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इस्लाम में धन-सम्पत्ति एवं स्वामित्व के आदेश (लेक्चर-5)

इस्लाम में धन-सम्पत्ति एवं स्वामित्व के आदेश (लेक्चर-5)

डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी

अनुवादक गुलज़ार सहराई

आज की चर्चा का शीर्षक है, इस्लाम में धन-सम्पत्ति एवं स्वामित्व के आदेश। धन एवं स्वामित्व की चर्चा इसलिए ज़रूरी है कि अर्थव्यवस्था तथा व्यापार का पूरा दारोमदार धन एवं स्वामित्व की धारणाओं पर है। धन एवं स्वामित्व के बारे में जो धारणाएँ होंगी, उन्हीं के आधार पर क़ानून का गठन किया जाएगा। उन्हीं के आधार पर लेन-देन के तमाम आदेश संकलित होंगे। क़ानून के विस्तृत विवरण उसके अनुसार तय होंगे।

इसलिए सबसे पहले यह ज़रूरी है कि इस्लाम में धन एवं स्वामित्व के आदेशों और धारणाओं के बारे में वे तमाम विस्तृत जानकारियाँ हमारे सामने रहें जो पवित्र क़ुरआन और सुन्नत में बयान हुई हैं और जिनको सामने रखकर इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने उनके विस्तृत आदेश संकलित किए हैं।

यह बात तो पवित्र क़ुरआन का हर विद्यार्थी जानता है कि पवित्र क़ुरआन के अनुसार अल्लाह तआला ही हर चीज़ का वास्तविक स्वामी है। सृष्टि में जो कुछ है उसका रचयिता और वास्तविक स्वामी हर दृष्टि से अल्लाह तआला ही है। यह बात मात्र किसी धार्मिक या पराभौतिक या मात्र किसी वैचारिक अर्थ में नहीं है, बल्कि यह एक क़ानूनी धारणा भी है जिसके बहुत-से महत्वपूर्ण अर्थ हैं। अगर अल्लाह तआला इन तमाम चीज़ों का मालिक है जो इस धरती पर या धरती से बाहर पाई जाती हैं तो फिर इंसान की हैसियत क्या है? इंसान पवित्र क़ुरआन के अनुसार अल्लाह तआला की सारी सृष्टि में उसका उत्तराधिकारी है।

पवित्र क़ुरआन में स्पष्ट रूप से कहा गया है— “उस धन-दौलत में से ख़र्च करो जिसमें अल्लाह तआला ने तुम्हें उत्तराधिकारी बनाया है।” यह उत्तराधिकार आज़माइश के लिए है। इंसान के सम्मान के लिए है। इंसान के पद और प्रतिष्ठा को बयान करने के लिए है कि अल्लाह तआला ने इंसान को वह उच्च स्थान और पद प्रदान किया है कि अपने उत्तराधिकार का दर्जा इंसान को प्रदान किया। अगर इंसान इस धरती पर इस सीमित कार्यक्षेत्र में अल्लाह के प्रतिनिधि की ज़िम्मेदारी अंजाम दे रहा है तो फिर यह ज़िम्मेदारी उन सीमाओं और नियमों के अनुसार होनी चाहिए जो अल्लाह ने बयान किए हैं।

यह उत्तराधिकार और प्रतिनिधित्व की अनिवार्य अपेक्षा है कि प्रतिनिधि की ज़िम्मेदारियाँ उन सीमाओं और नियमों के अनुसार ही पूरी की जाती हैं जो वास्तविक स्वामी ने तय किए हों। अगर आप किसी की जायदाद के मुतवल्ली (प्रबन्धक) हों और उसने अपनी जायदाद का रखवाला आपको बना दिया हो तो आप इस जायदाद को उन्हीं सीमाओं और नियमों के अंदर इस्तेमाल करने के पाबंद हैं जो अस्ल मालिक ने आपके लिए तय की हैं। आपकी हैसियत इस जायदाद के बारे में एक अमानतदार की है, बतौर एक ‘अमीन’ (रखवाले) के आप उसके मुतवल्ली हैं, उसकी सुरक्षा के भी ज़िम्मेदार हैं। आपको उन तमाम शर्तों और सीमाओं की पाबंदी करनी होगी जो अस्ल मालिक ने निर्धारित की हैं। यही गुणवत्ता इस सृष्टि में पाए जानेवाले संसाधनों और धन-दौलत के बारे में इंसान की है।

धन अपने-आपमें कोई अभीष्ट नहीं है। सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरात अपने-आपमें अभीष्ट नहीं होते। न इंसान उनको खा सकता है, न पी सकता है, न गर्मी सर्दी महसूस हो तो उनसे बचाव कर सकता है, न बीमारी की हालत में उनको बतौर दवा के खा सकता है, न बतौर मरहम के लगा सकता है। धन-दौलत मात्र एक ज़रिया हैं, माध्यम हैं जिनके द्वारा इंसान के बहुत-से काम निकलते हैं और बहुत-सी ज़रूरतें पूरी होती हैं। भूख-प्यास में मुबतला हो तो धन-दौलत के द्वारा आदमी खाना ख़रीद सकता है। गर्मी सर्दी का मसला हो तो मौसम का लिबास पैसे से ख़रीद सकता है। घर-बार की ज़रूरत हो तो वह पैसे से प्राप्त होता है। इसलिए यह बात याद रखनी चाहिए कि शरीअत की नज़र में धन अपने-आपमें कोई अभीष्ट नहीं है, बल्कि बहुत-से उद्धेश्यों की प्राप्ति का मात्र एक ज़रिया और माध्यम है। जिस तरह शेष तमाम चीज़ों का पैदा करनेवाला और मालिक अल्लाह तआला है उसी तरह इन हीरे-जवाहरात के भंडारों का मालिक भी अल्लाह है जो अल्लाह ने धरती में सुरक्षित किए हुए हैं।

चूँकि अल्लाह ने इंसान को इजाज़त दी है कि वह अल्लाह की शरीअत और नियमों के अनुसार धन-दौलत को प्राप्त करे। इसलिए धन-दौलत की प्राप्ति के वही साधन जायज़ होंगे जो अल्लाह की शरीअत ने बयान किए हैं। अगर शरीअत द्वारा स्वीकृति प्राप्त संसाधनों और तरीक़ों से हटकर धन-दौलत को प्राप्त किया जाएगा तो ऐसा करना नाजायज़ होगा, शरीअत की नज़र में ना-पसंदीदा होगा। जिस तरह धन-दौलत की प्राप्ति जायज़ तरीक़े से होनी चाहिए, शरीअत के अनुसार होनी चाहिए, उसी तरह धन-दौलत का इस्तेमाल भी शरीअत की सीमाओं के अनुसार और जायज़ तरीक़े से होना चाहिए। दूसरे शब्दों में धन की आय-व्यय के दोनों रास्ते, आने का रास्ता और जाने का रास्ता, दोनों जायज़ होने चाहिएँ, और शरीअत के अनुसार होने चाहिएँ।

धन-दौलत के बारे में यह बात पहले भी कही जा चुकी है कि अल्लाह तआला की शरीअत का मंशा यह है कि धन-दौलत समाज के सभी वर्गों में फैले, किसी एक वर्ग तक सीमित न हो। किसी एक वर्ग का इसपर आधिपत्य न हो। शरीअत ने बहुत-से आदेश इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए दिए हैं। अत: हर वह कार्य-प्रणाली, हर वह नीति, हर वह क़ानून, हर वह फ़ैसला शरीअत के अनुसार नहीं होगा, बल्कि शरीअत से टकराता हुआ होगा जिसका परिणाम धन-दौलत के संकेन्द्रण के रूप में निकलता हो।

अल्लाह तआला ने धन-दौलत का प्रेम इंसानों के दिल में रख दिया है। यह एक स्वाभाविक

भावना या प्राकृतिक तक़ाज़ा है, शरीअत इसको ख़त्म नहीं करना चाहती। जो तक़ाज़े अल्लाह तआला ने इंसान के अन्दर रखे हैं वे भौतिक हों, शारीरिक हों, पाशविक हों, धन-दौलत के तक़ाज़े से सम्बन्धित हों, वे सब-के-सब अल्लाह तआला की ‘दैन’ हैं। उनको सिरे से ख़त्म कर देने या बिलकुल हटा देने का अल्लाह ने आदेश नहीं दिया। अगर ये तक़ाज़े शरीअत और नैतिकता की सीमाओं के अंदर हैं तो बहुत लाभकारी और अत्यन्त सकारात्मक नेमतें हैं। लेकिन अगर इंसान अपने भौतिक उत्प्रेरकों, वासनाओं और निजी हित की वजह से उन्हीं को सब कुछ समझ ले और उन चीज़ों की मुहब्बत को दूसरे अधिक महत्वपूर्ण उद्धेश्यों पर हावी कर दे तो यह शरीअत की नज़र में ना-पसंदीदा है।

पवित्र क़ुरआन ने कई जगह स्पष्ट रूप से यह कहा है कि इंसान के दिल में माल की मुहब्बत बहुत तीव्र है। “इंसान माल की मुहब्बत में बहुत शदीद है।” (क़ुरआन, 100:8) एक और जगह इरशाद हुआ है कि अल्लाह तआला ने जितनी चाहत की चीज़ें हैं वे सब इंसानों के लिए सुसज्जित कर दी हैं। इन चाहत की चीज़ों को इंसानों के लिए ख़ूबसूरत अंदाज़ में तैयार कर दिया गया है जिनका विस्तृत विवरण पवित्र क़ुरआन में मौजूद है। हर इंसान उन ‘शहवात’ (चाहत की चीज़ों) को प्राप्त करना चाहता है, उनको प्राप्त करने में कोई हरज भी नहीं है अगर उनको शरीअत की सीमाओं के अंदर रह कर प्राप्त किया जाए, जायज़ तरीक़े से प्राप्त किया जाए, जायज़ तरीक़े से उनको प्रयोग किया जाए, जायज़ सीमाओं के अंदर रह कर उनको इस्तेमाल किया जाए। ये सब चीज़ें वे हैं जो ‘मताए-दुनिया’ (भौतिक संसाधन) कहलाती हैं। दुनिया के अस्थायी आनन्द का सामान कहलाती हैं। दुनिया के इस अस्थायी आनन्द को छोड़ने का या नज़र-अंदाज़ कर देने का अल्लाह की शरीअत ने आदेश नहीं दिया। अल्लाह की शरीअत ने तो इन सब चीज़ों को ख़ुद इंसान के फ़ायदे के लिए पैदा किया है। “ज़मीन की सारी चीज़ें तुम्हारे लिए पैदा कीं।” (क़ुरआन, 2:29) अत: जो चीज़ इंसान के फ़ायदे के लिए पैदा की गई हो, इंसान की ख़ातिर पैदा की गई हो, इंसान अगर उसको छोड़ दे तो यह अल्लाह की नियति और इसकी असीमित तत्वदर्शिता के ख़िलाफ़ है।

इसी लिए कहा गया, “इस दुनिया में अपना हिस्सा न भूल।” (क़ुरआन, 28:77) इस संसार में भी तुम्हारा हिस्सा है, जो सीमित है, जो शरीअत की सीमाओं के अनुसार प्राप्त किया जाना चाहिए, उसको प्राप्त करना मत भूलो। अल्लाह तआला ने जो दुआ अपने नेक बंदों को सिखाई है, जो आम तौर से नमाज़ के आख़िरी क़ादे (बैठक) में मुसलमान पढ़ते हैं वह यह है कि “ऐ अल्लाह! आख़िरत की अच्छाइयाँ भी प्रदान कर और दुनिया की अच्छाइयाँ भी प्रदान कर।” दुनिया में जो-जो अच्छाइयाँ हैं वे भौतिक अच्छाइयाँ हों, नैतिक हों, आध्यात्मिक हों, उन सबकी दुआ अल्लाह तआला से हर नमाज़ में की जाती है। बहुत-से सहाबा किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने, ताबिईन और मुफ़स्सिरीने-क़ुरआन (क़ुरआन के टीकाकारों) ने अरबी शब्द ‘ह-स-न’ की परिभाषा की है कि ‘ह-स-न’ से क्या अभिप्रेत है। ‘ह-स-न’ का अर्थ किसी ख़ास चीज़ में सीमित नहीं है। अल्लाह तआला ने शब्द को आम रखा है तो इसका अर्थ भी आम है। क़ुरआन के टीकाकारों ने उदाहरण के रूप में विभिन्न ‘हसनात’ (भलाइयों) का उल्लेख किया है। जिन ‘हसनात’ की नमाज़ में दुआ की जाती है वे इन उदाहरणों पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि वे सब अच्छाइयाँ जो इंसान को दरकार हैं वे सब बतौर ‘हसनात’ इस दुआ में शामिल हैं।

