रिबा’ और ‘ब्याज’ के इस्लामी विकल्प (लेक्चर नम्बर-8)
-
अर्थशास्त्र
- at 22 April 2026
रिबा’ और ‘ब्याज’ के इस्लामी विकल्प (लेक्चर नम्बर-8)
डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी
अनुवादक : गुलज़ार सहराई
आज की चर्चा का शीर्षक है ‘रिबा’ और ‘ब्याज’ के इस्लामी विकल्प। जहाँ तक ब्याज और रिबा के विकल्प का सवाल है, यह इतना मुश्किल और महत्वपूर्ण विषय नहीं है जितना इसे समझ लिया गया है या कुछ लोगों ने बना दिया है। आज अगर दुनिया में हर जगह ब्याज-आधारित व्यवस्था कार्यरत नज़र आती है तो इसका यह मतलब नहीं है कि इंसानियत ब्याज-आधारित व्यवस्था के अलावा किसी और व्यवस्था से कभी परिचित ही नहीं थी। दुनिया के अधिकतर इलाकों में, मानव इतिहास की अधिकतर सभ्यताओं में ब्याज-रहित व्यवस्था हमेशा कार्यरत रही है। इसके बावजूद कि इतिहास के हर दौर में ब्याजखोरी की बुरी आदत भी मौजूद रही है। यह भी एक सच्चाई है कि इंसानों की बहुत बड़ी संख्या ब्याज और रिबा से परहेज करती चली आ रही है और इस बचाव के साथ-साथ व्यापार और कारोबार की तमाम माँगें भी पूरी करती आई है। इसलिए यह समझना कि ब्याज का विकल्प तलाश करना कोई ऐसा कठिन काम है जिसके लिए बहुत कोशिश की ज़रूरत हो, दुरुस्त नहीं है। न ब्याज का विकल्प कोई ऐसा मामला है कि जिसकी तलाश एक बहुत कठिन काम हो।
खुद इस्लाम के इतिहास में कम-से-कम आरम्भिक बारह सौ साल का ज़माना ब्याज-रहित अर्थव्यवस्था का दौर है। मुसलमानों ने उपमहाद्वीप के पूर्वी प्रांतों से लेकर मराकश तक और साइबेरिया की सीमाओं से लेकर सूडान और ज़ंजबार तक राज किया। इस पूरे क्षेत्र की व्यवस्था चलाई और यह सारी व्यवस्था ब्याज-रहित बुनियादों पर कार्यरत रही। मुसलमानों के क्षेत्रों में ब्याजखोरी की शिकायत अगर कभी रही तो आम तौर से यहूदियों से हुई या भारत के बनियों से हुई। लेकिन आम तौर पर इस्लामी इतिहास से यही पता चलता है कि मुसलमानों की व्यवस्था ब्याज-रहित तरीके पर कार्यरत रही है।
पवित्र क़ुरआन ने एक संक्षिप्त से वाक्य में ब्याज का विकल्प स्पष्ट कर दिया है। “अल्लाह तआला ने व्यापार, कारोबार और खरीद-ओ-फरोख्त को जायज़ ठहराया है और रिबा को हराम करार दिया है।” (क़ुरआन, 2:275)। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ब्याज के आर्थिक विकल्प में वे तमाम मामले शामिल हैं जिनका संबंध व्यापार के स्वाभाविक और स्वतंत्रतापूर्ण तरीके से हो। आज़ाद और स्वाभाविक तरीके से न्याय और इंसाफ के अनुसार जो भी व्यापार किया जाएगा वह ब्याज का विकल्प करार पाएगा। पवित्र क़ुरआन ने ‘बैअ’ का शब्द प्रयुक्त किया है। चूँकि कारोबार और व्यापार की बहुत बड़ी शक्ल ‘बैअ’ है। बल्कि शायद सबसे बड़ी शक्ल ‘बैअ’ है। इसलिए पवित्र क़ुरआन ने ‘बैअ’ यानी क्रय-विक्रय को बतौर शीर्षक के अपनाया है।
हनफ़ी फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने ‘बैअ’ की परिभाषा की है “जब दो पक्ष आपस की सहमति से एक माल का तबादला दूसरे माल से करते हैं तो इसको ‘बैअ’ कहा जाता है।” इसी का नाम व्यापार है। इसी का नाम कारोबार है। इसी का नाम बिजनेस है। इसी का नाम पूँजी निवेश है। आप एक व्यक्ति को नकद रकम दे रहे हैं जो आपका माल है, उससे इंडस्ट्री खरीद रहे हैं जो उसका माल है। आप इंडस्ट्री से नया माल तैयार कर रहे हैं, लोग आकर आपसे खरीद रहे हैं। वे अपना माल आपको दे रहे हैं, आप अपनी पैदावार उनको दे रहे हैं। कहने का मतलब यह कि पूँजी निवेश और व्यापार की जितनी बड़ी-बड़ी शक्लें हैं उन सबमें क्रय-विक्रय का तत्व अनिवार्य रूप से पाया जाता है। इसलिए पवित्र क़ुरआन ने ‘बैअ’ का शब्द प्रयुक्त करके यह स्पष्ट इशारा भी दिया है कि व्यापार और लेन-देन की बुनियाद माल पर यानी वास्तविक पूँजियों पर होनी चाहिए। मात्र आभासी आधार पर, मात्र कर्जों के आधार पर कारोबार और पूँजी निवेश का कार्य नहीं होना चाहिए।
बैअ’ की जो परिभाषा हनफ़ी विद्वानों ने की है, शेष फ़ुक़हा की परिभाषाएँ भी उससे भिन्न नहीं हैं। शब्दों का अन्तर है। अर्थ और उद्देश्य सबका एक है। उदाहरण के रूप में मशहूर शाफ़ई फ़क़ीह अल्लामा रमली ने, जिनको ‘अल-शाफ़ई अल-सग़ीर’ भी कहा जाता है, उन्होंने अपनी किताब में ‘बैअ’ की परिभाषा यह की है कि ‘बैअ’ से मुराद वह अनुबंध है जिसमें संबंधित शर्तों के साथ माल का मुकाबला माल से किया जाए।
हदीसों में व्यापार और कारोबार के बारे में जो निर्देश दिए गए हैं, जो बहुत विस्तृत निर्देश हैं, उनमें ज़्यादा ज़ोर ‘बैअ’ पर ही दिया गया है। मुहद्दिसीन ने भी अपनी किताबों में ‘बैअ’ का शीर्षक लगाया है, लेकिन मुराद उनकी व्यापार और कारोबार ही है। कुछ मुहद्दिसीन ने उदाहरणार्थ इमाम इब्ने माजा ने ‘तिजारात’ का शीर्षक अपनाया है और इसमें ‘बैअ’ के आदेशों को बयान किया है।
व्यापार, बैअ और कारोबार के बारे में एक मूलभूत बात जो मैं पहले भी बता चुका हूँ, उसको यहाँ भी याद रखना चाहिए, वह यह कि लेन-देन में, व्यापारिक और दीवानी मामलों में, अस्ल जायज़ होना है। यानी कारोबार की हर किस्म, लेन-देन की हर किस्म जायज़ है, शर्त यह है कि वह उन हराम तत्वों से पाक हो जिनको शरीअत ने हराम करार दिया है। इसलिए आधुनिक प्रकार के जितने मामलात हैं, चाहे वे किसी पारंपरिक अरबी इस्लामी शब्दावली के तहत आ सकते हों या न आ सकते हों, वे सब जायज़ हैं, शर्त यह है कि वे पवित्र क़ुरआन और हदीसों की नुसूस (स्पष्ट आदेशों) से टकराते न हों और उन सर्वसम्मत नियमों से टकराते न हों जो फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने पवित्र क़ुरआन और सुन्नत से लिए हैं।
यह बात कि मामलात में अस्ल जायज़ होना है, व्यापार और कारोबार में बहुत आज़ादी प्रदान करती है। इससे व्यापार और कारोबार से जुड़े लोगों को इतना खुला मैदान मिल जाता है कि वे अपने व्यापार के लिए जो-जो शक्लें अपनाना चाहें, जो-जो शक्लें बताना चाहें, दुनिया में प्रचलित तरीके जहाँ-जहाँ से भी प्राप्त करना चाहें, वे प्राप्त करने में आज़ाद हैं। शरीअत को इस पर कोई आपत्ति नहीं है, शर्त यह है कि वे उन मुहर्रमात (हराम ठहराई हुई बातों) से पाक हों जिनका विवरण पहले बयान किया जा चुका है। उदाहरण के रूप में उसमें रिबा न हो, उसमें क़िमार (जुआ) न हो, ग़रर (धोखाधड़ी) न हो, वगैरह-वगैरह। यह उसूल फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने पवित्र क़ुरआन के कई निर्देशों से और कई हदीसों से लिया है। एक मशहूर हदीस जिसको इमाम बुखारी और मुस्लिम दोनों ने बयान किया है, और भी कई मुहद्दिसीन के यहाँ वह उल्लेख मिलता है। अल्लाह के रसूल ﷺ ने फरमाया, “मुसलमान आपस में जो शर्तें तय करना चाहें वे कर सकते हैं, जिस तरह का मामला और जो कारोबार करना चाहें, जिन शर्तों के साथ तय करना चाहें तय कर सकते हैं, उनको इजाजत है, अलबत्ता वे कोई ऐसी शर्त नहीं रख सकते जो शरीअत के किसी हलाल को हराम कर दे या शरीअत के किसी हराम को जायज़ करार दे दे।” यानी शरीअत के मुहर्रमात (हराम ठहराए हुए कामों) और मनहियात (निषिद्ध कामों) का ध्यान रखते हुए, शरीअत के तकाजों को सामने रखते हुए व्यापार और कारोबार का हर रूप जायज़ है। उदाहरणार्थ क्रय-विक्रय के लिए ज़रूरी है कि ‘माल-ए-मुतक़व्विम’ हो। ‘माल-ए-मुतक़व्विम’ में शराब और सूअर शामिल नहीं हैं। इसलिए शराब और सूअर के अलावा जिस चीज़ की बैअ होगी, जिस चीज़ को मुसलमान माल समझते हों और उसको प्राप्त करना चाहते हों, जिसकी तरफ लोगों का ध्यान और रुझान हो, वह व्यापार और कारोबार की बुनियाद बन सकती है।
व्यापार और कारोबार की जो शक्लें व्यापारिक क्षेत्र बनाना चाहें वे बना सकते हैं, बस शर्त यह है कि वे शरीअत के मुहर्रमात का उल्लंघन न करती हों। इन मुहर्रमात से बचने के लिए शरीअत के आदेशों के पालन को निश्चित बनाने के लिए ज़रूरी है कि उन आम नियमों का ध्यान रखा जाए जो फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने बताए हैं। इन नियमों का विवरण ‘व्यापार के आदेश’ के शीर्षक से और पवित्र क़ुरआन और हदीसों के स्पष्ट आदेशों के हवाले से बयान किया जा चुका है।
दूसरा उसूल मामलात में यह है कि शरीअत ने जितने आदेश दिए हैं वे, जितने मुहर्रमात बयान किए हैं वे, और जिन-जिन चीज़ों की मुसलमानों से आशा की जा सकती है वे, ये सब वे मामले हैं जिनकी बुनियाद इंसानों के निहितार्थों और इंसानों के लाभ पर है। जिन चीज़ों को शरीअत ने मस्लहत (निहितार्थ) करार दिया है, जो-जो चीज़ें इंसानों के हित और निहितार्थ के अनुसार हैं और शरीअत से टकराती नहीं हैं, उनका ध्यान मामलों में रखना चाहिए। यानी आम लोगों की जान को सुरक्षित रखनेवाले मामले, आम लोगों को सुरक्षा प्रदान करनेवाले मामले, आम लोगों के लिए रोज़ी के साधन उपलब्ध करनेवाले मामले, आम लोगों की ज़िंदगी में सुविधाएँ पैदा करनेवाले मामले, लोगों के जीवन-स्तर को वैध सीमाओं के अंदर बेहतर बनानेवाले मामले, इन सबका ध्यान व्यापार और कारोबार के तौर-तरीक़ों में रखा जाएगा। और कोई ऐसा कारोबार करने की इजाजत नहीं दी जाएगी जिससे इन उद्देश्यों के रास्ते में रुकावट पैदा होती है।
