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इस्लामी अर्थव्यवस्था का भविष्य (लेक्चर नम्बर-12)

इस्लामी अर्थव्यवस्था का भविष्य (लेक्चर नम्बर-12)

डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी 

अनुवादक: गुलज़ार सहराई 

(मरहूम डॉक्टर महमूद ग़ाज़ी के ये लेक्चर उनकी उर्दू किताब ‘मुहाज़िरात-ए-मईशत व तिजारत’ का हिन्दी अनुवाद है। ये कुल 12 लेक्चर हैं, जो उन्होंने अपने क़याम दोहा, क़तर में सन् 2009 में दिए थे।)

आज की चर्चा का शीर्षक है ‘इस्लामी अर्थव्यवस्था का भविष्य’। इस सिलसिले की इस आख़िरी चर्चा में कुछ बातें इस विषय पर पेश करना अभीष्ट है कि अगर किसी मुस्लिम देश में आज के माहौल और आज के सन्दर्भ में इस्लाम की आर्थिक शिक्षाओं को पूरी तरह लागू किया जाए तो इसका व्यावहारिक रूप क्या होगा। इसके नतीजे में जो समस्याएँ पैदा होंगी वे किस प्रकार की होंगी और उन समस्याओं को हल करने के लिए क्या-क्या काम किए जाने चाहिएँ?

यह काम जो इस्लामी अर्थव्यवस्था को लागू करने के लिए किए जाने चाहिएँ उनको दो बड़े शीर्षकों के तहत बाँटा जा सकता है। उनमें से एक शीर्षक के बारे में संक्षिप्त रूप से इशारा करूँगा, जबकि दूसरे शीर्षक पर ज़रा विस्तार से अपनी बातें पेश करूँगा।

पहला शीर्षक वे प्रशासनिक उपाय और प्रयोगसिद्ध मामले हैं जिनका सम्बन्ध किसी भी देश में आर्थिक विकास और आर्थिक विकास के प्रशासनिक और रणनीतिक मामलों से है। आर्थिक विकास और आर्थिक मामलों का एक बहुत बड़ा पहलू वह है जिसका सम्बन्ध केवल इंसानी अनुभव से है। आधुनिक काल के बहुत-से सकारात्मक पहलुओं में से एक पहलू यह भी है कि इस दौर में विशुद्ध आर्थिक विकास और आर्थिक सम्पन्नता के मामलों पर गहरे बौद्धिक ढंग से विचार हुआ है। विभिन्न समस्याओं को विचार-विमर्श तथा शोध का विषय बनाया गया है और हज़ारों, बल्कि लाखों इंसानों ने लम्बे चिन्तन-मनन और क़ौमों के अनुभवों के अध्ययन के बाद अर्थव्यवस्था की कला को इस ढंग से संकलित कर दिया है कि आज उससे लाभ उठाना आम इंसानों के लिए बहुत आसान हो गया है।

इसलिए सबसे पहली बात यह याद रखनी चाहिए कि जिन मामलात में शरीअत ने इंसानों को आज़ाद छोड़ा है, जिन मामलों के बारे में इंसान अपने अनुभव और अवलोकन से ख़ुद सही परिणाम तक पहुँच सकता है वहाँ दूसरे इंसानों के अनुभवों से फ़ायदा उठाना अपरिहार्य है। इस्लामी शरीअत का मूल सिद्धान्त और कार्यरत धारणा जिससे हर मुसलमान परिचित है, वह यह है कि तत्वदर्शिता और बुद्धिमानी की बात मुसलमान की गुमशुदा पूँजी है, जहाँ भी मिले मुसलमान को चाहिए कि इसको प्राप्त कर ले। इसलिए आर्थिक अनुभवों के मामले में आधुनिक काल के तमाम प्राचीन एवं आधुनिक और पूर्वी और पश्चिमी अनुभवों से भरपूर फ़ायदा उठाया जाना चाहिए।

इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने इस बात को एक ख़ालिस क़ानूनी सिद्धान्त की भाषा में बयान किया है कि “अल-अस्ल फ़िल-मुआमलातिल-मुबाह” यानी “मामलात में अस्ल यह है कि वे जायज़ हैं, सिवाय यह कि शरीअत ने किसी मामले को स्पष्ट रूप से या सैद्धान्तिक रूप से नाजायज़ क़रार दिया हो। इसलिए मामलात की जितनी शक्लें आजकल प्रचलित हैं उन सबसे पूरा-पूरा लाभ उठाया जाना चाहिए। इस कार्य में जहाँ-जहाँ कोई चीज़ शरीअत से टकराती नज़र आए वहाँ इस टकराव को दूर कर देना चाहिए और इस अनुभव से पूरा फ़ायदा उठाना चाहिए।

दूसरा शीर्षक जिसपर ज़रा विस्तार से चर्चा करना अभीष्ट है वह यह है कि इस्लामी अर्थव्यवस्था के नाम से जो कला पिछले सौ साल के अर्से में वुजूद में आई है अभी इस कला या इस ज्ञान को और विकास और व्यापकता देने की ज़रूरत है। यह व्यापकता और विकास एक दृष्टि से तो ख़ुद-ब-ख़ुद हो रहा है। जैसे-जैसे इस्लामी अर्थव्यवस्था के प्रयोग हो रहे हैं उसी गति से यह कला भी फैल रही है। इस्लामी बैंकिंग का काम जितना विस्तृत होता जा रहा है इस्लामी बैंकिंग पर लिटरेचर भी उसी गति और व्यापकता से सामने आ रहा है। इस्लामी ‘तकाफ़ुल’ की जितनी संस्थाएँ बन रही हैं इसी हिसाब से ‘तकाफ़ुल’ और बीमाकारी की इस्लामी धारणाओं पर शोध भी हो रहा है।

इस स्वचालित ज्ञानपरक प्रयास के साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि कुछ विद्वान अपने को इसके लिए समर्पित करें और कुछ शोधपरक संस्थाएँ और शिक्षण केन्द्र इसका प्रबन्ध करें कि इस्लामी अर्थव्यवस्था के इन पहलुओं को भी विशेष ध्यान एवं शोध का विषय क़रार दिया जाए, जिनकी फ़िल्हाल बाज़ार में या व्यापार में माँग नहीं है। जिस चीज़ की माँग हो उसकी सप्लाई का रास्ता तो ख़ुद-ब-ख़ुद पैदा हो जाता है। लेकिन बहुत-से मामले ऐसे हैं कि अभी उनकी व्यावहारिक माँग नहीं है, लेकिन वैचारिक और व्यावहारिक दृष्टि से मुसलमानों को इस बात की ज़रूरत है कि ऐसे मामलात पर भी शरीअत की राय, इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के शोध और इस्लाम के बड़े विद्वानों के इज्तिहादात (रायों) को आज की भाषा में, अर्थव्यवस्था की शैली और अर्थशास्त्र की शब्दावलियों में बयान किया जाए। इस्लामी अर्थव्यवस्था को जब भी उसके कलात्मक रूप में संकलित किया जाएगा तो उसमें इन गुणों और विशेषताओं को सामने रखना और नुमायाँ करना पड़ेगा जो इस्लामी अर्थव्यवस्था को दूसरी आर्थिक व्यवस्थाओं से प्रथक करती हैं। अगर नई संकलित इस्लामी अर्थव्यवस्था में वे गुण नहीं पाए जाते और इसके वे परिणाम नहीं निकल रहे जिनमें से कुछ का ज़िक्र इन बातों में आ चुका है और कुछ का मैं इस चर्चा के आख़िर में ज़िक्र करूँगा तो उसका अर्थ यह है कि इस्लामी अर्थव्यवस्था का संकलन या उसका लागू किया जाना सही तरीक़े से नहीं हो रहा। इस्लामी अर्थव्यवस्था के संकलन और उसे लागू करने के लिए जहाँ आजकल के अनुभवों से फ़ायदा उठाना ज़रूरी है वहाँ इन वैचारिक मापदंडों, सांस्कृतिक प्रतीकों और सामुदायिक पहचानों से जुड़े रहना भी अपरिहार्य है जिनकी सीमाएँ पवित्र क़ुरआन, सुन्नते-रसूल, और इस्लाम के बड़े विद्वानों के इज्तिहादात और फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) की रायों ने बनाई हैं।

इस्लामी अर्थव्यवस्था की इन विशेषताओं में कुछ बातें अत्यन्त महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय हैं। सबसे पहली बात यह है कि यह बुनियादी तौर पर एक दीनी और मज़हबी व्यवस्था है। यह एक ईश्वरीय वैचारिक शैली है जिसकी उठान विशुद्ध नैतिक नियमों और आध्यात्मिक सिद्धान्तों के आधार पर होती है। अतः पहले क़दम पर यह बात साफ़ कर देनी चाहिए कि यह वह अर्थव्यवस्था है जो नैतिकता से असम्बद्ध नहीं है, जो मज़हबी ज़िंदगी के बारे में लापरवाह नहीं है, जो समाज के नैतिक तक़ाज़ों और आवश्यकताओं के प्रति बेपरवाह नहीं है। बल्कि जिसका गहरा आधार विशुद्ध दीनी धारणाओं और आध्यात्मिक मूल्यों पर है। यह व्यवस्था एक पल के लिए भी अपनी विशुद्ध दीनी धारणाओं और मज़हबी आधार से अलग नहीं हो सकती। अगर किसी चरण पर कोई चीज़ दीनी मूल्यों और नैतिक उत्प्रेरकों से अलग हो रही है तो वह पुनरावलोकन की मुहताज है। वहाँ इस सम्बन्ध को दोबारा बहाल करने की ज़रूरत है जो कमज़ोर पड़ता नज़र आ रहा है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस्लामी अर्थव्यवस्था एक विस्तृत, व्यापक और भरपूर व्यवस्था का एक भाग है। अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन इस्लाम के अनुसार ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं से अलग और अपने-आपमें कोई चीज़ नहीं है, बल्कि उसका सम्बन्ध इस्लाम की जीवन के प्रति इस धारणा से है जिसको कुछ आधुनिक इस्लामी चिन्तकों ने पूर्ण जीवन व्यवस्था की बौद्धिक और सारगर्भित शब्दावली से याद किया है। अतः इस्लामी अर्थव्यवस्था के नियमों को जब भी संकलित किया जाएगा तो इस ढंग से संकलित किया जाएगा कि जहाँ वह अर्थव्यवस्था के तक़ाज़े और आवश्यकताओं को पूरा करें, वहाँ वे मुसलमानों की ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं के बारे में इस तरह उदासीन न हों जिस तरह सेक्युलर अर्थव्यवस्था उदासीन होती है। इस अर्थव्यवस्था का सम्बन्ध इस्लामी सामाजिक जीवन से भी होगा। इसका सम्बन्ध मुसलमानों के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों से भी होगा। इसका सम्बन्ध मुसलमानों की राजनीति, मुसलमानों की दीनियात (धार्मिक मामलों), मुसलमानों की ख़ालिस मज़हबी ज़िंदगी से भी होगा।

मुसलमानों की ख़ालिस मज़हबी ज़िंदगी में कई आदेश ऐसे हैं जिनका गहरा प्रभाव मुस्लिम समाज पर पड़ता है। कफ़्फ़ारात, ज़कात, सदक़ाते-वाजिबा वग़ैरा जैसे आदेश इसकी मिसाल हैं। इन सबके स्पष्ट और नुमायाँ आर्थिक परिणाम निकलते हैं। वक़्फ़ एक तरफ़ इबादत है, दूसरी तरफ़ एक सामाजिक और आर्थिक संस्था भी है। यहाँ तक कि इस्लामी क़ानूनों में कुछ ऐसे आदेश भी पाए जाते हैं कि उनपर अमल करने के नतीजे में विशुद्ध फ़ौजदारी मामलात के भी जहाँ आर्थिक प्रभाव निकलते हैं, वहाँ उनके मज़हबी पहलू भी हैं। चुनाँचे दीयत, क़त्ले-अम्द (जान-बूझकर क़त्ल करना) का कफ़्फ़ारा वग़ैरा अगरचे विशुद्ध फ़ौजदारी मामलात हैं, लेकिन कफ़्फ़ारा जब अदा किया जाएगा तो ज़ाहिर है कि ग़रीबों को अदा किया जाएगा। इसके नियम-क़ायदे होंगे, उन नियमों का गहरा सम्बन्ध इस्लाम के फ़ौजदारी क़ानून से भी होगा। इस्लाम की इबादात के आदेशों से भी होगा और उन आदेशों का आर्थिक पहलू भी होगा। इसलिए इस्लामी अर्थव्यवस्था को इन तमाम मामलात को सामने रखना पड़ेगा।

इससे इस्लामी अर्थव्यवस्था की प्रभाव डालनेवाली विशेषताएँ भी सामने आती हैं और वह यह कि यह एक सन्तुलित अर्थव्यवस्था है, जिसके तमाम पहलू एक-दूसरे से पूरे तौर पर मेल खाते हैं और यह कुल मिलाकर इंसानी ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं से मेल खाती भी है। इस्लामी अर्थव्यवस्था में किसी सवाल का कोई ऐसा जवाब नहीं दिया जा सकता जो इस्लाम की दीनी शिक्षाओं से मेल न खाता हो, जो इस्लामी सामाजिकता के तक़ाज़ों से टकराता हो, जो इस्लाम की संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों से टकराव रखता हो। इसलिए यह अर्थव्यवस्था ख़ुद अपने-आपमें भी सन्तुलित और परिपूर्ण है और ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं से भी पूरी तरह मेल खाती और उनके तक़ाज़े पूरे करती है।

