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इस्लामी बैंकिंग : अतीत, वर्तमान और भविष्य (लेक्चर नम्बर-10)

इस्लामी बैंकिंग : अतीत, वर्तमान और भविष्य (लेक्चर नम्बर-10)

डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी

अनुवादक : गुलज़ार सहराई

आज की चर्चा का शीर्षक है ‘इस्लामी बैंकिंग : अतीत, वर्तमान और भविष्य’। इस चर्चा में बैंकों की आवश्यकता, महत्व, वर्तमान काल में बैंकिंग व्यवस्था और बैंकों की भूमिका तथा इस्लामी बैंकिंग के सम्बन्ध में अब तक जो पहल हुई है, उसका एक संक्षिप्त जायज़ा लेना, इस्लामी बैंकिंग की वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करना और आगे पेश आने वाली मुश्किलों का संक्षिप्त-सा जायज़ा लेना अभीष्ट है।

यह बात तो हर व्यक्ति जानता है कि आज की आर्थिक व्यवस्था में बैंकों का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। बैंकों की हैसियत वर्तमान आर्थिक व्यवस्था में स्नायु-व्यवस्था की है। बैंकों के द्वारा ही पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चल रही है। बैंकों के द्वारा ही व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल रहा है। बैंकों के द्वारा ही औद्योगिक और पैदावारी गतिविधियों को बढ़ावा मिल रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को जो संस्थाएँ नियंत्रित कर रही हैं, वे बड़े-बड़े बैंक हैं। पूँजी निवेशक और व्यापार करने वाले पक्ष के दरमियान सम्पर्क का सबसे प्रभावकारी और आसान ज़रिया बैंकिंग की व्यवस्था है। अगर बैंक यह काम न करें तो न केवल बड़े-बड़े पूँजीपतियों के लिए, बल्कि छोटी बचतें रखने वालों के लिए भी सम्भावित ज़िम्मेदार पक्ष तक पहुँचना और ज़िम्मेदार पक्ष का चुनाव करके अपनी पूँजी या बचत उसके काम या योजना में लगाना लगभग असम्भव है। विश्वसनीय ‘मुज़ारिब’ या विश्वसनीय साझेदार का मिलना हर एक के बस की बात नहीं है। बैंकों के द्वारा यह काम बहुत आसानी से हो जाता है।

फिर विश्व स्तर पर जो व्यापारिक और आर्थिक गतिविधियाँ हैं—उदाहरणार्थ आयात और निर्यात की व्यवस्था, विभिन्न देशों के आपस में आर्थिक सम्बन्ध, व्यापारिक लेन-देन—इन सबके लिए ज़रूरी है कि एक ऐसी संस्था पाई जाती हो जो इस पूरी प्रक्रिया में सम्पर्क का कर्तव्य पूरा करे। सम्पर्क का यह कर्तव्य बड़ी हद तक बैंक पूरा करते हैं और बैंकों के द्वारा यह काम बहुत आसानी से हो जाता है। फिर जो लोग अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लेन-देन करना चाहते हैं या जिनका आयात-निर्यात का व्यापार होता है, उन्हें विभिन्न देशों के कानूनों की जानकारी प्राप्त करनी पड़ती है। हर देश के टैक्सों की व्यवस्था जाननी पड़ती है। ये महारतें प्राप्त करना हर एक के बस की बात नहीं होती, न हर व्यक्ति ये महारतें प्राप्त कर सकता है। भारत या पाकिस्तान के किसी शहर में बैठा हुआ एक व्यापारी जब जर्मनी या कनाडा से कोई सामान मँगवाना चाहता है या जापान और सिंगापुर का कोई व्यापारी गुजरांवाला और सियालकोट का बना हुआ सामान खरीदता है तो न सियालकोट और गुजरांवाला के व्यापारी के लिए सम्भव है कि जर्मनी, जापान और दूसरे देशों के कानूनों की यथोचित जानकारी प्राप्त करे और न यहाँ बैठे-बैठे वहाँ के टैक्सों की व्यवस्था की जानकारी प्राप्त करना आसान काम है। बैंकों के पास ये महारतें पहले से उपलब्ध होती हैं और उनकी सहायता से यह काम बहुत आसानी के साथ हो जाता है।

देश से बाहर रक़मों का भुगतान और विदेश से रक़मों को भेजना आजकल अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का एक बहुत महत्वपूर्ण अंग है। बैंकों के द्वारा यह स्थानांतरण और भुगतान की सुविधा बहुत आसान हो गई है। इससे पता चला कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था जिस ढंग से काम कर रही है, इसमें बैंकों की भूमिका बुनियादी महत्व रखती है। बैंकों की भूमिका को अगर समाप्त कर दिया जाए और यह ज़िम्मेदारी किसी और संस्था या संस्थाओं के सुपुर्द न की जाए तो अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की व्यवस्था देखते-देखते अस्त-व्यस्त हो सकती है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की व्यवस्था अस्त-व्यस्त होने का अर्थ यह है कि पूरी दुनिया की व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, आयात-निर्यात का सारा सिलसिला पलक झपकते ही धराशायी हो जाए।

इसकी वजह यह है कि आज कोई देश भी ऐसा नहीं है जो हर दृष्टि से आत्मनिर्भर हो और दुनिया के किसी देश से उसे किसी प्रकार के लेन-देन की ज़रूरत न हो। आज इस धरती पर कोई ऐसा देश नहीं पाया जाता जिसको विदेश से उदाहरणार्थ पेट्रोल, गैस, मशीनरी, कम्प्यूटर की सामग्री, टेलीफोन की सामग्री, मोबाइल फोन की सामग्री और इस तरह की अनगिनत चीजें खरीदने की ज़रूरत न पड़ती हो। यह सारा काम अत्यन्त मुश्किल, बल्कि असम्भव हो जाएगा अगर बैंकिंग की व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाए।

पश्चिम में प्रचलित बैंकिंग की वर्तमान व्यवस्था एक-दो दिन में नहीं सामने आई, न कभी किसी ने बाकायदा बैठकर यह सोचा था कि बैंकिंग की एक व्यवस्था बनानी चाहिए और इसकी रूप-रेखा यह और यह होनी चाहिए। वहाँ यह व्यवस्था लम्बे अरसे के दौरान एक स्वचालित ढंग से वजूद में आई है। व्यापारिक निहितार्थ और अनुभव ने जो परिवर्तन प्रस्तावित किए, वे परिवर्तन इसमें आते गए और उन परिवर्तनों तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक शक्तियों के हितों के मुताबिक इस व्यवस्था में परिवर्तन आता गया। कुछ पश्चिमी लेखक बैंकिंग के इतिहास का आरम्भ ईसा पूर्व से करते हैं। उनमें से कुछ का दावा है कि एक हजार ईसा पूर्व, बल्कि पंद्रह सौ ईसा पूर्व में भी बैंकिंग की संस्था मौजूद थी। लेकिन अगर बैंकिंग से अभिप्रेत, जैसा कि कुछ पश्चिमी लेखक उसके आरम्भ के इतिहास बयान करते हुए लेते हैं, यह है कि यह वह संस्था है जो क़र्ज़ों का व्यापार करती हो, व्यापार के लिए क़र्ज़ पर पूँजी उपलब्ध करती हो तो इस अर्थ में बैंकिंग की संस्था इससे भी प्राचीन है। सूदखोरी, क़र्ज़ और व्यापार में ब्याज पर पूँजी लगाने का काम हिंदू बनिए इससे भी बहुत पहले से कर रहे हैं। भारत में कई हजार वर्षों से ब्याज आधारित क़र्ज़ देने का और विभिन्न व्यापारों में ब्याज आधारित रक़में लगाने का प्रचलन चला आ रहा है। लेकिन वर्तमान अर्थ में, जिस अर्थ में आज बैंक का शब्द बोला जाता है, इस अर्थ में इसका आरम्भ सोलहवीं शताब्दी में इटली में हुआ। और जैसे-जैसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार बढ़ता गया, पश्चिम वालों के व्यापारिक हित फैलते चले गए, पश्चिमी बैंकिंग की व्यवस्था भी इसी गति और इसी तरह से बढ़ती और फैलती चली गई। सच तो यह है कि उन्नीसवीं शताब्दी के आखिर तक बैंकों की वह हैसियत नहीं थी, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में बैंकों की वह भूमिका नहीं थी, जो बीसवीं शताब्दी के मध्य से सामने आना शुरू हुई।

एक दृष्टि से बीसवीं शताब्दी को बैंकिंग के विस्तार और विकास का दौर क़रार दिया जा सकता है। वक्त के साथ-साथ बैंकिंग में विविधताएँ, बैंकों के कार्यों में विस्तार और बैंकिंग के काम में जटिलता ज्यादा-से-ज्यादा पैदा होती चली जा रही है। आज बैंकों के काम बहुत कलात्मक और जटिल हो गए हैं। इतने कलात्मक और जटिल कि इस कला को सीखने के लिए विधिवत रूप से शिक्षण संस्थाएँ क़ायम हैं। दुनिया की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटियों में बैंकिंग की संस्थाएँ और स्कूल या विभाग क़ायम हैं, जहाँ बैंकिंग के ज्ञान और कला पर जाँच भी हो रही है और उच्च शिक्षा भी हो रही है।

बैंकों की गतिविधियाँ यों तो अनगिनत हैं, लेकिन उन्हें समझने के लिए हम कुछ शीर्षकों में बाँट सकते हैं—

1. मुशावरती ख़िदमात (सलाहकार सेवाएँ) 

2. पूँजी निवेश में सहायता एवं सहयोग 

3. बचतों की सुरक्षा 

4. क़र्ज़ उपलब्ध कराना 

5. प्रत्यक्ष पूँजी निवेश (एफ़डीआई) 

6. सुरक्षित अमानत-घरों की उपलब्धता 

7. कारोबार में सहयोग 

8. जायदादों की व्यवस्था 

ये आठ प्रकार की वे बड़ी-बड़ी सेवाएँ हैं जो बैंक करते हैं। सलाहकार सेवाओं का दायरा बड़ा व्यापक है। विभिन्न बैंकों के पास विभिन्न प्रकार की महारतें उपलब्ध होती हैं। बैंक विभिन्न लोगों को मश्वरे भी देते हैं। आयात एवं निर्यात के मामलों में मश्वरे देते हैं। बहुत-से आर्थिक मामलों में बैंकों के मश्वरों के आधार पर बड़े-बड़े पूँजी निवेश होते हैं। फिर बैंक पूँजी निवेश या ‘इस्तिस्मार’ (लाभ प्राप्त करने) में सहायता करता है। बैंक को मालूम है कि कहाँ किस प्रकार का पूँजी निवेश हो रहा है। किस पूँजी निवेश में लाभ की सम्भावनाएँ ज्यादा हैं, किस पूँजी निवेश में लाभ की सम्भावनाएँ कम हैं।

बचतों की सुरक्षा का काम तो सब जानते हैं कि बैंकों में होता है। हर व्यक्ति अपनी बचत और ज़रूरत के अतिरिक्त रक़म बैंकों में रखना चाहता है। बैंकों में रक़में रखने का सबसे बड़ा और मूल उद्देश्य सुरक्षा होता है। घरों में, दुकानों में, दफ्तरों में नक़द रक़म की सुरक्षा तुलनात्मक रूप से मुश्किल काम है। लेकिन बैंकों के पास जमा कराने से यह रक़म सुरक्षित हो जाती है। फिर पूँजी निवेश का काम बहुत-से बैंक प्रत्यक्ष रूप से भी करते हैं और बैंकों के द्वारा विभिन्न लोग खुद करते हैं।

