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जिहाद की वास्तविकता

मानव-सभ्यता एवं नागरिकता की आधारशिला जिस क़ानून पर स्थित है उसकी सबसे पहली धारा यह है कि मनुष्य की जान और उसका रक्त सम्माननीय है। मनुष्य के नागरिक अधिकारों में सर्वप्रथम अधिकार जीवित रहने का अधिकार है और नागरिक कर्तव्यों में सर्वप्रथम कर्तव्य जीवित रहने देने का कर्तव्य है। संसार के जितने धर्म-विधान और सभ्य विधि-विधान हैं, उन सब में जान के सम्मान का यह नैतिक नियम अवश्य पाया जाता है। जिस क़ानून और धर्म में इसे स्वीकार न किया गया हो, वह न तो सभ्य लोगों का धर्म और क़ानून बन सकता है, न उसके अन्तर्गत कोई मानव-समुदाय शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकता है और न ही उसे कोई उन्नति प्राप्त हो सकती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं, जो मानव जान की इस गरिमा का आदर न करें और अपने स्वार्थ में दूसरे मनुष्य की हत्या करने लगें और धरती पर बिगाड़ फैला कर रख दें ऐसे लोगों को रोकना और दंडित करना ज़रूरी है। ज़मान को बिगाड़ से बचाने के लिए, इस्लाम ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ तलवार उठाने की अनुमति देता है। जिहाद का अर्थ होता है सतत प्रयास करना और अगर ज़रूरी हो तो इसके लिए तलवार भी उठाई जा सकती है।

क़ुरआन की शिक्षाएं

वही ईश्वर ही तो है जिसने तुम्हारे लिए धर्ती का बिछौना बिछाया, आकाश की छत बनाई, पानी बरसाया, पैदावार निकाल कर तुम्हारे लिए रोज़ी जुटाई। तुमको यह सब मालूम है, तो फिर दूसरों को अल्लाह का समकक्ष मत ठहराओ। (सार, 2:22) मानव-जीवन के बहुत से पहलू हैं, जैसे : आध्यात्मिक, नैतिक, भौतिक, सांसारिक आदि। इसी तरह उसके क्षेत्र भी अनेक हैं, जैसे: व्यक्तिगत, दाम्पत्य, पारिवारिक, सामाजिक, सामूहिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि। क़ुरआन, मनुष्य के सम्पूर्ण तथा बहुपक्षीय मार्गदर्शक ईश-ग्रंथ के रूप में इन्सानों और इन्सानी समाज को शिक्षाएं देता है। इनमें से कुछ, यहां प्रस्तुत की जा रही हैं:

पैग़म्बर की शिक्षाएं

अच्छा मनुष्य, अच्छा ख़ानदान, अच्छा समाज और अच्छी व्यवस्था-यह ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें हमेशा से, हर इन्सान पसन्द करता आया है क्योंकि अच्छाई को पसन्द करना मानव-प्रकृति की शाश्वत विशेषता है। पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने इन्सान, ख़ानदान, समाज और व्यवस्था को अच्छा और उत्तम बनाने के लिए जीवन भर प्रयत्न किया और इस काम में बाधा डालने वाले कारकों व तत्वों से लगातार संघर्ष भी किया। इस प्रयत्न में उन शिक्षाओं का बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका और स्थान है जो पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने अपने समय के इन्सानों को, अपने साथियों व अनुयायियों को तथा उनके माध्यम से भविष्य के इन्सानों को दीं। ये शिक्षाएं जीवन के हर पहलू, हर क्षेत्र, अर विभाग से संबंधित हैं। ये हज़ारों की संख्या में हैं जिन्हें बहुत ही सावधानी, निपुणता, और सत्यनिष्ठा के साथ एकत्रित, संकलित व संग्रहित करके ‘हदीसशास्त्र’ के रूप में मानवजाति को उपलब्ध करा दिया गया है। इनमें से कुछ शिक्षाएं (सार/भावार्थ) यहां प्रस्तुत की जा रही हैं:

