Hindi Islam
Hindi Islam
×

Type to start your search

इस्लाम में अर्थव्यवस्था एवं व्यापार का महत्व तथा उसके आदेश (लेक्चर-6)

इस्लाम में अर्थव्यवस्था एवं व्यापार का महत्व तथा उसके आदेश (लेक्चर-6)

डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी

अनुवादक गुलज़ार सहराई

आज की चर्चा का शीर्षक है इस्लाम में अर्थव्यवस्था एवं व्यापार का महत्व और उसके आदेश। यह चर्चा विशेष रूप से इसलिए ज़रूरी है कि इस्लामी शिक्षा में पवित्र क़ुरआन, हदीसों, फ़िक़्ह और तसव्वुफ़ (आध्यात्म) के संग्रह में व्यापार के बारे में बहुत विस्तार से निर्देश और शिक्षाएँ मिलती हैं। व्यापार के महत्व के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। फिर इस्लामी इतिहास से यह भी पता चलता है कि इस्लाम के प्रचार-प्रसार में व्यापारियों की भूमिका बहुत नुमायाँ रही है। यह बात हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की जीवनी को पढ़नेवाला हर व्यक्ति जानता है कि न सिर्फ़ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अरब के नामवर, सफल और अत्यन्त नेक-नाम व्यापारी थे, बल्कि उनके बड़े सहाबा, हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत उसमान ग़नी (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत तलहा (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) और कई दूसरे बड़े सहाबा इस्लाम से पहले भी और इस्लाम के बाद भी अरब के सबसे नुमायाँ और सबसे सफल व्यापारियों में गिने जाते थे। इसलिए यह कहना दुरुस्त होगा कि व्यापार से सम्बन्धित आदेश, व्यापार का महत्व और इस्लाम के प्रचार-प्रसार में व्यापारियों की भूमिका, इस्लाम के इतिहास में आरम्भ से मौजूद है। जायज़ और ईमानदारी से किए गए व्यापार के पक्ष में हदीसों में बहुत-से फ़ज़ाइल (श्रेष्ठताएँ) बयान हुए हैं। हदीस की किताब जामे तिरमिज़ी की मशहूर रिवायत (उल्लेख) है जिसमें यह कहा गया है कि एक सच्चा और ईमानदार व्यापारी क़ियामत के दिन पैग़म्बरों, सिद्दीक़ियों (अत्यन्त सत्यवादियों), और शहीदों के साथ उठाया जाएगा। इसकी वजह यह है कि एक ईमानदार और सच्चा व्यापारी जो शरीअत के आदेशों के अनुसार व्यापार करता हो, जो पवित्र क़ुरआन और सुन्नत के निर्देशों की पाबंदी करता हो वह अपने रवैये से इस्लामी समाज में, इस्लामी शिक्षा और इस्लामी आदेशों के प्रचार-प्रसार का ज़रिया बनता है।

जब एक व्यापारी जायज़ तरीक़े से व्यापार करता है तो वह सृजनात्मक आर्थिक गतिविधि में शरीअत के आदेशों के अनुसार हिस्सा लेता है। मानो शरीअत के उद्देश्यों की पूर्ति में व्यावहारिक रूप से शरीक और हिस्सेदार बन जाता है। उसका अपना पेशा, उसका अपना रोज़गार और उसकी निजी दिलचस्पी शरीअत के उद्देश्यों के इस हद तक अनुकूल हो जाती है कि जहाँ जायज़ रोज़ी की प्राप्ति, इस्लामी समाज में हलाल रोज़ी की तलाश और शरीअत के आदेशों की पाबंदी, शरीअत के मुख्य उद्देश्यों में शामिल है, वहाँ यह चीज़ उस व्यापारी के रवैये का हिस्सा भी बन जाती है। यह उस वक़्त है जब व्यापारी ईमानदार और सच्चा होने के साथ-साथ, शरीअत के आदेशों का पूर्ण रूप से क्रियान्वयन भी करता हो। शरीअत के आदेशों के पूर्ण क्रियान्वयन के लिए ज़रूरी है कि वह शरीअत के आदेशों को जानता और समझता हो। इस्लामी इतिहास में व्यापारियों और व्यापार से जुड़े लोगों ने इस्लाम के उद्देश्यों की पूर्ति में बहुत नुमायाँ हिस्सा लिया है। इसकी वजह यह है कि जितने आरम्भिक इस्लामी व्यापारी थे वे सब इस्लाम की ओर लोगों को बुलानेवाले भी थे। उनमें से बहुत-से बड़े इस्लामी फ़ुक़्हा (धर्मशास्त्री) अपने रोज़गार के साधनों की दृष्टि से व्यापारी भी थे। हज़रत इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) कूफ़ा के बड़े व्यापारियों में गिने जाते थे। हज़रत इमाम लैस-बिन-सअद मिस्र के बड़े व्यापारियों में शुमार हुआ करते थे। यही कैफ़ियत दूसरे कई फ़ुक़हा की है। हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपने ज़माने में यह आदेश दिया था कि जो व्यक्ति बाज़ार में बैठकर कारोबार करना चाहे उसके लिए ज़रूरी है कि वह फ़िक़्ह की जानकारी रखता हो। “हमारे बाज़ार में क्रय-विक्रय वही कर सकता है जो फ़िक़्ह जानता हो।” इसकी वजह यह है कि जो व्यक्ति फ़िक़्ह के आदेशों की जानकारी प्राप्त किए बिना व्यापार करेगा वह चाहे या न चाहे ‘रिबा’ में मुब्तला हो जाएगा, नाजायज़ कामों में मुब्तला हो जाएगा। गोया राज्य ने इस बात का प्रबन्ध किया था कि बाज़ार में काम करनेवाला हर व्यापारी ज़रूरत भर फ़िक़्ही आदेशों की जानकारी और व्यापार के बारे में इस्लामी निर्देशों का ज्ञान रखता हो। इस ज्ञान और इस भावना के साथ जब कोई व्यक्ति पैदावारी गतिविधियों में हिस्सा लेगा तो वह न केवल अपनी रोज़ी कमाएगा, बल्कि वह एक नेक और फ़ायदेमन्द काम में भी हिस्सेदार होगा। कुछ इस्लामी फ़ुकहा ने लिखा है कि हर पैदावारी गतिविधि जो शरीअत की सीमाओं के अनुसार हो, मुस्तहब (पसन्दीदा) है। इसलिए कि ख़ुद पवित्र क़ुरआन ने जगह-जगह आदेश देने के तौर पर पैदावारी गतिविधियों में हिस्सा लेने की निर्देश दिए हैं। पवित्र क़ुरआन में जहाँ-जहाँ आदेश का अन्दाज़ आता है उसके बारे में इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) का कहना यह है कि या तो वह वाजिब (अनिवार्य) बताने के लिए होता है, या इस्तिहबाब (पसन्दीदगी) के लिए होता है। कुछ ख़ास हालात में जहाँ सन्दर्भ इसकी अनुमति दे आदेश देना औचित्य ठहराने के लिए भी होता है। लेकिन जहाँ सन्दर्भ इस बात की निशानदेही न करता हो वहाँ आदेश देना इस्तिहबाब के लिए होता है या वाजिब बताने के लिए होता है।

पवित्र क़ुरआन में कहा गया है—

“ज़मीन में चलो-फिरो और जो रोज़ी अल्लाह ने दी है उसमें से खाओ (और प्राप्त करो)।” (क़ुरआन, 67:15)

“जो कुछ ज़मीन और आसमान में है वह सब तुम्हारे फ़ायदे के लिए रख दिया गया है।” (क़ुरआन, 45:13)

“तुम्हें इस ज़मीन को आबाद करने की हिदायत दी है।” (क़ुरआन, 11:61) इसलिए “अल्लाह का रिज़्क़ और अल्लाह का फ़ज़्ल तलाश करो।” (क़ुरआन, 62:10)

ये और इस तरह की दूसरे निर्देश जो आदेश देनेवाले अन्दाज़ में आए हैं, ये चुनाव के लिए हैं। गोया हलाल रोज़ी की प्राप्ति कम-से-कम पसन्दीदगी का दर्जा ज़रूर रखती है।

कुछ हालात में फ़र्ज़े-ऐन (परम कर्तव्य) भी हो जाता है। लेकिन आम हालात में यह एक पसंदीदा गतिविधि है।

एक हदीस में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने इंसानों को जो जायज़ रोज़ी दी है उसमें दस में से नौ हिस्से व्यापार के ज़रिये प्रदान किए हैं। व्यापार में मात्र पारम्परिक व्यापार यानी सादा कारोबार ही शामिल नहीं है, बल्कि हर वह गतिविधि शामिल है जिसमें इंसान अपनी ख़ुद की मेहनत से रोज़ी प्राप्त करता हो। इसमें उद्योग भी शामिल है, इसमें दस्तकारी भी शामिल है और वे तमाम मामले शामिल हैं जो इंसान अपनी मेहनत से अंजाम देता है। मेहनत के नतीजे में कमाई हुई रोज़ी अल्लाह तआला की तरफ़ से बरकत का ज़रिया बनती है।

यहाँ एक बात को स्पष्ट करना ज़रूरी है। वह यह कि कुछ लोगों में यह ख़याल फैल गया है कि आर्थिक गतिविधि में हिस्सा लेना ‘ज़ुह्द’ (परहेज़गारी) और इस्तिग़ना (निस्पृहता) के विपरीत है। शरीअत ने निस्सन्देह ‘ज़ुह्द’ की शिक्षा दी है, इस्तग़िना की भी शिक्षा दी है। सहाबा किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) से बड़ा ‘ज़ुह्द’ का अलमबरदार कोई नहीं हो सकता। अम्बिया (अलैहिमुस्सलाम) से बड़ा मुस्तग़नी (निस्पृह) कोई नहीं हो सकता। लेकिन ये सब लोग हलाल रोज़ी और व्यापार की प्राप्ति में हिस्सा लिया करते थे। यही वजह है कि इस्लाम के कुछ बड़े आलिमों से यह बात जोड़ी जाती है कि उन्होंने फ़रमाया कि ‘ज़ुह्द’ यह नहीं है कि दुनिया के माल को अपने ऊपर हराम कर लिया जाए या जायज़ माल को बर्बाद कर दिया जाए, बल्कि ‘ज़ुह्द’ यह है कि तुम यह यक़ीन रखो कि अल्लाह ने जो कुछ तुम्हें दिया है उससे कहीं ज़्यादा यक़ीनी तुम्हारा वह रिज़्क़ (रोज़ी) है जो अल्लाह के पास है। यानी अल्लाह के राज़िक़ (दाता) होने का यक़ीन और उसपर पूरा भरोसा ‘ज़ुह्द’ की रूह है।

‘तवक्कुल’ ‘ज़ुह्द’ का अनिवार्य अंग है। अगर ‘तवक्कुल’ न हो तो ‘ज़ुह्द’ का दावा बेकार है। मशहूर इस्लामी विद्वान अल्लामा इज़ुद्दीन-बिन-अब्दुस्सलाम अस्लमी ने लिखा है कि ‘ज़ुह्द’ यह है कि किसी भौतिक चीज़ का दिल से गहरा सम्बन्ध न हो। दिल उसकी मुहब्बत से ख़ाली हो, दिल में उससे लगाव न हो, दिल सिर्फ़ अल्लाह से लगा हुआ हो। ‘ज़ुह्द’ के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि हाथ भी धन-दौलत से ख़ाली हो। स्वामित्व में भी धन-दौलत न हो। धन-दौलत का हाथ में या जेब में होना ‘ज़ुह्द’ के विपरीत नहीं है, दिल में होना ‘ज़ुह्द’ के ख़िलाफ़ है। फिर अल्लामा इज़ुद्दीन-बिन-अब्दुस्सलाम ने कहा है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से बढ़कर ‘ज़ुह्द’ का अलमबरदार कोई नहीं हो सकता। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तमाम ज़ाहिदों के लिए अमली नमूने की हैसियत रखते हैं। लेकिन जब आप दुनिया से तशरीफ़ ले गए तो आपके स्वामित्व में फ़दक की ज़मीनें भी थीं, उनके इस्तेमाल में अवाली के कुछ बाग़ और मकान भी थे। उनके इस्तेमाल में वादियुल-क़ुरा की ज़मीन का एक हिस्सा भी था। ख़ैबर में जो उनको हिस्सा मिला था वह भी था। यह सब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के स्वामित्व में आया, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस दौलत को अल्लाह के रास्ते में ख़र्च किया, लेकिन उनमें से किसी चीज़ ने उनके दिल में जगह नहीं बनाई।

हज़रत सुलैमान (अलैहि॰) एक बहुत बड़े क्षेत्रफल के मालिक हुए, बहुत बड़े राज्य के शासक रहे, लेकिन उनमें से कोई चीज़ अल्लाह की तरफ़ उनके ध्यान को कम नहीं कर सकी। इस रवैये के साथ धन-दौलत अगर अल्लाह तआला प्रदान करता है तो उसकी प्राप्ति और उसका इस्तेमाल ‘ज़ुह्द’ के विपरीत नहीं है, बल्कि इस रवैये के बाद हर वयापारिक गतिविधि, हर आर्थिक गतिविधि इबादत और सदक़े की हैसियत ले लेती है। सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम दोनों में उल्लिखित है कि अगर कोई व्यक्ति पौधा लगाए या कोई खेती लगाए, उस पौधे और खेती में से कोई इंसान, कोई परिंदा या जानवर अपनी रोज़ी प्राप्त कर ले तो यह चीज़ पौधा लगानेवाले के लिए सदक़े की हैसियत रखती है। यानी अल्लाह के सभी प्राणियों, इंसान, जानवर, परिंदों, उनमें से किसी की रोज़ी का प्रबन्ध अगर किसी के हाथों होता है तो वह इस व्यक्ति की तरफ़ से सदक़े की जगह है, जिसका अल्लाह के दरबार में अज्र मिलेगा।