धन-दौलत को अल्लाह तआला ने ख़ैर भी कहा है फ़ज़्ल भी कहा है, मताअ (पूँजी) भी कहा है, ‘ह-स-न’ भी कहा है। इससे अंदाज़ा हो सकता है कि धन-दौलत का महत्व शरीअत की नज़र में क्या है। फिर यह धन-दौलत पूरी ज़िंदगी के लिए स्थायित्व की हैसियत रखता है। जिस तरह व्यक्ति की ज़िंदगी का दारोमदार स्वस्थ रक्त पर है, उसी तरह सामूहिक और सामाजिक ज़िंदगी का दारोमदार धन-दौलत की प्राप्ति पर है। माल ही उन तमाम शरई ज़िम्मेदारियों का आधार है जिनका सम्बन्ध आर्थिक मामलों से है। इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने लिखा है कि अल्लाह तआला ने बहुत-सी शरई ज़िम्मेदारियाँ इंसान पर डाली हैं, उनमें से कुछ शारीरिक हैं जैसे नमाज़, कुछ आर्थिक हैं जैसे ज़कात, कुछ में दोनों पहलू हैं जैसे हज। इसलिए शरीअत के इन तमाम आर्थिक आदेशों पर कार्यान्वयन उसी वक़्त हो सकता है जब धन मौजूद हो। ज़कात इंसान उसी वक़्त अदा करेगा जब उसके पास निसाब के बराबर धन मौजूद हो। सदक़ए-फ़ित्र इंसान उसी वक़्त अदा करेगा जब उसकी शर्तें मौजूद हूँ। ज़रूरी ख़र्चे, कफ़्फ़ारात (प्रायश्चित), यह सब धन होने से जुड़े हैं। सदक़ाते-वाजिबा (वे सदक़ात और ज़कात जिनका अदा करना अनिवार्य है) के मामले में इंसान इस बात का पाबंद है कि अपनी सतह और अपने स्तर के अनुसार अपने परिजनों को ख़र्च उपलब्ध करे। “जहाँ और जिस तरह तुम रहते हो उसी स्तर पर अपनी पत्नियों को रखो।” (क़ुरआन, 65:6) “अगर किसी को अल्लाह ने कुशादगी (समाई) दी हो तो वह कुशादगी के अनुसार ख़र्च करे।” (क़ुरआन, 65:7) “जो अल्लाह ने उसको दिया है उसमें से ख़र्च करे।” (क़ुरआन, 65:7) इसलिए कि अल्लाह तआला किसी पर उसकी सामर्थ्य से अधिक ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं डालता (क़ुरआन, 2:286) अल्लाह तआला जिस व्यक्ति को जो धन-दौलत और संसाधन प्रदान करता है उसके अनुसार ज़िम्मेदारी भी डालता है। यह नहीं होता कि संसाधन अल्लाह तआला प्रदान न करे, ज़िम्मेदारी ज़्यादा डाल दे। यह अल्लाह तआला के न्याय, कृपा और दया के ख़िलाफ़ है।

माल या धन से क्या मुराद है? माल में क्या-क्या चीज़ें शामिल हैं? माल की कितनी क़िस्में हैं? ये सवाल फ़िक़्ह और क़ानून के महत्वपूर्ण सवाल हैं। माल की परिभाषा में इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने बहुत-सी बहसें की हैं। माल को स्पष्ट और उसकी परिभाषा करते हुए इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने विशुद्ध क़ानूनी अंदाज़ की परिभाषा भी की है। सामाजिक अंदाज़ की परिभाषा भी की है, नैतिकता के दृष्टिकोण से भी माल को देखा है। अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से भी माल को स्पष्ट करने की कोशिश की है।

माल की इन तमाम परिभाषाओं में शब्द ‘माल’ की शाब्दिक व्याख्या को इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने आम तौर से नज़र-अंदाज़ नहीं किया। ‘माल’ का शब्द अरबी भाषा के प्रचलित शब्द ‘मैल’ से निकाला है। माल, यमील का अर्थ है माइल (प्रवृत्त) होना मेल रखना। उदाहरणार्थ किसी व्यक्ति का निजी ‘मैलान’ (प्रवृत्ति) किसी चीज़ की ओर हो तो इसको शाब्दिक दृष्टि से ‘माल’ कहा जा सकता है। जिस चीज़ की ओर सबसे ज़्यादा ‘मैलान’ हो वह ‘माल’ ही होता है। इसलिए माल का शब्द मैलान के शब्द से निकला है। हर वह चीज़ जिसकी ओर इंसान स्वाभाविक रूप से झुकाव रखता हो, उससे जायज़ रूप से फ़ायदा उठाया जा सकता हो, आम हालात में वह चीज़ इंसान के लिए जायज़ लाभ का ज़रिया और स्रोत हो, उसको ‘माल’ कहा जाता है। इमाम शातबी ने लिखा है कि माल के माल होने का एक प्रतीक यह है कि बाज़ार में उसकी कोई न कोई क़ीमत हो। जिस क़ीमत में वह बिक जाता हो या उसको ख़रीदा जा सकता हो। चाहे वह क़ीमत कितनी ही कम हो, लेकिन अगर कोई व्यक्ति उसको नष्ट कर दे तो उसपर इसका जुर्माना डाला जाए। आजकल अर्थशास्त्री ज़र (माल) की जो परिभाषा करते हैं उसमें उसके store of value होने का भी उल्लेख करते हैं कि उसमें यह प्रतिभा पाई जाती हो कि उसकी मालियत को ज़रूरत के वक़्त तक के लिए सुरक्षित रखा जा सकता हो। यह धारणा इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के यहाँ मौजूद है। इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने लिखा है। ये अल्लामा इब्ने-आबिदीन के अलफ़ाज़ हैं कि— “माल में वे तमाम चीज़ें शामिल हैं जिनकी ओर इंसान स्वाभाविक रूप से मैलान (झुकाव) रखता हो और जिनको ज़रूरत के वक़्त के लिए ज़ख़ीरा करके रखा जा सके।” जब किसी चीज़ को बहुत-से लोग या कुछ लोग माल समझने लगें और माल समझकर उसको प्राप्त करने का संघर्ष करें, उसके द्वारा सम्पन्नता प्राप्त करना चाहें, तो उसकी मालियत यानी माल होना साबित हो जाता है। उसका माल होना स्पष्ट हो जाता है।

माल की क़ानूनी परिभाषा के बारे में हनफ़ी फ़ुक़हा और दूसरे फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के दरमियान थोड़ा-सा अन्तर रहा है। ग़ैर-हनफ़ी फ़ुक़हा, शाफ़िई, मालिकी और हंबली और दूसरे अनेक फुक़हा के नज़दीक माल से मुराद हर वह चीज़ है जिसकी कोई भौतिक क़ीमत आम लोगों के दरमियान समझी जाती हो और शरई तौर पर उससे लाभ उठाना जायज़ हो, चाहे ख़ुद उसका अपना वुजूद भौतिक रूप से अलग से निर्धारित हो या न हो। चुनाँचे लाभ यानी किसी चीज़ के लाभ या केवल अधिकार जैसे लिखने का अधिकार, आविष्कार का अधिकार आदि। ये तमाम फुक़हा के नज़दीक माल हैं, इसलिए कि उनके नज़दीक उनकी एक भौतिक क़ीमत है। इस भौतिक क़ीमत को किसी दूसरे माल के मुआवज़े में एक के स्वामित्व से दूसरे के स्वामित्व में स्थानांतरित किया जा सकता है।

इसके मुक़ाबले में हनफ़ी फ़ुक़हा का कहना है कि माल वही हो सकता है जो अपना ख़ुद भौतिक अस्तित्व भी रखता हो। मात्र कोई अकेली चीज़ न हो। इसलिए हनफ़ी फ़ुक़हा के नज़दीक पारम्परिक रूप से लाभ और अधिकार को माल नहीं समझा जाता था। कोई व्यक्ति अपने अधिकार को बेच नहीं सकता, इसलिए कि अधिकार कोई ऐसी ठोस यानी tangible चीज़ नहीं थे, जिसका स्वामित्व और क़ब्ज़ा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित किया जा सके। यही वजह है कि आपने देखा होगा कि भारतीय उपमहाद्वीप के अनगिनत विद्वान ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं का कभी भी कोई लेखनाधिकार वुसूल नहीं किया। हालाँकि ऐसे-ऐसे लोग भारतीय उपमहाद्वीप में हुए हैं जिनकी रचनाओं की संख्या सैंकड़ों में है। उनमें ऐसे लेखक भी हैं कि जिनकी रचनाएँ उर्दू भाषा की अति लोकप्रिय रचनाओं में से हैं, जिनके शायद हज़ारों संस्करण प्रकाशित हुए हैं, लेकिन उन्होंने एक पैसा भी कभी लेखनाधिकार के रूप में वुसूल नहीं किया। इसलिए कि वे हनफ़ी मसलक (धार्मिक दृष्टिकोण) के अनुसार अधिकार और लाभ को माल नहीं समझते थे। इसलिए उनके क्रय-विक्रय को भी जायज़ नहीं समझते थे।

लेकिन आजकल फ़ुक़हा की आम तौर से प्रवृत्ति यही है कि बहुमत की राय को अपनाया जाए और लाभ और अधिकार को भी माल समझा जाए। इसलिए कि आजकल अधिकार के इतने प्रकार प्रचलित हो गए हैं और उनका क्रय-विक्रय इस तरह व्यापक स्तर पर हो रहा है कि उसको समाप्त करना बहुत मुश्किल भी है और अगर समाप्त कर भी दिया जाए तो उसके नतीजे में कुछ ऐसी समस्याएँ पैदा होंगी जिनका समाधान बहुत कठिन साबित होगा। इसलिए आजकल के विद्वानों ने आम तौर से ग़ैर-हनफ़ी उलमा की राय को ही को अपना लिया है। चुनाँचे कॉपीराइट और इस तरह के जो दूसरे अधिकार हैं, अब मुस्लिम जगत् में हर जगह उनको माल समझा जाने लगा है। जितनी भी अन्तर्राष्ट्रीय इस्लामी संस्थाएँ हैं, वे ‘मजमउल-फ़िक़्ह अल-इस्लामी’ हो या सामूहिक फ़ैसले की दूसरी संस्थाएँ हों, इन सबकी प्रवृत्ति और फ़ैसला यही है कि लाभ को भी माल समझा जाए और उनका क्रय-विक्रय जायज़ समझा जाए। चुनाँचे हर वह चीज़ जिससे फ़ायदा उठाना शरीअत की नज़र में जायज़ हो वह माल है। यह परिभाषा शेष फुक़हा की, विशेष रूप से हंबली फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) की बनाई हुई है। हनफ़ी उलमा से जितनी परिभाषाएँ उद्धृत हुई हैं, इमाम मुहम्मद से, अल्लामा इब्ने-आबिदीन से उन सबकी परिभाषाओं में भौतिक वस्तुओं पर ज़ोर दिया गया है और उनको बतौर मिसाल माल की परिभाषा में शामिल किया गया है। उदाहरणार्थ सामान व्यापार, नक़द धन और हीरे-जवाहरात, ज़मीन, जायदाद, सोना चाँदी, गेहूँ, अनाज, कपड़ा, ये वे मिसालें हैं जो हनफ़ी इमामों (महाविद्वानों) ने माल की परिभाषा में बयान की हैं। शरीअत ने माल के बारे में बहुत-से आदेश दिए हैं। ये आदेश क़ानूनी प्रकार के भी हैं और नैतिक प्रकार के भी हैं। कुछ आदेश ऐसे हैं कि उनका एक पहलू या एक सतह ऐसी है जिसका पालन करना और जिसे लागू करना क़ानूनी रूप से अनिवार्य है। दूसरा पहलू या दूसरी सतह नैतिक रूप से इंसानों की ज़िम्मेदारी है कि उसपर कार्यान्वयन करें। उदाहरणार्थ शरीअत ने आदेश दिया है कि माल की सुरक्षा करो, माल को बर्बाद न करो। एक हदीस है जिसमें अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया, “अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए जो चीज़ें नापसन्द की हैं उनमें से माल को बर्बाद करना भी है।” सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम दोनों में यह हदीस आई है।