बैंकों के पास ऐसे सुरक्षित अमानत-घर मौजूद होते हैं जहाँ अगर कोई व्यक्ति अपनी क़ीमती दस्तावेज़ात, ज़ेवरात या अन्य क़ीमती चीजें सुरक्षित रखना चाहे तो बैंक उसका पारिश्रमिक लेकर जगह उपलब्ध कर देता है। वहाँ लोहे के संदूक़ बने होते हैं। लोहे के इन संदूकों में से एक संदूक़ किराए पर लेने वाला अपनी क़ीमती चीजें सुरक्षित रख सकता है।

फिर बैंक विभिन्न कारोबारों में सहयोग करते हैं। जायदाद का प्रबन्ध भी बैंकों के हवाले किया जा सकता है। अगर आपकी कोई जायदाद किसी विदेश में है, आपने वहाँ कोई उद्योग खरीदा या कोई बड़ा व्यापार आपने शुरू किया तो बैंक उसमें आपकी सहायता कर सकता है। आप यहाँ बैठे हुए हैं, यहाँ से बैठकर आप उसकी निगरानी नहीं कर सकते। यह ज़िम्मेदारी कुछ बैंक संभाल लेते हैं और आपके वकील के तौर पर आपकी जायदाद का प्रबन्ध करते हैं और इसका पारिश्रमिक वसूल करते हैं।

इन सेवाओं में एक महत्वपूर्ण सेवा और महत्वपूर्ण काम बैंकों का यह है कि वे रक़मों के स्थानांतरण, देय रक़मों की वसूली और इसके अलावा बहुत-से काम अंजाम देते हैं। आपको यहाँ से विदेश रक़म भेजनी है तो आप बैंक के द्वारा भेज सकते हैं। आपको अपने क़र्ज़ वसूल करने हैं, आपकी जायदाद कराची में है, जो वहाँ आपने किराए पर दी हुई है, हर महीने उसका किराया वसूल करना है। आप यह ज़िम्मेदारी बैंक के सुपुर्द कर दें, बैंक उसका किराया वसूल करेगा, आपके हिसाब में जमा करता रहेगा। इस सेवा का पारिश्रमिक आपसे वसूल करेगा। एल.सी. खोलना भी बैंक के द्वारा ही होता है। अगर आप आयात-निर्यात का व्यापार करते हैं तो आपको विदेश रक़म अदा करनी पड़ती है, इसके लिए आप बैंक के पास एल.सी. खोलते हैं जिसके द्वारा आप विदेश रक़म भेज सकते हैं। फिर बैंक गारंटी की ज़रूरत पड़ती है जो ‘किफाला’ का एक प्रकार है और ‘किफाला’ के नियमों के तहत उसको अनुशासित कर दिया जाए तो यह शरीअत के बिलकुल मुताबिक है। आप किसी व्यक्ति से बहुत बड़े पैमाने पर व्यापार करना चाहते हैं और आपका दूसरा पक्ष जो आपसे परिचित नहीं है, इस बात को जानना चाहता है कि आपकी आर्थिक स्थिति क्या है, क्या आप इतने बड़े व्यापार में हाथ डालने के योग्य भी हैं या नहीं। यह काम बैंक कर देता है और गारंटी कर देता है। बैंक गारंटी के आधार पर दूसरे पक्ष को इत्मीनान हो जाता है और वह आपके साथ मामला करने के लिए तैयार हो जाता है। बैंक गारंटी उपलब्ध करने का काम बड़े-बड़े ठेकेदार भी करते हैं, उद्योगपति भी करते हैं, पूँजी निवेशक भी करते हैं। गोया बैंक गारंटी की ज़रूरत हर व्यक्ति को हर वक्त पड़ सकती है।

बैंक क्रेडिट कार्ड भी जारी करते हैं। क्रेडिट कार्ड गोया बैंक की तरफ से एक अनुमति-पत्र है। आप जब चाहें, जितनी रक़म चाहें बैंक से उधार ले लें और इसके आधार पर खरीदारी कर लें। अगर उधार का यह काम शरीअत के नियमों के मुताबिक हो, अगर इसमें शरई तौर पर कोई आपत्तिजनक बात न हो तो यह एक सुविधा है जो बैंक की ओर से उपलब्ध होती है।

गोया ये वे बड़े-बड़े लाभ और सेवाएँ हैं जो बैंक उपलब्ध करता है। बैंकों के कर्तव्यों में सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण कर्तव्य, जो दरअसल बैंकों के लिए सबसे बड़ा कर्तव्य की हैसियत रखता है, वह क्रेडिट क्रिएशन (Credit Creation) कहलाता है। यानी क़र्ज़ों को उपलब्ध कराना और क़र्ज़ वजूद में लाने का काम बैंक करते हैं। यहाँ तक कि बैंकों की परिभाषा ही यह है कि बैंक से अभिप्रेत वह संस्था है जो क़र्ज़ों का व्यापार करती हो और व्यापार से सम्बन्धित दस्तावेज़ का भी काम करती हो। व्यापारिक दस्तावेज़ और क़र्ज़ों का व्यापार ही बैंकों का बुनियादी काम है। शेष तमाम काम, जिनमें से कुछ बहुत लाभकारी हैं, जिनमें से कुछ के शरई रूप से जायज़ होने में कोई संकोच नहीं, वे बैंकों के आंशिक काम हैं। बैंक कई तरह के क़र्ज़ जारी करते हैं। उनमें लघु अवधि के क़र्ज़ भी होते हैं और दीर्घकालिक क़र्ज़ भी होते हैं। पैदावारी और व्यापारिक क़र्ज़ भी होते हैं और निजी ख़र्चों के लिए ‘सरफ़ी क़र्ज़’ भी होते हैं। बैंक इन तमाम क़र्ज़ों पर ब्याज वसूल करते हैं। यही बैंकिंग व्यवस्था पर सबसे बड़ा एतराज है कि वे अपना बहुत-सा महत्वपूर्ण और लाभकारी काम ब्याज में लिप्त होने की वजह से नाजायज़ कर देते हैं। अगर बैंकों की व्यवस्था से ब्याज और चंद एक और ख़राबियाँ—उदाहरणार्थ ‘ग़रर’ (धोखा) और ‘क़िमार’ (जुआ) वगैरह—को समाप्त कर दिया जाए तो बैंकों के तमाम काम न केवल अत्यन्त लाभकारी और ज़रूरी हैं, बल्कि देश और समाज के आर्थिक एवं भौतिक विकास के लिए अपरिहार्य हैं। बैंकों के लघु अवधि क़र्ज़ एक हफ्ते से सोलह हफ्ते तक की संक्षिप्त अवधि के लिए होते हैं। ये क़र्ज़ प्रायः वे होते हैं जिनकी ज़रूरत खुद बैंकों को या बड़े व्यापारियों को पेश आती है। दीर्घकालिक या पैदावारी क़र्ज़ वे होते हैं जो प्रायः उद्योग लगाने के लिए या विकास कार्यों के लिए दिए जाते हैं या बड़े व्यापारों के लिए दिए जाते हैं। ‘सरफ़ी क़र्ज़’ वे होते हैं जो व्यक्तिगत या निजी आवश्यकताओं के लिए दिए जाते हैं। बैंकों के मामलों का अधिकतर भाग इन्हीं क़र्ज़ों के प्रबन्ध और लेन-देन से सम्बन्धित है।

इस संक्षिप्त व्याख्या से यह अंदाज़ा हो जाएगा कि बैंकिंग व्यवस्था का आर्थिक व्यवस्था में अत्यन्त महत्व है। ये आर्थिक व्यवस्था के लिए सम्बन्धित ढाँचे की हैसियत रखते हैं, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे प्रभावकारी साधन हैं और धन भेजने का सबसे आसान और सबसे सुरक्षित साधन हैं। रक़म भेजने की ज़रूरत हर इंसान को हर ज़माने में पेश आती रही है। पुराने ज़माने में यह काम बड़े-बड़े व्यापारी किया करते थे जिनकी तरफ से हुंडियाँ जारी होती थीं। एक व्यापारी जो मक्का मुकर्रमा से व्यापार के लिए शाम (सीरिया) जा रहा है, वह हिजाज़ के किसी ऐसे जाने-माने और विश्वसनीय व्यापारी से, जिसकी दूसरे देशों में भी साख क़ायम हो, हुंडी लेकर चला जाया करता था। और शाम के जिस व्यापारी के नाम हुंडी होती थी, उसको दिखाकर अभीष्ट रक़म वसूल कर लिया करता था। हुंडियों का यह सिलसिला भी पता नहीं कब से जारी है और जब से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार हो रहा है उसी वक्त से हुंडियों का व्यापार भी हो रहा है। आज भी निजी और व्यक्तिगत हुंडियाँ हर जगह जारी हैं। जो काम पहले व्यक्तिगत व्यापारी निजी हुंडियों के द्वारा करते थे, वह काम आजकल व्यापक स्तर पर बैंक कर रहे हैं और रुपये भेजने के लिए उनकी एक विधिवत व्यवस्था है।

बैंकिंग और आर्थिक व्यवस्था की ये ज़िम्मेदारियाँ ख़ास तौर पर आर्थिक मामलों में मध्यस्थता यानी financial intermediation हैं, जिसके विभिन्न अंदाज़ और विभिन्न तरीक़े प्रचलित हैं। यानी बचत करने वालों और रक़म इस्तेमाल करने वालों के दरमियान सम्पर्क, आर्थिक सेवाओं की उपलब्धता, रक़मों का स्थानांतरण, फंड्स का प्रबन्ध, विभिन्न पूँजियों और ज़िम्मेदारियों के गठन, प्रेरणाओं और सेवाओं की उपलब्धता। ये सब तकाज़े अगर इस्लामी आदेशों के मुताबिक अंजाम दिए जाएँ तो वह इस्लामी बैंकिंग कहलाएगी और यही दरअसल इस्लामी बैंकिंग का असल इम्तिहान है कि क्या ये सारे तकाज़े बेहतर तरीक़े से शरीअत के आदेशों के मुताबिक अंजाम दिए जा रहे हैं। अगर ये सब काम शरीअत के आदेशों के मुताबिक अंजाम दिए जाएँ तो बैंकिंग के वे परिणाम निकलने चाहिएँ जो इस्लामी आदेशों का तकाज़ा हैं। इस वक्त बैंकिंग की व्यवस्था इस अंदाज़ की है कि उसकी सारी उठान, उसके उद्देश्य और लक्ष्य और कार्य-प्रणाली, यह सब-का-सब पश्चिमी देशों की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के पक्ष में जाता है। बैंकिंग व्यवस्था जो पूरी दुनिया में प्रचलित है, उसको चंद बड़े-बड़े बैंक नियंत्रित करते हैं। वे बड़े-बड़े बैंक पश्चिमी साहूकारों की मिल्कियत हैं। यों वे सारी दुनिया के बैंकों को और सारी दुनिया के बैंकों के द्वारा सारी दुनिया की दौलत को नियंत्रित करते हैं। इस वक्त पूरी दुनिया की 88 प्रतिशत से अधिक दौलत चौबीस देशों के नागरिकों के पास है और शेष ग्यारह प्रतिशत के लगभग, जो बाकी दौलत है, वह दुनिया के शेष एक सौ नब्बे देशों के नागरिकों के पास समझी जाती है। यह चौबीस देश जिनके पास दुनिया की 88 प्रतिशत से ज़्यादा दौलत है, ये पूरी दुनिया की आबादी का चौदह प्रतिशत से कुछ अधिक हैं। गोया दुनिया की पंद्रह प्रतिशत से कम आबादी, दुनिया की 88 प्रतिशत से ज़्यादा दौलत की मालिक है। और शेष 85 प्रतिशत आबादी जिस शेष दौलत की मालिक बताई जाती है, वह भी वास्तव में इस दौलत की वास्तविक मालिक नहीं है। इसलिए कि वह इस दौलत के इस्तेमाल करने में न स्वायत्त है, न उस दौलत को रखने के इसके पास संसाधन हैं, न उस दौलत का हस्तांतरण बड़े-बड़े पश्चिमी बैंकों की इच्छा के बिना हो सकता है। दुनिया के बड़े पश्चिमी देश और उनके बैंक जब चाहते हैं रक़म भेजने पर प्रतिबंध लगा देते हैं। जब चाहते हैं रक़म भेजने को अपने उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करते हैं।

