रिबा के बारे में कुछ संदेह और उनका स्पष्टीकरण (लेक्चर नंबर-9)
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अर्थशास्त्र
- at 30 April 2026
डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी
अनुवादक: गुलज़ार सहराई
आज की चर्चा का शीर्षक है—‘रिबा’ के बारे में कुछ संदेह और उनका स्पष्टीकरण। यह चर्चा कल और परसों की चर्चा की समाप्ति और पूर्णता है। चूँकि ‘रिबा’ के बारे में बहुत से सवाल और संदेह आज पैदा हो गए हैं या पैदा कर दिए गए हैं, इसके कारण आम लोगों के ज़ेहन में कुछ उलझनें पैदा होती हैं। इसलिए ज़रूरी है कि उन संदेहों को एक-एक करके देखा जाए, उनका वास्तविक उद्देश्य क्या है, इसका पता लगाया जाए और फिर देखा जाए कि क्या सचमुच उन संदेहों के आधार पर ‘रिबा’ के आदेशों में कोई अस्पष्टता पाई जाती है।
यह बात मैं पहले बता चुका हूँ कि ‘रिबा’ जिसको उर्दू और फ़ारसी में सूद, हिंदी में ब्याज और प्राचीन अंग्रेज़ी में *usury* कहा जाता था, प्राचीन काल से प्रचलित रहा है। हर क़ौम, हर ज़माने और हर इलाक़े में जहाँ ब्याजखोरी प्रचलित रही, वहाँ हर जगह और हर ज़माने में इसे बुरा और घृणित अपराध समझा गया। संसार के प्राचीन धार्मिक और नैतिक साहित्य में इस अपराध की बुराई का उल्लेख विभिन्न ढंग से मिलता है। प्राचीन मिस्री सभ्यता हो, बेबीलोनियन और असीरियन या समरी सभ्यताएँ हों, हिंदुओं की प्राचीन आर्य सभ्यता हो, यूनानी और रोमनों का प्राचीन इतिहास हो—इन सबमें ‘रिबा’ और सूद के निषेध की कोई-न-कोई धारणा हमेशा पाई जाती रही है। यहूदी और ईसाई धर्मों का हवाला पहले दिया जा चुका है। इन दोनों धर्मों में ब्याज का हराम होना आज भी इनकी किताबों में मौजूद है और वैचारिक दृष्टि से उनका धर्म आज भी ब्याज को हराम करार देता है।
इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि दुनिया की हर सभ्यता, हर क़ौम और हर धर्म में ब्याज की धारणा हमेशा मौजूद थी। जो चीज़ इतनी अधिक बार और लगातार बुरी समझी जाती रही हो, जिसको हमेशा हराम समझा गया हो, उसके बारे में यह समझना कि दुनिया बिना किसी स्पष्ट धारणा के उसको हराम समझती थी, एक अत्यंत बेकार और निरर्थक बात है। आख़िर चोरी, हत्या, धोखा—ये सारी बुराइयाँ दुनिया में हमेशा बुराइयाँ समझी गईं और उनमें से किसी के बारे में कभी यह उलझन पैदा नहीं हुई कि चोरी क्या है, क़त्ल क्या है, धोखा क्या है। इसी तरह सूद और ‘रिबा’ के बारे में भी कभी कोई उलझन या ग़लतफ़हमी पैदा नहीं होनी चाहिए और न कभी हुई है। यह उलझन या ग़लतफ़हमी तो अब पिछले डेढ़ सौ वर्षों के दौरान उन वर्गों ने पैदा की है जिनके हित आधुनिक ब्याज व्यवस्था से जुड़े हैं या जो आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था से लाभान्वित हो रहे हैं। इन संदेहों में बड़े-बड़े चार संदेह हैं।
सबसे बड़ा संदेह
पवित्र क़ुरआन की उस आयत से पैदा किया जाता है जिसका पिछली चर्चा में उल्लेख किया जा चुका है, जिसमें “बढ़ता-चढ़ता...” (क़ुरआन 3:130) की सीमाबंदी के साथ ब्याज की मनाही की गई है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि अगर ब्याज “बढ़ता-चढ़ता...” न हो, थोड़ा-थोड़ा हो तो वह हराम नहीं है। दूसरे शब्दों में शरीअत ने केवल चक्रवृद्धि ब्याज या कंपाउंड इंटरेस्ट को हराम करार दिया है। साधारण ब्याज मानो हलाल और पाक है।
कुछ लोग ख़र्च और व्यापार के लिए लिए गए क़र्ज़ों का फर्क पैदा करना चाहते हैं और यह साबित करना चाहते हैं कि ब्याज अगर ख़र्च के क़र्ज़ों पर दिया या लिया जाए तो नाजायज़ है, जबकि व्यापारिक क़र्ज़ों पर ब्याज लिया जाए तो वह नाजायज़ नहीं है। कुछ लोग ज़रूरत और मजबूरी का हवाला देते हैं कि ज़रूरत और मजबूरी में बहुत से नाजायज़ काम जायज़ करार पाते हैं। चूँकि आजकल ज़रूरत और मजबूरी का ज़माना है, इसलिए ‘रिबा’ को जायज़ होना चाहिए।
इन संदेहों पर मैं अभी आता हूँ, लेकिन इस आखिरी संदेह से यह ज़रूर स्पष्ट होता है कि जो लोग मजबूरी का हवाला देते हैं, वे ब्याज और ‘रिबा’ को अपने आपमें हराम और नाजायज़ ही समझते हैं। इसलिए कि जब ब्याज हराम और नाजायज़ होगा तभी तो मजबूरी की हालत में उसके जायज़ या नाजायज़ होने की बात पैदा होगी। अगर ब्याज हराम ही न हो तो फिर उसके जायज़ होने के लिए मजबूरी का हवाला निरर्थक है।
कुछ लोग यह साबित करना चाहते हैं कि बैंक इंटरेस्ट वह ‘रिबा’ नहीं है जिसको शरीअत में हराम करार दिया गया था। इस संदेह का कुछ उल्लेख पिछली एक चर्चा में किया जा चुका है। आज उसको और भी स्पष्ट करने की कोशिश की जाएगी। जिन लोगों की पहुँच इस्लामी फ़िक्ह और हदीस के संग्रहों तक है, उनको हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) का एक कथन मिल गया है जिसको बार-बार दोहराया जाता है। हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) के बारे में एक वाक्य कुछ हदीस की किताबों में आया है जिसमें उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के मामले में कुछ मामलों की स्पष्टीकरण नहीं करा सका और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) इससे पहले दुनिया से चले गए और मुझे वे सवाल करने का मौका नहीं मिला।
हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) के इस वाक्य से कुछ लोग यह साबित करना चाहते हैं कि ‘रिबा’ और सूद एक गोलमोल और अनिर्धारित चीज़ थी, स्पष्ट नहीं थी। हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने भी इसको अस्पष्ट करार दिया। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इसको पूरे तौर पर बयान नहीं किया, इसकी ज़रूरत भी नहीं समझी और यों गोया एक बहुत ज़रूरी चीज़ को अस्पष्ट और अनिर्धारित छोड़कर दुनिया से चले गए।
दुनिया के किसी क़ानून में ऐसा नहीं होता। यह अत्यंत बेकार और निरर्थक बात है। इंसानी क़ानून जो दुनिया के विभिन्न देशों में बनते हैं, वहाँ भी कभी ऐसा नहीं होता कि किसी चीज़ का स्पष्टीकरण किए बिना, उसकी परिभाषा किए बिना, उसकी सीमाएँ निर्धारित किए बिना उसको अपराधी ठहरा दिया गया हो और इस अपराध की बहुत बड़ी सज़ा रख दी गई हो। अल्लाह की शरीअत से इस तरह की अनुचित और तत्वदर्शिताहीन बातें जोड़ना सच तो यह कि बहुत बड़ा दुस्साहस है।
हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) का यह कथन अगर साबित हो जाए कि वाकई दुरुस्त है और उन्होंने सचमुच ऐसा ही कहा था तो यह ‘रिबाउल-फ़ज़्ल’ के बारे में है, ‘रिबाउन-नसिया’ के बारे में नहीं है। ‘रिबाउन-नसिया’ के बारे में प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) में कभी कोई मतभेद नहीं रहा। सहाबा के दरमियान इस बात पर पूर्ण मतैक्य रहा है कि ‘रिबाउन-नसिया’ का हराम होना पूर्ण निश्चित तथा स्थायी है। ‘रिबाउल-फ़ज़्ल’ के बारे में उसकी कुछ सूरतों और शक्लों के बारे में शुरू-शुरू में कुछ प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) की राय यह थी कि इनमें कोई हरज नहीं है, जबकि दूसरे प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) उनको भी हराम समझते थे। यह सावधानी के रवैये की बात है जो प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) में बहुत अधिक पाया जाता था।
हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) चूँकि असाधारण व्यक्तित्व रखने वाले इंसान थे। उनकी निगाह इंतिहाई दूरदर्शी थी। इसलिए वे उन तमाम संभावित रास्तों का अंदाज़ा कर रहे थे जिनके द्वारा सूदी कारोबार का रास्ता खुल सकता है। इसलिए वे यह चाहते थे कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से ऐसे तमाम मामलों को पूरी तरह स्पष्ट करा लें जो बहुत आगे भविष्य में भी किसी समय ब्याज को बढ़ावा देने का ज़रिया बन सकते थे।
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ऐसे बहुत कम संभावित मामलों को स्पष्ट करके उनके बारे में स्पष्ट आदेश देना उचित न समझा, बल्कि उन मामलों को मुस्लिम समाज की दीन (इस्लाम) के विषय में गहरी समझ पर छोड़ दिया। शरीअत का यह स्वभाव है कि वह जिस मामले के हराम होने का आदेश देती है तो वह आदेश स्पष्ट रूप से या तो पवित्र क़ुरआन में बयान किया जाता है या ‘सुन्नत-ए-साबिता’ (मुस्लिम समाज का वह तरीका जो समान रूप से चला आ रहा हो और जिसमें कोई मतभेद न हो) में आ जाता है, फिर उसका और स्पष्टीकरण हदीसों के द्वारा हो जाता है। विस्तृत स्पष्टीकरण प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के सामूहिक रवैये से हो जाता है और आंशिक विवरण की बात मुस्लिम विद्वानों की दीनी समझ पर छोड़ दी जाती है। ऐसे आंशिक मामलों में मुस्लिम विद्वान अपनी इज्तिहादी बसीरत (दीन के बारे में गहरी समझ) से काम लेकर संभावित शक्लों का हल खुद तलाश कर लेते हैं।