दाम्पत्य व्यवस्था

इस्लाम का दृष्टिकोण यह है कि दाम्पत्य व्यवस्था परिवार और समाज के सृजन की आधारशिला है। अर्थात् दाम्पत्य-संबंध के अच्छे या बुरे होने पर परिवार और समाज का; यहाँ तक कि सामूहिक व्यवस्था और सभ्यता व संस्कृति का भी; अच्छा या बुरा होना निर्भर करता है। अतः इस्लाम ने इस बुनियाद को मज़बूत बनाने और मज़बूत बनाए रखने पर बहुत ज़ोर दिया है। पति-पत्नी को बुनियादी और प्राथमिक स्तर पर एक-दूसरे से संतोष और सुख प्राप्त होना चाहिए। निकाह (विवाह) के वाद मिलन होते ही, एक-दूसरे के लिए अल्लाह की ओर से प्रेम, सहानुभूति, शुभचिन्ता व सहयोग की भावनाएँ वरदान-स्वरूप प्रदान कर दी जाती हैं (कु़रआन, 30:21) अतः ऐसा कोई कारक बीच में नहीं आना चाहिए जो अल्लाह की ओर से दिए गए इस प्राकृतिक दान को प्रभावित कर दे। अल्लाह कहता है कि पति-पत्नी आपस में एक-दूसरे का लिबास हैं (कु़रआन, 2:187)। अर्थात् वे लिबास ही की तरह एक-दूसरे की शोभा बढ़ाने, एक-दूसरे को शारीरिक सुख पहुँचाने और एक दूसरे के शील (Chastity) की रक्षा करने के लिए हैं। अतः दाम्पत्य जीवन के संबंध में क़दम-क़दम पर क़ुरआन व हदीस में रहनुमाई मिलती है।

इस्लाम: उत्तम समाज का निर्माण

आध्यात्मिकता इन्सान की प्रकृति में रची-बसी है। भौतिकवादी जीवन-प्रणाली के सारे भोग-विलास, ऐश व आराम सिर्फ़ शरीर को सुख देते हैं, आत्मा प्यासी रह जाती है। मानव-प्रकृति यह प्यास बुझाने के लिए व्याकुल रहती है। रहस्यवाद, सूफ़ीवाद, सन्यास, वैराग्य, संसार-त्याग और ब्रह्मचर्य आदि इसी प्यास के बुझाने के रास्ते समझे जाते हैं। लेकिन वह आत्मिक सुकून ही क्या जो दाम्पत्य, पारिवारिक व सामाजिक ज़िम्मेदारियों से भाग कर हासिल किया जाए! वह आध्यात्मिक शांति क्या जो उस सांसारिक जीवन-संघर्ष से फ़रार अख़्तियार करके प्राप्त की जाए जिसकी चुनौतियां और कठिनाइयां मनुष्य की मनुष्यता को निखारती, विकसित करती और समाज के लिए उपयोगी व लाभकारी बनाती हैं।इसके साथ, यह समस्या तो बनी ही रहती है कि कितने लोग अपने सामाजिक उत्तरदायित्व से भाग कर मठों, ख़ानक़ाहों, आश्रमों, गुफ़ाओं और पर्वतों पर ज़िन्दगी गुज़ार सकते हैं? शायद औसतन एक लाख में एक। फिर बाक़ी मानवजाति के लिए आध्यात्मिक प्यास बुझाने का क्या रास्ता है? बल्कि, रास्ता है भी या नहीं? आइए देखें वह इस्लाम क्या कहता है जिसका आह्वान है कि वह ज़िन्दगी के हर क्षेत्र, हर मामले में मार्गदर्शन भी करता है और उत्तम व श्रेष्ठ व्यावहारिक विकल्प भी पेश करता है।