यह एक सुखद बात है कि पारम्परिक बैंकिंग की कमज़ोरियों का अब एहसास पश्चिमी दुनिया में भी हो रहा है। पश्चिमी दुनिया में भी आखिर सकारात्मक विचार रखने वाले लोग हैं, चरित्रवान, शिष्ट इंसान पाए जाते हैं। ज़रूरी नहीं है कि हर व्यक्ति निजी हित या क्षेत्रीय अथवा देशीय पक्षपात के दृष्टिकोण से हर चीज को देखता हो। जो लोग वहाँ इन पक्षपातों से तुलनात्मक रूप से आज़ाद हैं, उनको उन कमज़ोरियों का एहसास हो रहा है। वहाँ अब नैतिक पूँजी निवेश की आवाज़ें उठ रही हैं। ये आवाज़ें कि पूँजी निवेश और ‘इस्तिस्मार’ की प्रक्रिया नैतिकता के नियमों के मुताबिक होनी चाहिए, यह बात अब वहाँ बहुत अधिक कही जा रही है। कहा जा रहा है कि इज्तिमाई तौर पर ज़िम्मेदार बैंकिंग होनी चाहिए। यानी socially responsible और socially desirable अंदाज़ की बैंकिंग होनी चाहिए। वास्तव में इन शब्दावलियों के द्वारा वे यह कहना चाहते हैं कि नैतिकता और धर्म को देश निकाला देने के बाद जो आर्थिक व्यवस्था क़ायम की गई है, उसके नतीजे में बहुत-सी नैतिक ख़राबियाँ पैदा हुई हैं। इन नैतिक ख़राबियों को दूर करने के लिए नैतिक पूँजी निवेश की ओर पलटा जाना चाहिए।

लेकिन पश्चिम के ये लोग यह बात भूल जाते हैं और यह बात उनको याद दिलाने की ज़रूरत है कि जब तक वे आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था की असल बुनियाद पर काम करते रहेंगे और मूल कर्तव्य यानी क़र्ज़ों के व्यापार और क्रय-विक्रय सम्बन्धी दस्तावेज़ात के आधार पर व्यापार करते रहेंगे, उस वक्त तक नैतिक बैंकिंग के वे परिणाम नहीं निकलेंगे जो वे चाहते हैं। अधिकतर समस्याएँ जो आर्थिक जीवन में पेश आती हैं, वे क़र्ज़ों के व्यापार की वजह से पेश आती हैं। यही वजह है कि शरीअत ने क़र्ज़ों के व्यापार और क़र्ज़ों के आपस में क्रय-विक्रय की सख़्ती से मनाही की है। और वे आदेश जिनका उल्लेख पहले कई बार किया जा चुका है, वे सब इस बात को यक़ीनी बनाने के लिए हैं कि व्यापार का आधार क़र्ज़ न हो, बल्कि वास्तविक सेवाएँ या सम्पत्तियाँ या real assets हों, वास्तविक जायदाद हो, वास्तविक व्यापार हो, वास्तविक उद्योग और इंडस्ट्री हो, ताकि जैसे-जैसे धन में वृद्धि होती जाए उसी हिसाब से असल और वास्तविक विकास में भी वृद्धि होती जाए, असल उद्योग में भी विस्तार होता जाए, असल व्यापार भी उसी हिसाब से पैदा हो, उसी हिसाब से सेवाएँ सामने आएँ, उसी हिसाब से assets और सम्पत्तियाँ क़ायम हों। इस वक्त क्या हो रहा है? इस वक्त यह हो रहा है कि विस्तार निधि या credit creation तो तेज़ी के साथ हो रहा है, लेकिन जितनी तेज़ी से दौलत में विस्तार हो रहा है, उतनी रफ्तार, उतने अनुपात और उतनी तेज़ी के साथ मूल सम्पत्ति में या असल मिल्कियतों में, असल पैदावार में और मूल सेवाओं में विस्तार नहीं हो रहा है। इन दोनों को एक-दूसरे से जोड़ने की ज़रूरत है। इसका यह मतलब नहीं है कि बैंक क़र्ज़ देने का काम बंद कर दें। बैंक जिन उद्देश्यों के लिए क़र्ज़ देते हैं, वे उद्देश्य अपने-आप में शरीअत में नाजायज़ नहीं हैं। अगर एक व्यक्ति बैंक से लघु अवधि यानी एक हफ्ते से चार हफ्ते तक का क़र्ज़ा लेना चाहता है तो इसमें शरई तौर पर कोई बुराई नहीं है। बहुत बार ऐसा होता है कि एक व्यापारी को फौरी तौर पर भुगतान करने के लिए रक़म की ज़रूरत है। उसे रक़म चंद हफ्ते बाद मिलने वाली है, एक महीने बाद मिलने वाली है। अगर वह लघु अवधि क़र्ज़ लेना चाहता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। ऐसी व्यवस्था और प्रबन्ध होना चाहिए कि लघु अवधि क़र्ज़ लेने वाला अपनी ज़रूरत के मुताबिक क़र्ज़ ले सके। ये क़र्ज़ बहुत आसानी से ब्याज रहित बुनियादों पर दिए जा सकते हैं। इन पर बढ़ी हुई रक़म नहीं ली जानी चाहिए। इसलिए कि क़र्ज़ों पर बढ़ी हुई रक़म ‘रिबा’ है। अलबत्ता बैंकों के वास्तविक ख़र्चों को पूरा करने के लिए सर्विस चार्ज लगाया जा सकता है। सर्विस चार्ज के जायज़ होने पर आम तौर पर इस दौर के उलमाए किराम का मतैक्य है। सर्विस चार्ज के नियम-क़ानून बहुत-से उलमाए किराम ने संकलित किए हैं। जहाँ तक दीर्घकालिक क़र्ज़ों का सम्बन्ध है तो अगर यह पैदावारी या व्यापारिक क़र्ज़ हैं, उद्योग और इंडस्ट्री लगाने के लिए हैं, किसी बड़े व्यापार के लिए हैं, किसी बड़े मंसूबे के लिए रक़म उपलब्ध करने की ख़ातिर हैं तो फिर उन्हें ‘मुशारका’, ‘मुज़ारबा’, ‘इजारा’ वगैरह के आधार पर होना चाहिए। निजी और ‘सरफ़ी’ क़र्ज़ जो उदाहरणार्थ इलाज के लिए कोई व्यक्ति लेना चाहता है, बच्चों की शादी या शिक्षा के लिए बहुत-से लोग क़र्ज़ लेना चाहते हैं, घर बनाने के लिए लेना चाहते हैं, हज करने के लिए कोई क़र्ज़ लेना चाहता है। यह काम या तो बैंक करें और इसके लिए ब्याज रहित क़र्ज़ों का कोई उचित प्रबन्ध करें। और अगर बैंक यह काम न कर सकते हों तो यह काम बैतुल-माल को, वक़्फ़ को और इस तरह की संस्थाओं को करना चाहिए। अगर ऐसे औक़ाफ़ (वक़्फ़ सम्पत्तियाँ) क़ायम कर दिए जाएँ जो लोगों को निजी आवश्यकताओं के लिए ब्याज रहित क़र्ज़ दिया करें तो बैंकों का बहुत-सा बोझ भी कम हो जाएगा और आम लोगों की एक वास्तविक ज़रूरत की पूर्ति का प्रबन्ध भी हो जाएगा। ये औक़ाफ़ सरकार भी क़ायम कर सकती है, विभिन्न बैंक भी क़ायम कर सकते हैं, लोग भी क़ायम कर सकते हैं। वक़्फ़ की यह रक़म पूँजी निवेश में लगा दी जाए, इस पूँजी निवेश के नतीजे में जो आमदनी हो, इस आमदनी को भी वक़्फ़ समझा जाए और जिस व्यक्ति को ब्याज रहित क़र्ज़ की ज़रूरत हो—उदाहरणार्थ इलाज के लिए, शादी, शिक्षा, हज वगैरह के लिए—तो वे वहाँ से ब्याज रहित क़र्ज़ ले लें।

इसी तरह बैतुल-माल में इस बात का प्रबन्ध हो सकता है। पाकिस्तान में बैतुल-माल अलहम्दुलिल्लाह मौजूद है। यह संस्था पंद्रह साल से काम कर रही है। अगर बैतुल-माल में ऐसा प्रबन्ध कर दिया जाए कि एक रिवॉल्विंग फंड हो, उसको किसी कामयाब और जायज़ पूँजी निवेश में लगा दिया जाए। उदाहरणार्थ उसके शेयर्स खरीद लिए जाएँ और इस फंड की आमदनी से निजी उद्देश्यों के लिए लोगों को ब्याज रहित बुनियादों पर सरफ़ी क़र्ज़ दिए जाएँ तो यह बैतुल-माल के उद्देश्य के ऐन मुताबिक होगा और आम लोगों की बहुत बड़ी तादाद इससे फायदा उठा सकेगी। इस वक्त होता यह है कि बैतुल-माल की रक़में हक़दारों में बाँटी जाती हैं। ज़रूरतमंदों की ज़रूरत इससे पूरी की जाती है। लेकिन सार्वजनिक स्तर पर जो शिकायतें पाई जाती हैं, वे इस बात की द्योतक हैं कि बैतुल-माल अभी तक अपने उद्देश्यों को पूरा करने में कामयाब नहीं हुआ। इसकी वजह यह है कि हमारे देश में सरकारी संसाधनों की बरबादी का आम रिवाज हो गया है, सियासी हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार, परिवारवाद, निजी पसंद-नापसंद का कल्चर बहुत मज़बूत है। इन समस्याओं की वजह से बैतुल-माल की संस्थाओं को वह विश्वास प्राप्त नहीं हो सका जो प्राप्त होना चाहिए। अगर क़र्ज़ों की यह स्कीम बैतुल-माल में शुरू कर दी जाए तो बड़े पैमाने पर लोग इससे लाभान्वित होंगे। जो बैतुल-माल से क़र्ज़ लेकर हज करके आएगा, वह ज़िंदगी-भर बैतुल-माल का शुक्रगुज़ार होगा। यह वे काम हैं जो इस्लामी बैंकों को भी करने चाहिएँ। कुछ आधुनिक विद्वानों ने इस्लामी बैंकों की स्थापना को शरई तौर पर फ़र्ज़े-किफाया क़रार दिया है। वे यह कहते हैं कि शरीअत का उसूल है “जो चीज़ शरई तौर पर वाजिब (अनिवार्य) हो और किसी और चीज़ को इख्तियार किए बिना उस पर यथोचित अमल न हो सके तो उस चीज़ को अपना लेना भी वाजिब हो जाता है।” इसलिए बहुत-से ऐसे दीनी उद्देश्य हैं, शरई आदेश हैं जिन पर अमल करने के लिए इस्लामी बैंकों की स्थापना ज़रूरी है या बैंकिंग की इस्लामी संस्थाओं की आधारशिला रखना ज़रूरी है।