उदाहरण के रूप में अगर कोई वर्ग ऐसा कोई कारोबार करना चाहे, कोई ऐसी चीज़ बेचना चाहे, जो आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए घातक हो तो यह सही नहीं होगा और राज्य की ज़िम्मेदारी होगी कि उसको नियंत्रित करे। अगर कुछ लोग ऐसे पेय पदार्थ प्रचलित करना चाहते हैं और उनका व्यापार करना चाहते हैं जिससे इस्लामी राज्य के वासियों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता हो या राज्य की आर्थिक स्वायत्तता प्रभावित होती हो तो राज्य हस्तक्षेप करके इन मामलों को रोक सकता है। निहितार्थ और कारण के उदाहरण दिए जाएँ तो बात बहुत लंबी हो जाएगी। इसलिए मैं ये कुछ मिसालें देना काफी समझता हूँ।
तीसरा बड़ा उसूल यह है कि मामलों और लेन-देन के नियम तय करते हुए उस क्षेत्र और उस ज़माने के आम चलन को सामने रखा जाएगा। हर क्षेत्र के लोगों का एक आम रिवाज होता है। कारोबारी वर्ग का एक रिवाज होता है। वह रिवाज अगर शरीअत और न्याय और इंसाफ से टकराता नहीं है, नैतिकता और शर्म के तकाजों के विरुद्ध नहीं है तो शरीअत उसको स्वीकार करती है। अतः ऐसे हर रिवाज को स्वीकार किया जाएगा और आदेश उसके आधार पर संकलित किए जाएँगे। उदाहरण के रूप में शरीअत के नियमों का तकाजा यह है कि हर क्रय-विक्रय स्पष्ट रूप से दोनों पक्षों की सहमति के आधार पर हो। इस पर तमाम फ़ुक़हा का मतैक्य है। पवित्र क़ुरआन में ‘तराज़ी’ (परस्पर सहमति) का जो सिद्धांत दिया गया है उसका व्यावहारिक तकाजा भी यही है कि स्पष्ट रूप से आपसी सहमति दोनों पक्षों के बीच पाई जानी चाहिए। लेकिन जब फ़ुक़हा ने यह देखा कि बाजार का आम रिवाज हर जगह यह है कि जिन सौदों की कीमतें निर्धारित होती हैं, जिनमें कोई भाव-ताव नहीं करना पड़ता, वहाँ खरीदार आता है, कीमत दुकानदार के सामने रखता है और चीज़ उठाकर चला जाता है। न दुकानदार खरीदार से कुछ कहता है और न खरीदार दुकानदार से कुछ बोलता है। इसलिए फ़ुक़हा ने इसको जायज़ करार दिया। इसलिए कि यह बैअ दोनों पक्षों की पूर्ण परस्पर सहमति से हो रही है। शरीअत का जो सिद्धांत ‘तराज़ी’ का है वह यहाँ प्रभावित नहीं हो रहा है। इसलिए इस सिद्धांत को निश्चित बनाने के लिए जो नियम फ़ुक़हा ने निर्धारित किए थे उन नियमों की यहाँ आवश्यकता नहीं पड़ती।
फ़िक़्ही आदेश और नियम फ़ुक़हा ने शरीअत के उसूलों का पालन करने के लिए संकलित किए हैं। शरीअत के सिद्धांतों को प्रभावित करने या नज़र-अंदाज़ करने के लिए फ़िक़्ही आदेश और नियम संकलित नहीं किए गए। यह बड़ी अहम बात है, और इसको याद रखना चाहिए कि असल चीज़ शरीअत के सिद्धांत और आदेश हैं। शरीअत के सिद्धांतों और आदेशों का पालन करने के लिए, उनको निश्चित बनाने के लिए और उन आदेशों के पीछे कार्यरत उद्देश्यों को व्यवहार में लाने के लिए फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने ‘मसाइल’ संकलित किए हैं। ये मसाइल उसी समय तक काम आनेवाले हैं जब तक उनके द्वारा शरीअत के आदेशों का पालन हो सके और शरीअत के उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। जब ये विस्तृत मसाइल जो फ़ुक़हा ने संकलित करके किताबों में और अपने फ़तवों के द्वारा फ़तवों की किताबों में दर्ज किए हैं, शरीअत के आदेशों का पालन न करा सकें, उनके द्वारा शरीअत के उद्देश्यों की पूर्ति न हो सके तो फिर इन मसाइल पर पुनरीक्षण की ज़रूरत पड़ती है।
कभी-कभी आम प्रचलन के बदल जाने से मसाइल बदल जाते हैं। रिवाज के बदलने से आदेश बदल जाते हैं। वे आदेश नहीं बदलते जिनका स्पष्ट रूप से पवित्र क़ुरआन या सुन्नत में उल्लेख है, बल्कि वे आदेश बदल जाते हैं जिनका आधार इंसानों की समझ या किसी स्थानीय चलन और रिवाज पर है। इसी लिए फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) को व्यापारिक चलन और रिवाज से अवगत होना चाहिए। व्यापार के चलन और रिवाज की जानकारी प्राप्त किए बिना जो मसाइल संकलित किए जाएँगे, वे मसाइल व्यावहारिक मसाइल नहीं होंगे। उनकी हैसियत एक वैचारिक राय से ज़्यादा नहीं होगी और उनका पालन करने में कारोबारी लोगों को मुश्किल पेश आएगी।
यही वजह है कि फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने जब व्यापार और कारोबार के आदेश संकलित किए तो पहले उन्होंने व्यापार और कारोबार के तरीकों की जानकारी प्राप्त की। इमाम मुहम्मद-बिन-हसन-शैबानी (रह.) का यह रवैया मैं कई बार बयान कर चुका हूँ कि जिस ज़माने में वे ‘बैअ’ और कारोबार के आदेश संकलित कर रहे थे, उस ज़माने में वे रोज़ाना एक निर्धारित समय पर बाजार जाया करते थे और बाजार में कुछ देर बैठकर व्यापारियों को व्यापार करते देखते थे। खरीदारों को खरीदारी करते देखते थे। बेचनेवालों को अपनी चीज़ें बेचते हुए देखते थे और यह समझने की कोशिश करते थे कि व्यापारी व्यापार कैसे करते हैं। बाजार में कौन-कौन से तरीके प्रचलित हैं और पूँजी निवेश के कौन-कौन से अंदाज़ बाजार में प्रचलित हैं।
आजकल के हिसाब से हम कह सकते हैं कि जो लोग व्यापार और पूँजी निवेश के इस्लामी आदेश संकलित करें उनको आधुनिक काल का वाणिज्य यानी कॉमर्स, आधुनिक काल के व्यवसाय प्रबंधन यानी बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, अर्थव्यवस्था और देश के आर्थिक और व्यापारिक क़ानूनों की आवश्यकता भर जानकारी होनी चाहिए। इसी लिए मैं समय-समय पर यह निवेदन करता रहता हूँ कि दीनी तालीम के पाठ्यक्रम में — वह दीनी तालीम मदरसों में हो रही हो, यूनिवर्सिटियों में हो रही हो या कॉलेजों में हो रही हो — प्रचलित क़ानून, अर्थव्यवस्था, प्रचलित राजनीति शास्त्र और संवैधानिक धारणाओं, व्यापार-ज्ञान और प्रबंधन आदि को ज़रूरत-भर शामिल किया जाना चाहिए। ‘ज़रूरत-भर’ की शर्त इसलिए लगानी ज़रूरी है कि इन संस्थाओं की मूल विशिष्टता इस्लामी ज्ञान-विज्ञान हैं। यहाँ उलूमे-हदीस, उलूमे-तफ़सीर और उलूमे-फ़िक्ह ही में विशिष्टता के लिए लोग आना चाहते हैं और इसी के लिए आना चाहिए। लेकिन हदीस, फ़िक्ह और तफ़सीर की विशिष्टता को आधुनिक काल में व्यवहार में लाने के लिए, और अपनी ज़िंदगियाँ उसके अनुसार ढालने में मदद देने के लिए ज़रूरी है कि आज के क़ुरआन के ज्ञाता, हदीस के ज्ञाता और फ़ुक़हा को आजकल के मुहावरों की जानकारी हो। आजकल की समस्याओं और मुश्किलों की भली-भाँति जानकारी हो।
मामलात (व्यवहार) की चौथी बुनियादी और महत्वपूर्ण बात यह है कि शरीअत के दूसरे आदेशों की तरह मामलात में भी दो पहलू पाए जाते हैं। इन मामलात में विशुद्ध क़ानूनी और अदालती पहलू भी पाया जाता है और खालिस दीनी, धार्मिक और नैतिक पहलू भी पाया जाता है। वह बात जिसको फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्री) ‘दियानतन’ (ईमानदाराना तौर पर) और ‘क़ज़ाअतन’ (न्याय की रोशनी में) की शब्दावली से परिभाषित करते हैं, वह मामलात में पूरे तौर पर मौजूद है। मामलात के कुछ पहलू ऐसे हैं कि जो ‘दियानतन’ आपत्तिजनक हो सकते हैं, लेकिन चूँकि अदालत और क़ानून ज़ाहिरी मामलात पर फैसला करने के पाबंद हैं इसलिए वे ज़ाहिरी मामलात की बुनियाद पर ही फैसला करेंगे और हो सकता है कि उनका फैसला हकीकत के एतिबार से अलग हो। यह नाजुक और सूक्ष्म अन्तर तमाम फ़ुक़हा के यहाँ पाया जाता है। लेकिन इस अन्तर का ध्यान ज़्यादा स्पष्टता के साथ हनफ़ी फ़ुक़हा ने रखा है। इसलिए बहुत-सी ज़ाहिरी बातों को देखनेवाले विद्वानों ने हनफ़ी फ़ुक़हा की राय को समझने में मुश्किल महसूस की है और हनफ़ी फ़ुक़हा के दृष्टिकोण को कुछ जगह नस्स यानी पवित्र क़ुरआन की आयत और हदीसों के ज़ाहिरी शब्दों से टकराता करार दिया है।
‘फ़िक्हुल-मुआमलात’ की पाँचवीं बुनियादी बात यह है कि शरीअत ‘फ़िक्हुल-मुआमलात’ को एक इजतिमाई और सामाजिक मामला समझती है। व्यापार और कारोबार मात्र किसी व्यक्ति का कोई निजी मामला नहीं है। अगरचे यह एक पहलू से व्यक्ति का निजी मामला भी है। लेकिन इसकी हैसियत केवल किसी निजी या व्यक्तिगत मामले की नहीं है, बल्कि हर व्यापार के सामूहिक प्रभाव होते हैं। पूरे समाज के सामूहिक जीवन पर कारोबार और व्यापार के प्रकार से अन्तर पड़ता है। अगर कारोबार जायज़ तरीके से हो रहा हो तो समाज का रंग और होता है, अगर कारोबार नाजायज़ तरीके से हो रहा हो तो समाज का अंदाज़ और होता है। इसलिए शरीअत ने मामलात के बारे में जो आदेश दिए हैं उसमें समाज के इस्लामी चरित्र, समाज के नैतिक गठन और समाज के आध्यात्मिक रंग की सुरक्षा के उद्देश्य को भी सामने रखा है।
ये वे कुछ आधारभूत बातें हैं जिनको फ़िक्हे-इस्लामी में मामलात के आदेश और मसाइल संकलित करते हुए सामने रखा गया है और आगे भी रखा जाना चाहिए। यानी सबसे पहले पवित्र क़ुरआन के नुसूस (स्पष्ट आदेश), फिर प्रमाणित सुन्नतों के आदेश, फिर उम्मत के विद्वानों के निकट सर्वसम्मत नियम एवं सिद्धांत और फिर ये बातें जिनका मैंने उल्लेख किया। इन सबको सामने रखते हुए इन सीमाओं के अंदर जो विकल्प भी कोई व्यक्ति प्रस्तावित करेगा वह वैध रूप से शरई विकल्प होगा और उसका पालन करना शरीअत के आदेशों का पालन करना समझा जाएगा।