चौथी विशेषता यह है कि यह अर्थव्यवस्था जीवन के प्रति एक सोच पर आधारित है। एक नज़रिए पर आधारित है। यह इस तरह की स्वयं पैदा हो जानेवाली व्यवस्था नहीं है जिस तरह की व्यवस्थाएँ पश्चिम में पैदा हुई हैं, जिनके उत्प्रेरक मात्र सामयिक आर्थिक हित हों। यहाँ ऐसा नहीं हुआ कि किसी इलाक़े में सामयिक आर्थिक हितों की प्राप्ति के लिए विभिन्न कार्य किए जा रहे हों जो कई सौ साल के अनुभवों के बाद आगे चलकर एक व्यवस्था का रूप धारण कर लें। यहाँ यह कैफ़ियत नहीं है। यहाँ पहले दिन से ही एक मूल विचारधारा सामने है जिसके आधार पर कुछ नियम और मूल सिद्धान्त वुजूद में आते हैं। इन सिद्धान्तों की रौशनी में ज़िंदगी के सारे पहलू संकलित हो रहे हैं, जिनमें से अर्थव्यवस्था भी है। इसलिए यह एक नैतिक आर्थिक व्यवस्था भी है। आज नैतिकता और आर्थिकता का रिश्ता पश्चिम ने समाप्त कर दिया है। समाप्त नहीं किया तो कमज़ोर तो यक़ीनन कर दिया है, और इस कमज़ोरी के बहुत-से नकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। आज उन परिणामों का एहसास भी कुछ संवेदनशील पश्चिमवालों को हो रहा है और ऐसी आवाज़ें उठने लगी हैं, जो समय-समय पर पश्चिम में सुनने में आती हैं। ऐसे लेख प्रकाशित होने लगे हैं जिनमें नैतिकता की दुहाई सुनाई देती है। आज दो सौ, तीन सौ साल के अनुभव के बाद पश्चिम जिस चीज़ की दुहाई दे रहा है वह पहले दिन से इस्लाम में मौजूद है।

अतः इस्लामी शरीअत की यह पाँचवीं विशेषता भुलानी नहीं चाहिए कि यह एक नैतिक व्यवस्था है, जिसकी बुनियाद नैतिक धारणाओं पर है। फिर यह कोई ख़ालिस भौतिक धारणाओं और सांसारिक हितों पर आधारित व्यवस्था नहीं है, बल्कि जैसा कि अभी मैंने बताया, इसमें एक महत्वपूर्ण पहलू इबादात का भी पाया जाता है। इस्लाम में इबादतें और अर्थव्यवस्था दोनों एक-दूसरे से गहरे तौर पर जुड़े हैं। यह बात इस चर्चा में कई बार आई है कि जायज़ रोज़ी की प्राप्ति इबादत से कम नहीं है। पवित्र क़ुरआन में जगह-जगह इस बात को बयान किया गया है। प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के हवाले से कई बार इस बात को बयान कर चुका हूँ कि इबादत और व्यापार, इबादत और अर्थव्यवस्था, इबादत और उद्योग, इबादत और खेती के दरमियान एक गहरा सम्बन्ध पाया जाता है। अगर आर्थिक सरगर्मी अल्लाह की शरीअत के अनुसार जायज़ रोज़ी की प्राप्ति के लिए की जाए और उद्देश्य यह हो कि इस दुनिया में दीनी ज़िम्मेदारियों को अदा करने के लिए जिन भौतिक संसाधनों की ज़रूरत है वे पैदा करना अभीष्ट है तो फिर सारी आर्थिक सरगर्मी इबादत क़रार पा जाती है। इस मूल तत्व को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

इस्लामी अर्थव्यवस्था में इबादत की आत्मा बनी रहनी चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं है कि इस्लाम की अर्थव्यवस्था कोई काल्पनिक या विशुद्ध आदर्श यूटोपिया प्रकार की व्यवस्था है जिसका व्यावहारिक जीवन से कोई सम्बन्ध न हो। इसके विपरीत इस्लाम की आर्थिक व्यवस्था एक विशुद्ध व्यावहारिक व्यवस्था है। पिछली ग्यारह चर्चाओं में आपने विभिन्न आदेशों के बारे में चर्चा सुनी और पढ़ी, इससे अंदाज़ा हो गया होगा कि इस्लाम की आर्थिक शिक्षा में कोई एक पहलू भी अव्यावहारिक या ख़ालिस वैचारिक और काल्पनिक प्रकार का नहीं है। हर आदेश व्यावहारिक और आदर्श पेश करनेवाला है। लेकिन वह एक ही समय में व्यावहारिक भी है। व्यावहारिकता और आदर्शवाद, दोनों के दरमियान सन्तुलन का नाम ही इस्लाम है।

इसके अलावा इस्लामी अर्थव्यवस्था एक विशुद्ध मानव-व्यवस्था है। इंसानों की आवश्यकताओं के लिए दी गई है। इंसानों की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की ख़ातिर ही ये आदेश बनाए गए हैं। इंसान बतौर इंसान इन आदेशों से लाभान्वित होता है। ये आदेश किसी एक नस्ल या दूसरी नस्ल के फ़ायदे के लिए नहीं दिए गए। इस व्यवस्था में इसकी गुंजाइश नहीं है कि किसी क़ौम के हित की ख़ातिर दूसरी क़ौम के हित को नुक़सान पहुँचाया जाए। किसी व्यक्ति के निहित हित की ख़ातिर दूसरे व्यक्ति के निहितार्थ को क़ुर्बान कर दिया जाए। ऐसा इसलिए है कि यह व्यवस्था वास्तविकतावादी व्यवस्था है। व्यावहारिक भी है और वास्तविकतावादी भी। दुनिया में जो कुछ हो रहा है, इंसानों के जिस-जिस तरह के स्वभाव हैं, इंसानों की जो-जो कमज़ोरियाँ हैं, उनका पूरा एहसास उस व्यवस्था को पहले दिन से है। पवित्र क़ुरआन में जगह-जगह इंसानों की कमज़ोरियाँ भी बताई गई हैं और इंसानों की ख़ूबियाँ भी बताई गई हैं। ये इसलिए बताई गई हैं कि यह जतला दिया जाए कि सृष्टि जिस रचयिता (अल्लाह) ने यह व्यवस्था दी है, पवित्र क़ुरआन का यह मार्गदर्शन प्रदान किया है, वे इंसानों की कमज़ोरियों से भी पूरे तौर पर परिचित हैं और ख़ूबियों से भी पूरे तौर पर परिचित हैं। इसलिए उसकी व्यवस्था में पूर्ण वास्तविकतावादी ढंग पाया जाता है।

इस वास्तविकतावाद के साथ-साथ इस्लाम में सबसे उच्च और श्रेष्ठतम उद्देश्य सामने रखे गए हैं। मुसलमानों के उद्देश्य हमेशा बुलंद और ऊँचे होने चाहिएँ। मुसलमान की निजी इच्छाएँ तो सीमित होनी चाहिएँ और हमेशा निष्ठावान इंसानों की निजी इच्छाएँ बहुत-सीमित रही हैं। लेकिन उनके क़ौमी उद्देश्य, क़ौमी लक्ष्य और सामूहिक धारणाएँ हमेशा बहुत बुलंद रही हैं। यही इस्लामी आर्थिक व्यवस्था की भी विशेषता है। जहाँ एक तरफ़ कोशिश की गई कि व्यक्ति को सन्तोष प्रवृत्ति का बनाया जाए, दूसरी तरफ़ ये आदेश भी दिए गए कि समाज और अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए जो कर सकते हो वह करो। अपने फ़ायदे के लिए नहीं, दूसरे के फ़ायदे के लिए हर वह काम जो तुम्हारे बस में हो उसको कर गुज़रो। यहाँ तक कि अगर वृक्ष का पौधा लगाने के लिए बैठे हो और क़ियामत का सूर फूँक दिया जाए तो पहले पौधे को लगाओ, ज़मीन में गाड़ दो, पानी दे दो, उसके बाद देखो कि सूर फूँका जा रहा है तो अब क्या करना है। इससे ज़्यादा वास्तविकतावाद और उद्देश्य की बुलंदी क्या होगी। ऐसा इसलिए है कि इस्लाम की व्यवस्था एक सन्तुलित व्यवस्था है। इसमें ज़िंदगी के तमाम पहलुओं के बीच पूरा सन्तुलन पाया जाता है। किसी एक पहलू को दूसरे पहलू पर अनावश्यक श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है। जिस पहलू को जितना महत्व मिलना चाहिए उतना ही महत्व शरीअत के अनुसार इस पहलू को दिया गया है।

इस्लाम की इस आर्थिक व्यवस्था के संकलन और इसे लागू करने की कुछ अनिवार्य शर्तें हैं। जब तक वे पूरी नहीं होंगी यह व्यवस्था वुजूद में नहीं आएगी। सबसे पहली शर्त वैचारिक स्वतंत्रता की है। जब तक मुसलमान क़ौम आम तौर से और मुसलमान क़ौमों के पेशवा ख़ास तौर से वैचारिक रूप से आज़ाद नहीं होंगे, पश्चिम की अनुचित वैचारिक ग़ुलामी और सांस्कृतिक प्रभाव से मुक्ति प्राप्त नहीं करेंगे उस वक़्त तक उनसे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह इस्लाम के आदेशों के आधार पर अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के लिए तैयार होंगे। इस वैचारिक स्वतंत्रता को प्राप्त करने और फिर बरक़रार रखने के लिए शिक्षा-व्यवस्था के पुनर्गठन की ज़रूरत है। जब तक शिक्षा-व्यवस्था का पुनर्गठन नहीं होगा, जब तक ऐसी व्यवस्था वुजूद में नहीं आएगी जिसमें आधार और बुनियाद की हैसियत इस्लाम के मूल्यों और शिक्षा को प्राप्त हो और तमाम सामाजिक और इंसानी ज्ञान-विज्ञान का पुनर्गठन इस ढंग से किया गया हो कि वह शरीअत के आदेशों के अनुसार उद्देश्यों को प्राप्त करने का ज़रिया बने उस वक़्त तक यह आज़ादी या तो प्राप्त नहीं हो सकती और अगर प्राप्त हो जाए तो बरक़रार नहीं रह सकती।

शिक्षा-व्यवस्था के पुनर्गठन के साथ-साथ इस्लामी अर्थव्यवस्था के लिए दरकार विशेषज्ञों की तैयारी अपरिहार्य है। विशेषज्ञों की तैयारी के लिए दीर्घकालिक योजना बनाना भी दरकार है जो शिक्षा-व्यवस्था के पुनर्गठन ही का एक भाग होगा। इसके साथ-साथ संक्षिप्त अवधि के ऐसे प्रोग्राम भी अपरिहार्य हैं जो तात्कालिक ज़रूरत की पूर्ति के लिए शुरू किए जाएँ। इन प्रोग्रामों में इस्लामी बैंकिंग के लिए लोग, ‘तकाफ़ुल’ की संस्थाओं को चलाने के लिए जनशक्ति, इस्लामी अर्थव्यवस्था की शिक्षा के लिए अर्थशास्त्रियों की तैयारी जैसे तुरन्त और महत्वपूर्ण उद्देश्यों की प्राप्ति सामने होगी, जो इस पूरी प्रक्रिया की कामयाबी की अपरिहार्य शर्त है। इन सब कामों के लिए संक्षिप्त अवधि के विभिन्न प्रोग्राम शुरू किए जाने चाहिएँ। उनमें यूनिवर्सिटियों और जामिआत को भी भाग लेना चाहिए और प्राइवेट दीनी शिक्षा की संस्थाओं को भी भरपूर नेतृत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी चाहिए। जब तक इन दोनों के दरमियान पूरा और भरपूर सहयोग और समरसता नहीं होगी यह उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस्लामी अर्थव्यवस्था और बैंकिंग को पूर्ण रूप से लागू करने की प्रक्रिया एक लम्बी प्रक्रिया है। इसकी पूर्ति में कितना वक़्त लगेगा यह अल्लाह बेहतर जानता है। लेकिन इस प्रक्रिया को विभिन्न दर्जों और चरणों से गुज़रना है।

सबसे पहला चरण जो आंशिक रूप से पूरा भी हो चुका है, लेकिन जिसका ख़ासा भाग अभी बाक़ी है वह यह है कि अर्थशास्त्रियों और व्यापारियों का समर्थन प्राप्त किया जाए कि वे इस्लाम के आर्थिक आदेशों पर क्रियान्वयन शुरू करें। यह बात मैं पहले भी बता चुका हूँ कि अगर आज पाकिस्तान के सारे व्यापारी और अर्थशास्त्री यह तय कर लें कि वे शरीअत के ख़िलाफ़ कोई काम नहीं करेंगे तो इस्लामी अर्थव्यवस्था और व्यापार का पहला चरण एक ही दिन में पूरा हो सकता है। इसलिए यह काम जितनी जल्दी किया जा सके उतना ही इस पहले चरण को तय करने में आसानी रहेगी।