‘रिबा’ से बचना फ़र्ज़े-ऐन (परम कर्तव्य) है और हर मुसलमान की निजी ज़िम्मेदारी है। इस्लामी बैंकों की स्थापना ‘रिबा’ से बचाव के लिए ज़रूरी है। अतः जो लोग इस्लामी बैंकों की स्थापना को फ़र्ज़े-किफाया (वह फ़र्ज़ जो कुछ लोग भी निभा दें तो काफ़ी है) क़रार देते हैं, उनकी बात वज़न रखती है। इस्लामी बैंकों की स्थापना पर कमो-बेश साठ-सत्तर साल से विचार-विमर्श हो रहा है। यह बात हमारे लिए खुशनसीबी की है कि इस्लामी बैंकिंग पर ग़ौर करने वाले विद्वानों में भारतीय उपमहाद्वीप ने विद्वानों का आम तौर से और पाकिस्तान के विद्वानों का विशेष रूप से नाम और काम सबसे नुमायाँ रहा है। पाकिस्तान में शैख़ अहमद इरशाद मरहूम ने पाकिस्तान बनने के तुरंत बाद आज़ाद मुस्लिम जगत् में सबसे पहले इस्लामी बैंकिंग की धारणा दी, किताबें लिखीं। खुद एक इस्लामी बैंक स्थापित करने के लिए कोशिशें कीं। डॉक्टर मुहम्मद उज़ैर ने पचास और साठ के दशकों में इस पर किताबें लिखीं। डॉक्टर अनवर इक़बाल क़ुरैशी मरहूम ने इस पर उल्लेखनीय बौद्धिक काम किया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के नामवर उस्ताद डॉक्टर नजातुल्लाह सिद्दीकी ने इस पर उल्लेखनीय बौद्धिक काम किया। भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर भी डॉक्टर अहमद अन-नज्जार और डॉक्टर महमूद अबुस-सऊद के नाम इस मामले में बहुत नुमायाँ हैं।

ये लोग तो वे हैं जिन्होंने ब्याज रहित बैंकिंग के विषय पर ज्ञानपरक कार्य किया। जिन लोगों ने व्यवहारतः इस्लामी बैंकों की स्थापना का बेड़ा उठाया, उनमें सबसे नुमायाँ नाम प्रिंस मुहम्मद अल-फ़ैसल का है जो शाह फ़ैसल के साहबज़ादे हैं और उन्होंने यह बेड़ा उस वक्त उठाया जब बहुत कम लोग इस ओर ध्यान दे रहे थे। ख़ास तौर पर मुस्लिम सरकारों के सत्ताधारियों में बहुत संकोच पाया जाता था और वे इस्लामी बैंकों की स्थापना की तरफ आने के लिए आमादा नहीं होते थे। प्रिंस मुहम्मद अल-फ़ैसल ने दुनिया के विभिन्न देशों के दौरे किए। शासकों से मुलाकातें कीं। ज़िम्मेदारों से विचारों का आदान-प्रदान किया और बड़े पैमाने पर जनाधार बनाने में नुमायाँ भूमिका निभाई।

इन तमाम बौद्धिक और व्यावहारिक प्रयासों का नतीजा यह निकला कि इस्लामी बैंकिंग की धारणा नुमायाँ तौर पर लोगों के सामने आ गई। बड़े पैमाने पर इस्लामी बैंक क़ायम होने शुरू हुए और आज इस्लामी बैंकिंग एक हक़ीक़त बन चुकी है। अब यह मात्र एक धारणा नहीं है। अब यह मात्र वैचारिक बहस नहीं है कि इस्लामी बैंकिंग होनी चाहिए या नहीं होनी चाहिए। कुछ कट्टरपंथी विद्वानों या कुछ आइडियलिस्ट चिंतकों की आपत्तियों के बावजूद—और उनकी ये आपत्तियाँ निराधार नहीं हैं—यह सच्चाई है कि इस्लामी बैंक क़ायम हो रहे हैं और इस्लामी बैंकिंग की प्रक्रिया में शिद्दत के साथ तेज़ी आ रही है।

जब हम इस्लामिक बैंक का शब्द इस्तेमाल करते हैं तो हमारी मुराद क्या होती है? इस्लामी बैंकिंग की कोई परिभाषा करने की ज़रूरत नहीं। इस चर्चा से इस्लामी बैंक की धारणा खुद-ब-खुद स्पष्ट हो जाएगी, लेकिन अगर इस्लामी बैंक की कलात्मक परिभाषा करनी ज़रूरी हो तो हम यह कह सकते हैं कि इस्लामी बैंक से अभिप्रेत वह संस्था है जो आधुनिक काल के जायज़ आर्थिक और ख़र्च करने सम्बन्धी मामलों को शरीअत की सीमा के अंदर रहते हुए अंजाम देती हो। हलाल-हराम के नियमों की पाबंद हो। नाजायज़ और हराम व्यापार—उदाहरणार्थ ‘रिबा’, ‘ग़रर’ और ‘क़िमार’ वगैरह—से परहेज़ करती हो। हमारी अन्तर्राष्ट्रीय इस्लामी यूनिवर्सिटी के एक पूर्व शिक्षक और अरब जगत् के पहली पंक्ति के अर्थशास्त्री डॉक्टर अब्दुर्रहमान युसरी ने एक लेख में इस्लामिक बैंक की परिभाषा यह की है कि इस्लामी बैंक से अभिप्रेत बैंकिंग की वह संस्था है जो अपने तमाम मामलों में, पूँजी निवेश की तमाम सरगर्मियों में, अपने प्रबन्धन सम्बन्धी मामलों में इस्लामी शरीअत के आदेशों का पूर्ण प्रावधान करे, शरीअत के उद्देश्यों की पूर्ति को अपना लक्ष्य समझे और एक मुस्लिम समाज की आर्थिक और ख़र्च सम्बन्धी आवश्यकताओं का राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रबन्ध करे।

आप जानते होंगे कि जब से बहुत-से इस्लामी बैंक क़ायम हुए हैं, उस वक्त से इस्लामी बैंकों का एक संघ भी वजूद में आ गया है। इसका नाम है “अल-इत्तिहादुद-दौलीयु लिल-बुनूकिल-इस्लामिया” अर्थात् ‘इस्लामिक बैंकों का अन्तर्राष्ट्रीय संघ’। यह संघ 1977 ई. में क़ायम हुआ था। इसके लिए बाकायदा एक समझौता किया गया था। बहुत-से इस्लामी बैंकों ने मिलकर एक दस्तावेज़ तैयार किया। इस दस्तावेज़ पर बहुत-से बैंकों के ज़िम्मेदार प्रतिनिधियों ने दस्तख़त किए और यों इस्लामी बैंकों का एक संघ वजूद में आया। इस दस्तावेज़ में, जो इस्लामिक बैंकों का संघ क़ायम करने के लिए तैयार किया गया था, इस्लामी बैंक की परिभाषा यह की गई है कि इस्लामी बैंक से अभिप्रेत वे संस्थाएँ या बैंक हैं जिनके बुनियादी क़ानूनों में इस बात को स्पष्ट किया गया हो कि वह शरीअत के आदेशों के मुताबिक अमल करेंगे और किसी प्रकार का ब्याज आधारित लेन-देन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं करेंगे। आज इस धारणा के मुताबिक बहुत-से इस्लामी बैंक क़ायम हैं।

इस्लामी बैंकिंग का यह अनुभव एक-दो दिन में सामने नहीं आया। यह लगभग सत्तर-अस्सी वर्ष का अनुभव है। इस्लामी बैंकिंग का प्रयोग सबसे पहले दक्षिण भारत के मशहूर मुस्लिम राज्य हैदराबाद में हुआ था जिसको खुद हैदराबाद के लोगों ने भी भुला दिया, पाकिस्तान वालों ने भी भुला दिया और लगभग हर उस व्यक्ति ने भुला दिया जिसे हैदराबाद के राज्य को याद रखना चाहिए था।

सबसे पहला प्रयोग इस्लामी बैंकिंग का इसी भुलाए जा चुके साम्राज्य हैदराबाद दक्कन में हुआ। इस अनुभव से कम-से-कम यह बात सामने आई कि इस्लामिक बैंकिंग की धारणाएँ मात्र वैचारिक बहसें नहीं हैं, कोई काल्पनिक विचार नहीं हैं, बल्कि यह एक वास्तविक और व्यावहारिक ज़रूरत के द्योतक हैं और इस पर व्यावहारिक रूप से काम किया जा सकता है। हैदराबाद दक्कन के इस अनुभव के बाद एक हल्की-सी कोशिश पाकिस्तान में हुई, 1950-1951 में। अभी मैंने शैख़ अहमद इरशाद का ज़िक्र किया। वह भी इस मामले में आगे-आगे रहे। और एक लम्बे अरसे तक इस्लामी बैंकों की स्थापना के लिए सक्रिय रहे।

आम तौर पर जिस इस्लामी बैंक का उल्लेख इस्लामी बैंकिंग के इतिहास में किया जाता है, वह मिस्र में ‘मित ग़म्र’ का इस्लामिक बैंक है, जो 1963 में क़ायम हुआ। इस बैंक के बारे में जो कुछ लिखा गया है और जो लेख प्रकाशित हुए हैं, उनसे अंदाज़ा होता है कि यह प्रयोग बहुत कामयाब रहा और कुछ वर्षों के अंदर-अंदर उसकी विभिन्न शाखाएँ विभिन्न शहरों में क़ायम हो गईं। इस सिलसिले में मिस्र के एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और इस्लामी स्कॉलर डॉक्टर अहमद अन-नज्जार की कोशिशें बहुत नुमायाँ थीं। उनकी कोशिशों से 1961 में इस बात की सरकारी स्वीकृति प्राप्त हुई कि एक इस्लामी बैंक क़ायम किया जाए। फिर 1963 में यह बैंक क़ायम हुआ और चार साल के अंदर-अंदर उसकी नौ ब्रांचें पूरे देश के अंदर क़ायम हो गईं। दो सौ के क़रीब कार्यकर्ता उससे जुड़े थे। एक लाख उसके ग्राहक और उसके साथ लेन-देन करने वाले थे।

लेकिन इस बैंक की सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि सरकारी संस्थाओं की ओर से इसे न केवल असहयोग का सामना था, बल्कि सख़्त प्रकार की रुकावटें पेश आती रहती थीं। असहयोग की यह समस्या हर उस देश में पेश आती है जहाँ ब्यूरोक्रेसी का अमल-दखल मामलात में बहुत ज़्यादा हो। मिस्र में भी सरकारी संस्थाओं की इच्छा और कोशिश यह थी कि इस बैंक को अपने नियंत्रण में रखें, नियंत्रण इनका हो, कड़ी सरकारी निगरानी में इन बैंकों को और उनकी ब्रांचों को काम करने की इजाज़त दी जाए। दूसरी तरफ उन बैंकों की कामयाबी का दारोमदार इस पर था कि वे स्थानीय हों और स्थानीय शाखाएँ स्वायत्तता प्राप्त हों। जब तक यह स्थानीय शाखाएँ आत्मनिर्भर रहीं और बैंक पर ब्यूरोक्रेसी का नियंत्रण नहीं था, उस वक्त तक यह प्रयोग सफल रहा। जब इन सब चीजों को केन्द्र सरकार के नियंत्रण में ले लिया गया तो बैंक का कार्य-प्रदर्शन बहुत प्रभावित हुआ और बहुत जल्द यह बैंक कमज़ोरी का शिकार होने लगा।

इसके बाद बाकायदा पहला इस्लामी बैंक भी मिस्र ही में क़ायम हुआ। सन् 1971 में मिस्री वित्त मंत्रालय ने ‘बैंक नासिरुल-इज्तिमाई’ के नाम से एक बैंक क़ायम किया। यह एक सरकारी बैंक था, जो सरकारी संसाधनों से वजूद में आया था। हर प्रकार के टैक्स और ड्यूटी से मुक्त था और महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस पर बैंकिंग का कानून लागू नहीं होता था। बैंकिंग कानून के लागू होने के कुछ लाभ भी होते हैं और कुछ नुक़सान भी। इसी तरह से बैंकिंग कानून के इस बैंक पर लागू न होने के भी कुछ लाभ थे, कुछ नुक़सान थे। बहरहाल यह बैंक किसी-न-किसी हद तक काम करता रहा और कामयाब रहा। इसी दौरान प्रिंस मुहम्मद अल-फ़ैसल सक्रिय हुए। इस्लामी विकास सम्बन्धी बैंक 1975 ई. में क़ायम हुआ। फिर दुबई इस्लामिक बैंक क़ायम हुआ। फिर एक-एक करके इस्लामी विकास सम्बन्धी बैंकों की स्थापना शुरू हुई और पूँजी निवेश की बहुत-सी इस्लामी कम्पनियाँ भी वजूद में आ गईं।

