इल्मे-कलाम अक़ीदे और ईमानियात की ज्ञानपरक व्याख्या एक परिचय (शरीअत : लेक्चर# 10)
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शरीअत
- at 21 November 2025
डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी
अनुवादक : गुलज़ार सहराई
आज की चर्चा का शीर्षक ‘इल्मे-कलाम : अक़ीदे और ईमानियात की ज्ञानपरक व्याख्या’ है। इस विषय, यानी अक़ीदे और ईमानियात पर एक आम चर्चा इससे पहले पेश की जा चुकी है, उस चर्चा में बताया गया था कि अक़ीदा और ईमान शरीअत की व्यवस्था का सर्वप्रथम और सबसे पहला आधार है। अक़ीदा और ईमानियात का विवरण उस इमारत के लिए जिसको हम शरीअत के नाम से याद करते हैं, आधार की हैसियत रखता है। यह आधार जिसके सिद्धान्त एवं नियम पवित्र क़ुरआन में मौजूद हैं, जिसकी व्याख्या हदीसों में की गई है और जिसपर प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के ज़माने से विद्वान और बुद्धिजीवी ग़ौर करते चले आ रहे हैं, इस्लाम की पूरी व्यवस्था में आधार और शरीअत के शरीर में रीढ़ की हड्डी की हैसियत रखता है। इन नियमों और सिद्धान्तों और उनसे सम्बन्धित समस्याओं को जब ज्ञानपरक ढंग से संकलित किया गया और कलात्मक दृष्टिकोण से तर्कों के साथ इन मामलों को पेश किया गया तो इस प्रयास के परिणामों ने इल्मे-कलाम (इस्लामी धारणाओं को बुद्धि द्वारा सिद्ध करने का ज्ञान) का नाम अपनाया। जल्द ही इस ज्ञान को इस्लामी ज्ञान-विज्ञान में एक मौलिक स्थान और महत्त्वपूर्ण हैसियत प्राप्त हुई।
इससे पहले यह बात बताई जा चुकी है कि जिसको हम इस्लामी शब्दावली में अक़ीदा कहते हैं वह पश्चिमी भाषाओं के dogma से भिन्न चीज़ है। अक़ीदे को dogma क़रार देना या कोई ऐसा कपोल-कल्पित विचार समझना कि जिसका आधार किसी बौद्धिक तर्क पर न हो, दुरुस्त नहीं है। डोगमा दरअस्ल यूनानी भाषा का शब्द है जो आरम्भ में किसी अधिकार प्राप्त शासक के फ़ैसलों के लिए प्रयुक्त होता था। रोमन एम्पायर के ज़माने में शैख़ों की मजलिस के फ़ैसलों को भी डोगमा कहा जाता था। यह शब्दावली यहूदियत और ईसाईयत में भी प्रयुक्त हुई है। प्रायः धार्मिक सत्ता के फ़ैसलों को डोगमा कहा जाता था। इन धर्मों में डोगमा से मुराद धर्म के वे नियम हैं जिनको किसी बौद्धिक आधार के बिना मात्र गढ़े हुए सिद्धान्तों के तौर पर मान लिया जाए और जिसमें एक आदेशात्मक ढंग शामिल हो, और जैसा कि कुछ पश्चिमी विशेषज्ञों ने लिखा है, जिसको एक arbitrary और एक derogative ढंग से (ये दोनों उसके मौलिक तत्त्व हैं) लोगों से मनवाया जाए। अक़ीदा ऐसी कोई चीज़ नहीं है। न इसमें आदेश देने का अन्दाज़ पाया जाता है और न इसका अन्दाज़ कुछ कम करने या विमुख हो जाने का है।
दुनिया के विभिन्न धर्मों में चूँकि अपनी धार्मिक मान्यताओं की ज्ञानपरक व्याख्या की परम्परा मौजूद है, इसलिए विभिन्न धर्मों में इल्मे-कलाम से मिलते-जुलते ज्ञान-विज्ञान विभिन्न नामों से मौजूद हैं। और जब इस्लामी इल्मे-कलाम की बात आती है तो दूसरे धर्मों की तरह शब्दावलियाँ निस्संकोच प्रयोग कर ली जाती हैं। चुनाँचे dogma या scholasticism या theology या इस तरह की दूसरी शब्दावलियाँ बहुत ज़्यादा इल्मे-कलाम के सन्दर्भ में पश्चिमी लेखों में प्रयुक्त होती हैं। ये शब्दावलियाँ आंशिक रूप से तो इल्मे-कलाम के विषयों और विशिष्टताओं की प्रवक्ता हो सकती हैं, लेकिन इन शब्दावलियों को पूर्ण रूप से इल्मे-कलाम का समानार्थी क़रार देना मुश्किल है।
इल्मे-कलाम इस्लामी फ़िक्र का एक अत्यन्त मौलिक और महत्त्वपूर्ण विषय है। जिस चीज़ को हम इस्लामी विचारधारा की शब्दावली से व्याख्यायित करते हैं वह एक सारगर्भित और सार्वजनिक शब्दावली है। इसमें विशुद्ध धार्मिक चिन्तन भी शामिल है, इसमें मुसलमानों का दार्शनिकतापूर्ण चिन्तन भी शामिल है, सामूहिक चिन्तन भी शामिल है और राजनैतिक चिन्तन भी शामिल है। जिन लोगों ने इस्लामी चिन्तन का इतिहास लिखा है या उसपर ग़ौर किया है उनमें से कुछ ज्ञानवान लोगों का कहना है कि इस्लामी विचारधारा के सबसे नुमायाँ और सबसे उल्लेखनीय मैदान दो हैं, एक मुसलमानों का उसूले-फ़िक़्ह और दूसरा इल्मे-कलाम। इन दोनों मैदानों में मुसलमानों की मिनहाजियात (तरीक़ों) का और इस मिनहाजियात का अस्ल होने यानी originality का सबसे ज़्यादा इज़हार होता है। अरब जगत् के प्रसिद्ध चिन्तक और आलिम डॉक्टर अली सामी निशार ने अपनी बौद्धिक पुस्तक ‘नशातुल-फ़िक्र अल-फ़ल्सफ़ी फ़िल-इस्लाम’ में इस पहलू पर बहुत स्पष्ट रूप से चर्चा की है। इस्लामी विचारधारा में क्या-क्या आधुनिकताएँ हैं? इस्लामी सोच ने इंसानी सभ्यता को क्या आम सोच दी? इसका सबसे ज़्यादा परिपक्व, व्यापक, श्रेष्ठ एवं परिपूर्ण नमूना हमें या उसूले-फ़िक़्ह में मिलता है, या फिर इल्मे-कलाम (इस्लामी धारणाओं को बुद्धि द्वारा सिद्ध करने का ज्ञान) में। यही वजह है कि इल्मे-कलाम और उसूले-फ़िक़्ह में कई बातें समान हैं। कलाम और सिद्धान्त में न केवल वार्ताओं की समानता है, बल्कि बहुत-से ऐसे लोग जिन्होंने इल्मे-कलाम में अपनी रायों को दुनिया के बौद्धिक क्षेत्रों में मनवाया है, वही लोग हैं जिन्होंने उसूले-फ़िक़्ह में भी बड़ा नुमायाँ काम किया है। इसी तरह से उसूले-फ़िक़्ह के सबसे बड़े विद्वान वे हैं जो इल्मे-कलाम के भी सबसे बड़े विद्वान हैं। इन कारणों से इन दोनों में कुछ समान बातें और सवालात भी पैदा हुए।
आज पश्चिमी दुनिया meta-jurisprudence यानी क़ानून के सिद्धान्त से परे की शब्दावली से परिचित है, जिससे अभिप्रेत वे पराभौतिक प्रश्न हैं जिनके आधार पर क़ानून के सिद्धान्त के मामले संकलित होते हैं। अगर meta-jurisprudence के नाम से कोई ज्ञान अस्तित्व रखता है और सचमुच jurisprudence का कोई पराभौतिक आधार है तो फिर meta-jurisprudence की आधारशिला का सौभाग्य मुतकल्लिमीने-इस्लाम (इस्लामी धारणाओं को बुद्धि द्वारा सिद्ध करनेवालों) को प्राप्त है। इस्लाम ने वे सवालात उठाए जो आगे चलकर इल्मे-कलाम और उसूले-फ़िक़्ह दोनों का आधार बने। इन सवालों में सबसे मौलिक सवाल यह था कि किसी चीज़ के अच्छा या बुरा होने का आख़िरी मापदंड क्या है? किसी चीज़ को किस आधार पर अच्छा क़रार दिया जाए और किस आधार पर बुरा क़रार दिया जाए? दूसरे शब्दों में अच्छाई और बुराई का फ़ाइनल मापदंड और आख़िरी कसौटी क्या है? अच्छाई और बुराई बौद्धिक हैं या शरई? यह सारांश है इस सवाल का जो मुतकल्लिमीने-इस्लाम ने भी उठाया, और लगभग तमाम उल्लेखनीय उलमाए-उसूल ने भी उठाया। यह एक दार्शनिकतापूर्ण सवाल भी है, यह एक इल्मे-कलाम से सम्बन्धित सवाल भी है और यह क़ानून के सिद्धान्त और उसूले-फ़िक़्ह का सवाल भी है। इस सवाल के जवाब में जो बहसें उलमाए-उसूल उदाहरणार्थ इमाम राज़ी (रह॰), इमाम ग़ज़ाली (रह॰), अल्लामा आमदी (रह॰), इमामुल-हरमैन (रह॰) और उनके दर्जे के दूसरे उसूलो-कलाम के बड़े आलिमों ने की हैं, वह इस्लामी सोच का एक अत्यन्त नुमायाँ और उज्ज्वल अध्याय है।
जिस तरह इल्मे-कलाम में एक साथ उलूमे-नक़्लिया (क़ुरआन एवं हदीसों में वर्णित आदेशों का ज्ञान) और उलूमे-अक़्लिया (बौद्धिक ज्ञान) दोनों आ जाते हैं, इसी तरह इल्मे-उसूले-फ़िक़्ह भी उलूमे-अक़्लिया और उलूमे-नक़्लिया दोनों की विशिष्टताओं को अपने अन्दर समेटे हुए है। उसूले-फ़िक़्ह का कोई विद्यार्थी यह नहीं कह सकता कि उसूले-फ़िक़्ह में कुछ समस्याएँ या आदेश ऐसे भी हैं जो इस्लाम की स्पष्ट शिक्षाओं से पूर्ण रूप से मेल नहीं खाते और उनसे लिए हुए नहीं हैं। इसी तरह जिस जिस दौर में उसूले-फ़िक़्ह की जो किताब संकलित हुई, विशेष रूप से प्रसिद्ध किताबें उनके बारे में उस ज़माने का कोई बड़े-से-बड़ा माहिरे-अक़्लियात (बुद्धिशास्त्री) यह नहीं कह सकता था कि अक़्लियात के प्रचलित मापदंड के अनुसार उसूले-फ़िक़्ह का अमुक दृष्टिकोण बौद्धिकता के विशेषज्ञ के लिए स्वीकार्य नहीं है। इमाम ग़ज़ाली (रह॰) की ‘अल-मुस्तसफ़ा’ हो या इमाम राज़ी (रह॰) की ‘अल-महसूल’, या फिर अन्य बड़े उलमाए-उसूल की किताबें हों, इन सब किताबों में ये दोनों विशेष गुण और इन दोनों मैदानों के तक़ाज़े पूरी तरह मौजूद हैं।
यही बात जो उसूले-फ़िक़्ह के बारे में कही जा सकती है वह इल्मे-कलाम के बारे में भी कही जा सकती है कि जहाँ इल्मे-कलाम एक विशुद्ध किताबों में वर्णित ज्ञान है, इस दृष्टि से कि पवित्र क़ुरआन और सुन्नते-रसूल के उद्धरणों पर आधारित है, वहाँ वह एक विशुद्ध बौद्धिक ज्ञान भी है कि मुतकल्लिमीने-इस्लाम ने बौद्धिक तर्कों की बुनियाद और प्रचलित मापदंडों के हिसाब से जो उच्चतम बौद्धिक तर्क और वैचारिक मापदंड थे उनके आधार पर इस ज्ञान को संकलित किया और दोनों के तक़ाज़ों को एक साथ निभाने का अत्यन्त सफल प्रयास किया। लेकिन यह अजीब बात है कि पश्चिमी विद्वानों में बहुत-से लोगों ने उसूले-फ़िक़्ह और इल्मे-कलाम के इस विशिष्ट गुण का ज़्यादा नोटिस नहीं लिया। इस पहलू से इल्मे-कलाम का आकलन कुछ ही पश्चिमी विद्वानों ने किया है। जिन्होंने निष्पक्षता से इस गुण का नोटिस लिया है उन्होंने बहुत गम्भीरता से और पूरी ज़िम्मेदारी से यह बात स्वीकार की है जो मैंने बताई। फिर भी प्राच्यविदों में ऐसे व्यक्तियों की भी कमी नहीं जिन्होंने इस महत्त्वपूर्ण बात को नज़रअन्दाज़ कर दिया और इल्मे-कलाम को एक defence apologia, defensive apologetics के नाम से याद किया। एक पश्चिमी विद्वान ने इल्मे-कलाम को discursive and apologia reasoned के नाम से याद किया। खेद प्रकट करना या apology का शब्द उनमें से बहुत-से लोगों में समान है।
सच तो यह है कि अगर मुतकल्लिमीने-इस्लाम के शुरू के लेख देखे जाएँ, विशुद्ध मुतकल्लिमीन के, तो उनमें कण-भर भी खेद व्यक्त करने का या प्रतिरक्षात्मक शैली का लेशमात्र भी नहीं पाया जाता। प्रतिरक्षात्मक शैली इब्ने-सीना, फ़ाराबी, इब्ने-रुश्द और कुछ अन्य दार्शनिकों में तो किसी हद तक शायद पाई जाती हो, लेकिन विशुद्ध मुतकल्लिमीन के यहाँ, जिनका आरम्भ हज़रत इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) से किया जा सकता है, यह प्रतिरक्षात्मक ढंग नहीं पाया जाता। प्रतिरक्षात्मक शैली का इल्मे-कलाम बीसवीं शताब्दी के आरम्भ और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में सामने आया जिसपर इस चर्चा के आख़िर में कुछ ज़रूरी इशारे पेश करूँगा।
मानव प्रकृति की एक नैसर्गिक विशेषता है कि वह सृष्टि के तथ्यों के बारे में बौद्धिक चिन्तन से काम लेती है। हर इंसान अपनी बौद्धिक सतह और क्षमता के अनुसार अपने दृष्टिकोण का बौद्धिक स्पष्टीकरण पेश करता है। यह बौद्धिक स्पष्टीकरण तमाम सामूहिक ज्ञानों और मानवीय ज्ञान की विशेषता रहा है। दुनिया के इतिहास में हर बुद्धिमान इंसान ने आभासित से अनाभासित का, प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष का और उपस्थित से अनुपस्थित का पता चलाने की कोशिश की है। यहाँ तक कि इस्लाम से पहले के अरब बद्दू (देहाती) भी एक सादा अन्दाज़ में और एक विशुद्ध आरम्भिक प्रकार की शैली से यह काम करते थे। एक अरबी कहावत है “ऊँट की मेंगनी पड़ी हो तो यह इस बात का प्रमाण है कि यहाँ से ऊँट गुज़रा है।” अब यह उपस्थित से अनुपस्थित का पता लगाने की बहुत आरम्भिक सी मिसाल है।
