी विद्वान शैख़ इब्ने-आशूर, और अल्लामा इलाल अल-फ़ासी ने इस सेवा को और आगे बढ़ाया। अब स्थिति यह है कि सारी दुनिया में नए सिरे से शरीअत के उद्देश्यों पर शोध हो रहा है। शरीअत के उद्देश्यों पर चिन्तन-मनन की नई संस्थाएँ बन रही हैं। शरीअत के उद्देश्यों के विभिन्न पहलुओं पर सैकड़ों किताबें लिखी जा चुकी हैं और आज दुनिया की बहुत-सी इस्लामी यूनिवर्सिटियों और दीनी शिक्षा की संस्थाओं में शरीअत के उद्देश्यों की विधिवत रूप से शिक्षा दी जा रही है।

चौदहवीं शताब्दी का अन्त, और पंद्रहवीं शताब्दी का आरम्भ नई उम्मीदों के साथ हुआ था। ये उम्मीदें पंद्रहवीं शताब्दी में इस्लामी शरीअत के पुनरुत्थान और इस्लामी सभ्यता की नए सिरे से तलाश की उम्मीदों और आरज़ुओं से भरी थीं।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम नए सिरे से जायज़ा लेकर यह देखें कि इस्लामी शरीअत और इस्लामी सभ्यता का भविष्य क्या है? दूसरे शब्दों में मुस्लिम समाज का सांस्कृतिक भविष्य जिसका आधार निश्चय ही इस्लामी शरीअत है वह क्या है? और यही इस सिलसिले के अगले और आख़िरी लेक्चर का विषय है।

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