हम यह कह सकते हैं कि सन् 70 का समय इस्लामी बैंकिंग के जन्म लेने का दौर है। इस दौर में दुबई, सूडान, मिस्र, कुवैत और बहरीन में कई इस्लामी बैंक वजूद में आए। इन देशों में इन बैंकों को कुछ छूटें भी दी गईं। कुछ देशों में इन बैंकों को नियमों और पाबंदियों से आज़ाद किया गया। सूडान में 1977 में क़ायम होने वाले इस्लामी बैंक को बैंकिंग आदेशों के मुताबिक कुछ कानूनों से आज़ाद क़रार दिया गया। इसी साल यानी 1977 से ही मिस्र में जब इस्लामिक बैंक क़ायम हुआ, तो यह बैंक कानून के द्वारा वजूद में आया। इसको भी कई विशेषाधिकार दिए गए और कई कानूनों से मुक्त रखा गया। इस बैंक की स्थापना में मिस्र के वक़्फ़ मंत्रालय की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी और शैख़ अन-नज्जार और औक़ाफ़ मंत्री को इस बैंक के द्वारा ज़कात के वितरण की निगरानी का काम भी सुपुर्द किया गया था। यह एक अच्छा काम था कि ज़कात के वितरण का काम भी वक़्फ़ मंत्रालय की तरफ से इस बैंक के सुपुर्द किया गया। इसके बाद शरई निगरानी की एक कमेटी बनाई गई जो उसके मामलात की शरई तौर पर निगरानी करती थी। लेकिन अफसोस कि यह बैंक अभी पूरे तौर पर बनने नहीं पाया था कि 1981 में उनमें से कई विशेषाधिकार वापस ले लिए गए। इन विशेषाधिकारों के वापस लेने का नतीजा यह निकला कि बैंक जिस ज़ोर-शोर से शुरू हुआ था, उसमें कमी आ गई और फिर वह बात पैदा नहीं हो सकी जिसकी लोग आशा कर रहे थे।

यह बात केवल मिस्र में ही नहीं, बल्कि और भी कई मुस्लिम देशों में हुई कि सरकारी रवैया आरम्भ में उदासीनता और तटस्थता का था। शुरू-शुरू में सरकार का वक़्फ़ मंत्रालय, वित्त मंत्रालय आदि का रवैया यह होता था कि दूर-दूर से देखो। अगर प्रयोग सफल होता नज़र आए तो उसको अपनी कामयाबी क़रार दो और अगर नाकाम होता नज़र आए तो यह कहो कि देखो हम पहले ही कह रहे थे कि यह नहीं चल सकता। इस रवैये से कोई सार्थक और प्रभावकारी और नई तबदीली नहीं आ सकी। शुरू-शुरू में इन देशों के स्टेट बैंकों ने इस्लामी बैंकों के मामलों में कोई दिलचस्पी नहीं ली। न नियम बनाए, न निगरानी करने की कोशिश की और बड़ी हद तक यह सारा काम एक प्राइवेट कोशिश के तौर पर ही जारी रहा।

इसके बाद जब 1980 का दशक आया तो 1980 के दशक से इस्लामी बैंकिंग पर ध्यान तुलनात्मक रूप से अधिक दिया जाने लगा और होते-होते यह काम बड़े पैमाने पर शुरू हो गया। जब 1990 का दशक शुरू हुआ, उदाहरणार्थ 1992 में हम कह सकते हैं तो पूरे मुस्लिम जगत् में पचपन इस्लामिक बैंक काम कर रहे थे। चौंतीस पूँजी निवेश की इस्लामी कम्पनियाँ काम कर रही थीं और तीन आर्थिक होल्डिंग कम्पनियाँ थीं। गोया 92 संस्थाएँ इस्लामी बैंकिंग के लिए काम कर रही थीं। उनमें 56 संस्थाएँ मुस्लिम देशों में थीं और 36 संस्थाएँ ग़ैर-मुस्लिम देशों में। लेकिन अफसोस यह है, और यह बात दुख से कहनी पड़ती है कि इन मुस्लिम देशों में जो 56 संस्थाएँ काम कर रही थीं, उनमें पाकिस्तान शामिल नहीं था। पाकिस्तान में इस्लामी बैंकिंग की सारी चर्चाओं के बावजूद 1990 के दशक के अंत तक विधिवत रूप से कोई इस्लामी बैंक क़ायम नहीं हुआ था। ‘अल-बरका’ बैंक ने एक ब्रांच क़ायम की जो सीमित ढंग से काम करती रही। फिर उसकी एक-दो ब्रांचें और भी बनीं। अब पिछले चंद वर्षों से, इक्कीसवीं शताब्दी के आरम्भ से, इस्लामिक बैंकिंग की संस्थाओं में तुलनात्मक रूप से तेज़ी आई है।

इस वक्त इस्लामी बैंकिंग के बारे में आम तौर पर दो परस्पर विरोधी रवैये पाए जाते हैं। एक रवैया तो उन लोगों का है जो इन बैंकों से जुड़े हैं। वे यह दावा करते हैं कि उनका काम सौ प्रतिशत मानकीकृत है। हर दृष्टि से मिसाली है और पूरी तरह इस्लामी कार्य-प्रणाली के मुताबिक बैंकिंग का सारा काम हो रहा है। कम-से-कम इन बैंकों द्वारा प्रकाशित पब्लिसिटी सामग्री से यही अंदाज़ा होता है। दूसरी तरफ कुछ आलोचकों का रवैया है जो इस्लामी बैंकिंग के सारे काम को पूरी तरह फ़्रॉड क़रार देते हैं। जो इस्लामी बैंकिंग की इस सारी कोशिश को एक ढकोसला समझते हैं। ये दोनों रवैये ग़लत हैं। न वर्तमान इस्लामी बैंकिंग सौ प्रतिशत मानकीकृत है और न बिलकुल ढकोसला है। इसको शरीअत के आदेशों के मुताबिक सौ प्रतिशत मानकीकृत होने में वक्त लगेगा। यह काम एक-दो दिन का नहीं है। इस काम में वर्षों लग सकते हैं। कितने दशक लगेंगे, अल्लाह बेहतर जानता है। लेकिन यह काम विभिन्न चरणों और विभिन्न श्रेणियों से गुज़रकर ही अपने आदर्श और पूर्ण रूप में सामने लाया जा सकेगा, बशर्ते कि सरकारों की तरफ से रुकावटें न हों, बशर्ते कि ब्यूरोक्रेसी की तरफ से रवैया विरोधपूर्ण न हो, बशर्ते कि स्टेट बैंकों का रवैया दोस्ताना हो, बशर्ते कि व्यापारी बिरादरी ब्याज रहित बैंकिंग को अपनाना चाहती हो। ये तमाम शर्तें बड़ी महत्वपूर्ण हैं। इन सबको नज़रअंदाज़ करके यह आशा करना कि इस्लामी बैंकिंग बस ज़रा-सी कोशिश से क़ायम हो जाएगी, एक बहुत बड़ी और अफसोसनाक नादानी है। सबसे पहले व्यापारी और कारोबारी बिरादरी को शरीअत के आदेशों पर अमल करने के लिए आमादा करना ज़रूरी है। जब तक वे आमादा नहीं होंगे, ब्याज रहित व्यापार और बैंकिंग की कोई कोशिश कामयाब नहीं हो सकती। उन्हें आमादा करने और समर्थक बनाने का काम इस्लामी विद्वानों का है। यह काम सरकारों या स्टेट बैंक का नहीं है। सरकारों का काम फ़ैसला करना और सुविधाएँ उपलब्ध करना है। स्टेट बैंक का काम नियम-क़ानून उपलब्ध करना और निगरानी करना है और वे सुविधाएँ पैदा करना है, जो वही पैदा कर सकता है।

वर्तमान इस्लामी बैंकिंग के बारे में हम यही कह सकते हैं कि यह इस्लाम के आदर्श लक्ष्य और मंज़िल की तरफ बढ़ रही है। कितना मरहला सफर का तय हो चुका है और कितना मरहला बाकी है, इसके बारे में अंदाज़े अलग-अलग हो सकते हैं, मत विभिन्न हो सकते हैं, लेकिन इससे कोई समझदार व्यक्ति मतभेद नहीं कर सकता कि अभी हमें बहुत आगे जाना है।

यह बात कि आप अपने ज़ेहन में एक आइडियल और आदर्श धारणा रखते हैं, जो चीज़ उस मानकीकृत और आदर्शवादी धारणा के मुताबिक न हो, उसको पूरी तरह फ़्रॉड, धोखेबाज़ी और ढकोसला क़रार दें तो यह सही इस्लामी रवैया नहीं है। आज कितने मुसलमान हैं जिनका इस्लाम से जुड़ाव का दावा बहुत हद तक मानकीकृत और आदर्श है? जिनकी ज़िंदगी बहुत हद तक इस्लामी दृष्टि से आदर्श है? ज़ाहिर है ऐसे खुशनसीब ईमान वाले बहुत कम हैं। क्या मात्र इस वजह से कि निष्ठावान मुसलमान बहुत कम हैं, एक आम और सीधे-सादे मुसलमान के इस्लाम के दावे को धोखा और फ़्रॉड क़रार दिया जाएगा, क्या आम लोगों के इस्लाम से सम्बन्धित दावे को ढकोसला क़रार दिया जाएगा? नहीं। यह एक भावनात्मक बात है। चूँकि आम लोगों को जल्दी अपील करती है इसलिए ये ग़ैर-ज़िम्मेदाराना शब्द और शब्दावलियाँ कुछ लोग इस्तेमाल करते हैं। बजाय इसके कि यह देखा जाए कि यह काम कितना बड़ा है, जिन लोगों ने शुरू किया है उन लोगों ने कितनी निष्ठा से शुरू किया था। इस काम के शुरू किए जाने में कितने निष्ठावान इंसानों के बौद्धिक और वैचारिक प्रयास और कितने लोगों की रातों की नींद और दिनों का चैन इसमें शामिल है। और किन मुश्किलों से वे इस क़ाफिले को इस चरण तक लाए हैं। इसका एहसास न करना और व्यंग्य एवं कटाक्ष के तीर उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं पर छोड़ना कोई इस्लामी रवैया नहीं है।

दूसरी ओर सरकारों का मामला भी विभिन्न मुस्लिम देशों में अलग-अलग है। कुछ देश ऐसे हैं जहाँ दोहरी व्यवस्था चल रही है। मिस्र, उर्दुन और कई पश्चिमी देशों में दोनों प्रकार की व्यवस्था प्रचलित हैं। आधुनिक पारम्परिक बैंक भी पूरे ज़ोर-शोर से काम कर रहे हैं और उनके समानान्तर इस्लामी बैंकों को भी काम करने की अनुमति दे दी गई है। कुछ देश वे हैं जो बैंकिंग की पूरी व्यवस्था को पूर्ण इस्लामी दिशा-निर्देशों के अनुसार ढालने के दावेदार हैं। यह देश ईरान और सूडान हैं और यह कहते हुए बहुत दुख होता है कि एक ज़माने में पाकिस्तान भी इन देशों में शामिल था। अस्सी का दशक था वह जब पाकिस्तान में ज़ोर-शोर से इस पूरी व्यवस्था को इस्लामी दिशा-निर्देशों के अनुसार ढालने की बात की जा रही थी और तेज़ी के साथ इस काम में पहल हो रही थी। लेकिन यह सिलसिला रुक गया और वह परिवर्तन जिसकी आशा की जा रही थी, वह अमल में नहीं आ सका। अब पाकिस्तान में भी कम-से-कम सरकारी स्तर पर दोगली या दोहरी व्यवस्था की बात हो रही है। स्टेट बैंक की निगरानी में पारम्परिक बैंक भी पिछली बार की तरह काम कर रहे हैं और उनके साथ-साथ इस्लामी बैंकों को भी काम करने की इजाज़त दे दी गई है। यह इजाज़त जो पाकिस्तान में पहली बार दी गई, इसका क्रेडिट स्टेट बैंक के पूर्व गवर्नर डॉक्टर इशरत हुसैन को जाता है जिन्होंने गम्भीरता और निष्ठा के साथ कोशिश की कि पाकिस्तान में इस्लामी बैंकिंग को बढ़ावा दिया जाए।