इसी तरह धर्मों और धार्मिक मान्यताओं पर आपत्तियों और प्रश्नों की मिसालें भी प्राचीन काल से चली आ रही हैं। जिस तरह धर्म, नैतिकता और अक़ीदे की व्यवस्था प्राचीन काल से चली आ रही है उसी तरह उनपर प्रश्नों और आपत्तियों का सिलसिला भी प्राचीन काल से जारी है। प्राचीन-से-प्राचीन क़ौमों में और आरम्भिक-से-आरम्भिक सभ्यताओं में भी दार्शनिकतापूर्ण प्रश्नों और ज्ञानपरक बहसों का सुराग़ मिलता है। यहाँ तक कि अत्यन्त primitive सभ्यताओं के बारे में भी अब जो चीज़ें प्रकाशित हुई हैं उनसे अन्दाज़ा होता है कि इस तरह के प्रश्न न केवल प्राचीन-से-प्राचीन इंसानी समाजों में मौजूद थे, बल्कि उनका जवाब देनेवाले भी मौजूद थे। अत: यह बात आश्चर्यचकित करनेवाली नहीं होनी चाहिए कि मुसलमानों ने पहले दिन से इस्लाम के अक़ीदों की बौद्धिक व्याख्या करने की कोशिश की और इस्लाम के अक़ीदों को एक ऐसी शैली में पेश करना चाहा जो बुद्धिमत्ता के मारे या अक़्लियत से प्रभावित इंसानों के लिए स्वीकार्य हो।
इल्मे-कलाम एक विशुद्ध इस्लामी ज्ञान है, इस दृष्टि से कि इसका आधार पवित्र क़ुरआन और सुन्नते-रसूल है। यह बात अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि जिस दौर और जिस क्षेत्र में कलामी समस्याएँ सबसे पहले सामने आईं वह दौर, वह ज़माना और वह इलाक़ा ऐसा था जो उस समय तक दूसरी सभ्यताओं के अधीन नहीं था। विशुद्ध मक्का मुकर्रमा के माहौल में, मदीना मुनव्वरा के माहौल में कूफ़ा के माहौल में जो विशुद्ध इस्लामी बस्तियाँ थीं, इस तरह की बौद्धिक समस्याएँ और प्रश्न उठाए गए और उनके उत्तर दिए गए। यह दावा कि यूनानी, मज़दकी (मज़दकियत एक धर्म था, जिसकी शिक्षा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि लोगों के दिलों से लालच और झगड़ा एवं विवाद पैदा करनेवाली दूसरी चीज़ों से दूर करने के लिए स्त्री सहित सभी वस्तुओं को एक साझा सम्पत्ति घोषित किया जाए) और ईसाई चिन्तकों के लेख मुसलमान विद्वानों को उपलब्ध थे, जिनके प्रभाव में इल्मे-कलाम का आरम्भ हुआ, ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत कमज़ोर और निराधार बात है। निस्सन्देह मसीही चिन्तकों के लेख अरबी में अनुवाद हुए, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता और उन लेखों के प्रभाव भी बाद के मुतकल्लिमीन पर महसूस होते हैं, लेकिन यह भी सच है कि इल्मे-कलाम के इतिहास का एक लम्बा समय ऐसा गुज़रा है जब मुतकल्लिमीने-इस्लाम इन तमाम प्रभावों से मुक्त थे और ये लेख मुतकल्लिमीने-इस्लाम के सामने नहीं थे।
जिस ज़माने में हज़रत इमाम अबू-हनीफ़ा या (रह॰) उनके शिष्य किताब ‘अल-फ़िक़्हुल-अकबर’ लिख रहे थे उस ज़माने में कूफ़ा में शायद कोई यूनानियों का नाम भी न जानता हो। इस वास्तविकता से कोई पश्चिमी विद्वान भी मतभेद नहीं कर सकता कि जिस ज़माने में किताब ‘अल-फ़िक़्हुल-अकबर’ लिखी जा रही थी उस ज़माने में इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) के सामने यूनानियों की किताबें नहीं थीं, इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) और उनके शिष्य ईसाई पादरियों की धार्मिक बहसों से परिचित नहीं थे, उनको मज़दकियों के विचारों और धारणाओं की भी कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन वे कलामी प्रकार के सवाल उठा रहे थे और उनके उत्तर संकलित कर रहे थे। इससे भी आगे बढ़कर वे समस्याएँ जो इल्मे-कलाम के आरम्भिक दौर में बड़ी महत्त्व रखती हैं, जिनसे इल्मे-कलाम का ख़मीर उठा, वे ख़ुद प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के दरमियान चर्चा में आईं। जैसा कि हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) और ख़वारिज के बीच बहस से अन्दाज़ा होता है। जब हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) के कहने पर हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) ख़वारिज से चर्चा करने के लिए जाते हैं तो ख़वारिज से चर्चा में वे समस्याएँ ज़ेरे-बहस आती हैं जो बाद में इल्मे-कलाम की आधारभूत बहसें बनीं। ज़ाहिर है न ख़वारिज यूनानियों की धारणाओं से परिचित थे न हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) को यूनानियों के लेखों तक पहुँच प्राप्त थी।
इसी तरह जिन मुहद्दिसीन ने कलामी समस्याएँ उठाईं उन मुहद्दिसीन की पहुँच यूनानी या दूसरे ज्ञान-विज्ञान तक हरगिज़ नहीं थी। यहाँ तक कि तीसरी शताब्दी हिजरी के आरम्भ में जब हज़रत इमाम अहमद-बिन-हंबल (रह॰) ख़ल्क़े-क़ुरआन के मसले पर अपना पक्ष तैयार कर रहे थे तो उनके सामने यूनानी धारणाएँ हरगिज़ नहीं थीं। न वे यूनानी शब्दावलियों से परिचित थे और न क़ुरआन और सुन्नत के अलावा उनके सामने कोई और मार्गदर्शन था। इन कुछ मिसालों से यह अन्दाज़ा किया जा सकता है कि इल्मे-कलाम की अस्ल बुनियाद और आरम्भ पवित्र क़ुरआन और सम्बन्धित हदीसों के ख़मीर से हुआ। पवित्र क़ुरआन की कमो-बेश छः हज़ार छः सौ आयतें हैं। उनमें से कुछ सौ आयतें, आदेश की आयतें कहलाती हैं, जिनका अन्दाज़ा टीकाकारों ने तीन से चार या पाँच सौ तक लगाया है। तीन सौ से कम आयतें प्रत्यक्ष रूप से आदेशों की आयतें हैं और उतनी ही संख्या में अप्रत्यक्ष रूप से आदेश देनेवाली आयतों से सम्बन्धित कही जा सकती हैं। ये वे आयतें हैं जो फ़िक़ही मामलात, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज, निकाह और तलाक़ वग़ैरा के मामलात से बहस करती हैं। शेष छः हज़ार से अधिक आयतें अप्रत्यक्ष रूप से या प्रत्यक्ष रूप से अक़ीदों, नैतिकता और ‘तज़किया’ और ‘एहसान’ से बहस करती हैं। इसलिए अक़ीदों से सम्बन्धित पवित्र क़ुरआन की आयतों की संख्या आदेशों की आयतों से बहुत ज़्यादा है।
पवित्र क़ुरआन ने जो अक़ीदे बयान किए हैं उनमें तार्किकता भी है, तथ्यों का बयान भी है और इनकार करनेवालों के सन्देहों का उत्तर भी है, दुश्मनों की आपत्तियों का उत्तर भी दिया गया है, और संवाद और बहस के अन्दाज़ की चर्चा भी है। पवित्र क़ुरआन की शैली का, विशेष रूप से अक़ीदों की आयतों के मामले में, जायज़ा लिया जाए तो अन्दाज़ा होता है कि पवित्र क़ुरआन ने ज़्यादा-तर ‘इस्तिक़रा’ (निश्चितता) की शैली अपनाई है। घटनाओं की आंशिक मिसालें देकर पवित्र क़ुरआन एक बड़े सिद्धान्त की निशानदेही करता है, जिस तक पवित्र क़ुरआन का पाठक ख़ुद-ब-ख़ुद पहुँच जाता है। पवित्र क़ुरआन में ख़िताबी तर्क भी हैं और ‘क़ियास’ से भी काम लिया गया है। पवित्र क़ुरआन में नैतिक तर्क भी दिए गए हैं। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सुचरित्र, अल्लाह की दयालुता, इनाकार करनेवालों और बहुदेववादियों का अंजाम और सत्कर्मियों की नेक-नामी को अपने बयानों के समर्थन में पेश किया गया है।
यही अन्दाज़ अक़ीदों की हदीसों का है। हदीसों के बड़े-बड़े संग्रह, चाहे वे ताबिईन के ज़माने के तुलनात्मक रूप से छोटे संग्रह हों, तबा-ताबिईन के दौर के तुलनात्मक रूप से बड़े संग्रह हों, या तबा-ताबिईन के बाद के ज़मानों के संकलित और सारगर्भित संग्रह हों, इन सबमें अक़ीदों से सम्बन्धित हदीसें मौजूद हैं, और वे सारी बहसें जो बाद के मुतकल्लिमीन के यहाँ चर्चा में ज़ेर-बहस आईं, वे इन हदीसों में बयान हुई हैं। जिस तरह पवित्र क़ुरआन ने यहूदियों, ईसाइयों और बहुदेववादियों के सवालों के जवाब दिए हैं, उनकी आपत्तियों को दूर करने की कोशिश की है और उनका उल्लेख करके उनको स्पष्ट किया है, उसी तरह हदीसों में भी ये वार्ताएँ मौजूद हैं।
यह बात जीवनी लेखकों ने भी लिखी है, टीकाकारों ने भी इसका उल्लेख किया है, मुहद्दिसीन के यहाँ भी यह उल्लेख मौजूद हैं कि बहुदेववादियों और यहूदियों में हिजरत से बहुत पहले से मुसलमानों के ख़िलाफ़ सहयोग और परामर्श का सिलसिला क़ायम था। बहुदेववादी रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से बहस, यानी एक धार्मिक बहस करने के लिए यहूदियों से मश्वरा किया करते थे और यहूदी समय-समय पर मक्का के बहुदेववादियों को ऐसे सवाल भेजते रहते थे जो उनके ख़याल में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दावे की सत्यता को जाँचने के लिए उनसे किए जाने चाहिएँ थे। सूरा-18 कह्फ़ में उल्लिखित प्रश्न इस परामर्श एवं सहयोग की एक महत्त्वपूर्ण मिसाल की हैसियत रखते हैं। इससे स्पष्ट रूप से यह अन्दाज़ा हो जाता है कि इस्लाम का अहले-किताब और दूसरे धर्मों से कलामी बहस-मुबाहसा और धार्मिक मामलों में मुजादला नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दौर से जारी है। इस मुजादिले (बहस) में यहूदियों ने भी हिस्सा लिया, बहुदेववादियों ने भी हिस्सा लिया और ख़ुद प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) में से कुछ ऐसे लोग भी इसमें शरीक रहे जिनको अपनी अन्तर्राष्ट्रीय यात्राओं के दौरान विभिन्न सभ्यताओं से वास्ता पड़ा था। इन प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने विभिन्न सभ्यताओं और धर्मों से अपनी जानकारी की वजह से कुछ प्रश्न रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछे और उन्होंने उन सवालों के सन्तोषजनक जवाब दिए।
यह वह भंडार या वह कच्चा माल था जिसके आधार पर इल्मे-कलाम की आधारशिला रखी गई। जब इल्मे-कलाम को कलात्मक दृष्टि से एक अलग कला के रूप में संकलित किया जा रहा था तो सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे पहला सवाल जो पैदा हुआ वह यह था कि अक़्ल (बुद्धि) और नक़्ल (क़ुरआन एवं हदीस से प्राप्त ज्ञान) में टकराव है या परस्पर अनुकूलता? अक़्ल और नक़्ल या बुद्धि और वह्य या आजकल के शब्दों में धर्म और विज्ञान के दरमियान टकराव की समस्या दुनिया के हर धर्म को पेश आई है। कुछ धर्म तो इस सवाल का कोई उत्तर नहीं दे पाए और उन्होंने बहुत जल्द हथियार डाल दिए, और उन्होंने एकाग्र होकर या तो बुद्धि को आधार बनाया या फिर ग्रन्थों में लिखी बातों को। कुछ धर्मों ने इसका उत्तर देने की कोशिश की, लेकिन इस उत्तर को ज्ञानपरक ढंग से संकलित नहीं किया। उसके नियमों पर विचार नहीं किया और इस सामंजस्य के सिद्धान्त और नियम संकलित नहीं किए।