यही मामला ‘रिबा’ के सिलसिले में भी अपनाया गया कि ‘रिबा’ जो जाना-माना था, उसको निश्चित रूप से हराम ठहरा दिया गया। ‘रिबा’ की वे शक्लें जिनको अरबवाले जानते नहीं थे, लेकिन उनकी वजह से वास्तविक रास्ता खुल सकता था, या जिनके नतीजे में यहूदी मुसलमानों का शोषण कर रहे थे, या जिनकी वजह से एक न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्था के गठन में रुकावट पड़ सकती थी, उन सबको अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने विभिन्न हदीसों के द्वारा मना कर दिया, जैसा कि मैंने पहले बताया कि छप्पन प्रकार के कारोबारों को हदीसों में निषिद्ध ठहरा दिया गया। इससे इस महत्व का भी अंदाज़ा होता है जो व्यापार को पाक-साफ़ करने के लिए कारोबार और रोज़ी को सुथरा बनाने के लिए इस्लामी शरीअत में दिया गया है।
इन तमाम विवरणों के बावजूद कुछ ऐसे हालात हो सकते हैं, कुछ ऐसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं जिनके बारे में यह मतभेद पैदा हो कि यह उन सीमाओं के अंदर हैं जो शरीअत ने जायज़ करार दी हैं या इन सीमाओं से बाहर हैं। शरीअत का स्वभाव इन आंशिक और नए पेश आने वाले मामलों में मुस्लिम समाज की आम गहरी समझ पर विश्वास करने का है। हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) यह समझते थे कि इस तरह के कुछ मामलों को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए और अगर उनको उम्मत (मुस्लिम समाज) की इज्तिहादी बसीरत (राय क़ायम करने वाली समझ) पर छोड़ दिया गया तो शायद इससे आगे चलकर कोई ग़लतफ़हमी पैदा हो।
यह पृष्ठभूमि है हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) के इस जुमले की, जो ‘रिबा’ के बारे में किताबों में उनसे जोड़ा गया है। यहाँ यह बात स्पष्ट कर देनी चाहिए कि हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) का यह वाक्य ‘सहीहैन’ यानी सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में और सुनन-ए-अरबा यानी इमाम तिरमिज़ी, अबू दाऊद, नसाई और इब्ने माजा की किताबों में मौजूद नहीं है। मुसन्नफ अब्दुर्रज़्ज़ाक़ और सुनन बैहक़ी में यह वाक्य मिलता है। लेकिन यह बात भी बड़ी महत्वपूर्ण है कि इस प्रकार की कोई बात दूसरे सहाबा से नहीं मिलती। यानी जिस पेचीदा बात का हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) के हवाले से उल्लेख किया जाता है, वह कोई पेचीदा या अस्पष्ट बात नहीं थी, बल्कि केवल एक ऐसी बात थी जिसका ताल्लुक़ शरीअत की हिकमत (तत्वदर्शिता) बयान करने से है। सवाल केवल इतना था कि क्या इस पहलू को स्पष्ट रूप से, ‘नस्स’ (स्पष्ट आदेश) के द्वारा स्पष्ट कर देना चाहिए था, या मुस्लिम समाज के विद्वानों की अपनी राय की समझ पर छोड़ देना चाहिए था।
‘रिबा’ के हवाले से एक वाक्य हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) से भी जोड़ा जाता है जिससे बैंक इंटरेस्ट के समर्थकों ने बहुत फायदा उठाने का प्रयास किया है। उनका यह वाक्य हदीस की किताबों में मौजूद है—“अन-नसिया के सिवा कोई रिबा नहीं है।” लेकिन हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) से जोड़े जाने वाले इस वाक्य का यह अर्थ कभी किसी ने नहीं समझा कि ‘रिबा’ के रूप भी जायज़ करार दिए जाएँ जो खुले-खुले ‘रिबाउन-नसिया’ में शामिल हैं और आज बैंक इंटरेस्ट के दायरे में आते हैं। अगर किसी तरह यह मान लिया जाए कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) ‘रिबाउल-फ़ज़्ल’ को जायज़ मानते थे तो इससे बैंक इंटरेस्ट का औचित्य कैसे साबित हो सकता है। बैंक इंटरेस्ट न बार्टर सेल है, न उसमें गेहूँ और चीजों का लेन-देन आपस में हो रहा है, न उसमें ‘तफ़ाज़ुल’ हो रहा है। बैंक इंटरेस्ट तो सारा-का-सारा शत-प्रतिशत ‘रिबाउन-नसिया’ है, जैसा कि कल की बातचीत में विस्तार से बयान किया जा चुका है। इसलिए न हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) का यह वाक्य काम आ सकता है और न हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) से जोड़ा जाने वाले इस बयान से कोई समर्थन सूदखोरी के लिए निकाला जा सकता है। फिर हदीस के बहुत से इमामों ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) का रुजू भी साबित किया है और यह बताया है कि उनको शुरू-शुरू में बेशक संकोच था कि ‘रिबाउल-फ़ज़्ल’ की कुछ शक्लें वाकई ‘रिबा’ हैं कि नहीं हैं। लेकिन आख़िरकार उन्होंने अपने इस कथन को उस समय वापस ले लिया, जब उनको बड़े सहाबा से शेष हदीसों की विस्तृत जानकारी हुई।
जहाँ तक क़ुरआन की आयत “बढ़ता-चढ़ता.....” (क़ुरआन 3:130) का संबंध है, उसको भी बहुत से लोगों ने बुनियाद बनाया है और यह साबित करने की कोशिश की है कि पवित्र क़ुरआन ने जिस ‘रिबा’ को हराम ठहराया है वह केवल वह है जो बढ़ता रहता हो। कल की बातचीत में मैं पवित्र क़ुरआन की आयतों के अवतरण के क्रम की ओर इशारा कर चुका हूँ जिसमें यह स्पष्ट करने की कोशिश की गई थी कि ‘रिबा’ के आदेश एक क्रम से अवतरित हुए हैं। और शरीअत ने अपनी तत्वदर्शिता के तहत रिबा जैसी आम और प्रचलित चीज़ को एक ही बार में समाप्त नहीं किया, बल्कि क्रम के साथ पंद्रह-बीस साल के समय में इस बुराई को समाप्त किया। इस क्रम में एक मरहला वह भी था जब “बढ़ता-चढ़ता....” सूद खाने को हराम ठहराया गया। चक्रवृद्धि ब्याज की मनाही कर दी गई। लेकिन चक्रवृद्धि ब्याज की इस मनाही के कई वर्ष बाद आख़िरकार ब्याज की तमाम किस्मों यानी ‘रिबा’ को हराम करार दे दिया गया और यह आदेश अवतरित हुआ—“अल्लाह ने व्यापार को हलाल किया है और रिबा को हराम ठहराया है।” (क़ुरआन 2:275)
यहाँ यह बात भी याद रखने की है कि क़ुरआन की एक शैली यह भी है कि कभी-कभी वह कोई ऐसी कैद किसी शब्द के साथ लगा देता है, जो मात्र उस घटना से जुड़ी होती है। पवित्र क़ुरआन में (और हदीसों में भी) कुछ जगहों पर किसी काम को अपराध ठहराते हुए उसकी बुराई को ख़ूब अच्छी तरह ज़ेहन में बिठाने के लिए उस अपराध की अतिरिक्त बुराइयाँ भी बयान की जाती हैं। यह कैद उस अपराध की और अधिक बुराई बयान करने के लिए होती है। इस सीमाबंदी का यह मतलब नहीं होता कि वह आदेश उस सीमा से जुड़ा हुआ ही है या उसकी शर्त के साथ है। इसकी मिसालें हदीस की किताबों में भी बहुत मिलती हैं और क़ुरआन में भी बहुत हैं।
उदाहरणार्थ क़ुरआन में एक जगह आया है कि “अगर तुम्हारी ये ख़रीदी हुई लौंडियाँ पाकीज़ा ज़िंदगी गुज़ारना चाहें तो तुम उन्हें बदकारी पर मजबूर न करो।” (क़ुरआन 24:33) इस आयत का यह अर्थ कोई समझदार आदमी करार नहीं देता कि अगर वे लौंडियाँ (दासियाँ) खुद बदकारी (व्यभिचार) करना चाहें तो उनको इसकी अनुमति दे दो। यहाँ सिर्फ़ यह बात याद दिलाने के लिए है कि तुम्हारी तरफ़ से यह बुराई और बढ़ जाती है कि एक तो तुम किसी को बदकारी पर मजबूर करो, जबकि वह खुद पाकीज़ा ज़िंदगी गुज़ारना चाहता हो। यह इशारा है कुछ मुनाफ़िक़ीन की तरफ़ जो अपनी बांदियों (दासियों) से नाजायज़ आय की प्राप्ति के लिए, नाजायज़ दौलत की हवस में इस तरह की हरकतें कराया करते थे।
ख़ुद हदीसों में इस तरह की मिसालें बहुत मिलती हैं, जिनमें किसी आदेश के साथ एक कैद लगाई गई। वह कैद कोई शर्त नहीं है, न आदेश उसकी शर्त से जुड़ा है, बल्कि वह एक ऐसी सूरते हाल को बयान करने के लिए लगाई गई जिससे उस अपराध की बुराई और अधिक नुमायाँ और स्पष्ट होकर सामने आ जाए। अतः “बढ़ता-चढ़ता...” की कैद संयोगवश है, चक्रवृद्धि ब्याज की कैद लगाने के लिए नहीं है।
आख़िरकार जब पवित्र क़ुरआन ने आदेश दे दिया कि “रिबा का जो हिस्सा बाक़ी है उसको छोड़ दो।” इस आदेश और ‘अर-रिबा’ के इस शब्द में हर प्रकार का ‘रिबा’ शामिल है। इसमें साधारण ब्याज भी शामिल है और चक्रवृद्धि ब्याज भी शामिल है। फिर पवित्र क़ुरआन की इसी आयत में अगला वाक्य है “तुम्हारा हक़ केवल मूलधन तक है।” यहाँ अरबी में ‘रासुल-माल’ का शब्द प्रयुक्त हुआ है जिससे यह इशारा करना अभीष्ट है कि यहाँ ब्याज का हराम होना बयान किया जा रहा है, वह व्यापारिक क़र्ज़ों पर लिया जाने वाला ब्याज है। व्यापार और संस्था के संदर्भ में ही ‘रासुल-माल’ की शब्दावली प्रयुक्त होती है। निजी और ख़र्च के लिए किए गए लेन-देन में ‘रासुल-माल’ या पूँजी की शब्दावली आम तौर पर प्रयुक्त नहीं हुआ करती। इसलिए क़र्ज़ देने वाले का हक़ सिर्फ़ यह है कि वह अपना ‘रासुल-माल’ वापस ले सकता है। न उसको ज़ुल्म करने की अनुमति है न विरोधी पक्ष को ज़ुल्म करने की अनुमति है। अगर वह ज़्यादा ले रहा होगा तो वह ज़ुल्म कर रहा होगा। उसे कम मिलेगा तो उसपर ज़ुल्म होगा। इसलिए न कमी की अनुमति इस तरफ़ है न उस तरफ़ है। इस आयत के शब्द “बढ़ता-चढ़ता...” से अगर कोई ग़लतफ़हमी पैदा हो भी रही थी तो अगली आयत से दूर हो जाती है।