माल को बर्बाद करने की बहुत-से शक्लें हो सकती हैं। कभी-कभी इंसान संसाधनों की अधिकता और धन-दौलत की बहुतायत की वजह से माल को बर्बाद कर देता है और उसको एहसास नहीं होता। उदाहरणार्थ कुछ लोग पुराने कपड़े नष्ट कर देते हैं, बचा हुआ खाना फेंक देते हैं, जो वस्तुएँ ज़रूरत से अतिरिक्त हों उनको नज़र-अंदाज़ कर के फेंक देते हैं। यह सब माल के बर्बाद करने की विभिन्न शक्लें हैं। अगर कोई चीज़ आपके इस्तेमाल में नहीं है तो आप उसे किसी ऐसे व्यक्ति को दे दें जो ज़रूरतमंद हो। दुनिया में ज़रूरतमंदों की कमी नहीं है। यह मात्र ध्यान रखने की बात है।

दूसरी ओर शरीअत ने माल की सुरक्षा का आदेश दिया है, बल्कि माल की सुरक्षा को तमाम इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने सर्वसहमति से शरीअत के पाँच मूल उद्धेश्यों में से एक क़रार दिया है। आप अपने प्रबन्धन के अधीन और इस्तेमाल में रहनेवाले माल की सुरक्षा करने के इसलिए भी पाबंद हैं कि आप उसके रखवाले हैं। आप अस्ल मालिक के उत्तराधिकारी हैं। अस्ल मालिक अल्लाह तआला है, और आप उसके प्रतिनिधि हैं। अगर कोई व्यक्ति आपको अपनी जायदाद का मुतवल्ली (प्रबन्धनक) नियुक्त कर दे और आप उसकी सुरक्षा न करें तो आपको एक नालायक़ मुतवल्ली और एक अयोग्य प्रबन्धक क़रार दिया जाएगा और आपको जायदाद के प्रबन्धन के पद से अलग कर दिया जाएगा। इसलिए माल की सुरक्षा भी ज़रूरी है और माल को बर्बाद होने से बचाना भी ज़रूरी है। बर्बाद होने से बचाने की एक शक्ल तो यह है कि इंसान अपने माल को बर्बाद होने से बचाए, यह तो सभी लोग करते हैं। एक न एक सतह पर हर व्यक्ति करता है। लेकिन दूसरे के माल की सुरक्षा भी अपनी ज़िम्मेदारी समझी जाए, इसपर भी शरीअत ने बहुत ज़ोर दिया है। जिस तरह हर इंसान की इज़्ज़त महत्वपूर्ण है, उसका माल भी सम्मान योग्य है। जिस तरह हर इंसान की इज़्ज़त पवित्र है, उसकी जायज़ मिल्कियत भी पवित्र है और उन सबका सम्मान हर बुद्धि एवं विवेक रखनेवाले वयस्क इंसान की ज़िम्मेदारी है। यहाँ तक कि अगर कोई व्यक्ति अपने माल की सुरक्षा करते हुए जान दे बैठे तो उसको शहीद का दर्जा दिया जाएगा। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया— “जो व्यक्ति अपने माल की सुरक्षा करते हुए क़त्ल हो जाए उसका दर्जा शहीद का है।” इससे अंदाज़ा होता है कि शरीअत ने माल को कितना महत्व दिया है।

माल की सुरक्षा का एक तरीक़ा यह भी है कि इसकी देख-भाल रखी जाए। उसमें पूँजी निवेश किया जाए, उसमें वृद्धि की कोशिश की जाए। मैं यह हदीस कई बार बयान कर चुका हूँ जिसमें अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि “अगर किसी व्यक्ति के पास ज़मीन हो तो या तो ख़ुद उसको आबाद करे या अपने किसी भाई को दे दे, जो उसको आबाद करने में दिलचस्पी रखता हो।” एक और हदीस में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि अगर कोई व्यक्ति किसी यतीम के माल का मुतवल्ली (प्रबन्धक) बन जाए तो उस माल को व्यापार में लगा देना चाहिए। इसलिए कि अगर उसको ख़ाली छोड़ दिया तो हर वर्ष जब ज़कात अदा करनी पड़ेगी तो उसमें ढाई प्रतिशत कमी आती जाएगी और जब तक यह बच्चा बड़ा होगा, उसके माल का काफ़ी बड़ा हिस्सा ज़कात में निकल चुका होगा। उदाहरणार्थ बच्चा अगर एक वर्ष का है तो जब तक वह पंद्रह वर्ष का होगा तो ढाई प्रतिशत के हिसाब से देखें कितना हिस्सा माल का शायद सैंतीस प्रतिशत कम हो जाएगा। जब उसका माल उसको मिलेगा तो औने-पौने मिलेगा। इसलिए बेहतर यह है कि उसको व्यापार में लगा दिया जाए। व्यापार में लगाने से माल में बढ़ोतरी भी होगी, बरकत भी होगी और पूरा समाज इस माल से लाभान्वित होगा।

इस निर्देश से यह भी अंदाज़ा होता है कि शरीअत की नज़र में व्यापार और पूँजी निवेश ख़ुद एक पसंदीदा चीज़ है। शरीअत की नज़र में हर वह गतिविधि पसंदीदा है जिससे व्यापार और आर्थिक गतिविधि को आगे बढ़ने की ताक़त मिले, जिससे आर्थिक गतिविधि में बढ़ोतरी हो।

माल की सुरक्षा का एक सूचक यह भी है कि शरीअत ने माल के इस्तेमाल पर कुछ सीमाएँ और पाबन्दियाँ लगाई हैं। उदाहरणार्थ अगर कोई व्यक्ति मंदबुद्धि हो, बहुत बेवक़ूफ़ हो तो उस वक़्त तक उसका माल उसको न दिया जाए जब तक उसमें समझ-बूझ पैदा न हो जाए। यह आदेश सीधे तौर से पवित्र क़ुरआन में आया है, “बेवक़ूफ़ और कमअक़्ल लोगों के हाथ में उनका माल न दो, जब तक तुम यह महसूस न कर लो कि उनमें समझ-बूझ पैदा हो गई है।” (क़ुरआन, 4:5) “जब तुम यह महसूस कर लो कि उनमें समझ-बूझ पैदा हो गई है फिर उनका माल उनके हवाले कर दो।” (क़ुरआन, 4:6) मान लीजिए कि एक लखपति बाप का इंतिक़ाल हो गया है। उसके वारिस छोटे-छोटे बेटे हैं जो बारह-बारह, तेरह-तेरह वर्ष की उम्र के हैं, अभी मामलों को समझते नहीं हैं। वह पूरी जायदाद उनके हाथों में आएगी तो कुछ वर्ष में, बल्कि कुछ महीनों में उड़ाकर बराबर कर देंगे। माल का ग़लत इस्तेमाल करेंगे।

इसलिए समाज को यह निर्देश है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि ऐसे बेअक़्ल और अनुभवहीन लोगों के हाथ में दौलत न चली जाए। अगर किसी यतीम के वली (संरक्षक) मौजूद हैं, उदाहरणार्थ चाचा ज़िंदा है या दादा मौजूद है तो यह आदेश उनके लिए है कि वे इस माल की सुरक्षा रखें और जब तक उनके यतीम पोते या भतीजे समझदार न हो जाएँ, उनमें समझ-बूझ पैदा न हो जाए उस वक़्त तक उनका माल उनके हवाले न करें। अगर किसी व्यक्ति का कोई क़रीबी संरक्षक नहीं है तो फिर यह निर्देश राज्य को है। अदालत की ज़िम्मेदारी है कि वह इस बात का प्रबन्ध करे कि बच्चों और बेसहारा लोगों के माल और जायदाद की सुरक्षा हो। इस्लामी क़ानून के अनुसार क़ाज़ी (न्यायाधीश) अपने इलाक़े की तमाम विधवाओं, अनाथों और बेसहारा लोगों का रखवाला है। हर उस यतीम (अनाथ) का वली (संरक्षक) है जिसका कोई वली न हो। हर उस विधवा का रखवाला है जिसका कोई रखवाला न हो। हर उस बेसहारा का सहारा है जिसका कोई सहारा न हो। यह क़ाज़ी की ज़िम्मेदारियाँ हैं, इस्लामी शरीअत के अनुसार ये क़ाज़ी के फ़राइज़ (कर्तव्य) हैं। तमाम फ़ुक़हा ने इनको बयान किया है। एक प्रसिद्ध हदीस है जिसमें नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया था, “जिसका कोई वली न हो तो हुकूमत उसकी वली होगी।” सरकार की ओर से ये ज़िम्मेदारियाँ क़ाज़ी और अदालतें अंजाम देंगी। इससे यह अंदाज़ा किया जा सकता है कि माल की सुरक्षा के बारे में शरीअत कितना ख़याल रखती है और किस तरह उसकी सुरक्षा और वृद्धि में दिलचस्पी रखती है।

माल की प्रतिष्ठा की एक सतह से तो हम सब परिचित हैं कि शरीअत ने हर व्यक्ति का माल प्रतिष्ठित कर दिया है, मेरा माल सम्मान योग्य है आपके लिए, आपका माल सम्मान योग्य है मेरे लिए। मैं आपके माल पर बुरी नज़र न रखूँ, आप मेरे माल पर बुरी नज़र न रखें। इसकी एक सतह तो नैतिक और सामाजिक है। जो नैतिकता और प्रशिक्षण के द्वारा प्राप्त की जाएगी। शिक्षा और प्रशिक्षण, सामाजिक वातावरण और नैतिकता तथा चरित्र के द्वारा यह स्वभाव पैदा किया जाना चाहिए कि हर व्यक्ति दूसरे की चीज़ का सम्मान करे और किसी दूसरे की चीज़ को लालच की नज़र से न देखे।

लेकिन इसकी एक सतह क़ानूनी भी है। राज्य की ज़िम्मेदारी है कि क़ानून बनाकर इस बात को निश्चित बनाए कि हर व्यक्ति का माल सुरक्षित रहे। अदालतें और क़ानून लागू करनेवाली संस्थाएँ इस बात को निश्चित बनाएँ कि वे अपनी ज़िम्मेदारी को प्रभावकारी तरीक़े से अंजाम देंगी और लोगों के माल, जायदाद और सम्पत्तियों की सुरक्षा की जाएगी। अल्लामा इब्ने-आबिदीन जो बाद के फुक़हा में पहली पंक्ति के फ़क़ीह हैं, उन्होंने इस धारणा को एक क़ानूनी नियम के अंदाज़ में संकलित किया है। उन्होंने कहा है कि “किसी भी व्यक्ति के लिए यह जायज़ नहीं है कि किसी दूसरे का माल बिना किसी शरई कारण के ले ले।” शरई कारण से मुराद वे तमाम कारण हैं जो दूसरे के माल की प्राप्ति को जायज़ क़रार देते हैं। जायज़ व्यापार, क्रय-विक्रय, हिबा, हदिया, विरासत। यह वे तरीक़े हैं जिनके द्वारा दूसरे का माल जायज़ रूप से इंसान को हस्तांतरित होता है।

चूँकि माल की सही धारणा और सही वितरण पर शरीअत के बहुत-से आदेशों का दारोमदार है। इसलिए इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने माल के विस्तृत आदेश संकलित किए हैं और ज़रूरी प्रकार बयान किए हैं। माल के बारे में यह मैं पहले बता चुका हूँ कि माल से मुराद वह है जिससे फ़ायदा उठाना जायज़ हो, जिसको आम लोग माल समझते हों और बतौर माल के उसकी प्राप्ति में दिलचस्पी रखते हों। इसलिए वे तमाम चीज़ें चर्चा से ख़ारिज हो जाएँगी और माल की परिभाषा में शामिल नहीं समझी जाएँगी जिनके द्वारा लोग सम्पन्नता प्राप्त नहीं करते। उदाहरणार्थ घास की बहुत बड़ी मिक़दार हो तो वह माल है। लेकिन अगर एक तिनका हो तो वह माल नहीं है। न कोई व्यक्ति उसको प्राप्त करना चाहता है, न उसको ख़रीदने के लिए तैयार है, न एक तिनके से आम हालात में कोई काम निकलता है। खजूर की अगर बहुत-सी गुठलियाँ हों तो वह माल है। एक गुठली अगर कहीं पड़ी हो तो वह माल नहीं है।