ग़ैर-मुस्लिम देशों में जहाँ-जहाँ इस्लामी बैंकिंग शुरू हुई है वहाँ बहुत-से देश तो ऐसे हैं जहाँ की बैंकिंग व्यवस्था इस्लामी बैंकिंग को अब तस्लीम करने लगी है और वहाँ के कानूनों और व्यवस्था में इसकी गुंजाइश पैदा कर दी गई है कि इस्लामी बैंकिंग की संस्थाएँ क़ायम की जाएँ। उदाहरणार्थ ब्रिटेन में यह गुंजाइश कानूनी रूप से पैदा कर दी गई है। लेकिन जिन देशों में इस्लामी बैंकिंग के तकाज़ों को वहाँ का कानून स्वीकार नहीं करता, जो बड़ी संख्या में हैं, वहाँ ऐसी मिसालें मौजूद हैं कि मुसलमानों ने निजी तौर पर ‘तमवील’ (धनवान बनाना) और व्यापार के इस्लामी आदेशों पर अमल करने का फ़ैसला किया। इस गरज के लिए संस्थाएँ बनाईं और वे संस्थाएँ बहुत कामयाब रहीं। आज से पच्चीस साल पहले अमेरिका में कुछ मुसलमानों ने मुसलमानों की आवास सम्बन्धी आवश्यकताओं और मुश्किलों का एहसास करते हुए एक संस्था बनाई जिसको ब्याज रहित बुनियादों पर चलाया। और बहुत-से लोग इससे जुड़े। उन्होंने इस्लामी आदेशों के मुताबिक इसमें पूँजी निवेश की और अपना एक सेंटर बनाने में कामयाब हुए।

हाल ही में कई मशहूर पश्चिमी बैंकों ने भी इस मैदान में क़दम रखा है। और कई इस्लामी तरीक़े यानी प्रोडक्ट्स बनाकर जारी किए हैं। इन बैंकों में सिटी बैंक, हांगकांग, शंघाई बैंक वगैरह और अमेरिका की एक मशहूर फाउंडेशन भी शामिल है। इन सबने अपनी-अपनी इस्लामी ब्रांचें, इस्लामी उप-संस्थाएँ यानी कम्पनियाँ क़ायम की हैं और उनके लिए जो दस्तावेज़ात जारी किए हैं, वे अधिकतर इस्लामी आदेशों के मुताबिक हैं और मुसलमान आलिमों के मश्वरे से तैयार किए गए हैं।

इस्लामी बैंकिंग में जो रुकावटें हैं, वे कानूनों के रास्ते से भी आ रही हैं और कुछ दूसरे कारणों से भी पैदा हो रही हैं। बैंकों के जो प्रचलित कानून हैं, वे पारम्परिक बैंकिंग के लिए बनाए गए हैं। इस्लामी बैंकिंग के लिए इन कानूनों के तहत काम करना मुश्किल होता है। कुछ फ़िक़ही रायें भी जिनका इज़हार कुछ आलिमों ने किया है, वे भी रुकावट हैं। कुछ फ़तवे जो बैंकिंग की व्यवस्था को समझे बिना, बैंकिंग व्यवस्था को जाने बिना, जारी कर दिए गए हैं, उनके द्वारा भी रुकावटें पैदा होती हैं।

फिर जैसा कि मैंने बताया कि आशाएँ इतनी ऊँची हैं कि उनका अनमनी कोशिशों से जल्दी पूरा हो जाना बहुत मुश्किल बात है। इन आशाओं की पूर्ति के लिए बहुत-से लोग यह समझते हैं कि पलक झपकते में ये सब आशाएँ पूरी हो जानी चाहिएँ। अगर आज इस्लामी बैंकिंग शुरू हो जाए तो कल यह पूरी तरह लागू हो जानी चाहिए। जब वे आशाओं को पूरा होते नहीं देखते तो कड़वाहटें पैदा होती हैं। ग़लत-फहमियाँ पैदा करने में पारम्परिक बैंकिंग के लोगों का भी दखल है। बहुत-से पारम्परिक बैंक इस्लामी बैंकिंग को पनपते देखना नहीं चाहते। वे जाने-अनजाने बहुत-सी ग़लत-फहमियाँ पैदा करते रहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को धोखा बताते हैं। बज़ाहिर कुछ मामले ऐसे हैं कि पारम्परिक और इस्लामी बैंकिंग के मामलात में फ़र्क़ ज़्यादा नुमायाँ तौर पर महसूस नहीं होता, लेकिन शरीअत के बहुत-से आदेशों में ऐसा है कि जायज़ और नाजायज़ में जो फ़र्क़ है, वह कार्य-प्रणाली का फ़र्क़ होता है। बहुत-से मामलात शरीअत में जायज़ हैं, बहुत-से नाजायज़ हैं। एक ही काम को एक तरीक़े से किया जाएगा तो जायज़ होगा, दूसरे तरीक़े से किया जाएगा तो नाजायज़ होगा। इसलिए यह समझना कि चूँकि काम वही है जो पारम्परिक बैंकों में हो रहा है अतः यह नाजायज़ होना चाहिए, यह बात हर जगह और हर स्थिति में दुरुस्त नहीं है।

इसके अलावा जो रुकावटें हैं, वे सरकारी पॉलिसियों की, शिक्षा व्यवस्था की, व्यापारी और कारोबारी वर्ग में इस्लामी बैंकिंग और शरीअत से अनभिज्ञता और प्रचलित संस्थाएँ, बैंक और कम्पनियाँ हैं। इन चार रुकावटों के साथ यह कहने की अनुमति दीजिए कि कुछ उलमाए-किराम का रवैया भी इस रास्ते में रुकावट है।

1977 से 1985 तक पाकिस्तान में इस्लामी बैंकिंग की प्रक्रिया में तेज़ी आई। जनरल ज़ियाउल-हक़ मरहूम ने 29 सितंबर 1977 को इस्लामी नज़रियाती कौंसिल को यह निर्देश दिया कि वह ब्याज की समाप्ति के लिए प्रस्ताव और दस्तावेज़ात पेश करे। इस्लामी नज़रियाती कौंसिल ने नवंबर 1978 में एक आरम्भिक रिपोर्ट पेश की और फ़रवरी 1979 में ‘रिबा’ की रोकथाम की एक तीन वर्षीय योजना तैयार करके राष्ट्रपति को पेश कर दी। इस तीन वर्षीय योजना का मुद्दा यह था कि क्रमशः तीन वर्ष के अंदर-अंदर ब्याज आधारित मामलों को देश की अर्थव्यवस्था से निकाल दिया जाए और देश की अर्थव्यवस्था को पूर्ण रूप से ब्याज रहित बना दिया जाए। चुनाँचे इस पर अमल करने का आरम्भ हुआ और अगस्त 1979 में यानी रिपोर्ट की स्वीकृति के चंद महीनों के अंदर-अंदर हाउस बिल्डिंग फ़ाइनांस कारपोरेशन के मामलों को ब्याज से पाक कर दिया गया। कारपोरेशन की तरफ से ब्याज रहित गतिविधियों का आरम्भ हुआ। एक जुलाई 1979 को किसानों को ब्याज रहित क़र्ज़ दिए जाने लगे। इस तरह से तेज़ी के साथ इस योजना पर अमल होता नज़र आने लगा। 1980 के मध्य में कम्पनीज़ ऑर्डिनेंस में संशोधन हुआ। ‘मुज़ारबा ऑर्डिनेंस’ आया और एक-एक कर ये परिवर्तन शुरू हुए। इन परिवर्तनों की पृष्ठभूमि जानने के लिए हमें ज़रा पीछे जाना पड़ेगा।

पाकिस्तान में इस्लामी बैंकिंग का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना पाकिस्तान का इतिहास। सन् 1935, 1936, 1937 के वर्षों में क़ायदे-आज़म (मुहम्मद अली जिन्नाह) और अल्लामा इक़बाल के दरमियान जब पत्राचार हो रहा था और प्रस्तावित मुस्लिम राज्य के बहुत-से मामलात पर इन दोनों महानुभावों के दरमियान विचारों का आदान-प्रदान हो रहा था तो इसमें इस्लामी अर्थव्यवस्था के विषयों पर भी विचार व्यक्त किए गए थे। उस दौर के इस महत्वपूर्ण पत्राचार में अल्लामा इक़बाल ने क़ायदे-आज़म के एक सवाल के जवाब में यह लिखा कि पाकिस्तान में मुसलमानों की अर्थव्यवस्था की समस्या, रोटी और ग़रीबी और भुखमरी की समस्या कोई ज़्यादा मुश्किल नहीं है। शरीअत के आदेशों को अगर उचित ढंग से लागू किया जाए तो यह समस्या हल की जा सकती है।

क़ायदे-आज़म ने अपनी ज़िंदगी की जो आखिरी तक़रीर की थी, वह 1 जुलाई 1948 को कराची में स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान का उद्घाटन करते हुए की थी। इसमें उन्होंने पश्चिमी पूँजीवादी व्यवस्था और कम्युनिस्ट व्यवस्था दोनों की ख़राबियों की निशानदेही की थी और यह निर्देश दिया था कि स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान इस्लामी दिशा-निर्देशों के मुताबिक एक नई आर्थिक व्यवस्था का ढाँचा तैयार करे, जिसके आधार पर पाकिस्तान की व्यवस्था ठीक की जाए। इससे बहुत पहले 1942, 1943, 1944 के वर्षों में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई थी जिसमें अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ भी शामिल थे और उलमाए-किराम भी शामिल थे। इस कमेटी की ज़िम्मेदारी यह थी कि भविष्य में क़ायम होने वाले आज़ाद मुस्लिम राज्य के लिए शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिकता के तीनों महत्वपूर्ण विभागों के आदेश संकलित करे। इस नए राज्य की शैक्षिक गतिविधियों को इस्लामी दिशा-निर्देशों पर कैसे ढाला जाए। वहाँ की सियासत और व्यवस्था को इस्लाम के मुताबिक कैसे बनाया जाए और वहाँ की अर्थव्यवस्था को कैसे नए अंदाज़ से संकलित किया जाए।

इसके बाद जब पाकिस्तान में संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई, 1952 में देश के सूफ़ी प्रवृत्ति के प्रधानमंत्री ख़्वाजा नाज़िमुद्दीन मरहूम ने अपना मुसव्वदा (ड्राफ्ट) विधानसभा में पेश किया, 1954 में मुहम्मद अली बोगरा मरहूम का मुसव्वदा सामने आया जो वर्तमान काल में पाकिस्तान के लिए बेहतरीन संवैधानिक ड्राफ्ट था। उसको एक साजिश के तहत ग़ुलाम मुहम्मद ने नाकाम बनाया। असेंबली ऐन वक्त पर तोड़ दी और तैयार शुदा संविधान लागू नहीं हो सका। फिर 1956 के संविधान में, फिर 1962 के बड़े हद तक सेक्युलर संविधान में फ़ील्ड मार्शल अय्यूब ख़ान ने यह बात लिखी। इन सब संविधानों में लिखा हुआ है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था से ब्याज को समाप्त किया जाएगा। 1973 के सर्वसम्मत संविधान में भी यह बात लिखी हुई है कि ‘रिबा’ को जितनी जल्दी सम्भव हो देश की अर्थव्यवस्था से समाप्त किया जाएगा। इस्लामी नज़रियाती कौंसिल ने 1973 में, 1980 में और उसके बाद भी कई बार ब्याज आधारित व्यवस्था की समाप्ति का प्रस्ताव और सिफारिशें पेश की हैं।