यह बात क़ुरआन के सभी टीकाकारों ने लिखी है, इसमें कोई मतभेद नहीं, इमाम इब्ने जरीर तबरी से लेकर हमारे ज़माने के क़ुरआन के तमाम टीकाकारों तक सब यही लिखते चले आए हैं कि “बढ़ता-चढ़ता...” की कैद ‘रिबा’ के हराम होने की शर्त नहीं है। यह सिर्फ़ हकीकत बयान करने के लिए है। फिर यह भी सच है कि अरब में दोनों तरह का ‘रिबा’ प्रचलित था। साधारण ब्याज भी प्रचलित था और चक्रवृद्धि ब्याज भी प्रचलित था। ब्याज व्यापारिक और पैदावारी क़र्ज़ों पर भी लिया जाता था और ख़र्च के लिए और निजी क़र्ज़ों पर भी लिया जाता था। इसलिए अरब में जब ‘रिबा’ का शब्द बोला जाता था तो वह हर तरह के ‘रिबा’ के लिए बोला जाता था। और जब ‘रिबा’ को हराम करार दिया गया तो हर तरह का ‘रिबा’ खुद-ब-खुद हराम हो गया।
इमाम राज़ी ने लिखा है कि ‘बढ़ता-चढ़ता......’ ‘रिबा’ का गुण है, ‘दैन’ का गुण नहीं। इसलिए कि ‘दैन’ का तो यहाँ उल्लेख ही नहीं है। “यह बढ़ता-चढ़ता सूद न खाओ”। इससे पता चला कि ‘रिबा’ अगर साधारण हो तो भी ‘बढ़ता-चढ़ता...’ हो सकता है। और एक तरह से हर रिबा बढ़ता-चढ़ता ही होता है। साधारण ब्याज अगर एक साल के लिए एक व्यक्ति ने दस प्रतिशत पर लिया, उदाहरणार्थ एक लाख रुपये लिए, दस प्रतिशत ब्याज मिलाकर एक लाख दस हज़ार चुकाने होंगे। एक वर्ष बाद वह चुका नहीं सका और फिर एक साल के लिए उसने सूदी क़र्ज़ चुकाने की मुहलत बढ़वा ली। अब जो वह ज़्यादा ब्याज चुकाएगा तो वह एक लाख पर नहीं, एक लाख दस हज़ार पर चुकाएगा। इसलिए इस अतिरिक्त दस हज़ार की हद तक तो चक्रवृद्धि ब्याज हो गया। अतः “बढ़ता-चढ़ता....” तो साधारण सूद भी पाया जाता है। यह कहना कि साधारण ब्याज बढ़ने-चढ़ने के गुण से बिलकुल ख़ाली है, सही नहीं है।
फिर एक बात याद रखनी चाहिए जो बहुत महत्वपूर्ण है, जिससे शरीअत की व्याख्या करने की तत्वदर्शिता का अंदाज़ा होता है। शरीअत द्वारा हराम ठहराई हुई चीज़ों पर एक-एक नज़र डाली जाए—चोरी, डाका, बदकारी, झूठ, धोखा, झूठी गवाही, मदिरापान, हत्या—ये सब वे अपराध हैं जिनको शरीअत ने हराम ठहराया है। और ये सब बड़े गुनाहों में भी शामिल हैं। उनमें से कोई अपराध ऐसा नहीं है कि शरीअत ने उसमें थोड़े से अपराध की तो अनुमति दी हो और ज़्यादा को हराम ठहरा दिया हो। शरीअत ने ऐसे हरगिज़ नहीं कहा कि बेशक चोरी जुर्म है, सज़ा सख़्त है, हाथ काट दिया जाएगा, लेकिन थोड़ी-बहुत चोरी जायज़ है, मगर ज़्यादा चोरी की अनुमति नहीं है। डाका मामूली हो तो अनुमति है, बड़ा डाका हो तो अपराध है। छोटी-मोटी धोखाधड़ी जायज़ है, बड़ी धोखाधड़ी नाजायज़ है। छोटा-मोटा क़त्ल जायज़ है, बहुत ज़्यादा क़त्ल करना नाजायज़ है। जितनी हास्यास्पद यह बात मालूम होती है, उसी तरह ‘रिबा’ की बात भी हास्यास्पद है। जो चीज़ हराम है और शरीअत ने हराम करार दे दी, उसमें कमी-बेशी का फर्क पैदा करना न केवल इंतिहाई बेवकूफ़ी और अबौद्धिक बात है, बल्कि यह एक असंभव चीज़ भी है।
ऐसे मामलों में कमी-बेशी की हद निर्धारित करना मात्र अंदरूनी चीज़ है। यह बहुत subjective चीज़ है, किस चीज़ को आप कम कहेंगे, किसको ज़्यादा कहेंगे। न सिर्फ इस्लामी शरीअत, बल्कि कोई भी अच्छी क़ानून-व्यवस्था इस प्रकार की अस्पष्ट और subjective बातों पर अपना दारोमदार नहीं रखा करती। दुनिया के तमाम विकसित क़ानून दो-टूक और स्पष्ट मामलों पर दारोमदार रखते हैं। जो चीज़ हराम करार दी जाती है उसमें कमी-बेशी नहीं होती, सज़ा में तो हो सकती है कि कम किस्म का जुर्म हो तो कम सज़ा होगी, ज़्यादा जुर्म होगा तो ज़्यादा सज़ा होगी, लेकिन यह बात कि शरीअत कह दे कि क़त्ल थोड़ा-सा हो तो जायज़ है, ज़्यादा हो तो नाजायज़ है, धोखाधड़ी थोड़ी-सी हो तो जायज़ है, ज़्यादा हो तो नाजायज़ है। यही हाल डाके और चोरी का है। जिस तरह इन अपराधों में कमी-बेशी की बुनियाद पर फैसला नहीं बदल सकता, इसी तरह ब्याज के बारे में नहीं बदल सकता।
यहाँ एक और चर्चा भी ध्यान देने योग्य है जिसका संबंध उसूल-ए-फ़िक्ह से है। उसूल-ए-फ़िक्ह की बहसों में यह मसला हनफ़ियों और ग़ैर-हनफ़ियों के नज़दीक इख़्तिलाफ़ी (मतभेदपूर्ण) रहा है कि ‘मफ़हूम-ए-मुख़ालिफ़ा’ का विश्वास किया जाएगा या नहीं। मफ़हूम-ए-मुख़ालिफ़ा से अभिप्रेत यह है कि शरीअत में किसी चीज़ का आदेश दिया गया हो और जिस चीज़ का आदेश दिया गया, उसके साथ कोई गुण, कैफ़ियत या हालत का जो अर्थ निकलता है क्या वह मान्य होगा? क्या कोई दूसरा आदेश इस कैद या गुण से निकाला जा सकता है। हनफ़ी फ़ुक़हा और बहुत से मुतकल्लिमीन (धार्मिक मामलों को बुद्धि के द्वारा सिद्ध करने वाले) इसको नहीं मानते। उनके नज़दीक ‘मफ़हूम-ए-मुख़ालिफ़ा’ मान्य नहीं है। जिस चीज़ का शरीअत में आदेश दिया गया है वह आदेश उसी चीज़ तक सीमित है। इसके विपरीत या इसके विरुद्ध आदेश उससे निकालना, जबकि उसका कोई और प्रत्यक्ष प्रमाण न हो, दुरुस्त नहीं है।
जो फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्री) ‘मफ़हूम-ए-मुख़ालिफ़ा’ को मानते हैं उदाहरणार्थ इमाम मालिक, इमाम शाफ़िई, इमाम अहमद बिन हंबल वे भी तीन शर्तों के साथ मानते हैं। पहली शर्त यह है कि जो कैद या कैफ़ियत पैदा हुई है, जिसके आधार पर ‘मफ़हूम-ए-मुख़ालिफ़’ मुराद लिया जा रहा है, वह किसी आम और बहुत ज़्यादा पेश आने वाली सूरते हाल को बयान करने के लिए न आई हो। इसलिए कि कभी-कभी ऐसा होता है कि शरीअत के आदेशों में कोई ऐसा अतिरिक्त गुण आ जाता है जो बतौर शर्त के नहीं आया होता। मिसाल के तौर पर पवित्र क़ुरआन में है “तुम्हारी वे सौतेली बेटियाँ जो तुम्हारी गोद में पली हों और तुम्हारी इन बीवियों की औलाद हों जिनके साथ तुम्हारी रुख़सती हो चुकी है, वे तुम पर हराम हैं।” (क़ुरआन 4:23) यहाँ सौतेली बेटी के साथ यह गुण या कैद बयान हुई है “तुम्हारी गोद में पली हों”। अब संयोग से तमाम फ़ुक़हा की राय और टीकाकारों का इस पर मतैक्य है कि “तुम्हारी गोद में पली हों” का यह गुण या कैद मात्र संयोगवश है। यहाँ यह हरगिज़ यह मतलब नहीं है कि अगर सौतेली बेटी तुम्हारी गोद में न पली हो तो इससे निकाह जायज़ है। यह कोई मुसलमान नहीं समझता। हर मुसलमान इस पर ईमान रखता है कि सौतेली बेटी ‘मुहर्रमात’ (हराम ठहराई हुई औरतों) में से है और हमेशा-हमेशा के लिए महरम है। लेकिन चूँकि आम तौर पर सौतेली बेटियाँ सौतेले बाप की गोद में पली होती हैं इसलिए यह गुण इस बात को बयान करने के लिए है कि वह बच्ची जो तुम्हारी गोद में पली है उसको भी तुम महरम नहीं समझोगे तो बहुत बुरी बात होगी। गोया इस बात के महत्व का गहरा एहसास पैदा करने के लिए “तुम्हारी गोद में” की कैद लगाई गई है। अतः पहली शर्त उन लोगों के निकट भी यही है कि वह जो कैद या गुण बयान हुआ है वह किसी आम और बहुत ज़्यादा होने वाली कैफ़ियत या स्थिति को बयान करने के लिए न हो।
दूसरी शर्त यह है कि इस कैद से किसी ख़ास घटना की निशानदेही नहीं होती। तीसरी शर्त यह है कि वह जो कैद या गुण आया है वह अल्लाह तआला ने अपनी नेमत या एहसान के बतौर बयान न किया हो। उदाहरणार्थ पवित्र क़ुरआन में एक जगह आया है, “अल्लाह ने समुद्रों और नदियों को तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया ताकि तुम उससे ताज़ा गोश्त लेकर खाओ।” (क़ुरआन 16:14)। इसका यह मतलब नहीं है कि अगर समुद्र का शिकार ताज़ा न हो तो वह हराम है। या नदी की मछली अगर ताज़ा न हो तो वह जायज़ नहीं है। हालाँकि क़ुरआन में शब्द ‘तरीया’ आया है। यहाँ ‘तरीया’ का शब्द अल्लाह तआला के एहसान की ओर इशारा करता है। अल्लाह तआला के ख़ास एहसान को बयान करने के लिए है कि अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए समुद्रों से, नदियों से ताज़ा-ताज़ा गोश्त का इंतिज़ाम कर रखा है।
ये तीन शर्तें उन लोगों ने सामने रखी हैं जो ‘मफ़हूम-ए-मुख़ालिफ़ा’ को मानते हैं। अगर इन तीनों शर्तों को सामने रखते हुए “बढ़ता-चढ़ता....” को देखा जाए तो उन लोगों की दलील की कमज़ोरी पूरे तौर पर स्पष्ट हो जाती है जो “बढ़ता-चढ़ता.....” की शर्त को रिबा के हराम होने के लिए अनिवार्य ठहराते हैं।
“बढ़ता-चढ़ता.....” की ही तरह की एक ग़लतफ़हमी यह भी कुछ लोग बयान करते हैं कि ‘रिबा’ अगर बहुत ऊँची दर पर हो, ब्याज की दर बहुत ज़्यादा हो, (यानी जिसको exorbitant rate कहते हैं) तो वह तो नाजायज़ है। exorbitant न हो तो जायज़ है। यह संदेह भी इतना ही कमज़ोर और निराधार है जितना “बढ़ता-चढ़ता.....” वाला संदेह निराधार था। पहली बात तो यह कि शरीअत ने सूदी लेन-देन में “फ़लाँ हद तक अगर ब्याज की दर हो तो ठीक है और फ़लाँ हद से अधिक हो जाए तो अनुचित नहीं है” जैसी कोई शर्त नहीं लगाई है। पवित्र क़ुरआन में, हदीसों में, प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के इज्तिहादात (रायों) में भी कहीं कोई एक शब्द भी ऐसा नहीं मिलता जिसमें इस बात का इशारा या कोई उल्लेख हो कि हुर्मत (निषेधाज्ञा) का संबंध ब्याज की दर से है। दर एक प्रतिशत हो, शून्य एक प्रतिशत हो, शून्य-शून्य एक प्रतिशत हो वह ‘रिबा’ ही समझा जाएगा और हराम ही होगा।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन दोनों के दरमियान कोई सीमा-रेखा क़ायम करना संभव नहीं है। किस ब्याज दर को अनुचित दर या exorbitant दर कहा जाएगा और किस ब्याज दर को उचित ब्याज दर कहा जाएगा, यह बहुत आंतरिक सी चीज़ है। शरीअत के मामलों का फैसला ख़ास तौर पर क़ानूनी और अदालती मामलों का फैसला आंतरिक और non-objective बुनियादों पर नहीं होता। यह फैसला तो ख़ालिस विषयक और objective बुनियादों पर होता है।