इसी तरह जायज़ तौर पर लाभ उठाने की शर्त भी सब फुक़हा ने बयान की है। इसमें कोई मतभेद नहीं है कि माल वह है जिससे फ़ायदा उठाना शरई तौर पर जायज़ हो। चुनाँचे मुसलमान के लिए सूअर और शराब माल नहीं है। इसलिए कि न मुसलमान शराब को पी सकता है न इस्तेमाल कर सकता है, न उसका स्वामित्व प्राप्त कर सकता है। इसलिए मुसलमान की हद तक शराब माल नहीं है और न शराब के आधार पर कोई मुसलमान कोई कारोबार या लेन-देन आदि कर सकता है।

इस विवरण के आधार पर इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने माल के दो प्रकार बताए हैं। एक प्रकार ‘मुतक़व्विम’ (जिसका कुछ न कुछ मूल्य हो) कहलाता है। दूसरा प्रकार ‘ग़ैर-मुतक़व्विम’ (जिसका कोई मूल्य न हो) कहलाता है। ‘मुतक़व्विम’ से मुराद हर वह चीज़ है जिसकी कोई क़ीमत शरई तौर पर विश्वास योग्य हो। जिसकी मालियत और क़ीमत को शरीअत स्वीकार करती हो। फुक़हा ने इसकी परिभाषा की है कि ‘माले-मुतक़व्विम’ वह है जिससे फ़ायदा उठाना शरीअत के अनुसार जायज़ हो। जिससे शरई तौर पर फ़ायदा उठाना जायज़ न हो वह ‘ग़ैर-मुतक़व्विम’ है। लेकिन ‘मुतक़व्विम’ और ‘ग़ैर-मुतक़व्विम’ का स्वामित्व से कोई सम्बन्ध नहीं है। कभी-कभी ‘ग़ैर-मुतक़व्विम’ चीज़ स्वामित्व में आ सकती है। लेकिन ‘ग़ैर-मुतक़व्विम’ के आधार पर कोई अनुबन्ध यानी लेन-देन नहीं हो सकता। कोई कारोबार नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति के घर में किसी मटके में सिरका रखा हुआ था। किसी मौसमी या रासायनिक परिवर्तन की वजह से वह सिरका शराब में परिवर्तित हो गया। अब स्वामित्व तो मौजूद है जो पहले से चला आ रहा है। यह भंडार जो भी है, इस वक़्त शराब है, कल सिरका था। वह उस व्यक्ति के स्वामित्व में है। लेकिन अगर यह शराब बन गई है तो फिर न उसको बेचा जा सकता है, न हदिया (भेंट) किया जा सकता है, न उसका कोई और इस्तेमाल किया जा सकता है।

‘मुतक़व्विम’ और ‘ग़ैर-मुतक़व्विम’ माल की इस परिभाषा के बाद मौलिक सिद्धान्त यह ज़ेहन में रखना चाहिए कि इन तमाम अनुबन्धों में यानी लेन-देन की इन तमाम क़िस्मों में जिसमें बुनियाद माल होता है, यह ज़रुरी है कि वह ‘माले-मुतक़व्विम’ हो। यह अनुबन्ध के जायज़ होने के लेन-देन या मामले के दुरुस्त होने की अनिवार्य शर्त है। चुनाँचे बैअ (विक्रय) में, क्रय-विक्रय में, हिबा और इजारा में, रहन और मुशारका में उन तमाम शक्लों में जो माल होगा, जिसके आधार पर ये सारे मामलों होंगे उसका ‘माले-मुतक़व्विम’ होना ज़रूरी है। अगर वह ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’ हो तो फिर लेन-देन की ये शक्लें जायज़ नहीं होंगी। ‘माले-मुतक़व्विम’ के बारे में कुछ लोगों को यह ख़याल होता है कि ‘माले-मुतक़व्विम’ और ‘ग़ैर-मुतक़व्विम’ में केवल उन आदेशों का लिहाज़ रखा जाएगा जो प्राचीन फ़िक़ही किताबों में आलिमों ने बयान कर दिए हैं। ऐसा नहीं है, बल्कि अगर आज सरकार के क़ानून किसी चीज़ को निषिद्ध क़रार दे दें, उसका लेन-देन और इसके क्रय-विक्रय को नाजायज़ क़रार दे दें, वह भी ‘माले-मुतक़व्विम’ की परिभाषा से निकल जाएगी। उदाहरणार्थ आज सरकार के क़ानून हेरोइन के स्वामित्व को नाजायज़ क़रार देते हैं। इसलिए हेरोइन ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’ है। चाहे उसका कोई और इस्तेमाल जायज़ होता हो या न होता हो। सम्भव है किसी दवा में इस्तेमाल होता हो, सम्भव है किसी और जगह भी इस्तेमाल हो सकता हो, लेकिन इस सम्भावना के बावुजूद उसको ‘ग़ैर-मुतक़व्विम’ ही समझा जाएगा और उसका लेन-देन दुरुस्त नहीं होगा, इसलिए कि सरकारों के क़ानून में इसको निषिद्ध चीज़ क़रार दे दिया गया है।

इसी तरह उदाहरणार्थ भारी हथियार के स्वामित्व का मामला है, सरकार के क़ानून भारी हथियारों के निजी स्वामित्व को स्वीकार नहीं करते। कोई व्यक्ति अपने स्वामित्व में टैंक नहीं रख सकता। कोई व्यक्ति अपने स्वामित्व में तोप नहीं रख सकता, बम नहीं रख सकता। ये चीज़ें सिर्फ़ सरकार के सशस्त्र बलों के स्वामित्व में और सरकार के प्रबन्ध में ही रह सकती हैं। इसलिए आम लोगों की हद तक उनकी हैसियत ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’ की होगी। अगर कोई व्यक्ति इनका क्रय-विक्रय करता है और भारी हथियारों का लेन-देन करता है तो यह लेन-देन नाजायज़ लेन-देन होगा, जायज़ नहीं होगा।

यही गुणवत्ता उदाहरणार्थ जाली सिक्कों की है। जाली सिक्के और जाली नोट बनाना भी जुर्म है, पास रखना भी जुर्म है और उनका लेन-देन करना भी जुर्म है। इसलिए जाली सिक्के और जाली नोट भी ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’ शुमार होंगे। न केवल ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’ होंगे, बल्कि उनका लेन-देन छल-फ़रेब का एक प्रकार क़रार दिया जाएगा और धोखाधड़ी का जुर्म भी उनकी वजह से साबित हो जाएगा।

माल की एक दूसरी क़िस्म है ‘मिस्ली’ और ‘क़ीमी’। ‘मिस्ली’ और ‘क़ीमी’ का फ़र्क़ कभी-कभी बहुत ज़रूरी होता है इसलिए कि बहुत-से मामले ऐसे हैं जिनका औचित्य और औचित्य न होना माल के ‘मिस्ली’ और ‘क़ीमी’ होने पर निर्भर होता है। ‘मिस्ली’ से मुराद वे चीज़ें हैं जिनकी जैसी चीज़ें बाज़ार में या मार्केट में आम तौर से उपलब्ध हों और उसके अंगों या मूल यूनिटों में कोई उल्लेखनीय अन्तर न पाया जाता हो। आम लोग बाज़ार में एक की जगह दूसरे को स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हों। उदाहरणार्थ अंडे ‘मिस्ली’ हैं। आप अण्डा लेने बाज़ार में जाएँ तो सबका साइज़ भी लगभग एक ही जैसा होता है, वज़्‌न भी क़रीब-क़रीब एक ही होता है। एक की जगह दूसरा और दूसरे की जगह तीसरा आप लेना चाहें तो दुकानदार को एतिराज़ नहीं होता। ‘मिस्ली’ चीज़ें आम तौर से वे होती हैं जो गिनकर या मापकर या तौलकर बेची जाती हैं। हर वह चीज़ जो उचित हो, यानी वज़न करके बेची जाती हो, मापने योग्य हो यानी मापकर बेची जाती हो, गिनकर फ़रोख़्त की जाती हो, बशर्तेकि उसकी गिनती, उसकी इकाइयाँ क़रीब-क़रीब एक जैसी हों। इन सब चीज़ों को ‘मिस्ली’ कहा जाता है।

दिरहम और दीनार ‘मिस्लियात’ में से हैं। आजकल के सिक्के और करंसियाँ ‘मिस्लियात’ में से हैं। आप सौ रुपये का एक नोट निकालें तो उसकी और दूसरे जितने भी सौ रुपये के नोट हैं उन सबकी मालियत एक ही होगी। आप दुकानदार को सौ रुपये अदा करना चाहें तो दाईं ओर की जेबवाला नोट दें या बाईं ओर की जेबवाला नोट दें, दुकानदार को कोई एतिराज़ नहीं होगा। दुकानदार दोनों को समान रूप से स्वीकार करेगा। दोनों की समान मालियत (Value) होगी। आप बाज़ार में अनाज ख़रीदने जाएँ तो गेहूँ की एक बोरी और दूसरी बोरी और तीसरी बोरी सबका वज़न भी एक है, मालियत भी एक है, क़ीमत भी एक जैसी है और गेहूँ का प्रकार भी थोड़े-बहुत अन्तर को नज़र-अंदाज़ करके एक जैसा है। अगर आप एक मन गेहूँ खरीदें और दुकानदार अपने गोदाम में मौजूद बोरियों में से कोई एक बोरी रखवा दे तो आपको कोई एतिराज़ नहीं होगा। ये सब चीज़ें ‘मिस्ली’ कहलाती हैं। यानी वे चीज़ें जिनके जैसी या जिनकी मिस्ल बाज़ार में आसानी के साथ उपलब्ध हैं और बिना किसी उल्लेखनीय अन्तर के उनका एक यूनिट दूसरे यूनिट के समान समझा जाता है और उसकी जगह स्वीकार कर लिया जाता है।

‘मिस्ली’ के मुक़ाबले में दूसरी क़िस्म है ‘क़ीमी’। इससे मुराद वे चीज़ें हैं जिनके हर यूनिट की अलग क़ीमत होती है। हर यूनिट की मालियत (Value) अलग तय होती है और एक यूनिट दूसरे यूनिट की जगह आम तौर से स्वीकार नहीं किया जाता। उदाहरणार्थ मकान है। आप  विभिन्य शहरों में जाएँ तो आपको हर मकान की क़ीमत अलग मिलेगी। यहाँ तक कि अधिकतर स्थितियों में यह भी होता है कि एक ही इलाक़े में एक जैसे मकानों की क़ीमतों में फ़र्क़ होता है। अगर कोने का मकान है तो उसकी क़ीमत और है, दरमियान में है तो क़ीमत और है, ढलान में है तो क़ीमत और है। हालाँकि क्षेत्रफल भी वही है, मकान की बनावट भी एक जैसी है नक़्शा भी एक जैसा है। लेकिन क़ीमतों में फ़र्क़ होता है। अत: ‘क़ीमी’ से मुराद माल की वे क़िस्में हैं जिनकी इकाइयाँ या जिनके यूनिट अलग-अलग मालियत रखते हों और एक की जगह दूसरे को स्वीकार न किया जाता हो। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि ‘मिस्ली’ ‘क़ीमी’ में परिवर्तित हो जाता है और ‘क़ीमी’ ‘मिस्ली’ में परिवर्तित हो जाता है। उदाहरणार्थ अगर दो ‘मिस्ली’ माल जो दो विभिन्न जिंसों से सम्बन्ध रखते हों, इस तरह मिलकर एक हो जाएँ कि उन दोनों को अलग-अलग न किया जा सके तो वे फिर ‘मिस्ली’ नहीं रहते, बल्कि मिलकर ‘क़ीमी’ हो जाते हैं। उदाहरणार्थ एक जगह आटा भी रखा हुआ था और चीनी भी रखी हुई थी। किसी वजह से आटा और चीनी इस तरह मिलकर एक हो गए कि अब उनको अलग नहीं किया जा सकता। अब यह ‘मिस्ली’ नहीं रहे, बल्कि ‘क़ीमी’ हो गए। इसलिए कि बाज़ार में कोई ऐसा आटा नहीं मिलता जिसमें इस तरह चीनी मिली हुई हो, इसी अनुपात से मिली हो, इस तरह की चीनी मिली हो। चूँकि बाज़ार में इसके यूनिट इस तरह के अब उपलब्ध नहीं रहे इसलिए इसकी क़ीमत विभिन्न होगी और इसकी हैसियत ‘क़ीमी’ की हो जाएगी ‘मिस्ली’ की नहीं रहेगी।