इसके विपरीत इस्लामी इतिहास में मुतकल्लिमीने-इस्लाम और उलमाए-उसूल ने जो बहुत-सी स्थितियों में एक ही व्यक्तित्व की दो उपाधियाँ थीं, एक ही व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू थे, इस अनुकूलता के सिद्धान्त एवं नियम भी संकलित किए और विस्तृत नियम भी, और आख़िरकार वे मतैक्य से इस निष्कर्ष पर पहुँच गए कि ‘मनक़ूले-सहीह’ (प्रमाणित ग्रन्थीय ज्ञान) और ‘माक़ूले-सरीह’ (बुद्धिसंगत ज्ञान) के दरमियान कोई टकराव नहीं है। यानी हर वह शिक्षा जो निश्चित रूप से रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के व्यक्तित्व से साबित है, उदाहरणार्थ पवित्र क़ुरआन है, तो वह निश्चित रूप से प्रमाणित है। सहीह हदीसें भी अगर ज्ञानपरक और कलात्मक रूप से साबित हैं तो उनमें और ऐसे ज्ञानपरक तथ्यों में स्पष्ट रूप से बुद्धि की माँग हैं, कोई टकराव नहीं है।
इस्लाम के बड़े विद्वानों ने ‘माक़ूल’ (बुद्धि संगत) के साथ ‘सरीह’ (स्पष्ट रूप से) की शर्त ज़रूर लगाई है। यह शर्त इसलिए ज़रूरी है कि बौद्धिकता के नाम पर बहुत-सी कमज़ोर और अपरिपक्व बातें भी हर दौर में कही जाती रही हैं। हर दौर के बुद्धिजीवियों की यह शैली रही है कि किसी ख़ास समय में उनके ज़ेहन में जो सवालात या ख़यालात पैदा हों उनको वे बुद्धि की फ़ाइनल और निश्चित माँग समझने लगते हैं और इस सही-ग़लत के मिश्रण को फ़ाइनल और निश्चित तथ्य मानकर उनके आधार पर दीनी समस्याओं और तथ्यों के बारे में प्रश्न उठाते हैं। समय के साथ-साथ यह साबित होता जाता है कि वे चीज़ें जिनको किसी समय बुद्धि का फ़ाइनल और निश्चित मानदंड समझा गया था वह मात्र एक राय थी जिसका आधार विशुद्ध प्रमाणित तर्कों पर नहीं था। ऐसे सैंकड़ों नहीं हज़ारों विचार हैं जो अतीत में निश्चितता के साथ प्रस्तुत किए गए और उनके आधार पर धार्मिक अक़ीदों की नई व्याख्या की दावत दी गई, लेकिन समय ने बताया कि ये विचार मात्र सतही ख़यालात या व्यक्तिगत विचार एवं राय थे, उनकी बुनियाद तथ्यों पर नहीं थी। इसलिए मुतकल्लिमीने-इस्लाम ने पहले दिन से ‘सरीह’ की शर्त लगाई है कि जिस वास्तविकता के बारे में ‘सराहत’ (स्पष्टता) के साथ साबित हो जाए कि यह बुद्धि की अनिवार्य और निश्चित अपेक्षा है उसमें और ‘सहीहुल-मनक़ूल’ में कोई टकराव नहीं है।
यही बात इमाम तहावी ने भी लिखी है जो इस्लाम के मुख्य दौर के अति प्रमाणित मुतकल्लिमीन और इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) में से हैं। बाद के लगभग हर दौर में, चाहे वह क़ाज़ी इब्ने-रुश्द जैसे दार्शनिक, मुतकल्लिम और फ़क़ीह हों या अल्लामा इब्ने-तैमिया (रह॰) जैसे बड़े इमाम और अपने दौर के मुजद्दिद हों, सबने इस बात को विभिन्न ढंग से स्पष्ट किया है कि अक़्ल और नक़्ल में कोई टकराव नहीं है। इमाम इब्ने-तैमिया (रह॰) ने तो ‘दर-ए-तआरुज़ अल-अक़्ल वन-नक़्ल’ के नाम से इस विषय पर एक भरपूर और मोटी किताब भी लिखी है। इब्ने-रुश्द का रिसाला ‘फ़सलुल-मक़ालि फी माबै-न अश-शरीअ वल-हिकमः मिनल-इत्तिसाल’ अगरचे संक्षिप्त है लेकिन इस बारे में शोहरत रखता है और अपने ज़माने में दार्शनिकों और शरीअत के दरमियान सन्तुलन और बड़ाई का सबसे नुमायाँ और उल्लेखनीय नमूना कहलाता था।
दर्शन यानी अक़्लियात और शरीअत में जो सर्वसम्मत मामलात हैं वे क्या हैं? ख़ुद हमारे दौर में उपमहाद्वीप में बीसवीं शताब्दी में अनेक विद्वानों ने इस सवाल को क़ौम के सामने रखा और अक़्ल और नक़्ल के दरमियान सामंजस्य बिठाने और बड़ाई के सिद्धान्त को बयान किया। यह बात सम्भवतः दोहराने की ज़रूरत नहीं। पवित्र क़ुरआन का हर विद्यार्थी जानता है कि पवित्र क़ुरआन ने अनगिनत स्थानों पर, विशुद्ध धार्मिक मामलों और अक़ीदों पर बात करते हुए भी, मानव-बुद्धि और अवलोकन को अपील किया है। ‘तफ़क्कुर’, ‘तदब्बुर’, ‘ताक़्क़ुल’ ये शब्द पवित्र क़ुरआन में इतनी अधिक बार बयान हुए हैं और इतना अधिक उनका हवाला दिया गया है कि अब यह एक बहुत जानी-मानी बात की हैसियत रखती है। जब यह सवाल उठने और उनके ज्ञानपरक उत्तर संकलित होने शुरू हुए, और जैसा कि मैं ने बताया कि सहाबा और ताबिईन ही के सामने ये सवालात आने लगे थे। तो जल्द ही एक वर्ग में एक प्रवृत्ति यह पैदा होने लगी कि ऐसे मुजर्रिद बौद्धिक सवालात भी उठाए जाएँ जिनकी कोई व्यावहारिक उपयोगिता न हो। यह प्रवृत्ति इस्लाम की रूह और मुसलमानों के स्वभाव के ख़िलाफ़ समझी गई। इसलिए कि विशुद्ध बौद्धिक, अव्यावहारिक और बे-नतीजा सवालात उठाना इस्लाम के स्वभाव से मेल नहीं खाता। अलबत्ता अगर कोई सवाल सचमुच किसी के ज़ेहन में पैदा होता है और उसका जवाब नहीं दिया जाता तो इस बात का ख़तरा है कि उसके दिल में इस्लाम के अक़ीदों और शिक्षा के बारे में कोई बद-गुमानी या कुविचार जन्म लेगा जो बाद में जाकर परिपक्व हो जाएगा। चुनाँचे वास्तविक और सचुमच पैदा होनेवाली आपत्तियों और सवालों के जवाब देना तो सहाबा और ताबिईन ने अपनी ज़िम्मेदारी समझा। लेकिन अगर सवाल केवल सवाल करने के लिए उठाया गया हो या शक बनाए रखने के लिए शक पैदा किया गया हो तो प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने इस तरह के शकों का जवाब देना न केवल पसन्द नहीं किया, बल्कि इस प्रवृत्ति के ख़िलाफ़ सख़्त नापसन्दीदगी का इज़हार किया।
हज़रत हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) का रवैया इस मामले में ख़ासा सख़्त था। उन्होंने एक से अधिक मौक़ों पर इस तरह की हरकत करनेवालों को सज़ा भी दी। चुनाँचे सबीह नामी एक व्यक्ति का उल्लेख मिलता है जो सूरा-77 मुर्सलात के बारे में सवालात उठाया और फैलाया करता था। उल्लेखों में इन सवालों का स्पष्टीकरण नहीं मिलता कि वे किस तरह के सवालात थे, लेकिन वे सवालात निश्चय ही ऐसे थे कि उनसे सन्देह तो पैदा होते थे, लेकिन किसी वास्तविक आपत्ति की निशानदेही नहीं होती थी। हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उस व्यक्ति को समझाने और इस बेकार हरकत से बाज़ रखने की कोशिश की, लेकिन वह बाज़ नहीं आया। हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उसको सज़ा दी और इतनी सज़ा दी कि आम हालात में उनका इतनी सज़ा देने का नियम नहीं था। इस तरह की घटनाएँ हज़रत अली-बिन-अबी-तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ज़माने में भी घटित हुईं और शेष सहाबा या ताबिईन के ज़माने में भी ऐसी घटनाएँ मिलती हैं। यह सख़्त रवैया सम्भवतः इस बात को निश्चित बनाने के लिए था कि सवाल हेतु सवाल और सन्देह हेतु सन्देह की प्रवृत्ति को इस्लामी समाज में या मुसलमानों की ज्ञानपरक और वैचारिक जीवन में पनपने की गुंजाइश न दी जाए।
यह बात कि अक़्ल और नक़्ल के दरमियान सन्तुलन कैसे पैदा किया जाए? तमाम कलामी बहसों का मूल सिद्धान्त रहा और मौलिक प्रश्न क़रार पाया। इस सवाल से लगभग हर दौर के मुतकल्लिमीन ने बहस की है और अक़्ल और नक़्ल की माँगों के मध्य सन्तुलन क़ायम करने की कोशिश की है। ज़ाहिर है कि इन कोशिशों में विभिन्न विद्वानों और चिन्तकों के अपने स्वभाव और विचारधारा के प्रभाव भी महसूस होते हैं। यह जायज़ा ख़ुद एक महत्त्वपूर्ण विषय की हैसियत रखता है कि किसी मुतकल्लिम के यहाँ अक़्ल का पलड़ा भारी है और किस के यहाँ नक़्ल का। फिर किस दौर और किस इलाक़े में अक़्ल का पलड़ा भारी रहा और किस दौर और किस इलाक़े में नक़्ल का।
कुछ विद्वान लोगों ने जिनमें हमारी यूनिवर्सिटी के पूर्व अध्यक्ष और मिस्र के पहली पंक्ति के चिन्तक डॉक्टर हसन शाफ़िई भी शामिल हैं, इस महत्त्वपूर्ण कलामी मसले के बारे में मुतकल्लिमीन की रायों का ऐतिहासिक और आलोचनात्मक निरीक्षण किया है। डॉक्टर शाफ़िई ने एक किताब में सर्वसम्मत रायों और प्रवृत्तियों के बारे में एक नक़्शा भी बनाया है, जिसमें उन्होंने बताया है कि दूसरी, तीसरी और चौथी शताब्दी हिजरी में जितने कलामी मदारिस पैदा हुए उनका अक़्ल और नक़्ल के बारे में क्या रवैया था। एक अत्यन्त रवैया यह हो सकता है कि अक़्ल को सिरे से नज़रअन्दाज़ कर दिया जाए और दीनी (धार्मिक) मामलों में केवल नक़्ल पर बुनियाद रखी जाए। एक और दूसरा अतिवादी रवैया यह हो सकता है कि बुद्धि पर ही तमाम दीनी और धार्मिक मामलों की आधारशिला रखी जाए और नक़्ल को सिरे से नज़रअन्दाज़ कर दिया जाए। ज़ाहिर है कि ये दोनों अतियाँ अवास्तविक हैं और असन्तुलित दृष्टिकोणों को जन्म देती हैं। इन दोनों इन्तिहाओं के दरमियान जो सन्तुलन का रास्ता है वही स्वीकार्य और सर्वसम्मत रास्ता है। जो लोग बुद्धिवाद में बहुत ज़्यादा नुमायाँ हुए उनमें से अधिकांश वे थे जो बाद में ‘मोतज़िली’ कहलाये। जो लोग नक़्ली (क़ुरआन एवं हदीस में लिखे) तर्कों का प्रावधान करने में बहुत ज़्यादा प्रसिद्ध हुए वे थे जिनको उनके विरोधियों ने ‘हश्विया’ के नाम से याद किया है और वे ख़ुद अपने-आपको प्रायः अहले-ज़ाहिर के नाम से याद करते थे। उनमें से कुछ लोग वे भी थे जो अक़ीदों के मामले में हज़रत इमाम अहमद-बिन-हंबल (रह॰) के पैरौ थे और अपने को हंबली या सलफ़ी क़रार देते थे। यह नहीं समझना चाहिए कि ‘हश्विया’ या ‘मोतज़िला’ कोई बहुत बड़ा गरोह था। यह एक राय थी जो शुरू में एक प्रवृत्ति के रूप में सामने आई। यह प्रवृत्ति आगे चलकर एक मदरसा-ए-फ़िक्र (School of thought) में परिवर्तित हुई।
लेकिन समय के साथ-साथ इन तमाम प्रवृत्तियों और मदारिसे-फ़िक्र में विचारों का आदान-प्रदान भी जारी रहा और मुसलमान एक सर्वसम्मत दृष्टिकोण की तरफ़ बढ़ते चले गए। वे सर्वसम्मत दृष्टिकोण जो बहुत जल्द सामने आ गया, यह था कि विशुद्ध दीनी मामलात, दीनी आदेशों और शिक्षाओं के मामले में अक़्ल और नक़्ल दोनों का अपना-अपना चरित्र है। बुद्धि से एक हद तक यह मालूम हो सकता है कि क्या चीज़ अपने-आपमें अच्छी है और क्या चीज़ बुरी है, लेकिन अच्छाई-बुराई का अस्ल, आख़िरी और निश्चित फ़ैसला वह्य (प्रकाशना) के द्वारा ही हो सकता है और वह्य के द्वारा ही किसी कार्य को उत्तम प्रतिदान या यातना का कारण क़रार दिया जा सकता है।
मोतज़िला, जिनको आप इस्लाम में विशुद्ध बुद्धिवादियों का प्रतिनिधि क़रार दे सकते हैं (अगरचे आजकल के बुद्धिवाद के अर्थ की दृष्टि से यह बात दुरुस्त न होगी, लेकिन उस ज़माने में बुद्धिवाद के अर्थ की दृष्टि से उनको बुद्धिवाद का प्रतिनिधि क़रार दिया जा सकता है) उनका यह कहना था कि अक़्ल और नक़्ल दोनों बुनियादों पर किसी चीज़ के अच्छा और बुरा होने का फ़ैसला किया जा सकता है। अगर बुद्धि किसी चीज़ को अच्छा क़रार देती है तो वह अच्छी है, और अगर नक़्ल (धर्म ग्रन्थीय ज्ञान) उसका समर्थन करता है तो उससे अधिक उसका अच्छा होना साबित हो जाता है। इसी तरह इसके विपरीत अगर बुद्धि किसी चीज़ के बुरा होने का फ़ैसला करती है तो वह चीज़ बुरी है और अगर ‘नक़्ल’ से भी उसका समर्थन हो जाता है तो उसका बुरा होना और अधिक स्पष्ट हो जाता है। गोया वह्य और बुद्धि का एक-दूसरे के लिए समर्थन प्रमाण ही प्रमाण है।