इस्लाम की नैतिक व्यवस्था

मानव के अन्दर नैतिकता की भावना एक स्वाभाविक भावना है जो कुछ गुणों को पसन्द और कुछ दूसरे गुणों को नापसन्द करती है। यह भावना व्यक्तिगत रूप से लोगों में भले ही थोड़ी या अधिक हो किन्तु सामूहिक रूप से सदैव मानव-चेतना ने नैतिकता के कुछ मूल्यों को समान रूप से अच्छाई और कुछ को बुराई की संज्ञा दी है। सत्य, न्याय, वचन-पालन और अमानत को सदा ही मानवीय नैतिक सीमाओं में प्रशंसनीय माना गया है और कभी कोई ऐसा युग नहीं बीता जब झूठ, जु़ल्म, वचन-भंग और ख़ियानत को पसन्द किया गया हो। हमदर्दी, दयाभाव, दानशीलता और उदारता को सदैव सराहा गया तथा स्वार्थपरता, क्रूरता, कंजूसी और संकीर्णता को कभी आदर योग्य स्थान नहीं मिला। इससे मालूम हुआ कि मानवीय नैतिकताएं वास्तव में ऐसी सर्वमान्य वास्तविकताएँ हैं जिन्हें सभी लोग जानते हैं और सदैव जानते चले आ रहे हैं। अच्छाई और बुराई कोई ढकी-छिपी चीज़ें नहीं हैं कि उन्हें कहीं से ढूँढ़कर निकालने की आवश्यकता हो। वे तो मानवता की चिरपरिचित चीज़ें हैं जिनकी चेतना मानव की प्रकृति में समाहित कर दी गई है। यही कारण है कि क़ुरआन अपनी भाषा में नेकी और भलाई को ‘मारूफ़’ (जानी-पहचानी हुई चीज़) और बुराई को ‘मुनकर’ (मानव की प्रकृति जिसका इन्कार करे) के शब्दों से अभिहित करता है।

इस्लाम: शैक्षणिक व्यवस्था

धर्म-विमुख, धर्म-विहीन या धर्म-विरोधी (सेक्युलर) विचारधारा में मात्र पंचेन्द्रियाँ (Five Senses) ही ज्ञान का मूल स्रोत हैं। ऐसे ज्ञान का अभीष्ट ‘मनुष्य के व्यक्तिगत व सामूहिक हित के भौतिक संसाधनों का विकास, उन्नति तथा उत्थान' है। इसमें नैतिकता व आध्यात्मिकता के लिए कोई जगह नहीं होती। जबकि मनुष्य एक भौतिक अस्तित्व होने के साथ-साथ...बल्कि इससे कहीं अधिक...एक आध्यात्मिक व नैतिक अस्तित्व भी है। उसके अस्तित्व का यही पहलू उसे पशुओं से भिन्न व श्रेष्ठ बनाता है। शिक्षा, ज्ञान अर्जित करने की पद्धति, प्रणाली, प्रयोजन का नाम है। इस्लाम का शैक्षणिक दृष्टिकोण, यह है कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो मनुष्य की व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक व सामूहिक आवश्यकताओं के भौतिक तक़ाज़ों को इस तरह पूरा करे कि उसके नैतिक व आध्यात्मिक तक़ाज़ों का हनन, और ह्रास एवं हानि न हो। इस्लाम की मान्यता है कि आध्यात्मिकता, नैतिकता एवं मानवीय मूल्यों को भौतिकता पर प्राथमिकता व वर्चस्व प्राप्त है। इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार यह तभी संभव है जब शिक्षा संबंधी विचारधारा में ईश्वरीय मार्गदर्शन, नियम व सिद्धांत की प्रमुख भूमिका तथा प्राथमिक व अनिवार्य योगदान हो। इस मार्गदर्शन का मूल स्रोत ‘ईशग्रंथ तथा ईशदूत (पैग़म्बर) का व्यावहारिक आदर्श' है।

वुज़ू कैसे करें ?

नमाज़ सबसे महान इबादत है। नमाज़ के माध्यम से, एक व्यक्ति खुद को अपने स्रष्टा और स्वामी के सामने हाज़िर होता है। अल्लाह के सामने हाज़िर होने के लिए कुछ प्रोटोकॉल हैं। वुज़ू सबसे महत्वपूर्ण प्रोटोकॉल है। यह अपने दिल, दिमाग़ और शरीर को शुद्ध, पवित्र और एकाग्र करने का इस्लामी तरीका है। क़ुरआन में स्वयं अल्लाह ने नमाजड के लिए वुज़ू करने का आदेश दिया है :