इसी तरह से और कारण और उत्प्रेरक भी हैं जिसकी वजह से ‘मिस्ली’ माल परिवर्तित होकर ‘क़ीमी’ माल क़रार पा जाते हैं। उदाहरणार्थ किसी ‘मिस्ली’ माल में कोई ऐब लग गया। नई गाड़ी जब आप ख़रीदकर लाए थे तो शो-रूम में इस मॉडल और रंग की सब गाड़ियों की क़ीमतें एक थीं, होंडा गाड़ियों के आप स्टोर पर जाएँ तो सब होंडा गाड़ियों की, अगर वे सब एक ख़ास ब्रांड की गाड़ियाँ हों, तो उन सबकी क़ीमतें एक होती हैं। आपने गाड़ी ख़रीदी और लेकर आए और कुछ दिन इस्तेमाल के बाद अगर एक्सिडेंट हो गया और गाड़ी में कोई ऐब हो गया। अब यह गाड़ी ‘मिस्ली’ नहीं रही। अब यह ‘क़ीमी’ हो गई। अब उसकी क़ीमत का निर्धारण उसके अपने वुजूद के हिसाब से होगा। बाज़ार में इस जैसी अब और कोई गाड़ी उपलब्ध नहीं है।

कभी-कभी आप कोई ऐसा नयापन उसमें पैदा कर देते हैं कि वह दूसरे अंगों से अलग चीज़ हो जाती है। आपने अपनी किसी महारत से उसमें कोई ऐसी वैल्यू ऐड कर दी जो बाज़ार में उपलब्ध नहीं है, इस वैल्यू ऐड करने से भी वह चीज़ ‘क़ीमी’ हो जाएगी। इस्तेमाल के बाद जब कोई ‘मिस्ली’ चीज़ पुरानी हो जाए तो भी वह ‘क़ीमी’ हो जाती है। आप एक जैसे क़लम बाज़ार में जाकर देखें तो आपको एक ही क़ीमत में मिलेंगे। लेकिन अगर आप एक क़लम ख़रीदकर ले आए और कुछ दिन इस्तेमाल किया, इस्तेमाल करने के बाद वह पुराना हो गया तो अब वह ‘मिस्ली’ नहीं समझा जाएगा। अब उसकी हैसियत ‘क़ीमी’ की होगी। इसलिए कि बाज़ार में ऐसा बहुत कम होता है, बल्कि शायद नहीं होता कि सब पुराने क़लमों की एक जैसी क़ीमत हो। सारे पुराने क़लम उदाहरणार्थ बीस रुपये के हों, कोई बीस का होगा, कोई पाँच का होगा, कोई दस का होगा। ये और इस तरह के कुछ कारण हैं जिनकी वजह से ‘मिस्ली’ चीज़ ‘क़ीमी’ में परिवर्तित हो जाती है।

कभी-कभी ‘क़ीमी’ चीज़ ‘मिस्ली’ में परिवर्तित हो जाती है और अगर ऐसा हो तो फिर उसके हिसाब से उसकी क़ीमत और मालियत का निर्धारण करना पड़ेगा।

माल का एक विभाजन और है जो बहुत महत्वपूर्ण है, वह है ‘इस्तेमाली’ और ‘इस्तेहलाकी’। इस फ़र्क़ को न समझने की वजह से कभी-कभी समस्याएँ पैदा होती हैं। दुर्भाग्य से अंग्रेज़ी में दोनों के लिए एक शब्द है। दोनों की प्राप्ति के लिए borrow करने का शब्द इस्तेमाल होता है। जिस चीज़ को आप ख़र्च कर के consume कर दें, जिसका वुजूद आपके इस्तेमाल के नतीजे में ख़त्म हो जाए। इसके लिए भी अंग्रेज़ी भाषा में borrow का शब्द इस्तेमाल होता है और जिस चीज़ को आप इस्तेमाल कर के ज्यों का त्यों वापस कर दें, उसके वुजूद पर आपके इस्तेमाल से कोई अन्तर न पड़े उसको भी अंग्रेज़ी में borrow करना कहते हैं। इस शाब्दिक समानता की वजह से बहुत-सी मुश्किलें और उलझनें पैदा होती हैं।

इस्तेमाली माल वह है जिसका अस्ल वुजूद यानी corpus इस्तेमाल के बावजूद मौजूद और बाक़ी रहे, और इस्तेमाल से उसके वजूद पर अन्तर न पड़े। उदाहरणार्थ आपके पास साइकिल है। मैंने आपसे इस्तेमाल के लिए माँगी और तीन दिन इस्तेमाल करने के बाद आपको आपकी साइकिल ज्यों की त्यों वापस कर दी। यह इस्तेमाली है। इसके विपरीत ‘इस्तेहलाकी’ माल वह होता है कि जिसको मैं consume कर लूँगा, उसको ख़र्च कर लूँगा, जब मैं उसको ख़र्च कर लूँगा तो वह फिर अस्ली चीज़ मौजूद नहीं रहेगी। मैं उस जैसी कोई चीज़ आपको वापस कर दूँगा। उदाहरणार्थ घरों में अक्सर होता है, पुरानी बस्तियों, मुहल्लों में होता था कि महिलाएँ घर की ज़रूरत की चीज़ें मुहल्ले से ले लिया करती थीं। किसी के यहाँ चीनी ख़त्म हो गई, उसने पड़ोसन से कहा बहन एक पाव चीनी दे दो, बहन ने एक प्याला भरकर चीनी दे दी। अब वह चीनी तो यहाँ इस्तेमाल हो गई, ख़र्च हो गई, वह चीनी तो अब वापस नहीं हो सकती, क़ियामत तक वापस नहीं आ सकती। जब यह बहन महीने के शुरू में वापस करेगी तो उस जैसी चीनी इतने ही माप के अनुसार वापस कर देगी। यह इस्तेहलाकी है। जिसको शरीअत में ‘आरियत’ कहते हैं, जिसका सही अनुवाद borrow करना है। वह इस्तेमाल की चीज़ों में होती है। इसके मुक़ाबले में जो क़र्ज़ होता है वह इस्तेहलाकी चीज़ों में होता है। क़र्ज़ से मुराद यह है कि आपने कोई चीज़ किसी से ले ली, उसको ख़र्च कर दिया, अब वह आपके पास मौजूद नहीं रही। जब क़र्ज़ चुकाने का समय आएगा तो आप उस जैसी चीज़ बाज़ार से लेकर वापस कर देंगे। ज़ाहिर है कि यह चीज़ ‘मिस्लियात’ में से होगी, इसी लिए इसको आप वापस कर देंगे। ख़र्च आम तौर से ‘मिस्लियात’ का होता है। इस्तेमाल आम तौर से ‘क़ीमियात’ का होता है। मगर हर जगह ऐसा नहीं है। कभी-कभी ‘क़ीमियात’ का ख़र्च भी होता है। ‘मिस्लियात’ का इस्तेमाल भी होता है। लेकिन आम तौर से ऐसा ही है कि ख़र्च ‘मिस्लियात’ का और इस्तेमाल ‘क़ीमियात’ का होता है।

माल की एक और क़िस्म जिससे अंग्रेज़ी क़ानून भी परिचित है, वह ‘ऐन’ और ‘दैन’ है। ‘ऐन’ से मुराद तो वह चीज़ है यानी वो corpus जो आपके पास मौजूद हो। आपके पास घड़ी है, आपके पास चश्मा है, आपके पास रेडियो है, आपके पास टेप रिकार्डर है, आपके पास ख़ुशबू की शीशी है, किताबें हैं, करंसी है, हीरे-जवाहरात हैं यह सब ‘ऐन’ है। लेकिन कभी-कभी आपके स्वामित्व में एक चीज़ होती है जो अभी आपके पास नहीं है, लेकिन बहुत जल्द आपके पास आ जाएगी, आपको प्राप्त हो जाएगी। इस वक़्त वह किसी दूसरे व्यक्ति के पास है जो वह आपको देने का पाबन्द है। इसको शरीअत में ‘दैन’ कहते हैं। ‘दैन’ से मुराद हर वह माल है जो दूसरे के ज़िम्मे हो और वह आपको अदा करने का पाबंद हो और उसको अदा कर सकता हो। एक व्यक्ति ने आपसे एक मन गेहूँ यह कहकर लिया और कहा कि जब मेरी फ़सल कटेगी तो मैं आपको वापस कर दूँगा। अब यह एक मन गेहूँ ‘दैन’ है, यह ‘ऐन’ नहीं है। यह उसके ज़िम्मे है कि वह आपको वापस कर दे।

‘ऐन’ और ‘दैन’ को समझना इसलिए ज़रूरी है कि ‘रिबा’ (ब्याज) के बहुत-से आदेशों का सम्बन्ध ‘ऐन’ और ‘दैन’ से है। ‘इस्तेहलाकी’ और ‘इस्तेमाली’ का सम्बन्ध भी ‘रिबा’ के आदेशों से बहुत गहरा है। एक और विभाजन है ‘ऐन’ और ‘मनफ़आ’ या ‘मनफ़अत’। यह विभाजन, जैसा कि मैंने पहले बताया, हनफ़ी फ़ुक़हा के यहाँ ज़्यादा महत्व नहीं रखता है। इसलिए कि हनफ़ी फ़ुक़हा ‘मनफ़अत’ (लाभ) को माल नहीं समझते थे। दूसरे फुक़हा जो ‘मनफ़अत’ को भी माल समझते हैं उन्होंने ये दो क़िस्में बयान की हैं। एक तो भौतिक अस्तित्व रखनेवाली कोई चीज़ है जो ‘ऐन’ कहलाती है। एक उस भौतिक अस्तित्व से उठाया जानेवाला वह फ़ायदा है जो अपना अलग भौतिक अस्तित्व नहीं रखता। फ़ायदे का कोई ज़ाहिरी या भौतिक अस्तित्व नहीं होता। इसलिए हनफ़ी फ़ुक़हा उसको माल नहीं समझते। दूसरे फुक़हा जो माल के भौतिक होने को ज़रूरी नहीं समझते वह ‘मनफ़अत’ को भी माल समझते हैं।

ये तो वे महत्वपूर्ण क़िस्में हैं जिनका शरीअत के आदेश से गहरा सम्बन्ध है और इन मामलों को, इन आदेशों को समझना शरीअत के बहुत-से आदेशों को जानने के लिए ज़रूरी है। इनके अलावा भी कुछ क़िस्में हैं जिनके कुछ फल भी सामने आते हैं। लेकिन वह विस्तार से बयान करने की बात है इसलिए उनको मैं नज़र-अंदाज़ करता हूँ। उदाहरणार्थ ‘मनक़ूल’ (चल) और ‘ग़ैर-मनक़ूल’ (अचल) का विभाजन है। जायदादे-मनक़ूला (चल सम्पत्ति) और जायदाद ग़ैर-मनक़ूला (अचल सम्पत्ति) से अंग्रेज़ी क़ानून भी अवगत है। ‘अमवाले-ज़ाहिरा’ (प्रत्यक्ष धन) और ‘अम्वाले-बातिना’ (परोक्ष धन) का भी एक विभाजन है। इस विभाजन का सम्बन्ध ज़कात या टैक्सेशन के दायरे से है। ‘अमवाले-ज़ाहिरा’ वे हैं जो हर एक को नज़र आ रहे हों। उदाहरणार्थ खेती या बाग़ है। वह ज़मीन पर मौजूद है, जिसका जी चाहे जाकर देख ले। किसी ने मवेशी पाले हुए हैं, वे हर एक सामने हैं, व्यापार का सामान है, दुकान में रखा हुआ है। ये ‘अमवाले-ज़ाहिरा’ कहलाते हैं। ‘अम्वाले-बातिना’ वे हैं कि जो आम तौर से नज़र नहीं आते। आपने अपनी रक़म बचाकर बैंक के लॉकर में ज़ेवर या नक़द पैसा रखा हुआ है। आपको पता है या शायद बैंक के कर्मचारियों को मालूम है, या घर में आपने कोई धन-दौलत सुरक्षित रखा हुआ है, ये ‘अम्वाले-बातिना’ कहलाते हैं।