इसके मुक़ाबले में एक दृष्टिकोण वह था जिसके माननेवाले आम तौर से वे लोग थे जिनको ‘अशाइरा’ कहा जाता था। ‘अशाइरा’ के ख़याल में विशुद्ध बुद्धि के आधार पर धार्मिक अक़ीदों का फ़ैसला नहीं किया जा सकता और धार्मिक और दीनी दृष्टि से जो मामलात अच्छे या बुरे क़रार दिए जाएँगे वे केवल ‘नक़्ल’ (क़ुरआन एवं हदीस में वर्णित आदेशों) के आधार पर क़रार दिए जाएँगे। बुद्धि को उससे कोई सरोकार नहीं। बज़ाहिर आज यह बात ज़रा कमज़ोर या हल्की मालूम होती है, लेकिन जिस ज़माने में यह कही गई, उस ज़माने में मुस्लिम समाज के बड़े-बड़े दिमाग़ों ने न केवल यह बात कही, बल्कि अत्यन्त ज़ोर-शोर से इसका समर्थन भी किया। इमाम ग़ज़ाली (रह॰) और इमाम राज़ी जैसे विद्वान यही दृष्टिकोण रखते थे।
इन दोनों के मुक़ाबले में एक तीसरा दृष्टिकोण सामने आया जो शुरू में तो ज़्यादा लोकप्रिय नहीं था, लेकिन बाद में क्रमशः लोकप्रिय होता चला गया और पहले दोनों दृष्टिकोणों के माननेवाले भी आख़िरकार इससे किसी-न-किसी हद तक सहमति व्यक्त करने पर मजबूर हो गए, और आज सम्भवतः मुस्लिम समाज की अधिकांश आबादी इसी को मानती है। वह दृष्टिकोण यह है कि अक़्ल और नक़्ल दोनों के आधार पर किसी चीज़ की अच्छाई या बुराई का फ़ैसला किया जा सकता है, लेकिन जहाँ तक आख़िरत की यातना और उत्तम प्रतिदान का सम्बन्ध है, इसका फ़ैसला केवल नक़्ल (यानी क़ुरआन एवं हदीस में लिखे सिद्धान्तों) के आधार पर होगा। सांसारिक मामलों का फ़ैसला अक़्ल और नक़्ल दोनों के आधार पर किया जा सकता है। आज शरीअत के मार्गदर्शन से रौशन सद्बुद्धि किसी चीज़ को अच्छा या बुरा क़रार दे सकती है, या देश का क़ानून या रिवाज किसी चीज़ को ग़लत या सही क़रार दे सकता है, लेकिन परलोक में अज़ाब और सवाब उसी अच्छाई या बुराई के आधार पर मिलेगा जिसको शरीअत ने अच्छाई या बुराई क़रार दिया हो। यह बात निस्सन्देह बहुत बुद्धिसंगत और सन्तुलित है। उस समय थोड़े लोग थे जो उससे सहमति व्यक्त करते थे। यह दृष्टिकोण इमाम अबू-मंसूर मातुरीदी का था जिनके माननेवाले मातुरीदी कहलाते थे। समय के साथ-साथ अशाइरा और मातुरीदी दोनों इससे इत्तिफ़ाक़ करते गए। आख़िरकार यह अशाइरा और मातुरीदी का बड़ी हद तक सर्वसम्मत दृष्टिकोण बन गया। बाद के मोतज़िला ने भी इससे सहमति जताई। अशाइरा और मातुरीदी की सोच इतनी व्यापक थी कि मोतज़िला की सोच उसमें विलीन हो गई और मोतज़िला के जो विचार मुसलमानों की आम प्रवृत्ति से अलग थे, वे समय के साथ-साथ ख़त्म होते चले गए।
इन हालात में जब पहली बार उन बहसों को संकलित करने की ज़रूरत पेश आई तो इसको ‘फ़िक़्हुल-अकबर’ के शब्द से याद किया गया। इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) जिनसे इल्मे-कलाम की सबसे पहली किताब जुड़ी है जो उनकी अपनी प्रत्यक्ष रूप से या उनके शिष्यों में से किसी की लिखी हुई है, वह ‘अल-फ़िक़्हुल-अकबर’ के नाम से प्रसिद्ध है। इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) ने फ़िक़्ह के दो हिस्से क़रार दिए हैं। एक ‘फ़िक़्हुल-उसूल’ और दूसरा ‘फ़िक़्हुल-फ़ुरूअ’। इसी तरह एक ‘फ़िक़्हुल-क़ुलूब’ है और दूसरी ‘फ़िक़्हुल-आमाल’। एक वह फ़िक़्ह है जो शरीअत की बुनियादों और अक़ीदों की गहरी समझ पर आधारित है, जिसका सम्बन्ध इंसान के हार्दिक मामलों से है। दूसरी फ़िक़्ह वह है जिसका सम्बन्ध इंसान के ज़ाहिरी मामलात से है, वह ‘फ़िक़्हुल-आमाल’ या ‘फ़िक़्हे-ज़ाहिर’ कही जा सकती है। इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) ने फ़िक़्ह की जो परिभाषा अपने ज़माने में की थी वह इस व्यापकता को सामने रखकर की थी। इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) की परिभाषा थी “इंसान इस बात की मारिफ़त (गहरा ज्ञान) प्राप्त करे कि उसकी ज़िम्मेदारियाँ क्या हैं और उसके अधिकार क्या हैं?” इसमें अक़ीदा भी शामिल है। क़ल्बी-आमाल भी शामिल हैं, ‘तज़किया’ और ‘एहसान’ भी शामिल है और विशुद्ध ज़ाहिरी और फ़िक़ही आमाल भी शामिल हैं।
व्यापकता और परिपूर्ण करने की यह प्रवृत्ति जो इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) के इस लेख और परिभाषा से शुरू हुई थी, और बाद में ख़ासी दब गई थी, बादवालों में दोबारा अपनाई गई और बादवालों में बहुत-से लोगों ने फ़िक़्ह और कलाम की व्यापकता को एक-बार फिर अपने ध्यान का केन्द्र बनाया। विशेष रूप से उलमाए-उसूल और मुतकल्लिमीन में जो एक जैसी समस्याएँ थीं उनसे भी ‘फ़िक़्हुल-अकबर’ और ‘फ़िक़्हुल-असग़र’ का महत्त्व बहुत बढ़ गया। इस दृष्टि से हम कह सकते हैं कि इल्मे-कलाम और इल्मे-फ़िक़्ह यह दोनों एक ही ज्ञान या एक ही कला के दो पहलू थे। एक उसूले-दीन का ज्ञान था जिसका विषय तौहीद का अक़ीदा और अक़ीदों के बारे में चिन्तन-मनन करना और तर्कों से उनहें सिद्ध करना था, दूसरी कला वह थी जो इंसान के प्रतिदिन के मामलों से बहस करती था। यही वजह है कि फ़िक़्हे-अकबर के साथ-साथ दूसरे शीर्षक जो इस कला के लिए प्रयुक्त किए गए वे उसूले-दीन, इल्मे-अक़ाइद, इल्मे-तौहीद और इल्मे-अस्मा और सिफ़ात (अल्लाह के नामों और उसके गुणों का ज्ञान) थे।
यह सवाल कि इल्मे-कलाम को कलाम क्यों कहा गया? अक्सर उठाया जाता रहा है। बहुत-से लोगों ने इस सवाल का जवाब देने की कोशिश भी की और इस ज्ञान के कारण पर रौशनी डाली। आम तौर पर जो कारण बयान किया जाता है वह यह है कि जब शुरू-शुरू में इस ज्ञान को बाक़ायदा कलात्मक रूप से संकलित किए जाने की बात आई तो उस समय जो अति महत्त्वपूर्ण समस्या मुतकल्लिमीन के क्षेत्रों में ज़ेरे-बहस थी वह कलामे-इलाही (क़ुरआन) से सम्बन्धित थी। कलामे-इलाही (अल्लाह का कलाम) की वास्तविकता क्या है? आसमानी किताबें किसी अर्थ में कलामे-इलाही हैं? कलामे-इलाही जब इंसानों तक पहुँचता है तो उसका प्रकार क्या होता है? निस्सन्देह पवित्र क़ुरआन कलामे-इलाही है और यह कलाम अल्लाह तआला के एक महत्त्वपूर्ण गुण का प्रतीक है। इसलिए इसकी वास्तविकता और प्रकार क्या है? इन सबका गहरा सम्बन्ध इस सवाल से था कि अल्लाह तआला के अस्तित्व और गुणों की वास्तविकता क्या है? अस्तित्व का गुणों से सम्बन्ध क्या है? गुणों का अस्तित्व से क्या सम्बन्ध है? क्या इन दोनों का अलग-अलग अपने-आपमें एक अस्तित्व है, या दोनों का अलग-अलग अस्तित्व नहीं है? अगर अपने-आपमें अलग अस्तित्व है तो क्या गुण भी इसी तरह प्राचीन हैं, जिस तरह अल्लाह तआला का अस्तित्व प्राचीन है? इन प्रश्नों के सन्दर्भ में कलाम के गुण का सवाल भी पैदा हुआ। अगर अल्लाह के अस्तित्व की तरह उसके गुण भी प्राचीन हैं तो फिर कलाम का गुण भी प्राचीन है। अगर कलाम प्राचीन है तो क्या किताबे-इलाही और पवित्र क़ुरआन भी प्राचीन है।
जब यह सवाल पैदा हुआ तो विद्वानों और बुद्धिजीवियों के दो गिरोहों ने दो विभिन्न दृष्टिकोण अपनाए। दोनों गिरोहों ने अपने दृष्टिकोण को सही समझा और उसपर सख़्त रुख़ अपनाया। एक गिरोह को संयोग से शासन के संसाधन भी प्राप्त थे। उसने अपने दृष्टिकोण को ही न केवल फ़ाइनल और निश्चित समझा, बल्कि तौहीदे-हक़ीक़ी (वास्तविक एकेश्वरवाद) और तंज़िया-ए-कामिल (अल्लाह का हर अवगुण से मुक्त होना) को निश्चित बनाने के लिए उसपर ईमान रखना भी ज़रूरी समझा। इस ख़याल के सामने इस गिरोह ने दीन और इस्लाम की माँग यही समझी कि अपने दृष्टिकोण को ज़बरदस्ती लोगों से मनवाया जाए। इसका नतीजा कुछ अत्यन्त प्रतिष्ठित और प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों पर सख़्ती के रूप में निकला जो इस्लामी इतिहास में कोई सुखद बात नहीं थी। दूसरी तरफ़ दूसरे गिरोह ने जो मुस्लिम समुदाय के कुछ अत्यन्त प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों पर आधारित था, अपने दृष्टिकोण के सही होने पर न केवल आग्रह किया, बल्कि पहले दृष्टिकोण को कुफ़्र, इलहाद (इस्लाम से विमुख हो जाना) और फ़ित्ना क़रार देकर उसका मुक़ाबला करने का फ़ैसला किया। इस तरह मुस्लिम समुदाय में दो गिरोह एक-दूसरे के सम्मुख आ गए। और मुस्लिम समाज को एक अत्यन्त कष्टप्रद स्थिति का सामना करना पड़ा।
कलामे-इलाही की वास्तविकता के साथ-साथ कुछ ऐसी समस्याएँ भी ज़ेरे-बहस आईं जिनको आप पवित्र क़ुरआन के कलामी बयानात पर आधारित कह सकते हैं। पवित्र क़ुरआन में तौहीद (एकेश्वरवाद) का उल्लेख भी है और पैग़म्बरी का भी, आख़िरत के तर्क और गवाहियाँ भी बयान की गई हैं और उन अक़ीदों पर मक्का के इस्लाम-विरोधियों की तरफ़ से आपत्तियाँ भी नक़्ल की गई हैं। बहुत-से बहुदेववादी अरब मरने के बाद दोबारा उठाए जाने को नहीं मानते थे, इसलिए उनकी तरफ़ से आए दिन तरह-तरह के सन्देह उठाए जाते थे, उनके उत्तर भी पवित्र क़ुरआन में दिए गए हैं। दूसरे धर्मों के खंडन में भी हैं। बुत-परस्ती, शिर्क, नास्तिकता, यहूदियत और मसीहियत पर पवित्र क़ुरआन में टिप्पणियाँ हैं और बुद्धि एवं विवेक के साथ-साथ ईमान लाने की दावत भी है।
इन सब चीज़ों का बयान पवित्र क़ुरआन की जिन आयतों में हुआ है उनको दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है। और यह विभाजन ख़ुद पवित्र क़ुरआन का किया हुआ है, किसी मुतकल्लिम या फ़क़ीह का किया हुआ नहीं है। कुछ आयतें तो वे हैं जिन्हें पवित्र क़ुरआन ने उम्मुल-किताब और मुहकमात कहा है। किताब की अस्ल यही हैं। दूसरी वे आयतें हैं जो मुतशाबिहात (उपलक्षित) कहलाती हैं, जिनमें आख़िरत, फ़रिश्तों और दूसरे परोक्ष मामलों को कहीं उपमा कहीं सांकेतिक रूप में और कहीं अलंकार की शैली में पेश किया गया है। इन बयानों के वास्तविक अर्थ के बारे में एक से अधिक व्याख्याओं की सम्भावना मौजूद है। जिनके दिल में टेढ़ापन होता है वे मुतशाबिहात के पीछे लग जाते हैं, उनके बारे में ग़ैर-ज़रूरी सवालात उठाए जाते हैं। यों पवित्र क़ुरआन के मुहकमात से, जिनपर ईमान लाना और जिनपर अमल करना हर इंसान की ज़िम्मेदारी है, ऐसे लोगों का ध्यान हट जाता है।
जब इन आयाते-मुतशाबिहात (उपलक्षित आयतों) की व्याख्या की बात आई तो यह बात भी सामने आई कि मुतशाबिहात को समझने की शैली क्या होनी चाहिए? और मुतशाबिहात की व्याख्या के नियम एवं सिद्धान्त क्या होने चाहिएँ। यह विशुद्ध कलामी बहस और कलामी मामला था। इस विशुद्ध कलामी मसले ने जहाँ मुहद्दिसीन का ध्यान इस ओर कराया वहाँ टीकाकारों का ध्यान भी इस ओर कराया। विशुद्ध मुतकल्लिमीन जो उस समय संख्या में बहुत कम थे, उन्होंने भी इस सवाल की ओर ध्यान दिया। उदाहरण के रूप में पवित्र क़ुरआन में आया कि “अल्लाह तआला का हाथ उनके हाथों के ऊपर था।” यहाँ अल्लाह का हाथ से क्या मुराद है? क्या यह वैसा ही शारीरिक हाथ है जो हर इंसान का होता है? या इससे मुराद दस्ते-क़ुदरत यानी सामर्थ्य शक्ति है? या इसका अर्थ दस्ते-शफ़क़त यानी दयालुता की छाया है? इस तरह उदाहरणार्थ पवित्र क़ुरआन में है कि “अल्लाह तआला अर्श पर मुस्तवी हुआ” अब ‘इस्तिवा’ का ज़ाहिरी और शाब्दिक अर्थ तो यह है कि कोई व्यक्ति शारीरिक अस्तित्व के साथ किसी तख़्त पर सवार हो जाए, बैठ जाए। क्या अल्लाह तआला इस अर्थ में तख़्त पर बैठा? क्या वह शारीरिक रूप में तख़्त पर इस तरह सम्भव है जिस तरह सांसारिक बादशाह अपने तख़्त पर बैठते हैं?