पहले चरण में जो काम करने ज़रूरी हैं उनमें यह भी है कि प्रचलित मामलात और व्यापार के तरीक़ों के इस्लामी विकल्प पेश किए जाएँ। ज़रूरी नहीं कि हर चीज़ का इस्लामी विकल्प फ़ौरी तौर पर मौजूद हो। लेकिन उस जैसा रास्ता ज़रूर मौजूद हो सकता है। यानी अगर एक उद्देश्य जो जायज़ उद्देश्य है तो ला-मुहाला इस जायज़ उद्देश्य को प्राप्त करने का जायज़ तरीक़ा भी शरीअत की सीमाओं के अंदर उपलब्ध होना चाहिए। चाहे वह पूरे तौर पर वर्तमान तरीक़े के अनुसार न हो, पूरे तौर पर मिलता-जुलता न हो, लेकिन उसके क़रीब-क़रीब ज़रूर हो सकता है। इसलिए विकल्प सम्भव न हों तो उससे क़रीब के तरीक़े पेश किए जाने चाहिएँ।

राज्य की यह ज़िम्मेदारी है कि वह इन तमाम कोशिशों के दरमियान समरसता पैदा करे जो देश में इस्लामी अर्थव्यवस्था के सिलसिले में की जा रही हैं। स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान ऐसे बहुत-से काम कर रहा है। सिक्योरिटी और एक्सचेंज आयोग में कुछ काम हो रहा है। बहुत-से काम प्राइवेट संस्थाएँ कर रही हैं। लोग कर रहे हैं। शिक्षण संस्थाएँ कर रही हैं। इन सबके दरमियान समरसता नहीं है। और इस समरसता की ज़रूरत का एहसास भी बहुत-से लोगों को नहीं है। इसलिए अगर इन सारे प्रयासों के दरमियान समरसता पैदा हो जाए, सम्पर्क की शक्ल वुजूद में आ जाए तो उनके फल और परिणाम पहले से बहुत बढ़ सकते हैं। राज्य इस काम को उसी वक़्त कर सकता है जब राज्य के ज़िम्मेदारों के दीनी और वैचारिक पहलू में परिवर्तन आए।

अल्लामा इक़बाल ने एक जगह लिखा है कि भविष्य के गठन के लिए वैचारिक निर्माण ज़रूरी है और वैचारिक निर्माण के लिए विचारों का शुद्ध होना ज़रूरी है। अतः राज्य के ज़िम्मेदारों की वैचारिक शुद्धि और मानसिक शुद्धि तुरन्त दरकार है। ताकि जब एक बार यह शुद्धि हो जाए तो उसके बाद निर्माण आसानी से किया जा सकेगा। जिस ज़मीन में झाड़-झंकाड़ और ज़हरीले पौधे जगह पकड़े हुए हों वहाँ गुलो-गुलज़ार आसानी से आबाद नहीं किए जा सकते। वहाँ पहले ज़मीन की शुद्धि करनी पड़ती है और उन तमाम झाड़-झंकाड़ों को, ज़हरीले पौधों को खोदकर फेंक देना पड़ता है, निकालकर अलग कर देना पड़ता है जो वहाँ पहले से मौजूद हों। इसके बाद ही कहीं जाकर इस साफ़-सुथरी ज़मीन में नया बीज डाला जाता है। इस बीज के लिए खाद उपलब्ध होती है। इसकी परवरिश की जाती है। जब जाकर नए गुल और गुलज़ार पैदा होते हैं। यही नहीं, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा मुश्किल और मेहनत-तलब, बल्कि कड़ी मेहनततलब मामला विचारों और नज़रियों के निर्माण का भी है। यह काम उसी वक़्त हो सकता है जब इस्लामी अर्थव्यवस्था के हक़ में जनाधार पूरे तौर पर जागृत हो। इस वक़्त सच्चाई यह है कि हलाल और हराम के बारे में आम तौर पर वह समझ मौजूद नहीं है जो मुस्लिम समाज की विशेषता होनी चाहिए। यह काम जहाँ संचार माध्यम, पत्रकार और शिक्षण संस्थाओं का है, वहाँ यह काम प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों का भी है। बल्कि प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों की ज़िम्मेदारी इस बारे में बहुत ज़्यादा है कि वे अवाम में हलाल और हराम के बारे में उमूमी समझ पैदा करें और जिन चीज़ों को शरीअत ने हराम क़रार दिया है, ख़ास तौर पर ‘रिबा’, ‘क़िमार’ और ‘ग़रर’, उनकी ख़राबियों, बुराइयों को पूरे तौर पर बयान करें। जब तक हराम की गई चीज़ों की बुराई और ख़राबी अच्छी तरह ज़ेहन में बिठाई नहीं जाएगी, उस वक़्त तक उनसे बचने की इच्छा पैदा नहीं हो सकती।

यह बात कि कुछ लोग अपनी पूरी ज़िंदगी सरकारों से यह माँग करने में गुज़ार दें कि सरकार ‘रिबा’ और ‘क़िमार’ को निषिद्ध क़रार दे दे और ख़ुद ज़िंदगी में एक लम्हे के लिए भी ‘रिबा’ और ‘क़िमार’ से बचने की भावना पैदा न हो, यह इस्लामी रवैया नहीं है। इस्लामी रवैया यह है कि व्यक्ति ख़ुद ‘रिबा’ और ‘क़िमार’ और दूसरी हराम की हुई चीज़ों से जितना बच सकता है बचे और जहाँ इसलिए व्यक्तिगत रूप से बचना मुश्किल हो, वहाँ राज्य से आशा रखे कि राज्य अपना कर्तव्य पूरा करेगा। यह ऐसा ही है कि कोई व्यक्ति पूरी ज़िंदगी नमाज़ न पढ़े और उज़्र यह पेश करे कि राज्य ने नमाज़ क़ायम करने की व्यवस्था नहीं की थी, इसलिए मैं फ़र्ज़ नमाज़ नहीं पढ़ सका। कोई व्यक्ति पूरी ज़िंदगी अपने माल की ज़कात अदा न करे और उज़्र यह पेश करे कि राज्य ने ज़कात की व्यवस्था क़ायम नहीं की थी। जिस तरह यह उज़्र अस्वीकार्य है इसी तरह अर्थव्यवस्था के बहुत-से इस्लामी आदेशों पर क्रियान्वयन न करने का बहाना भी कमज़ोर बहाना और अस्वीकार्य है।

इस्लामी अर्थव्यवस्था और व्यापार के लागू करने का यह चरण अपरिहार्य है। इस पहले चरण से गुज़रे बिना दूसरे चरण में प्रवेश करना सम्भव नहीं है। न पहले चरण की अवधि का पूरी तरह निर्धारण सम्भव है और न दूसरे चरण का। विभिन्न मुस्लिम देशों में यह अवधि विभिन्न हो सकती है। हो सकता है कि एक देश में सरकार, व्यापारी, उद्योगपति, न्यायपालिका और प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान मिलकर इस अवधि को बहुत कम कर दें तो यह चरण बहुत थोड़ी अवधि में तय हो सकता है। लेकिन अगर सरकार के ज़िम्मेदार लोग, बैंकर, व्यापारी, उद्योगपति, प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान और न्यायपालिका दिलचस्पी न लें तो यह चरण बहुत लम्बा भी हो सकता है। इसलिए इन सबके दरमियान सहयोग और वैचारिक समरसता अपरिहार्य है। जब तक ये सब लोग इन उद्देश्यों के बारे में सर्वसहमति न रखते हों, यानी सरकार, बैंकर, व्यापारी, उद्योगपति, अर्थशास्त्री, प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान और क़ानून से जुड़े लोग जिनमें जज लोग और वकील दोनों शामिल हैं, उस वक़्त तक यह चरण मुकम्मल नहीं हो सकता।

इस चरण की अनिवार्य शर्त यह भी है कि जहाँ-जहाँ इस्लामी अर्थव्यवस्था का अध्ययन हो रहा है, वह किसी शिक्षण संस्था में हो रहा हो, किसी शोध के रूप में किया जा रहा हो, किसी लेक्चर और भाषण में हो रहा हो, वहाँ ज़रूरी है कि इसका अध्ययन एक ज़िंदा और सक्रिय व्यवस्था की हैसियत से किया जाए। किसी अतीत के अनुभव या किसी विरासत के तौर पर न किया जाए। अतीत की विरासत के तौर पर तो इस्लामी शिक्षा का अध्ययन पिछले तीन सौ साल से हो रहा है। उपनिवेशवाद के पूरे दौर में होता रहा। इसका उद्देश्य केवल इतना था कि इस विरासत से सम्बन्ध बरक़रार रहे। यह विरासत बिलकुल बरबाद न हो, यह उद्देश्य पूरा हो गया। वह पूरी विरासत आज हमारे पास मौजूद है। इसको समझनेवाले भी हैं, इसको जाननेवाले भी हैं, इसको पढ़ने और पढ़ानेवाले भी मौजूद हैं। अब हम एक नए दौर में दाख़िल हो रहे हैं। अब आज़ादी और ख़ुदमुख़्तारी का दौर है। अब इस्लामी समाज और इस्लामी सभ्यता के गठन का दौर है। एक ज़िंदा सभ्यता और ज़िंदा समाज के गठन के लिए ज़रूरी है कि इसके बुनियादी क़ानूनों, उसकी धारणाओं, और उसके पैराडाइम को एक ज़िंदा और सक्रिय व्यवस्था की हैसियत से संकलित किया जाए। आधुनिक आर्थिक तथ्यों और संसाधनों से जब तक इस्लामी अर्थव्यवस्था के आदेशों को जोड़ा नहीं जाएगा, यानी relate नहीं किया जाएगा उस वक़्त तक इस्लामी अर्थव्यवस्था को एक ज़िंदा और सक्रिय व्यवस्था के तौर पर पेश किया जाना मुश्किल होगा।

अभी तक मुस्लिम जगत् में बहुत-से लोगों को यह ख़याल है कि इस्लामी अर्थव्यवस्था इस दौर में व्यावहारिक नहीं है। यह विद्वानों की ज़िम्मेदारी है कि वे यह साबित करके दिखाएँ और कुछ मामलों में विद्वानों ने यह बात साबित किया है और दुनिया के बहुत-से देशों ने स्वीकार किया है कि इस्लामी अर्थव्यवस्था के आदेश स्वीकार्य हैं, व्यावहारिक हैं। यह काम पूरी अर्थव्यवस्था और इस्लामी क़ानूनों के सिलसिले में किया जाना चाहिए। अभी तक हमारे यहाँ ऐसे लोग मौजूद हैं जो मुस्लिम जगत् के विभिन्न देशों में प्रभावकारी हैसियत रखते हैं। जिनके ज़ेहन इस मामले में साफ़ नहीं हैं कि इस्लामी शरीअत के तमाम आदेश इस दौर में भी व्यावहारिक हैं। कुछ लोगों के ख़याल में फ़ौजदारी आदेश अव्यावहारिक हैं। किसी के ख़याल में व्यक्तिगत क़ानून अव्यावहारिक हैं। किसी के ख़याल में संवैधानिक निर्देश अव्यावहारिक हैं। किसी के ख़याल में जिहाद और जंग के आदेश अव्यावहारिक हैं। यही कैफ़ियत अर्थव्यवस्था के आदेशों के बारे में भी है। इसलिए इस ग़लत-फ़हमी का खंडन करना और सम्बन्धित लोगों को समझाना ज़रूरी है। जब तक ऐसा नहीं होगा उस वक़्त तक पश्चिम की उपनिवेशवादी शोषक और अन्यायपूर्ण व्यवस्था से मुक्ति सम्भव नहीं है। आज जो व्यवस्था मुस्लिम जगत् में प्रचलित है, यह पश्चिम की उपनिवेशवादी और शोषक व्यवस्था के अवशेष हैं, जिनके वही परिणाम निकल रहे हैं जो अतीत में पिछले दो सौ साल से निकलते चले आ रहे हैं।

इस्लामी अर्थव्यवस्था के व्यावहारिक रूप से लागू होने के लिए जिन मामलात का विशेष अध्ययन ज़रूरी है, जिनका कलात्मक संकलन और बौद्धिक गठन अपरिहार्य है, उनमें सबसे महत्वपूर्ण समस्या तो बैंकिंग और ‘तकाफ़ुल’ की है। इसके बारे में ख़ासा ज्ञानपरक काम हुआ है। लेकिन जिन विषयों पर अभी काम होना बाक़ी है उनमें ब्याज रहित अर्थव्यवस्था के अब तक के अनुभवों का आलोचनात्मक ज्ञानपरक अध्ययन, ‘मुज़ारबा’ पर क्रियान्वयन की कैफ़ियत और ज़कात और ‘औक़ाफ़’ की व्यवस्था के आर्थिक महत्व के प्रयोगसिद्ध अध्ययन जैसे मामले शामिल हैं। इन विषयों पर अभी तक इस तरह कलात्मक ढंग से काम नहीं हुआ जो आधुनिक काल में इन संस्थाओं को सक्रिय और प्रभावकारी बनाने के लिए अपरिहार्य है। अगरचे इस्लामी अर्थव्यवस्था का गठन एवं संकलन का काम पिछले सौ साल से हो रहा है और इस मामले में अत्यन्त महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय पहल हुई है। लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है। और जो कुछ करना बाक़ी है वह बहुत आसान काम नहीं है। वह काफ़ी मुश्किल काम है जिसके लिए गम्भीर और सामूहिक प्रयास दरकार हैं।