यह बात मैं बार-बार इसलिए कहना चाह रहा हूँ कि कुछ लोगों के ज़ेहन में यह ग़लत-फ़हमी पाई जाती है कि ब्याज के इस्लामी विकल्प के लिए ज़रूरी है कि वह फ़िक्ह की किताबों में लिखे हुए इन व्यापार के गिने-चुने तरीकों या उपनिवेशवादी तरीकों के सौ प्रतिशत अनुसार होना चाहिए। और अगर वह उनमें से किसी एक के सौ प्रतिशत अनुसार न हो तो फिर वह नाजायज़ होगा। यह विचार सही नहीं है। उदाहरण के रूप में हनफ़ी फ़ुक़हा ने जब ‘मुशारका’ की कुछ किस्में बयान की हैं, शिराकते-इनान, वुजूह और मुफ़ावज़ा वगैरह-वगैरह, तो वे इसलिए नहीं बयान कीं कि पवित्र क़ुरआन में इसका आदेश दिया गया है।
[शिराकते-इनान : दो या अधिक साझेदारों का माल और उपभोग बराबर होने को ‘शिराकते-इनान’ कहते हैं। शिराकते-इनान में दोनों साझेदार अपना माल और मेहनत बराबर पेश करते हैं।
शिराकते-वुजूह : दो या अधिक व्यक्ति एक चीज़ साझी ज़िम्मेदारी पर खरीदते हैं। फिर जब उसे बेचते हैं, तो उससे जो लाभ प्राप्त होता है उसे निर्धारित शर्तों के अनुसार बाँट लेते हैं। (इस प्रकार हानि से भी दोनों प्रभावित हो सकते हैं) इस अनुबंध को शिराकते-वुजूह कहते हैं।
शिराकते-मुफ़ावज़ा : इसमें हर साझेदार दूसरे को आर्थिक एवं शारीरिक साझेदारी के पूर्णाधिकार देता है।——अनुवादक]
न पवित्र क़ुरआन में शिराकते-इनान का ज़िक्र है, न मुफ़ावज़ा का ज़िक्र है, न वुजूह का ज़िक्र है। हदीसों में भी उनमें से किसी का ज़िक्र नहीं है। हनफ़ी फ़ुक़हा ने इन शीर्षकों को इसलिए संकलित किया है, ये शब्दावलियाँ इसलिए प्रयुक्त की हैं कि उनके ज़माने में ‘मुशारका’ के जो प्रचलित तरीके थे वे यही थे। इन तरीकों का हनफ़ी फ़ुक़हा ने जायज़ा लिया। जायज़ा लेने के बाद जो तरीके जायज़ थे, उनको इन शीर्षकों के तहत बयान किया। उनमें जो पहलू नाजायज़ महसूस किए, उनकी निशानदेही की और उनके जायज़ पहलुओं के आदेश संकलित कर दिए। जो पहलू जायज़ थे उनको बरकरार रखा और उनको और भी आसान बनाने के लिए उनका विवरण संकलित कर दिया।
आज अगर शिराकते-इनान और मुफ़ावज़ा वगैरह के अलावा ‘मुशारका’ का कोई ऐसा नया तरीका अपनाया जाता है जो रिबा (ब्याज), ग़रर (धोखाधड़ी), और क़िमार (जुआ) वगैरह से पाक हो तो उसकी वही हैसियत होगी जो शिराकते-इनान और ‘मुज़ारबा’ या ‘मुफ़ावज़ा’ की उस ज़माने में करार दी गई थी।
व्यापार और लेन-देन के आदेशों में असल चीज़ लोगों के दरमियान लेन-देन और अनुबंध है। जिसको फ़ुक़हा ने ‘अक़्द’ के शब्द से परिभाषित किया है। दरअसल अक़्द उस संबंध का नाम है जो उन दो पार्टियों के दरमियान पाया जाता है जो आपस में किसी प्रकार का लेन-देन कर रही हों। किसी प्रकार का भी लेन-देन जिसकी बुनियाद किसी धन या लाभ पर हो, या सेवाओं पर या जायज़ लाभ पर हो, उसको ‘अक़्द’ कहा जाता है। फ़ुक़हा ने प्रचलित अनुबंधों को सामने रखकर उनकी बहुत-सी किस्में बयान की हैं, और उनके बहुत-से आदेश संकलित किए हैं। अक़्द की किस्में यों तो बहुत-सी हैं, लेकिन एक किस्म बहुत आसान है और महत्वपूर्ण है, जिससे अक़्द के बहुत-से आदेशों को समझने में मदद मिलती है।
इस विभाजन की दृष्टि से अक़्द की तीन किस्में हैं। पहली किस्म तो वह है जो दोनों पक्षों के लिए अनिवार्य हो। जैसे अक़्दे-बैअ। आपने एक चीज़ खरीदी, बेचनेवाले को कीमत अदा कर दी। उसने सौदा आपके सुपुर्द कर दिया। अब यह दोनों के लिए लाज़िमी है। न वह आपकी अनुमति के बिना अपना सौदा वापस ले सकता है, न आप उसकी अनुमति के बिना सौदे को रद्द कर सकते हैं। जब सौदा फ़ाइनल तौर पर तय हो जाए, ख़ियार और शर्तें वगैरह तमाम पूरी हो जाएँ तो यह अक़्दे-लाज़िम हो जाता है। इसी तरह से इजारा है, या सुल्ह, या हवाला, मुज़ारआ, यह सब अक़्दे-लाज़िम की हैसियत रखते हैं। अक़्दे-लाज़िम एक बार जब घटित हो जाए तो फिर कोई पक्ष एकतरफा तौर पर उससे बाहर नहीं आ सकता।
दूसरी किस्म अक़्दे-जायज़ कहलाती है जो दोनों पक्षों के लिए जायज़ होता है। दोनों पक्ष जब चाहें उसको खत्म कर सकते हैं और इस बंदिश से बाहर आ सकते हैं। उदाहरणार्थ ‘मुशारका’ अक़्दे-जायज़ है। दो पक्ष मिलकर ‘मुशारका’ करते हैं। एक पक्ष जब चाहे वापस आ जाए। उदाहरणार्थ दस आदमियों ने मिलकर एक कंपनी बनाई। जब कंपनी ने काम करना शुरू कर दिया तो एक पक्ष अपनी पूँजी लेकर अलग होना चाहता है, इसमें कोई रुकावट नहीं है, जब चाहे अलग हो जाए। दो पक्ष अलग होना चाहें तो अलग हो जाएँ। इस तरह के अनुबंधों में ‘मुशारका’, ‘मुज़ारबा’, ‘वकाला’ वगैरह शामिल हैं।
अक़्द की तीसरी किस्म वह अक़्द है जो किसी एक पक्ष के लिए अनिवार्य हो। दोनों के लिए नहीं, एक के लिए अनिवार्य हो। उदाहरणार्थ किफ़ाला, रहन। रहन एक के लिए अनिवार्य है। ज़ाहिर है जिस पक्ष ने अपने क़र्ज़ की वापसी या रकम की वुसूली को निश्चित बनाने के लिए रहन लेकर अपने पास रखा है वह अगर खत्म करना चाहे तो कर सकता है। जिसने रहन रखवाया है, जिसने अपनी चीज़ रहन रखी है उसको यह आज़ादी नहीं है कि जब चाहे एकतरफा तौर पर अपना रहन रखा हुआ माल वापस ले ले। ज़ाहिर है उसने तो अपनी मर्ज़ी से रहन नहीं रखा। मुरतहिन (रहन में दूसरे की वस्तु अपने पास रखनेवाला) की माँग पर ही उसने रहन रखा है। लिहाज़ा मुरतहिन के लिए यह रास्ता खुला है कि जब चाहे रहन को खत्म कर दे। यह अनुबंध केवल राहिन (रहन में अपनी वस्तु देनेवाला) के लिए अनिवार्य है। वह एकतरफा तौर पर खत्म नहीं कर सकता।
इन तीनों प्रकार के अनुबंधों में यह ज़रूरी है कि अनुबंध करनेवाले यानी दोनों पक्ष कुछ शर्तों पर पूरे उतरते हों। समझदार, वयस्क होना तो दुनिया के शेष क़ानूनों में ज़रूरी भी माना जाता है कि अक़्द के लिए समझदार होना भी ज़रूरी है और बालिग होना भी। शरीअत ने इसके लिए कुछ और आदेश भी रखे हैं। उदाहरण के रूप में उसके उपभोग पर कोई प्रतिबंध, अदालत या क़ानून की तरफ से न लगाया गया हो, इस प्रतिबंध को ‘हिज्र’ कहा जाता है। शरीअत में ‘हिज्र’ के विस्तृत आदेश दिए गए हैं। यह आदेश खुद पवित्र क़ुरआन ने दिए हैं। “और अपने माल नासमझ लोगों के सुपुर्द न करो।” (क़ुरआन, 4:5) यह निर्देश खास तौर पर यतीमों के उन संरक्षकों के लिए है या यतीमों के उन औसिया (जिनके पक्ष में वसीयत की गई हो) के लिए है, जिनके उपयोग या प्रबंधन में किसी यतीम का माल हो। उनको हिदायत है कि उस समय तक उनका माल उनके हवाले न करो जब तक उनमें समझ-बूझ पैदा न हो जाए। यानी समझ-बूझ के पैदा होने तक एक कम समझ और नासमझ बच्चे पर पाबंदी है, वह अपने माल में, अपने बाप-दादा से मिली हुई जायदाद का उपभोग नहीं कर सकता। इसलिए कि शरीअत ने माल को बरबाद करने की मनाही की है। माल को बरबाद करना हराम है। एक व्यक्ति जो समझ-बूझ नहीं रखता, जब उसको बैठे-बिठाए बाप-दादा की दौलत मिलेगी तो वह उसको बरबाद करेगा। माल को बरबाद करना शरीअत की मंशा के खिलाफ है। इसलिए शरीअत का निर्देश यह है कि माल को बरबाद होने से बचाने के लिए उसका प्रबंध उस समय तक उसके मालिक को न दिया जाए जब तक उसमें समझ-बूझ पैदा न हो जाए। इस पाबंदी को फ़िक्ह की शब्दावली में ‘हिज्र’ कहा जाता है। इसलिए अनुबंध की एक शर्त यह भी है कि उसके किसी पक्ष पर ‘हिज्र’ न लगाया गया हो। यानी कोई एक पक्ष प्रतिबंध के अधीन या ‘हिज्र’ के अन्तर्गत न आता हो।
चौथी शर्त यह है कि दोनों पक्षों की सहमति पूरे तौर पर मौजूद हो। यह सिद्धांत स्वयं पवित्र क़ुरआन में आया है, ‘तराज़ी’ के सिद्धांत की व्याख्या पवित्र क़ुरआन में मौजूद है। हर वह चीज़ जिसके नतीजे में ‘तराज़ी’ की शर्त प्रभावित हो वह अनुबंध के औचित्य को प्रभावित करती है। फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने इन चीज़ों के लिए ‘उयूबे-तराज़ी’ या ‘उयूबे-रज़ा’ का शब्द प्रयुक्त किया है। उदाहरण के रूप में ‘इकराह’ (अप्रियता के साथ) को फ़ुक़हा ने ‘तराज़ी’ के खिलाफ करार दिया है, जबर और ज़बरदस्ती से किसी व्यक्ति ने किसी की चीज़ औने-पौने दामों खरीद ली। इससे ‘बैअ’ फासिद (दूषित) हो जाती है। हमारे देश में ऐसी मिसालें मौजूद हैं कि राजनैतिक प्रभाव और सत्ता के बल पर विरोधी पक्ष की ज़मीनें, जायदादें, फैक्टरियाँ, कंपनियाँ औने-पौने दामों खरीद लीं और अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बेच दीं। यह ‘इकराह’ है और ‘उयूबे-तराज़ी’ में से है। इसके नतीजे में जो क्रय-विक्रय या व्यापार होगा वह जायज़ नहीं होगा। न मिल्कियत जायज़ होगी, न मिल्कियत के हस्तांतरण को स्वीकार किया जाएगा।
‘उयूबे-तराज़ी’ में अक़्द का अयोग्य होना भी शामिल है। कोई एक पक्ष योग्यता न रखता हो तो उसके नतीजे में भी समझा जाएगा कि ‘तराज़ी’ मौजूद नहीं है। उदाहरणार्थ एक तरफ बच्चा है या पागल है, ज़मीन बच्चे के नाम है और बच्चे को बहला-फुसलाकर उसकी रज़ामंदी प्राप्त कर ली जाए तो यह विश्वसनीय नहीं है। ग़लत-फ़हमी के नतीजे में प्राप्त की जानेवाली रज़ामंदी विश्वसनीय नहीं है। यह और इस तरह के मामलात ‘उयूबे-तराज़ी’ कहलाते हैं।