तीसरी बात यह है कि ‘रिबा’ की जो ख़राबियाँ हैं, नैतिक, सामूहिक, आर्थिक, वे दोनों प्रकार के ‘रिबा’ में पाई जाती हैं। ब्याज की दर कम हो या अधिक हो, उचित हो या अनुचित हो, जो ख़राबियाँ हैं वे दोनों प्रकार के ‘रिबा’ में पाई जाती हैं। इन ख़राबियों को समाप्त करने का तकाज़ा यह है कि ‘रिबा’ के हर रूप को नाजायज़ और हराम समझा जाए।
कुछ लोग ख़र्च हेतु और व्यापारिक क़र्ज़ों में अंतर करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि ‘रिबा’ की हुर्मत (निषेध) का मूल कारण यह है कि इसमें शोषण पाया जाता है और शोषण इन लोगों के ख़याल में क़र्ज़ों में होता था। इसलिए निजी क़र्ज़ों पर अगर ब्याज माँगा जाए तो वह तो शोषण है और जायज़ नहीं है, लेकिन व्यापारिक क़र्ज़ों पर अगर ब्याज लिया जाए तो वह जायज़ है। पहली बात तो यह है कि शरीअत ने ऐसा कोई अंतर नहीं रखा। न पवित्र क़ुरआन में यह अंतर बताया गया, न हदीसों में इसका कोई उल्लेख मिलता है, न प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने ऐसा कोई अंतर किया। दूसरी बात यह है कि इस्लाम से पहले जो ‘रिबा’ प्रचलित था, जिससे अरब और अरब के बाहर के लोग हर तरह परिचित थे, वह ख़र्च हेतु और व्यापारिक दोनों प्रकार के क़र्ज़ों पर लिया जाता था।
पिछली चर्चा में मैंने हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) के दावों का उल्लेख किया था। हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) बड़े पैमाने पर व्यापार किया करते थे और वे अरब में सबसे सख़ी (दानशील) थे। आख़िर सबसे सख़ी इंसान के पोते थे, हाशिम बिन अब्दे मुनाफ़ के पड़पोते थे जो मक्का मुकर्रमा में अरब के चारों ओर से आने वाले हाजियों की अपनी जेब से मेहमाननवाज़ी किया करते थे। इसी लिए उनका लक़ब हाशिम पड़ गया था। हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) भी अपनी जेब से हाजियों के लिए बहुत सी ज़रूरतों का प्रबंध किया करते थे। उनके बारे में यह समझना कि वे लोगों को निजी ज़रूरतों पर भी क़र्ज़ देकर ब्याज लिया करते थे, यह सही नहीं है। उनके तमाम सूदी मामले, इसी तरह क़ुरैश के दूसरे बड़े-बड़े सरदारों के सूदी मामले सब व्यापारिक क़र्ज़ों से जुड़े थे। इसलिए जिस चीज़ को शरीअत ने हराम करार दिया वह मूल रूप से व्यापारिक क़र्ज़ों ही का ब्याज था। कुछ स्थितियों में यह ब्याज ख़र्च हेतु लिए जाने वाले क़र्ज़ों पर भी वसूल किया जाता था। दूसरी बात यह कि ख़राबियाँ दोनों में समान हैं। अगर ब्याज के नतीजे में नैतिक ख़राबियाँ पैदा होती हैं, सामाजिक ख़राबियाँ पैदा होती हैं, आर्थिक ख़राबियाँ पैदा होती हैं तो वे दोनों प्रकार के क़र्ज़ों पर लिए जाने वाले ब्याज से पैदा होती हैं। ख़र्च हेतु लिए गए क़र्ज़ों पर ब्याज दिया जाए और लिया जाए, व्यापारिक क़र्ज़ों पर ब्याज लिया जाए और दिया जाए, दोनों ख़राबियाँ, दोनों के नतीजे एक जैसे हैं।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आज भी सारे ज़बानी जमा ख़र्च के बावजूद बैंक इंटरेस्ट के समर्थक लोग व्यावहारिक रूप से इन दोनों में कोई अंतर नहीं करते। बैंक के पास क़र्ज़ लेने के लिए कोई अपनी जायज़ ज़रूरतों के लिए जाए तो बैंक उससे भी उसी दर और उसी तरह ब्याज वसूल करता है जिस प्रकार व्यापारिक क़र्ज़ लेने वालों से वसूल किया जाता है, बल्कि हमारे देश में व्यापारिक क़र्ज़ों में नर्मी और माफ़ी की मिसालें तो अनगिनत मिलती हैं, हर साल सरकारों के प्रिय लोगों के करोड़ों और अरबों के क़र्ज़े माफ़ होते क़ौम देख रही है। ख़र्च हेतु और निजी क़र्ज़ों की माफ़ी की शायद ही कोई मिसाल मिले। ऐसा कोई बैंक मेरी जानकारी की हद तक मौजूद नहीं है, न मुस्लिम जगत् में, न मुस्लिम जगत् से बाहर जो पारंपरिक बैंकिंग के तरीके के अनुसार काम करता हो और लोगों को जायज़ ज़रूरतों के लिए बिना ब्याज के क़र्ज़ देता हो। अतः जब व्यवहारतः ऐसा नहीं है तो फिर ख़र्च हेतु लिए जाने वाले और व्यापारिक क़र्ज़ों का अंतर जारी रखना और उसके आधार पर ब्याज को जायज़ करार देना, मात्र उलझाए रखना है।
एक और बात यह कही जाती है कि पुराने ज़माने में ‘रिबा’ को हराम ठहराने का कारण यह था कि लोग ज़रूरतमंद होने की वजह से ब्याज देने पर मजबूर थे। और ब्याज लेने वाला लोगों की ज़रूरतों से नाजायज़ लाभ उठाया करता था। इसलिए ब्याज को हराम ठहरा दिया गया। अगर मान लो, मजबूरी की इस बात को दुरुस्त मान लिया जाए तो ब्याज देना तो मजबूरी समझा जा सकता है, ब्याज लेने में तो कोई मजबूरी नहीं थी। ब्याज लेने वाला न पहले मजबूर था, न आज मजबूर है। फिर सहीहैन (बुख़ारी और मुस्लिम) की हदीस है, मुत्तफ़क़ अलैह है, जिसमें कहा गया है, “ब्याज लेने वाला और ब्याज देने वाला गुनाह में दोनों बराबर हैं।” इसलिए ब्याज देने वाले की मजबूरी और ज़रूरत का हवाला देकर उसकी ज़रूरतमंदी के आधार पर ब्याज वसूल करने को जायज़ करार देने की बात उतनी ही निराधार, बल्कि हास्यास्पद है जितनी शेष बातें निराधार हैं।
दूसरी बड़ी और महत्वपूर्ण बात इस संदर्भ में यह है कि आज क़र्ज़ लेने वाले आम तौर से दौलतमंद और बड़े-बड़े पूँजीपति लोग होते हैं। जो क़र्ज़ देने वाले हैं, जिनकी पूँजी क़र्ज़ के तौर पर दी जा रही है, वे आम तौर से कम आय वाले लोग हैं। अतः यह कहना कि क़र्ज़ लोग आवश्यकतावश लेते हैं, सही नहीं है। अतीत में भी ऐसा ही था। जो लोग व्यापारिक क़र्ज़ लिया करते थे, उनमें से बहुत से बड़े-बड़े व्यापारी होते थे। कुछ बड़े-बड़े दौलतमंद भी हुआ करते थे। और क़र्ज़ देने वाले हर तरह के लोग थे। कम आय वाले लोग भी थे और ज़्यादा आमदनी वाले लोग भी थे।
हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम (रज़ियल्लाहु अन्हु) का बहुत बड़ा कारोबार था। वे लोगों से क़र्ज़ लिया करते थे, फिर उसको व्यापार में लगाया करते थे। अस्ल में लोग उनके पास जब अपनी अमानत रखने के लिए आया करते थे तो वे कहते थे कि इसको अमानत मत समझो, इसको क़र्ज़ के तौर पर मुझे दे दो। इसलिए कि अगर यह रक़म अमानत के तौर पर रखी गई और किसी वजह से नष्ट हो गई तो मैं उसे अदा करने का पाबंद नहीं होऊँगा। मुमकिन है मेरे बाद मेरे वारिस उसको अदा करने में संकोच करें, लेकिन अगर तुम मुझे क़र्ज़ के तौर पर दोगे तो फिर मैं और मेरे वारिस और मेरे कर्मचारी, हर व्यक्ति उसके अदा करने का पूरे तौर पर पाबंद होगा। इसलिए मदीना मुनव्वरा के बहुत से आम निवासी उनको क़र्ज़ के तौर पर रक़म दे दिया करते थे। मक़सद यह होता था कि उनकी रक़म सुरक्षित रहे। जब हज़रत ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) का इंतिक़ाल हुआ तो वे बाईस लाख दिरहम के क़र्ज़दार थे। यानी बाईस लाख दिरहम लोगों ने उनको दिया हुआ था जो बतौर क़र्ज़ उनके पास था और उन्होंने उसको अपने व्यापार और कारोबार में लगाया हुआ था। यह लगभग वही काम है जो आजकल बैंक करते हैं। इस फर्क के साथ कि बैंक इस पर ब्याज भी अदा करते हैं। हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम ब्याज नहीं चुकाते थे, लेकिन मूल पूँजी उनके पास सुरक्षित रहती थी और इसको चुकाने के वे ज़िम्मेदार थे।
शरीअत का सिद्धांत “अल-ख़िराज बिज़-ज़मान” मैं पहले बयान कर चुका हूँ जिस चीज़ से आप फायदा उठा सकते हैं उसका नुक़सान उठाने के भी आप ज़िम्मेदार हैं। जिस चीज़ का आप नुक़सान उठा रहे हैं, उसका फायदा उठाने में आप हक़दार हैं। अतः हज़रत ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) जिस रक़म के चुकाने के पाबंद थे, जो रक़म उनके लिए अदा करना ज़रूरी था, वह उसका फायदा भी उठा सकते थे। अगर वह रुपया उनके पास अमानत के तौर पर होता तो वे उससे फायदा नहीं उठा सकते थे, न उसको व्यापार में लगा सकते थे। और किसी दुर्घटना के परिणामस्वरूप नष्ट हो जाने के लिए, उनका रुपया सुरक्षित रखने की ख़ातिर वे उस रक़म को अमानत समझने के बजाय क़र्ज़ के तौर पर लिया करते थे।
क़र्ज़ के शब्द से प्राचीन साहित्य में ग़रीबी और भुखमरी की कल्पना जुड़ी है। आज क़र्ज़ की परिकल्पना बदल चुकी है। अब क़र्ज़ के साथ न मुहताजी ज़रूरी है, न ग़रीबी और भुखमरी ज़रूरी है। सरकारें भी क़र्ज़ लेती हैं, बैंक क़र्ज़ लेते हैं, बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियाँ क़र्ज़ लेने के अभियान चलाती हैं। आज की पूरी पश्चिमी अर्थव्यवस्था क़र्ज़ों की अर्थव्यवस्था बनकर रह गई है। क़र्ज़ों की इस अर्थव्यवस्था का आधार ब्याजखोरी पर है। इसलिए ब्याजखोरी और बैंक इंटरेस्ट की व्यवस्था वर्तमान पश्चिमी अर्थव्यवस्था की आत्मा की हैसियत रखती है। यह इसकी नस-नस में ख़ून की तरह बहती और दौड़ती है।