सहाबा किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) सिर्फ़ व्यापार ही में हिस्सा नहीं लेते थे, बल्कि उन्होंने व्यापार को इस तरह नए अंदाज़ से संकलित किया, बड़े पैमाने पर सुसंगठित किया, बल्कि हम कह सकते हैं कि उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार को बढ़ावा दिया कि सहाबा किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) की इस कॉरपोरेट व्यापार के नतीजे में बड़े पैमाने पर मुसलमान व्यापारी दुनिया-भर में फैल गए, वहाँ उन्होंने इस्लाम का प्रचार-प्रसार भी किया और हलाल रोज़ी के तरीक़े भी दुनिया को सिखाए। सहाबा किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के ज़माने से यह परम्परा चली आ रही है कि वह बैतुलमाल से व्यापार के लिए क़र्ज़ लिया करते थे। गोया व्यापार के लिए क़र्ज़ लेने की सुविधा जो आज बैंकों के ज़रिये है, यह परम्परा बैतुलमाल के ज़रिये इस्लाम के मुख्य दौर से मौजूद रही है।

हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) के बेटों की घटना मशहूर है जिन्होंने बैतुलमाल की रक़म से व्यापार किया और ‘मुज़ारबा’ के तौर पर लाभ का एक हिस्सा ख़ुद रखा और एक हिस्सा बैतुलमाल में जमा कराया। जिन बड़े सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) का बड़े पैमाने पर व्यापार था जिसको कॉरपोरेट व्यापार कहा जा सकता है, उनमें हज़रत ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत अबदुर्रहमान-बिन-औफ़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) और हज़रत उसमान-बिन-अफ़्फ़ान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के व्यापार शामिल थे। ये व्यापार इतने बड़े पैमाने पर थे कि आज उनके विस्तृत विवरण से जो लोग अवगत नहीं हैं, वे उसका अंदाज़ा नहीं कर सकते कि मदीना के उच्चतम मापदंड, ‘तक़वा’ और ‘ज़ुह्द’ के सर्वोच्च नमूना होने के बावजूद सांसारिक दृष्टि से सबसे सफल व्यापार इन लोगों ने किस तरह और कितने बड़े पैमाने पर चलाकर दिखाया। और यह साबित किया कि दीनदारी और व्यापार में कोई टकराव नहीं है और इन दोनों को साथ-साथ कैसे चलाया जा सकता है। हज़रत इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) का कारोबार और व्यापार मशहूर है। कूफ़े के बड़े व्यापारियों में से हज़रत इमाम साहब भी थे।

न केवल सहाबा किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम), इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्री) और बहुत से नेक बुज़ुर्ग ख़ुद व्यापारी थे, बल्कि व्यापार से जुड़ाव मुस्लिम दुनिया की एक विशेषता थी। मुस्लिम नाविकों ने व्यापार के ज़रिये पूरी दुनिया के सफ़र किए। दुनिया के कोने-कोने में इस्लाम को फैलाया। आज इंडोनेशिया, मलयेशिया फ़िलिपीन और चीन के अधिकतर इलाक़ों में जो मुसलमान पाए जाते हैं ये सब मुसलमान व्यापारियों के द्वारा मुसलमान हुए। इंडोनेशिया, मलयेशिया के विस्तृति इलाक़ों में करोड़ों मुसलमानों पर सम्मिलित आबादियाँ मुसलमान व्यापारियों की कृपा हैं। अगर आज हमारे व्यापारी उस प्राचीन इस्लामी परम्परा को ज़िंदा करें जिसमें व्यापार और इस्लाम का सन्देश दूसरों तक पहुँचाने, दोनों को इकट्ठा किया गया था तो वह बड़े पैमाने पर एक नए अंदाज़ से इस्लाम के आह्वान को सुसंगठति कर सकते हैं।

आज दुनिया जिस आर्थिक मुश्किल और परेशानी का शिकार है, आज दुनिया के सामने जो सख़्त आर्थिक संकट है उसका हल इस्लामी शिक्षा के पास मौजूद है। इस्लामी शरीअत इस संकट से निकलने में दुनिया का मार्गदर्शन कर सकती है। यह काम आज के व्यापारी और कारोबारी वर्ग से जुड़े लोग कर सकते हैं कि इस्लाम में व्यापार और कारोबार के जो नियम बताए गए हैं, इस्लामी अर्थशास्त्र और बैंकिग के जो नियम आधुनिक समय के विद्वानों ने संकलित किए हैं उनको पश्चिमी दुनिया में परिचित कराया जाए और उनके आधार पर ऐसे सफल व्यापार सुसंगठति किए जाएँ जो दुनिया को इस्लाम की शिक्षा की तरफ़ आकर्षित करें। यह गतिविधि ख़ुद एक इबादत है। लेकिन जब इस नीयत से की जाएगी कि इसके साथ-साथ इस्लाम के प्रचार-प्रसार का काम भी करना है तो यह सर्वोच्च श्रेणी की इबादत बन जाएगी।

यह बात कि व्यापार में हिस्सा लेना अपने-आपमें नेकी का काम है और ख़िदमते-ख़ल्क़ (समाज सेवा) है, यह कई हदीसों में बयान हुई है। एक बार हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने फ़रमाया, और यह रिवायत ‘मुवत्ता-इमाम-मालिक’ में मौजूद है कि जो व्यक्ति गर्मी सर्दी की परवाह किए बिना हमारी मंडियों में बाहर से माल लेकर आता है और उसको बेचता है तो वह उमर का मेहमान होगा। यानी सरकारी मेहमान होगा। हमारी मेहमानी के दौरान जिस तरह चाहे अपना सौदा बेचा करे और जितना चाहे बेचे और जितना चाहे न बेचे। इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि राज्य की ज़िम्मेदारी है कि व्यापारियों को सुविधाएँ जुटाए और उन सुविधाओं को उपलब्ध करने में सरकारी संसाधन भी ख़र्च करे। सरकारी संसाधन अगर ख़र्च करने पड़ें तो राज्य इसमें संकोच न करे, जैसा कि हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने फ़रमाया कि बाहर से जो व्यापारी माल लेकर आएगा वह राज्य का मेहमान होगा। राज्य उसके खाने-पीने और ठहने के ख़र्चे बर्दाश्त करेगा। इस धारणा पर आजकल के माहौल में कैसे अमल किया जाए, यह ज्ञानवानों के ग़ौर करने की बात है, आधुनिक समय के ज़िम्मेदार लोगों के ग़ौर करने की बात है। यह उसूल बहरहाल उस कथन से निकलता है कि व्यापारियों को सरकारी संसाधन उपलब्ध करना सरकारी संसाधनों से उनके लिए सुविधाएँ उपलब्ध करना राज्य की ज़िम्मेदारी है।

शरीअत ने व्यापार के बारे में जो आदेश दिए हैं वे दो तरह के हैं। थोड़ा-सा हिस्सा तो उन आदेशों का है जिनमें यह बताया गया है कि व्यापार करते हुए क्या-क्या नियम सामने रहने चाहिएँ। यह हिस्सा तो आम तौर से उन नैतिक निर्देशों पर आधारित है जिनसे हर मुसलमान परिचित होता है। उदाहरणार्थ सच बोलना, ईमानदारी से काम लेना, सही नाप तौल करना, इन धारणाओं से अधिकतर मुसलमान परिचित होते हैं। ये अधिकतर वे मामले हैं जो दुनिया की तमाम सभ्य क़ौमों में सर्वमान्य हैं। कोई क़ौम यह नहीं कहती है कि नाप तौल में कमी की जाए। कोई क़ौम यह नहीं कहती कि कारोबार और व्यापार में धोखा दिया जाए। कोई क़ौम यह नहीं कहती कि व्यापार के माल के बारे में झूठ बोला जाए। इसलिए शरीअत ने इन मामलों को ज़्यादा विस्तार से बयान नहीं किया, बल्कि उनकी केवल याददिहानी कराने पर बस किया है। दूसरा हिस्सा शरीअत की शिक्षा का वह है जिनमें विस्तार के साथ इन हराम ठहराई हुई चीज़ों को बताया गया है जो व्यापार की प्रक्रिया में शामिल नहीं होनी चाहिएँ और जिनसे व्यापार की प्रक्रिया, उद्योग और कारोबार की प्रक्रिया में बचना चाहिए।

इन हराम ठहराई हुई चीज़ों में सबसे नुमायाँ और स्पष्ट रूप से हराम चीज़ तो ‘रिबा’ है जिसके बारे में एक अलग और स्थायी चर्चा में विवरण पेश किया जाएगा। दूसरी चीज़ ‘ग़रर’ है। जिसका पहले भी ज़िक्र किया जा चुका है। ‘ग़रर’ से मुराद वह लेन-देन है जिसमें किसी एक पक्ष का हक़ अनिश्चित और अस्पष्ट हो। दो पक्षों में से एक पक्ष का हक़ तो निर्धारित रूप से तय हो जाए, दूसरे का हक़ तय न हो। यह शरीअत के अनुसार जायज़ नहीं है। ‘ग़रर’ की बहुत-सी क़िस्में हदीसों में बयान हुई हैं। जैसा कि मैंने पहले बताया था कि हदीसों में 56 के क़रीब आदेश दिए गए हैं या व्यापार की 56 के क़रीब शक्लों को नाजायज़ क़रार दिया गया है। इसलिए कि या तो उनमें ‘रिबा’ पाया जाता है या ‘ग़रर’ पाया जाता है। इससे अंदाज़ा किया जा सकता है कि अगर जाहिलियत के सादा माहौल में, इस्लाम से पहले के सादा व्यापार में ‘ग़रर’ और ‘रिबा’ की छप्पन शक्लें पाई जाती थीं तो आज की पेचीदा अर्थव्यवस्था में कितनी शक्लें पाई जाती होंगी।

तीसरी चीज़ जो शरीअत में हराम क़रार दी गई है वह ‘क़िमार’ है। ‘क़िमार’ के बारे में हम कह सकते हैं कि ‘क़िमार’ वह है कि जिसमें दोनों पक्षों का हक़ अस्पष्ट और अनिश्चित हो और एक पक्ष के लाभ का परिणाम दूसरे का नुक़्सान हो। उदाहणरार्थ तीन आदमियों ने मिलकर पैसे बराबर लगाए और किसी भाग्य या संयोग के नतीजे में वह पूरी रक़म किसी एक व्यक्ति को मिल गई यह ‘क़िमार’ कहलाता है। इसलिए कि दो लोगों का नुक़्सान होगा तो तीसरे को पैसे मिलेंगे। किसको रक़म मिलेगी, किसको नहीं मिलेगी, यह भी निश्चित नहीं है। कौन नुक़्सान उठाएगा, कौन लाभ उठाएगा, यह भी निश्चित नहीं है। यह चीज़ ‘क़िमार’ कहलाती है और यह स्पष्ट रूप से हराम है।

‘क़िमार’ ही की एक तुलनात्मक रूप से हल्की शक्ल जो हराम है वह ‘मयसिर’ है। ‘मयसिर’ वह है कि जिसमें कोई व्यक्ति जो कुछ पाये वह मात्र क़िस्मत और संजोग पर आधारित हो। ऐसा कारोबार, ऐसा व्यापार, जिसमें एक से अधिक लोग हिस्सा लें और उसमें किसी एक को मात्र संजोग के नतीजे में फ़ायदा हो जाए। यह भी गोया ‘क़िमार’ और जुए की एक शक्ल है, लेकिन उससे ज़रा हल्की है। पवित्र क़ुरआन ने जब ‘मयसिर’ को हराम क़रार दिया है, तो ‘क़िमार’ ख़ुद-ब-ख़ुद हराम हो जाता है। पवित्र क़ुरआन की एक शैली यह है कि हराम बातों के सारे दर्जों को अलग-अलग बयान करने के बजाय कभी-कभी उनके सबसे पहले और आरम्भिक दर्जे ही को हराम क़रार दे देता है। शेष दर्जों का हराम होना उससे स्पष्ट हो जाता है। जब किसी हल्की चीज़ को हराम क़रार दे दिया गया तो उस हल्की के बाद की जितनी चीज़ें हैं वे सब आप-से-आप हराम हो जाती हैं। यह नहीं हो सकता कि हल्की चीज़ तो हराम हो और भारी चीज़ हलाल हो। पवित्र क़ुरआन ने जब यह कहा कि माँ बाप के सामने उफ़ तक न करो तो इसका मतलब यह है कि माँ बाप की मर्ज़ी और सम्मान के ख़िलाफ़ कोई काम न करो। अब कोई परले दर्जे का बेवक़ूफ़ व्यक्ति ही यह बात कह सकता है कि पवित्र क़ुरआन ने कहीं यह तो नहीं कहा कि माँ बाप की पिटाई न करो, न क़ुरआन में आया है, न हदीस में आया है, इसलिए माँ-बाप के सामने उफ़ करना तो जायज़ नहीं है, पिटाई करना जायज़ है। जितनी हास्यास्पद बात यह होगी उतनी ही हास्यास्पद बात यह भी है कि पवित्र क़ुरआन ने ‘मयसिर’ को हराम क़रार दिया है, ‘क़िमार’ को हराम क़रार नहीं दिया। हालाँकि हल्की चीज़ को हराम क़रार देने का तार्किक और अनिवार्य परिणाम यह है कि जो ज़्यादा भारी जुर्म रखनेवाली चीज़ है वह पहले नाजायज़ मानी जाएगी।

व्यापार में हराम ठहारई हुई पाँचवें चीज़ जो ‘ग़रर’ का ज़रिया बनती है वह जहालत और अनभिज्ञता है। किसी ऐसे व्यापार में हिस्सा लेना जिसकी शर्तें पता न हों, स्पष्ट न हों, जिसमें जो चीज़ बेची जा रही है उसके बारे में भी पता न हो। जो क़ीमत व्यक्ति वुसूल करना चाहता है वह क़ीमत भी नामालूम हो, ये सब बातें चूँकि ‘ग़रर’ पैदा करती हैं इसलिए इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने उनको अलग से भी बयान किया है और इसको ‘जह्ल’ (अज्ञानता) बताया है। छटी चीज़ ‘ज़रर’ है। ‘ज़रर’ से मुराद नुक़्सान है। लेकिन हर वह व्यापार या कारोबार जिसमें किसी एक पक्ष को अकारण ही नुक़्सान हो रहा हो वह दुरुस्त नहीं है।