हज़रत उसमान ग़नी (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ज़माने से यह परम्परा चली आ रही है कि ‘अमवाले-ज़ाहिरा’ की ज़कात राज्य वुसूल करता था और ‘अम्वाले-बातिना’ की ज़कात लोग ख़ुद दिया करते थे। हज़रत उसमान ग़नी (रज़ियल्लाहु अन्हु) को अल्लाह तआला ने बहुत असाधारण सूझ-बूझ प्रदान की थी। उन्होंने बहुत-से मामलों में ऐसे फ़ैसले किए जिनके बहुत दूरगामी प्रभाव ज़ाहिर हुए और अगर वे यह फ़ैसले न करते तो आज बहुत-सी समस्याएँ खड़ी हो गई होतीं। चुनाँचे ‘अमवाले-ज़ाहिरा’ और ‘अम्वाले-बातिना’ का विभाजन भी उन महत्वपूर्ण मामलों में से एक है। हज़रत उसमान ग़नी (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने यह महसूस किया कि हो सकता है आगे चलकर कुछ लोग अपने ‘अम्वाले-बातिना’ की ज़कात देने में संकोच करें। ज़कात वुसूल करनेवाला आग्रह करे कि उनके पास माल है। वे आग्रह करें कि उनके पास माल नहीं है, और नौबत तलाशी और गिरफ़्तारी तक पहुँचे तो ये सरकारी कर्मचारियों को एक ऐसा हथियार देने के समान होगा जिससे काम लेकर सरकारी कर्मचारी हर व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन में अनुचित हस्तक्षेप कर सकते हैं। यों टोह लेने की एक ऐसी अप्रिय प्रक्रिया आम हो जाएगी जिसके परिणामस्वरूप बहुत-सी कठिनाइयाँ पैदा होंगी। शरीअत ने टोह लेने से मना किया है। आम लोगों के विश्वास को ठेस पहुँचाने को हतोत्साहित किया है। इसलिए यह आशा करनी चाहिए कि आम लोग अपने ‘अम्वाले-बातिना’ की ज़कात ख़ुद अदा कर देंगे और ‘अमवाले-ज़ाहिरा’ की ज़कात राज्य वुसूल करेगा।

यह मात्र प्रशासनिक सुविधा का मामला नहीं था। अगरचे इससे प्रशासनिक सुविधाएँ भी बहुत पैदा हुईं और तेरह सौ वर्ष का अनुभव गवाह है कि इस प्रशासनिक सुविधा की वजह से ज़कात की व्यवस्था सफलता से चलती रही। लेकिन यह एक वैचारिक मामला भी है कि राज्य को व्यक्तियों के निजी जीवन में हस्तक्षेप करने और लोगों के निजी मामलों की खोज लगाने की कहाँ तक इजाज़त है।

‘अमवाले-ज़ाहिरा’ और ‘अम्वाले-बातिना’ के अलावा एक और विभाजन भी कुछ फुक़हा ने किया है, वह ‘उसूल’ (मूल) और ‘समरात’ (फल या परिणाम) का है। माल का एक प्रकार वह होता है जो अस्ल है। एक वह है जो इस अस्ल के फल हैं। आप बकरी के दो छोटे-छोटे बच्चे लेकर आए। अस्ल तो आपके पास बकरी के ये दो बच्चे हैं। इसके बाद उनके बच्चे पैदा होने का सिलसिला शुरू हुआ और पचास बकरियों का एक गल्ला वुजूद में आ गया। शेष बकरियाँ फल हैं और वे दो बच्चे अस्ल थे। आपने छोटा पौदा ख़रीदा, परवरिश करके बड़ा कर लिया, उसमें फल पैदा हुए, फूल-पत्ते आए, वे उसके ‘समरात’ हैं। कभी-कभी फ़िक़ही आदेशों के विवरण में इस विभाजन की ज़रूरत पड़ती है। एक और विभाजन ‘ममलूक’ और ‘मुबाह’ का है। माल का एक प्रकार तो वह है जो किसी की सम्पत्ति है। व्यक्ति की मिल्कियत है या राज्य की मिल्कियत है। राज्य ने किसी ख़ास उद्देश्य के लिए इसको सरकारी स्वामित्व में रखा हुआ है। उदाहरणार्थ सरकारी घोड़ों की चरागाह है। फ़ौज के घोड़े वहाँ चरते हैं या उदाहरणार्थ सरकार ने कोई ज़मीन प्राप्त की है, किसी छावनी के निर्माण के लिए, या एयरपोर्ट के निर्माण के लिए। इन ‘ममलूका’ ज़मीनों के अलावा जो ज़मीनें हैं वे ‘मुबाह’ कहलाती हैं। ‘मुबाह’ से मुराद वह ज़मीन या वह माल है जो किसी के स्वामित्व में न हो। दरिया में पानी बह रहा है। यह ‘मुबाह’ है और सबके लिए आम है, किसी के स्वामित्व में नहीं है। जिसका दिल चाहे जाकर पानी भरकर ले आए। जब वह भरकर ले आएगा, बाल्टी में या मटके में सुरक्षित करेगा तो अब यह उसका स्वामित्व हो जाएगा। जब तक वह पानी दरिया में था सबका यकसाँ स्वामित्व था। जंगल में घास लगी हुई है, खुली ज़मीन है किसी व्यक्ति की मिल्कियत नहीं है। घास हर व्यक्ति को लेने का अधिकार है। हर व्यक्ति अपने जानवरों के लिए वहाँ से घास प्राप्त कर सकता है। ये और इस तरह की चीज़ें वे हैं जिनको इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने ‘अम्वाले-मुबाहा’ क़रार दिया है जो सब के लिए ‘मुबाह’ हैं।

एक और तक़सीम है ‘क़ाबिले-तक़सीम’ (विभाजन योग्य) और ना-काबिले-तक़सीम (अविभाज्य)। माल की कुछ क़िस्में वे हैं जो क़ाबिले-तक़सीम हैं। अगर वे एक से अधिक व्यक्तियों के स्वामित्व में हों, और वे उसको विभाजित करना चाहें तो कर सकते हैं। दो भाइयों को अपने बाप से एक लाख रुपये विरासत में मिल गए, वे चाहें तो पचास-पचास हज़ार रुपये आपस में बाँट सकते हैं। लेकिन कोई ऐसी मशीनरी मिल गई जो पूरा एक यूनिट है, वह विभाजित नहीं हो सकती। विभाजित होने के बाद न इसके काम की रहेगी न उसके काम की रहेगी। यह ना-क़ाबिले-तक़सीम माल है। एक साइकिल दो भाइयों को मिल गई। साइकिल ना-क़ाबिले-तक़सीम है। उसके दोनों पहियों को अलग-अलग कर दिया जाएगा तो उनकी कौड़ी की क़ीमत नहीं रहेगी। इसलिए क़ाबिले-तक़सीम माल और ना-क़ाबिले-तक़सीम माल के अलग-अलग आदेश हैं।

माल की इन अलग-अलग क़िस्मों से किसी हद तक इस बात का अंदाज़ा हो जाएगा कि इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने किस विस्तार के साथ और कितनी मेहनत के साथ माल के आदेशों पर ग़ौर किया है और शरीअत के एक-एक शब्द, पवित्र क़ुरआन के एक-एक अक्षर और हदीसों के एक-एक हिस्से से किस तरह लाभ उठाकर ये आदेश संकलित किए हैं।

धन एवं स्वामित्व का आपस में बहुत गहरा सम्बन्ध है। स्वामित्व माल ही का होता है। जो माल न हो उसका स्वामित्व नहीं हो सकता। इसलिए इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने जहाँ माल के आदेशों से बहस की है वहाँ स्वामित्व के आदेशों से भी बहस की है। देश और स्वामित्व की भी बहुत-सी क़िस्में हैं। स्वामित्व से मुराद यह है कि कोई व्यक्ति किसी चीज़ पर इस तरह का क़ानूनी और शरई ‘हक़’ रखता हो जो उसे इस चीज़ को इस्तेमाल करने, ख़र्च करने और दूसरों को इस्तेमाल और ख़र्च करने से रोकने के क़ाबिल बनाता हो। एक फ़क़ीह ने स्वामित्व की परिभाषा कुछ यों की है, “किसी व्यक्ति का किसी चीज़ के बारे में ऐसा ख़ास या ख़ुसूसी ‘हक़’ जो उसको उस चीज़ को बरतने के क़ाबिल बनाए और दूसरे को उस चीज़ को हर प्रकार से बरतने से रोकने की इजाज़त दे। यह स्वामित्व अधिकार कहलाता है।”

स्वामित्व की बहुत-सी क़िस्में हैं। एक ‘मिल्कियते-ताम्मा’ कहलाती है यानी पूर्ण रूप से स्वामित्व। ‘मिल्कियते-ताम्मा’ से मुराद यह है कि जिस चीज़ का पूर्ण स्वामित्व आपके पास हो उसका अस्तित्व और लाभ दोनों के आप मालिक हों। यानी अंग्रेज़ी परिभाषा में आप कह सकते हैं कि इसके corpus के भी आप मालिक हों और usufruct (लाभ उठाने) के भी मालिक हों। उदाहरणार्थ आपने एक गाड़ी ख़रीदी, गाड़ी का अस्तित्व यानी corpus भी आपका स्वामित्व है इसका फ़ायदा भी आपका स्वामित्व है। यह ‘मिल्कियते-ताम्मा’ है। गाड़ी आपके क़ब्ज़े में भी है, आपने उसकी पूरी क़ीमत अदा कर दी। हर दृष्टि से गाड़ी आपके पूर्ण स्वामित्व में आ गई।

लेकिन अगर आपने गाड़ी ख़रीद ली और ख़रीदकर दूसरे व्यक्ति को छः महीने के लिए ‘इजारे’ (किराए) पर दे दी। अब उसका वुजूद तो आपके स्वामित्व में है। आप उसके corpus के तो मालिक हैं, लेकिन इसके लाभ के अब मालिक नहीं रहे। लाभ से फ़ायदा उठाने या उसको इस्तेमाल करने का हक़ उस व्यक्ति को है जिसने गाड़ी आपसे ‘इजारे’ पर ली है।

तीसरी क़िस्म है ‘मिल्के-मनफ़अत’। ‘मिल्के-मनफ़अत’ से मुराद यह है कि गाड़ी या उस चीज़ का मालिक तो कोई और हो, लेकिन लाभ का मालिक कोई और हो। जैसे इसी गाड़ी की मिसाल में इस व्यक्ति ने आपसे गाड़ी किराए पर ली है, वह उसके लाभ का मालिक है, गाड़ी के जितने जायज़ लाभ हैं उन सबसे फ़ायदा उठाने का और उनके अनुसार गाड़ी को बरतने का उसको अधिकार है। ‘मिल्के-मनफ़अत’ से मिलती-जुलती एक चीज़ और है जिसको इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने ‘मिल्के-इन्तिफ़ा’ के शब्द से परिभाषित किया है।