क़र्ज़ के इस सारे महत्व के बावजूद कुछ लोग इसके बारे में संदेह व्यक्त करते हैं कि बैंक इंटरेस्ट जिस चीज़ पर दिया जा रहा है वह क़र्ज़ है कि नहीं है। चूँकि बैंकों में आम तौर पर डिपॉजिट की शब्दावली इस्तेमाल होती है और डिपॉजिट का उर्दू अनुवाद ‘अमानत’ किया जाने लगा है जो ग़लत है। वस्तुतः यह डिपॉजिट की शब्दावली भी संदर्भ से हटकर है, और इसका अनुवाद ‘अमानत’ भी ग़लत है। इसलिए कि इस रक़म पर जो अतिरिक्त रक़म दी जा रही है वह अमानत में बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि क़र्ज़ में बढ़ोतरी है। इसलिए कि अमानत पर बढ़ोतरी की कोई धारणा शरीअत में तो दरकिनार दुनिया की किसी क़ौम में आज भी मौजूद नहीं है। आप किसी पड़ोसी के पास अमानत रखवाकर चले जाएँ। वह आपकी अमानत की सुरक्षा भी करे और बाद में आकर आप उससे माँग करें कि मेरी अस्ल अमानत भी वापस कर दो और उसके साथ पाँच सौ रुपये भी लाओ तो इस बात को हर व्यक्ति अस्वीकार्य और हास्यास्पद करार दे देगा।
अतः यह रक़म जो बैंक में रखी जाती है, उसकी हैसियत सिर्फ़ क़र्ज़ की है। चाहे उसमें क़र्ज़ का शब्द इस्तेमाल किया गया हो या न किया गया हो। क़र्ज़ की परिभाषा यह है कि क़र्ज़ से अभिप्रेत हर वह रक़म है जो किसी व्यक्ति ने किसी से ली हो और एक मुद्दत के बाद अनिवार्य रूप से ज्यों की त्यों वापस करनी हो, इस दौरान रक़म लेने वाले को उसमें हर प्रकार के उपभोग का पूरा-पूरा अधिकार हो। अगर यह रक़म किसी वजह से चुकानी नहीं है तो यह क़र्ज़ नहीं है। इस्लामी फ़ुक़हा का यह उसूल मैं पहले भी बयान कर चुका हूँ कि इंसानी मामलों और लेन-देन में अस्ल एतिबार उद्देश्यों और अर्थों का होता है। शब्द और इबारत का नहीं होता। शब्द और इबारत में आप अमानत का शब्द रखें, deposit का रखें, खाते का शब्द रखें या जो जी चाहे लिखें, अगर उसकी वास्तविकता यह है कि वह रक़म दूसरे के ज़िम्मे चुकाने योग्य है तो वह ‘दैन’ है और क़र्ज़ है।
इस्लामी फ़ुक़हा ने लिखा है कि क़र्ज़ के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि वह क़र्ज़ ही के शब्द के साथ लिया गया हो। किसी भी शब्द या इबारत के द्वारा यह मामला हुआ हो, इसमें ‘दैन’ का शब्द इस्तेमाल किया गया हो, अतीया का शब्द इस्तेमाल किया गया हो या कोई और शब्द इस्तेमाल किया गया हो। अगर वह देय है तो वह क़र्ज़ है। अल्लामा इब्ने आबिदीन जो मशहूर हनफ़ी फ़ुक़हा में से हैं उन्होंने लिखा है कि क़र्ज़ का लेन-देन क़र्ज़ के शब्द से भी हो सकता है ‘दैन’ से भी हो सकता है और बिना किसी शब्दावली के इस्तेमाल के भी हो सकता है। उदाहरणार्थ अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से कहे कि मुझे एक दिरहम अदा कर दो, मैं एक महीने में एक दिरहम तुम्हें वापस कर दूँगा। यह भी क़र्ज़ है। इसी तरह अगर कोई व्यक्ति ‘आरिया’ का शब्द यानी ‘उधार’ का शब्द इस्तेमाल करे या borrow का शब्द इस्तेमाल करे जो अंग्रेज़ी में आजकल क़र्ज़ के अर्थ में बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होता है, इन सब स्थितियों में यह मामला क़र्ज़ ही समझा जाएगा। यही बात हनफ़ी फ़िक्ह की मशहूर किताब ‘हिदाया’ में भी कही गई है। मशहूर हंबली फ़क़ीह अल्लामा इब्ने क़ुदामा ने भी कही है। और तमाम फ़ुक़हा किराम शुरू से यही कहते चले आ रहे हैं।
कुछ लोगों का ख़याल है कि बैंकों का लेन-देन क़र्ज़ की परिभाषा में शामिल नहीं है। अतः इस पर क़र्ज़ के आदेश जारी नहीं होने चाहिएँ। यह संदेह इतना निराधार और इतना कमज़ोर है कि शायद इसका जवाब देने की भी ज़रूरत नहीं है। जो लोग बैंकों की कार्य-प्रणाली और काम को जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि बैंकों का अस्ल काम ही क़र्ज़ों का लेन-देन करना है। बैंक की परिभाषा ही आधुनिक क़ानून में यह की गई है कि बैंक से अभिप्रेत वह संस्था है जो क़र्ज़ों का लेन-देन करता हो, ‘दैन’ और करेंसी का व्यापार करता हो, यहाँ तक कि पश्चिमी देशों में बैंकों को प्रत्यक्ष रूप से व्यापार करने की अनुमति नहीं है। अगर बैंकिंग की कोई संस्था प्रत्यक्ष रूप से किसी तिजारत या व्यापार में लिप्त पाई जाए तो उसको बैंकिंग की सूची से निष्कासित कर दिया जाता है। पश्चिमी देशों के बड़े-बड़े बैंक उस संस्था से बतौर बैंक मामला करने से इनकार कर देते हैं। इसलिए यह कहना कि बैंकों का लेन-देन क़र्ज़ नहीं है, यह शरीअत को भी न जानने का सबूत है, बैंकिंग के बारे में भी न जानने का प्रमाण है। बैंक न तो खुद कोई व्यापार करते हैं और न प्रत्यक्ष रूप से किसी व्यापार में उनका हिस्सा होता है। वे केवल क़र्ज़ लेते हैं और क़र्ज़ देते हैं। जो रक़में लोग उनके पास रखवाते हैं, वे भी क़र्ज़ हैं और जो रक़में वे दूसरों को बतौर एडवांस या loan देते हैं, वह भी क़र्ज़ है। इस रक़म के लिए borrow का शब्द इस्तेमाल हो या advance का शब्द हो या कोई और शब्द हो, उनकी वास्तविकता क़र्ज़ की है। जब बैंक लोगों से क़र्ज़ लेते हैं तो ब्याज की दर कम चुकाते हैं। जब वे दूसरों को रक़में क़र्ज़ देते हैं तो उनसे ज़्यादा ब्याज वसूल करते हैं और इन दोनों दरों में जो फर्क होता है वही बैंक की आय होती है। कम दर के ब्याज पर आगे क़र्ज़ दे देना, यह शुरू से यहूदी साहूकारों का तरीका रहा है। और हर ज़माने के ब्याजखोर, साहूकार ऐसा ही करते रहे हैं। बैंक भी ऐसा करते हैं। बैंकिंग के तमाम विश्वसनीय विशेषज्ञ यही लिखते चले आ रहे हैं। बैंकों के क़ानून इसी आधार बने हैं। और बैंक मूल रूप से ‘दैन’ का व्यापार करते हैं। ‘दैन’ का व्यापार यानी trade in debts ही बैंक का अस्ल कारोबार है। इसलिए यह समझना कि बैंकों के मामलात पर क़र्ज़ के आदेश जारी नहीं होने चाहिएँ, यह बहुत बड़ी नादानी और भोलापन है।
कुछ लोग यह भी कहते हैं कि शरीअत ने आसानी का आदेश दिया है और मुश्किल और मशक्कत को समाप्त करने का निर्देश दिया है। “अल्लाह तआला तुम्हारे लिए आसानी चाहता है, वह तुम्हारे लिए मुश्किल नहीं चाहता।” (क़ुरआन 2:185) चूँकि शरीअत आसानी चाहती है, इसलिए आसानी का तकाज़ा है कि ब्याज को हराम न करार दिया जाए। यह बात कहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि जिस शरीअत ने यह नियम निर्धारित किया है कि क़ानून में आसानी होनी चाहिए, उसी ने यह नियम भी निर्धारित किया है कि मुहर्रमात (हराम ठहराई हुई चीज़ों और कामों) में कोई आसानी नहीं होती। युस्र (आसानी) का यह नियम, आसानी पैदा करने का यह सिद्धांत, हराम कामों में नहीं चलता।
अगर यह सिद्धांत मान लिया जाए तो ये दूसरे मुहर्रमात में भी जारी होना चाहिए। ऐसा होने लगे तो फिर किसी ग़रीब और बेसहारा इंसान के लिए चोरी जायज़ होनी चाहिए, डाका जायज़ होना चाहिए, व्यभिचार जायज़ होना चाहिए, क्या दुनिया का कोई क़ानून इसकी अनुमति देता है? यह याद रखना चाहिए कि ‘युस्र’ का उसूल जायज़ मामलों में होता है। अगर दो मामले जायज़ हों और दोनों में से किसी एक को अपनाना हो तो फिर आसान मामले को अपनाना चाहिए। किसी फ़र्ज़ को पूरा करने के दो ही रास्ते हों, एक रास्ता आसान हो और दूसरा मुश्किल हो तो आसान रास्ते को अपनाना चाहिए। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बारे में हदीसों में आता है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सामने जब दो रास्ते होते थे, एक आसान और एक मुश्किल, तो आप आसान रास्ते को अपनाते थे, बशर्ते कि वह गुनाह न हो या उसमें कोई ग़लत बात न हो तो फिर आप आसान रास्ते को अपनाया करते थे।
यह बात कि फ़लाँ-फ़लाँ हराम कामों को इसलिए जायज़ करार दिया जाए कि उसकी वजह से आसानी पैदा हो जाएगी, तो यह पूरी क़ानून-व्यवस्था को नष्ट करने के समान होगा। दुनिया का कोई क़ानून इससे सहमत नहीं हो सकता कि चूँकि एक व्यक्ति को भ्रम है और उसके विचार से अगर वह फ़लाँ हराम काम न करे तो यह और यह मुश्किल पैदा हो जाएगी। अतः उसके लिए हराम को हलाल कर देना चाहिए। यह सिद्धांत अगर मान लिया जाए तो दुनिया का कोई क़ानून बाक़ी नहीं रह सकता।
इसके अलावा शरीअत ने ‘युस्र’ के बहुत से आदेश दिए हैं। पवित्र क़ुरआन ने ‘युस्र’ का आदेश दिया है, ‘ज़रर’ (नुक़सान) दूर करने का आदेश दिया है, ‘हरज’ (रुकावट) दूर करने का आदेश दिया है। इन नियमों और उन धारणाओं पर विस्तार से बहस की है। इमाम शातिबी और इमाम कराफ़ी, अल्लामा इब्ने आबिदीन और इस दर्जे के दूसरे फ़ुक़हा ने बहुत विस्तार से ज़रर, युस्र और हरज की धारणाओं को बयान किया है। उन तमाम नियमों और बहसों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शरीअत के ‘मुहर्रमात’ (हराम ठहराए कामों) को हलाल करार देना, शरीअत के ‘मुबाहात’ (जायज़ कामों) को हराम करार देना, या ‘वाजिबात’ (ज़रूरी कामों) का क्रम बदल देना किसी के अधिकार में नहीं है और न ‘युस्र’ का मतलब यह है कि शरीअत के आदेशों को बदल दिया जाए। जो लोग बैंक इंटरेस्ट के औचित्य को मानते हैं, वे ज़रूरत और हाजत पर भी बहुत ज़ोर देते हैं। वे मजबूरी और ज़रूरत के बारे में शरीअत के दूसरे आदेशों को अनदेखा कर देते हैं। निस्संदेह शरीअत ने ज़रूरत और मजबूरी को स्वीकार किया है। मजबूरी और ज़रूरत पड़ने पर कुछ नाजायज़ कामों को भी गवारा करने की अनुमति दी है। क़ुरआन से यह बात स्पष्ट होती है, हदीसों में इन नियमों को स्पष्ट किया गया है। ज़रूरत के आदेश, ज़रूरत के प्रकार और मजबूरी का विवरण भी क़ुरआन और हदीसों में आया है।