पश्चिम की आर्थिक व्यवस्था कई सौ वर्ष की लगातार बौद्धिक एवं वैचारिक कोशिशों का नतीजा है। इन कोशिशों में यूरोप और उत्तरी अमेरिका के तमाम शासकों ने, बड़ी-बड़ी सरकारों ने, बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटियों ने और शैक्षिक और शोधपरक संस्थाओं ने भाग लिया है। हज़ारों बल्कि शायद लाखों आर्थिक संस्थाओं ने जो अनुभव पिछले चार-सौ साल में किए हैं उन सबका गहरा कलात्मक अध्ययन किया गया। उनसे परिणाम निकाले गए, इन परिणामों को संकलित किया गया। फिर इन परिणामों को दोबारा व्यावहारिक अनुभवों पर चस्पाँ करके रखा गया। इन सब लगातार प्रयासों के नतीजे में आधुनिक पश्चिमी अर्थव्यवस्था संकलित हुई है।

इस्लामी अर्थव्यवस्था के पूर्ण गठन और संकलन के लिए और इसके ख़ुद-मुख़्तार वुजूद को यक़ीनी बनाने के लिए ज़रूरी है कि इस्लामी अर्थव्यवस्था के अपने ऐसे संसाधन और यंत्र हों यानी tools हों जिनसे काम लेकर इस्लामी अर्थव्यवस्था के आदेशों का प्रवर्त्तन भी किया जा सके। जिनकी सहायता से इस प्रवर्त्तन के परिणामों का विश्लेषण भी किया जा सके और तदधिक तथ्य और परिणाम मालूम करने के लिए नए-नए ढंग भी जिनके आधार पर बनाए जा सकें। जब तक ऐसा नहीं होगा उस वक़्त तक वह ज्ञानपरक विचार या नियम संकलित नहीं हो सकते, जिनका आधार प्रयोगसिद्ध तथ्यों पर हो। यह बात दोहराने की ज़रूरत नहीं कि इस्लामी अर्थव्यवस्था में एक साथ दोनों पहलू पाए जाते हैं। जहाँ तक उसके वैचारिक और मापदंड सम्बन्धी यानी normative पहलू का सम्बन्ध है वह तो सर्वसम्मत है, तयशुदा है, पवित्र क़ुरआन और सुन्नत में और इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के विस्तृत लिटरेचर में मौजूद है। लेकिन जहाँ तक उसके व्यावहारिक और प्रयोगसिद्ध यानी empirical परिणाम का सम्बन्ध है इसके लिए आजकल के तार्किकता के नियम, आजकल की शैलियाँ और आजकल के संसाधनों को अपनाना अपरिहार्य है। यह उसी वक़्त हो सकता है जब अनुभव इतना वुजूद में आ जाए, इतना विस्तृत अनुभव सामने आ जाए जिसके आधार पर कोई प्रयोगसिद्ध शोध सम्भव हो। यह प्रयोगसिद्ध शोध ज़कात के बारे में भी हो सकता है, औक़ाफ़ के बारे में भी हो सकता है, हज के बड़े ऑप्रेशन के बारे में भी हो सकता है। उदाहरणार्थ तबुंग हाजी (Tabung Haji) मलेशिया की मशहूर संस्था है जिसपर कुछ काम हुआ है। इस काम से कुछ निष्कर्ष भी निकले होंगे। इन निष्कर्षों से दूसरे देशों में किस तरह फ़ायदा उठाया जा सकता है। दूसरे देश किस अंदाज़ से अपनी व्यवस्था का गठन कर सकते हैं। ये वे मामलात हैं जिनका सम्बन्ध ख़ालिस प्रयोगसिद्ध तथ्यों और जानकारी से है।

यह काम उसी वक़्त हो सकता है जब ऐसे विद्वान मौजूद हों जो इस पूरे काम की योग्यता रखते हों। मैं फिर याद दिलाऊँगा, शिक्षा-व्यवस्था के पुनर्गठन की महत्वपूर्ण और बुनियादी बात, जो इस पूरी प्रक्रिया के लिए पहले क़दम की हैसियत रखती है। जब तक ऐसे लोग मौजूद नहीं होंगे जो फ़िक़्हे-इस्लामी के संग्रहों पर गहरी नज़र रखते हों और पश्चिम की आर्थिक धारणाओं से आलोचनात्मक रूप से परिचित हों। उस वक़्त तक यह सारा काम पूरा नहीं होगा। जब ऐसे विद्वान अस्तित्व में आ जाएँगे तो ज़रूरत होगी कि एक ऐसा माहौल और फ़िज़ा पैदा की जाए जो सांस्कृतिक, सामूहिक, सामाजिक और राजनैतिक दृष्टि से इस काम को प्रोत्साहित करे और आंशिक और समष्टीय दोनों प्रकार की आर्थिकता पर क्रियान्वयन भी कराए और क्रियान्वयन के बाद उसका अध्ययन करके उनसे तदधिक परिणाम निकालने के साधन-संसाधन भी उपलब्ध करे। इस्लामी अर्थव्यवस्था का यह पहला चरण जिससे हम गुज़र रहे हैं यह एक मजबूरी का-सा चरण है। हम एक मजबूरी की-सी स्थिति से गुज़र रहे हैं। इस मजबूरी की स्थिति में बहुत-से ऐसे काम भी करने पड़ेंगे जो बज़ाहिर हीला मालूम होंगे, लेकिन उनसे गुज़रे बिना आगे बढ़ना मुश्किल है। इस चरण में कुछ ऐसे तरीक़ों को भी बर्दाश्त करना पड़ेगा जिनका इस्लामी विकल्प फ़िलहाल मौजूद नहीं है, और जिनको फ़ौरी तौर पर अनदेखा करना भी व्यापारियों और अर्थव्यवस्था के लिए सम्भव नहीं है। इसलिए इस चरण में इन तरीक़ों को बर्दाश्त करना पड़ेगा। कल की चर्चा में मैं रि-इंश्योरेंस की मिसाल दे चुका हूँ कि रि-इंश्योरेंस बड़ी हद तक ग़ैर-मुस्लिम देशों के अधीन और उनके कंट्रोल में है। इसके बहुत-से मामलात शरीअत से मेल नहीं खाते, लेकिन मजबूरी में उसको बर्दाश्त करना पड़ेगा।

बहुत-से मुस्लिम देशों के विदेशों में व्यापार का बड़ा भाग ग़ैर-मुस्लिमों के साथ है। मैंने पहले बताया था कि मुसलमानों के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का केवल आठ प्रतिशत भाग है जो मुस्लिम देशों में आपस में हो रहा है। 92 प्रतिशत भाग वह है जो मुस्लिम देशों का ग़ैर-मुस्लिम देशों के साथ है। बहुत-से मुस्लिम देशों ने दूसरे देशों और उनके अधीन क़ायम अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से बड़े-बड़े क़र्ज़ लिए हुए हैं। इन क़र्ज़ों के बदले अपनी क़ीमती जायदादें और परिसम्पत्तियाँ रहन रखे हुए हैं। यह काम पाकिस्तान के शासकों ने बहुत ज़्यादा किया है। पाकिस्तान की बहुत क़ीमती परिसम्पत्तियाँ बड़े पैमाने पर ग़ैर-मुस्लिम देशों के हाथों रहन रख दी गई हैं। अब एक झटके से इन तमाम अनुबन्धों को निरस्त करना सम्भव नहीं है। इन क़र्ज़ों की मात्रा इतनी बड़ी है कि पाकिस्तान की पूरी परिसम्पत्तियाँ बेचकर के भी शायद उनको अदा न किया जा सके। इसलिए मजबूरी के सिद्धान्त के तहत इस स्थिति को बर्दाश्त करना पड़ेगा। शरीअत ने मजबूरी के आदेश इसी तरह की स्थिति से निबटने के लिए दिए हैं।

इस चरण में यह भी ज़रूरी है कि फ़िक़्हे-मालियात और फ़िक़्हुल-मुआमलात की नए अंदाज़ से शिक्षा की शुरुआत की जाए। यह शुरुआत यूनिवर्सिटियों में भी की जाए, दीनी शिक्षा की संस्थाओं में भी की जाए, बल्कि यह काम हर उस शिक्षण केन्द्र में किया जाना चाहिए जहाँ किसी-न-किसी दृष्टि से फ़िक़्ह या अर्थव्यवस्था की शिक्षा हो रही हो। जहाँ दीनी शिक्षा की संस्थाओं और विभागों के लिए यह ज़रूरी है कि वे फ़िक़्हे-मालियात और फ़िक़्हुल-मुआमलात की नए अंदाज़ से शिक्षा का प्रबन्ध करें, वहाँ बैंकिंग, अर्थव्यवस्था, व्यापार और बिज़नेस ऐडमिनिस्ट्रेशन के विभागों की भी यह ज़िम्मेदारी है कि वे इन विषयों की इस अंदाज़ से शिक्षा दें कि इन संस्थाओं के शिक्षा प्राप्त लोग शरीअत के पक्ष से पूरे तौर पर आगाह भी हों और इस पक्ष को अपने व्यक्तित्व के विभागों में जारी भी कर सकें और अपनी दक्षतापूर्ण जानकारी को शरीअत के आदेशों के क़रीब भी कर सकें।

अभी मैंने बताया है कि यह ज़रूरी नहीं कि इस्लामी अर्थव्यवस्था और व्यापार को जब वर्तमान समय में लागू किया जाए तो पूरे मुस्लिम जगत् के लिए एक ही तरह का नक़्शा और एक ही तरह की रूपरेखा बनाई जाए। यह इसलिए ज़रूरी नहीं है कि विभिन्न मुस्लिम देशों की आर्थिक परिस्थितियाँ विभिन्न हैं। शिक्षा सम्बन्धी परिस्थितियाँ भी भिन्न हैं। सामाजिक और सामूहिक हालात भी भिन्न हैं। इसलिए सिद्धान्त और आधार तो समान और सर्वसम्मत होंगे, लेकिन विस्तृत रूपरेखाएँ और व्यावहारिक नक़्शे हर बड़े मुस्लिम देश में अलग-अलग हो सकते हैं।

उदाहरणार्थ पाकिस्तान में इस्लामी अर्थव्यवस्था स्थापित और लागू करने के लिए जो ख़ाका या नक़्शा बनाया जाए ज़रूरी नहीं कि वह रूपरेखा और नक़्शा अपने तमाम आंशिक विवरणों में भी पूरे तौर पर सऊदी अरब के नक़्शे और ख़ाके से मिलता हो। सिर्फ़ सैद्धान्तिक रूप से सहमत होना ज़रूरी है। विवरणों पर सहमत होना ज़रूरी नहीं है।

इस दृष्टि से हम मुस्लिम देशों को तीन बड़ी-बड़ी श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं। कुछ मुस्लिम देश तो वे हैं जो इस्लाम को लागू करने के ध्वजावाहक हैं या कम-से-कम उसके दावेदार हैं। जैसे पाकिस्तान एक ज़माने में ध्वजावाहक था, फिर मात्र दावेदार हो गया। अब ऐसा मालूम होता है कि न ध्वजावाहक है, न दावेदार है। लेकिन वैचारिक दृष्टि से, संवैधानिक दृष्टि से, तहरीके-पाकिस्तान की क़िस्म और पाकिस्तान के नेताओं की कमिटमेंट की दृष्टि से पाकिस्तान को इस्लाम को लागू करने का ध्वजावाहक होना चाहिए, और कम-से-कम वैचारिक और संवैधानिक दृष्टि से वह अब भी इस्लाम को लागू करने का ध्वजावाहक है। इसलिए पहली श्रेणी में जो देश शामिल हैं उनमें पाकिस्तान का नाम सबसे ऊपर आना चाहिए। दूसरी श्रेणी इन देशों की है कि जो इस्लामी व्यवस्था के ध्वजावाहक या उसे लागू करने के दावेदार तो नहीं हैं, लेकिन इस्लामी अर्थव्यवस्था और व्यापार के विरोधी भी नहीं हैं। वहाँ सरकारें इस बात की इजाज़त देती हैं कि अगर कुछ लोग इस्लामी अर्थव्यवस्था और व्यापार की बुनियादों पर काम करना चाहें तो कर सकते हैं। मुस्लिम जगत् के अधिकतर देश इसी प्रकार के हैं। तीसरी श्रेणी उन देशों की है जो सेक्युलरिज़्म से गहरा लगाव रखते हैं। वैचारिक दृष्टि से सेक्युलरिज़्म ही को अपना धर्म और ईमान समझते हैं और सेक्युलरिज़्म से मुँह फेरनेवाली किसी पॉलिसी को स्वीकार करने में झिझक महसूस करते हैं।