‘मिल्के-इन्तिफ़ा’ से मुराद वह है जिसको आप ‘मराफ़िक़’ या यूटिलिटीज़ या सर्विसेज़ भी कह सकते हैं। कुछ फुक़हा ने इसके लिए ‘मराफ़िक़’ की शब्दावली इस्तेमाल की है। इस स्वामित्व से मुराद ऐसे अधिकार का स्वामित्व या ऐसे अधिकारों और लाभों या सेवाओं का ‘हक़’ है जो किसी स्वामित्व से तो जुड़े होंगे, लेकिन जब और जहाँ आप उनसे फ़ायदा उठाएँगे वह जगह या वह वक़्त आपका स्वामित्व नहीं होगा। उदाहरणार्थ आपने एक कृषि भूमि ख़रीदी। कृषि भूमि के आप पूर्ण रूप से मालिक हैं। इसका क्षेत्रफल भी आपका स्वामित्व है, इसका लाभ भी आपका स्वामित्व है। लेकिन आपकी इस भूमि में और पानी की नहर जो बह रही है उसमें किसी तीसरे व्यक्ति की भूमि आती है। अब जब तक आप इस तीसरे व्यक्ति की ज़मीन से पानी गुज़ारकर लेकर न लाएँ आप अपनी ज़मीन से पूरा लाभ नहीं उठा सकते। आपका पानी का पाइप वहाँ से गुज़रेगा या पानी का नाला वहाँ से गुज़रेगा या पानी का रास्ता गुज़रेगा। यह आपको हक़ है कि आप इस तीसरे व्यक्ति की ज़मीन से पानी गुज़ारें। उसको हक़ नहीं कि वह आपको पानी ले जाने से रोके। यह हदीस से साबित है। तमाम इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) का इत्तिफ़ाक़ है कि आपका यह हक़ है कि वहाँ से गुज़रकर जाएँ। आप उसकी ज़मीन से गुज़रकर ही अपनी ज़मीन पर जा सकते हैं, आपकी ज़मीन तक पहुँचने का कोई और रास्ता नहीं है। अत: इस दरमियानी क्षेत्रफल का मालिक आपको रास्ता देने से नहीं रोक सकता। अगर रोकेगा तो क़ानून आपकी मदद के लिए आएगा। आप उसकी ज़मीन में से पानी लेकर जाएँगे, वह पानी ले जाने से नहीं रोक सकता। अगर आप जायज़ और माक़ूल तरीक़े से पानी ले जा रहे हैं तो शरीअत आपको उसका पूरा हक़ देती है। अलबत्ता अगर आप बदनीयती से इस तरह वहाँ से पानी लेकर जा रहे हैं कि उसकी ज़मीन को नुक़्सान होता है तो फिर इसकी आपको इजाज़त नहीं है। यह अधिकार ‘हुक़ूक़े-इंतिफ़ा’ (लाभ उठाने के अधिकार) कहलाते हैं। आपके लिए अपने स्वामित्व से लाभ उठाने के लिए इन अधिकारों का इस्तेमाल करना अपरिहार्य है। जब आप अपनी ज़मीन के मालिक हो गए तो इस स्वामित्व के साथ-साथ आप इन अधिकारों के मालिक भी हुए जो आपको अनिवार्य रूप से इस्तेमाल करने हैं।

‘मिल्क’ (स्वामित्व) का एक प्रकार है ‘मिल्कियते-हुकूक़े-मानविया’। ‘हुकूक़े-मानविया’ की मिसाल मैं पहले दे चुका हूँ। हनफ़ी फ़ुक़हा की राय यह रही है कि वह ‘हुक़ूक़े-मुजर्रदा’ (अभौतिक अधिकारों) के स्वामित्व को स्वामित्व नहीं मानते। न उनको माल मानते हैं। लेकिन शेष फुक़हा उनको माल समझते हैं इसलिए उनके स्वामित्व के जायज़ होने के भी समर्थक हैं। स्वामित्व कैसे प्राप्त होता है। इंसान किसी चीज़ का मालिक बनता है तो कैसे बनता है? यह सवाल भी धन एवं स्वामित्व के सन्दर्भ में महत्व रखते हैं। स्वामित्व प्राप्ति के जो कारण शरीअत ने निर्धारित किए हैं या बताए हैं वे चार हैं। सबसे पहला कारण तो ‘अक़्द’ (अनुबन्ध) है कि आप किसी contract के द्वारा दूसरे व्यक्ति के स्वामित्व को प्राप्त कर लें। इस स्वामित्व को प्राप्त करने के लिए आप क्रय-विक्रय से काम लें। ‘मुशारका’ और ‘मुज़ारबा’ से काम लें। या इस तरह के और मामलों या लेन-देन के तरीक़े से काम लें ये सब ‘अक़्द’ की विभिन्न शक्लें हैं।

दूसरी शक्ल है ‘एहराज़े-मुबाहात’। वे तमाम चीज़ें जो ‘मुबाह’ हों और किसी के स्वामित्व में

न हों वे सबके लिए उपलब्ध हैं, जो व्यक्ति जाकर उसको प्राप्त करे वह उसका स्वामित्व क़रार पाएगी। ‘एहराज़े-मुबाहात’ का यह सिद्धान्त शरीअत के बहुत-से आदेशों की बुनियाद है। अनेक हदीसों से साबित है। इमाम बुख़ारी और अनेक मुहद्दिसीन ने बयान किया, “जिस व्यक्ति ने कोई ऐसी ज़मीन आबाद कर ली जो किसी की नहीं थी तो वह उसका हक़दार है।” वह ज़मीन उसका स्वामित्व क़रार पाएगी। एक और हदीस है जिसको इमाम अबू-दाऊद ने बयान किया है कि “किसी व्यक्ति ने आगे बढ़कर पानी भर लिया और अपने स्वामित्व में ले लिया तो वह उसका स्वामित्व है।” उदाहरणार्थ कोई पानी का चश्मा (जलस्रोत) था, रेगिस्तान में, जंगल में, पहाड़ों में बह रहा था, किसी का स्वामित्व नहीं था। एक व्यक्ति ने जाकर वहाँ घर बनाया, इमारत बनाई, आवास कर लिया तो जितना पानी वह चश्मे से प्राप्त करके अपने क़ब्ज़े में कर लेगा वह उसका स्वामित्व हो जाएगा। ये ‘एहराज़े-मुबाहात’ की वे मिसालें हैं जो ख़ुद हदीसों में बयान हुई हैं। स्वामित्व प्राप्त करने का तीसरा ज़रिया विरासत है। एक व्यक्ति के बाप के पास ज़मीन थी, जायदाद थी, धन-दौलत थी। उसका इंतिक़ाल हो गया। उसकी जायदाद उसकी औलाद में स्थानांतरित हो जाएगी। यह ‘इन्तिक़ाले-मिल्कियत’ (स्वामित्व का स्थानांतरण) विरासत के रूप में हुआ है। जो व्यक्ति किसी का वारिस हो और शरीअत के आदेश के अनुसार उसको विरासत का अधिकार प्राप्त हो वह अपने पूर्वजों की जायदाद और सम्पत्तियों का जायज़ मालिक बन सकता है और शरीअत उसको जायज़ स्वामित्व स्वीकार करती है।

स्वामित्व का चौथा ज़रिया वह है जिसकी ओर मैं पहले इशारा कर चुका हूँ कि आपके पास अस्ल माल मौजूद था। अस्ल के आप मालिक थे। उसमें आपने बढ़ोतरी की, उसका पूँजी निवेश किया, उसमें बढ़ोतरी पैदा हुई तो उसके नतीजे में, उस पूँजी निवेश या वृद्धि या बढ़ोतरी के नतीजे में जो भी माल प्राप्त होगा वह ख़ुद-ब-ख़ुद आपका स्वामित्व क़रार पाएगा। आपके पास एक लाख रुपय थे, आपने पूँजी निवेश किया, उसके नतीजे में फ़ायदा हुआ। आपको डेढ़ लाख रुपये प्राप्त हो गए तो यह अतिरिक्त पचास हज़ार भी आपका जायज़ स्वामित्व होगा। मैंने बकरियों के गल्ले की मिसाल दी थी कि आपने बकरी के दो बच्चों से कारोबार शुरू किया और आपके पास पचास बकरियों का गल्ला हो गया, तो शेष अड़तालीस बकरियाँ भी आपका जायज़ स्वामित्व होंगी। इसी तरह कृषि पैदावार, उद्योग, इंडस्ट्री, यह सब स्वामित्व के जायज़ साधन हैं और उनके द्वारा जो चीज़ स्वामित्व में प्राप्त होगी वह आपका जायज़ स्वामित्व होगी।

स्वामित्व की प्राप्ति का सबसे बड़ा ज़रिया ‘अक़्द’ (अनुबन्ध) है, लेन-देन है। इस्लामी शरीअत के आदेशों की रौशनी में इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने उक़ूद की बहुत-से क़िस्में बयान की हैं। इन क़िस्मों को सामने रखकर उक़ूद की अनेक क़िस्में भी की गई हैं। एक क़िस्म है ‘उक़ूदे-तमलीकात’ और ‘उक़ूदे-इस्क़ातात’। तमलीकात से मुराद वे उक़ूद (अनुबन्ध) हैं जिनके नतीजे में कोई व्यक्ति किसी के माल या किसी की जायदाद का मालिक हो जाए। ‘इस्क़ातात’ से मुराद वे उक़ूद हैं जिसमें कोई व्यक्ति अपने स्वामित्व या अपने हक़ को समाप्त कर दे। अक़्द (अनुबन्ध) जिस प्रकार का भी हो उसका दारोमदार या उसकी बुनियाद माल होता है। अगर ‘माले-मुतक़व्विम’ न हो तो वह अक़्द जायज़ नहीं होगा। जिस वक़्त वह अक़्द हो रहा है उस वक़्त वह माल अक़्द करनेवाले के स्वामित्व में न हो, या उस वक़्त मौजूद न हो, या मौजूद तो हो लेकिन इतना ग़ैर-मालूम और अनिर्धारित हो कि यह पता न चलता हो कि वह किस प्रकार का है। ऐसा कोई अक़्द भी दुरुस्त नहीं होगा। दूसरे शब्दों में अक़्द के दुरुस्त होने के लिए ज़रूरी है कि ‘माले-मुतक़व्विम’ हो, अनुबन्ध करनेवाले के पूर्ण स्वामित्व में हो, या वह अक़्द के वक़्त मौजूद हो, या इतने स्पष्ट रूप से उसकी परिभाषा कर दी गई हो कि ख़रीदार और विक्रेता दोनों के ज़ेहन में यह स्पष्ट हो जाए कि क्या चीज़ और किस तरह की चीज़ है जिसपर अनुबन्ध हो रहा है और निर्धारित समय पर उसको अदा करना या ख़रीदनेवाले के हवाले करना मुमकिन हो, आसान हो।

‘तमलीकात’ से सम्बन्धित जो उक़ूद हैं उनकी बड़ी-बड़ी क़िस्में दो हैं। एक तो वे उक़ूद हैं जो ‘उक़ूदुल-मुआवज़ा’ कहलाते हैं। यानी वह उक़ूद (अनुबन्ध) जिनमें एक व्यक्ति अपना माल दे और दूसरे से बदले में उसका माल ले। आप बाज़ार में क्रय-विक्रय करने जाते हैं या कोई और अनुबन्ध या मामला जिसके नतीजे में लेन-देन होता है, कोई एक चीज़ आप देते हैं और कोई दूसरी चीज़ उसके एवज़ में प्राप्त कर लेते हैं। ये सब उक़ूद ‘उक़ूदे-मुआवज़ा’ कहलाते हैं। उक़ूद की सबसे बड़ी क़िस्में यही हैं।

इनके मुक़ाबले में एक अक़्द वह होता है जो ‘अक़्दे-तबर्रु’ कहलाता है या ‘उक़ूदुत्तबर्रि’ कहलाते हैं। जिसमें ‘तमलीक’ और ‘तमल्लुक’ बिना किसी बदल के क़ायम होते हैं। बिना किसी मुआवज़े के चीज़ का स्वामित्व दूसरे को स्थानांतरित हो जाता है। सदक़ा, वसीयत या इआरा ये सब उक़ूद तो हैं लेकिन उनमें कोई बदल नहीं होता। आप किसी को तोहफ़ा दें, हदिया दें तो उसके मुक़ाबले में आप कोई क़ीमत वुसूल नहीं करते। क़ीमत वुसूल करेंगे तो वह हिबा (तोहफ़ा) नहीं रहेगा, बैअ (सौदा) हो जाएगी। इसलिए इन उक़ूद में दूसरे व्यक्ति के मालिक बन जाने और स्वामित्व के हस्तांतरण के लिए इतना काफ़ी है कि वह व्यक्ति उस चीज़ को अपने क़ब्ज़े में ले ले जिसके लिए आपने ‘तबर्रु’ किया है या जिसको हदिया दिया है। जब वह अपने क़ब्ज़े में ले लेगा, उस वक़्त से वह उस चीज़ का मालिक हो जाएगा। जब तक क़ब्ज़े में नहीं लेगा, उस वक़्त तक मालिक नहीं होगा। इसलिए कि यहाँ मुक़ाबले में कोई एवज़ मौजूद नहीं है।

‘उक़ूदे-मुआवज़ा’ में जब दोनों पक्ष वह चीज़ और उसका एवज़ वुसूल कर लें तो बैअ (सौदा) पूरा हो जाता है। यहाँ चूँकि एवज़ नहीं है, इसलिए अस्ल चीज़ का क़ब्ज़ा ही एवज़ के स्थान पर समझा जाएगा।