सातवीं चीज़ ‘ग़बन’ है। यानी ऐसी मुनाफ़ाख़ोरी जो बाज़ार में आम तौर पर प्रचलित न हो। उस स्तर का लाभ रखना जिस स्तर का बाज़ार में प्रचलन नहीं है। यह शरीअत में ‘ग़बन’ कहलाता है। याद रखिएगा कि उर्दू/हिन्दी में ‘ग़बन’ का अर्थ दूसरा हो गया है। प्राचीन फ़िक़ही साहित्य में ‘ग़बन’ का अर्थ अवास्तविक ढंग की नफ़ाख़ोरी है। आठवीं चीज़ जो शरीअत ने मना की है वह ‘ख़लाबा’ है। ‘ख़लाबा’ से मुराद है किसी व्यक्ति की सादगी की वजह से उसको धोखा देना या किसी व्यक्ति के सामने चिकनी-चुपड़ी बातें बनाकर उसको ऐसा फ़ैसला करने पर मजबूर कर देना जो उसके वयापारिक हित में न हो। शरीअत ने ऐसी स्थिति में नुक़्सान उठानेवाले व्यक्ति को यह हक़ दिया है कि वह चाहे तो सौदे को रद्द कर दे और अपनी दी हुई रक़म वापस ले-ले। नौवीं चीज़ ‘तदलीस’ है। ‘तदलीस’ का काम आजकल बहुत हो रहा है। ‘तदलीस’ का अर्थ यह है कि अपने व्यापार या अपने सौदे और व्यापार के सामान में ऐसे गुण बयान करना जो उसमें नहीं पाए जाते। इसको तदलीस कहते हैं। आपने कोई प्रोडक्ट तैयार किया। इस प्रोडक्ट के ऐसे-ऐसे गुण बयान किए जो उसमें नहीं पाए जाते। लोगों ने इस प्रोपेगंडे से प्रभावित होकर उसको ख़रीद लिया। यह अमल शरीअत में दुरुस्त नहीं है। यह ‘तदलीस’ कहलाता है। अगर कोई व्यक्ति ‘तदलीस’ के नतीजे में अपना कारोबार चलाए और चीज़ बेच दे तो वह शरई तौर पर ग़लती का मुजरिम हो रहा है। यह गुनाह का काम है। राज्य को यह हक़ पहुँचता है कि उसको रोकने के लिए क़ानून बनाएँ और कोई मुनासिब पॉलिसी अपनाए।

दसवीं चीज़ जो हराम ठराई चीज़ों में से है ‘बैए-मादूम’ है। यानी ऐसी चीज़ की बिक्री जो उस वक़्त न मौजूद है और न बेचनेवाले के इख़्तियार में है कि वह उपलब्ध कर सके। अगर कोई चीज़ मौजूद नहीं है, लेकिन बेचनेवाला उसको उपलब्ध कर सकता है, उसको मालूम होता है कहाँ बिकती है, कैसे बनती है, कैसे प्राप्त होती है। वहाँ से प्राप्त करके आपको उपलब्ध कर देगा। जैसे अक्सर सप्लाई का काम करनेवाले करते हैं। या जो चीज़ें तैयार करने का काम करते हैं। उनके पास आज चीज़ें तैयार नहीं हैं, लेकिन आप उनको पेशगी क़ीमत अदा कर देते हैं। वे चीज़ें ख़ुद बनाकर या बनवाकर या बाज़ार से ख़रीदकर आपको उपलब्ध कर देते हैं, यह जायज़ है। ‘मादूम’ से मुराद यहाँ वह चीज़ है जो न मौजूद हो और न बेचनेवाले के बस में हो कि वह ख़रीदकर आपको दे सके। ऐसी चीज़ की ख़रीद-बिक्री जायज़ नहीं है।

इसी तरह से ऐसा व्यापार भी जायज़ नहीं है जिसमें दो परस्पर विरोधी कारोबारों को इस तरह मिला दिया गया हो कि एक की पूर्ति दूसरे पर निर्भर हो। इसको शरीअत में नाजायज़ क़रार दिया गया है। इसलिए कि इससे सूद (ब्याज) का रास्ता खुलता है। मिसाल के तौर पर इस तरह का कारोबार कि मैं आपको फ़ुलाँ चीज़ बेचने के तैयार हूँ बशर्तेकि आप मुझे इतना क़र्ज़ा दें। मैं आपको क़र्ज़ा देने के लिए तैयार हूँ बशर्तेकि आप मेरी फ़ुलाँ चीज़ ख़रीद लें, यह जायज़ नहीं है। ये दोनों दो अलग-अलग मामले हैं। जब दोनों को एक-दूसरे पर निर्भर क़रार दिया जाएगा तो इससे नाजायज़ व्यापार और सूदखोरी का रास्ता खिलेगा। इसलिए यह नाजायज़ है।

इन आदेशों से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि धन प्राप्ति के बारे में इस्लाम का एक आम स्वभाव है। वह आम स्वभाव यह है कि बिना मेहनत के धन-प्राप्ति के रास्ते कम-से-कम किए जाएँ। देखने में आया है कि बिना मेहनत के जो दौलत प्राप्त होती है वह आम तौर पर ग़लत रास्ते में ख़र्च होती है। ‘माले-मुफ़्त, दिले-बेरहम’ का मुहावरा जिसने भी सोचा था सही सोचा था। मयसिर, क़िमार, ग़रर, रिबा, सट्टा ये सब वे रास्ते हैं जिनके नतीजे में बैठे-बिठाए बिना किसी मेहनत के बेशुमार दौलत इंसान को प्राप्त हो सकती है। और जब दौलत के अंबार पर बैठे-बिठाए प्राप्त होने लगें तो इंसान का मन उसको ग़लत रास्तों में ख़र्च करने पर आमादा करता है। जिससे न केवल फ़ुज़ूलख़र्ची करनेवालों का वर्ग पैदा होता है, बल्कि ख़ुद आम समाज में भी बहुत-सी नैतिक बुराइयाँ पैदा हो जाती हैं। इसलिए इस्लामी शरीअत का स्वभाव यह है कि धन की प्राप्ति के लिए नियम-क़ायदे निर्धारित किए जाएँ। बिना मेहनत के प्राप्त होनेवाली दौलत के रास्तों को कम-से-कम और सीमित-से-सीमित किया जाए। यह काम इस्लामी राज्य को भी करना चाहिए। इसके लिए क़ानून भी बनाने चाहिएँ और यह बात मुस्लिम समाज का और मुसलमानों के स्वभाव का हिस्सा भी होनी चाहिए।

दूसरी बात जो शरीअत के आदेशों से स्पष्ट रूप से सामने आती है वह यह है कि एक व्यापारी और कारोबार करनेवाले में यह हौसला होना चाहिए कि वह पहल कर सके यानी कोई साहसपूर्ण क़दम उठा सके। यह सफलता और विकास की एक महत्वपूर्ण शर्त है। ज़िन्दगी के किसी भी पहलू में सच तो यह है कि पहल करने का हौसला रखे बिना सफलता और विकास प्राप्त नहीं होता। ‘रिबा’ और ब्याजख़ोरी से यह भावना समाप्त हो जाती है। घर बैठकर खाने की आदत हो जाती है। इसलिए शरीअत ने यह कोशिश की है और जगह-जगह पर ऐसे आदेश दिए हैं जिनके नतीजे में हर जायज़ रोज़ी कमानेवाला मेहनत करे और आगे बढ़कर काम करे। घर बैठकर खाने की आदत न पाले। इसलिए कि घर बैठकर खाने से व्यापारिक गतिविधि भी कमज़ोर हो जाती है और पहल करने की भावना भी समाप्त हो जाती है।

शरीअत ने व्यापार के जो आदेश दिए हैं उनमें एक बहुत महत्वपूर्ण, बल्कि मूल सिद्धान्त यह है कि व्यापार और कारोबार में विशेषकर और व्यवहार में आम तौर से अस्ल यह है कि हर चीज़ जायज़ है, जब तक कि उसका हराम या मकरूह (अप्रिय) होना शरीअत के स्पष्ट आदेशों से साबित न हो जाए। इसलिए व्यापार की हर क़िस्म जायज़ है, बशर्तेकि उसमें कोई ऐसा तत्व शामिल न हो जिसको शरीअत ने हराम क़रार दिया है। दूसरी बड़ी वजह इस आदेश की यह है कि ‘फ़िक़्हे-मामलात’ का दारोमदार इंसानों के जायज़ हितों और जायज़ निहितार्थों की पूर्ति पर है। शरीअत यह बात जानती है कि इंसानों की ज़िन्दगी का दारोमदार व्यापार और कारोबार पर है।

इमामुल-हरमैन इमाम जुवैनी ने यह बात स्पष्ट रूप से लिखी है कि व्यापार और कारोबार की जितनी बड़ी-बड़ी और महत्वपूर्ण सूरतें हैं वे सब मूल आवश्यकताओं में शामिल हैं। इसलिए कि उनपर मानव जीवन के स्थायित्व एवं सुरक्षा का दारोमदार है और मानव जीवन की सुरक्षा शरीअत के मूल उद्देश्यों में से है, जैसा कि पवित्र क़ुरआन की अनगिनत आयतों से पता चलता है। अतः जिन-जिन चीज़ों पर मानव जीवन की सुरक्षा का दारोमदार है वह सबकी आवश्यकताओं में शामिल हैं। व्यवहार और व्यापार से सम्बन्धित तमाम अध्याय शरीअत ने इसी ज़रूरत की पूर्ति की ख़ातिर दिए हैं। व्यापार और कारोबार में जो चीज़ अपरिहार्य है वह सुविधा की प्राप्ति है। यों तो ‘मयसिर’ और ‘तयसीर’ शरीअत के हर आदेश में बुनियाद की हैसियत रखती है। आसानी पैदा करना शरीअत का स्वभाव है। आसानी इबादतों में भी पैदा की जाएगी। आसानी मामलों में भी पैदा की जाएगी। आसानी ख़ानदानी मामलों में भी रखी गई है। लेकिन ‘तयसीर’ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत जिस चीज़ में पड़ती है वह मामलात, व्यापार और कारोबार हैं। जब तक मामलात, व्यापार और कारोबार में आसानियाँ पैदा नहीं की जाएँगी आम लोगों के लिए अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति मुश्किल हो जाएगी। इसी आसानी को देखते हुए शरीअत ने इन ‘मुहर्रमात’ (हराम ठहराए गए कामों और चीज़ों) का विवरण बयान करने पर बस किया है जिनकी वजह से कोई कारोबार नाजायज़ क़रार पाता है। इन ‘मुहर्रमात’ से जिनकी तादाद बहुत-सीमित है अगर बचा जाए तो फिर व्यापार और कारोबार की तमाम शक्लें जायज़ हो जाती हैं। किसी व्यापार के जायज़ होने के लिए ज़रूरी नहीं है कि शरीअत में स्पष्ट रूप से उसको जायज़ क़रार दिया गया हो। व्यापार और कारोबार की हर सूरत शरीअत में जायज़ है बशर्तेकि उसमें हराम तत्व शामिल न हो।

इन हराम तत्वों में सबसे महत्वपूर्ण जैसा कि बताया गया ‘रिबा’ है। इसके बारे में विस्तार से चर्चा होगी। दूसरी महत्वपूर्ण चीज़ ‘ग़रर’ है। जिसको अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। ‘ग़रर’ के बारे में मशहूर हनफ़ी फ़क़ीह अल्लामा इब्ने-आबिदीन ने लिखा है कि ‘ग़रर’ से मुराद यह है कि ‘मबीअ’ यानी जिस चीज़ को बेचा जा रहा है उसका वुजूद सन्दिग्ध हो। यह शक कि वह चीज़ मौजूद है, या मौजूद नहीं है या यह शक कि मौजूद हो भी सकती है या नहीं, मौजूद हो सकती हो तो उपलब्ध भी की जा सकती है या उपलब्ध नहीं की जा सकती। इस की तैयारी की प्रक्रिया में आना सन्दिग्ध है। यह ‘ग़रर’ कहलाता है। अल्लामा इब्ने-क़य्यिम ने इसको इस प्रकार स्पष्ट किया है कि जिसका प्राप्त होना और नष्ट होना दोनों समान रूप से सम्भव हों। इसकी सम्भावना भी है कि वह आपको प्राप्त न हो सके और इसकी सम्भावना भी है कि प्राप्त हो जाए। दोनों तरह की सम्भावनाएँ पचास-पचास प्रतिशत मौजूद हैं। यह ‘ग़रर’ कहलाता है। शरीअत में ‘ग़रर’ की जो मिसालें दी गई हैं, हदीसों में वे इतनी सादा और स्पष्ट हैं कि उनसे ‘ग़रर’ की हक़ीक़त फ़ौरी तौर पर सामने आ जाती है। एक मछेरा जाल लेकर कश्ती में बैठकर निकलता है और आपसे पेशगी ही मामला कर लेता है कि आज जितनी मछलियाँ हाथ आएँगी वह आपको एक हज़ार रुपये में बेच देता हूँ। वह इसके लिए आपसे पेशगी एक हज़ार रुपये वुसूल कर ले, यह बात दुरुस्त नहीं है, यह ‘ग़रर’ है। इसलिए कि नहीं कह सकते कि उसको कितनी मछलियाँ मिलेंगी, कैसी मिलेंगी, अच्छी होंगी कि बुरी होंगी। कम होंगी कि ज़्यादा होंगी। हो सकता है आज उसको बिलकुल मछली न मिले। हो सकता है बहुत मिल जाएँ। हो सकता है उस तरह की मछली न मिले जिस तरह की मछली मिलने का आपको अंदाज़ा था कि मिलनी चाहिए। इन सब स्थितियों में कटुता पैदा होगी, बद-गुमानी होगी। हो सकता है मतभेद तक नौबत पहुँचे। इसलिए शरीअत ने इस रास्ते को बंद कर दिया है।