‘बैअ’ के औचित्य की शर्तें क्या हैं। कुछ शर्तों का उल्लेख तो इन्हीं में आ गया। एक शर्त मैं पहले भी ज़िक्र कर चुका हूँ कि वह ‘माल-ए-मुतक़व्विम’ हो। दूसरी शर्त हदीसों के संदर्भ में बयान हुई थी कि ‘शै-ए-मबीअ’ (बेची जानेवाली वस्तु) बाए (बेचनेवाले) की मिल्कियत में हो। हदीस में ऐसी चीज़ के बेचने से मना किया गया है जो अभी मिल्कियत में न आई हो और क़ब्ज़े में न आई हो। कहा गया, “किसी ऐसी चीज़ को मत बेचो जो तुम्हारी मिल्कियत में न हो।” जब कोई चीज़ खरीदो तो जब तक तुम्हारे क़ब्ज़े में न आ जाए उसको आगे न बेचो।
फिर यह भी ज़रूरी है कि जिस चीज़ को आप बेच रहे हैं वह आप खरीदार के सुपुर्द करने की क्षमता रखते हों। आज सुपुर्द कर सकें या आइंदा किसी निश्चित तिथि पर सुपुर्द कर सकें। क्रय-विक्रय के जायज़ होने के लिए यह भी ज़रूरी है कि कीमत और जो चीज़ क्रय-विक्रय की जा रही है, ये दोनों स्पष्ट रूप से स्पष्ट और निर्धारित हों। खरीदनेवाले को पता हो कि वह क्या खरीद रहा है, बेचनेवाले को इल्म हो कि वह क्या बेच रहा है। एक अहम शर्त यह भी है कि ‘बैअ’ फ़ाइनल और क़तई हो। किसी शर्त से जुड़ी हुई या किसी आइंदा घटनेवाली घटना पर निर्भर न हो, कि अगर फलाँ काम हो गया तो मैं यह बेच दूँगा। यह ‘बैअ’ नहीं है, यह वादा-ए-बैअ है। बेचने का वादा है, अगर बेचनेवाला इस वादे की पाबंदी करे तो अच्छी बात है, न करे तो आप उसको क़ानूनी तौर से वह चीज़ बेचने पर मजबूर नहीं कर सकते। अल्लाह तआला के यहाँ वह वादे की खिलाफ़वर्ज़ी का अपराधी माना जाएगा और वादे की खिलाफ़वर्ज़ी करनेवालों के साथ अल्लाह तआला जो भी सुलूक करेगा यह व्यक्ति भी उसका हक़दार होगा, लेकिन इस दुनिया के मामलों की हद तक यह वादा-ए-बैअ है, ‘बैअ’ नहीं है।
एक और शर्त यह है जो पवित्र क़ुरआन के स्पष्ट शब्दों से ली गई है कि हर व्यक्ति अपनी मिल्कियत में जो उपभोग करना चाहे वह कर सकता है। आपके पास गाड़ी है, आप उसको बेचना चाहते हैं, बेच सकते हैं। खुद इस्तेमाल करना चाहें खुद इस्तेमाल कर सकते हैं। किसी को हदिया (उपहार) देना चाहें तो आप हदिया दे सकते हैं। किराए पर चलाना चाहें तो आप किराए पर चला सकते हैं। जायज़ इस्तेमाल की जितनी शक्लें हो सकती हैं उसमें आपको अधिकार है जिस तरह चाहें इस्तेमाल करें। लेकिन इस इस्तेमाल का एक नियम और एक सीमा है। वह सीमा यह है कि आप अपने जायज़ स्वामित्व में आनेवाली किसी चीज़ का इस ढंग से इस्तेमाल नहीं कर सकते कि उससे किसी दूसरे व्यक्ति का नुक़्सान हो।
तमाम फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने सर्वसहमति से यह उसूल बयान किया है जो कुछ हदीसों से लिया गया है। अल्लामा इब्ने आबिदीन जो बाद के हनफ़ी फ़ुक़हा में बहुत ऊँचा मुकाम रखते हैं, उन्होंने एक जगह लिखा है कि मूल सिद्धांत यह है कि व्यक्ति को अपनी खालिस मिल्कियत में उपभोग करने की पूरी आज़ादी है। लेकिन अगर इस उपभोग के नतीजे में किसी दूसरे को स्पष्ट रूप से कोई नुक़्सान हो रहा हो या कोई मुश्किल पेश आ रही हो, या कोई नुक़्सान पहुँच रहा हो तो इस उपभोग की मनाही कर दी जाएगी और उसकी अनुमति नहीं दी जाएगी।
मैं पहले बता चुका हूँ कि हदीसों में छप्पन प्रकार के कारोबारों और ‘बुयूअ’ (सौदों) की मनाही की गई है। यह वे बुयूअ हैं जिनमें या तो रिबा पाया जाता है या रिबा का हल्का-सा असर है या रिबा की संभावना है, या ग़रर (धोखा) है या क़िमार (जुआ) है या ग़रर और क़िमार का हल्का-सा असर है या संभावना पाई जाती है या उनके नतीजे में रिबा, ग़रर या क़िमार वगैरह का रास्ता खुलता है। इन तमाम प्रकार की ‘बुयूअ’ (सौदों) को शरीअत ने निषिद्ध करार दिया है।
उदाहरण के रूप में उनमें से एक ‘बैउल-ऐना’ है। ‘बैउल-ऐना’ यह है कि एक सौदा उधार कीमत पर बेच दे और उसके बाद कम कीमत पर उसी बेचनेवाले से नकद खरीद ले। बज़ाहिर ये दो अलग-अलग मामले हैं और अलग-अलग इन दोनों मामलों को देखा जाए तो ये जायज़ ही मालूम होते हैं। आप अपनी कोई चीज़ उधार कीमत पर बेचना चाहें तो आपको उसकी अनुमति है। किसी दूसरे व्यक्ति से कोई चीज़ आप खरीदना चाहें और बाजार से कम कीमत पर लेना चाहें तो इसकी भी अनुमति है। लेकिन यहाँ इन दोनों जायज़ मामलों को मिलाया गया है। यों मिलाए जाने का प्रेरक या जज़्बा यह है कि अप्रत्यक्ष रूप से ब्याज का एक हीला उपलब्ध किया जाए। ब्याज में क्या होता है? ब्याज में यह होता है कि व्यक्ति किसी से साल या दो साल या उदाहरणार्थ छः महीने के लिए रकम उधार लेता है और यह तय करता है कि जब वापस करूँगा तो एक लाख के एक लाख पच्चीस हज़ार वापस करूँगा। यह पच्चीस हज़ार की बढ़ोतरी ‘रिबा’ है।
‘बैउल-ऐना’ इसी ब्याज का एक हीला है। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति अपनी पुरानी गाड़ी या मोटर साइकिल एक लाख पच्चीस हज़ार रुपये में बेचता है। यह एक लाख पच्चीस हज़ार रुपये उधार हैं और एक साल के दौरान क़िस्तों में चुकाने होंगे। अब मामले की शक्ल यह बनी कि इस व्यक्ति के ज़िम्मे जिसने यह मोटर साइकिल खरीदी है एक लाख पच्चीस हज़ार रुपये भुगतान करने हैं। अब यह मोटर साइकिल अपने क़ब्ज़े में लेने के बाद दोबारा उसी बेचनेवाले को एक लाख रुपये नकद में बेच देता है। और एक लाख रुपये उससे तुरंत वुसूल कर लेता है। अब खुलासा यह हुआ कि इस व्यक्ति को एक लाख रुपये मिले और एक लाख रुपये मिलने के बाद जो उसको चुकाने हैं वह एक लाख पच्चीस हज़ार हैं। इसका नाम ब्याज है। मोटर साइकिल तो दरमियान में मात्र एक वसीले या ज़रिए के तौर पर इस्तेमाल हुई, असल उद्देश्य एक लाख वुसूल करके एक लाख पचपन हज़ार वापस करना है। इसलिए यह हीला शरीअत के अनुसार जायज़ नहीं है और यह बात भी मैं पहले बता चुका हूँ कि लेन-देन के मामलात में, अनुबंधों में व्यापार के मामलों में असल एतिबार हकीकत और अर्थ का होता है, शब्दों और इबारत का नहीं होता। इस एक मिसाल से यह अंदाज़ा हो गया होगा कि शरीअत में जिस तरह के छप्पन मामलों को हराम करार दिया गया है वे क्यों हराम करार दिए गए हैं और उनके हराम किए जाने की हिकमत (तत्वदर्शिता) या मस्लहत (निहितार्थ) क्या है।
इसी तरह से हदीस में ‘बैउल-मुज़ाबना’ की मनाही है। ‘बैउल-मुज़ाबना’ के नाम से क्रय-विक्रय का एक तरीका मदीना मुनव्वरा में अल्लाह के रसूल ﷺ के ज़माने में जारी था। मदीना मुनव्वरा में था, तो हो सकता है कि दूसरे खेतीवाले शहरों में भी होता हो। होता यह था कि एक व्यक्ति अपनी खजूर या अपना गेहूँ या कोई कृषि उत्पादन जो उसके पास तौला हुआ निश्चित वज़न के साथ मौजूद होता था वह दूसरे किसी व्यक्ति की वृक्ष पर लगी हुई चीज़ को इस तौली हुई चीज़ के मुकाबले में बेच देता था। और जो वृक्ष पर लगी होती थी उसकी तादाद और मालियत का मात्र अंदाज़ा कर लिया जाता था। इसको ‘मुज़ाबना’ कहते थे। उदाहरण के रूप में एक व्यक्ति का खजूरों का बाग है। अभी उसकी खजूर पक्की नहीं है, कच्ची है। उसके पकने में अभी तीन-चार महीने या छः महीने बाकी हैं। उसको अभी तुरंत घर के इस्तेमाल के लिए खजूरें दरकार हैं। अब वह यह करता था कि खजूरों के एक व्यापारी के पास जाए, उसके यहाँ से दस मन खजूर उठा ले। अब दस मन खजूर तो निर्धारित तौर पर दस मन है। उसने ले ली। और उसके मुकाबले में यह तय किया कि मेरे बाग में जो खजूर लगी हुई है यह तुम ले लो। यह भी अंदाज़ से दस मन होगी, जब फसल उतरेगी तो यह आप उतार लीजिएगा। यह ‘मुज़ाबना’ कहलाता है और यह जायज़ नहीं है। इसकी वजह यह है कि हो सकता है कि जो खजूर वृक्ष पर से उतरे वह दस मन न हो बल्कि नौ मन हो। मुमकिन है दस के बजाय बारह मन हो। दोनों सूरतों में इसकी संभावना है कि यह कारोबार ‘रिबा’ का रूप ले ले और ‘रिबाउल-फ़ज़्ल’ बन जाए। एक दृष्टि से तो यह ‘रिबाउल-फ़ज़्ल’ ही है। इसलिए कि मैं कल की चर्चा में बता चुका हूँ कि ‘रिबाउल-फ़ज़्ल’ में अगर लेन-देन हाथ-के-हाथ न हो और बराबर-सराबर न हो, दोनों सूरतों में यह ‘रिबाउल-फ़ज़्ल’ हो जाएगा। ‘बैउल-मुज़ाबना’ में यह वास्तविक ‘रिबा’ भी हो जाता है। इसलिए कि आज एक व्यक्ति खजूरें बेच रहा है। छः महीने या चार महीने के बाद उनकी कीमत के तौर पर ज़्यादा मात्रा में खजूरें वुसूल करेगा। इसमें ‘रिबाउल-फ़ज़्ल’ भी पाया जाता है और ‘रिबाउन-सैयेआ’ भी पाया जाता है। इसी प्रकार की एक मिसाल वह है जिसको हदीस में ‘बैउल-कालयी’ कहा गया है। यानी दैन का क्रय-विक्रय दैन के साथ। इससे भी चूँकि ‘रिबा’ का रास्ता खुलता है, इसलिए शरीअत ने इसको भी हराम करार दिया है।
इन हराम कामों से बचते हुए जिनमें से अक्सर का विवरण इन चर्चाओं में आ गया है, व्यापार का जो भी तरीका अपनाया जाएगा वह ‘रिबा’ का विकल्प समझा जाएगा और शरीअत के अनुसार स्वीकार्य होगा। ‘बैअ’ या अक़्द में आपसी सहमति भी ज़रूरी है जिसका उल्लेख किया जा चुका है। आपसी सहमति का विवरण फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने बहुत अधिक बयान किया है। इन विवरणों को बयान करने में कुछ आंशिक और शाब्दिक मतभेद भी फ़ुक़हा के दरमियान पाए जाते हैं। लेकिन इन मतभेदों का कोई मौलिक या वास्तविक महत्व इसलिए नहीं है कि ये मात्र आंशिक या शाब्दिक मतभेद हैं।
असल आधारभूत नियमों और धारणाओं तथा आदेशों पर जो पवित्र क़ुरआन और हदीसों से लिए गए हैं, फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) का मतैक्य है।
फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने ‘रिबा’ के जो विकल्प अपने-अपने ज़माने में प्रस्तावित किए थे या आज प्रस्तावित किए गए हैं उनको पंद्रह शीर्षकों के अन्तर्गत बयान किया जा सकता है। ये पंद्रह शीर्षक इस प्रकार हैं—
1. मुशारका
2. मुज़ारबा
3. मुराबहा
4. ‘बैए-मुअज्जल’
5. इजारा
6. मुज़ारआ
7. मुसाक़ात
8. मुसल्लम
9. इस्तिस्ना
10. इजारा-ए-मुन्तहिया बित्तमलीक
11. तवर्रुक
12. बैए-बित्तक़सीत
13. मुराबहा लिल-आमिर बिश-शरा
14. ‘मुशारका’ मुतनाक़िसा
15. वक़्फ़
इन तमाम तरीकों का आधुनिक काल के तकाजों के अनुसार पूँजी निवेश में अत्यन्त प्रभावी और लाभदायक इस्तेमाल किया जा सकता है और उनमें से अधिकतर का इस्तेमाल विभिन्न इस्लामी बैंकों में शुरू भी हो गया है। आम तौर पर विद्वानों का ख़याल यह है कि इन तमाम तरीकों में जो अत्यन्त उचित, लाभकारी और इस्लामी आदेशों के सबसे क़रीब तरीके हैं, वह मुज़ारबा और ‘मुशारका’ हैं।
मुज़ारबा और ‘मुशारका’ पर आधुनिक काल में काफी काम हुआ है। विद्वानों ने हज़ारों शोध लेख और सैकड़ों किताबें इन विषयों पर लिखी हैं, जिनमें बहुत-से लेखों में मुज़ारबा, मुशारका, इजारा वगैरह के आधुनिक प्रयोगों के बारे में शरीअत की निर्देशों को नए ढंग से बयान किया गया है। मुज़ारबा की मूल आत्मा यह है कि पूँजी एक व्यक्ति की हो और उस पूँजी से मेहनत करनेवाला कोई दूसरा व्यक्ति हो। ये व्यक्ति लोग भी हो सकते हैं, गिरोह भी हो सकते हैं और संस्थाएँ भी हो सकती हैं।
‘मुज़ारबा’ का यह तरीका इस्लाम से बहुत पहले से प्रचलित है। अल्लाह के रसूल ﷺ ने अपनी नौजवानी में नुबूवत से बहुत पहले ‘मुज़ारबा’ की बुनियाद पर कारोबार का आरम्भ किया था। हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का माल लेकर आप व्यापार के लिए तशरीफ ले गए, यह ‘मुज़ारबा’ ही की एक शक्ल थी। बाद में भी खुद अल्लाह के रसूल ﷺ ने और बहुत-से सहाबा किराम ने ‘मुज़ारबा’ की बुनियाद पर कारोबार किए। ‘मुज़ारबा’ में अव्वल तो कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जो शरीअत के आदेशों से टकराती हो। और अगर मान लीजिए इसकी संभावना थी भी तो अल्लाह के रसूल ﷺ ने विभिन्न निर्देशों के तहत जिनमें से अधिकतर का उल्लेख किया जा चुका है, ‘मुज़ारबा’ पर प्रभाव डालनेवाले इन नकारात्मक कारणों और तत्वों का रास्ता बंद कर दिया।
‘मुज़ारबा’ की मूल आत्मा यह है कि पूँजीपति या जिसके पास पूँजी या व्यापार-सामग्री है उसके लिए ज़रूरी नहीं कि वह व्यापार और कारोबार में भी निपुणता रखता हो। दूसरी ओर जो व्यक्ति व्यापार और कारोबार के गुर जानता है और व्यापार का अनुभव रखता है उसके लिए ज़रूरी नहीं है कि वह पूँजी भी रखता हो। इसलिए इन दोनों के साधनों से एक साथ फ़ायदा उठाने के लिए ‘मुज़ारबा’ का तरीका दुनिया में बहुत पहले से प्रचलित है। इस्लामी शरीअत ने इसको बरकरार रखा, इसको जायज़ करार दिया। फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने इसके आदेश संकलित किए।
बीसवीं सदी के मध्य में जब इस्लामी बैंकिंग पर चर्चा और वाद-विवाद का आरम्भ हुआ तो विद्वानों की नज़र सबसे पहले ‘मुज़ारबा’ पर पड़ी। इसलिए कि मुज़ारबा वह कार्य-प्रणाली है जिसको बहुत आसानी के साथ आधुनिक बैंकिंग के उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। जो लोग बैंकों में अपनी रकमें रखते हैं उनकी हैसियत ‘रब्बुल-माल’ (माल के मालिक) की करार दी जा सकती है। गोया वे रब्बुल-माल हैं और वे अपनी पूँजी कारोबार और व्यापार के लिए दे रहे हैं। बैंक की हैसियत एक मुज़ारिब की होगी। जो अपनी पूँजी को आगे ‘मुज़ारबा’ पर दे देता है। फ़िक्ह की किताबों में इस शीर्षक के तहत इस विषय पर बहस होती है ‘बाबुल-मुज़ारिब युज़ारिब’। मुज़ारिब अगर आगे ‘मुज़ारबा’ करना चाहे तो उसको इजाजत है और रब्बुल-माल की अनुमति से कुछ शर्तों के तहत वह आगे दूसरे कारोबारियों से ‘मुज़ारबा’ कर सकता है। चुनाँचे बैंक इन तमाम रकमों को लेकर कुछ रकमें तो खुद कारोबार में लगाता है और शेष रकमों को वह आगे कारोबार के लिए व्यापार करनेवालों को दे देता है। ये एंटरप्रिनियर जो बैंक से पूँजी लेकर व्यापार करते हैं, उद्योग लगाते हैं या कोई और कारोबार करते हैं, यही दरअसल मुज़ारिब हैं, बैंक की हैसियत दरमियानी कर्मचारी की है। यहाँ बैंक की दो हैसियतें हैं। असल रकम देनेवालों के लिए इसकी हैसियत मुज़ारिब की है और असल मुज़ारिब के मुकाबले में उसकी हैसियत रब्बुल-माल की है। इस प्रक्रिया को अगर शरीअत के आदेशों के अनुसार किया जाए तो यह आधुनिक बैंकिंग के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सबसे उचित और लाभदायक कार्य-प्रणाली है।
‘मुज़ारबा’ के आदेशों में थोड़ा-बहुत मतभेद भी है। फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने अपनी राय से जो आदेश संकलित किए उनकी रायों में विभिन्न कारणों से अन्तर पैदा हुआ। आज यह अन्तर हमारे लिए एक ऐसी विविधता का ज़रिया है जिससे हम आधुनिक काल में लाभान्वित हो सकते हैं। जहाँ तक पवित्र क़ुरआन और हदीसों के स्पष्ट आदेशों का संबंध है, फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) के सर्वमान्य नियमों का संबंध है, वे तो सबके निकट सर्वमान्य हैं। लेकिन अगर इजतिहादी मामलों (वे मामले जिनके विषय में क़ुरआन और हदीस में स्पष्ट आदेश नहीं हैं) में एक से अधिक रायें पाई जाती हों तो आज उन रायों की वजह से हमारे लिए यह आसानी है कि यह देख सकें कि आधुनिक काल के तकाजे किस राय पर अमल करने से ज़्यादा पूरे हो सकते हैं। पूँजी निवेश और आर्थिक विकास के उद्देश्यों को किस फ़क़ीह के इजतिहाद (क़ुरआन एवं हदीस के अध्ययन के आधार पर फ़क़ीह की अपनी राय) पर अमल करने से ज़्यादा बेहतर अंदाज़ में प्राप्त किया जा सकता है।
इस सिद्धांत के तहत आधुनिक काल में ‘मुज़ारबा’ के जो नियम और आदेश संकलित हुए हैं उनका पूरी दुनिया में पालन हो रहा है। ये आदेश और नियम आयूफ़ी ने संकलित किए हैं जो बहरीन में एक अंतर्राष्ट्रीय इस्लामी संस्था है। और विभिन्न देशों के स्टेट बैंक उसकी स्थापना में साझेदार हैं। सदस्य देशों के स्टेट बैंकों के प्रमुख या उनके प्रतिनिधि उसके सदस्य हैं। यह संस्था इसी काम के लिए स्थापित की गई है कि पूँजी निवेश के इस्लामी तरीकों के लिए शरीअत के नियमों और आदेशों को नए ढंग, नई भाषा, नई आवश्यकताओं और नई शब्दावलियों के तहत संकलित करे। इस संस्था ने अत्यन्त लाभकारी काम किया है और मुज़ारबा, मुशारका, इजारा और दूसरे कई अनुबंधों के बहुत-से आदेश आजकल की भाषा और प्रचलित शब्दावली में संकलित करके प्रकाशित कर दिए हैं।
एक अहम बात यह है कि खुद पश्चिमी दुनिया में ‘मुज़ारबा’ से मिलती-जुलती एक कार्य-प्रणाली प्रचलित है जिस पर वहाँ बहुत सफलतापूर्वक अमल हो रहा है। यह कार्य-प्रणाली venture capital कहलाती है। वेंचर कैपिटल की रूह भी यही है कि पूँजी उपलब्ध करनेवाला एक व्यक्ति हो, जिसको वहाँ sleeping partner कहा जाता है। वह प्रत्यक्ष रूप से कारोबार में हिस्सा नहीं लेता। दूसरी तरफ कारोबार करनेवाला व्यक्ति होता है जो दरअसल कारोबार करता है। यही दरअसल मुज़ारिब है। वेंचर कैपिटल को बहुत आसानी के साथ बिना किसी बड़े परिवर्तन के ‘मुज़ारबा’ के आदेशों के अनुसार ढाला जा सकता है।
यह बात मैं इसलिए बार-बार बताता हूँ कि हमारे यहाँ एक आम मान्यता यह पैदा हो गई है कि आज की दुनिया में केवल वह चीज़ व्यावहारिक है जो पश्चिम में हो रही है। इस मान्यता के कारण आज के मुसलमान कोई नई चीज़ सोचने के सिरे से योग्य ही नहीं रहे, और अगर सोचें तो उसको व्यवहार में लाने के योग्य नहीं हैं। जो लोग यह नकारात्मक ज़ेहन रखते हों उनको इस बात का यक़ीन दिलाने के लिए कि ‘मुज़ारबा’ पर अमल करना संभव है, वेंचर कैपिटल का हवाला लाभदायक सिद्ध हो सकता है। जो-जो आपत्तियाँ ‘मुज़ारबा’ पर की जाती हैं वे वेंचर कैपिटल की कार्य-प्रणाली पर ग़ौर करने से दूर की जा सकती हैं।
हमारे यहाँ कुछ लोग कहते हैं कि जब हम ‘मुज़ारबा’ पर किसी को माल देंगे तो वह अनिवार्य रूप से कारोबार में नुक़्सान ज़ाहिर करेगा और यह दावा करेगा कि ‘मुज़ारबा’ में कोई लाभ नहीं हुआ। अतः जो घर बैठा साझेदार (sleeping partner) है उसको नुक़्सान ही नुक़्सान होगा। यह आपत्ति निस्संदेह वज़न रखती है। इसलिए कि हमारा अनुभव इस तरह की पूँजी निवेश के बारे में सुखद नहीं रहा। अतीत में फ़ाइनांस कंपनियों के हालात और कार्य-प्रदर्शन से हम सब परिचित हैं। ताज कंपनी जैसी संस्था में जो समस्याएँ पैदा हुईं उससे हम सब परिचित हैं। इसलिए कुछ लोग ‘मुज़ारबा’ पर अमल करने के बारे में वास्तव में इसलिए संकोच करते हैं कि अगर लोगों पर भरोसा करके उनको भारी रकमें पूँजी निवेश के लिए दे दी जाएँ तो इस बात की ज़मानत कौन देगा कि वे वास्तव में असल हिसाब पूँजीपति के सामने पेश करें और उनको उनका जायज़ हक अदा करें।
इसलिए मैं कहता हूँ कि अगर वेंचर कैपिटल के सिद्धांतों एवं नियमों को सामने रखा जाए और यह देखा जाए कि पश्चिमी दुनिया में इस पर कैसे अमल हो रहा है, वहाँ के अनुभव और कार्य-प्रणाली से लाभ उठाया जाए तो ‘मुज़ारबा’ के रास्ते में आनेवाली बहुत-सी मुश्किलों पर काबू पाया जा सकता है।
मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि मुस्लिम जगत् का व्यापारी तो धोखेबाज़ है और पश्चिम का व्यापारी धोखेबाज़ नहीं है। धोखाधड़ी इंसान की प्रकृति में शामिल है। उसका मन धोखाधड़ी और झूठ बोलने पर उसको आमादा करता रहता है। अगर शैतान किसी मुस्लिम मुल्क के व्यापारी को बहका सकता है तो अमेरिका के व्यापारी को भी बहका सकता है। यह कहना कि अमेरिका का व्यापारी शैतान के बहकावे से सुरक्षित है, मुस्लिम जगत् का व्यापारी शैतान के बहकावों से सुरक्षित नहीं है, यह दुरुस्त नहीं है। अन्तर केवल इतना है कि उन देशों में क़ानून सख्त हैं। क़ानून का पालन करानेवाली संस्थाएँ अत्यन्त प्रभावी हैं और जनाधार के द्वारा एक ऐसा वातावरण पैदा कर दिया गया है कि किसी व्यक्ति के लिए शैतान के इन बहकावों पर अमल करना मुश्किल हो गया है। यह काम मुस्लिम जगत् में भी किया जा सकता है और किया जाना चाहिए और जल्द-से-जल्द किया जाना चाहिए।
‘मुज़ारबा’ के आदेश जो फ़ुक़हा ने बयान किए हैं वे बहुत विस्तृत हैं। लेकिन उनका खुलासा इस दस्तावेज़ में आ गया है जो आयूफ़ी ने तैयार की है और अरबी और अंग्रेज़ी में उपलब्ध है। ये दस्तावेज़ दुनिया की विभिन्न यूनिवर्सिटियों के इस्लामी वित्त के प्रोग्रामों में बतौर पाठ्य पुस्तक के पढ़ाए भी जा रहे हैं। मुस्लिम जगत् में कई ऐसी संस्थाएँ मौजूद हैं जहाँ इस्लामी बैंकिंग या इस्लामी वित्त की शिक्षा हो रही है और इस्लामी बैंकिंग और इस्लामी वित्त के कोर्सों में यह दस्तावेज़ Standards या उच्चस्तरीय दस्तावेज़ बतौर पाठ्य पुस्तक के पढ़ाए जा रहे हैं।
फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने ‘मुज़ारबा’ की कई किस्में बयान की हैं। पाकिस्तान के क़ानून में भी ‘मुज़ारबा’ की इन दो किस्मों को शामिल किया गया है। पाकिस्तान में सन् 1980 ई. में एक ‘मुज़ारबा आर्डिनेंस’ जारी किया गया था जिसके अनुसार ‘मुज़ारबा’ की वही दो बड़ी-बड़ी किस्में बताई गई थीं जो फ़िक्ह की किताबों में आम तौर पर मिलती हैं। एक ‘मुज़ारबा-ए-आम्मा’ या ‘मुज़ारबा-ए-मुतल्लक़ा’ कहलाता है और दूसरा ‘मुज़ारबा-ए-खास्सा’ या ‘मुज़ारबा-ए-मुक़य्यदा’ कहलाता है। यानी एक General Purpose ‘मुज़ारबा’ और दूसरा Specific Purpose ‘मुज़ारबा’। जनरल ‘मुज़ारबा’ में मुज़ारिब को यानी कारोबार और व्यापार करनेवाले को यह आज़ादी होती है कि वह जिस कारोबार और व्यापार में पैसा लगाना चाहे लगा सकता है। जिस क्षेत्र में, जिस प्रकार के कारोबार को उचित और लाभकारी समझे उस क्षेत्र में उसी कारोबार को अपना सकता है। इसके विपरीत specific ‘मुज़ारबा’ यानी ‘मुज़ारबा-ए-खास्सा’ किसी निर्धारित उद्देश्य और निर्धारित कारोबार के लिए होता है। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति चमड़े के कारोबार का विशेषज्ञ है। आपने उसको चमड़े के कारोबार में रुपया लगाने के लिए दिया है। अब वह सिर्फ चमड़े के कारोबार में, उन शर्तों के अनुसार, इस क्षेत्र में कारोबार करने का पाबंद है जो पूँजी उपलब्ध करनेवालों के और उसके दरमियान तय हुई हैं। यह Specific Purpose ‘मुज़ारबा’ कहलाता है। इन दोनों के विस्तृत आदेशों में थोड़ा-सा अन्तर है। मूल नियम और सिद्धांत इन सबके एक ही हैं। ‘मुज़ारबा’ पर आधुनिक काल के विद्वानों ने अलग किताबें भी लिखी हैं और ‘फ़िक्हुल-मुज़ारबा’ के शीर्षक से बहुत-से शोध लेख भी ज्ञानपरक और कला संबंधी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।
‘मुज़ारबा’ के बाद दूसरी महत्वपूर्ण शक्ल शिरकत या ‘मुशारका’ की है। शिरकत या ‘मुशारका’ एक आम शब्दावली है। एक दृष्टि से ‘मुज़ारबा’ भी शिरकत की एक शक्ल है। लेकिन चूँकि ‘मुज़ारबा’ बहुत अहम किस्म है। बहुत लोकप्रिय है, बहुत आम है। इसलिए फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्री) उसको अलग से बयान करते हैं। ‘मुशारका’ या शिरकत से मुराद हर वह कारोबार है जो दो या दो से अधिक व्यक्ति मिलकर करें। आजकल की शब्दावली के अनुसार पार्टनरशिप, ज्वॉइंट स्टॉक कंपनी और कॉरपोरेट फाइनेंसिंग की सारी किस्में। ये सब ‘मुशारका’ ही की विभिन्न शक्लें हैं।
जहाँ तक पार्टनरशिप का संबंध है, इसके नियम बहुत आसान हैं। और चूँकि इसका संबंध कॉरपोरेट फाइनेंसिंग के मैदान से नहीं है इसलिए इस पर ज़्यादा बहस भी आम तौर से नहीं होती। पार्टनरशिप के क़ानून जो पाकिस्तान में प्रचलित हैं वे आम तौर से शरीअत के आदेशों से टकराते नहीं हैं। इसलिए पार्टनरशिप की हद तक शरीअत के आदेशों पर अमल करना कोई मुश्किल नहीं है। यानी पाकिस्तान में क़ानूनी दृष्टि से पार्टनरशिप की सरगर्मियों को शरीअत के अनुसार अंजाम देने में कोई खास रुकावट पैदा नहीं हो सकती।
बैंकिंग और कॉरपोरेट फाइनेंसिंग व्यवस्था के अलावा शिराकती कारोबार की जितनी सूरतें हैं उन सब पर पार्टनरशिप के क़ानून और शरीअत के ‘मुशारका’ संबंधी आदेशों की हदों के अंदर रहकर बहुत आसानी से अमल किया जा सकता है। सच तो यह है कि पाकिस्तान में बहुत-से लोग ऐसे हैं जिनमें से कुछ को मैं निजी तौर पर भी जानता हूँ जो शिराकती आधार पर बड़े-बड़े कारोबार कर रहे हैं। उन्होंने कभी बैंकों के साथ कोई लेन-देन नहीं रखा। इसलिए कि उनको बैंकों से सूदी लेन-देन करने की ज़रूरत ही नहीं पेश आई। उनके ये शिराकती कारोबार शरीअत के ‘मुशारका’ से संबंधित आदेशों के बिलकुल अनुसार हैं।
फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्री) जिस ज़माने में ‘मुशारका’ के आदेश संकलित कर रहे थे उस ज़माने में ‘मुशारका’ की जो-जो शक्लें प्रचलित थीं उनका उन्होंने जायज़ा लिया और शरीअत के नियमों की रोशनी में उनके आदेश संकलित कर दिए। उस ज़माने में शिरकते-इनान, शिरकते-मुफ़ावज़ा वगैरह प्रकार की शिराकतें प्रचलित थीं। कुछ आलिमों का ख़याल है कि आजकल कॉरपोरेट फाइनेंसिंग की व्यवस्था के तहत जो कंपनियाँ बनाई जाती हैं उनकी हैसियत शिरकते-इनान से बहुत मिलती-जुलती है। इसलिए इन आलिमों के विचार में शिरकते-इनान के आदेशों के तहत कंपनियों की व्यवस्था को बहुत आसानी के साथ शरीअत के अनुसार बनाया जा सकता है।
ज़ाहिर बात है कि इससे कोई मतभेद नहीं कर सकता कि अगर आजकल की कंपनियों को शिरकते-इनान के अनुसार बनाया जा सके तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन मैं यह बताने की एक बार फिर इजाजत चाहता हूँ कि मान लीजिए, अगर शिरकते-इनान की विस्तृत जानकारी किसी कंपनी की कार्य-प्रणाली पर पूरी नहीं उतरती तो भी उस कंपनी के कारोबार के जायज़ होने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि वह शिरकते-इनान के सौ प्रतिशत अनुसार हो। अगर कोई कंपनी ऐसी है कि उसके क़ायदे-क़ानून और कार्य-प्रणाली में कोई चीज़ शरीअत के नियमों और आदेशों से टकराती नहीं है तो वह जायज़ है। चाहे उसको शिरकते-इनान कहा जा सके या न कहा जा सके। यही कैफियत ‘मुशारका’ की दूसरी किस्मों की है।
‘मुशारका’ और ‘मुज़ारबा’ के कुछ आदेश एक जैसे हैं और कुछ आदेश अलग-अलग हैं। ‘मुज़ारबा’ और ‘मुशारका’ की बुनियाद पर बहुत-से इस्लामी बैंक काम कर रहे हैं। सबसे पहले फ़ैसल इस्लामिक बैंक ने ‘मुशारका’ की बुनियाद पर काम शुरू किया था। फ़ैसल इस्लामिक बैंक मिस्र में भी कायम है, सूडान में भी कायम है और कई दूसरे इस्लामी देशों में कायम भी है। यह बैंक शाह फ़ैसल मरहूम के बेटों ने कायम किया था और एक ज़माने में यह पहली पंक्ति का इस्लामी बैंक था। इसकी सफलता और अनुभव से प्रभावित होकर दूसरे विभिन्न बैंकों ने भी इस्लामी दिशानिर्देशों पर काम शुरू किया। जिनका विवरण आगे एक चर्चा में इंशाअल्लाह पेश किया जाएगा।
‘मुशारका’ की बहुत-सी शक्लें आजकल के विद्वानों ने प्रस्तावित की हैं। ये वे शक्लें हैं जो आधुनिक काल के तकाजों को सामने रखकर कुछ इस्लामी विद्वानों ने प्रस्तावित की हैं। उनका प्राचीन फ़िक़्ही किताबों में उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन उनके जायज़ होने में कोई शक इसलिए नहीं है कि ये शरीअत की आम हदों के अंदर हैं। उनमें कोई चीज़ ऐसी नहीं है जो शरीअत के आदेशों से सीधे-सीधे टकराती हो। चुनाँचे इन्हीं में से एक ‘मुशारका-ए-मुतनाक़िसा’ भी है जिसको ‘शिरकते-मुतनाक़िसा’ भी कहा जाता है। इसी तरह से एक ‘मुशारका-ए-मुन्तहिया बित्तमलीक’ भी है। यह जो नई-नई शक्लें आधुनिक काल में प्रस्तावित हो रही हैं उनको कुछ लोगों ने फ़िक़्ही इंजीनियरिंग (engineering) का नाम दिया है। फ़िक़्ही इंजीनियरिंग में कोई हरज नहीं है, अगर शरीअत के आम नियमों की पाबंदी की जाए। फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) के सर्वसम्मत सिद्धांतों को सामने रखा जाए तो फ़िक़्ही इंजीनियरिंग की कार्य-प्रणाली को अपनाते हुए नए-नए तरीके और कारोबार के नए-नए ढंग सोचना और उन पर अमल करना एक लाभकारी और पसंदीदा बात है। लेकिन अमल में एक मूल सिद्धांत का ध्यान रखना चाहिए जो अल्लामा इज़ुद्दीन-बिन-अब्दुस्सलाम ने अपनी अत्यन्त ज्ञानवर्धक किताब ‘क़वाइदुल-अहकाम फ़ी मसालिहुल-अनाम’ में बयान किया है। अल्लामा इज़ुद्दीन ने लिखा है— “हर वह उपभोग या