ज़रूरत से मुराद यह है कि शरीअत के वे उद्देश्य जिनकी ख़ातिर सारे आदेश दिए गए हैं, ख़ुद दीन (इस्लाम) की सुरक्षा, इंसानी जान की सुरक्षा, इंसान के माल की सुरक्षा, इंसान की बुद्धि की, नस्ल की सुरक्षा, इन उद्देश्यों में से अगर कोई उद्देश्य प्रत्यक्ष रूप से ख़तरे का निशाना बन जाए और उसके विनाश का सख़्त ख़तरा और संभावना पैदा हो जाए तो इस स्थिति में उस उद्देश्य को बचाने के लिए कोई हराम काम कर लेने की अनुमति है। उदाहरणार्थ शरीअत ने मुर्दा जानवर का गोश्त खाने की मनाही की है—“मुर्दा जानवर तुम्हारे लिए हराम करार दिया गया है।” (क़ुरआन 5:3) अब अगर कोई व्यक्ति खुद भूख से इतना मजबूर हो कि उसकी जान ख़तरे में हो और वह मरने के क़रीब हो तो उसके लिए मुर्दा जानवर का गोश्त खा लेना और जान बचा लेना जायज़ है, लेकिन ज़रूरत का आदेश यह भी है, पवित्र क़ुरआन के स्पष्ट आदेश से निकलता है कि “ज़रूरत के इस सिद्धांत पर उतना ही अमल किया जाए जितना फ़ौरी तौर पर अपरिहार्य है।” पवित्र क़ुरआन में आया है—“ग़ैर बाग़िन व ला आदिन”। जहाँ मजबूरी की अनुमति है, जहाँ मजबूरी की स्थिति में कुछ हराम कामों के करने की अनुमति दी गई है, वहाँ यह शर्त स्पष्ट रूप से आई है—“ग़ैर बाग़िन व ला आदिन”। यानी उस हराम काम को करने में नीयत अल्लाह की सीमाओं से निकलने और अल्लाह की शरीअत का उल्लंघन करने की न हो। इन शब्दों से फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने यह नियम निकाला है कि ज़रूरत पड़ने पर जब हराम काम करना पड़े तो उसको सिर्फ़ ज़रूरत की हद तक ही किया जाए, जिस हद तक ज़रूरत पूरी हो जाए।
उदाहरणार्थ, एक व्यक्ति प्यास से मर रहा है, रेगिस्तान में है, प्यास का शिकार है, पानी कहीं से भी उपलब्ध नहीं है। उसके किसी साथी के पास शराब की बोतल मौजूद है, ऐसे व्यक्ति को अनुमति है कि शराब से अपनी प्यास बुझा ले।
लेकिन अगर एक घूँट से प्यास बुझ सकती हो, जान बच सकती हो तो दो घूँट पीना जायज़ नहीं होगा। इस अनुमति का यह अर्थ नहीं है कि शराब पीने वालों की महफ़िल में जाकर बैठे और जाम-पर-जाम लुंढाना शुरू कर दे। या किसी व्यक्ति को भूख की वजह से इसका ख़तरा है कि उसकी जान चली जाएगी और वहाँ कहीं सूअर का गोश्त उपलब्ध है, वहाँ जाकर बैठे और दस्तरख़ान के मज़े लूटे, यह दुरुस्त नहीं है। अगर एक निवाले से जान बच सकती है तो दो निवाले लेना जायज़ नहीं होगा। दो निवालों से जान बच सकती है तो तीन निवाले लेना जायज़ नहीं होगा।
‘इज़तिरार’ (मजबूरी) के इन आदेशों के सामने रखकर देखा जाए तो पता चलता है कि बैंक इंटरेस्ट को जो लोग मजबूरी के आधार पर जायज़ ठहराना चाहते हैं उनको ऐसी कोई मजबूरी पेश नहीं आई है और अगर मान लो मजबूरी हो भी तो फिर “उतने ही से ज़रूरत पूरी करें जितने से पूरी हो जाती हो” के तहत एक बार या दो बार ऐसा किया जा सकता है, लेकिन पूरी ज़िंदगी ब्याजखोरी में गुज़ार दी जाए, भोग-विलास और आराम की चाह में घर बैठे ब्याज आधारित आय से लोग लाभान्वित हों। यह शरीअत की मजबूरी और ज़रूरत की अवधारणा का खुला-खुला शोषण है।
यहाँ यह बात बतानी ज़रूरी है, वह यह कि हमारे देश में एक ऐसा वर्ग निस्संदेह मौजूद है, उदाहरणार्थ विधवा महिलाएँ हैं, बूढ़े लोग हैं, बे-घर लोग, यतीम बच्चे, जिनके पास न तो इतनी निपुणता, इतना समय और फ़ुर्सत है कि खुद कोई व्यापार कर सकें, न उनके पास कोई ऐसे संसाधन हैं, न ऐसी आयु है कि जाकर नौकरी करें या मज़दूरी करें। ऐसे लोगों में से बहुत से ऐसे हैं कि उनको घर बैठे आमदनी होती रहे। एक 80 वर्षीय बूढ़ा आदमी है, वह अब कोई नौकरी नहीं कर सकता, मज़दूरी भी नहीं कर सकता। व्यापार की दक्षता भी उसको प्राप्त नहीं है। और अगर हो भी तो उसकी आयु और स्वास्थ्य अब व्यापार करने की अनुमति नहीं देता, या उदाहरणार्थ बूढ़ी विधवा महिलाएँ हैं। ऐसे लोगों के लिए सरकारों को कोई प्रबंध करना चाहिए। इस प्रकार के लोगों की आवश्यकताओं का हवाला देकर बैंक इंटरेस्ट को आम तौर पर जायज़ करार देना, यह भी शरीअत के उद्देश्यों और स्वभाव के विरुद्ध है। अगर मान लो बैंक इंटरेस्ट जायज़ हो तो फिर इस जायज़ की हक़दार वे विधवा महिलाएँ हैं जिनके पास कोई आय का स्रोत नहीं है, वे बूढ़े पेंशन पाने वाले लोग हैं जिनमें मेहनत करने की क्षमता नहीं बची है, वे स्वयं व्यापार नहीं कर सकते, या ऐसे बच्चे जिनके वारिस पैसा छोड़ गए और कोई जायज़ ज़रिया ऐसे नहीं है जिसमें इस पैसे को लगाया जा सके।
अगरचे आज पाकिस्तान में ऐसे जायज़ साधन मौजूद हैं जहाँ इस प्रकार की रक़म लगाई जा सकती है और जायज़ तरीके से घर बैठे आमदनी हो सकती है। लेकिन चूँकि हमारे देश में दुर्भाग्य से बेईमानी और धोखाधड़ी का दौर-दौरा है, इसलिए बहुत से लोग अपना पैसा लगाते हुए घबराते हैं। बैंकों की व्यवस्था चूँकि शुरू से चली आ रही है, दो सौ डेढ़ सौ वर्षों से एक विशेष ढंग पर क़ायम है, वहाँ धोखाधड़ी की संभावनाएँ तुलनात्मक रूप से कम होती हैं। इसलिए कुछ लोगों की सचमुच ज़रूरत है कि उनके लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिनको घर बैठे हर महीने एक निश्चित रक़म मिल सके। अब चूँकि पाकिस्तान में बहुत से बैंकों ने इस्लामी विभाग भी क़ायम कर दिए हैं, इस्लामी ब्रांचें भी बनाई हैं, इसलिए अब यह काम कुछ आसान हो गया है और इस्लामी बैंकों को या पारंपरिक बैंकों के जो इस्लामी विभाग हैं या इस्लामी शाखाएँ हैं, उनको यह काम करना चाहिए और विधवा महिलाओं, बूढ़े पेंशनर्स, बे-घर लोग, यतीम बच्चों, बीमार और बेसहारा लोगों के लिए शरीअत के अनुसार ऐसी योजनाएँ बनानी चाहिएँ जहाँ वे पैसा लगा सकें और उनको घर बैठे आमदनी हो सके।
‘रिबा’ के बारे में एक बात याद रखनी चाहिए कि ‘रिबा’ की जितनी भी शक्लें हैं, वह बैंक इंटरेस्ट हो या कोई और शक्ल हो, ये सब-की-सब शरीअत के उन आदेशों से टकराती हैं जिनके आधार पर इस्लाम की आर्थिक व्यवस्था गठित होती है। मैं पहले विस्तार से बता चुका हूँ कि पवित्र क़ुरआन में एक जगह स्पष्ट रूप से यह बताया गया है कि इस्लाम की अर्थव्यवस्था की तत्वदर्शिता का एक पहलू यह है कि दौलत का संकेन्द्रण न हो, बल्कि दौलत हर वर्ग में गर्दिश करे। ‘रिबा’ और ब्याज की जितनी शक्लें हैं वे धन के संकेन्द्रण का साधन बनती हैं। इसलिए शरीअत का यह मौलिक सिद्धांत “ताकि वह (धन) तुम्हारे धनवानों में न फिरता रहे।” (क़ुरआन 59:7) ‘रिबा’ की मौजूदगी में अमल में नहीं आ सकता। अगर समाज में अर्थव्यवस्था एवं व्यापार की व्यवस्था ब्याज आधारित है तो धन का संकेन्द्रण अपरिहार्य है। अगर धन के संकेन्द्रण को समाप्त करना अभीष्ट है जैसा कि पवित्र क़ुरआन का आदेश है तो फिर ब्याज आधारित व्यापार को समाप्त करना पड़ेगा।
इसी प्रकार एक हदीस नबवी का मैं कई बार हवाला दे चुका हूँ, जिसमें नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि “अल-ख़िराज बिज़-ज़मान” यानी लाभ उसी का उठाया जा सकता है जिसका घाटा तुम्हारे ज़िम्मे हो। शरीअत का यह सिद्धांत जीवन के लगभग सभी पहलुओं में काम कर रहा है। शरीअत के आदेशों में इस सिद्धांत का ध्यान रखा गया है। ‘रिबा’ इस सिद्धांत को रद्द कर देता है। ब्याज देने वाला एक ऐसी पूँजी का लाभ उठा रहा है जिसके नुक़सान का वह पाबंद नहीं है। उसको हर हाल में अपनी अस्ल पूँजी वापस मिलेगी। चाहे क़र्ज़ लेने वाले ने इससे जायज़ कारोबार किया हो या नाजायज़ किया हो। क़र्ज़ लेने वाले को व्यापार में लाभ हो या घाटा हुआ हो। ब्याज आधारित क़र्ज़ देने वाला अपनी अस्ल पूँजी हर हाल में सुरक्षित रखता है, और निर्धारित समय पर उसको वापस ले लेता है। जब अस्ल सुरक्षित है और उसके घाटे का यह ज़िम्मेदार नहीं है तो इसका लाभ उठाने का भी उसको अधिकार नहीं है।
‘रिबा’ के बारे में ग़लतफ़हमी की एक और बड़ी वजह मेरे ख़याल में अंग्रेज़ी के कुछ शब्द हैं। अरबी में ‘आरिया’ और ‘क़र्ज़’, ये दो शब्द अलग-अलग प्रयुक्त होते हैं और दोनों का अर्थ अलग-अलग है। आपको याद होगा कि मैंने एक चर्चा में जहाँ माल के प्रकार बताए थे, वहाँ यह भी बताया था कि माल ‘इस्तेमाली’ भी होता है और ‘इस्तेहलाकी’ भी होता है। माल का एक प्रकार तो वह है कि आपने उसको अपने उपभोग में लिया, इस्तेमाल किया, आपके इस्तेमाल करने के नतीजे में अस्ल चीज़ ज्यों की त्यों मौजूद रही, इसमें कोई फर्क नहीं पड़ा और आपने अस्ल चीज़ ज्यों की त्यों वापस कर दी। उदाहरणार्थ आप कहीं जा रहे थे, या सफ़र पर थे, आपने किसी दोस्त से उसका मोबाइल फ़ोन ले लिया, मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल किया, सफ़र से वापस आकर उसका मोबाइल फ़ोन वैसा-का-वैसा ही उसको वापस कर दिया। मोबाइल फ़ोन ज्यों का त्यों मौजूद है, न ख़र्च हुआ, न कम हुआ, और न आपने उसको इस तरह इस्तेमाल किया कि उसका अस्तित्व समाप्त हो गया हो। यह ‘आरिया’ कहलाता है, इसके आदेश अलग हैं। यह ‘इस्तेमाली’ चीज़ों में होता है।