इन तीनों प्रकार के देशों में इस्लामी अर्थव्यवस्था की बहाली के तक़ाज़े अलग-अलग हैं और भविष्य की इस्लामी अर्थव्यवस्था या भविष्य में इस्लाम का काम करने के नक़्शे इन तीनों प्रकार के देशों में अलग-अलग होंगे। जो देश इस्लाम को लागू करने के दाई (आवाहक) हैं या मुद्दई (वादी) हैं वहाँ राज्य की एक महत्वपूर्ण और शायद सबसे पहली ज़िम्मेदारी यह है कि वह एक प्रेरक अभियान शुरू करे जिसके नतीजे में लोगों को प्रेरित किया जाए, व्यापारियों को इसका समर्थक बनाया जाए, कारोबारी हलके को इस ओर प्रवृत्त किया जाए कि वे इस्लाम के आदेशों पर अमल करें। इस्लाम के आदेशों से जानकारी प्राप्त करें। चिरंजीवी अभियान के साथ-साथ इस्लामी संस्थाओं को और मज़बूत बनाना भी ज़रूरी है। आजकल इम्पावरमेंट (Empowerment) का शब्द बहुत चलता है। हर चीज़ की (empowerment) की बात हो रही है। इसलिए इस्लामी संस्थाओं की भी (empowerment) होनी चाहिए। यह काम इस पहले चरण की पूर्ति के लिए बुनियादी शर्त की हैसियत रखता है। शिक्षा के इस्लामी गठन का मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ।

जीवन के शेष विभागों में बेहतरी और सुधार किया जाए, कलात्मक दृष्टि से भी और इस्लामी दृष्टि से भी। कुछ लोग कलात्मक सुधार के पहलू को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और केवल नैतिकता के उपदेश को काफ़ी समझते हैं। नैतिकता का उपदेश हो रहा हो, दीनी (धार्मिक) प्रेरणा का अभियान जारी हो, लेकिन किसी काम को करने के जो कलात्मक और व्यावहारिक तक़ाज़े हैं उनपर अमल न हो तो ऐसा ख़ाली-ख़ूली प्रेरणा अभियान कुछ परिणामदायक नहीं होता। आप पूरे समाज में नमाज़ के लिए प्रेरणा अभियान चलाएँ, नमाज़ के फ़ज़ाइल (परलोक में मिलनेवाला पुण्य) बयान करें, लेकिन वहाँ मस्जिद क़ायम न करें, इमाम की नियुक्ति न करें, वक़्त पर अज़ान का प्रबन्ध न हो तो फिर प्रेरणा अभियान के परिणाम बहुत-सीमित होंगे। इसलिए प्रेरणा अभियान के साथ-साथ किसी काम को करने के जो व्यावहारिक और कलात्मक तक़ाज़े हैं उनपर भी प्रभावकारी और पूर्ण रूप से क्रियान्वयन होना चाहिए। ग़ैर-इस्लामी उत्प्रेरकों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज में इन तमाम शक्तियों के दरमियान समरसता होनी चाहिए। वैचारिक समरूपता होनी चाहिए जो इस्लाम को लागू करने के इस साझे एजंडे से मेल खाती हो। इस्लाम को लागू करने का कम-से-कम एक एजंडा पूरे देश में सर्वसम्मत होना चाहिए, जो अलहम्दुलिल्लाह पाकिस्तान में है। पाकिस्तान में ‘दस्तूर इस्लामी जमहूरिया पाकिस्तान 1973’ में इस्लाम को लागू करने का जितना एजंडा मौजूद है उसके बारे में यह बात सन्तुष्टि और यक़ीन के साथ कही जा सकती है कि देश के तमाम उल्लेखनीय वर्ग इस एजंडे पर सहमत हैं और दस्तूर पर सर्वसहमति रखने की वजह से इस एजंडे पर काम करने पर भी एकमत हैं। इसलिए इस बारे में कम-से-कम देश में कोई मतभेद या ख़ींचा-तानी नहीं होनी चाहिए।

इस्लामी अर्थव्यवस्था और व्यापार की स्थापना के लिए ज़रूरी यह है कि एक ऐसा उच्चाधिकारी आयोग क़ायम किया जाए जैसा सुप्रीमकोर्ट की निर्देश के अनुसार स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान में क़ायम किया गया था। ऐसा आयोग एक स्थायी आयोग हो जो सरकार के ज़िम्मेदार लोगों पर आधारित हो, जिसमें अर्थव्यवस्था और क़ानून के सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञ भी शामिल हों और शरीअत के बड़े विशेषज्ञ और प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान भी शामिल हों। यह आयोग इस बात का अधिकार रखता हो, इस बात की क्षमता रखता हो और पाबंद हो कि पाकिस्तान में इस्लामी अर्थव्यवस्था की ओर पहल की प्रक्रिया का जायज़ा लेता रहे, समय-समय पर निर्देश जारी करता रहे और जहाँ-जहाँ मुश्किलें पैदा हों उनका हल प्रस्तावित कर के सरकार को ध्यान दिलाता रहे। इस आयोग में अर्थशास्त्री और बड़े इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्री) भी शामिल होने चाहिएँ। क़ानून विशेषज्ञ और अर्थशास्त्र में दक्षता रखनेवाले भी शामिल होने चाहिएँ। यह आयोग एक ऐसा टाइम-टेबल बनाए जो व्यावहारिक भी हो और सरकार की सलाह के बाद बनाया गया हो। इस आयोग और सरकार के दरमियान कोई टकराव की कैफ़ियत न हो।

यह आयोग सरकार के एक अंग के तौर पर काम करे। सरकार के किसी विरोधी के तौर पर काम न करे। इसकी हैसियत किसी विपक्षी पार्टी की नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसकी हैसियत सरकार ही की एक संस्था की होनी चाहिए। सरकार के संरक्षण में यह संस्था एक Watch Dog का काम करे। यह देखे कि विभिन्न क़ानूनों पर अदालतों के फ़ैसलों, स्टेट बैंक के आदेशों पर और ख़ुद इस आयोग के निर्देशों पर कितना अमल हो रहा है।

पाकिस्तान के इन्फ़ोर्समेंट शरीअत एक्ट 1991 (Enforcement of Shari'ah Act, 1991) में एक ऐसे आयोग की गुंजाइश रखी गई थी, लेकिन यह आयोग प्रभावकारी तौर पर काम नहीं कर पाया। या तो उसका नेतृत्व राजनैतिक कार्यकर्ताओं के हाथ में रहा जो अपनी सरकारों को मुश्किल में नहीं डालना चाहते थे, या उनका ख़याल था कि अगर उन्होंने कोई प्रस्ताव पेश किया तो सरकार उसको स्वीकार नहीं करेगी। सरकार स्वीकार नहीं करेगी तो जन साधारण की नज़र में ख़ुद उनको और सरकार को बेइज़्ज़ती का सामना करना पड़ेगा। इसलिए हम अपनी सरकार को बेइज़्ज़ती का निशाना क्यों न बनाएँ। इसलिए उन्होंने कोई सक्रिय भूमिका अदा नहीं की। या उसमें ऐसे लोग रखे गए जो ख़ुद निष्क्रय थे, उनकी सुस्ती की वजह से संस्था भी निष्क्रय हो गई। अब या तो उसी आयोग को सक्रिय बनाया जाए या कोई नई संस्था क़ायम की जाए, जो वाक़ई सक्रिय संस्था हो, जो इस्लामी अर्थव्यवस्था की शिक्षा के प्रस्तावों को भी बनाए। अर्थव्यवस्था में इस्लामी शोध की संस्थाएँ भी क़ायम करे। टैक्सों की पूर्ण व्यवस्था पर पूरी तरह पुनरावलोकन का प्रस्ताव भी दे। यह आयोग ख़ुद भी प्रस्ताव दे सकता है और ऐसी कमेटियाँ भी क़ायम कर सकता है जो व्यावहारिक प्रस्ताव पेश करें।

जब तक हमारे देश में टैक्सों की व्यवस्था पर पूरी तरह पुनरावलोकन नहीं होगा बहुत-से सुधारों पर क्रियान्वयन का काम रुका रहेगा। न ज़कात पर पूरी तरह अमल हो सकेगा, न ‘मुज़ारबा’ पर हो सकेगा, न ‘मुशारका’ पर पूरी तरह अमल हो सकेगा और बहुत-से सुधार उस वक़्त तक अधूरे रहेंगे जब तक वर्तमान टैक्सों और टैक्सों की व्यवस्था पर भरपूर पुनरावलोकन नहीं किया जाएगा।

हमारे यहाँ कॉरपोरेट व्यापार की निगरानी का मामला बहुत ढीला है। दुनिया के देशों में ये संस्थाएँ बहुत मज़बूत, बहुत खरी और बहुत कड़ी होती हैं। हमारे यहाँ ये संस्थाएँ न खरी हैं, न कड़ी हैं और न मज़बूत हैं। निगरानी और कंट्रोल के लिए जब तक कोई मज़बूत, खरी और कड़ी संस्था नहीं होगी उस वक़्त तक कॉरपोरेट व्यापार की व्यवस्था मज़बूत बुनियादों पर क़ायम नहीं हो सकेगी। एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह भी ज़रूरी महसूस होता है कि आर्थिक मामलों से निबटने के लिए फ़ास्ट ट्रैक अदालतें अलग होनी चाहिएँ। अदालतों के पास काम का अंबार बहुत ज़्यादा है। किसी जज के लिए, चाहे वह हाईकोर्ट का जज हो या निचली अदालत का जज हो, यह पूरा काम बहुत अच्छे से निबटाना बहुत मुश्किल हो जाता है जो उसको करने को मिलता है। मुक़द्दमों की अधिकता की वजह से उनको इकट्ठा हो चुके मुक़द्दमों को निबटाने के काम में देर होती है और देर के नतीजे में वह स्थिति पैदा होती है जिसके बारे में मैंने एक-बार कहा था कि पाकिस्तान की अदालतों से अपना हक़ प्राप्त करने के लिए सब्रे-अय्यूब, उम्रे-नूह और दौलते-क़ारून की ज़रूरत होती है। इसका एक आंशिक समाधान यह भी हो सकता है कि हाईकोर्ट की निगरानी में विभिन्न मामलों की अलग-अलग अदालतें क़ायम कर दी जाएँ। आर्थिक मामलों की अदालतें अलग हों, बैंकिंग की अदालतें अलग हों। अगर ऐसा हो जाए तो उम्मीद की जा सकती है कि जिन अस्बाब की बिना पर कारोबारी वर्ग पहल करने से घबराता है इन रुकावटों को जुज़वी हद तक ही सही दूर किया जा सकेगा।

बैंकिंग के प्रशिक्षण की तुरन्त व्यवस्था क़ायम की जानी चाहिए। इस वक़्त हमारे देश में बैंकिंग के प्रशिक्षण की व्यवस्था अत्यन्त अपर्याप्त है। बैंकों में काम करनेवाले लोगों की बड़ी संख्या वह है जिनको पहले से इस कलात्मक काम का सिरे से कोई अनुभव नहीं होता, न कोई प्रशिक्षण होता है। इस्लामी बैंकिंग का मामला और भी नाज़ुक और कमज़ोर है। प्रशिक्षण न यहाँ है, न वहाँ है। पारम्परिक बैंकिंग का प्रशिक्षण तो माहौल में ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाता है और जब आदमी नौकरी शुरू करता है तो पहले दिन से उसके कलात्मक प्रशिक्षण की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है। और चूँकि यह व्यवस्था चार-सौ वर्ष से चल रही है इसलिए किसी नए अनुभवहीन और नवोदित के आगमन से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, वह जल्द ही वहाँ के रंग में रंग जाता है। लेकिन इस्लामी अर्थव्यवस्था तो अपने आरम्भ में है। अगर आरम्भ ही अप्रशिक्षित और नौसिखिए लोगों के हाथ में होगा तो आरम्भ ही में गड़बड़ पैदा हो जाएगी। इसलिए प्रशिक्षण की जितनी ज़रूरत इस्लामी बैंकिंग के मामलात में है, उतनी शायद पारम्परिक बैंकिंग में नहीं है।

देश की आर्थिक प्राथमिकताओं का निर्धारण भी इस्लामी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। आर्थिक प्राथमिकताओं का निर्धारण एक बार हो जाए तो उन आर्थिक प्राथमिकताओं को सामने रखकर ब्याज के इस्लामी विकल्प तैयार करना तुलनात्मक रूप से आसान हो जाएगा। विदेशों के प्रभाव से आज़ादी इस पहले चरण में अपरिहार्य है। न केवल इस चरण की पूर्ति के लिए, बल्कि आत्मनिर्भरता की प्राप्ति के लिए भी आर्थिक स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता की प्राप्ति अपरिहार्य है। आत्मनिर्भरता की प्राप्ति जब तक बतौर पॉलिसी के मूल सिद्धान्त के लिए सख़्ती से नहीं अपनाई जाएगी उस वक़्त तक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता। पाकिस्तान की हद तक हम कह सकते हैं कि इस्लामी बैंकिंग के Watch Dog की ज़िम्मेदारी स्टेट बैंक या किसी और संस्था जिसको भी दी जाए वहाँ इस काम के लिए ज़रूरी लोग और संसाधनों की उपलब्धता अपरिहार्य है। उचित यह है कि यह ज़िम्मेदारी स्टेट बैंक ही की हो। बशर्तेकि काम सक्रिय ढंग से किया जाए और स्टेट बैंक में इस काम के लिए प्रभावकारी और आत्मनिर्भर विभाग क़ायम किया जाए। पाकिस्तान में छोटे उद्योगों पर ज़ोर देने से इस्लामी अर्थव्यवस्था के विकास में सहायता मिल सकती है। इसकी वजह यह है कि छोटा उद्योगपति और छोटा व्यापारी इस्लाम के आदेशों पर आसानी से अमल कर सकता है और उससे जल्द अपनी बात मनवाई जा सकती है। गाँव और देहातों पर अगर ध्यान दिया जाए और छोटी-छोटी योजनाओं में पूँजी निवेश किया जाए तो जहाँ बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक का प्रयोग काम देगा वहाँ इस्लामी आदेशों पर क्रियान्वयन भी आसान होगा। गाँव और देहात में मानसिक रूप से लोग पहले ही इस बात के लिए आमादा रहते हैं कि इस्लाम के आदेशों पर अमल करें और जिन चीज़ों को शरीअत ने हराम क़रार दिया है उनसे बचने की कोशिश करें।