इसी तरह जब तक परिंदा हवा में उड़ रहा है उस वक़्त तक उसकी बिक्री जायज़ नहीं है। यानी वह परिंदा जो जंगली है और अभी आपने शिकार नहीं किया। यहाँ वह परिंदा मुराद नहीं है जो आपका सधाया हुआ है। मुराद वह परिंदा है जिसको अभी आपने शिकार नहीं किया, जंगली है, हवा में उड़ रहा है और अंदाज़ा नहीं कि आप उसको शिकार कर सकेंगे या नहीं कर सकेंगे।

‘ग़रर’ (धोखा) के बारे में फ़ुक़हा (इस्लामी धर्मशास्त्रियों) ने लिखा है कि अगर मामूली ‘ग़रर’ हो, थोड़ा-बहुत तो वह नज़र-अंदाज किया जा सकता है। इसलिए कि थोड़ी-बहुत अनिश्चितता हर चीज़ में होती है। आपने काग़ज़ का एक बहुत बड़ा पैकेट ख़रीदा, बाहर से देखा, इसकी सम्भावना चाहे बहुत थोड़ी हो, एक प्रति हज़ार हो, लेकिन इस बात की सम्भावना तो है कि इसमें कुछ काग़ज़ ख़राब रखे हुए हों। लेकिन इस तरह की सम्भावना चूँकि बहुत कम होता है इसलिए यह ‘ग़ररे-यसीर’ है, इसको शरीअत ने कोई ख़ास महत्व नहीं दिया।

‘क़िमार’ के बारे में स्पष्ट किया जा चुका है कि ‘क़िमार’ में दो पक्षों या दो मुक़ाबला करनेवालों में एक का नुक़्सान दूसरे के फ़ायदे को अनिवार्य कर देता हो, और दूसरे का फ़ायदा पहले के नुक़्सान के को अनिवार्य करता हो। इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने यही तारीफ़ें ‘क़िमार’ की बयान की हैं।

यहाँ यह बात ज़ेहन में रखनी चाहिए कि ‘क़िमार’ में असाधारण जोखिम पाया जाता है। लेकिन ख़ुद अपने-आपमें जोखिम ‘क़िमार’ नहीं है। थोड़ा-बहुत जोखिम या ख़तरा तो हर चीज़ में होता है। अगर यह ख़तरा उचित और सन्तुलित सीमाओं के अंदर हो तो यह ‘क़िमार’ नहीं है। उस हद से बढ़ जाए तो ‘क़िमार’ है। इस ख़तरे या जोखिम को समाप्त करने या सीमित रखने के उचित और जायज़ तरीक़े भी हो सकते हैं, वे इस्लामी तरीक़े हैं। यह समझना कि जोखिम का वुजूद हर इस्लामी प्रोडक्ट में अनिवार्य है, इसको कम नहीं किया जा सकता, यह दुरुस्त नहीं है। जोखिम को कम किया जा सकता है। इसके लिए इस्लामी तरीक़े अपनाए जा सकते हैं। बशर्तेकि वे उचित सीमाओं के अंदर हों। इस्लामी शरीअत के अनुसार कारोबार और व्यापार की सबसे महत्वपूर्ण शक्ल जिसको पवित्र क़ुरआन में बयान किया गया है वह ‘बैअ’ है। ‘बैअ’ यानी क्रय-विक्रय चूँकि व्यापार का सबसे बड़ा और प्राचीनतम तरीक़ा है इसलिए पवित्र क़ुरआन में ‘बैअ’ की शब्दावली इस्तेमाल की गई है। ‘बैअ’ की हक़ीक़त तो जैसा कि इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने लिखा है यह है कि माल का क्रय-विक्रय या माल का तबादला माल के साथ किया जाए। इसमें एक तरफ़ के माल को क़ीमत कहा जाता है दूसरी तरफ़ के माल को सौदा कहा जाता है। जिस ज़माने में अदला-बदली (Barter) के प्रकार का क्रय-विक्रय होता थी, वहाँ यह निर्धारण मुश्किल होता था कि क्या चीज़ क़ीमत है और क्या सौदा है। लेकिन जब से मौद्रिक अर्थव्यवस्था (Monetary economy) प्रचलित हो गई है उस वक़्त से यह निर्धारण आसान हो गया है कि क़ीमत क्या है और सौदा क्या है। इसलिए कुछ फुक़हा ‘बैअ’ की परिभाषा इस तरह करते हैं कि इसमें बार्टर और मौद्रिक दोनों अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हो जाएँ। कुछ फुक़हा जो आधुनिक काल के हैं वे बीच की परिभाषा इस तरह करते हैं कि इसमें मौद्रिक अर्थव्यवस्था में होनेवाली ‘बैअ’ ही शामिल होती है।

इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने पवित्र क़ुरआन के स्पष्ट निर्देशों की रौशनी में यह लिखा है कि क्रय-विक्रय या व्यापार के लिए दोनों पक्षों की स्वीकृति अनिवार्य है। दोनों पक्ष जो व्यापार की योग्यता रखते हों, बुद्धि-विवेक रखते हों, वयस्क हों, वे ‘ईजाब और क़ुबूल’ (आपसी सहमति) से व्यापार कर सकते हैं। लेकिन ख़ुद ईजाब और क़ुबूल क्या है, क्या ईजाब और क़ुबूल के शब्दों का दोहराना ज़रूरी है? इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के बहुमत का कहना यह है कि ज़बान से ईजाब व क़ुबूल के शब्द कहना ज़रूरी नहीं है। हर वह रवैया या इशारा या ऐसा रवैया जो दोनों पक्षों की रज़ामंदी को बताता हो वह काफ़ी है।

चुनाँचे ‘बैए-बित्तआती’ अधिकतर फुक़हा के नज़दीक जायज़ है। ‘बैए-बित्तआती’ हाथ के हाथ लेन-देन को कहते हैं। यह इस प्रकार होता है कि व्यापारी ने सामान रखा हुआ है, आपने उससे कुछ नहीं कहा। क़ीमत सामने रख दी और सामान उठाकर ले आए। उसने भी इसपर एतिराज़ नहीं किया। गोया वह भी राज़ी है आप भी राज़ी हैं। इसको ‘बैए-बित्तआती’ कहते हैं। अक्सर बाज़ारों में विशेष रूप से छोटी चीज़ों के बारे में जो ‘मिसलियात’ (वे चीज़ें जो एक जैसी बहुत होती हैं) से सम्बन्ध रखती हैं, इस तरह की ‘बैअ’ का आम रिवाज होता है। जो चीज़ें इस तरह की ‘बैअ’ में रखी जाती हैं उनमें से हर एक की क़ीमत निर्धारित होती है। बाज़ार में एक अंडे की क़ीमत मसलन दो रुपये है। आपने दो रुपये दुकानदार के सामने रख दिए, अण्डा उठाकर ले आए। एक डबल-रोटी की क़ीमत मसलन पचास रुपये है, आपने पचास रुपये का नोट रखा और डबल-रोटी उठाकर घर ले गए। यह ‘बैए-बित्तआती’ की क़िस्में हैं।

इस ‘बैअ’ को इमाम अबू-हनीफा, इमाम मालिक, इमाम अहमद और अधिकतर फुक़हा जायज़ क़रार देते हैं। और इसी पर आम तौर पर मुस्लिम दुनिया का रिवाज रहा है। इमाम शाफ़िई ने इस ‘बैअ’ को शुरू में नाजायज़ समझा और इसको ‘तराज़ी’ यानी आपस की रज़ामंदी के ख़िलाफ़ क़रार दिया। इमाम शाफ़िई के बाद आनेवाले शाफ़िई फुक़हा में से कुछ लोग इसको जायज़ समझते हैं कुछ लोग नाजायज़। लेकिन व्यावहारिक रूप से जो तरीक़ा शाफ़िई दुनिया में प्रचलित है वह वही है जो जम्हूर फुक़हा (फ़ुक़हा की अधिक तादाद) के दृष्टिकोण के अनुसार है।

‘बैअ’ के बाद कारोबार की एक और महत्वपूर्ण क़िस्म जो प्राचीनकाल से प्रचलित है वह ‘इजारा’ है। ‘इजारा’ से मुराद किसी लाभ को बेचना है। किसी चीज़ का अस्ल स्वामित्व आपका हो और आप ही का रहे। अलबत्ता उसके लाभ आप अस्थायी रूप से किसी को बेच दें, इसको ‘इजारा’ कहा जाता है। आपने एक गाड़ी ख़रीदी, गाड़ी आपका स्वामित्व है। लेकिन आपने एक साल के लिए निर्धारित किराए पर इसका फ़ायदा उठाने की किसी व्यक्ति को अनुमति दे दी, यानी किराए पर दे दी, या दूसरे शब्दों में उसके लाभ और नफ़े को बेच दिया। यह ‘इजारा’ कहलाता है। ‘इजारा’ की शर्तें अगर पूरी की जाएँ तो यह जायज़ कारोबार है। इसके नतीजे में हर क़िस्म का कारोबार किया जा सकता है। अगर ‘इजारा’ का कोई नया तरीक़ा शरीअत की सीमाओं के अनुसार हो और उससे पूँजी निवेश में काम लिया जा सकता हो तो उसके द्वारा पूँजी निवेश कराने में कोई हरज नहीं है।

आधुनिक बैंकिंग में ‘इजारा’ की बहुत-से रूप प्रचलित हैं। जिनके बारे में यह देखना चाहिए कि वे शरीअत के आदेश के अनुसार हैं कि नहीं हैं। अगर शरीअत के आदेशों के अनुसार हैं तो उनपर क्रियान्वयन में कोई बुराई नहीं है। ‘इजारा’ की बुनियादी शर्तों में यह बात शामिल है कि वह लाभ की बुनियाद पर हो। यानी इस चीज़ का जो लाभ है वह मामले की बुनियाद हो। उसका वुजूद मामले की बुनियाद न हो। यानी उस चीज़ का इस्तेमाल यानी use न हो सकता हो, इस्तिहलाक (यानी consumption) न होता हो। उसकी अस्ल सुरक्षित रहती हो। दूसरी शर्त यह है कि जिस माल के लाभ को आप किराए पर ले रहे हैं वह ‘माले-मुतक़व्विम’ हो यानी शरीअत में जायज़ हो, शरीअत में उसका इस्तेमाल जायज़ हो। तीसरी शर्त यह है कि वास्तविक दृष्टि से भी और शरई आदेशों की दृष्टि से भी इस लाभ को पूरा-पूरा वुसूल किया जा सकता हो। चौथी शर्त यह है कि वह लाभ मालूम और निर्धारित हो। मालूम और निर्धारित में बहुत दो-टूक अंदाज़ से मालूम और निर्धारित होना लाज़िमी नहीं है। आम तौर पर अंदाज़ा होना चाहिए कि कितना लाभ दरकार है। इसकी वजह यह है कि कभी-कभी लाभ में सौ प्रतिशत निर्धारण सम्भव नहीं होता। आपने अपनी गाड़ी किराए पर दे दी। अब किराए पर लेनेवाला सौ मील रोज़ चलाएगा, या दस मील चलाएगा या पाँच सौ मील रोज़ चलाएगा, इसका निर्धारण पूरे यक़ीन के साथ मुश्किल है। आपका आम अंदाज़ा है कि जिस व्यक्ति को आपने गाड़ी किराए पर दी है वह आम तौर से प्रतिदिन सौ मील चलाता है। किसी दिन डेढ़ सौ चलाएगा किसी दिन पचास चलाएगा। किसी-किसी दिन कई सौ मील चलाएगा। इसलिए अगर आप चाहें कि पहले से यह तय कर लें कि आपकी गाड़ी किराए पर लेनेवाला मसलन दो सौ मील रोज़ाना से ज़्यादा नहीं चलाएगा तो यह सम्भव नहीं होता। इसलिए शरीअत ने इसको लाज़िमी क़रार नहीं दिया।

इजारा के नतीजे में जो नक़्शा सामने आता है वह यह है कि जो ‘मुस्ताजिर’ है जिसने चीज़ किराए पर ली है वह इस निर्धारित अवधि तक के लिए इस लाभ का मालिक होगा जिसकी ख़ातिर उसने वह चीज़ किराए पर ली है और जो ‘मूजिर’ है जो अस्ल मालिक है, वह निर्धारित किराए का हक़दार होगा। मालिक की ज़िम्मेदारी यह है कि वह चीज़ मुस्ताजिर के हवाले कर दे, और अगर उसमें कोई दोष पाया जाता है या उसपर कोई जुर्माना है, तो वह ख़ुद ही उसका ज़िम्मेदार होगा और उसको अदा करेगा। मुस्ताजिर की ज़िम्मेदारी यह है कि उस चीज़ की हिफ़ाज़त करे, किराए को समय पर अदा करे और जब ‘इजारा’ की अवधि समाप्त हो जाए तो जो चीज़ किराए पर ली गई है उसको ज्यों का त्यों वापस कर दे। इसलिए कि जब अवधि समाप्त हो जाए तो फिर ‘इजारा’ समाप्त हो जाता है।

‘इजारा’ को दोनों पक्षों की आपस की रज़ामंदी से भी समाप्त किया जा सकता है। और अगर वह चीज़ नष्ट हो जाए तो भी ‘इजारा’ समाप्त हो जाता है। आपने किसी का घोड़ा किराए पर लिया, आपने मसलन एक साल के लिए यह मामला किया था, लेकिन दरमियान में घोड़ा बीमार हुआ और मर गया। अब ‘इजारा’ आपका समाप्त हो गया। अब दोनों पक्षों को अपने-अपने हुक़ूक़ के लिए कुछ क़वाइद के अनुसार मामले को तय करना पड़ेगा।