मुहम्मद (सल्ल॰) के जीवन-आचरण का सन्देश

प्रस्तुत विषय पर अगर तार्किक क्रम के साथ लिखा जाए, तो सबसे पहले हमारे सामने यह सवाल आता है कि एक नबी के जीवन-आचरण का ही सन्देश क्यों? किसी और का सन्देश क्यों नहीं? दूसरे नबियों में से भी सिर्फ़ हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के जीवन-आचरण का सन्देश, दूसरे नबियों और धार्मिक नेताओं के जीवन-आचरण का सन्देश क्यों नहीं? इस प्रश्न पर शुरू ही में विचार करना इसलिए ज़रूरी है कि हमारा मन इस बात पर पूरी तरह संतुष्ट हो जाए कि वास्तव में हम पुराने और नए, हर ज़माने के किसी नेता के जीवन-आचरण से नहीं, बल्कि एक नबी के जीवन आचरण से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं और किसी दूसरे नबी या धार्मिक गुरु के जीवन में नहीं, बल्कि मुहम्मद (सल्ल॰) के जीवन में ही हम को वह सही और पूर्ण मार्गदर्शन मिल सकता है, जिसके हम सच में मुहताज हैं।

ईमान’ का अर्थ

ईमान का अर्थ जानना और मानना है। जो व्यक्ति ईश्वर के एक होने को और उसके वास्तविक गुणों और उसके क़ानून और नियम और उसके दंड और पुरस्कार को जानता हो और दिल से उस पर विश्वास रखता हो उसको ‘मोमिन’ (ईमान रखने वाला) कहते हैं। ईमान का परिणाम यह है कि मनुष्य मुस्लिम अर्थात् अल्लाह का आज्ञाकारी और अनुवर्ती हो जाता है। इस लेख में इस विषय पर बात की गई है कि ईमान का अर्थ क्या है और ईमान लाने से क्या आशय है। इस्लाम के अनुसार एक अल्लाह पर ईमान लाने के साथ किन-किन चीज़ों पर ईमान लाना ज़रूरी है।

हदीस: एक परिचय

इस्लामी परिभाषा में ‘हदीस', पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) के कथनों, कर्मों, कार्यों को कहते हैं। अर्थात् 40 वर्ष की उम्र में ईश्वर की ओर से सन्देष्टा, (पैग़म्बर) नियुक्त किए जाने के समय से, देहावसान तक, आप (सल्ल॰) ने जितनी बातें कीं, जितनी बातें दूसरों को बताईं, जो काम किए उन्हें इस्लाम की शब्दावली में हदीस कहा जाता है। क़ुरआन के साथ-साथ हदीस भी इस्लाम का मुख्य स्रोत है। क़ुरआन में जो नियम लंक्षेप में दिए गए हैं, उनकी व्याख्या और वर्णन हदीसों में हैं। इस लेख में हम देखेंगे कि हदीस क्या हैं, इनका क्या महत्व है और इनके महत्वपूरण संग्रह कौन कौन से हैं।

इस्लाम में इबादत का अर्थ

‘इबादत’ वास्तव में बहुत विस्तृत अर्थ रखने वाला शब्द है। आम तौर से इसे पूजा और उपासना के अर्थ में बोला जाता है। जैसे नमाज़, रोज़ा, हज आदि, निसंदेह ये सब इबादत है, लेकिन ये ही कुल इबादत नहीं हैं, बल्कि इबादत का एक हिस्सा मात्र हैं। शब्द इबादत का मूल है ‘अ’, ‘ब’, ‘द’। इसी से बना शब्द है ‘अब्द’, यानी, ग़ुलाम, दास, बन्दा। बन्दे या दास की अपनी कोई मर्ज़ी नहीं होती, बल्कि उसे अपने स्वामी की मर्ज़ी के अनुसार ही चलना होता है। क़रआन में अल्लाह ने स्पष्ट कहा है कि “हमने इन्सानों और जिन्नों को केवल इसलिए पैदा किया कि वे हमारी इबादत करें।” दास अपने उपास्य और प्रभु के लिए जो कुछ करे वह इबादत है। उसका पूरा जीवन इबादत है, अगर वह ईश्वर के बताए नियमों के अनुसार जीवन बिताए। कोई भी काम करते हुए वह देखे कि इस विषय में ईश्वर का आदेश क्या है। ईश्वर ने जिन चीज़ों का आदेश दिया या आज्ञा दा है उनका पालन करे और जिन चीज़ों से रोका है, उन से दूर रहे तो उसका पूरा जीवन इबादत होगा, चाहे ये सब दुनिया के मामले ही क्यों न हों।

शरीयत क्या है ?