इस तरह की आयतों और बयानात के बहुत-से अर्थ और भावार्थ हो सकते हैं जिनमें से हर एक की गुंजाइश अरबी भाषा और शैली तथा नियमों की दृष्टि से मौजूद है। इन आयतों की टीका के मामले में विद्वानों में तीन चार विभिन्न प्रकार के दृष्टिकोण पैदा हुए, लेकिन मुसलमानों की बड़ी संख्या और मुसलमान विद्वानों और मुहद्दिसीन की अधिकांश संख्या ने इस तरह के सवालात उठाने को अव्यावहारिक और निष्फल गतिविधि क़रार दिया। इमाम मालिक (रह॰) का यह वाक्य प्रसिद्ध है और लगभग तमाम मुतकल्लिमीन ने किसी-न-किसी अन्दाज़ में इसको नक़्ल किया है कि “इस्तिवा तो मालूम है, लेकिन उसकी कैफ़ियत हमें मालूम नहीं है।” अल्लाह तआला के ‘इस्तिवा’ की कैफ़ियत क्या है? उसे हम नहीं जानते। और उसपर ईमान लाना अनिवार्य है। इसलिए कि उसका ज़िक्र पवित्र क़ुरआन में आया है और इस कैफ़ियत के सम्बन्ध में सवाल करना बिद्अत है। इसलिए कि इस कैफ़ियत को इंसान न समझ सकता है और न इंसानों की ज़बान में शायद उसके लिए ऐसे शब्द मौजूद हैं जो इस कैफ़ियत को बयान कर सकें।
इन विशुद्ध कलामी समस्याओं के साथ-साथ एक और सन्दर्भगत समस्या जिसने आगे चलकर कई मदारिसे-फ़िक्र (Schools of thougt) को जन्म दिया, वह इमामत और क़ियादत (नेतृत्व) की समस्या थी। इमामत की समस्या यों तो फ़िक़्हे-ज़ाहिर और फ़िक़्हे-अमली से सम्बन्ध रखती है, और जैसा कि मैंने बताया था कि इमामत की स्थापना अपने-आपमें अभीष्ट नहीं है, बल्कि दूसरे कारणों से अभीष्ट है। मूल उद्देश्य तो कुछ और उद्देश्यों की पूर्ति है जो मुस्लिम समुदाय को अंजाम देने हैं। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए माध्यम के तौर पर राज्य और इमामत की ज़रूरत पड़ती है। इसलिए इमामत की अनिवार्यता, संसाधनों की अनिवार्यता के प्रकार की है, उद्देश्यों की अनवार्यता के प्रकार की नहीं, इससे तो किसी को मतभेद नहीं था, लेकिन यह बात कि इमामत के अपने-आपमें अनिवार्य होने का आधार और प्रमाण क्या है? यह सवाल बहुत शुरू ही में पैदा हुआ। जब यह सवाल पैदा हुआ कि इमामत की ज़रूरत मुस्लिम समुदाय को है कि नहीं, तो इस बड़े सवाल के नतीजे में अनेक आंशिक प्रश्नों का पैदा होना भी अनिवार्य था। उदाहरणार्थ इमामत की शर्तें क्या होंगी? जो लोग इमामत के पद पर आसीन होंगे उनके गुण क्या होंगे? क्या उनके लिए पूरे मुस्लिम समुदाय में सर्वश्रेष्ठ होना ज़रूरी है? क्या इमामत मफ़ज़ूल, यानी ऐसे व्यक्ति की इमामत जिससे श्रेष्ठ लोग मौजूद हों, जायज़ है?
जब ये सवालात पैदा हुए तो विभिन्न लोगों ने उनके बारे में राय क़ायम की। कुछ लोगों ने दावा किया कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने बाद अपने उत्तराधिकारी के बारे में वसीयत कर दी थी, उसका पालन करना अनिवार्य है। वह वसीयत हज़रत अली-बिन-अबी-तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) के लिए की गई थी। अत: उनको स्पष्ट रूप से रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का उत्तराधिकारी होना चाहिए था और जिन्होंने इस उत्तराधिकार को स्वीकार नहीं किया उन्होंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के स्पष्ट आदेश का उल्लंघन किया। यह एक गिरोह की राय थी, यह राय इन शब्दों में और इस स्पष्टता के साथ अगरचे तुरन्त रूप से नहीं आई, बल्कि बहुत बाद में सामने आई, लेकिन एक महत्त्वपूर्ण समस्या के तौर पर यह तसव्वुर या ख़याल पहली शताब्दी हिजरी के अन्त से ही किसी-न-किसी अन्दाज़ में ज़ेरे-बहस रहा। स्पष्ट रहे कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तरफ़ से नामज़दगी की यह बात ख़ुद हज़रत अली-बिन-अबी-तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कही न उनके बेटों हज़रत इमाम हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कही, और न ही इन दोनों के बेटों में से किसी ने कही, यह बहुत बाद में सामने आई।
दूसरी राय यह थी कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के उत्तराधिकारी और मुसलमानों के शासक का चुनाव मुस्लिम समाज की ज़िम्मेदारी है। यह अधिकार मुस्लिम समाज के अहले-हल्लो-अक़्द (समाधान करने का गुण रखनेवालों) या मुसलमानों के विश्वसनीय लोगों या पूरे मुस्लिम समुदाय का है कि वह अपना अमीर (नेता) चुने। मुस्लिम समाज जिसका चुनाव कर ले वह मुसलमानों का इमाम हो सकता है।
तीसरा दृष्टिकोण एक यह भी सामने आया कि मुसलमानों को किसी इमाम की ज़रूरत नहीं। अगर मुस्लिम समाज स्वयं पवित्र क़ुरआन का पालन करता रहे और शरीअत के आदेशों पर अमल करता रहे तो किसी इमामत की ज़रूरत नहीं। यह एक बहुत थोड़ी संख्या का दृष्टिकोण था, लेकिन जिसका जो दृष्टिकोण था उसने तर्कों से उसको बयान किया और तर्कों से अपने दृष्टिकोण को बयान करने के साथ-साथ दूसरों के दृष्टिकोणों की आलोचना भी की और उनके तर्कों को रद्द भी किया। इस प्रकार बहुत जल्द इमामत की समस्या एक कलामी समस्या बन गई। यों एक विशुद्ध प्रशासनिक और राजनैतिक मुद्दे ने कलामी समस्या की हैसियत ले ली, इसलिए कि कुछ लोग शिद्दत के साथ अपनी ही राय को दुरुस्त क़रार देते थे।
ऐसा बाद की शताब्दियों में भी होता रहा कि बहुत-सी ऐसी समस्याएँ जिनका सम्बन्ध अक़ीदों से नहीं था, जिनका सम्बन्ध धर्म की बुनियादों से नहीं था, लेकिन किसी कारणवश, उदाहरणार्थ कुछ लोगों की भावनाओं की शिद्दत के कारण या कुछ लोगों के किसी मामले से गहरे लगाव के कारण कोई एक राय बहुत अधिक विवादित और महत्त्वपूर्ण बन गई, उसपर बहुत ज़्यादा बहस-मुबाहसा और बाल की खाल निकालना शुरू हुआ तो वह राय भी इल्मे-कलाम का हिस्सा बन गई। उदाहरणार्थ अमुक बुज़ुर्ग ने इस्लाम स्वीकार किया था या नहीं किया था? अब यह एक विशुद्ध ऐतिहासिक मामला है। लेकिन अगर इसपर मुसलमानों के दो गिरोहों में बहुत शिद्दत पैदा हो जाए और दोनों तरफ़ से अपनी-अपनी राय के समर्थन में तर्क और जवाबी तर्क सामने आने लगें तो यह कलामी मामला बन जाएगा। इस तरह इल्मे-कलाम में बहुत-सी नई-नई समस्याएँ शामिल होती गईं।
एक बड़ा सवाल यह सामने आया कि ईमान जिसपर इस्लाम का दारोमदार है, मुस्लिम समाज की एकता जिसके आधार पर क़ायम है, इसकी वास्तविकता क्या है? क्या ईमान का अर्थ केवल दिल से पुष्टि करना है? या मुख से स्वीकार करना भी ईमान के लिए ज़रूरी है? और क्या इन दोनों के साथ-साथ अमल भी ईमान की वास्तविकता और परिभाषा में शामिल है कि नहीं? कुछ लोगों का शिद्दत से यह ख़याल था कि अमल (कर्म) भी ईमान का हिस्सा है और जब तक मुकम्मल अमले-सालेह (पूर्ण सत्कर्म) न हो उस समय ईमान पूर्ण नहीं हो सकता। इसके विपरीत कुछ लोगों का ख़याल था कि आमाल (कर्म) ईमान की वास्तविकता का हिस्सा नहीं हैं और कर्म के बिना ईमान की वास्तविकता अस्तित्व में आ सकती है। इस बहस में दोनों तरफ़ से बहुत विस्तृत तर्क और जवाबी तर्क हदीस और कलाम की किताबों में मौजूद हैं। जब यह समस्या तर्कों और जवाबी तर्कों का विषय बनी तो फिर यह सवाल भी पैदा हुआ कि अगर कोई व्यक्ति ईमान रखता है और शरीअत पर अमल नहीं करता, सत्कर्म नहीं करता, बल्कि बुरे काम करता है तो उसकी हैसियत क्या है? क्या वह मुसलमान कहला सकता है। यह सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो गया कि कुछ हदीसों में बुरे कर्म करने पर आख़िरत में सख़्त सज़ा मिलने की बात बताई गई है और कुछ कर्मों के करने को कुफ़्र (इस्लाम का इनकार) कहा गया है। अगर ऐसा व्यक्ति भी मुसलमान है तो फिर इन हदीसों का अर्थ क्या है? उदाहरणार्थ “ईमान और कुफ़्र को जो चीज़ अलग करती है वह नमाज़ का छोड़ देना है” इससे बज़ाहिर तो यही पता चलता है कि अगर कोई व्यक्ति नमाज़ छोड़ देता हो तो उसको ईमान प्राप्त नहीं रहता। तो क्या अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के कहने का वही अर्थ है जो उसके ज़ाहिरी शब्दों से महसूस होता है? या इस कथन का कोई और अर्थ है? यह एक विशुद्ध कलामी समस्या थी। इसके बारे में अनेक मत सामने आए। बहस-मुबाहसे ने एक दृष्टिकोण को जन्म दिया। जो बहुत सख़्ती के साथ मोतज़िला ने अपनाया। वह यह था कि ऐसा व्यक्ति न मुसलमान रहता है और न काफ़िर (इस्लाम का इनकारी) होता है, बल्कि उसका दर्जा इन दोनों के दरमियान रहता है। मोतज़िला ने इस दर्जे के लिए ‘मंज़िलतु बैनल-मंज़िलतैन’ की शब्दावली अपनाई। कुछ लोगों उदाहरणार्थ ख़वारिज का ख़याल था कि गुनाहे-कबीरा (महापाप) का करनेवाला काफ़िर हो जाता है। यह ख़वारिज का दृष्टिकोण था। आम अहले-सुन्नत जो मुसलमानों की प्रभावी आबादी थे, उनका दृष्टिकोण यह था कि बड़े गुनाहों का करनेवाला काफ़िर नहीं होता। मोतज़िला का दृष्टिकोण था वह ‘मंज़िलतु बैनल-मंज़िलतैन’ पर रहता है। यानी दोनों दर्जों के दरमियान एक तीसरा दर्जा उसको प्राप्त हो जाता है कि वह न मोमिन है न काफ़िर इन दोनों के मध्य है।
इन तीनों के तर्क, आपत्तियाँ और जवाबी आपत्तियाँ, ये सारे मामलात पहली शताब्दी के अन्त से लेकर तीसरी शताब्दी के आख़िर तक ज़ेरे-बहस रहे। फिर जैसे-जैसे इस्लामी समाज फैलता गया और इस्लामी राज्य की सीमाएँ फैलती गईं दूसरी क़ौमों से मुसलमानों का मेल-जोल बढ़ता गया, वैसे-वैसे इन बहसों में भी विविधता पैदा होती रही। मज़दकियों से ख़ैर और शर (भलाई-बुराई) की बहसों पर चर्चाएँ हुईं। सीरिया के ईसाइयों के साथ बहसे हुईं। फिर आगे चलकर यूनानी विचारों के अनुवाद हुए। यूनानी ज्ञान-विज्ञान के विशेषज्ञों से दार्शनिकतापूर्ण मामलों पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ। इनमें से जिस-जिसने इस्लाम पर जो आपत्ति की उसका जवाब उसी के सर्वमान्य सिद्धान्तों और गढ़े हुए सिद्धान्तों के आधार पर मुतकल्लिमीने-इस्लाम ने देने की कोशिश की। इस तरह से इल्मे-कलाम के दायरा विशाल होता गया, लेकिन इस सबके बावजूद यह बात हमेशा सर्वसम्मत रही कि इल्मे-कलाम का आधार पवित्र क़ुरआन है। जिन लोगों ने इसका इनकार किया या इसमें सन्देह व्यक्त किया उनपर आश्चर्य व्यक्त करते हुए इमाम अबुल-क़ासिम क़ुशैरी ने एक जगह लिखा है कि “यह बात बड़ी आश्चर्यचकित करनेवाली बात है कि लोग यह कहें कि पवित्र क़ुरआन में इल्मे-कलाम नहीं है।”
[क़ुरआन में इल्मे-कलाम है या नहीं, इस बहस से हटकर देखने और सोचनेवाली बात तो यह है कि क़ुरआन में मुतशाबिहात (उपलक्षित आयतों) की गहराई में जाने और अपनी अक़्ल से उनके अर्थ निर्धारित करने से मना किया गया है, जबकि इल्मे-कलाम की बहसों में अधिकांश रूप से यही सब किया जाता है।———अनुवादक]