इस्लाम में व्यापार के आदेश इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने बहुत विस्तार से बयान किए हैं। ये आदेश अपनी जगह बहुत महत्व रखते हैं, लेकिन समस्या यह है कि ये आदेश आजकल की बहुत-सी स्थितियों में लागू नहीं होते, इसलिए आज इस्लामी व्यापार के लिए यह बात ज़रूरी है कि नए अंदाज़ से फ़िक़्ही निधि का पुनःसंकलन किया जाए। इस्लाम में पूँजी निवेश के जितने तरीक़े प्रचलित रहे हैं उनको आजकल की भाषा में स्पष्ट किया जाए। यानी मामले से सम्बन्धित फ़िक़्ही पूँजी के पुनःसंकलन और पूँजी निवेश के सिद्धान्त का पुनः संकलन। ये दोनों आजकल के तुरन्त पूरे किए जाने लायक़ तक़ाज़े हैं।

यह बात ख़ुशी और इतमीनान की है कि इस दौर के इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने बड़े पैमाने पर यह काम किया है, और बड़े पैमाने पर आजकल भी हो रहा है। उनमें से हर व्यापार के लिए, विशेष रूप से अगर बड़े पैमाने पर इसको किया जाए तो दस्तावेज़ों और अनुबन्धों की तैयारी भी अपरिहार्य है। यह काम बैंकिंग की हद तक तो बहुत हुआ है और बहरैन में जो इदारा ‘एयूबी’ (Ahli United Bank) के नाम से काम करता है उसने बहुत-सी दस्तावेज़ात और अनुबन्धों के मुसव्वदे तैयार किए हैं, जिनके द्वारा इस्लामी बैंकों का काम बहुत आसान हो गया है। लेकिन व्यापार का बड़ा हिस्सा वह है या ख़ासा बड़ा हिस्सा वह है जो बैंकों से बाहर किया जा रहा है। उनके लिए भी विभिन्न प्रकार की दस्तावेज़ और काग़ज़ात की तैयारी ज़रूरी है। इस्लामी आर्थिक और व्यापारिक संस्थाओं की स्थापना भी व्यापार की अनिवार्य आवश्यकता है। आजकल व्यापार बहुत पेचीदा हो गया है। इसकी नई नई शक्लें और रूप सामने आने लगे हैं। इन नई-नई शक्लों को संगठित करने के लिए नई आर्थिक तथा व्यापारिक संस्थाओं की ज़रूरत है। उनकी स्थापना विभिन्न मुस्लिम देशों में होनी चाहिए। इस्लामी आर्थिक मार्केट की स्थापना अपरिहार्य है। आजकल जो आर्थिक मार्केट, Money Market या ‘बाज़ारे-ज़र’ है वह पूरा-का-पूरा या उसका अधिकतर हिस्सा ब्याज आधारित कारोबार पर निर्भर है। उस कारोबार में या उस बाज़ार में इस्लामी अर्थव्यवस्था और इस्लामी व्यापार का पनपना मुश्किल होता है। इसलिए इस्लामी आर्थिक बाज़ार का गठन अपरिहार्य है।

फिर इस्लामी अर्थव्यवस्था और व्यापार के लिए अकाउंटेंट और आर्थिक रुप से हिसाब लेने की तैयारी भी अपरिहार्य है। शरीआ ऑडिट और व्यापार की निगरानी का इस्लामी प्रबन्ध भी होना चाहिए। इस्लामी संस्थाओं की दर्जा-बंदी यानी rating की व्यवस्था भी अब शुरू होने लगी है। और यह बात ख़ुशी की है कि इस्लामी व्यापारिक संस्थाओं की दर्जा-बंदी भी अब शुरू हो गई है। और आशा है कि समय के साथ-साथ यह सिलसिला बढ़ता चला जाएगा और वह तमाम अपेक्षाएँ पूरी करने के योग्य हो जाएगा जो आज आधुनिक काल की दृष्टि से अपरिहार्य हैं।

इस्लाम में व्यापार के आदेशों पर चर्चा बहुत संक्षेप भी की जा सकती है और बहुत विस्तृत रूप से भी की जा सकती है। विस्तृत चर्चा अगर की जाए तो वह बहुत लम्बी भी होगी और बहुत जटिल भी होगी। इसलिए कि व्यापार के आदेशों के बारे में जितने विस्तार से इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने लिखा है वह ‘फ़िक़्हुल-मुआमलात’ की हज़ारों किताबों और लाखों पृष्ठों पर फैला हुआ है। जिस-जिस ज़माने में इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने लिखा, उस ज़माने के व्यापारिक सिद्धान्त, और व्यापार के तरीक़ों को सामने रखकर लिखा।

व्यापार के तौर-तरीक़े हर दौर में बदलते रहते हैं। इसलिए पवित्र क़ुरआन और सुन्नत में व्यापार के तरीक़ों की तफ़सीलात के बारे में ज़्यादा चर्चा नहीं है। पवित्र क़ुरआन ने कुछ सैद्धान्तिक निर्देश देने को काफ़ी समझा है। हदीसों में उन उसूलों के और अधिक व्यावहारिक विवरण बयान किए गए हैं और उन सीमाओं की निशानदेही की गई है जिनके नतीजे में कोई व्यापार जायज़ या नाजायज़ क़रार पाएगा। ये वे सीमाएँ हैं जिनको इस चर्चा में संक्षिप्त रूप से स्पष्ट किया गया है। इन सीमाओं के अंदर जो भी व्यापार किया जाएगा उसका नाम जो भी हो, वह जायज़ और शरीअत के अनुसार होगा।

किसी व्यापार के जायज़ और शरीअत के अनुसार होने के लिए यह हरगिज़ ज़रूरी नहीं है कि वह सौ प्रतिशत उन फ़िक़ही तरीक़ों के अनुसार हो जो इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने फ़िक़्ह की किताबों में लिखे हैं। इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने फ़िक़्ह की किताबों में जो तरीक़े लिखे हैं ये वे हैं जो उनके ज़माने में जगह-जगह प्रचलित थे। इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने उन तरीक़ों का जायज़ा लिया। उनमें जो चीज़ शरीअत से टकराती नहीं थी उसके तफ़सीली आदेश बयान कर दिए। जब तक उन जायज़ तरीक़ों को शरीअत के आदेशों के अनुसार बरता जाता रहा, वे इस्लामी तरीक़े समझे जाते रहे। जब व्यापार के इन तरीक़ों को इस्लाम की शिक्षा से हटकर बरता गया तो वे ग़ैर-इस्लामी तरीक़े हो गए। इसी तरह आज के तमाम प्रचलित तरीक़ों को अगर इस्लाम के आदेशों के अनुसार बरता जाएगा तो वे जायज़ तरीक़े होंगे। इस्लाम के आदेशों से हटकर उनपर अमल किया जाएगा तो वे नाजायज़ तरीक़े होंगे।

इसलिए व्यापार के प्रचलित तरीक़ों की जानकारी भी इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के लिए ज़रूरी है। यह जानकारी न केवल इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के लिए ज़रूरी है, बल्कि व्यापार का पेशा अपनानेवालों के लिए भी अपरिहार्य है। यह बात मैं पहले बता चुका हूँ कि इमाम मुहम्मद-बिन-हसन शैबानी जिस ज़माने में मामलों के आदेश संकलित कर रहे थे तो वे कुछ समय के लिए रोज़ाना बाज़ार जाकर बैठा करते थे। अपने निर्धारित समय का एक हिस्सा इन्होंने इस काम के लिए रखा था कि बाज़ार में अपने किसी दोस्त के पास जाकर बैठते थे और ध्यानपूर्वक व्यापार के तरीक़े और लेन-देन के ढंगों का अवलोकन किया करते थे, ताकि यह पता चलाएँ कि बाज़ार में लेन-देन होता कैसे है, ताकि उसके आदेश संकलित किए जाएँ।

इसी तरह आज के इस्लामी विद्वानों की यह ज़िम्मेदारी है कि आजकल प्रचलित व्यापार के तरीक़ों का जायज़ा लें और अगर उनमें कोई चीज़ शरीअत से टकराती नहीं है तो उसके बारे में स्पष्ट कर दें कि यह जायज़ है। और अगर कोई चीज़ शरीअत से टकराती है तो यह बताएँ कि वह क्यों टकराती है और इस टकराव को दूर कैसे किया जाए। और इस प्रचलित तरीक़े को इस्लाम के अनुसार कैसे बनाया जाए। ये दोनों काम अंजाम देना और इस ज़रूरत की पूर्ति करना आजकल के इस्लामी विद्वानों और फुक़हा की ज़िम्मेदारी है। किसी व्यापार को नाजायज़ क़रार देकर बिलकुल ही नज़रअंदाज कर देना और आम लोगों से यह उम्मीद रखना कि वे उससे बचे रहेंगे, यह व्यावहारिक रवैया नहीं है। यह नीति न सहाबा किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) की थी, न चारों इमामों की थी, और न पिछले तेरह सौ चौदह सौ साल के दौरान इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) का यह तरीक़ा रहा है।

यही मामला बैंकिंग व्यवस्था का है। जैसा कि आगे विस्तार से बात आएगी। बैंकिंग की व्यवस्था में कुछ मामले हैं जो जायज़ हैं, कुछ मामले हैं जो नाजायज़ हैं। जो नाजायज़ हैं वे किस हद तक नाजायज़ हैं इसकी निशानदेही होनी चाहिए। जो पहलू नाजायज़ हैं उनको कैसे जायज़ बनाया जाए, यह स्पष्टीकरण भी दरकार है। इस स्पष्टीकरण और उन आदेशों के संकलन के बाद बैंकिंग के उद्देश्यों के लिए और बैंकिंग के मैदान में क्या जानेवाला हर वह काम जो शरीअत में जायज़ हो और शरीअत की सीमाओं के अनुसार अंजाम दिया जा रहा हो वह इस्लामी बैंकिंग कहलाएगा और जायज़ काम होगा। यही नीति, व्यापार, अर्थव्यवस्था, कारोबार और व्यवहार के सभी विभागों में अपनाई जानी चाहिए।

व्यापार और कारोबार के इस मौलिक महत्व के देखते हुए फ़ुक़हा ने व्यापार और कारोबार के विभिन्न पहलुओं पर बहुत विस्तार से बहस की है। यह चर्चा जहाँ फुक़हा, क़ुरआन के टीकाकारों और मुहद्दिसीन ने की है वहाँ इस चर्चा से सूफ़ियों ने भी दिलचस्पी ली है और यह बताया है कि व्यापार और कारोबार से जुड़ाव किसी इंसान के आध्यात्मिक विकास के रास्ते में रुकावट नहीं हो सकता, अगर इन गतिविधियों को शरीअत की सीमाओं के अनुसार अंजाम दिया जाए। इमाम ग़ज़ाली जो इस मामले में एक उदाहरण हैं कि उनका रवैया अधिकतर सांसारिक मामले में ख़ासा सख़्त होता है और जो अत्यन्त उच्च नैतिक और सख़्त आध्यात्मिक मापदंड उन्होंने अपने लिए अपनाया था, वह आशा करते हैं कि हर मुसलमान नैतिक उच्चता और भौतिकता से ऊपर उठने के बारे में इसी मापदंड पर आसीन होगा। उन्होंने भी जहाँ व्यापार और कारोबार की व्यस्तताओं को रूहानियात (अध्यात्म) से जुड़ा क़रार दिया है वहाँ उन्होंने मध्यमार्ग यह बताया है कि इंसान अपनी पूरी आर्थिक ज़िम्मेदारियों को भरपूर तरीक़े से अंजाम दे। आर्थिक गतिविधियों में भरपूर हिस्सा ले। लेकिन इसके साथ-साथ अपनी पारलौकिक ज़िम्मेदारियों को भी न भूले। ऐसा व्यक्ति ही सन्तुलित रास्ते पर क़ायम रहता है और उन लोगों में से होता है जिन्हें पवित्र क़ुरआन ने ‘मुक़तसिदीन’ के नाम से याद किया है यानी बीच का रवैया अपनानेवाले।

इमाम ग़ज़ाली ने एक और जगह लिखा है कि रोज़ी की तलब के बारे में लोगों की तीन क़िस्में होती हैं। कुछ लोग तो वे होते हैं जिन्होंने अपनी गतिविधि और दिलचस्पी का पूरा केन्द्र आर्थिक और भौतिक लाभों ही की प्राप्ति को क़रार दिया और पारलौकिक ज़िम्मेदारियों को भूल गए। ये तो हलाक होनेवालों में से हैं। कुछ लोग वे होते हैं जिन्होंने अपने ध्यान का मुख्य केन्द्र परलोक को क़रार दिया और अपनी दीनी (धार्मिक) ज़िम्मेदारियों पर ही ध्यान दिया, सांसारिक ज़िम्मेदारियाँ या तो उनसे उपेक्षित हो गईं या वे उनपर उतना ध्यान नहीं दे सके जितना ध्यान आम तौर पर लोग देते हैं। ये वे हैं जिनको इमाम ग़ज़ाली ‘फ़ायज़ीन’ के नाम से याद करते हैं। ये सफल हैं इसलिए कि वास्तविक सफलता उनको प्राप्त हो गई। जहाँ तक सांसारिक मामले का सम्बन्ध है तो ज़िन्दगी उनकी भी कट गई जैसे बाक़ी लोगों की कट जाती है। तीसरा गिरोह उन लोगों का है कि जो अपनी आर्थिक गतिविधियों में आख़िरत को याद रखते हैं। आर्थिक गतिविधियों से जो लाभ और नेमतें प्राप्त होती हैं उनको पारलौकिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं और यों दुनिया और आख़िरत दोनों को मिलाकर ज़िन्दगी गुज़ारते हैं। ये वे हैं जो ‘मुक़तसिदीन’ में से हैं और सन्तुलित या मध्य मार्ग पर चल रहे हैं।