माल की दूसरी किस्म है ‘इस्तेहलाकी’। ‘इस्तेहलाकी’ चीज़ क़र्ज़ के तौर पर दी जाती है, उसका ‘आरिया’ नहीं होता। ‘इस्तेहलाकी’ माल वह होता है कि जब आप उसको एक बार अपने उपभोग में ले आएँ तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। उदाहरणार्थ एक पड़ोसन ने दूसरी पड़ोसन से चीनी मँगवाई कि महीने के आरंभ में जब चीनी आएगी तो वापस कर देंगे। अब जब पड़ोसन चीनी को इस्तेमाल करेगी तो वह चीनी समाप्त हो जाएगी। अब अस्ल मौजूद नहीं रहेगी। यह नहीं हो सकता कि वह चीनी इस्तेमाल भी हो जाए और वैसी-की-वैसी ही बाक़ी भी रहे और उसको ज्यों की त्यों वापस कर दिया जाए। अगर लेने वाली उसको ख़र्च करेगी तो वह चीनी तो समाप्त हो जाएगी और उसका ‘इस्तेहलाक’ (ख़ातिमा) हो जाएगा, यानी वह consume हो जाएगी और फिर उस जैसी, उतनी ही मात्रा और उतनी ही वज़न की चीनी वापस कर दी जाएगी।
यह अंतर अगर नज़र के सामने रहे तो फिर यह अनुमान हो जाएगा कि क़र्ज़ केवल ‘इस्तेहलाकी’ चीज़ों का होता है, ‘इस्तेमाली’ चीज़ों में सिर्फ़ ‘आरिया’ होता है। नक़द रक़म ‘इस्तेहलाकी’ चीज़ है। जब आप किसी से क़र्ज़ लेते हैं, तो वह ‘दैन’ होता है। और फिर जब उसको ख़र्च करते हैं तो अस्ल रक़म आपके पास से चली जाती है, वह आपके क़ब्ज़े में मौजूद नहीं रहती। आपने किसी से सौ रुपये लिए और सौ रुपये ख़र्च कर दिए, वे सौ रुपये आपके पास से चले गए अब जब आप क़र्ज़ देने वाले को सौ रुपये वापस करेंगे तो वे सौ रुपये वापस नहीं करेंगे जो उसने आपको दिए थे, कोई और सौ रुपये, उतनी ही मालियत के आप उसको चुका देंगे। यह ‘दैन’ कहलाता है।
अंग्रेज़ी में दोनों के लिए borrow का शब्द इस्तेमाल होता है। आपने लाइब्रेरी से किताब borrow कर ली और बैंक से रक़म भी borrow कर ली। हालाँकि अरबी और इस्लामी शब्दावली के अनुसार किताब बतौर ‘आरिया’ के ली है और रक़म बतौर क़र्ज़ या ‘दैन’ के ली है। अतः ‘आरिया’ पर ‘दैन’ के आदेश जारी नहीं होंगे, ‘दैन’ पर ‘आरिया’ के आदेश जारी नहीं होंगे। चूँकि अंग्रेज़ी में दोनों के लिए एक ही शब्द प्रचलित है इसलिए इससे अस्पष्टता भी पैदा होती है और एक पर दूसरे के आदेश, और दूसरे पर पहले के आदेशों को चस्पाँ करने में जहाँ सीधे-सादे लोगों को ग़लतफ़हमी होती है, वहाँ सूदखोरों को आसानी हो जाती है।
जहाँ तक ‘इस्तेमाली’ चीज़ों का संबंध है, उनका किराया लिया जा सकता है और इस्तेमाल करने वाला किराया देने का पाबंद है। इसलिए कि किराया उस चीज़ का दिया और लिया जाएगा जिसके नुक़सान या घाटे का अस्ल मालिक पाबंद हो। एक व्यक्ति ने अपनी गाड़ी आपको किराए पर दे दी। आपने गाड़ी इस्तेमाल की और फिर अस्ल गाड़ी ज्यों की त्यों वापस कर दी और इस इस्तेमाल का पारिश्रमिक या किराया एक हज़ार रुपये प्रतिदिन या पाँच सौ रुपये दिन के हिसाब से गाड़ी के मालिक को अदा कर दिया। यह इस स्थिति में जायज़ है कि गाड़ी के नुक़सान का ज़िम्मेदार मालिक हो। अगर एक्सीडेंट हो जाए, ख़ुदा न ख़ास्ता गाड़ी को नुक़सान हो जाए, तो यह अस्ल मालिक का नुक़सान समझा जाए, किराए पर लेने वाले का नुक़सान न समझा जाए।
बहुत से लोग इस ‘इजारे’ को या इस किराए को ब्याज के साथ गड्ड-मड्ड कर देते हैं। वे कहते हैं कि अगर गाड़ी का किराया लेना जायज़ है तो पैसे का किराया लेना क्यों जायज़ नहीं है? मकान का किराया जायज़ है, ज़मीन का किराया जायज़ है तो पूँजी का किराया जायज़ क्यों नहीं है? वे यह भूल जाते हैं कि क़र्ज़ में अस्ल पूँजी वापस नहीं होती। अस्ल पूँजी तो ख़र्च हो गई और जब क़र्ज़ लेने वाले ने पूँजी क़र्ज़ ली थी तो वह पहले दिन से क़र्ज़ लेने वाले के ‘ज़मान’ में थी, जो किसी के ‘ज़मान’ में हो उसका फायदा उठा सकता है। क़र्ज़ लेने वाले के ‘ज़मान’ में अगर वह रुपया था तो फिर उसका फायदा भी क़र्ज़ लेने वाला उठाएगा। इसके विपरीत अगर क़र्ज़ देने वाला उस रुपये का ‘ज़मान’ रखता है, नुक़सान होने पर रक़म के बरबाद होने को बर्दाश्त करता है और घाटे की ज़िम्मेदारी लेता है तो यह ‘मुज़ारबा’ है, यह जायज़ है। शरीअत का यह उसूल इतना स्पष्ट और दो टूक है कि उसके होते हुए किसी प्रकार के ‘रिबा’ या ब्याज के हलाल या जायज़ होने की संभावना समाप्त हो जाती है।
इस चर्चा को समाप्त करने से पहले मैं अल्लामा इब्ने क़य्यिम का एक वाक्य बयान करना चाहता हूँ जिससे पूरी स्थिति को समझने में बहुत मदद मिलती है। उन्होंने एक जगह हीले से बहस की है। और ख़ास तौर पर सूदी हीलाकारी का उल्लेख किया है। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा है कि ‘रिबा’ का हराम होना किसी निर्धारित शक्ल या निर्धारित शब्दों तक सीमित करना दुरुस्त नहीं है, बल्कि ‘रिबा’ के हराम होने का संबंध इस वास्तविकता की वजह से है जिससे वह व्यापार और क्रय-विक्रय से अलग होता है। ‘रिबा’ से संबंधित यह हकीकत जहाँ भी पाई जाएगी वहाँ हुर्मत (निषेध) का आदेश भी चस्पाँ होगा। चाहे उसमें शब्द कोई भी अपनाए जाएँ। शरीअत के आदेशों का दारोमदार तथ्यों पर होता है, शब्दों और शीर्षकों पर नहीं होता। अतः व्यापार और पूँजी निवेश के तमाम मामलों में मूल प्रश्न जो तय करने का है वह यह है कि क्या यह अपनी वास्तविकता की दृष्टि से व्यापार और ‘बैअ’ में शामिल हैं या नहीं हैं। अगर यह मामलात अपनी हकीकत की दृष्टि से ‘बैअ’ और व्यापार में दाख़िल हैं तो फिर यह जायज़ हैं और अगर यह ‘बैअ’ और व्यापार में दाख़िल नहीं हैं तो फिर यह देखना चाहिए कि क्या ये मामलात की नाजायज़ सूची में तो शामिल नहीं हैं। अगर उनमें ‘ग़रर’, ‘क़िमार’, ‘रिबा’ या इस तरह की कोई और बुराई पाई जाती है तो फिर उनको भी नाजायज़ करार देना होगा। और मात्र इस आधार पर उनमें से किसी चीज़ को जायज़ करार दे देना दुरुस्त नहीं होगा कि यह प्रचलित कार्य-प्रणाली की हैसियत से अपनाया गया है और आम लोग इससे परिचित हैं।
‘रिबा’ के बारे में कुछ शक-संदेहों के संदर्भ में दो मामलों की निशानदेही ज़रूरी है जो ‘रिबा’ के मामलों को समझने के लिए अपरिहार्य हैं। जिस प्रकार शरीअत ने सकारात्मक रूप से ‘रिबा’ को हराम ठहरा दिया है, वहाँ नकारात्मक ‘रिबा’ को भी हतोत्साहित किया गया है। नकारात्मक ‘रिबा’ से मुराद यह है कि समय की क़ीमत निर्धारित करके समय अगर कम हो जाए तो अस्ल पूँजी में कमी कर दी जाए। यह भी रिबा का रास्ता खोलने के समान है। इसलिए चारों इमामों के सर्वसम्मत मत के अनुसार यह जायज़ नहीं है। यह मामला चूँकि ज़रा विस्तार चाहता है, इसलिए मैं ज़रा विस्तार से बयान करना चाहता हूँ। शरीअत ने मामलों ख़ासकर लेन-देन, व्यापार और शेष दीवानी मामलों में सुल्ह की अनुमति दी है, सुल्ह का अर्थ यह है कि अगर किसी व्यापार के दो पक्षों के दरमियान किसी लेन-देन में मतभेद पैदा हो जाए और उस मतभेद को सुलझाने के लिए वे आपस में राज़ीनामा या समझौता करना चाहें तो समझौता कर सकते हैं। इस समझौते के दौरान अगर एक पक्ष अपने किसी अधिकार को छोड़ना चाहे तो उसको अपने अधिकार को छोड़ने की भी अनुमति है। इसको ‘सुल्ह-ए-इस्क़ात’ (समझौता समाप्त होना) कहा जाता है और ‘सुल्ह-ए-इबरा’ भी कहा जाता है। यह बहुत से फ़ुक़हा के नज़दीक जायज़ है और इसमें कोई हरज नहीं है।
लेकिन अगर यह मामला किसी पेशगी शर्त के साथ किया जाए, उदाहरणार्थ क़र्ज़ लेते वक़्त यह शर्त रख ली जाए कि अगर देय रक़म एक साल के बाद अदा की, तो एक लाख के एक लाख दस हज़ार रुपये चुकाने होंगे। और अगर क़र्ज़ देने वाला वक़्त से पहले वसूल करना चाहे उदाहरणार्थ साल भर के बजाय छः महीने बाद वसूल करना चाहे, तो क़र्ज़ लेने वाले को अधिकार होगा कि इस छः महीने की अतिरिक्त अवधि की क़ुर्बानी देने के मुक़ाबले में अस्ल रक़म में से कोई हिस्सा काट ले, यह जायज़ नहीं है।
यह मामला हदीस और फ़िक्ह के साहित्य में ‘ज़अ व तअज्जुल’ या ‘ज़ऊ व तअज्जिलू’ के शीर्षक से मशहूर है। ‘ज़ऊ व तअज्जिलू’ बहुवचन में है और ‘ज़अ व तअज्जुल’ एकवचन में है। ‘ज़अ व तअज्जुल’ के शाब्दिक अर्थ यह हैं कि अस्ल माँग में कमी कर दो और बक़िया रक़म पेशगी वसूल कर लो। यह बात अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ग़ज़वा बनू नज़ीर के मौके पर फ़रमाई थी। इस मौके पर यह तय हुआ था कि बनू नज़ीर के यहूदियों को मदीना मुनव्वरा से निष्कासित कर दिया जाए। जब वे निष्कासित होने लगे, उस समय यह अंदाज़ा हुआ कि मदीना मुनव्वरा के बहुत से लोगों की रक़में बनू नज़ीर के यहूदियों के ज़िम्मे देय हैं। इस तरह के एक मौके पर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया, ‘ज़ऊ व तअज्जिलू’। जो रक़म एक मुद्दत बाद देय होगी वह अभी वसूल कर लो और अस्ल दरकार रक़म में से कुछ हिस्सा कम कर दो।