यह था पृष्ठभूमि इन मामलात का जिनकी रौशनी में इल्मे-कलाम को संकलित करने की ज़रूरत पेश आई। इस मरहले पर कुछ निष्ठावान लेकिन ज़ाहिर को देखनेवाले लोगों ने यह राय अपनाई कि इल्मे-कलाम को विधिवत रूप से संकलित न किया जाए, न इस्लाम-विरोधियों के सन्देहों को ध्यान देने योग्य समझा जाए, और अगर उनका जवाब दिया भी जाए तो उसके लिए विरोधियों की तर्क शैली से काम न लिया जाए। इन लोगों का ख़याल था कि इल्मे-कलाम को संकलित करने की ज़रूरत इसलिए नहीं है कि सहाबा और ताबिईन ने इस्लाम के अक़ीदों को इस अन्दाज़ से संकलित नहीं किया था। यह बात आज भी बहुत-से लोग कहते हैं, लेकिन अगर अन्य ज्ञान-विज्ञान के संकलन की रौशनी में देखा जाए तो यह राय बड़ी कमज़ोर महसूस होती है। अगर प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने क़ुरआन की टीका की किताबें और उलूमुल-क़ुरआन के दफ़्तर संकलित नहीं किए थे तो टीका के सारे भंडार संकलित करना भी दुरुस्त नहीं होना चाहिए। अगर प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने फ़िक़्ही किताबें संकलित नहीं कीं, उसूले-फ़िक़्ह संकलित नहीं किया तो ये सारे ज्ञान-विज्ञान भी जो बाद में संकलित हुए, संकलित नहीं किए जाने चाहिएँ थे। इसलिए केवल इल्मे-कलाम के बारे में यह कहना कि चूँकि प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने इसका संकलन नहीं किया था, इसलिए उसका संकलन उचित नहीं, यह बात बहुत कमज़ोर, हल्की और अस्वीकार्य है।
दूसरी और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) को बौद्धिक अन्दाज़ में इस्लामी अक़ीदों को संकलित करने की इसलिए ज़रूरत नहीं थी कि उनके दिलो-दिमाग़ में वे आपत्तियाँ ही पैदा नहीं हुईं जो बादवालों के दिलो-दिमाग़ में पैदा हुईं। प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के ईमान की परिपक्वता इस बात को निश्चित करती थी कि उनको किसी बाह्य बौद्धिक तर्क की ज़रूरत नहीं। वे बौद्धिक तर्क की कमज़ोर बैसाखियों के बजाय हृदय एवं विवेक और अल्लाह के सामने उपस्थित होने के एहसास की दौलत से माला-माल थे। उनको इन बाहरी सहारों की ज़रूरत न थी। यही कैफ़ियत ताबिईन के ज़माने में अधिकांश लोगों की थी।
बाद के ज़मानों में अलबत्ता इस बात की ज़रूरत महसूस हुई कि बाहर से आनेवाली आपत्तियों और अन्दर से उठनेवाले सन्देहों का जवाब देने के लिए प्रचलित तर्क शैली के अनुसार इस्लामी अक़ीदों का बचाव किया जाए और उनको बयान किया जाए। चूँकि इस ज्ञान का सम्बन्ध इस्लामी अक़ीदों के बचाव और व्याख्या से था इसलिए मुतकल्लिमीने-इस्लाम ने इसको इस्लामी ज्ञान में सबसे श्रेष्ठ और सबसे उच्च क़रार दिया। उनका कहना यह था कि शरीअत के सारे आदेशों का आधार इसी पर है। शरई आदेशों पर अमल तभी हो सकता है जब अक़ीदे पुख़्ता हों। अक़ीदे पुख़्ता तब ही हो सकते हैं कि जब अक़ीदों के समर्थन में दिए जानेवाले तर्क मज़बूत हों। उसी तर्क के सामने उनके ख़याल में इल्मे-कलाम तमाम दीनी उलूम का मुखिया था। इसलिए कि अक़ीदों की हैसियत उस नींव की है जिसपर इमारत खड़ी होती है। और जब इमारत खड़ी होगी तो वह दोनों लोकों के सौभाग्य को निश्चित बनाएगी, अत: साबित हुआ कि आख़िरकार दोनों लोकों के सौभाग्य का दारोमदार अक़ीदों पर है। एक बड़े और प्रसिद्ध मुतकल्लिम अल्लामा सादुद्दीन तफ़्ताज़ानी ने, जिनकी किताबें इल्मे-कलाम के अत्यन्त पुख़्तगी के दौर का प्रतिनिधित्व करती हैं, लिखा है कि इल्मे-शरीअत और आदेशों की सारी बुनियाद और इस्लाम की तमाम शिक्षाओं का आधार तथा नियम वह इल्मे-तौहीद (एकेश्वरवाद का ज्ञान) और इल्मे-सिफ़ात (गुणों का ज्ञान) है जिसको इल्मे-कलाम के नाम से भी याद किया जाता है। जिससे सन्देहों के अंधेरे दूर होते हैं और अंधेरों को रौशनी में परिवर्तित किया जाता है। इससे यह अन्दाज़ा होता है कि प्रबन्धकों की नज़र में इल्मे-कलाम का क्या महत्त्व था।
मुतकल्लिमीन के इन सारे प्रयासों के साथ-साथ हर दौर में निष्ठावान विद्वानों का एक सीमित वर्ग ऐसा भी रहा जिसने इल्मे-कलाम की इन कोशिशों को पसन्दीदगी की नज़र से नहीं देखा। इस वर्ग का ख़याल था कि आपत्ति करनेवालों को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए और विद्वानों को केवल पवित्र क़ुरआन, सुन्नत और सीरत से दिलचस्पी रखनी चाहिए। जितना पवित्र क़ुरआन का ज्ञान आम होता जाएगा, जितना सुन्नत का ज्ञान फैलता जाएगा और जितनी सीरत से जानकारी बढ़ती जाएगी, उतना ही लोगों के अक़ीदे पुख़्ता होते जाएँगे और सन्देह कमज़ोर पड़ते जाएँगे। चुनाँचे बहुत-से बड़े मुहद्दिसीन इमाम मालिक (रह॰), इमाम अहमद (रह॰), इमाम बुख़ारी (रह॰) और कई दूसरे लोगों से ऐसे कथन उद्धृत हैं जिनसे इल्मे-कलाम का महत्त्वहीन होना साबित होता है। बाद के समयों में भी अल्लामा इब्ने-अब्दुल-बर्र, जिनके बारे में कहा जाता है कि अपने ज़माने में पश्चिमवालों के सबसे अधिक जाननेवाले थे, पश्चिम यानी स्पेन और मराक़श के विद्वानों में सबसे ज़्यादा ज्ञान रखनेवाले और इल्मे-हदीस के अपने ज़माने के पश्चिमी मुस्लिम जगत् में सबसे बड़े माहिर थे, उनसे कुछ ऐसे बयानात जुड़े हैं जो इल्मे-कलाम के महत्त्व को कम करते हैं। कुछ लोगों ने इसपर किताबें भी लिखी हैं। अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती का भी एक रिसाला है जो इल्मे-कलाम के खंडन में है। और भी एक-दो छोटे-छोटे मैगज़ीन इल्मे-कलाम के खंडन और इसकी निन्दा में लिखे गए हैं।
लेकिन अल्लामा सादुद्दीन तफ़्ताज़ानी, जिनका मैंने अभी हवाला दिया, इन तमाम आपत्तियों का जवाब यह देते हैं कि जिन लोगों ने इल्मे-कलाम से दिलचपसी पर आपत्ति की, यह वह इल्मे-कलाम था जिसकी बुनियाद विशुद्ध यूनानी ज्ञान-विज्ञान और यूनानी तर्क शैली पर थी। जबकि अस्ल इल्मे-कलाम यह नहीं था। अस्ल इल्मे-कलाम से मुराद ऐसा वार्तालाप है जो तर्क के आधार पर हो, जिसे आजकल डायलॉग या संवाद कहा जाता है। यह वही चीज़ है जिसे पवित्र क़ुरआन की शब्दावली में ‘मुख़ासमा’ या ‘मुजादला’ कहा गया है।
शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी (रह॰) के ख़याल में पवित्र क़ुरआन के पाँच मौलिक विषयों में से एक विषय ‘मुख़ासमा’ और ‘मुजादला’ भी है। ‘मुजादला’ के लिए पवित्र क़ुरआन में कई जगह निर्देश दिए गए हैं। “और बेहतरीन तरीक़े से मुजादला किया जाए।” (क़ुरआन, 16:125) तर्कों के साथ संवाद किया जाए और दूसरे के अक़ीदे का खंडन करते हुए उसकी भावनाओं को ठेस न पहुँचाई जाए। किसी के देवताओं को बुरा न कहा जाए और अपनी बात का समर्थन करते हुए जो दोनों पक्षों की सर्वसम्मत मान्यताएँ हैं उनको बुनियाद बनाकर उनसे आरम्भ किया जाए।
यह पवित्र क़ुरआन की मौलिक शिक्षा थी जो धार्मिक मुजादला, मुकालमा या मुख़ासमा के बारे में थी। चूँकि इसमें दोनों पक्षों की सर्वसम्मत मान्यताओं को स्वीकार करके उसके आधार पर बात करने की दावत दी गई थी इसलिए इन सर्वसम्मत बातों की तलाश में मुतकल्लिमीन ने बहुत ज़्यादा प्रयास किया और कुछ ऐसी चीज़ें भी स्वीकार कर लीं जो समान मान्यताओं की हैसियत नहीं रखती थीं। जैसे-जैसे यूनानी किताबों का अनुवाद होता गया और यूनानी तर्कशास्त्र और दार्शनिकतापूर्ण ज्ञान मुसलमानों में प्रचलित होते गए वैसे-वैसे यूनानी दर्शन और बौद्धिकता की सर्वसम्मत मान्यताएँ भी (जिनको आप मुश्किल ही से समान मान्यताएँ कह सकते हैं) मुसलमानों में आम होती गईं।
ये ‘मान्यताएँ’ समय के साथ-साथ बहुत-से मुसलमानें में भी मान्यताओं की हैसियत लेती चली गईं और उनके आधार पर मुसलमान उलमा ने कुछ ऐसी बहसें भी इल्मे-कलाम में शामिल कर लीं जो दरअस्ल इल्मे-कलाम की बहसें नहीं थीं। चुनाँचे जब यूनानी शैली में इल्मे-कलाम के संकलन का काम शुरू हुआ, जिसका आरम्भ हम चौथी या पाँचवीं शताब्दी हिजरी के लगभग क़रार दे सकते हैं, तो यूनानियों की मान्यताओं को थोक के हिसाब से इल्मे-कलाम में ज़ेरे-बहस लाया जाने लगा। शुरू-शुरू में सावधान मुतकल्लिमीने-इस्लाम तो उन यूनानी विचारों का खंडन भी किया करते थे या उनकी आलोचनात्मक समीक्षा भी किया करते थे, लेकिन समय के साथ-साथ बहुत-सी चीज़ें बिना किसी जाँच के इल्मे-कलाम में शामिल होती गईं और कुछ ऐसी बहसें भी इल्मे-कलाम में आ गईं जो इल्मे-कलाम की ज़रूरत और इल्मे-कलाम की समस्याएँ नहीं थीं।
इसकी शक्ल यह बनी कि जब यूनानी शैली को सामने रखकर मुतकल्लिमीन ने इस्लामी अक़ीदों को बयान करना चाहा तो उनको चाहे-अनचाहे यूनानी तर्कशास्त्र और दर्शन में प्रचलित तर्क-शैली से काम लेना पड़ा। इस तर्क-शैली से काम लेने की ख़ातिर उनको यूनानी शब्दावलियाँ और मक़ूलात (categories) भी अपनानी पड़ीं। उन्होंने देखा कि अल्लाह तआला के अस्तित्व को साबित करने के लिए यह ज़रूरी है कि ख़ुद अस्तित्व पर बात की जाए। अस्तित्व पर जो बहसें यूनानियों के यहाँ अरस्तू या दूसरे लोगों के यहाँ मौजूद थीं, उनसे मुतकल्लिमीने-इस्लाम ने भी काम लिया। फिर अस्तित्व की उन्होंने दो क़िस्में क़रार दीं। एक वाजिबुल-वुजूद (जिसका अस्तित्व अनिवार्य हो) और एक मुम्किनुल-वुजूद (जिसके अस्तित्व की सम्भावना हो)। फिर मुम्किन (सम्भव) को उन्होंने स्पष्ट किया कि सम्भव क्या है। इससे उन्होंने देखा कि सृष्टि में जो चीज़ें सम्भव हैं उनके लिए यूनानियों ने ‘जौहर’ और ‘अर्ज़’ की शब्दावलियाँ प्रयुक्त की हैं। हर जौहर के साथ एक अर्ज़ भी होता है। जौहर वह है जो अपने-आपमें क़ायम हो। अर्ज़ वह है जो किसी दूसरे की वजह से क़ायम हो।
ये वे बहसें हैं जिनका सम्बन्ध न इस्लामी अक़ीदे से है न तौहीद से है। न पवित्र क़ुरआन में ये समस्याएँ आई हैं, न हदीसों में आई हैं, न सहाबा और ताबिईन ने जौहर, अर्ज़ और दूसरे मक़ूलात (categories) से सम्बन्धित शब्दावलियाँ कभी प्रयोग कीं, और न ही इस्लामी अक़ीदों का उनपर दारोमदार है। लेकिन समय के साथ-साथ ये समस्याएँ इस क़द्र गहराई और मज़बूती से इल्मे-कलाम में शामिल हो गईं कि एक मरहला ऐसा भी आया कि यही समस्याएँ इल्मे-कलाम का अस्ल हिस्सा बन गईं। फिर इस बात की भी ज़रूरत महसूस हुई कि जब इस्लामी अक़ीदों को बयान करते हुए इल्मे-कलाम की बहसों को बयान किया जाए तो पहले इन मौलिक मामलों से बहस की जाए। ये मौलिक मामले उमूरे-आम्मा कहलाए जाने लगे। यानी वे आम मामले जिनके आधार पर आगे चलकर अक़ीदों को बयान किया जाने लगा, जो अक्सर यूनानियों से लिए गए थे। यह काम सबसे ज़्यादा इमाम राज़ी (रह॰) ने किया।