फिर 1984 में स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने सर्कुलर नम्बर 13 जारी किया जो जून 1984 को जारी हुआ। इस सर्कुलर में यह बात कही गई थी कि 1 जुलाई 1985 से देश के तमाम मामलात और बैंकिंग की तमाम गतिविधियाँ पूर्ण रूप से इस्लामी दिशा-निर्देशों के मुताबिक होंगी। गोया स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने और पाकिस्तान सरकार ने 1977 से लेकर 1984 तक तमाम ज़रूरी तैयारी कर ली थी। 1 जुलाई 1985 से यह पूरी व्यवस्था परिवर्तित किए जाने का फ़ैसला कर लिया था। लेकिन इस पर अमल नहीं हो सका। दरमियान में लोकतंत्र की वह नीलम-परी सामने आ गई जिसकी प्रतीक्षा में हमारे यहाँ बहुत-से लोग रहते हैं। 1985 में चुनाव हुए। राजनैतिक सत्ता वजूद में आ गई, जिसने इस पूरी प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप से नज़रअंदाज कर दिया। और जो परिवर्तन सन् 1985 के जुलाई से होना चाहिए था, वह रुक गया। और फिर आज तक वह काम दोबारा शुरू नहीं हो सका।

सन् 1980 में जब संघीय शरई अदालत क़ायम हुई तो उस वक्त संघीय शरई अदालत के अधिकार में आर्थिक कानूनों का मामला नहीं था। 1990 में आर्थिक कानून वगैरह के अदालती पुनरावलोकन का मामला उनके अधिकार में आया। 16 नवंबर 1991 को संघीय शरई अदालत ने देश के 22 ब्याज आधारित कानूनों के बारे में अपना मशहूर फ़ैसला दिया। उसके ख़िलाफ उस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी जो इस्लाम का नाम लेकर सत्ता में आई थी। 23 दिसंबर 1999 को सुप्रीम कोर्ट में इस अपील का फ़ैसला हुआ और इस फ़ैसले को बरकरार रखा गया जो संघीय शरई अदालत ने किया था। फिर 2002 में सुप्रीम कोर्ट का अपना फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट की ही एक बेंच ने निरस्त कर दिया और फिर आज भी यही स्थिति क़ायम है। आज हम इसी मरहले पर खड़े हैं जिस मरहले पर 1980 के शुरू में थे।

पाकिस्तान के इस अनुभव के परिणाम और फल देखने के लिए मुस्लिम जगत् में हर जगह बहुत-से लोग प्रतीक्षा कर रहे थे कि इसके परिणाम क्या निकलते हैं। पाकिस्तान में बहुत ज़ोर-शोर से इस्लाम का नारा बुलंद किया गया था। इन नारों ने पूरी दुनिया के मुसलमानों के दिलों में उम्मीद की किरण जगा दी थी। इस्लामी अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञों ने पाकिस्तान के अनुभव पर अपनी नज़रें जमाई हुई थीं और वे यह समझते थे कि पाकिस्तान के अनुभव के प्रकाश में पूरे मुस्लिम जगत् में एक नए दौर का आरम्भ होगा। इस पूरे अनुभव में नेतृत्व की भूमिका पाकिस्तान की थी। पाकिस्तान ने नेतृत्व के इस स्थान को खुद ही खो दिया। अल्लाह तआला ने नेतृत्व और मार्गदर्श का जो पद पाकिस्तान वालों को दिया था, पाकिस्तान वाले स्वयं ही उसे छोड़ बैठे। और अब यह पर्चम दूसरे देशों के हाथ में चला गया है। इन देशों के हाथ में जिनके पास आज भी इतनी जन-शक्ति नहीं है जितनी पाकिस्तान में है। आज भी वे पाकिस्तान वालों के बौद्धिक एवं वैचारिक काम से लाभ उठा रहे हैं। आज भी वे पाकिस्तानी विशेषज्ञों से काम लेने पर मजबूर हैं। जहाँ-जहाँ इस्लामिक बैंकिंग के काम हो रहे हैं वहाँ पाकिस्तानी विद्वान, पाकिस्तानी विशेषज्ञ और पाकिस्तानी लोग आगे-आगे हैं।

सरकारों की इस कोताही और लापरवाही के बावजूद इस्लामी बैंकिंग का काम तेज़ी के साथ फैल रहा है। आज से बारह-तेरह साल पहले 1997 में दुनिया-भर में इस्लामी बैंकिंग में लगी हुई पूँजी कुल एक खरब साठ अरब डॉलर थी। और इसमें दस से पंद्रह प्रतिशत तक वार्षिक वृद्धि हो रही थी। 1999 में इस्लामी बैंकिंग का काम करने वाले बैंक एक सौ सत्तर (170) से अधिक थे। इस संख्या में ईरान और सूडान के बैंक शामिल नहीं हैं। सूडान और ईरान के बैंक उसके अलावा थे। सन् 2000 में इस्लामी बैंकिंग का काम करने वाली संस्थाओं की संख्या का अंदाज़ा दो सौ से अधिक था। 2004-2005 के वर्षों में इन दो सौ से अधिक बैंकों की पाँच हज़ार से अधिक शाखाएँ दुनिया-भर में वजूद में आ चुकी थीं।

अब भी यह पूरा अनुभव अत्यन्त सुखद है। इस काम में तेज़ी आ रही है और नई-नई इस्लामी आर्थिक और मसरफ़ी (उपयोगी) संस्थाएँ आए दिन क़ायम हो रही हैं। इस्लामी बैंकिंग की इस सफलता का अनुमान उसके परिणाम और इस्लामियत से करना चाहिए। अगर इस्लामी बैंकिंग के परिणाम आर्थिक दृष्टि से लाभकारी हैं, कलात्मक दृष्टि से उपयोगी हैं, देश के विकास में प्रभावकारी रूप से भाग ले रहे हैं और शरीअत के आदेशों के मुताबिक हैं तो फिर इस्लामी बैंकिंग सफल है। इमाम शातिबी ने एक जगह लिखा है कि “किसी भी मामले के अंजाम के आधार पर उस मामले का फ़ैसला करना शरीअत का एक तय-शुदा उसूल है।” अतः इस्लामी बैंकरों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे इस बात को यक़ीनी बनाएँ कि उनके मामलात जहाँ कलात्मक दृष्टि से सौ प्रतिशत दुरुस्त हों, वहाँ इस्लामी दृष्टि से भी पूरे तौर पर शरीअत के आदेशों के पाबंद हों।

यह बात कि किसी कलात्मक असफलता की वजह से कोई इस्लामी बैंक असफल हो और उसको इस्लाम के खाते में डाल दिया जाए, इसका ख़ासा खतरा मौजूद है। इसलिए इस्लामी बैंकरों को चाहिए कि बैंकिंग के आधुनिक कलात्मक तकाज़ों की पूरी जानकारी प्राप्त करें और बैंकिंग के जो आधुनिकतम तरीक़े हैं, उनसे भरपूर और पूरा लाभ उठाया जाए, ताकि किसी प्रयोग की कलात्मक असफलता इस्लाम के खाते में न डाली जा सके। इसके लिए ज़रूरी है कि जो प्रचलित प्रोडक्ट्स हैं, उनके इस्लामी विकल्पों पर ज़ोर दिया जाए और आगे असल ज़ोर इस पर होना चाहिए कि जो ‘तमवील’ है वह उसूल यानी सम्पत्तियों और assets के आधार पर हो, ‘दैन’ के आधार पर न हो। यानी सम्पत्तियाँ और asset-based ‘तमवील’ होनी चाहिएँ। debt-creating ‘तमवील’ नहीं होनी चाहिए। दूसरी बात यह कि इस्लामी बैंकिंग को चाहिए कि वह माइक्रो फाइनांसिंग पर ख़ास ध्यान दे। छोटे लोगों को क़र्ज़ देना देश की अर्थव्यवस्था का तकाज़ा भी है, आम लोगों की ज़रूरत भी है और इस्लामी बैंकिंग जितनी तेज़ी से और जितने प्रभावकारी ढंग से छोटी अर्थव्यवस्था में सफल हो सकती है, उतनी तेज़-रफ्तार कामयाबी बड़ी अर्थव्यवस्था में मुश्किल है। बड़ी अर्थव्यवस्था में इस्लामी सुधारों के कामयाब होने में ख़ासा वक्त लगेगा। ‘शिराकत’ (साझेदारी) पर आधारित ‘तमवील’ को यानी participatory financing को प्राथमिकता प्राप्त होनी चाहिए। यह इस्लामी बैंकिंग का वह काम है, जो इस्लामी बैंकर को करना चाहिए।

पारम्परिक बैंकिंग की ख़राबियाँ इसी स्तर से कम होनी चाहिएँ। इसी अनुपात से पारम्परिक बैंकिंग की कमज़ोरियों को दूर किया जाना चाहिए। सट्टा, जुआ, अस्थिरता और लगातार संकट और व्यापारिक चक्कर जो पारम्परिक बैंकिंग की पुरानी ख़राबियाँ हैं, ये इस्लामी बैंकिंग में नहीं होनी चाहिएँ। इस्लामी बैंकिंग में लाभ अगर आए तो वह दो तरीक़े से आना चाहिए। या तो वह लाभ उस चीज़ का लाभ हो जिसके नतीजे में कोई जायदाद या माल (assets) वजूद में आए हैं, या कोई वैल्यू (value) वजूद में आई है। यानी value creation हुई है या asset creation हुई है। मात्र opportunity cost या वक्त की क़ीमत के आधार पर आमदनी नहीं होनी चाहिए। अगर आमदनी मात्र वक्त की क़ीमत के आधार पर हो रही है तो चाहे उसका जो भी नाम रखा जाए और कोई भी मनमाना मतलब निकाल कर, खींच-तान कर उसका औचित्य खोज लिया जाए, वह इस्लाम की मूलात्मा और स्वभाव से मेल नहीं खाता। इस्लाम की आत्मा और तकाज़ों से मेल खाने वाला वही ‘तमवील’ और पूँजी निवेश है जिसके नतीजे में व्यवहारतः कोई व्यापार पैदा हो, कोई उद्योग वजूद में आए, कोई सेवा वजूद में आए, कोई जायदाद वजूद में आए। अतः जितनी व्यापकता दौलत में हो, उतनी ही व्यापकता सम्पत्तियों या उद्योगों या व्यापार में होनी चाहिए। धन का बढ़ना और पूँजी का बढ़ना ये दोनों एक साथ और सन्तुलित ढंग से होने चाहिएँ। जब आदर्श इस्लामी बैंकिंग वजूद में आएगी तो उसके फल भी नज़र आने चाहिएँ। इसके फलों में सबसे बड़ा फल न्याय है, दौलत का न्यायपूर्ण वितरण है। आर्थिक विकास में तेज़ी है। हर वर्ग इन फलों से लाभान्वित होता नज़र आना चाहिए। ‘रिबा’, ‘ग़रर’ और ‘क़िमार’ से पूरे तौर पर मुक्ति मिलनी चाहिए।