जो व्यक्ति रोज़गार की तलब में सीधे रास्ते को नहीं अपनाता और सीधे रास्ते पर क़ायम नहीं रहता, वह सन्तुलित मार्ग के दर्जे को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए ज़रूरी है कि दुनिया के धन-दौलत को पारलौकिक सफलता का ज़रिया समझा जाए। पारलौकिक उद्देश्यों के लिए धन-दौलत को इस्तेमाल किया जाए और धन-दौलत की तलब और प्राप्ति सब-की-सब पूर्ण रूप से शरीअत के अनुसार हो। माल की प्राप्ति भी शरीअत के अनुसार हो और माल का ख़र्च भी शरीअत के आदेशों के अनुसार हो। यानी जहाँ से कमाने की अनुमति है वहाँ से कमाया जाए और जहाँ ख़र्च करने की अनुमति या नसीहत है वहाँ ख़र्च किया जाए।

धनोपार्जन के इसी महत्व के देखते हुए अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कई बार यह इरशाद फ़रमाया और उनका यह फ़रमान कई मुहद्दिसीन ने, जिनमें इमाम अहमद, इमाम हाकिम और इमाम बज़्ज़ार शामिल हैं, बयान किया है। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि “सबसे ज़्यादा हलाल रोज़ी जो इंसान प्राप्त करता है वह है जो वह अपनी निजी कमाई से और नेक और ईमानदारी से किए गए व्यापार से प्राप्त करे।” ईमानदारी से किए गए व्यापार से जो कमाई प्राप्त होती है वह बहुत बरकत वाली कमाई होती है, जिसके प्रभाव इंसान के नैतिक जीवन पर भी पड़ते हैं। यही वजह है कि अगर कोई व्यक्ति सांसारिक गतिविधियों में भरपूर हिस्सा ले रहा हो, आर्थिक ज़िम्मेदारियाँ पूरे तौर पर अंजाम दे रहा हो, लेकिन उसके साथ-साथ पारलौकिक ज़िम्मेदारियों को भी पूरे तौर पर याद रखे हुए हो तो वह रूहानी तर्बियत (आध्यात्मिक प्रशिक्षण) के मक़ामात (दर्जों) को बहुत जल्दी प्राप्त कर लेता है। उसे वे नैतिक पावनता जल्दी प्राप्त हो जाती है जो शरीअत का अभीष्ट है।

यही वजह है कि मशहूर ताबिई फ़क़ीह और हज़रत अबू-हनीफ़ा (रह॰) के उस्ताद इबराहीम नख़ई फ़रमाया करते थे कि सच्चा व्यापारी, ईमानदार मुझे ज़्यादा प्रिय है उस व्यक्ति की तुलना में जो सब काम छोड़-छाड़कर इबादत में अपनी ज़िन्दगी गुज़ारे। इसलिए कि जो व्यक्ति व्यापार करता है, ज़िन्दगी की गतिविधियाँ भरपूर तरीक़े से अंजाम दे रहा है और इसके साथ-साथ इबादत भी करता है, दीनी ज़िम्मेदारियाँ भी अंजाम देता है, वह लगातार जिहाद (संघर्ष) की कैफ़ियत में रहता है। वह जिहाद जो उसका अपने नफ़्स (मन) के ख़िलाफ़ है, शैतान के ख़िलाफ़ है। इसलिए कि इबराहीम नख़ई ने कहा कि शैतान तरह-तरह से उस व्यापारी के सामने आता है, कभी नाप-तौल और तराज़ू के द्वारा आता है। कभी लेन-देन के द्वारा सामने आता है और उसको सीधे रास्ते से हटाने की कोशिश करता है। ईमानदार व्यापारी रात-दिन शैतान के इन हथकंडों को नाकाम बनाने में लगा रहता है, अपने को उनसे दूर रखता है, अपने रवैये को पाकीज़ा रखता है। यों उसको ‘तज़किया’ (आत्मिक विकास) प्राप्त होता है और ‘तज़किया’ के नतीजे में जो खरापन पैदा होता है, जो सुथरा स्वभाव इंसान का बनता है वह उस व्यक्ति का नहीं हो सकता जो सब काम छोड़कर मस्जिद के कोने में या ख़ानक़ाह के कोने में बैठ गया हो।

यह इसलिए भी है कि हलाल रोज़ी की तलब ख़ुद एक फ़र्ज़ है। इमाम तबरानी ने हज़रत अबदुल्लाह-बिन-मसऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु) के हवाले से बयान किया है कि “हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी यह भी है कि हलाल रोज़ी की तलाश और तलब करे।” हलाल रोज़ी की तलब और तलाश जब इंसान करता है तो जहाँ वह एक शरई आदेश का पालन कर रहा होता है, वह अपनी सांसारिक और भौतिक गतिविधियों को शरीअत के आदेशों के अनुसार अंजाम दे रहा होता है और हज़रत इबराहीम नख़ई के कथनानुसार उन तमाम नकारात्मक शक्तियों से भी संघर्षरत रहता है जो उसको सत्यमार्ग से हटाना चाहती हैं। कोई हराम खिलाना चाहता है, कोई रिश्वत देना चाहता है कोई नाप-तौल में कमी करवाना चाहता है। कोई टैक्स में गड़बड़ कराना चाहता है। और इस व्यक्ति को दिन-रात इन तमाम नकारात्मक प्रवृत्तियों से बचना पड़ता है। अपने तत्कालीन आर्थिक हितों में से कुछ की क़ुर्बानी भी देनी पड़ती है। इसलिए इस लगातार क़ुर्बानी और संघर्ष के परिणामस्वरूप जो प्रशिक्षण मिलता है वह बहुत ठोस और पुख़्ता होता है। इसी लिए यह कर्तव्य इमाम ग़ज़ाली के कथनानुसार अत्यन्त कठिन कर्तव्य है और इंसान पर अत्यन्त भारी गुज़रता है कि बैठे-बिठाए नाजायज़ रोज़ी मिल रही हो, बैठे-बिठाए भौतिक लाभ प्राप्त हो रहा हो, बैठे-बिठाए चुपचाप से नाजायज़ लाभ प्राप्त हो रहे हों और इंसान सिर्फ़ अल्लाह की प्रसन्नता की ख़ातिर उनसे परहेज़ करे, निस्सन्देह यह एक बहुत मुश्किल काम है। यही वजह है कि अल्लामा इक़बाल ने इसको दीन का एक बुनियादी राज़ (रहस्य) क़रार दिया है, बुनियादी हिक्मत इसको ठहराया है। वह एक जगह फ़रमाते हैं— सिर्रे-दीन सिद्क़े-मक़ाल, अक्ले-हलाल”। ज़बान की सच्चाई और हलाल रोज़ी, इन दो चीज़ों पर दीन (धर्म) की तत्वदर्शिता का दारोमदार है। सिद्क़े-मक़ाल (सच बोलनेवाला) होगा तो अक्ले-हलाल (हलाल रोज़ी) भी होगा। अक्ले-हलाल (हलाल रोज़ी) होगा तो उसकी बरकत से सिद्क़े-मक़ाल भी प्राप्त होगा। कुछ उलमा ने पवित्र क़ुरआन की इस आयत से दलील ली है जिसमें फ़रमाया गया है कि—“जो कुछ पाक जीज़ें हैं, उनमें से खाओ और नेक और भले कार्य करो।” (क़ुरआन, 23:51) यहाँ नेक काम से पहले “हलाल रोज़ी खाने” का ज़िक्र है। यानी पाकीज़ा चीज़ों की प्राप्ति को भले कामों से पहले रखा गया है। इसलिए हलाल रोज़ी का महत्व कुछ दृष्टि से उन नेक कामों से बढ़कर है जिनका दर्जा फ़र्ज़ का नहीं है। इसलिए कि आर्थिक गतिविधि या व्यापारिक गतिविधि अपने-आपमें शरीअत की नज़र में पसंदीदा है। इमाम बुख़ारी ने हज़रत अनस इब्ने-मालिक से बयान किया है कि अगर कोई मुसलमान कोई पौधा लगाता है या कोई खेती बोता है और उसका फल या दाना कोई इंसान या जानवर या परिंदा कोई भी खाए तो वह उसके हक़ में सदक़ा शुमार होता है। इससे यह भी पता चला कि जानवरों और परिंदों के कल्याण का कार्य भी अल्लाह की नज़र में सदक़ा है। लिहाज़ा जानवरों को भूख और प्यास से बचाना, गर्मी और सर्दी से सुरक्षित रहने के लिए उनका प्रबन्ध करना, यह भी सदक़े की हैसियत रखता है। इस अर्थ की एक-दो हदीसें और भी हैं जिनको विभिन्न मुहद्दिसीन ने नक़्ल किया है।

इससे स्पष्ट होता है कि हर आर्थिक गतिविधि, हर पैदावारी गतिविधि शरीअत की नज़र में पसंदीदा है। मशहूर मुहद्दिस हज़रत अबू-क़िलाबह जो इल्मे-हदीस के इतिहास के नुमायाँ व्यक्तित्वों में से हैं, जिनकी ‘सनद’ से बहुत-से मुहद्दिसीन को बहुत-सी रिवायतें (उल्लेख) मिली हैं। उन्होंने एक व्यक्ति को देखा जो मस्जिद के एक कोने में बैठकर तिलावत (क़ुरआन पाठ) और इबादत किया करता था, उन्होंने उससे पूछा कि तुम क्या करते हो? तुम्हारी आय का स्रोत क्या है? उसने जवाब दिया कि आय का स्रोत कुछ भी नहीं है। लोग जो कुछ देते हैं वह इस्तेमाल करता हूँ और अपना वक़्त इबादत में लगाता हूँ। अबू-क़िलाबा ने कहा कि “मैं तुम्हें आर्थिक जीवन और हलाल रोज़ी की प्राप्ति में लगा हुआ देखूँ, यह मुझे ज़्यादा पसंद है इस बात की तुलना में कि मैं तुम्हें मस्जिद के कोने में बैठे देखूँ।” इसलिए कि इबादत का अपना वक़्त है, आर्थिक गतिविधि का अपना वक़्त है। दोनों की ज़िम्मेदारियाँ अपनी-अपनी जगह हैं। एक को दूसरे के लिए क़ुर्बान करना यह शरीअत की सन्तुलित शिक्षाओं के ख़िलाफ़ है।

आर्थिक गतिविधियों से दिलचस्पी पैदा करना और नौजवानों को इस ओर प्रवृत्त करना इस्लामी विद्वानों में से बहुत से लोगों का काम रहा है। हज़रत हसन बसरी, जो मशहूर ताबिई हैं और मशहूर मुहद्दिसीन और अस्हाबे-तज़किया में से हैं, वह कहा करते थे कि बाज़ार अल्लाह तआला के दस्तरख़ान हैं, जो इस दस्तरख़ान पर आएगा उसको अपना हिस्सा मिलेगा। अतः बाज़ार में जाए बिना न व्यापार हो सकता है, न कारोबार हो सकता है। जब बाज़ार में जाओ तो यह समझकर जाओ कि अल्लाह तआला का दस्तरख़ान है, यहाँ जाकर मेहनत करूँगा तो मुझे रिज़्क़ मिलेगा जो अल्लाह की तरफ़ से मेरे लिए नेमत होगी। लेकिन बाज़ार जाने से पहले ज़रूरी है कि व्यापारी को व्यापार के ज़रूरी आदेशों का ज्ञान हो। ज्ञान हर चीज़ के लिए अपरिहार्य है। शरीअत में संक्षिप्त सैद्धान्तिक आदेश जानना फ़र्ज़े-ऐन (परम कर्तव्य) है। हर व्यक्ति की यह व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी है कि जिस गतिविधि से उसका सम्बन्ध हो उसके बारे में शरीअत के आदेश मालूम करे। आम ज़िन्दगी से सम्बन्धित हलाल और हराम के आदेश जानना भी फ़र्ज़े-ऐन है। जिस व्यक्ति को यह मालूम न हो कि पाक पानी कौन-सा होता है और नापाक पानी कौन-सा होता है तो वह नमाज़ के लिए वुज़ू कैसे करेगा। वुज़ू नहीं करेगा तो नमाज़ कैसे अदा करेगा। इसी तरह जो व्यक्ति जायज़ रोज़ी की प्राप्ति के लिए बाज़ार जाना चाहता है और बाज़ार को अल्लाह का दस्तरख़ान समझकर जा रहा है उसके लिए ज़रूरी है कि वह शरीअत के आदेशों का ज्ञान रखता हो।

इमाम ग़ज़ाली ने लिखा है कि व्यापारी के लिए छः प्रकार के मामलों का ज्ञान अपरिहार्य है। एक व्यापारी को इन छः मामलों का आवश्यक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए

1. क्रय-विक्रय

3. सूद और रिबा (ब्याज)

3. बैए-सलिम

4. इजारा

5. मुशारका

6. मुज़ारबा

इसलिए कि व्यापार और कारोबार की बड़ी-बड़ी क़िस्में यही हैं, और इनमें जो ख़राबी पैदा होती है, वह आम तौर से ब्याज की वजह से पैदा होती है। ‘रिबा’ की कुछ शक्लें इतनी बारीक और सूक्ष्म हैं कि कभी-कभी उसका अंदाज़ा नहीं होता कि इस कारोबार में ‘रिबा’ दाख़िल हो गया है। इसलिए ‘रिबा’ के आदेश व्यापारियों के लिए जानना अपरिहार्य है।