इमाम राज़ी (रह॰) बौद्धिकता के बहुत बड़े इमाम थे और उन्हें अपने ज़माने के बुद्धिवाद में इमामत का वह दर्जा प्राप्त था कि मुस्लिम जगत् उनकी इमामत को स्वीकार करता था। आज तक वे बौद्धिकता में एक मिसाल हैं। अल्लामा इक़बाल ने जगह-जगह राज़ी को बौद्धिकता के प्रतिनिधि के रूप में ही बतौर ‘रम्ज़’ प्रयोग किया है। इमाम राज़ी (रह॰) ने एक किताब ‘अल-मुहसल फ़ी अफ़्क़ारिल-मुतक़द्दिमीन वल-मुताख़्ख़िरीन’ के नाम से संकलित की जिसके बारे में उनका ख़याल था कि प्राचीन और आधुनिक मुतकल्लिमीन ने जो कुछ लिखा है उन सबका सारांश उन्होंने इस किताब में लिख दिया है। निस्सन्देह यह किताब बहुत विद्वतापूर्ण और अपने समय की बेहतरीन किताबों में से एक है। लेकिन इस पूरी किताब में आरम्भ से अन्त तक यूनानी विचारों और बहसों के अलावा और कुछ नहीं है। उनको इस्लामी अक़ीदे बयान करने का अभी मौक़ा ही नहीं आया कि पूरी किताब ख़त्म हो गई और उन्होंने वे मान्यताएँ जो यूनानी विचारधारा से ली गई थीं, जिनसे काम लेकर आगे चलकर इस्लामी अक़ीदे की व्याख्या और बचाव के लिए तर्क करना था और इस तर्क के तैयार किए जाने के बाद उससे इस्लामी अक़ीदों का समर्थन होना था, इन मान्यताओं ही को बयान करने पर बस किया। यों इन उमूरे-आम्मा की, जो दरअस्ल आरम्भिक मामले थे, इतना महत्त्व हो गया कि वे मान्यताएँ ही इल्मे-अक़ाइद क़रार पा गईं। इसे बाद के विद्वानों के इल्मे-कलाम की एक ऐसी कमज़ोरी कहना चाहिए या एक ऐसा गुण कहना चाहिए जिसने इल्मे-कलाम के मूल तथ्यों और उद्देश्यों से लोगों का ध्यान हटा दिया और यूनानी तर्कशास्त्र, यूनानी भौतिकी और गणित की समस्याएँ इल्मे-कलाम का हिस्सा बन गईं। तर्कशास्त्र और दर्शन तो ख़ैर किसी हद तक ऐसी चीज़ें थीं कि एक हद तक उनसे काम लिया जा सकता था और आज भी शायद लिया जा सकता है। लेकिन जिस चीज़ को यूनानी भौतिकी कहते थे आज उसे भौतिकी कहना शायद भौतिकी के साथ मज़ाक़ हो। आज की भौतिकी इससे बहुत आगे चली गई है और प्राचीन भौतिकी से बहुत विभिन्न हो गई है।
इस ज़माने की बहुत ही आरम्भिक प्रकार की धारणाएँ या अस्पष्ट विचार और अन्धविश्वास जिनको यूनानी भौतिकी के नाम से याद करते थे और उनको यूनानी ज्ञान की मान्यताएँ समझा करते थे उनमें से आज के भौतिक विज्ञान में शायद एक चीज़ भी ऐसी नहीं है जो सर्वमान्य सत्य की हैसियत रखती हो या ज्ञानपरक मामलों में ज़ेरे-बहस आती हो। शरीर क्या है? फिर शरीर की वास्तविकता और कैफ़ियत क्या है? यह यूनानी दर्शन की एक महत्त्वपूर्ण समस्या थी। शरीर से गति की और गति से समय और स्थान की समस्या पैदा हुई? शरीर को अगर दर्शन की समस्या क़रार दिया जाए तो इससे अनेक कठिनाइयाँ पैदा होंगी। शरीर को प्रयोगात्कम ज्ञान की समस्या क़रार दिया जाए तो इससे यूनानी परिचित नहीं थे। उनके यहाँ भौतिकी दर्शन का एक अंग थी और दर्शन के सिद्धान्त और आस्थाओं के साथ-साथ भौतिक विज्ञान यानी फिज़िक्स की समस्याओं पर भी मंतिक़े-इस्तिख़राजी (निगमनात्मक तर्कशास्त्र) के प्रकाश में ही बहस होती थी। मंतिक़े-इस्तिख़राजी और भौतिकी में ज़मीन-आसमान की दूरी है।
ये ख़राबियाँ जो यूनानियों की व्यवस्था में मौजूद थीं। ये सारी ख़राबियाँ इल्मे-कलाम में भी आ गईं। अलबत्ता इस पूरे अनुभव से एक महत्त्वपूर्ण बात ज़रूर पता चली और वह यह कि मुतकल्लिमीने-इस्लाम की यह प्रवृत्ति रही है कि इस्लामी दृष्टिकोण की व्याख्या में उन्होंने अपने ज़माने की बौद्धिक, वैचारिक और धार्मिक प्रवृत्तियों को सामने रखा और अपने दृष्टिकोण के क्रम और formulation में यह प्रयास किया कि उनके दौर के जो विमुख होनेवाले हैं उनके विचारों का खंडन साथ-साथ होता रहे।
इस काम के लिए जब फिज़िक्स या भौतिकी की बात आई तो फिर ऐसी बहुत सारी समस्याएँ भी ज़ेरे-बहस आईं जो प्रत्यक्ष रूप से इस्लामी अक़ीदों का हिस्सा नहीं थीं। उदाहरणार्थ समय और स्थान की बहस पैदा हुई। शरीर की बहस से गति पैदा हुई। गति की बहस से समय और स्थान की बहस पैदा हुई। ये सब शरीर ही की बहसें हैं जो अल्लाह तआला की मख़लूक़ (स्रष्ट रचना) है। अब अल्लाह तआला जो समय और स्थान का रचयिता है, उसके अस्तित्व का आभास समय और स्थान की सीमाओं में रहकर कैसे हो सकता है? वह रचयिता जिसका कोई निवास स्थान नहीं, ख़ुद समय और स्थान की सीमाओं में बंधा या सीमित कैसे हो सकता है? वह तो समय और स्थान पर ‘मुसैतिर’, ‘मुक़तदिर’ (हावी) और उनसे परे है। जब अल्लाह तआला को समय और स्थान की सीमाओं के अन्दर सीमित करके समझने की कोशिश की जाएगी तो अल्लाह के अस्तित्व की महानता और असीमितता का आभास नहीं हो सकेगा।
ये समस्याएँ थीं जिनका बहुत-से मुतकल्लिमीने-इस्लाम शिकार हुए। इन लोगों की बहसों का अधिकांश भाग विशेष रूप से भूमिकाओं का बड़ा हिस्सा विशुद्ध दार्शनिकतापूर्ण बहसों पर आधारित है। उनमें से बहुत-सी बहसें आज पुरानी और आउट डेटेड हो चुकी हैं। कुछ ऐसी हैं जो अब भी आंशिक उपयोगिता रखती हैं, और कुछ मामलात ऐसे भी हैं जो अब भी महत्त्वपूर्ण और ज़रूरी हैं। बाद के इस्लामी विद्वानों की किताबें सबसे पहले उमूरे-आम्मा से बहस करती हैं। उमूरे-आम्मा से मुराद हैं क़वाइदे-मनहजिया, मबाहिसे-मंतिक़िया, पराभौतिक मामले और भौतिकी के वे मामलात जो यूनानियों से मुसलमानों में आए, और उन्हीं से लेकर बाद के मुतकल्लिमीने-इस्लाम ने समझे। यह शैली इमाम राज़ी ने बहुत ज़ोर-शोर से अपनाई और इल्मे-कलाम और यूनानी दर्शन की सीमाएँ गोया समाप्त कर दीं। इमाम राज़ी के बाद लगभग सभी मुतकल्लिमीन को यह शैली इस क़दर पसन्द आई कि सबने उसकी पैरवी शुरू कर दी। इस शैली की लोकप्रियता का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि अल्लामा अज़्दुद्दीन ईजी की आधी से ज़्यादा किताब इन उमूरे-आम्मा ही पर आधारित है।
इस स्थिति का अनिवार्य परिणाम यह निकला कि ये प्रारम्भिक बहसें, जो दरअस्ल प्रत्युत्तर के
लिए अपनाई गई थीं, अस्ल कलामी समस्याएँ बन गईं और इन्हीं को पढ़ना-पढ़ाना विद्वानों के एक बड़े वर्ग का ओढ़ना-बिछौना बन गया। इस आयोजन की वजह से कुछ ऐसे विचार भी मुसलमानों में तथ्यों का दर्जा पा गए जो अनुभव ने बाद में ग़लत साबित किए, जिनमें से एक मिसाल मैंने दी थी कि ज़मीन के स्थिर होने और आसमान के गतिमान होने को उन्होंने बतौर एक सर्वमान्य सत्य के स्वीकार कर लिया। इसी तरह ‘फ़लकुल-अफ़्लाक’ (आकाशों का आकाश) की परिकल्पना या नौ आसमानों की व्यवस्था, ये सब कुछ यूनानियों के यहाँ से या कहीं और से आया था, लेकिन इसको मुसलमानों में से बहुत-से लोगों ने स्वीकार कर लिया। एक किताब में ‘फ़लकुल-अफ़्लाक’ की तारीफ़ लिखी है कि “नौवाँ आसमान सभी आसमानों का आसमान है।” यानी “ये सभी आसमानों और ब्रह्मांड से ऊपर है, और शरीअत के विद्वान इसे अर्श कहते हैं।” यह फ़ुज़ूल और हास्यास्पद बात है। न कहीं पवित्र क़ुरआन में अर्श को ‘फ़लकुल-अफ़्लाक’ कहा गया है, न हदीस में, न अर्शे-इलाही को नौंवा आसमान कहते हैं। पता नहीं यह बात किसने, कब, कहाँ से और किससे सीखी और ज़बरदस्ती खींच-तानकर उसको अर्शे-इलाही से जोड़ दिया।
ये मिसालें मैं यह बात स्पष्ट करने के लिए देना चाहता हूँ कि मुतकल्लिमीन के प्रयासों का आरम्भ जिस ज़ोर-शोर से हुआ था और जिन अच्छे उद्देश्यों की ख़ातिर हुआ था वे यूनानियों के हत्थे चढ़ने के बाद, यूनानियों से ज़रूरत से ज़्यादा प्रभावित होने की वजह से सन्मार्ग से बहुत हद तक हट गए, और एक लम्बा समय गुज़रने के बाद उनसे वे परिणाम और फल प्राप्त नहीं किए जा सके जिनकी प्राप्ति इल्मे-कलाम का उद्देश्य था। लेकिन इसका यह अर्थ हरगिज़ नहीं है कि अतीत में इल्मे-कलाम की ज़रूरत नहीं थी, या आज किसी इल्मे-कलाम की ज़रूरत नहीं है। इल्मे-कलाम की ज़रूरत हर दौर में रही है और हर दौर में रहेगी। इंसानों की एक विशेषता या कमज़ोरी और मजबूरी यह भी है कि बहुत-से इंसान समय के चलन से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते हैं। जिस ज़माने में यूनानी ज्ञान का चलन था और यूनान का हवाला बौद्धिकता और ज्ञानमीमांसा के अध्यायों में आख़िरी हवाला समझा जाता था या एक वर्ग में समझा जाने लगा था, उस दौर में बहुत-से विद्वान यूनानी ज्ञान और शब्दावलियों से प्रभावित होने में सीमाओं से निकल गए। उन्होंने यूनानियों की बहुत-सी ऐसी ख़ुराफ़ात भी दिलो-जान से स्वीकार कर लीं जिनका सिरे से कोई सम्बन्ध पवित्र क़ुरआन या सुन्नत को समझने से नहीं था, बल्कि इन बेकार बातों के बिना भी क़ुरआन और सुन्नत को बहुत बेहतर तौर पर समझा और समझाया जा सकता था। इससे पहले जब मुसलमान दीनी और दुनियावी दोनों दृष्टि से ज़्यादा अच्छे मुसलमान थे तो उनका इल्मे-कलाम और उनकी अक़ीदों की व्याख्या यूनानी गन्दगियों से पाक थी। लेकिन जब ‘उमूरे-आम्मा’ के नाम से ये ख़ुराफ़ात और बेकार बहसें मुसलमानों में आईं और चल पड़ीं तो उस समय न मुसलमान दीनी दृष्टि से उच्चस्तरीय मुसलमान रहे थे और न सांसारिक दृष्टि ही से। इससे अन्दाज़ा किया जा सकता है कि इन बहसों की व्यावहारिक उपयोगिता क्या थी।
फिर एक ज़माना वह आया कि दुनिया पश्चिमी विज्ञान से प्रभावित हुई और हर चीज़ को विज्ञान के हवाले से समझा जाने लगा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त और बीसवीं शताब्दी के शुरू में इस्लामी अक़ीदों की व्याख्या एवं टीका के नाम से ऐसे प्रयास सामने आए जिन्होंने पश्चिमवाद में बाद के मुतकल्लिमीन की यूनान-परस्ती को भी मात दे दी। विज्ञान की प्रसिद्ध चीज़ें और ज्ञानपरक मान्यताएँ तो बड़ी बात है, जो-जो चीज़ें पश्चिम के हवाले से प्रचलित होती गईं उनको भी बतौर मान्यताओं के स्वीकार करके इस्लामी अक़ीदों की व्याख्याएँ उनकी रौशनी में की जाने लगीं। जितनी हास्यास्पद आज ‘उमूरे-आम्मा’ की ये मिसालें मालूम होती हैं उससे कम हास्यास्पद वे मान्यताएँ नहीं हैं जिनको सत्य जानकर उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त या बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में बहुत-से मुस्लिम चिन्तकों ने इस्लामी अक़ीदों को स्पष्ट किया। फिर भी इससे यह अन्दाज़ा ज़रूर होता है कि आधुनिक काल में एक नए इल्मे-कलाम की ज़रूरत का एहसास पैदा हो चला है। नया इल्मे-कलाम जिसमें यूनानियों की ग़ैर-ज़रूरी बौद्धिकता, घिसे-पिटे तर्कों और अबौद्धिक ख़ुराफ़ात से जान छुड़ाकर प्रचलित तर्क शैली और प्रचलित ज्ञानमीमांसा के सर्वमान्य सिद्धान्तों के अनुसार क़ुरआनी आदेशों की व्याख्या इस तरह की जाए कि उसमें नए तर्कों या नई शैली से काम लिया गया हो। यह आज की एक बहुत बड़ी ज़रूरत है। यह बात हमारे लिए बड़ी सुखद है कि इस ज़रूरत का एहसास सबसे पहले उपमहाद्वीप में हुआ। इस मामले में सैयद अमीर अली, सर सैयद अहमद ख़ान, मौलाना शिबली नोमानी (रह॰), अल्लामा सैयद सुलैमान नदवी (रह॰), अल्लामा इक़बाल (रह॰), डॉक्टर मुहम्मद रफ़ीउद्दीन (रह॰), मौलाना सैयद अबुल-आला मौदूदी (रह॰) उपमहाद्वीप के महत्त्वपूर्ण नाम हैं। उपमहाद्वीप से बाहर मुफ़्ती मुहम्मद अब्दा (रह॰) वग़ैरा, कुछ नुमायाँ नाम हैं जिन्होंने सबसे पहले इस ज़रूरत का एहसास किया।