इस्लाम की शब्दावली में ‘शरीअत’ का अर्थ है, धर्मशास्त्र या धर्मविधान। क़ुरआन और हदीस की शिक्षाओं के आधार पर इस्लाम के माननेवालों के लिए जीवन बिताने के जो नियम और सिद्धांत तैयार किए गए हैं, उन्हें ही शरीअत कहते हैं। ‘इबादत’ के तरीक़े, सामाजिक सिद्धांत, आपस के मामलों और सम्बन्धों के क़ानून, हराम और हलाल (वर्जित व अवर्जित), वैध-अवैध की सीमाएँ इत्यादि। शरीअत की दृष्टि से हर इनसान पर चार प्रकार के हक़ होते हैं। एक ईश्वर का हक़; दूसरे: स्वयं उसकी अपनी इन्द्रियों और शरीर का हक़, तीसरेः लोगों का हक़, चैथे: उन चीज़ों का हक़ जिनको ईश्वर ने उसके अधिकार में दिया है ताकि वह उनसे काम ले और फ़ायदा उठाए। ‘शरीअत’ इन सब हक़ों को अलग-अलग बयान करती है और उनको अदा करने के लिए ऐसे तरीक़े निश्चित करती है कि सारे हक़ संतुलन के साथ अदा हों और यथासंभव कोई हक़ मारा न जाए।

इस्लाम का इतिहास

इस्लाम का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना पुराना स्वंय मानवजाति का इतिहास है। आमतौर पर यह समझा जाता है कि मनुष्य का जन्म इस दुनिया में अंधकार की हालत में हुआ और उसने कालांतर में धीरे-धीरे जीने की कला सीखी और ख़ुद को दूसरे जानवरों से अलग कर लिया। इस्लाम इस थ्योरी को नहीं मानता है। इस्लाम के अनुसार मनुष्य को पूरे प्रकाश में और जीवन जीने का मार्गदर्शन देकर दुनिया में भेजा गया है। सब से पहले अल्लाह ने अपने बन्दे और पैग़मबर आदम को शिक्षा और दिशा निर्देश देकर दुनिया में भेजा और साथ ही आदम की पत्नी हव्वा को भी भेजा। इन की संतान से ही दुनिया आबाद होती गई। इस तरह मानवजाति का इतिहास ही इस्लाम का इतिहास है। अज्ञानतावश लोग समझते हैं कि इस्लाम 1400 वर्ष पुराना धर्म है, और इसके ‘प्रवर्तक’ पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) इसके प्रवर्तक (Founder) नहीं, बल्कि इसके आह्वाहक और अंतिम पैग़म्बर हैं, दे उस सिलसिला की अंतिम कड़ी हैं, जो हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से शुरू हुआ था। पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) का काम उसी चिरकालीन (सनातन) धर्म की ओर, जो सत्यधर्म के रूप में आदिकाल से ‘एक’ ही रहा है, लोगों को बुलाने, आमंत्रित करने और स्वीकार करने के आह्वान का था। आपका मिशन, इसी मौलिक मानव धर्म को इसकी पूर्णता के साथ स्थापित कर देना था ताकि मानवता के समक्ष इसका व्यावहारिक नमूना साक्षात् रूप में आ जाए।

हिजाब (परदा) क्या है

इस्लाम एक संपूर्ण जीवन व्यवस्था है। इसमें जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरा जीवन गुज़ारने का तरीक़ा बताया गया है। इस्लाम ने जीवन के सभी क्षेत्रों में मार्गदर्शन किया है, इनमें इबादत, समाज, नैतिकता, अर्थशास्त्र आदि सभी शामिल हैं। इबादत के साथ-साथ हिजाब और पर्दा भी इस्लामी जीवन शैली का अभिन्न अंग है जो महिलाओं की गरिमा, सतीत्व और नारीत्व की सुरक्षा की गारंटी देता है। इस्लाम में पर्दा का विशेष महत्व है। इसमें महिलाओं और पुरुषों दोनों को पूरे वस्त्र पहनने के साथ-साथ शालीनता को भी प्राथमिकता देने का आदेश दिया गया है। यही कारण है कि किसी पुरुष के लिए किसी गैर-महरम महिला की ओर देखना जायज़ नहीं है। पर्दा पुरुषों और महिलाओं के दिलों को पवित्र रखने का सबसे प्रभावी साधन है, इसके साथ शील का अस्तित्व जुड़ा हुआ है, इसका उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करना और समाज को अनैतिकता, अश्लीलता और दुराचार से बचाना है।