इन कामों के साथ-साथ यह भी उचित मालूम होता है कि देश के आम व्यापारियों के लिए ऐसे छोटे-छोटे प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जाएँ जिनके द्वारा उनको इस्लाम के आदेशों और क़ानूनों से परिचित कराया जाए। शरीअत के आदेश उनको बताए जाएँ। ‘रिबा’, ‘क़िमार’ और ‘ग़रर’ की हुर्मत (हराम होने) से उनको आगाह किया जाए। यह वर्ग जब इन आदेशों से आगाह हो जाएगा तो बहुत आसानी के साथ उनपर क्रियान्वयन के लिए भी तैयार हो जाएगा। अगर छोटे-छोटे व्यापारियों का वर्ग इस्लाम के आदेशों पर अमल करना शुरू कर दे तो फिर आसानी के साथ इस्लामी अर्थव्यवस्था के ऊँचे लक्ष्य को अपनाया जा सकता है। व्यापारियों के प्रशिक्षण सम्बन्धी कार्यक्रम प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान भी कर सकते हैं। दीनी शिक्षा की संस्थाएँ भी कर सकती हैं और ख़ुद व्यापारियों के संगठन भी आपस में मिलकर कर सकते हैं। पाठ्यक्रम में इस्लामी अर्थव्यवस्था की सामग्री यों तो पाकिस्तान में किसी हद तक शामिल है। लेकिन अगर अर्थव्यवस्था के अध्यापक मिलकर यह तय कर लें कि वे अर्थव्यवस्था की पारम्परिक शिक्षा के साथ-साथ इस्लामी अर्थव्यवस्था के आदेश भी छात्रों को पढ़ाएँगे तो यह काम ज़्यादा मुश्किल नहीं है। इस्लामी अर्थव्यवस्था पर उर्दू और अंग्रेज़ी में इतनी सामग्री उपलब्ध है कि वह अध्यापकों और छात्रों की आम आवश्यकताओं को भरपूर तरीक़े से पूरा कर सकती है।

उर्दू और अंग्रेज़ी में इस्लामी अर्थव्यवस्था पर ज़्यादा-से-ज़्यादा सामग्री उपलब्ध कराना हम सबकी ज़िम्मेदारी है। यह बात अत्यन्त प्रोत्साहित करनेवाली है कि अरबी भाषा में अरब दुनिया में इस्लामी अर्थव्यवस्था, व्यापार और ‘तकाफ़ुल’ पर बहुत काम हुआ है। सैंकड़ों नहीं, हज़ारों किताबें और इससे भी ज़्यादा शोध लेख पिछले चालीस-पचास साल में लिखे गए हैं। अगर इस पूरे संग्रह से अच्छी किताबों का चयन करके, हर साल सौ किताबें भी उर्दू/हिन्दी और अंग्रेज़ी में प्रकाशित हो जाया करें तो कुछ साल के अंदर-अंदर हम उर्दू/हिन्दी भाषा को और किसी हद तक अंग्रेज़ी भाषा को इस्लामी अर्थव्यवस्था के साहित्य से माला-माल कर सकते हैं। अगर पाकिस्तान के हर बड़े दीनी मदरसे में और तमाम यूनिवर्सिटियों में इस्लामियात का हर विभाग यह तय कर ले कि हर साल अपने छात्रों से कम-से-कम दो किताबों का उर्दू/हिन्दी और एक किताब का अंग्रेज़ी अनुवाद कराएगा तो कुछ वर्षों के अंदर-अंदर यह कमी पूरी हो सकती है।

यहाँ एक बात में विशेष रूप से बताना चाहता हूँ, वह यह कि इस्लामी अर्थव्यवस्था के लिए किए जानेवाले इस सारे काम को देश की राजनीति के प्रभाव से दूर रखा जाए। राजनैतिक संघर्ष ने हमारे देश में इस्लाम को फ़ायदा कम पहुँचाया है, नुक़सान ज़्यादा पहुँचाया है। अगर इस्लामी अर्थव्यवस्था को लागू करने के एक साझा प्रोग्राम पर सर्वसहमति हो जाए जो आसानी के साथ पैदा की जा सकती है, तो फिर उस कार्य को निहितार्थों और राजनैतिक हितों के प्रभाव से दूर रखने की ज़रूरत है। जो देश और समाज के साझे लक्ष्य हैं, पाकिस्तान की रक्षा साझा लक्ष्य है। पाकिस्तान का विकास साझा लक्ष्य है। पाकिस्तान की ख़ुशहाली और अमन और अमान साझा लक्ष्य है। इसी तरह पाकिस्तान का इस्लामी गठन भी साझा लक्ष्य होना चाहिए। इस लक्ष्य को किसी राजनैतिक हित पर क़ुर्बान नहीं होने देना चाहिए। इस्लामी दृष्टिकोण से आनेवाली जागरूकता और उससे मिलनेवाली ताक़त किसी राजनैतिक निहितार्थ के तहत नहीं, इस्लाम की ख़ातिर और अल्लाह के दीन की ख़ातिर यह काम किया जाना चाहिए। जिसमें राज्य के तमाम विभागों, गिरोहों और तंज़ीमों को भाग लेना चाहिए। इसके साथ-साथ राज्य की यह ज़िम्मेदारी भी है कि राज्य के क़ानूनों में जहाँ-जहाँ ज़रूरत हो वहाँ परिवर्तन करके इस्लामी विकल्पों के लिए गुंजाइश पैदा की जाए। पाकिस्तान में क़ानूनों में कुछ परिवर्तन अस्सी की दहाई में हुई थीं। कुछ परिवर्तनों की और भी ज़रूरत है। इन परिवर्तनों के लिए कुछ काम हुआ भी है। कुछ क़ानूनों के ड्राफ़्ट तैयार भी हुए हैं। जिनमें से कुछ ड्राफ़्टों के क्रम देने में मैंने भी भाग लिया है। अगर यह काम सर्वसहमति से हो जाए, सरकार और दूसरे तमाम रुसूख़दार लोग इससे सहमत हो जाएँ तो क्रमशः धीरे-धीरे इस काम को किया जा सकता है, और पाकिस्तान अपने इस स्थान को दोबारा प्राप्त कर सकता है जो उसको पचास की दहाई में प्राप्त था, जब वह मुस्लिम जगत् के लिए नमूने और नेतृत्व की हैसियत रखता था।

इस्लामी अर्थव्यवस्था को लागू करने का काम पाकिस्तान में जब भी होगा उसमें अनिवार्य रूप से यह चीज़ होगी कि ‘रिबा’ की हर सूरत का पूर्ण ख़ातिमा हो। टैक्सों की वर्तमान व्यवस्था और पश्चिमी धारणा पर पुनरावलोकन हो। हर प्रकार का आधिक्य पूरी तरह समाप्त हो। दौलत के केन्द्रीकरण को कम-से-कम किया गया हो। देश में सामूहिक न्याय अर्थात् बँटा हुआ न्याय और सोशल जस्टिस पूरे तौर पर मौजूद हों। और ख़ास तौर पर जो बेघर मज़दूर या बेघर किसान हैं, उनको रहने और खेती के लिए ज़मीन उपलब्ध हो।

शरीअत का एक बुनियादी आदेश है जो कई हदीसों में बयान हुआ है। “जिसने ज़मीन को ज़िन्दा किया, जबकि वह मर चुकी थी, तो वह उसकी हो गई।” यानी जो व्यक्ति किसी ग़ैर-आबाद और बिना वारिस की ज़मीन को आबाद करे वह उसकी है। अगर हुकूमते-पाकिस्तान इस उसूल को बतौर पॉलिसी के अपना ले और इसके लिए एक ऐसी संस्था बना दे जो एक पाँच वर्षीय, दस वर्षीय, पंद्रह वर्षीय या बीस वर्षीय मंसूबे के द्वारा पाकिस्तान की ग़ैर-आबाद सरकारी ज़मीनों को मुफ़्त ज़रूरतमन्द किसानों में तक़सीम कर दे। पानी उपलब्ध करने में सरकार सहायता दे। जहाँ ज़रूरी हो वहाँ क़र्ज़ा दे। जहाँ सरकार क़र्ज़ा न दे सके वहाँ ज़कात की रक़म से संसाधन प्रदान किए जाएँ तो बहुत जल्द पाकिस्तान में क्रान्ति लाई जा सकती है। नई बस्तियाँ आबाद की जा सकती हैं। इसके साथ-साथ बड़ी-बड़ी ज़मींदारियों में जो ग़ैर-आबाद ज़मीन पड़ी है वह वापस ले ली जाए। बैंक एक योजना के तौर पर ‘मुज़ारबा’ और ‘मुशारका’ के इस्लामी सिद्धान्तों पर पूँजी निवेश करें। शिक्षित नव जवानों को प्राथमिकता दें, जो कलात्मक बुनियादों पर ज़मीनें आबाद करें। अगर एक मैट्रिक पास नौजवान को या एफ़.ए. (F.A.) पास नौजवान को एक साल का, तीन महीने या चार महीने का संक्षिप्त कृषि कोर्स कराया जाए और मुर्दा पड़ी ज़मीनों के लिए इसको तैयार किया जाए, अगर वह हक़दार हो तो ज़कात फ़ंड से इसको ज़रूरी रक़म दी जाए। हक़दार न हो तो बैंकों से क़र्ज़ दिए जाएँ तो रोज़गार की समस्या के हल में भी सहायता मिल सकती है और ज़मीनें भी बड़े पैमाने पर आबाद की जा सकती हैं।

मुस्लिम जगत् में आपस में व्यापार बढ़ाने का भी इस्लामी अर्थव्यवस्था के भविष्य से गहरा सम्बन्ध है। अगर वे देश जो इस्लामी अर्थव्यवस्था के सिलसिले में पहल कर रहे हैं या करना चाह रहे हैं, या करने के ध्वजावाहक हैं, अगर उनका आपस में कारोबार इतना बढ़ जाए कि वे एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें तो इससे इस्लामी एकत्व में भी सहायता मिलेगी। इस्लामी अर्थव्यवस्था के काम में भी पहल होगी और एक-दूसरे के अनुभवों से फ़ायदा उठाने में भी आसानी होगी।

इस्लामी अर्थव्यवस्था में पहल करने के मापदंड क्या हैं? यानी पहल करने के indicators क्या हैं? इंडेक्स क्या हैं? मेरे ख़याल में ये नीचे लिखी चीज़ें हैं—

धन का व्यापक स्तर पर वितरण 

छोटे और घरेलू उद्योगों को अधिक-से-अधिक बढ़ावा देना 

मुशारका और मुज़ारबा और इनकी धारणा पर आधारित नए तरीक़ों का ज़्यादा-से-ज़्यादा रिवाज 

बैए-मुराबहा और तवर्रुक़ जैसे तरीक़ों का कम-से-कम इस्तेमाल 

व्यापार को बढ़ाना 

औद्योगिक विकास में नुमायाँ और लगातार वृद्धि 

समाज के ग़रीब तबक़ात को लाभान्वित होने के अवसर ज़्यादा-से-ज़्यादा मिलेंगे 

ब्याज आधारित अर्थव्यवस्था में लगी हुई रक़म के मुक़ाबले में कमी का स्पष्ट रुझान 

इस्लामी अर्थव्यवस्था में लगाई जानेवाली पूँजी में नुमायाँ वृद्धि का रुझान 

धन के संकेन्द्रण में कमी का नुमायाँ रुझान 

यानी देश में ब्याज आधारित व्यापार में जितनी कुल रक़म लगी हो इसमें एक साल में अगर दस प्रतिशत कमी हुई है, अगले साल बीस प्रतिशत कमी हुई है, इससे अगले साल तीस प्रतिशत कमी हुई है, तो यह सफलता का एक निशान या पैमाना समझी जाएगी। इसी तरह इस्लामी अर्थव्यवस्था में लगी हुई रक़म में हर साल नुमायाँ वृद्धि होनी चाहिए। अगर देश की कुल पैदावार का जितना प्रतिशत ब्याज रहित इस्लामी अर्थव्यवस्था में लगा है, इसमें वृद्धि हो रहा है और जितना पूँजी ब्याज आधारित अर्थव्यवस्था में लगी है उसमें कमी आ रही है और वृद्धि और कमी का यह रुझान लगातार जारी है तो इसका मतलब यह है कि इस्लामी अर्थव्यवस्था के लागू होने में सफलता मिल रही है। और अगर ऐसा नहीं हो रहा तो फिर समझा जाएगा कि या तो सफलता नहीं हो रही या सफलता की प्रक्रिया बहुत सुस्त और न होने के बराबर है।