गतिविधि जिससे उसका असल अभीष्ट पूरा न हो वह बातिल (असत्य) है।” अतः ‘मुशारका-ए-मुतनाक़िसा’ हो, ‘मुशारका-ए-मुन्तहिया बित्तमलीक’ हो या और नई शक्लें हों, अगर उनके नतीजे में शरीअत के उद्देश्य पूरे हो रहे हैं, अगर उनके नतीजे में आम लोग लाभ और हानि के तहत कारोबार में स्वतंत्रतापूर्ण रूप से शरीक हो रहे हैं, अगर उनमें से किसी कार्य-प्रणाली में शरीअत के किसी आदेश का उल्लंघन नहीं हो रहा तो फिर ये सब जायज़ हैं। लेकिन अगर ये उद्देश्य उनसे पूरे नहीं हो रहे तो मात्र अरबी में नाम रख लेने की वजह से कोई कार्य-प्रणाली जायज़ नहीं करार दी जा सकेगी। ‘मुशारका-ए-मुन्तहिया बित्तमलीक’ की बहुत-सी शक्लें आधुनिक काल के फ़ुक़हा ने प्रस्तावित की हैं। इसी तरह से ‘मुशारका-ए-मुतनाक़िसा’ की शक्लें भी प्रस्तावित की हैं। कुछ लोगों ने इन दोनों को मिलाकर एक और शक्ल प्रस्तावित की है। कुछ लोगों ने ‘इजारा’ और ‘मुशारका’ को मिलाकर एक नई शक्ल प्रस्तावित की है। इन सब शक्लों पर अगर उन तमाम विवरणों के तहत अमल किया जाए जो आज फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने संकलित किए हैं, और खास तौर पर जो आयूफ़ी के स्टैंडर्ड्स में बयान हुई हैं तो फिर उन पर अमल शरीअत के आदेशों के अनुसार है। और ये तरीके वैसे ही इस्लामी तरीके हैं जैसे शिरकते-इनान या शिरकते-मुफ़ावज़ा हैं। लेकिन अगर इन शर्तों की पाबंदी नहीं की जा रही है, तो फिर इसका अर्थ यह है कि यह सब कुछ मात्र शब्दों का उलट-फेर है और हकीकत की दृष्टि से वित्त के ये नए तरीके शरीअत के आदेशों के अनुसार नहीं हैं।
जिस तरह से बैंकों को ‘मुज़ारबा’ पर अमल करने में शुरू में कुछ मुश्किलें पेश आईं उसी तरह ‘मुशारका’ पर अमल करने में भी शुरू-शुरू में कई मुश्किलें पेश आईं, लेकिन अब ‘मुज़ारबा’ और ‘मुशारका’ के इस प्रयोग को कम-से-कम बीस-पच्चीस साल हो गए हैं। इस दौरान में इन पर लगातार विचार-विमर्श हुआ है। बहुत-से विद्वानों ने इन मसाइल पर विस्तार से विचारों का आदान-प्रदान किया है। अब यह मसाइल ऐसे नहीं रहे जिन्हें हल न किया जा सकता हो। विभिन्न इस्लामी बैंकों ने ‘मुशारका’ पर काम शुरू किया है। ‘मुशारका’ सर्टिफिकेट भी शुरू किए हैं। खुद पाकिस्तान में बहुत-से बैंक ‘मुशारका’ की बुनियाद पर काम कर रहे हैं और ‘मुशारका’ ‘सुकूक’ और सर्टिफिकेट भी जारी कर रहे हैं। ‘मुशारका’ टर्म सर्टिफिकेट भी अब एक आम और प्रचलित तरीका हो गया है, जिस पर विभिन्न बैंकों में अमल दरआमद हो रहा है।
‘मुशारका’ और ‘मुज़ारबा’ के अलावा खुद सीधे-सीधे क्रय-विक्रय भी एक ऐसी साफ-सुथरी, सीधी-सादी और पावन कार्य-प्रणाली है जिस पर अगर बैंक अमल करना शुरू कर दें तो बहुत आसानी के साथ, शरीअत के अनुसार, कारोबार और बिजनेस को सुगठित किया जा सकता है। क्रय-विक्रय और बुयूअ के आदेश मूल रूप से तो खुद पवित्र क़ुरआन में बयान हुए हैं। हदीसों में उनकी तफ़सील आई है। जिसका खुलासा मैं तफ़सील के साथ बयान कर चुका हूँ। लेकिन ‘बैअ’ से संबंधित कुछ विस्तृत इजतिहादी मामलों में फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) के बीच मतभेद रहा है।
कुछ उलमा का कहना है कि क्रय-विक्रय और अनुबंधों के मामलों में इमाम अहमद-बिन-हंबल (रह.) का दृष्टिकोण बहुत आसान और व्यापक होता है। इसलिए इमाम अहमद-बिन-हंबल (रह.) के इजतिहादात से अगर खास तौर पर लाभ उठाया जाए तो ‘बैअ’ के आदेशों को ज़्यादा आसानी के साथ संकलित किया जा सकता है। कुछ और लोगों का कहना है कि बुयूअ के बारे में इमाम मालिक (रह.) के बनाए हुए इजतिहादी नियम बहुत पक्के और बेहतर हैं। शैखुल-इस्लाम अल्लामा हाफ़िज़ इब्ने तैमिया (रह.) ने लिखा है कि बुयूअ के बारे में इमाम मालिक (रह.) के उसूल दूसरे फ़ुक़हा के सिद्धांतों एवं नियमों की तुलना में ज़्यादा परिपक्व और ज़्यादा बेहतर हैं। इसलिए कि इमाम मालिक (रह.) ने बुयूअ के नियम प्रसिद्ध ताबिई हज़रत सईद-बिन-मुसय्यिब (रह.) के द्वारा लिए हैं। हज़रत सईद-बिन-मुसय्यिब (रह.) मदीना मुनव्वरा के मशहूर फ़ुक़हा में थे। उनके बारे में कहा जाता था कि “बैअ और क्रय-विक्रय के मामलों में वह फ़ुक़हा में सबसे नुमायाँ और गहरी नज़र के मालिक हैं”, यानी बड़ी सूझ-बूझ रखनेवाले हैं।
बहरहाल इमाम मालिक (रह.) के इजतिहादात (इस्लाम के विषय में निजी रायें) हों, इमाम अहमद-बिन-हंबल (रह.) के इजतिहादात हों या दूसरे फ़िक़्ही इमामों के इजतिहादात हों, इजतिहादी मामलात में चारों इमामों के दृष्टिकोण से समान रूप से लाभ उठाया जाना अब आधुनिक काल का एक आम रुझान हो गया है। पाकिस्तान में इस्लामी नज़रियाती कौंसिल, उच्च अदालतें, ओआईसी की फ़िक्ह अकैडमी, राबिता आलमे-इस्लामी की फ़िक्ह अकैडमी, मिस्र का मजमउल-बुहूस अल-सलामेह, और इस तरह की कई संस्थाएँ जो सामूहिक इजतिहाद का कर्तव्य निभा रही हैं। उनका रवैया आम तौर से यही होता है कि देश के क़ानून, दीवानी मामलात, और खास तौर पर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मसाइल और आदेशों को क़ानूनी रूप दिए जाने और उनके नव-संकलन में किसी निर्धारित फ़िक़्ही इजतिहाद की पैरवी को लाज़िमी न समझा जाए।
इसका कारण यह है कि आज अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एक ऐसे वैश्विक दौर में दाखिल हो गया है जहाँ पूरी दुनिया की सतह पर क़रीब-क़रीब एक ही ढंग से कारोबार हो रहा है। आज शायद दुनिया यह मान सकती है और दुनिया से मनवाया जा सकता है और मनवाया जाना चाहिए कि अगर वह मुस्लिम जगत् के साथ कारोबार करना चाहती है तो उसको शरीअत के आदेशों के अनुसार ही मुस्लिम जगत् के साथ कारोबार करना पड़ेगा। जैसा कि अतीत में कमोबेश बारह सौ साल तक दुनिया मुसलमानों के साथ शरीअते-इस्लामी के नियमों और आदेशों के अनुसार ही व्यापार और कारोबार करती रही है। यह काम आज भी हो सकता है।
लेकिन अतीत के मुकाबले में अब सूरते-हाल कई तरह से बदल गई है। अतीत में यह मुमकिन था और ऐसा होता भी था कि अगर कोई व्यापारी उसमानी तुर्कों के साथ व्यापार कर रहा है तो उसको फ़िक्हे-हनफ़ी के अनुसार व्यापार करना होगा। यूरोप का कोई व्यापारी उत्तरी अफ्रीका के देशों के साथ व्यापार कर रहा है तो उसका व्यापार फ़िक्हे-मालिकी के अनुसार होगा। मिस्र और सीरिया के ताजिरों के साथ व्यापार कर रहा है तो उसका व्यापार फ़िक्हे-शाफ़ई के अनुसार होगा। आज ऐसा करना मुश्किल है। इसलिए कि बड़ी-बड़ी मल्टी नेशनल कंपनियाँ जो एक ही समय में दुनिया में सैकड़ों देशों में काम रही हैं। वे पूरी दुनिया में लगभग एक जैसी व्यवस्था और क़रीब-क़रीब समान क़ानूनों के तहत काम कर रही हैं। इस स्थिति में उनसे यह कहना बहुत-सी ग़ैर-ज़रूरी समस्याएँ पैदा करेगा कि इस्लामी क़ानून पाकिस्तान में और होगा, सऊदी अरब में और होगा, मिस्र और सीरिया में और होगा, मराकश में और होगा। यह आग्रह करना सही नहीं है, न इस पर अमल करना मुमकिन है। इसलिए मुस्लिम जगत् में आज का रुझान यही है, और यह बहुत लाभदायक और सकारात्मक प्रवृत्ति है कि फ़िक्हे-इस्लामी के पूरे संग्रह को सामने रखकर इजतिहादी मामलों में यह देखा जाए कि फ़िक्ह के इमामों का कौन-सा इजतिहाद है जो आजकल के तकाजों के ज़्यादा अनुसार है और आजकल के मसाइल को ज़्यादा आसानी के साथ हल कर सकता है। चुनाँचे बुयूअ, मुज़ारबा, मुशारका, इन सबके नियम जो संकलित हुए हैं या होने चाहिएँ वे इसी आधार पर संकलित हो रहे हैं कि चारों इमामों के इजतिहादात को विशेषकर और शेष बड़े फ़ुक़हा के इजतिहादात को आम तौर से एक साथ सामने रखा जाए।
बुयूअ में यों तो हर प्रकार की ‘बैअ’ से लाभ उठाया जा सकता है, लेकिन सबसे ज़्यादा जिन किस्मों से लाभ उठाया गया है और उठाया जा रहा है वह ‘बैए-मुराबहा’ और ‘बैए-मुअज्जल’ हैं। कुछ बैंकों में इन दोनों को मिलाकर एक नई कार्य-प्रणाली अपनाई गई है। कुछ जगह ‘बैए-मुराबहा’ पर अमल हो रहा है, कुछ जगह ‘बैए-मुअज्जल’ पर अमल हो रहा है। ‘बैए-मुराबहा’ पर उर्दू में, अंग्रेज़ी में, अरबी में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। और संघीय शरई अदालत के फैसलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में भी ‘बैए-मुराबहा’ पर बहुत विस्तार से विचार व्यक्त किए जा चुके हैं।
‘बैए-मुराबहा’ के बारे में सच्चाई यह है कि यह पूँजी निवेश का कोई आदर्श तरीका नहीं है। यह तो व्यापार की एक शक्ल है जिससे आंशिक रूप से पूँजी निवेश का फ़ायदा भी उठाया जा सकता है। ‘बैए-मुराबहा’ यह है कि कोई व्यक्ति जो अपना कोई सौदा बेचना चाहता हो, उसके लिए यह जायज़ है कि वह यह तय करे कि उसको किसी सौदे की प्राप्ति में जो कीमत या लागत पड़ेगी, उस पर वह इतने प्रतिशत के हिसाब से लाभ लेगा। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति इम्पोर्ट, एक्सपोर्ट का कारोबार करता है, वह यह कहता है कि मैं इंडस्ट्री के लिए फलाँ देश से मशीनरी आयात करूँगा। मशीनरी आयात करने पर जो कुल खर्च होगा वह लगाने के बाद पाँच प्रतिशत या दस प्रतिशत या पंद्रह प्रतिशत के हिसाब से मैं लाभ वुसूल करूँगा। इस स्थिति में खरीदार को यह हक है कि वह यह चेक करे और इस बात को यकीनी बनाए कि जो कीमत बेचनेवाला बयान करता है, सचमुच वही कीमत उसको पड़ी है या कोई और है। जब यह तय हो जाए कि यही कीमत पड़ी है और यह काम आज कोई मुश्किल नहीं है, आसान काम है। दस्तावेज़ात हर जगह मौजूद होती हैं और चूँकि विभिन्न देशों के बैंकों से गुज़रती हैं इसलिए इसमें किसी फेर-बदल की संभावना नहीं होती। जालसाज़ी की संभावना भी नाम मात्र रह गई है।