यह मसला ग़ज़वा बनू नज़ीर के दौरान पेश आया जो मदीना के आरंभिक वर्षों की घटना है। उस समय तक ‘रिबा’ की कई आयतें अवतरित हुई थीं। इसलिए चारों इमामों का यह ख़याल है कि ‘रिबा’ की आयतों के अवतरित होने बाद इस तरह की अनुमति अगर शरीअत में थी तो वह निरस्त हो चुकी है। और अब ‘ज़अ व तअज्जुल’ के सिद्धांत पर अमल करना दुरुस्त नहीं है। कुछ दूसरे लोगों का शुरू से यह ख़याल रहा है कि आदेश निरस्त नहीं हुआ, ताबिईन में हज़रत इमाम नख़ई (रह.) और बाद के फ़ुक़हा में शैख़ुल-इस्लाम अल्लामा इब्ने तैमिया (रह.) और अल्लामा इब्ने क़य्यिम (रह.) की यही राय है। इन लोगों के निकट ‘ज़अ व तअज्जुल’ का सिद्धांत बाक़ी है और इस पर बाद में अमल भी किया जा सकता है। बशर्ते कि दो सिद्धांतों का ध्यान रखा जाए। एक यह कि इस प्रकार की कोई शर्त क़र्ज़ या लेन-देन के आरंभ में पहले से न रखी जाए। दूसरे यह मामला केवल क़र्ज़ देने वाले और क़र्ज़ लेने वाले के दरमियान हो, कोई तीसरा पक्ष इसमें शामिल न हो। यों व्यवहारतः यह सुल्ह (समझौते) की एक किस्म हो जाती है जिसके औचित्य पर अब भी बहुत से लोग क़ायम हैं। आज कुछ लोग ‘ज़अ व तअज्जुल’ की इस सामयिक अनुमति को discounting के मामले में अपनाना चाहते हैं और अल्लामा इब्ने क़य्यिम और हज़रत इबराहीम नख़ई की राय पर बुनियाद रखना चाहते हैं। लेकिन उनकी राय भी, अगर उन दोनों शर्तों का ध्यान रखा जाए तो भी, इस मामले में सहयोगी नहीं हो सकती और discounting of bills का जो रिवाज आज पाया जाता है उसको ‘ज़अ व तअज्जुल’ के उसूल के तहत जायज़ करार देना मुश्किल है।
दूसरी अहम बात यह है कि किसी मामले के ‘रिबा’ होने या न होने का फैसला जहाँ स्पष्ट आदेशों के आधार पर किया जाएगा, पवित्र क़ुरआन और हदीसों के स्पष्ट आदेशों को सामने रखकर किया जाएगा, वहाँ मामलात के बारे में आम नियमों को भी सामने रखना पड़ेगा। मामलात के बारे में शरीअत के आम नियमों में कुछ तो वे हैं जिनका पवित्र क़ुरआन और हदीसों में स्पष्ट रूप से उल्लेख है लेकिन इस्लामी फ़ुक़हा ने पवित्र क़ुरआन के कई स्पष्ट आदेशों से और कई हदीसों से उन उसूलों और सिद्धांतों को निकाला है। इसलिए उनकी हैसियत भी स्पष्ट नियमों की है।
इनमें सबसे पहला सिद्धांत मर्ज़ी और दिल की रज़ामंदी का है। ‘तराज़ी’ का शब्द पवित्र क़ुरआन में आया है। हर प्रकार के लेन-देन में दोनों पक्षों की पूर्ण स्वीकृति अपरिहार्य है। हदीसों में इसके लिए ‘तीबुन-नफ़्स’ (पाक दिल) की शब्दावली भी आई है। यानी इंसान अपने दिल की गहराइयों से पूर्ण स्वीकृति और आमदगी के साथ किसी चीज़ का फैसला करे तो समझा जाएगा कि वह राज़ी है। ऊपरी-ऊपरी रज़ामंदी, ज़ाहिरी रज़ामंदी और दिल से नापसंदीदगी ‘तराज़ी’ के ख़िलाफ़ है।
‘रिबा’ से संबंधित आज बहुत से मामले ऐसे हैं जिनमें संबंधित पक्ष पूर्ण स्वीकृति से शामिल नहीं होता। मजबूरन लोग ब्याज पर क़र्ज़ लेने पर मजबूर होते हैं। उनके सामने समस्याएँ और परेशानियाँ और मुश्किलें ऐसी पैदा हो जाती हैं जिनकी वजह से उनको ब्याज पर क़र्ज़ लेना पड़ जाता है। यह ‘तीबुन-नफ़्स’ भी नहीं है और ‘तराज़ी’ भी नहीं है। इसलिए इस तरह के मामलात में जहाँ और स्पष्ट आदेशों को देखते हुए इस मामले को नाजायज़ करार दिया जाएगा, वहाँ ‘तीबुन-नफ़्स’ और रज़ामंदी का न होना भी इसको नाजायज़ बनाएगा।
फिर दूसरा सिद्धांत जैसा कि मैंने बताया जो कई हदीसों में आया है, वह ‘ग़रर’ की मनाही है। ‘ग़रर’ को स्पष्ट किया जा चुका है कि ‘ग़रर’ वह है जो ‘मस्तूरुल-आक़िबा’ हो या ‘मजहूलुल-आक़िबा’ हो, यानी जिसका परिणाम निश्चित रूप से मालूम न हो कि क्या होगा। आज बहुत से मामलात ऐसे हैं जिनमें ‘ग़रर’ पाया जाता है। उन मामलों में दोनों पक्षों को यह मालूम नहीं होता कि आख़िरकार दोनों पक्षों का हक़ क्या बनेगा, उनको क्या मिलेगा, यह आज के बहुत से मामलात में पाया जाता है। ख़ासतौर पर फ़्यूचर सेल्ज़ के नाम से जो कुछ हो रहा है, उसका बड़ा हिस्सा ‘ग़रर’ पर आधारित है। इसलिए जहाँ ‘ग़रर’ पाया जाता हो, दोनों पक्षों में से किसी एक का अधिकार अस्पष्ट और अनिर्धारित हो, वह मामला भी जायज़ नहीं होगा।
तीसरा सिद्धांत ‘मयसिर’ की मनाही है। ‘मयसिर’ और ‘क़िमार’ का उल्लेख पहले विस्तार से किया जा चुका है। आजकल बहुत से मामलात जो बैंकों के ज़रिए हो रहे हैं या कारोबारी क्षेत्रों में हो रहे हैं उनमें ‘मयसिर’ पाया जाता है। यह तरह-तरह की लॉटरियाँ और यह रीफ़िल की स्कीमें, लकी ड्रॉ हैं, इनमें से हो सकता है कुछ मामलात जायज़ भी हों, लेकिन उनका बड़ा हिस्सा नाजायज़ मामलात पर आधारित है और उनसे बचना अनिवार्य है।
पवित्र क़ुरआन ने एक और सिद्धांत जो बहुत स्पष्ट रूप से बयान किया है और ‘रिबा’ के संदर्भ में भी इसका उल्लेख पवित्र क़ुरआन में किया गया है, वह ज़ुल्म की मनाही है। हदीस में आया है कि “ज़ुल्म क़ियामत के दिन अंधेरों के रूप में सामने आएगा।” पवित्र क़ुरआन में जहाँ यह कहा गया है कि ब्याज के दावों को छोड़ दो, ब्याज आधारित देय को समाप्त कर दो, वहाँ यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है कि तुम्हारा अधिकार केवल तुम्हारी अस्ल पूँजी तक सीमित होना चाहिए। पवित्र क़ुरआन में यह कहने के बाद कि “...अपना मूलधन लेने का तुम्हें अधिकार है” कहा गया “न तुम ज़ुल्म करो, न तुम पर ज़ुल्म किया जाए।”
इस ज़ुल्म और शोषण का कुछ लोग बहुत ज़्यादा हवाला देते हैं और अजीब बात है कि ज़ुल्म और शोषण के बार-बार हवाले के बावजूद ‘रिबा’ की कुछ किस्मों को जायज़ करार देना चाहते हैं। बैंक इंटरेस्ट की कोई किस्म ऐसी नहीं है जिसमें उस अर्थ में पवित्र क़ुरआन ने अत्याचार एवं शोषण को नाजायज़ करार दिया है। पवित्र क़ुरआन के अनुसार अत्याचार यह है कि मूलधन से अधिक की माँग की जाए और यह भी अत्याचार है कि मूलधन से कम वापस किया जाए।
शरीअत का एक और सिद्धांत जो ज़ुल्म की मनाही की अनिवार्य अपेक्षा, बल्कि उसकी शर्त है, वह इंसाफ़ से पूर्ण, गहरा और वास्तविक जुड़ाव है। पवित्र क़ुरआन के अनुसार आसमानी शरीअतों का मूल लक्ष्य और मूल उद्देश्य इंसाफ़ पर इंसानों को क़ायम करना है। इंसाफ़ की अनिवार्य अपेक्षा और अर्थ यह है कि हर इंसान का जान-माल सुरक्षित हो। किसी व्यक्ति को यह अनुमति न हो कि दूसरे का माल उसकी अनुमति और दिल की स्वीकृति के बिना इस्तेमाल करे। इसलिए भी वर्तमान ब्याज आधारित व्यापार की बहुत सी शक्लें नाजायज़ करार पाएँगी। इसलिए कि उनमें न्याय की उस धारणा का ध्यान नहीं रखा गया है जो शरीअत का उद्देश्य है।
फिर एक महत्वपूर्ण और बड़ा सिद्धांत जिसका पहले भी कई बार उल्लेख किया जा चुका है वह सिद्धांत सूदी मामलात में बहुत महत्व रखता है। फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) के शब्दों में ‘अल-ग़ुर्म बिल-ग़ुन्म’ का सर्वसम्मत सिद्धांत है। यह वही चीज़ है जिसको हदीस में ‘अल-ख़िराज बिज़-ज़मान’ के शब्दों से याद किया गया। फ़ुक़हा ने इसको ‘अल-ग़ुर्म बिल-ग़ुन्म’ के शब्दों से भी याद किया है। इनके अलावा भी कुछ दूसरे शब्द और इबारतें इस अर्थ को बयान करने के लिए इस्तेमाल की गई हैं। उन सबका अर्थ यह है कि शरीअत की नज़र में न्याय का तकाज़ा यह है कि फायदा उठाने का आपको पूरा हक़ है। और जिस चीज़ का आप फायदा उठा रहे हैं या उठाना चाहते हैं, उसका नुक़सान भी आपको उठाना चाहिए।
यह सिद्धांत इस्लामी शरीअत के मूल नियमों और आदेशों में से है, बल्कि यह कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा कि यह शरीअत की व्याख्या की तत्वदर्शिता का बुनियादी हिस्सा है। इस्लामी शरीअत के बहुत से आदेश यहाँ तक कि पारिवारिक क़ानून के आदेश, व्यक्तिगत क़ानून की बहुत सी समस्याएँ, अंतरराष्ट्रीय मामलात, दीवानी क़ानून, इन सबमें ‘अल-ग़ुर्म बिल-ग़ुन्म’ का सिद्धांत काम करता है। आज अगर व्यापारिक मामलों में ‘अल-ग़ुर्म बिल-ग़ुन्म’ के सिद्धांत को पूरे तौर पर अपना लिया जाए और इस आदेश पर इसकी मूल आत्मा के अनुसार अमल किया जाए तो ‘रिबा’ की बहुत सी किस्मों से आसानी के साथ बचा जा सकता है। इसी सिद्धांत को देखते हुए इस्तेमाल की चीज़ों का ‘इजारा’ (किराया) जायज़ है और धन का ‘इजारा’ जायज़ नहीं है। इस्तेमाल की चीज़ों की वापसी उस व्यक्ति की ज़िम्मेदारी होती है जिसने उसको किराए पर लिया है। लेकिन उस किराए पर लेने के बावजूद और उन चीज़ों के लाभ से लाभान्वित होने के बावजूद चीज़ों का अगर कोई नुक़सान या ज़िम्मेदारी, यानी ‘ग़ुन्म’ आ पड़े तो वह अस्ल मालिक के ज़िम्मे है। चूँकि अस्ल मालिक इसका पूरा-पूरा फायदा उठा रहा है, इसलिए वह इसका नुक़सान बर्दाश्त करने का भी पाबंद है।
इन मिसालों से यह बात दिन की रोशनी की तरह स्पष्ट हो जाती है कि ब्याज आधारित अर्थव्यवस्था और इस्लामी आदेश, दो बिलकुल परस्पर विरोधी और आपस में टकराने वाली चीज़ें हैं और इन दोनों को एक साथ लेकर चलने की कोशिश करना आग और पानी को जमा करने के समान है।
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