इस्लामी अर्थव्यवस्था की तरफ़ पहल एक दृष्टि से तो सुस्त रहेगी। इसलिए कि विभिन्न चरणों से गुज़रने के बाद ही वास्तविक सफलता तक पहुँचना सम्भव होगा। पहले चरण में खुले-खुले हराम कामों से मुक्ति प्राप्त करनी होगी। कुछ मकरूहात (अप्रिय कामों) को गवारा करना पड़ेगा। अगले चरण में बड़े मकरूहात को समाप्त करके छोटे मकरूहात को गवारा करना पड़ेगा। इससे अगले चरण में मुबाहात (जायज़ कामों) में तुलनात्मक रूप से ग़ैर-अफ़ज़ल मुबाहात को बर्दाश्त करना होगा। इस तरह आगे चलकर दर्जा-ब-दर्जा कामयाबियों के द्वारा ख़ालिस इस्लामी स्तर की प्राप्ति सम्भव हो सकेगी।

इस्लामी अर्थव्यवस्था और व्यापार के भविष्य के तक़ाज़ों को पूरा करने के लिए एक आलमगीर फ़िक़्ह (विश्वव्यापी धर्मशास्त्र) की ज़रूरत है। इसको हम globalized फ़िक़्ह या cosmopolitan फ़िक़्ह कह सकते हैं।

इस्लामी अर्थव्यवस्था और व्यापार के लिए जहाँ संस्थाओं, पूँजी निवेशकों और कारोबारी लोगों के लिए प्रशिक्षण सम्बन्धी कार्यक्रम दरकार हैं, वहाँ नौजवान प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों के लिए भी बैंकिंग के विशेष कोर्स जारी होने चाहिएँ। ये यूनिवर्सिटियों में भी हो सकते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय इस्लामी यूनिवर्सिटी में कई साल से हो रहे हैं। दूसरी यूनिवर्सिटियों को भी ऐसे कोर्स कराने चाहिएँ। ये कोर्स दीनी मदरसों में भी हो सकते हैं। इन कोर्सों की अवधि दो से तीन साल तक होनी चाहिए। इनमें अंग्रेज़ी की अनिवार्य जानकारी, गणित, अर्थव्यवस्था और बिज़नेस ऐडमिनिस्ट्रेशन के विषयों के साथ-साथ इस्लामी बैंकिंग पर आधारित नई फ़िक़्ह ‘अल-फ़िक़्हुल-मिस्रि फ़ी मआइज़े-शरईया, अल-फ़िक़्हुल-माली औराक़ि तिजारिया, क़ानूने-तिजारत वग़ैरा जैसे विषय अपरिहार्य हैं।

वे प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान जो फ़िक़्ह की गहरी समझ रखते हों, फ़िक़्ह में विशेष योग्यता प्राप्त कर चुके हों, वे इस्लामी बैंकिंग का यह विशेष कोर्स कर लें तो बहुत आसानी के साथ वे नई संस्थाओं के मार्गदर्शन का कर्तव्य पूरा कर सकते हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रमों का सम्बन्ध केवल प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों और बैंकरों या अर्थशास्त्रियों से नहीं है, बल्कि एक दृष्टि से पूरे समाज के प्रशिक्षण और तैयारी के लिए लगातार प्रशिक्षण और प्रेरणा अभियान होना चाहिए। मुसलमान उपभोक्ता का रवैया ग़ैर-मुस्लिम उपभोक्ता से अलग बनाने के लिए प्रशिक्षण दरकार है। आजकल की पूरी अर्थव्यवस्था उपभोक्ताओं के रवैये के अध्ययन पर आधारित होती है। बहुत-सी आर्थिक पॉलिसियाँ उपभोक्ताओं के रवैयों के अध्ययन के आधार पर बनाई जाती हैं। अगर मुसलमान उपभोक्ता का रवैया ग़ैर-मुस्लिम उपभोक्ता से भिन्न नहीं है तो फिर इस्लामी अर्थव्यवस्था सफल नहीं हो सकती। इस्लामी अर्थव्यवस्था की सफलता के लिए ज़रूरी है कि मुसलमान उपभोक्ताओं का रवैया ग़ैर-मुस्लिम उपभोक्ताओं के रवैये से भिन्न हो। उपभोक्ता वह है जो हराम चीज़ों की ख़रीदारी नहीं करता। मुसलमान उपभोक्ता वह है जो फ़ुज़ूलख़र्ची नहीं करता। मुसलमान उपभोक्ता वह है जो उदाहरणार्थ अश्लील पत्र-पत्रिकाएँ और किताबें नहीं ख़रीदता। मुसलमान उपभोक्ता के जीवन की आवश्यकताएँ तुलनात्मक रूप से सीमित होंगी। मुसलमान उपभोक्ता धोखाधड़ी नहीं करेगा। ये वे कुछ उदाहरण हैं जिनके द्वारा हम अंदाज़ा कर सकते हैं कि मुसलमान उपभोक्ता का रवैया ग़ैर-मुस्लिम उपभोक्ताओं के रवैये से कैसे अलग होगा।

इस्लामी अर्थव्यवस्था का एक बहुत अहम indicator जिसकी तरफ़ मैं इशारा करके चर्चा समाप्त करता हूँ वह यह है कि इसके नतीजे में सम्बन्धित मुस्लिम राज्य के हर शहरी को कफ़ाफ़ के स्तर के संसाधन उपलब्ध हो जाने चाहिएँ। इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने ‘कफ़ाफ़’ की शब्दावली प्रयुक्त की है। जो पवित्र क़ुरआन की कुछ आयतों और हदीसों पर आधारित है। जिसके अनुसार राज्य और समाज की यह ज़िम्मेदारी है कि हर व्यक्ति को ज़िंदगी की कम-से-कम अनिवार्य अपेक्षाएँ पूरे करने में सहायता दी जाए। यानी हर नागरिक के पास सिर छिपाने को जगह हो, तन ढाँपने को कपड़ा हो, ज़रूरत-भर पेट भरने के लिए रोज़ी उपलब्ध हो। ये और इस तरह की अपरिहार्य आवश्यकताएँ जिनमें से कुछ का उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ, यह राज्य को उपलब्ध करनी चाहिएँ।

‘कफ़ाफ़’ की धारणा विभिन्न कालों में विभिन्न रही है। शरीअत ने ‘कफ़ाफ़’ की कहीं परिभाषा नहीं की कि ‘कफ़ाफ़’ यह है, बल्कि ‘कफ़ाफ़’ से मुराद यह है कि समाज अर्थव्यवस्था और सभ्यता के जिस स्तर पर हो उस स्तर के लिहाज़ से समाज में जो कम-से-कम आर्थिक तक़ाज़े हैं वे पूरे होने चाहिएँ। वे कम-से-कम आर्थिक तक़ाज़े क्या हैं? इसका निर्धारण समाज के हिसाब से किया जाएगा, हर समाज ख़ुद उन कम-से-कम तक़ाज़ों का निर्धारण करेगा। इन तक़ाज़ों को कैसे पूरा किया जाए? यह राज्य अपने संसाधनों के हिसाब से पूरा करेगा। इसका विवरण एक अतिरिक्त अंदाज़ की चीज़ है।

पवित्र क़ुरआन ने एक सार्वजनिक सिद्धान्त दिया है जिससे हम लाभ उठा सकते हैं। “समाई रखनेवाले पर उसकी अपनी हैसियत के अनुसार और तंगदस्त पर उसकी अपनी हैसियत के अनुसार अनिवार्य है— यह अच्छे लोगों पर एक हक़ है।” (क़ुरआन, 2:236) इस आयत से यह सिद्धान्त निकलता है कि इस तरह की ज़िम्मेदारियाँ निश्चित रूप से तय नहीं की जा सकतीं। ये अतिरिक्त चीज़ें हैं जिनका सम्बन्ध हर दौर के हिसाब से भिन्न हो सकता है। आइडियल रवैया यही है कि हर व्यक्ति निजी रूप से अपने व्यक्तिगत जीवन में क़नाअत (सन्तुष्टि) का उसूल अपनाए। लेकिन यह राज्य की ज़िम्मेदारी नहीं है कि लोगों को ज़बरदस्ती क़नाअत करनेवाला बनाए। यह काम तब्लीग़ और तक़रीर करनेवालों का है कि लोगों को क़नाअत के रवैये की नसीहत करें। राज्य की ज़िम्मेदारी यह है कि अपने ज़माने के आर्थिक स्तर और आवश्यकताओं के लिहाज़ से ‘कफ़ाफ़’ की मात्रा और स्तर का निर्धारण करके उसकी उपलब्धता को अपने संसाधनों के अनुसार निश्चित बनाए।

प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान जब जन साधारण का प्रशिक्षण करें तो उनको इसराफ़ (फ़ुज़ूलख़र्ची) से बचने की शिक्षा भी दें। इसराफ़ सिर्फ़ पूँजी ज़्यादा ख़र्च करने का नाम नहीं है। कुछ लोग समझते हैं कि बहुत ज़्यादा पूँजी ख़र्च करके ही फ़ुज़ूलख़र्ची की जा सकती है। वक़्त की बर्बादी को भी फ़ुज़ूलख़र्ची कहते हैं। ग़ैर-ज़रूरी चीज़ों के जमा करने को भी फ़ुज़ूलख़र्ची कहते हैं। ग़रज़ जिस चीज़ की समाज को सकारात्मक रूप से ज़रूरत नहीं है, जो सरगर्मी समाज में किसी सांस्कृतिक, आर्थिक, दीनी, शैक्षिक और नैतिक निर्माण का ज़रिया नहीं बन रही, वह फ़ुज़ूलख़र्ची के दायरे में शामिल है और जन साधारण को उससे बचने की नसीहत करते रहना, प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों की ज़िम्मेदारी है। फ़ुज़ूलख़र्ची को एक नकारात्मक रवैये के तौर पर जन साधारण के मन में बिठाना, यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है।

आज पाकिस्तान में जितने संसाधन बर्बाद हो रहे हैं, उनमें से बहुत-से वे हैं जिनको बर्बाद होने से बचाया जा सकता है। जो संसाधन बर्बाद होने से बचाए जा सकते हैं वे उन लोगों की आवश्यकताएँ पूरी करने में काम दे सकते हैं जिनकी आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो रही हैं। यह भी उपभोक्ता के रवैये का एक महत्वपूर्ण पहलू है। पवित्र क़ुरआन की एक आयत में बहुत संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित ढंग से इसराफ़ के इस रवैये को बताया गया है। ईमानवालों की विशेषताओं का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि ये वे लोग हैं कि जब ख़र्च करते हैं तो न फ़ुज़ूलख़र्ची करते हैं न कंजूसी करते हैं, बल्कि इन दोनों के दरमियान बीच की राह अपनाते हैं। फ़ुज़ूलख़र्ची को आधुनिक अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में इस तरह बयान करना चाहिए कि वह हमारे आर्थिक रवैये का भाग बन सके।

एक महत्वपूर्ण काम जो इस्लामी अर्थव्यवस्था के सिलसिले में करना ज़रूरी है जिसका आरम्भ बड़ी हद तक हो चुका है और कुछ विद्वानों ने अरबी, अंग्रेज़ी और दूसरी भाषाओं में इस विषय पर काम भी किया है। वह इस्लाम के बड़े विद्वानों और प्राचीन अर्थशास्त्रियों के विचारों का एक नए ढंग से आधुनिक संकलन है। यह इसलिए ज़रूरी है कि हममें से बहुत-सों के ज़ेहन में यह ख़याल बैठ गया है कि आर्थिक समस्याओं पर सोचना-समझना सिर्फ़ पश्चिम में शुरू हुआ है। न मुसलमान विद्वानों ने आर्थिक समस्याओं से बहस की, न उन्होंने अर्थव्यवस्था और मालियात की समस्याओं को इस क़ाबिल समझा कि इसको किसी गम्भीर चर्चा का विषय बनाया जाए। यह सोच इसलिए ज़ेहन में बैठ गई है कि इस्लाम के बड़े विद्वानों के लेख अरबी भाषा में हैं। उनकी शैली प्राचीन है। उनके तर्क विशेष ढंग के हैं। उनकी तर्क-शैली आज बहुत-से लोगों को अजनबी मालूम होती है। इसलिए उनके शोधों से बहुत-से लोग अनजान रहते हैं।