इसलिए ‘बैए-मुराबहा’ को इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट में खास तौर पर और इंडस्ट्री के दूसरे मामलात में आम तौर पर आसानी के साथ प्रयुक्त किया जा सकता है। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति कोई इंडस्ट्री लगाना चाहता है, इसके लिए एक करोड़ रुपये की मशीनरी उसको जर्मनी से दरकार है। इसके पास एक करोड़ रुपया नहीं है। अब पारंपरिक बैंकिंग की कार्य-प्रणाली में तो यह होता था कि वह बैंक के पास जाए और एक करोड़ रुपया क़र्ज़ ले और इस पर दस प्रतिशत ब्याज देने का वादा करे और समय आने पर एक करोड़ के बजाय एक करोड़ दस लाख रुपये की रकम अदा करे। और क़र्ज़ की यह रकम लेकर अपनी मशीनरी मँगवा ले, यह तो यकीनन ब्याज है। इसके मुकाबले में ‘बैए-मुराबहा’ का तरीका यह प्रस्तावित किया गया कि बैंक एक करोड़ रुपया सूदी क़र्ज़ देने के बजाय खुद वह इंडस्ट्री आयात करे। इसके बाद खरीदार को बताए कि यह मशीनरी बैंक को एक करोड़ रुपये में पड़ी है। इस पर दस प्रतिशत बैंक का लाभ होगा। यों वह खरीदार एक करोड़ दस लाख रुपये अदा करके मशीनरी बैंक से खरीद ले। यहाँ कर्जों का लेन-देन नहीं है। यहाँ वास्तविक सिद्धांत का यानी सम्पत्तियों का और tangible assets का कारोबार है, और शरीअत के आदेशों के अनुसार ‘बैअ’ की एक शक्ल है। इसलिए यह जायज़ है।
इसमें और पहली स्थिति में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। यहाँ मात्र क़र्जों का नहीं, बल्कि एक वास्तविक सम्पत्ति का लेन-देन हो रहा है। वह मशीनरी जो आयात हो रही है, जब से खरीदी गई उस समय से लेकर जब तक जर्मनी से पाकिस्तान पहुँची और खरीदार के हाथ बेच दी गई, उस वक़्त तक वह बैंक की ज़मानत में है। उसके तमाम खर्चे, उसके जुर्माने, उसमें पैदा होनेवाली त्रुटियाँ उस पर पड़नेवाले खर्चे, यह सब-के-सब बैंक को चुकाने पड़ेंगे। इसलिए कि ‘अल-खराजु बिज़्-ज़मान’ (लाभ उठाने का अधिकार घाटा उठाने की ज़िम्मेदारी पर निर्भर है) का उसूल शरीअत में तय-शुदा है। चूँकि बैंक इस मशीनरी पर लाभ ले रहा है इसलिए बैंक को उसका नुक़्सान भी बर्दाश्त करना चाहिए। यह ‘बैए-मुराबहा’ है। इसका विस्तृत विवरण पाकिस्तान में भी तय हुआ। आयूफ़ी की दस्तावेज़ात में भी तय-शुदा है। और इस पर समय-समय पर विद्वान विचार व्यक्त करते रहे हैं।
पाकिस्तान में जब ‘बैए-मुराबहा’ शुरू हुआ, ये 1980-1981 की बात है, तो कुछ बैंकों के बारे में यह शिकायतें मिलीं कि वे ‘बैए-मुराबहा’ के उन विवरणों के अनुसार अमल नहीं कर रहे जो इस्लामी नज़रियाती कौंसिल ने तय किए थे। यह शुरू की बात थी। हो सकता है सच में कुछ मुश्किलें हों, मुमकिन है कुछ बैंकरों को ‘बैए-मुराबहा’ की हकीकत को समझने में दिक्कत हुई हो या कोई और वजह हो। लेकिन समय के साथ-साथ स्थिति में बेहतरी आई है। नियम एवं क़ानून भी बेहतर हुए हैं। स्टेट बैंक की तरफ से निगरानी का काम भी पहले के मुकाबले में ज़्यादा प्रभावी हुआ है। इसलिए अब स्थिति बेहतरी की तरफ जा रही है।
‘बैए-मुराबहा’ चूँकि तुलनात्मक रूप से आसान है और जो कार्य-प्रणाली पाकिस्तान में कुछ विद्वानों ने प्रस्तावित की, उसमें ज़रूरत से ज़्यादा आसानियाँ बैंकरों के लिए उपलब्ध कर दीं। इसकी वजह से बैंकों ने बड़े पैमाने पर मुराबहा ही को सूदी कारोबार के एक मात्र विकल्प के रूप में अपना लिया। इसका नतीजा यह निकला कि ‘मुशारका’ और ‘मुज़ारबा’ पर अमल करने की रफ्तार रुक गई। इस वक़्त भी स्थिति यह है कि बैंकों के मामलात का अधिकतर हिस्सा ‘बैए-मुराबहा’ की बुनियाद पर चल रहा है और ‘मुज़ारबा’ और ‘मुशारका’ की बुनियाद पर किया जानेवाला काम बहुत थोड़ा है। हालाँकि उसका प्रभाव होना चाहिए। बैंकों के मामलात का अधिकतर हिस्सा ‘मुज़ारबा’ या ‘मुशारका’ की बुनियाद पर होना चाहिए और थोड़ा-बहुत हिस्सा कुछ प्रतिशत अगर ‘बैए-मुराबहा’ के आधार पर भी हो जाए तो कोई हरज नहीं है। ‘बैए-मुराबहा’ की दो सूरतें ‘बैए-तौलिया’ और ‘बैए-तौज़ीआ’ भी हैं। चूँकि ‘बैए-तौलिया’ और ‘बैए-तौज़ीआ’ बैंकों के मामलात में ज़्यादा काम नहीं आतीं, इसलिए आजकल के फ़ुक़हा ने इनसे बहस ज़्यादा नहीं की।
यहाँ यह बात याद रखनी चाहिए और यह बात मैं पहले भी बता चुका हूँ कि ‘बैअ’ की कोई भी किस्म हो, मुराबहा या तौलिया हो या कोई और शक्ल हो, ‘बैए-मुअज्जल’ हो, इसमें यह बात याद रखनी चाहिए कि “अल्लाह के रसूल ﷺ ने क़र्ज़ और ‘बैअ’ दोनों को एक साथ मिलाने से मना किया है।” यह हदीस कई मुहद्दिसीन ने बयान की है। कई सहाबा किराम ने इसको रिवायत किया है। न केवल बैअ, बल्कि किसी भी प्रकार के मुआवज़े के अनुबंध और क़र्ज़ को एक अनुबंध में जमा करना दुरुस्त नहीं है। यानी कोई भी ऐसा अनुबंध जो ‘उक़ूदुल-मुआवज़ा’ की किस्म में शामिल हो, उदाहरणार्थ बैअ, इजारा, इसमें क़र्ज़ और अक़्दे-मुआवज़ा को इकट्ठा करके कोई नई शक्ल बनाना दुरुस्त नहीं है।
इमाम मालिक (रह.) ने इसकी व्याख्या में यह लिखा है कि इससे मुराद वह ‘बैअ’ है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे से कहे कि मैं तुम्हारा फलाँ सौदा उदाहरणार्थ मैं तुम्हारी गाड़ी दस लाख रुपये में खरीदने के लिए तैयार हूँ, शर्त यह है कि तुम मुझे पाँच लाख रुपये क़र्ज़ दे दो। यह जायज़ नहीं है। मैं तुम्हारी ज़मीन खरीदने के लिए तैयार हूँ शर्त यह है कि तुम मुझे इतनी रकम क़र्ज़ दे दो या मुझसे इतनी रकम क़र्ज़ ले लो। क़र्ज़ और बैअ, इन दोनों को मिलाकर कोई तीसरी शक्ल बनाना, दुरुस्त नहीं है। लिहाज़ा फ़िक़्ही इंजीनियरिंग के काम में इन निर्देशों को सामने रखना अपरिहार्य है। जो अनुबंध ‘उक़ूदुल-मुआवज़ा’ कहलाते हैं, ये वे हैं जिनमें माल का तबादला या तो माल के साथ हो रहा हो, जैसे आम क्रय-विक्रय के मामलात हैं। या माल का तबादला लाभ के साथ हो रहा हो जैसे इजारा है। इजारा में एक तरफ से तो माल है, पैसा है, किराया है, दूसरी तरफ माल नहीं है, बल्कि माल से पैदा होनेवाला लाभ है। आप मकान किराए पर लेते हैं, मकान के आप मालिक नहीं हो जाते। आप कुछ अरसे के लिए केवल उसके लाभ के मालिक होते हैं। या ऐसा तबादला जिसमें लाभ का तबादला लाभ के साथ हो। यह वह है जिसको इस्लामी शब्दावली में ‘महायाह’ कहते हैं और आधुनिक क़ानून की शब्दावली में भी ये set off की एक शक्ल है।
मुआवज़ात के साथ-साथ जो आर्थिक मामले हैं उनमें एक शक्ल ‘तौसीक़ात’ कहलाती है। उनको ‘उक़ूदुत-तवस्सुक़’ भी कहा जा सकता है। यानी वे अनुबंध जिनमें एक व्यक्ति अपने हक को और पक्का करने के लिए कोई और छोटा-मोटा मामला करता है। उदाहरणार्थ रहन का मामला, उदाहरणार्थ किफाला या हवाला का मामला, यह ‘उक़ूदुत-तवस्सुक़’ या तौसीक़ात कहलाते हैं। ये सब वे मामले हैं जिनसे आधुनिक काल में बैंकिंग की प्रक्रिया में विद्वान लाभ उठा रहे हैं।
जहाँ तक इजारा का संबंध है तो वास्तविकता यह है कि इजारा की संस्था और इजारा का क़ानून सबसे पहले फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने संकलित किया। इजारे के आदेश फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) की देन हैं। पश्चिमी दुनिया में आज से सत्तर-अस्सी साल पहले इजारे की वह परिकल्पना नहीं थी जो आज पाई जाती है। लीज़िंग को बतौर पूँजी निवेश के एक तरीके के पश्चिमी दुनिया में बहुत आखिर में शुरू किया गया है। यह संस्था पश्चिम में साठ-सत्तर साल से ज़्यादा पुरानी नहीं है। इसके विपरीत इस्लामी इतिहास में इजारे की कार्य-प्रणाली शुरू से प्रचलित रही है और इजारा के आदेश फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने दूसरी सदी हिजरी में संकलित करने शुरू कर दिए थे। आज इजारे की एक अहम शक्ल वह है जिसको ‘इजारा-ए-मुन्तहिया बित्तमलीक’ कहते हैं। खास तौर पर जायदाद, ज़मीन, गाड़ियों और इस तरह की आवश्यकताओं के क्रय-विक्रय में ‘इजारा-ए-मुन्तहिया बित्तमलीक’ को बहुत महत्व प्राप्त है।
ये वे कुछ बड़े-बड़े विकल्प हैं जो सूदी कारोबार की जगह विद्वानों ने प्रस्तावित किए हैं। इन पर दुनिया के अधिकतर इस्लामी बैंकों में अमल हो रहा है।
Facebook: HindiIslamPage X: HindiIslam
Recent posts
-
सूद का हराम होना और इसका मूल कारण (लेक्चर-7)
03 February 2026 -
इस्लाम में अर्थव्यवस्था एवं व्यापार का महत्व तथा उसके आदेश (लेक्चर-6)
20 January 2026 -
इस्लाम में धन-सम्पत्ति एवं स्वामित्व के आदेश (लेक्चर-5)
06 January 2026 -
अर्थव्यवस्था तथा व्यापार में राज्य की भूमिका (लैक्चर-4)
23 December 2025 -
आधुनिक काल की मुख्य वित्तीय एवं आर्थिक समस्याएँ : एक अवलोकन (लैक्चर-3)
18 December 2025 -
इस्लाम की वित्तीय एवं आर्थिक व्यवस्था मूल-अवधारणाएँ, महत्वपूर्ण विशेषताएँ तथा लक्ष्य (लैक्चर -2)
16 December 2025