जब इल्मे-कलाम के नव-संकलन की ज़रूरत महसूस हुई तो उस समय दो तीन प्रवृत्तियाँ हमारे यहाँ सामने आईं। एक प्रवृत्ति को हम आधुनिक काल की पहली वैचारिक प्रवृत्ति कह सकते हैं। यह एक खेद प्रकट करते हुए अपनी बात कहने की प्रवृत्ति थी, इसके प्रतिनिधि वे लोग थे जो पश्चिम के हर हवाले को निश्चित और प्रमाणित की दृष्टि से अत्यन्त उच्च स्तर पर समझते थे। जो बात किसी अंग्रेज़ ने इंग्लिश में और फ़्रांसीसी ने फ़्रेंच में लिख दी वह इन लोगों के नज़दीक सत्य का आख़िरी मापदंड बन गई, और उसको निश्चितता प्राप्त हो गई। अत: उन लोगों के नज़दीक इस्लाम की सेवा और मुसलमानों के निहितार्थ की अपेक्षा यही थी कि क़ुरआन और सुन्नत की हर शिक्षा को खींच-तानकर हर प्रकार की घटिया व्याख्या द्वारा पश्चिम के प्रचलित विचारों के अनुसार साबित कर दिया जाए। ज़ाहिर है यह प्रवृत्ति मुसलमानों में चलनेवाली नहीं थी। सर सैयद अहमद ख़ान ने इसी प्रवृत्ति को अगुवाई की और बहुत-से धार्मिक मामलों में उन्होंने यही प्रवृत्ति अपनाई। वह धर्म पर विज्ञान के हमले से बहुत भयभीत थे। उन्होंने इस ख़तरे का कई बार इज़हार भी किया कि विज्ञान का हमला जिस तरह ईसाइयत को ले डूबा है, इस्लाम को भी ले डूबेगा। इसलिए इस्लाम की ऐसी व्याख्या की जाए कि जो उसको विज्ञान के हमले से सुरक्षित रख सके। यह बात उन्होंने अपने लेखों में भी लिखी है और उनके सबसे प्रमाणित जीवनी लेखक मौलाना अलताफ़ हुसैन हाली (रह॰) ने भी लिखी है। सर सैयद ख़ुद अपने को मोतज़िला का अनुयायी समझते थे और बौद्धिक आधार पर नए इल्मे-कलाम का संकलन करना चाहते थे। लेकिन नए इल्मे-कलाम के संकलन के लिए जिस तरह की शैक्षिक पृष्ठभूमि और ज्ञानपरक एवं वैचारिक परिवेश की ज़रूरत थी वह सर सैयद को उपलब्ध नहीं था। वह प्रत्यक्ष रूप से पश्चिमी विचारों से परिचित नहीं थे। अंग्रेज़ी या कोई और पश्चिमी भाषा नहीं जानते थे। पश्चिमी बौद्धिकता से उनकी जानकारी उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे पचास सालों में भारत के अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ों से प्रभावित क्षेत्रों में प्रचलित विचारों तक सीमित थी। आधुनिक इल्मे-कलाम के संकलन के लिए उन्होंने अपनी अधूरी, अध-कचरी और बिखरी हुई जानकारी को बतौर बुनियाद अपनाया। चुनाँचे उन्होंने उस दौर के पश्चिमी ज्ञान और पश्चिमी विज्ञान के बारे में अपनी समझ की रौशनी में इस्लाम के आदेशों और नियमों की विशुद्ध बौद्धिक व्याख्याओं को अपनाने का फ़ैसला किया। इस बौद्धिक व्याख्या की पहली अपेक्षा तो उन्होंने यह समझी कि हक़ायक़े-ग़ैबिया (परोक्ष सम्बन्धी तथ्यों) और मोजिज़ात (चमत्कारों) की मनमानी व्याख्या की जाए। और उन मामलों को उन्नीसवीं शताब्दी के विज्ञान और प्रयोगात्मक ज्ञान की मान्यताओं के अनुसार साबित करके दिखाया जाए। चुनाँचे उन्होंने कहा कि मेराज एक ख़ाब थी। शक़्क़े-सदर (नबी सल्ल॰ का सीना चाक किया जाना) भी ख़ाब था। शैतान से मुराद नफ़्से-अम्मारा (बुराई पर उभारनेवाली प्रवृत्ति) है। पवित्र क़ुरआन में जिन ग़ैबियात (परोक्ष की बातों) का ज़िक्र है वे मात्र सांकेतिक हैं, वग़ैरा-वग़ैरा।
सच तो यह है कि यह रास्ता बड़ा ख़तरनाक रास्ता है। अगर क़ुरआन के बयानों की व्याख्या सांकेतिक और अलंकार के पर्दे में करने का रास्ता एक बार खोल दिया जाए तो शरीअत, अक़ीदे, नैतिक पराकाष्ठा, आदेश और ‘तज़किया’ के सिद्धान्त सब ख़त्म हो जाते हैं। हर चीज़ की व्याख्या संकेत में की जा सकती है। जिस तरह आज ईसाई दुनिया इंजीलों की व्याख्या अलंकारों और सांकेतिक ढंग में करके हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) और अन्य प्रतिष्ठित पैग़म्बरों की शिक्षाओं से आज़ाद हो चुकी है, उसी तरह यह रास्ता मुसलमानों के लिए खोला जा सकता है। टीका की इस शैली में सर सैयद अकेले नहीं थे। इसकी मिसाल या झलक किसी हद तक मिस्र के मुफ़्ती अब्दा, अल्लामा सैयद रशीद रज़ा और अल्लामा तनतावी जौहरी के यहाँ भी मिलती है।
दूसरी प्रवृत्ति प्राचीन इल्मे-कलाम को नए रंग में पेश करने की प्रवृत्ति थी। यह भी भारतीय उपमहाद्वीप में सामने आई। चुनाँचे मौलाना शिबली नोमानी (रह॰) और उनके शिष्य अल्लामा सैयद सुलैमान नदवी (रह॰) इसके बड़े प्रतिनिधि हैं, इन लोगों ने प्राचीन धारणाओं और समस्याओं को नए अन्दाज़ और नई शैली द्वारा पेश करना चाहा। उपमहाद्वीप से बाहर शैख़ हुसैन अल-जसर (रह॰), शैख़ुल-इस्लाम मुस्तफ़ा सबरी (रह॰) और कई दूसरे लोग हैं जिनके लेखों में यह अन्दाज़ मिलता है।
एक नई शैली भी बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से सामने आनी शुरू हुई जिसके प्रतिनिधि अकबर इलाहाबादी, मौलाना अबुल-हसन अली नदवी (रह॰), मौलाना अब्दुल-माजिद दरियाबादी (रह॰) और मौलाना अबुल-आला मौदूदी (रह॰) वग़ैरा हैं। चूँकि ये लोग प्रत्यक्ष रूप से पश्चिम और पश्चिमी भाषाओं से परिचित थे, पश्चिमी धारणाओं तक इनकी पहुँच थी। इस्लामी अक़ीदों और शिक्षाओं से यह प्रत्यक्ष रूप से परिचित थे, इसलिए इनके यहाँ न मरऊबियत थी और न मात्र प्राचीन को नए अन्दाज़ में पेश करने की इच्छा और प्रयास, बल्कि उन्होंने इल्मे-कलाम को सचमुच एक नए ढंग से पेश करने की कोशिश की।
लेकिन उपमहाद्वीप में, बल्कि आधुनिक मुस्लिम जगत् में जिस व्यक्तित्व को आधुनिक इल्मे-कलाम का संस्थापक क़रार दिया जा सकता है, जिसकी हैसियत आधुनिक इल्मे-कलाम के इतिहास में वही है जो प्राचीन इल्मे-कलाम के इतिहास में अल्लामा अबुल-हसन अशअरी और इमाम अबू-मंसूर मातुरीदी की थी, वह मेरे ख़याल में अल्लामा इक़बाल हैं। वे पश्चिम से ख़ूब परिचित थे और उन तमाम लोगों से कहीं ज़्यादा परिचित थे जिनके मैंने नाम लिए हैं। वे इस्लाम के वैचारिक मूलस्रोतों से भी इन लोगों से कम परिचित नहीं थे। सर सैयद की तरह वे हीनभावना के शिकार नहीं हुए। न वे विज्ञान के हमले से भयभीत थे और न पश्चिमी सभ्यता के कमज़ोर पहलुओं से अनभिज्ञ। वे इस्लाम के भविष्य से निराश, नहीं बल्कि अत्यन्त आशान्वित थे, और इतने आशान्वित थे कि शायद उस दौर में उनसे ज़्यादा आशान्वित कोई और न हुआ हो। वे राज़ी और रूमी दोनों की परम्परा के उत्तराधिकारी हैं। बौद्धिकता में वे बहुत ऊँचा दर्जा रखते हैं। और दिल को आधार क़रार देने में वे रूमी की परम्परा के ध्वजावाहक हैं, वे ज़िक्र और दिल पर आधारित तसव्वुरे-मारिफ़त को ज़िन्दा करनेवाले हैं। उन्होंने अपने कलाम में, नस्र में भी और नज़्म में भी उन तमाम समस्याओं पर विचार व्यक्त किए हैं जो इल्मे-कलाम की आधारभूत समस्याएँ हैं। ईमान, इस्लाम, तौहीद, पैग़म्बरी, ख़त्मे-नुबूवत, फ़रिश्तों पर ईमान, फ़रिश्तों से इंसान का श्रेष्ठ होना, जब्र और क़द्र (यह समस्या कि इंसान मात्र कठपुतली है या उसे सब कुछ करने का अधिकार प्राप्त है), इमामत और ख़िलाफ़त, क़ियामत का दिन, जन्नत-जहन्नम, मोजिज़ात और मेराज, दिल और रूह, मौत और ज़िन्दगी की वास्तविकता, अक़्ल और नक़्ल, और इंसानी मन जैसी महत्त्वपूर्ण समस्याओं पर उन्होंने अलग शैली में विचार व्यक्त किए हैं। उनमें से कुछ समस्याओं पर उन्होंने इतनी गहराई से विचार व्यक्त किए हैं कि वह एक नया दृष्टिकोण और एक नई प्रवृत्ति के संस्थापक क़रार दिए जा सकते हैं। ख़त्मे-नुबूवत पर उनके लेख पूरी इस्लामी सोच के इतिहास में अत्यन्त सारगर्भित और प्रभावशाली लेख हैं। फ़रिश्तों पर इंसान की श्रेष्ठता का मामला तमाम मुतकल्लिमीन उठाते रहे, लेकिन जिस अन्दाज़ से इक़बाल ने इसको बयान किया है किसी और मुतकल्लिम ने इक़बाल से पहले बयान नहीं किया।
उपमहाद्वीप, बल्कि मुस्लिम जगत् से बाहर पश्चिमी दुनिया में भी बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से एक नया इल्मे-कलाम सामने आया है जिसका इतिहास इक़बाल से काफ़ी पुराना है। यह यूरोप में इस्लाम के वैचारिक और दार्शनिकतापूर्ण पहलुओं के अध्ययन का आरम्भ है जो उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में सामने आया। बीसवीं शताब्दी के बहुत आरम्भ से इस परम्परा का ज़ोर-शोर से इज़हार हुआ और आज पश्चिम में बड़ी संख्या में ऐसे विद्वान मौजूद हैं जो नए इल्मे-कलाम की इस परम्परा के ध्वजावाहक हैं। ईटन (Eaton), मार्टिन लिग्ज़ (Martin Lings), शॉन, विलियम चिट्टिक (William Clark Chittick) कमो-बेश एक दर्जन या इससे अधिक लोग इस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने पूरी एक लाइब्रेरी पैदा कर दी है। ये लोग दर अस्ल विभिन्न पश्चिमी क़ौमों से सम्बन्ध रखते हैं। मूलतः पश्चिमी विचारधारा और दर्शन के विशेषज्ञ हैं, लेकिन उन्होंने इस्लाम का अध्ययन भी काफ़ी गहराई से किया है। उनके यहाँ हीनभावना का कोई सवाल नहीं। यह ख़ुद मूलतः, नस्ली और शैक्षिक रूप से पश्चिमी हैं, पश्चिमी विचारधारा को समझने में इनसे कोई कोताही नहीं हुई। इसलिए कि ये मूलतः इसी के विशेषज्ञ हैं। लेकिन पश्चिमी चिन्तन की कमज़ोरियों की निशानदेही करने में ये लोग अपने बहुत-से पूर्वी साथियों से कहीं ज़्यादा अलग हैं। यह तो हो सकता है कि उनमें से किसी की इस्लामी राय के बारे में एक से अधिक दृष्टिकोण क़ायम किए जा सकें या उनकी इस्लामी फ़ार्मुलेशन के बारे में एक से अधिक रायें दी जा सकें, लेकिन उनमें से किसी की निष्ठा के बारे में सन्देह करना मुश्किल मालूम होता है।
इन लोगों के लेखों के नतीजे में और दूसरे बहुत-से कारणों से इस समय दुनिया में जिस इल्मे-कलाम की ज़रूरत महसूस हो रही है वह अशाइरा या मातुरीदी या मोतज़िला का इल्मे-कलाम या नौ-मोतज़िला का इल्मे-कलाम नहीं है, बल्कि यह वह इल्मे-कलाम है जिसके प्रतिनिधि मौलाना जलालुद्दीन रूमी (रह॰) हैं। वे एक साथ अशअरी भी हैं और मातुरीदी भी, वे एक साथ इशराक़ियत के सकारात्मक तत्त्व भी रखते हैं और मश्शाईन की तर्क शैली को भी जहाँ ज़रूरी और लाभकारी समझते हैं प्रयोग करने में संकोच नहीं करते। वे दिल को अपील करने की वजह से एक बड़े वर्ग को प्रभावित करने में अपने ज़माने में भी सफल हुए और आज भी सफल हो रहे हैं।
आज ज़रूरत इस बात की है कि एक ऐसा इल्मे-कलाम संकलित किया जाए जो पश्चिमी विचारधारा के आलोचनात्मक अध्ययन पर आधारित हो, जिसमें इस्लामी अक़ीदों को यूनानी गन्दगियों और हिन्दुस्तानी मिलावटों से अलग करके विशुद्ध क़ुरआन और सुन्नत के आधार पर पहले के इस्लामी विद्वानों के लेखों की रौशनी में समझा गया हो और नई तर्क शैली से उसको बयान किया गया हो। मेरा ख़याल है कि इस सन्दर्भ में उपमहाद्वीप के विद्वान अल्लामा इक़बाल से लाभान्वित होने की वजह से और उपमहाद्वीप की भरपूर पश्चिमी समझ की परम्परा की वजह से इस बात के ज़्यादा योग्य हैं कि इस इल्मे-कलाम को और अधिक विकास दे सकें और दुनिया की इस इच्छा या कमी को पूरा कर सकें जो आज दुनिया महसूस कर रही है।
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