‘बैअ’ (सौदा) के मामले इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने बहुत विस्तार से बयान किए हैं। यह भी बताया है कि ‘बैअ’ या क्रय-विक्रय और ‘बैअ’ और ‘शरा’ कौन लोग कर सकते हैं। इस बारे में शरीअत और देश के क़ानून मुत्तफ़िक़ हैं कि ‘बैअ’ और ‘शरा’ के लिए सम्बन्धित पक्ष का वयस्क और समझदार होना ज़रूरी है। कुछ अपवाद हैं जिनसे क़ानून भी सहमति व्यक्त करता है, शरीअत भी सहमत है, जहाँ छोटा बच्चा भी क्रय-विक्रय कर सकता है। जिन मामलों के आधार पर कारोबार होना चाहिए, व्यापार जिस माल का होना चाहिए उसका विवरण थोड़ा-सा बयान किया जा चुका है। एक-बार संक्षेप में फिर दोहरा देता हूँ कि वह कोई नापाक चीज़ न हो, ‘माले-मुतक़व्विम’ हो, यानी शरीअत उसको माल स्वीकार करती हो। जिस व्यक्ति की तरफ़ से बेचा जा रहा है वह चीज़ पूर्ण रूप से उसके स्वामित्व में हो। जो व्यक्ति कोई चीज़ बेच रहा है वह उस चीज़ के अदा करने पर पूरी तरह सक्षम हो। जो चीज़ वह बेच रहा है उस समय अगर मौजूद नहीं है तो उसको इतनी सामर्थ्य होनी चाहिए और वह चीज़ ऐसी होनी चाहिए कि हर समय प्राप्त करके ख़रीदार को उपलब्ध की जा सके। अगर किसी व्यक्ति ने कोई चीज़ ख़रीदी है तो जब तक उसके क़ब्ज़े में न आ जाए उस वक़्त तक वह आगे बेच नहीं सकता। हदीस में आया है कि “अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उस चीज़ को बेचने से मना किया है, जो अभी क़ब्ज़े में न आई हो।” जो चीज़ अभी तक ख़रीदार के क़ब्ज़े में नहीं आई, वास्तविक क़ब्ज़े में आई हो या वैचारिक दृष्टि से क़ब्ज़े में आ गई हो, इसकी बिक्री क़ब्ज़े से पहले जायज़ नहीं है। जो चीज़ बेची जा रही है और आइन्दा किसी तारीख़ को अदा की जाएगी, उसकी मात्रा, उसके गुण, उसका प्रकार, वह चीज़ पूरी तरह और स्पष्ट रूप से मालूम होनी चाहिए।

इमाम ग़ज़ाली ने एक बात बहुत दिलचस्प लिखी है। आजकल की दृष्टि से उसकी व्याख्या की जाए तो बात स्पष्ट हो जाएगी। उन्होंने लिखा कि व्यापारियों को ‘ज़र’ के मामले का ज्ञान होना चाहिए। “व्यापारी के लिए नक़द (या ज़र) का ज्ञान अनिवार्य है।” लेकिन इससे मुराद क्या है। मेरा ख़याल है कि इससे मुराद हर दौर के हिसाब से विभिन्न मामले हो सकते हैं। आजकल के व्यापारी के लिए ज़रूरी है कि वह काग़ज़ी करंसी के विवरण का ज्ञान रखता हो। बेचने और ख़रीदने से सम्बन्धित दस्तावेज़ों की जानकारी रखता हो। करंसी के लेन-देन के आदेशों को जानता हो। वास्तविक और जाली करंसी का फ़र्क़ समझता हो। सरकार के जो क़ानून करंसी के लेन-देन के लिए मुक़र्रर हैं उनसे परिचित हो। ये सब मामले नक़द के ज्ञान में शामिल हैं। इसलिए कि जिन उद्देश्यों और आदेशों के लिए इमाम ग़ज़ाली ने नक़द के ज्ञान की प्राप्ति की शर्त रखी, उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ज़रूरी है कि आज का व्यापारी करंसी से सम्बन्धित इन तमाम मामलों से अच्छी तरह से परिचित हो।

पवित्र क़ुरआन में जगह-जगह ‘ज़रर’ की मनाही आई है। ज़ुल्म की मनाही आई है। ‘ज़रर’ से मुराद हर वह नुक़्सान है जो किसी व्यक्ति को दूसरे के रवैये से पहुँचे और उसका हक़ प्रभावित हो। पवित्र क़ुरआन में जगह-जगह ‘ज़रर’ से मना किया गया है। हदीसों में ‘ज़रर’ की मनाही आई है और यह मशहूर हदीस तो अब फ़िक़्ह के नियम की हैसियत रखती है। “न तुम किसी को ‘ज़रर’ पहुँचाओ, न बदले में कोई तुम्हें ‘ज़रर’ पहुँचाए।” ‘ज़रर’ का बड़ा दख़ल मामले में होता है। अगर व्यापारी शरीअत के आदेशों की पाबंदी न करे या जहाँ-जहाँ शरीअत के आदेश की पाबंदी न हो रही हो वहाँ दूसरे पक्ष को ‘ज़रर’ पहुँचने की प्रबल सम्भानाएँ पैदा हो जाएँगी और जब उसको ‘ज़रर’ पहुँचेगा तो आप उसके साथ ज़ुल्म कर रहे होंगे। इसलिए कोई ऐसा रवैया नहीं अपनाना चाहिए जिससे दूसरे पक्ष को ‘ज़रर’ या नुक़्सान पहुँचने की सम्भावना पैदा होती हो, इसलिए कि जब भी किसी को ‘ज़रर’ पहुँचेगा तो वह ज़ुल्म समझा जाएगा और आप ज़ुल्म के अपराधी क़रार पाएँगे। ‘ज़रर’ में यह बात भी शामिल है कि आप किसी ख़रीदार को कोई ऐसा सौदा बेच दें जो उसकी आशा के अनुसार न हो, लेकिन आप उसे यह समझा दें कि यह उसकी आशा के अनुसार है।

इमाम ग़ज़ाली ने लिखा है कि ‘ज़रर’ का अपराध करने और उसके नतीजे में ज़ुल्म का अपराध करने से बचने के लिए चार चीज़ें ज़रूरी हैं। पहली चीज़ तो यह ज़रूरी है कि कोई बेचनेवाला अपने सौदे की कोई ऐसी परिभाषा न करे जो उसमें नहीं पाई जाती हो। यह आजकल इश्तिहार बाज़ी की एक कला बन गई है। विज्ञापन बनानेवाली कंपनियाँ तो जिस चीज़ को चाहें आसमान पर पहुँचा दें और जिसको चाहें ज़मीन पर गिरा दें। दूसरी बात इमाम ग़ज़ाली ने यह लिखी है कि ‘बाए’ (विक्रेता) की ज़िम्मेदारी है कि अपनी चीज़ का कोई दोष न छिपाए। और अगर कोई उसमें ऐसी कमज़ोरी या त्रुटि है जो स्पष्ट रूप से नज़र नहीं आती तो उसका बता देना और ज़ाहिर कर देना ज़रूरी है। अगर ऐसा न किया जाए तो यह धोखे के समान होगा। तीसरी बात यह कि उसका अस्ल वज़्‌न, अस्ल मात्रा और अस्ल मालियत छिपाई न जाए। चौथी बात यह कि बाज़ार में जो भाव है, जो प्रचलित है उसको ख़रीदार से न छिपाया जाए। ये तमाम बातें सही-सही ख़रीदार को बता दी जाएँ और उसपर कोई ऐसा दबाव न डाला जाए जिसकी वजह से वह कोई ऐसी चीज़ ख़रीदने पर आमादा हो जाए जो वह ख़रीदना नहीं चाहता या अगर दबाव न डालते तो वह न ख़रीदता तो ऐसा करना दुरुस्त नहीं है।

यही वजह है कि हदीसों में व्यापारियों के क़सम खाने को बुरा समझा गया है। चीज़ बेचनेवाला अपनी चीज़ बेचने के लिए बार-बार क़समें खाए तो यह बहुत अनुचित बात है। दो-चार कौड़ी की आमदनी के लिए अल्लाह तआला के पाक और बाबरकत नाम को बीच में लाना यह मुसलमान की गरिमा के अनुकूल नहीं है। यह नापसंदीदगी उस वक़्त है जब क़सम सच्ची हो। और अगर झूठी हो तो वैसे ही बहुत बड़ा गुनाह है। इसके नतीजे में बरकत भी समाप्त हो जाती है। सौदा तो शायद बिक जाए, लेकिन बरकत जाती रहती है। फिर यह धोखा भी है, जहाँ यह झूठी क़सम है वहाँ धोखा भी है।

शरीअत में धोखे की सख़्त मनाही आई है। इमाम ग़ज़ाली और अल्लामा इब्ने-तैमिया ने और दूसरे बहुत से लोगों ने यह बात विस्तार से लिखी है कि धोखे में क्या-क्या चीज़ें शामिल हैं। अगर कोई व्यक्ति अपने सौदे के तमाम दोष या कमज़ोरियाँ ज़ाहिर नहीं करता, उसमें से कुछ छिपाता है और कुछ ज़ाहिर कर देता है, तो यह भी एक तरह का धोखा है, बल्कि ज़ुल्म भी है और मुसलमान की जो ज़िम्मेदारी दूसरे मुसलमान का भला चाहने के बारे में है, उससे बचना भी है।

अगर एक व्यक्ति जान-बूझकर अंधेरे में माल दिखाता है कि अंधेरा होने की वजह से ख़रीदार को पूरे तौर पर माल नज़र न आए, मसलन क़ुर्बानी का मौक़ा है, जानवर बेचने के लिए लाए गए हैं, ऐसे में ख़रीदार को अंधेरे में ले जाकर लंगड़ा जानवर दिखा दिया, बीमार जानवर दिखा दिया। पुरानी गाड़ी थी, अंधेरे में जाकर दिखाई, पता नहीं चला कि उसमें क्या-क्या ख़राबियाँ थीं या बहुत-सी चीज़ें थीं, जिनका इकट्ठा सौदा होना था, उनमें से अच्छी चीज़ें दिखा दीं, बुरी चीज़ें न दिखाईं। ख़रीदार ने समझा कि वे सारी चीजें ऐसी ही अच्छी होंगी। यह सब धोखे की विभिन्न क़िस्में हैं जिससे कारोबार और व्यापार नाजायज़ हो जाता है।

इसके विपरीत अगर कारोबार और व्यापार सच और नेकी की बुनियाद पर हो तो वहाँ अल्लाह तआला की बरकत उतरती है। शैख़ैन यानी इमाम बुख़ारी और इमाम मुस्लिम दोनों ने इस हदीस को बयान किया है कि जब दो कारोबार करनेवाले सच बोलते हैं और एक-दूसरे के साथ ख़ैर-ख़ाही करते हैं तो उनके उस मामले में बरकत उतरती है। और अगर वह कोई चीज़ छिपाएँ और झूठ बोलें तो उनके इस कारोबार से बरकत छीन ली जाती है। एक और हदीस में जो हज़रत इमाम अबू-दाऊद ने उल्लेख की है (हज़रत इमाम अबू-दाऊद का सम्बन्ध हमारे प्रांत बलूचिस्तान से था) अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि जब तक दोनों कारोबारी शरीक एक-दूसरे के साथ धोखा नहीं करते, ख़ियानत (बेईमानी) नहीं करते तो अल्लाह तआला की दया एवं कृपा उनके ऊपर रहती है। और ज्यों ही वह बेईमानी करते हैं, अल्लाह तआला अपनी दया एवं कृपा का हाथ उनके ऊपर से हटा लेता है।

ख़ियानत (बेईमानी) में जो-जो चीज़ें शामिल हैं उनमें सबसे नुमायाँ नाप-तौल में कमी-बेशी का मामला है। नाप-तौल में कमी-बेशी पवित्र क़ुरआन की नज़र में अत्यन्त अप्रिय बात है। पवित्र क़ुरआन ने इन व्यापारियों को तबाही की धमकी दी है जिनके लेने के पैमाने और होते हैं, देने के पैमाने और होते हैं। पैमाना यकसाँ हो, नाप तौल में पूर्ण रूप से हक़ और इंसाफ़ से काम लिया जाए, बल्कि थोड़ा-सा झुकता हुआ तौलकर बेचे तो अल्लाह तआला की तरफ़ से उसमें बरकत होती है। जो व्यक्ति क़ीमत लगा रहा है अगर वह वास्तविक ख़रीदार है और नेक नीयती से क़ीमत लगा रहा है तो दुरुस्त है। वर्ना अगर वह इसलिए क़ीमत लगा रहा है कि दूसरा ख़रीदार हौसला हार जाए या अस्ल क़ीमत पर ख़रीदने से बाज़ रहे तो यह शरीअत की नज़र में अप्रिय है।

सहाबा किराम, ताबिईन, तबा-ताबिईन, और बाद के दौर में ऐसी सैंकड़ों और हज़ारों घटनाएँ दीनदार व्यापारियों की मौजूद हैं जिन्होंने मामूली-सी असावधानी के ख़तरे की वजह से अपने पूरे-पूरे कारोबार सदक़ा कर दिए और ज़र्रा बराबर शक अपने किसी कारोबार में क़बूल नहीं किया।

जहाँ शरीअत ने यह निर्देश दिए हैं वहाँ इससे भी रोका है कि लेन-देन करनेवाले अपने ज़रा-ज़रा से हक़ के लिए आपस में उलझें और एक-दूसरे के साथ कटु वचन बोलने और सम्बन्ध ख़राब करनेवाला रवैया अपनाएँ, यह शरीअत की नज़र में पसंदीदा नहीं है। एक मशहूर हदीस में जो सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम दोनों किताबों में आई है, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि “तुममें बेहतरीन वह है जो अपने ज़िम्मे वाजिबात (देय राशि या वस्तुओं) को बेहतरीन तरीक़े से अदा करता है।” समय पर अदा करता है, पूरे तौर पर अदा करता है, अख़लाक़ और किरदार के साथ अदा करता है, वह बेहतरीन व्यक्ति है। एक और जगह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि “अल्लाह तआला उस व्यक्ति पर रहम करता है जो क्रय-विक्रय में भी आसानी का रवैया अपनाता है और बेचने में भी आसानी का रवैया अपनाता है।” न कोई चीज़ बेचते वक़्त झिक-झिक करता है, न ख़रीदते वक़्त बक-बक का रवैया अपनाता है। इसके विपरीत नरमी और आसानी उसके स्वभाव का हिस्सा होती है।