यह बात कि न केवल इस्लाम के इतिहास में, बल्कि सम्भवतः मानवता के इतिहास में सार्वजनिक वित्त यानी Public Finance पर पहली किताब इमाम अबू-यूसुफ़ ने लिखी, बहुत-से लोगों की जानकारी में नहीं है। इमाम अबू-यूसुफ़ जो दूसरी शताब्दी हिज्री के अति प्रसिद्ध इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) में से हैं उनकी ‘किताबुल-ख़िराज’ अपने विषय पर पहली किताब है। इस किताब में उन्होंने अर्थशास्त्र सम्बन्धी आदेश बयान करने के साथ-साथ आर्थिक शब्दावलियों के प्रस्ताव भी दिए हैं। आर्थिक विकास और जनकल्याण के बारे में बहुत-सी नई धारणाएँ बयान की हैं। यह किताब चूँकि अब्बासी ख़लीफ़ा हारून अल-रशीद के नाम एक याददाश्त के तौर पर संकलित की गई थी इसलिए उस दौर में होनेवाली कुछ ऐसी बातों की निशानदेही भी इस किताब में की गई है जो इमाम अबू-यूसुफ़ के नज़दीक नहीं होनी चाहिएँ। उनके ख़याल में जहाँ कहीं ज़्यादतियाँ हो रही थीं उनकी निशानदेही की है, उनको समाप्त करने पर ज़ोर दिया है और यह मश्वरा भी दिया है कि मालियात के मामलों से सम्बन्धित जितने कर्मचारी नियुक्त किए जाएँ वे सब विद्वान, दीनदार, सही समझ रखनेवाले और चरित्रवान लोगों पर सम्मिलित हों। इमाम अबू-यूसुफ़ की इस किताब में राज्य की आय के स्रोत, राज्य की ज़िम्मेदारियाँ, राज्य के ख़र्चे और इस्लामी अर्थव्यवस्था के नैतिक पहलुओं पर बहुत विस्तार से चर्चा की गई है।

जिस ज़माने में इमाम अबू-यूसुफ़ यह किताब लिख रहे थे उसी ज़माने में दूसरे कई लोगों ने भी विभिन्न आर्थिक विषयों पर किताबें लिखीं। इमाम अबू-यूसुफ़ की किताब का तो उर्दू और अंग्रेज़ी में अनुवाद मौजूद है। इसलिए बहुत-से लोग इससे परिचित हैं। लेकिन ‘किताबुल-अमवाल’ के नाम से और भी बहुत-सी किताबें दूसरी और तीसरी शताब्दी हिज्री में लिखी गईं जिनमें से इमाम अबू-उबैद की ‘किताबुल-अमवाल’ का अनुवाद भी मौजूद है। अंग्रेज़ी में भी है, उर्दू में भी है। इमाम अबू-उबैद के शिष्य हमीद-बिन-ज़ंजवैह की ‘किताबुल-अमवाल’ भी तीन भागों में है, जो अभी कुछ साल पहले रियाज़ में प्रकाशित हुई है। इस किताब में इमाम हमीद-बिन-ज़ंजवैह ने अपने उस्ताद अबू-उबैद के काम से पूरा लाभ उठाया है और इसमें वृद्धियाँ भी की हैं। ये दोनों किताबें अबू-उबैद की ‘किताबुल-अमवाल’ और उनके शिष्य की संकलित की हुई ‘किताबुल-अमवाल’, ये अपने विषय पर बेहतरीन किताबें समझी गईं। यहाँ तक कि इल्मे-हदीस के पहली पंक्ति के इमाम शैख़ुल-इस्लाम अल्लामा हाफ़िज़-इब्ने-हजर ने लिखा है कि अबू-उबैद की ‘किताबुल-अमवाल’ आर्थिक फ़िक़्ह के बारे में लिखी जानेवाली बेहतरीन किताब है।

मालियात से मुसलमानों की दिलचस्पी का अंदाज़ा इससे हो सकता है कि प्रसिद्ध सूफ़ी बुज़ुर्ग अबू-बक्र बिन-अबिद्दुनिया, जिनका तसव्वुफ़ और ज़ुह्द मशहूर है, वह भी मालियात के मामलों से बहुत दिलचस्पी रखते थे। इमाम अबू-उबैद के शिष्यों में से थे और उन्होंने एक किताब ‘इस्लाहुल-माल’ के नाम लिखी थी जो मालियात से सम्बन्धित शरीअत के नैतिक निर्देशों से बहस करती है। गोया उनके उस्ताद अबू-उबैद ने मालियात के क़ानूनी और फ़िक़्ही पहलुओं पर लिखा और उनके शिष्य अबू-बक्र अबिद्दुनिया ने मालियात के नैतिक पहलुओं पर लिखा। यों ये दोनों किताबें एक-दूसरे को पूरा करती हैं।

फ़ुक़हा के अलावा साहित्यकारों ने भी मालियात और व्यापार, अर्थव्यवस्था और राज्य के विषय को नज़रअंदाज़ नहीं किया। मशहूर साहित्यकार जाहिज़ की किताब व्यापार के बारे में मशहूर है जो ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व रखती है जिससे इस दौर के व्यापारिक तौर-तरीक़ों का ख़ासा अंदाज़ा होता है। यह कुछ मिसालें तो मैंने पुराने विद्वानों की ख़ास तौर पर दी हैं, जिन्होंने इस विषय पर बहुत-सी रचनाएँ संकलित की हैं।

जहाँ तक सार्वजनिक आर्थिक समस्याओं और आर्थिक विचारों का सम्बन्ध है तो हर बड़े फ़क़ीह ने उनसे बहस की है। ख़ास तौर पर इमाम सरख़सी जो अपने ज़माने के पहली पंक्ति के फ़ुक़हा में से थे, अल्लामा अबुल-हसन मावर्दी जो अपने ज़माने के सबसे बड़े शाफ़िई फ़क़ीह थे, उनके अलावा इमाम ग़ज़ाली, अल्लामा इब्ने-तैमिया, इब्ने-क़य्यिम, इमाम शातिबी, इन सब लोगों ने मालियात और अर्थव्यवस्था की समस्याओं पर विचार व्यक्त किए हैं। इतिहासकारों में से अल्लामा इब्ने-ख़लदून और मक़रीज़ी की आर्थिक धारणाएँ बहुत मशहूर हैं जिनपर उर्दू के साथ-साथ अंग्रेज़ी में भी कुछ-न-कुछ सामग्री उपलब्ध है। नैतिकता के अध्यापकों में से अल्लामा जलालुद्दीन दवानी और मौलाना रूम और शाह वलीयुल्लाह का नाम उल्लेखनीय है। इन लोगों ने विस्तार से आर्थिक समस्याओं पर विचार व्यक्त किए हैं।

शाह वलीयुल्लाह मुहद्दिस देहलवी के आर्थिक विचारों पर कई किताबें उर्दू और दूसरी ज़बानों में मौजूद हैं। शाह साहब ने अर्थव्यवस्था की वैचारिक समस्याओं से भी बहस की है, अर्थव्यवस्था के नैतिक पहलुओं को भी अपना विषय बनाया है और अपने ज़माने के आर्थिक समस्याओं और तथ्यों पर पूरे ध्यान से ग़ौर करके कुछ सुधार भी प्रस्तावित किए हैं। यह बात बहुत-से लोगों की जानकारी में है और शाह साहब का हर शिष्य इस बात को जानता है कि शाह साहब के सम्बन्ध अपने ज़माने के शासकों से विभिन्न स्तर पर हमेशा क़ायम रहे। वह ख़ुद भी अपने समय के शासकों को और राजनेताओं को मश्वरे देते रहे और उनके ज़माने के शासक भी उनसे मार्गदर्शन लेने में झिझक और शर्म महसूस नहीं करते थे। मुग़ल शासक मुहम्मद शाह और अहमद शाह ख़ुद कई बार उनके पास हाज़िर हुए और विभिन्न मामलों पर उनसे मार्गदर्शन लिया।

ये कुछ उदाहरण जिनमें बहुत वृद्धि की जा सकती है, यह बात स्पष्ट करने के लिए काफ़ी हैं कि मुस्लिम अर्थशास्त्रियों या इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के आर्थिक विचारों पर अभी तक इस ढंग से काम नहीं हुआ कि आज उनसे लाभान्वित होना अर्थशास्त्रियों के लिए आसान हो जाए। अर्थव्यवस्था की बहुत-सी समस्याएँ ऐसी हैं जो इन अर्थशास्त्रियों के लेखों और बहसों से लाभ उठाने के नतीजे में हल हो सकते हैं। उदाहरणार्थ ख़र्च का नज़रिया यानी consumption का नज़रिया जैसा कि पश्चिम में है इसपर मुस्लिम आर्थिक चिन्तकों को सख़्त आपत्तियाँ हैं। जिस चीज़ को उपभोक्ता की बुद्धिमता यानी consumer's rationalism कहा जाता है, इसपर कुछ समकालीन मुस्लिम उलमा ने गंभीर रूप से आपत्तियाँ की हैं। ख़ुद उपभोक्ता का रवैया या consumer's behaviour कोई नई बात नहीं है। इस्लामी विद्वानों ने भी इससे बहस की है। चूँकि उनके यहाँ शब्दावलियाँ और शीर्षक विभिन्न हैं, इसलिए सरसरी नज़र से देखने पर यह निर्धारण करना मुश्किल हो जाता है कि इस परिचर्चा में वे समस्याएँ भी शामिल हैं जो आज अर्थव्यवस्था की बड़ी समस्याएँ हैं। जिस चीज़ को आजकल utility map कहा जाता है उसका बड़ा महत्व है और उपभोक्ता के रवैये के निर्धारण में इससे बड़ी मदद मिलती है।

पश्चिमवालों ने यह बात भुला दी है कि उपभोक्ता का रवैया मूल रूप से एक नैतिक और सांस्कृतिक समस्या है। यह विशुद्ध रूप से आर्थिक समस्या नहीं है। इसका आर्थिक पहलू बहुत-सीमित और मामूली है। इस्लामी विद्वानों ने इन समस्याओं पर लाभकारी बहसें की हैं। इमाम ग़ज़ाली के यहाँ ये बहसें मिलती हैं। दूसरे लोगों के यहाँ मिलती हैं। ये बहसें अगर आजकल की भाषा में संकलित की जाएँ तो इस्लामी आर्थिक विचारों के नए नमूने सामने आएँगे।

फिर जिसको आर्थिक सफलता (economic success) कहा जाता है वह क्या है? पश्चिम में इसकी धारणा और है। इस्लामी शरीअत के अनुसार इसकी धारणा और है। इंसान के जन्म का उद्देश्य क्या है? क्या उसके वुजूद का उद्देश्य यह है कि वह कमानेवाली मशीन बनकर रह जाए या उसके जन्म का मक़सद किसी और चीज़ की प्राप्ति है और भौतिक संसाधन उसके लिए मात्र माध्यम और स्रोत की हैसियत रखते हैं। इस्लाम की नज़र में धन कमाना अपने-आपमें यानी अपनी ख़ुद कोई प्रशंसनीय बात नहीं है। यह संसाधनों की प्राप्ति का एक ज़रिया है और ये संसाधन किसी और बड़े उच्च नैतिक, इंसानी और आध्यात्मिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने के लिए हैं। यही कैफ़ियत सफलता और विकास की धारणाओं की है। धन, विकास, आर्थिक सफलता, इन सब शीर्षकों के तहत जब इस्लामी चीज़ों को शामिल किया जाएगा तो इन सब शब्दावलियों का एक नया अर्थ निर्धारित होगा और उस नए अर्थ को सामने रखकर इस्लामी अर्थव्यवस्था को एक नए ढंग से संकलित करने में सहायता और मार्गदर्शन मिलेगा।

ये सारे काम अपरिहार्य हैं और एक नए इस्लामी आर्थिक रवैये के गठन के लिए इन सब कोशिशों को एक ही वक़्त में शुरू करना अत्यन्त ज़रूरी है। अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हम सबको आम तौर से और पाकिस्तानवालों को ख़ास तौर से यह करने का जज़बा दे कि हम इस वादे को पूरा करने के सिलसिले में अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी कर सकें जो भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों ने अल्लाह तआला से भी किया था, इंसानियत से भी किया था, मुसलमानों से भी किया था, इतिहास से भी किया था और ख़ुद अपने आपसे भी किया था। अभी तक हम इन सब वादों का उल्लंघन करते रहे हैं। जब तक हम इन सामूहिक वादों को पूरा करने के लिए एक क़ौम की हैसियत से आगे नहीं बढ़ेंगे उस वक़्त तक पाकिस्तान इन्हीं समस्याओं और मुश्किलों का शिकार रहेगा जिनसे वह आज दो-चार है।

पाकिस्तान में इस्लामी अर्थव्यवस्था पर सबसे पहले काम शुरू हुआ था। भारतीय उपमहाद्वीप के विद्वानों ने सबसे पहले इस्लामी अर्थव्यवस्था को अपने शोध का विषय बनाया था। फिर पाकिस्तान बनने के बाद पाकिस्तान का रवैया इस मामले में नेतृत्वपूर्ण रहा। दुनिया के विभिन्न देशों के विद्वानों ने पाकिस्तान के अनुभवों से फ़ायदा उठाया। पाकिस्तान के विद्वानों के लेखों की माँग दुनिया-भर में हुई। इसके बाद पाकिस्तानवाले सुस्त पड़ गए। दुनिया आगे निकल गई, हम पीछे रह गए।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम इस कमी को दूर करें और यह ग़फ़लत जो हमसे आधी शताब्दी के क़रीब-क़रीब हुई है इसके नतीजे में जो नुक़सान हुआ है उसको पूरा करने की कोशिश करें। किसी फ़ारसी शायर ने कहा था जिसका मतलब है कि “एक पल की लापरवाही से सौ साल की मंज़िल खोटी हो सकती है, हमसे तो पचास साल ग़फ़लत होती रही।” अल्लाह करे यह पचास वर्षीय ग़फ़लत पचास हज़ार वर्षीय पिछड़ेपन को जन्म न दे और हमें इस ग़फ़लत को दूर करने का अल्लाह तआला जल्द-से-जल्द सौभाग्य प्रदान करे।

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