यह वे फल हैं जो इस्लामी बैंकिंग के नतीजे में सामने आने चाहिएँ। इस्लामी बैंकिंग के रास्ते में जो बड़े-बड़े चैलेंजेस और मुश्किलें हैं, उनमें से कुछ का मैं ज़िक्र कर चुका हूँ। यह बात मैं फिर दोहराना चाहता हूँ कि किसी अनुभव की कलात्मक ख़राबी का ज़िम्मेदार इस्लामी बैंकिंग को या इस्लामी शरीअत के आदेशों को न ठहराया जाए। इस्लामी कानूनों के लागू होने और इस्लामी सुधारों की कामयाबी के लिए मात्र दीनी जज़्बा काफ़ी नहीं है। इस काम के लिए दुनिया में प्रचलित अनुभवों की जानकारी भी बहुत ज़रूरी है। जर्मनी में मर्चेंट बैंकिंग का अनुभव बहुत कामयाब बताया जाता है। मर्चेंट बैंकिंग की धारणा इस्लामी बैंकिंग के आदेशों से बहुत क़रीब है। अतः अगर जर्मनी में मर्चेंट बैंकिंग कामयाब है तो उससे लाभ उठाकर उसको इस्लामी बैंकिंग के तकाज़ों के मुताबिक ढाला जा सकता है।

मुकाबले और प्रतिस्पर्धा के इस वातावरण में इस्लामी बैंकों के लिए इस्लामी आदेशों की सख़्ती से पाबंदी और सीमाओं का ध्यान रखने में कभी-कभी बैंकों को दुष्वारी महसूस होती है। यह बात दुरुस्त है। आपका मुकाबला एक ऐसे बैंक से है जो शरीअत की सीमाओं का पाबंद नहीं है। नैतिकता के नियमों का पाबंद नहीं है। उसको दौलत कमाने के सैकड़ों रास्ते मिले हुए हैं। आपको जो रास्ते उपलब्ध हैं वे सीमित हैं, हलाल-हराम की पाबंदी आपको करनी है। हराम से परहेज़ करना है। ‘रिबा’ से बचना है। इसलिए मुकाबला मुश्किल तो है, लेकिन इस मुकाबले में कामयाब होने के लिए ज़रूरी है कि जन-साधारण को तैयार किया जाए। कार्यकर्ताओं को, अकाउंटेंट्स को, कानूनी सलाहकारों को, मानसिक रूप से आमादा किया जाए। उनमें से बहुत-से लोग—बैंकों के कर्मचारी भी, अकाउंटेंट, कानूनी सलाहकार और फ़ैसला करने वाले भी—अभी तक पारम्परिक ब्याज आधारित बैंकिंग के मनोवैज्ञानिक वातावरण से नहीं निकल सके। इस पारम्परिक मनोवैज्ञानिक वातावरण ने उनका एक ख़ास ज़ेहन बना दिया है। इस ज़ेहन से जब वे इस्लामी बैंकिंग में आते हैं तो क़दम-क़दम पर उलझनें महसूस होती हैं। इन उलझनों से निकलने का हल यही है कि इन तमाम लोगों के लिए ऐसे तरबियती प्रोग्राम बनाए जाएँ जिनके द्वारा उनके लिए इस्लामी आदेशों और इस्लामी बैंकिंग के नियमों को समझना आसान हो।

पश्चिमी बैंकिंग और इस्लामी बैंकिंग के मध्य सम्पर्क और सम्बन्ध का सम्भावित रूप क्या है? इस पर भी ग़ौर होना चाहिए। एक सम्भावित सम्बन्ध तो दुश्मनी और चुनौती देने का हो सकता है। एक और प्रकार मुकाबले और नफ़रत का हो सकता है। इन दोनों के मुकाबले में जो सम्बन्ध अधिक उचित और बेहतर मालूम होता है, वह सहयोग और ‘तकामुल’ (एक-दूसरे की कमी पूरी करना) का है। अगर इस्लामी बैंकिंग की संस्थाएँ पश्चिमी बैंकिंग की संस्थाओं से शरीअत के आदेशों और नैतिक नियमों की मुकम्मल पाबंदी के साथ इंसानी उद्देश्य में सहयोग करें, जन-साधारण का कल्याण सर्वप्रथम प्राथमिकता हो और उन मैदानों पर ध्यान दिया जाए जो अभी ख़ाली हैं, जिनमें काम नहीं हुआ, तो इस्लामी बैंकिंग के लिए पश्चिमी दुनिया में पनपना तुलनात्मक रूप से आसान हो सकता है। दुश्मनी और ललकारने का नतीजा सिवाए तबाही और मुश्किलों के और कुछ नहीं होगा।

इस्लामी बैंकिंग की कामयाबी को जाँचने के लिए सबसे पहले यह देखना चाहिए कि लाभ और हानि में प्रत्यक्ष रूप से भागीदारी का अनुपात क्या है। यानी ‘मुज़ारबा’ और ‘मुशारका’ पर किस हद तक अमल हो रहा है। और शरीअत के आदेशों यानी ‘रिबा’ का हराम होना, ‘क़िमार’ का हराम होना, ‘ग़रर’ का हराम होना और ‘अल-ख़िराज बिज़-ज़मान’ वगैरह पर कितना अमल हो रहा है। व्यापार में विकास और फैलाव के अवसर तुलनात्मक रूप से बेहतर हुए हैं या पहले जैसे हैं। कारोबारी प्रक्रिया में शरीक लोगों की तादाद में वृद्धि हुई है या कमी हुई है। फ़र्ज़ी कारोबारों का ख़ातिमा हुआ है कि नहीं हुआ। फ़र्ज़ी कारोबारों से अभिप्रेत यह है कि बहुत-से लोग (पाकिस्तान में ऐसे लोगों की तादाद दूसरे देशों के मुकाबले में बहुत ज़्यादा है जो बहुत दुख की बात है) बैंकों से फ़र्ज़ी कारोबारों के नाम पर क़र्ज़ लेते हैं। फिर फ़र्ज़ी और अधूरे काग़ज़ात के द्वारा बैंकों को सन्तुष्ट कर देते हैं। फिर इसमें नुक़सान ज़ाहिर करके पूरी रक़म माफ़ करा लेते हैं। यह खेल पाकिस्तान में पचास वर्षों से खेला जा रहा है। हर आने वाली सरकार जो बड़े लम्बे-चौड़े दावों के साथ सामने आती है, जब वह जाती है तो अंदाज़ा होता है कि वह और भी कई खरब रुपये के क़र्ज़ माफ़ करके चली गई है। यह क़र्ज़ सियासी रुसूख़ के आधार पर प्राप्त कर लिए जाते हैं, सियासी दबाव डालकर करोड़ों, अरबों और खरबों रुपये जन-साधारण के बरबाद कर दिए जाते हैं और कोई पूछने वाला नहीं कि जन-साधारण की रक़म कहाँ गई।

यह सब इसलिए सम्भव हो रहा है कि बैंक क़र्ज़ों का और ज़र (करेंसी) का व्यापार करते हैं। अगर बैंकों की पूरी व्यवस्था की उठान इस पर हो कि वे असल लाभ-हानि में शरीक हों तो इस तरह की चोरी का रास्ता बहुत हद तक रोका जा सकता है। फिर हमारे यहाँ बीमार उद्योगों की एक काल्पनिक कहानी पैदा कर दी गई है। बीमार उद्योगों की यह बीमारी या कैंसर तो उस वक्त से चला आ रहा है जब इस देश के कुछ तेज़-तर्रार हुकमरानों ने उद्योगों को राष्ट्रीय मिल्कियत में ले लिया था और अपने सियासी उद्देश्य और सत्ता में बढ़ोतरी की ख़ातिर पूरे देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। उस वक्त से लेकर आज तक हज़ारों उद्योग बीमार उद्योग चले आ रहे हैं और उन्हें स्वस्थ बनाने के नाम पर करोड़ों, बल्कि अरबों और खरबों रुपया और बरबाद हो चुका है।

इस पूरे मामले को नए सिरे से कलात्मक दृष्टि से हल करने की ज़रूरत है। बैंकों को ‘मुज़ारबा’ की तरफ आने पर आमादा किया जाना चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि ‘मुज़ारबा’ के रास्ते में जो वास्तविक मुश्किलें हैं, उनका जायज़ा लिया जाए। जो लोग ‘मुज़ारबा’ से जुड़े हैं या ‘मुज़ारबा’ करना चाहते हैं, वे कुछ मुश्किलों का इज़हार करते हैं। उनमें कुछ लोग दो हिसाब रखने को अपनी ज़रूरत क़रार देते हैं। बैंकों से बात की जाए तो वे दक्षता की कमी का इज़हार करते हैं। ईमानदारी की कमी की शिकायत करते हैं।

फ़िज़िबिलिटी रिपोर्ट (Feasibility Report) की कानूनी हैसियत क्या है, इस पर अरब दुनिया में ख़ासा ग़ौर हुआ है। बैंकों के प्रत्यक्ष रूप से व्यापार में भाग लेने में मुश्किलें हैं—कानूनी भी, प्रशासनिक भी और कलात्मक भी—जिनकी वजह से ‘मुज़ारबा’ की कोशिशों में ज़्यादा कामयाबी नहीं हुई। अगर Venture Capital, मर्चेंट बैंकिंग और होल्डिंग कम्पनियों के अनुभवों को, जो पश्चिमी दुनिया में सफलतापूर्वक हुए हैं, सामने रखा जाए और उन अनुभवों से ‘मुज़ारबा’ के सिलसिले में फायदा उठाया जाए तो बहुत आसानी के साथ इन मामलों को हल किया जा सकता है।

इस्लामी बैंकिंग और पारम्परिक बैंकिंग में फ़र्क़ यों तो कई दृष्टि से है। लेकिन एक महत्वपूर्ण फ़र्क़ की निशानदेही करके यह चर्चा समाप्त करता हूँ। वह यह कि पारम्परिक बैंकों में बैंक और खाता धारकों के दरमियान ‘दायिन’ (देन/क़र्ज़ देने वाला) और ‘मदयून’ (जिसको दैन/क़र्ज़ दिया गया हो) का सम्बन्ध होता है। बैंक और खाता धारक, ‘दायिन’ और ‘मदयून’, दो अजनबी पक्षों की हैसियत रखते हैं जो एक-दूसरे से अनजान हैं। इस्लामिक बैंकों में उनकी हैसियत व्यापारिक साझेदार की होगी जो एक-दूसरे के समझे-बूझे और दोस्त होंगे और लाभ और हानि में एक-दूसरे के भागीदार भी होंगे।

इस्लामी बैंकों का बुनियादी काम यह होना चाहिए कि वे जायज़ पूँजी निवेश के रास्ते तलाश करें, जायज़ पूँजी निवेश के संसाधन और साधन ज़्यादा-से-ज़्यादा पैदा करें। देश के आर्थिक विकास में पारम्परिक बैंकों से ज़्यादा भाग लें। मुस्लिम देशों के दरमियान व्यापार को बढ़ावा देने में अपनी भूमिका निभाएँ। बैंकिंग की नई व्यवस्था और ढंग से परिचित करवाएँ। नैतिकता और व्यापार के टूटे हुए रिश्ते को फिर से जोड़ें। ‘रिबा’ के उन्मूलन में सहायता दें। जायज़ व्यापार को बढ़ावा देने में प्रभावकारी भूमिका निभाएँ। सम्बन्धित मुस्लिम देश के आर्थिक विकास में भाग लें। धन के संकेन्द्रण को रोकने में सहायता दें। ग़रीब व्यापारियों को प्रोत्साहित करें। लाभ और नुक़सान में भागीदार बनें और सामूहिक न्याय की स्थापना में सहायता दें। अगर ये सारे काम इस्लामी बैंक कर रहे हों और सबको होते नज़र भी आ रहे हों तो फिर इस्लामी बैंकिंग बढ़ावा पा रही है। और अगर ये उद्देश्य पूरे नहीं हो रहे तो इसका अर्थ यह है कि इस्लामी बैंकिंग अभी शुरू नहीं हुई और वास्तविक इस्लामी बैंकिंग का काम अभी सामने नहीं आया। वह जब भी सामने आएगा, उसकी ये बरकतें और फल अवश्य ही सामने आने चाहिएँ।

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