नर्मी और आसानी का रवैया अपनाना और दूसरे इंसानों के साथ मामले में आसानी-पसंद होना, यह अल्लाह को पसंद है। अगर किसी व्यक्ति से ग़लती से कोई ऐसा लेन-देन हो गया जो उसके हित या निहितार्थ के ख़िलाफ़ था और बाद में वह उसपर पछताता है और उसको समाप्त करना चाहता है तो शरीअत का निर्देश यह है कि तुम उसको समाप्त करने में सहायता करो। एक हदीस में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि “अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति के मामले को समाप्त करने में सहायता दे जो अपने मामले पर पछता रहा हो तो अल्लाह तआला क़ियामत के दिन उसकी बहुत-सी ग़लतियाँ समाप्त कर देंगे। बहुत-से ऐसे अपराध और मामले हैं जहाँ उससे ग़लती हुई थी और वहाँ उससे पूछ-गछ होनी चाहिए थी, इस नेकी के बदले में अल्लाह-तआला उससे पूछ-गछ समाप्त कर देगा।

यही वजह है कि इस्लामी विद्वानों ने यह लिखा था कि व्यापार इंसानों की कसौटी है। इंसान की दीनदारी, तक़्वा और परहेज़गारी का इम्तिहान लेन-देन और व्यापार में ही होता है। कभी-कभी एक व्यक्ति पूरी ज़िन्दगी दीनदारी का रवैया ज़ाहिर करता रहता है। नमाज़ें, रोज़े, इबादतें और तमाम मज़हबी गतिविधियों की पूरी पाबंदी करता है। ये सब काम उसके ठीक रहते हैं। लेकिन उसको कभी भी किसी से लेन-देन का इत्तिफ़ाक़ नहीं होता। जब लेन-देन का इत्तिफ़ाक़ पहली बार हो जाए तो पता चलता है कि वह कितना पैसे का पुजारी इंसान है। ज़रा-ज़रा सी चीज़ पर किस हद तक लड़ने-झगड़ने के लिए तैयार है। मामूली-मामूली बात पर गाली-गलौज पर उतर आता है। यों तक़्वा और परहेज़गारी का सारा मुलम्मा मिनटों में उतर जाता है। सच तो यह है कि वास्तविक तक़्वा का अस्ल प्रदर्शन कारोबार और लेन-देन में ही होता है, जहाँ पैसे-कौड़ी का मामला हो।

यह ज़रा ग़ौर करने की बात है। इससे पता चलता है कि धन-दौलत की मुहब्बत में इंसान चूँकि बहुत सख़्त है उसके लिए अस्ल इम्तिहान उसकी दीनदारी और तक़्वा का वहाँ होता है जहाँ धन-दौलत हाथ से जा रहा हो। धन-दौलत भी हाथ से न जाए, दीनदारी भी बरक़रार रहे, तक़्वा भी प्राप्त हो और सांसारिक धन-दौलत भी प्राप्त हो, इसलिए सबसे पहले ज़रूरी है कि इंसान की नीयत और अक़ीदा पाकीज़ा हो। नीयत भी साफ़ हो और अक़ीदा भी साफ़ हो।

इंसान के लिए बेहतर यह है कि वह पेशा अपनाए जिसका सम्बन्ध फ़राइज़े-किफ़ाया (वे कर्तव्य जो यदि कुछ लोग भी निभा दें तो भी काफ़ी हो, परन्तु यदि अगर कोई न निभाए तो सब गुनहगार हों) से हो, ताकि वह मुस्लिम समाज की तरफ़ से फ़र्ज़े-किफ़ाया को अंजाम देने का सौभाग्य भी प्राप्त कर सके। जब दुनिया के बाज़ार में बैठे तो आख़िरत के व्यापार से ग़ाफ़िल न हो। दुनिया के बाज़ार को आख़िरत के व्यापार का ज़रिया और साधन समझकर बैठे। जब व्यापार की गतिविधि में हो तो दीनी (धार्मिक) ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल न हो। “ये वे लोग हैं जिनको कोई व्यापार और क्रय-विक्रय अल्लाह के ज़िक्र और नमाज़ क़ायम करने से ग़ाफ़िल नहीं करता।” (क़ुरआन, 24:37)

एक तक़वावाले व्यापारी के लिए केवल हराम मामलों से बचने को सब कुछ समझना काफ़ी नहीं है, बल्कि एक मुत्तक़ी व्यापारी को सन्देहों से भी बचना चाहिए। जो मामले स्पष्ट रूप से हराम हैं उनसे तो बचना ही चाहिए, लेकिन तक़्वा का तक़ाज़ा यह है कि जहाँ शक-सन्देह हो, इंसान को उससे भी परहेज़ करना चाहिए। मामले और व्यापार में ज़्यादा लोभ और लालच का रवैया नहीं अपनाना चाहिए। इसलिए कि लालच और लोभ का रवैया अगर एक बार पैदा हो जाए तो फिर वह कम नहीं होता, बल्कि बढ़ता रहता है। और इस तरह बढ़ता है कि इंसान को एहसास भी नहीं होता कि उसमें लालच पैदा हो गया है और बढ़ रहा है। इसलिए पहले ही क़दम पर लोभ और लालच की भावनाओं को समाप्त कर देना चाहिए।

आख़िरी बात यह कि हर व्यापार करनेवाले को अपने ग्राहकों से या अपनी सम्बन्धित पार्टियों से या पक्षों से मामला ख़ूब खोल-खोलकर साफ़ करना चाहिए। मामले की सफ़ाई शरीअत के मूल आदेशों में से है। क़ियामत के दिन हर मामले का अलग-अलग हिसाब देना होगा। इसलिए वहाँ के हिसाब से बचने के लिए ज़रूरी है कि यहीं मामले साफ़ कर लिए जाएँ और हर व्यक्ति का दिल पहले ही साफ़ हो।

व्यापार और अर्थव्यवस्था का महत्व शरीअत की नज़र में कई पहलुओं से है। एक जगह इमाम ग़ज़ाली ने लिखा है कि अगर उद्योग और व्यापार को लोग छोड़ दें तो लोगों की रोज़ी तबाह हो जाएगी और अल्लाह की सृष्टि का अधिकतर भाग मारा जाएगा। इन तमाम मामलों का दारोमदार इंसानों के आपसी सहयोग और परस्पर निर्भरता पर है। हर गिरोह दूसरे गिरोह की आवश्यकताओं का प्रबन्ध कर रहा होगा तो फिर मामले दुरुस्त रहेंगे।

इसके लिए ज़रूरी है कि समाज या राज्य के विभिन्न वर्ग विभिन्न पेशे और विभिन्न उद्योग अलग-अलग अपनाएँ। अगर सब लोग किसी एक उद्योग को अपना लेंगे तो बाक़ी उद्योग तबाह हो जाएँगे और सब लोग तबाही और बर्बादी का निशाना बनेंगे। अगर सब लोग कोई एक पेशा अपना लेंगे और बाक़ी पेशे छोड़ दें तो मामले गड़बड़ हो जाएँगे। इसलिए इन तमाम उद्योगों को और उन तमाम कारोबारों और पेशों को अपनाना चाहिए जिनकी समाज को ज़रूरत है और जिनपर मानव समाज का, मानव विकास का दारोमदार है।

मानव विकास का दारोमदार या इंसान के स्थायित्व का दारोमदार जिन मामलों पर है उनमें मशहूर मालिकी फ़क़ीह और क़ुरआन के टीकाकार अल्लामा इब्ने-अरबी के कथनानुसार अक़्दे-निकाह और अक़्दे-बैअ (व्यापारिक अनुबन्ध) दो बुनियादी महत्व रखनेवाले मामले हैं। इसलिए कि वे यह कहते हैं— “दुनिया की पूरी ज़िन्दगी का दारोमदार इन दोनों पर है।” अक़्दे-बैअ भोजन और जीवन की आवश्यकताओं के लिए ज़रूरी है और अक़्दे-निकाह मानवजाति को चलाने के लिए ज़रूरी है। इसलिए शरीअत ने इन दोनों के बहुत विस्तृत आदेश बताए हैं। यही वजह है कि इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने ‘फ़िक़्हुल-इबादात’ और ‘फ़िक़्हुल-मनाकिहात’ यानी व्यक्तिगत जीवन के आदेश और नियमों के बाद सबसे महत्वपूर्ण दर्जा ‘फ़िक़्हुल-मुआमलात’ का क़रार दिया है। मामलात (व्यवहार) ही की बुनियाद पर तमाम व्यापार, तमाम लेन-देन, तमाम आर्थिक गतिविधियाँ और इंसान के पूरे आर्थिक जीवन का दारोमदार है।

इस पूरी ज़िन्दगी के आदेश इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने इस्लामी फ़िक़्ह के जिस अध्याय और जिस विभाग में संकलित किए हैं वह ‘फ़िक़्हुल-मुआमलात’ कहलाता है। इसलिए ‘इबादात’ (पूजा पद्धति) और ‘मनाकिहात’ (विवाह एवं दाम्पत्य जीवन) के बाद फ़िक़्ह इस्लामी का अत्यन्त महत्वपूर्ण और अपरिहार्य हिस्सा ‘फ़िक़्हुल-मुआमलात’ का है। ‘फ़िक़्हुल-मुआमलात’ में मात्र कारोबार और व्यापार ही के आदेश नहीं हैं, बल्कि उनका एक आध्यात्मिक पहलू भी है जिनमें कुछ की तरफ़ इशारा किया जा चुका है। इमाम मुहम्मद-बिन-हसन शैबानी जो फ़िक़्ह हनफ़ी के पहले संकलनकर्ता हैं, उनसे किसी ने कहा कि आपने ‘ज़ुह्द’ पर कोई किताब नहीं लिखी। उस ज़माने में, यानी दूसरी तीसरी सदी हिजरी में मुहद्दिसीन ‘ज़ुह्द’ (आत्म संयम) और ‘रिक़ाक’ (नर्म स्वभाव) के विषयों पर बहुत अधिक किताबें लिखा करते थे। यानी उन हदीसों के संग्रह या उन निर्देशों के संग्रह जो इंसान के दिल में दुनिया से बेनियाज़ी (निस्पृहता) पैदा करें, अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण भाव पैदा करें, दिल में नर्मी पैदा करें और अल्लाह से सम्बन्ध को मज़बूत बनाएँ। इमाम मुहम्मद से पूछा गया कि आपने इस विषय पर कोई किताब नहीं लिखी? इमाम मुहम्मद ने जवाब दिया मैंने ‘किताबुल-बुयूअ’ लिख दी है। यानी जब ‘किताबुल-बुयूअ’ में बयान किए गए हलाल और हराम के आदेशों पर इंसान लगातार अमल करेगा तो अवश्य ही दीनदारी पैदा होगी। जब दीनदारी पैदा होगे तो हलाल और हराम की तमीज़ पैदा होगी, जहाँ हराम से बचने की भावना पैदा होगी वहीं संदिग्ध चीज़ों से बचने की भावना भी पैदा होगी। इसलिए ‘ज़ुह्द’ ख़ुद-ब-ख़ुद पैदा हो जाएगा। और अगर कोई व्यक्ति हलाल और हराम से सम्बन्धित आदेशों का उल्लंघन करेगा, तो उसके ज़ुह्द और इस्तिग़ना (निस्पृहता) के सारे दावे रखे रह जाएँगे। इसलिए हलाल रोज़ी का गहरा सम्बन्ध सच बोलने से है। और सच बोलने और हलाल रोज़ी दोनों का गहरा सम्बन्ध ज़ुह्द और इस्तिग़ना से है।

इस चर्चा का सार यह है कि व्यापार और कारोबार के मामले जो बज़ाहिर केवल भौतिक और सांसारिक हैं, वे अस्ल में मात्र भौतिक और सांसारिक नहीं हैं, बल्कि वे अपने अंदर एक गहरा आध्यात्मिक तथा नैतिक पहलू भी रखते हैं। बशर्तेकि उनको शरीअत के आदेशों के अनुसार अंजाम दिया जाए।

Facebook: HindiIslamPage  

X:  HindiIslam1

LEAVE A REPLY

Recent posts

  • इस्लाम में धन-सम्पत्ति एवं स्वामित्व के आदेश (लेक्चर-5)

    इस्लाम में धन-सम्पत्ति एवं स्वामित्व के आदेश (लेक्चर-5)

    06 January 2026
  • अर्थव्यवस्था तथा व्यापार में राज्य की भूमिका (लैक्चर-4)

    अर्थव्यवस्था तथा व्यापार में राज्य की भूमिका (लैक्चर-4)

    23 December 2025
  • आधुनिक काल की मुख्य वित्तीय एवं आर्थिक समस्याएँ : एक अवलोकन (लैक्चर-3)

    आधुनिक काल की मुख्य वित्तीय एवं आर्थिक समस्याएँ : एक अवलोकन (लैक्चर-3)

    18 December 2025
  • इस्लाम की वित्तीय एवं आर्थिक व्यवस्था मूल-अवधारणाएँ, महत्वपूर्ण विशेषताएँ तथा लक्ष्य (लैक्चर -2)

    इस्लाम की वित्तीय एवं आर्थिक व्यवस्था मूल-अवधारणाएँ, महत्वपूर्ण विशेषताएँ तथा लक्ष्य (लैक्चर -2)

    16 December 2025
  • वित्त और अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धांत पवित्र कुरआन और पैगंबर हजरत मोहम्मद (स0) की सुन्नत (शिक्षाओं एवं निर्देशों) की रोशनी में! (लैक्चर -1)

    वित्त और अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धांत पवित्र कुरआन और पैगंबर हजरत मोहम्मद (स0) की सुन्नत (शिक्षाओं एवं निर्देशों) की रोशनी में! (लैक्चर -1)

    10 December 2025
  • इन्सान की आर्थिक समस्या और उसका इस्लामी हल

    इन्सान की आर्थिक समस्या और उसका इस्लामी हल

    23 May 2022