उक़ूद में जो चीज़ सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, जिसको पवित्र क़ुरआन ने स्पष्ट रूप से बयान किया है, जिसके बिना कोई अनुबन्ध अक़्दे-जायज़ नहीं क़रार पाता वह ‘तराज़ी’ है। मुआहदा (अनुबन्ध) करनेवाले दोनों पक्ष, लेन-देन या व्यापार करनेवाली दोनों पार्टियाँ पूरी रज़ामंदी के साथ, जिसको हदीस में ‘तय्यिबे-नफ़्स’ कहा गया है, यानी दिल की पूरी सफ़ाई और ख़ुशी के साथ, लेन-देन करें तो वह जायज़ होगा। अगर ‘तराज़ी’ यानी आपस की पूरी रज़ामंदी न पाई जाती हो तो यह ‘तराज़ी’ के न होने के समान है। वास्तविक रज़ामंदी या ‘तराज़ी’ के न होने से कुछ शक्लों में बैअ बातिल (अमान्य) होती है, सिरे से निरस्त होती है, कुछ शक्लों में फ़ासिद (दूषित) हो जाती है, कुछ शक्लों में शदीद मकरूह (अत्यन्त अप्रिय) हो जाती है। इसलिए तराज़ी की जाँच और उसपर निश्चित हो जाना अपरिहार्य है। उदाहरणार्थ जिस वक़्त आप लेन-देन कर रहे थे उस वक़्त की किसी एक पक्ष में यह योग्यता ही नहीं थी कि वह अक़्द कर सके। उदाहरणार्थ वह छोटा बच्चा था, आपने छः वर्ष के बच्चे से मकान ख़रीद लिया तो यह अक़्द बिलकुल बातिल है। इसलिए कि यहाँ तराज़ी नहीं है, छः वर्ष के बच्चे की रज़ामंदी का कोई भरोसा नहीं। यह बात कि एक यतीम बच्चे ने अपने बाप की विरासत में मकान प्राप्त किया और आपने टाफ़ियों का लालच देकर मकान का काग़ज़ उससे ले लिया तो यह सख़्त धोखे के समान है। यह डाका है, तराज़ी नहीं है। आप लाख कहें कि बच्चा राज़ी था, उसने ख़ुशी-ख़ुशी से मकान दे दिया था, यह दुरुस्त नहीं होगा। इसी तरह अगर कोई व्यक्ति बेचारा पागल है, उसको दौरे पड़ते हैं, आपने दौरे के वक़्त में या पागलपन की हालत में उसकी रज़ामंदी प्राप्त कर ली तो यह रज़ामंदी जायज़ रज़ामंदी नहीं है। किसी व्यक्ति ने ग़लती से ‘महले-अक़्द’ को, जिसपर अक़्द हो रहा है, ग़लत समझा और मामला कर लिया, यह भी तराज़ी के ख़िलाफ़ है। फुक़हा कहते हैं, “जिस चीज़ पर अक़्द हो रहा है उसको ग़लती से कुछ का कुछ समझ लिया तो यह अक़्द दुरुस्त नहीं होगा।” मसलन शीशे का आम टुकड़ा था, किसी सीधे-सादे अनजान आदमी ने याक़ूत समझकर लाखों रुपये का ख़रीद लिया, बाद में पता चला कि यह तो याक़ूत नहीं था, बल्कि शीशे का एक आम-सा टुकड़ा था, तो यह अक़्द जायज़ न होगा और अगर बेचनेवाला उसको ख़ुद से रद्द न करे तो अदालत उसको निरस्त या रद्द क़रार दे देगी।

धोखा, तग़रीर और फ़रेब भी तराज़ी के ख़िलाफ़ हैं, कुछ फ़ुक़हा ने ‘‘तदलीस’’ की शब्दावली भी प्रयोग की है। यानी जिस चीज़ को बेचा जा रहा है उसके बारे में कोई ऐसा विवरण बयान किया गया जो उसमें मौजूद नहीं है। जैसे आजकल के बेचनेवाले ज़मीन-आसमान के क़ुलाबे मिलाते हैं। यह भी ‘तदलीस’ और ‘तग़रीर’ की एक शक्ल है। विज्ञापन कंपनियों ने इस छल-फ़रेब और धोखाधड़ी और ‘तदलीस’ को एक कला का रूप दे दिया है जो विशेषताएँ बनानेवालों की कल्पना में भी न हों वे विज्ञापनों के द्वारा आम कर दी जाती हैं और विशुद्ध धोखा और फ़रेब के द्वारा चीज़ें बेची जाती हैं। शरीअत ने इसको तग़रीर क़रार दिया है और ऐसी बैअ को नाजायज़ कहा है। अगर वे विशेषताएँ उस चीज़ या सौदे में नहीं हैं जो बताई गई हैं तो यह बैअ (सौदा) दुरुस्त नहीं है।

‘ग़बने-फ़ाहिश’ को भी इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने तराज़ी के ख़िलाफ़ क़रार दिया है। ‘ग़बने-फ़ाहिश’ से मुराद क़ीमतों में इतनी बढ़ोतरी है जो किसी अंदाज़ा करनेवाले के अंदाज़े में न आ सके। इससे मुराद यह है कि बाज़ार में क़ीमतों में थोड़ा-बहुत अन्तर तो होता है। अगर यह चश्मा एक जगह दो सौ का है तो दूसरी जगह दो सौ दस रुपये का होगा। तीसरी जगह शायद एक सौ नव्वे का हो। चौथी जगह शायद दो सौ बीस रुपये का हो। तो गोया दो सौ रुपये मालियत की अगर कोई चीज़ है तो उसमें बीस-पचीस रुपये तक की कमी-बेशी बाज़ार में हो सकती है। इतनी कमी-बेशी को ‘ग़बने-फ़ाहिश’ नहीं कहा जाएगा। लेकिन अगर दो सौ रुपये की चीज़ कोई चार सौ रुपये में बेच दे तो यह निस्सन्देह ‘ग़बने-फ़ाहिश’ है। इसलिए कि जिन लोगों को चश्मे की क़ीमतों का अंदाज़ा है उनका अंदाज़ा अगर पूछा जाए तो उनके अंदाज़ों और अस्ल क़ीमत में पंद्रह, बीस, पच्चीस रुपये से ज़्यादा का फ़र्क़ नहीं होगा।

ग़रज़ इसके लिए फुक़हा ने एक ऐसा सिद्धान्त प्रस्तावित किया है जिसपर हर जगह अमल हो सकता है। जिस चीज़ के क्रय-विक्रय के सम्बन्धित बात हो रही है उसके क्रय-विक्रय से सम्बन्धित विशेषज्ञ उसकी क़ीमत का जो अंदाज़ा लगाएँ, उन अंदाज़ों में जो अन्तर हो, वह अन्तर अगर उचित और गवारा है, तो उसको ‘ग़बने-फ़ाहिश’ नहीं कहा जाएगा। लेकिन अगर अन्तर इससे आगे बढ़कर हो तो वह ‘ग़बने-फ़ाहिश’ होगा और वह जायज़ नहीं होगा।

तराज़ी को जो चीज़ प्रभावित करती है उसमें ‘इकराह’ या ज़बरदस्ती भी है। ‘इकराह’ की कुछ किस़्में तो वे हैं जो क़ानून के दायरे में भी आती हैं और वे जुर्म हैं। दुनिया के हर क़ानून की तरह शरीअत के क़ानून में भी जब्र और ’इकराह’ को जुर्म क़रार दिया गया है। इसलिए जहाँ जब्र और ’इकराह’ इस अंदाज़ का है जो क़ानून के दायरे में आता है वहाँ तो मामला स्पष्ट है। लेकिन जब्र और ‘इकराह’ की एक शक्ल वह होती है जिसका निर्धारण क़ानून के द्वारा करना बहुत दुशवार होता है। वह मात्र एक नैतिक अंदाज़ के दबाव की बात होती है। हदीस में आया है “किसी व्यक्ति के लिए दूसरे का माल जायज़ नहीं है, उसके दिल की बेहद ख़ुशी के बिना।” अब दिल की ख़ुशी है कि नहीं है, इसका निर्धारण कुछ हालात में सम्भव नहीं होता। लेकिन सम्बन्धित पक्षों को मालूम होता है कि दिल की ख़ुशी थी या नहीं थी। ‘इकराह’ कितना था या नहीं था।

दीन (इस्लाम) के कुछ बड़े विद्वानों ने लिखा है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी वजाहत (Smartness) या अपने व्यक्तित्व का प्रभाव डालकर किसी को कोई चीज़ ख़रीदने या बेचने पर मजबूर करे तो यह जायज़ नहीं है। इसलिए कि यह दिल की ख़ुशी के ख़िलाफ़ है। आप किसी व्यक्ति की कोई क़ीमती चीज़ बहुत कम क़ीमत पर ख़रीदना चाहते हैं, वह राज़ी नहीं है, आप उसपर दबाव डालने के लिए किसी अत्यन्त सम्मान योग्य शख़्सियत को ले गए जिनका कहा वह टाल नहीं सकता, या उसके किसी ऐसे उपकारक को ले गए जिनके एहसान के बोझ तले वह दबा हुआ है। उसके कहने से वह बहुत कम क़ीमत पर अपनी चीज़ बेच देने को तैयार हो जाएगा। अंदर से दिल में राज़ी नहीं होगा, लेकिन अनमने पन से तैयार हो जाएगा। कुछ विद्वानों ने इसको भी नाजायज़ लिखा है। चूँकि यह “उन दोनों और अल्लाह के बीच का” मामला है। अत: हर व्यक्ति को ख़ुद तय करना चाहिए, मामला करनेवाले को ख़ुद देखना चाहिए कि उसने जो जायदाद प्राप्त की है वह ‘तय्यिबे-नफ़्स’ (दिल की ख़ुशी) के साथ प्राप्त की है या बिना ‘तय्यिबे-नफ़्स’ के।

तराज़ी की एक महत्वपूर्ण अपेक्षा यह भी है कि जो चीज़ ख़रीदी जा रही हो या बेची जा रही हो वह स्पष्ट रूप से मालूम और निर्धारित हो। मिसाली सूरत तो यह है कि वह चीज़ मौजूद हो। बेचनेवाले के पूर्ण स्वामित्व में हो और बतौर बेचनेवाला आपके क़ब्ज़े में हो और उस वक़्त उपलब्ध हो। यह तो मिसाली और आइडियल क्रय-विक्रय है। लेकिन शरीअत ने मानवीय ज़रूरतें और हाजतों को देखते हुए ऐसी चीज़ों के क्रय-विक्रय की भी इजाज़त दे दी है जो उस वक़्त आपके क़ब्ज़े या स्वामित्व में नहीं हैं। लेकिन आप आसानी के साथ अपेक्षित शर्तों पर इस चीज़ को उपलब्ध कर सकते हैं। उदाहरणार्थ आप सप्लायर का काम करते हैं। आपके पास उस वक़्त तो कुछ भी नहीं है। लेकिन आप मसलन काग़ज़ सप्लाई करते हैं। लाखों रुपये का काग़ज़ आप सप्लाई कर सकते हैं। काग़ज़ बनानेवालों से आपका मामला रहता है। आप काग़ज़ के कारख़ानों से लेन-देन करते हैं। उनसे उधार काग़ज़ लेते हैं। ख़रीदारों को बेचने के बाद जो क़ीमत वुसूल होती है तो अपना लाभ रखकर काग़ज़ के कारख़ाने के मालिकान को क़ीमत अदा कर देते हैं। आपके लिए निर्धारित अंदाज़ और नमूने का काग़ज़, उस मिक़दार और अंदाज़ का काग़ज़, जिस स्तर का ख़रीदार को दरकार है उपलब्ध करना मुश्किल नहीं है। इस स्थिति में आप इस काग़ज़ का कारोबार कर सकते हैं जो फ़िलहाल आपके स्वामित्व या क़ब्ज़े में नहीं है, उदाहरणार्थ आपके पास ख़रीदार आया, उसने बताया कि मुझे नव्वे ग्राम का काग़ज़ दरकार है, इसका यह साइज़ होगा, यह रंग होगा, फ़ुलाँ प्रकार का होगा, ये सब चीज़ें मालूम और निर्धारित हैं। आप काग़ज़ के कारख़ाने में जाएँगे, उसको आर्डर देंगे, वह निर्धारित समय में आपको काग़ज़ उपलब्ध कर देगा, यह तो जायज़ है।

इस शक्ल के अलावा ऐसी बहुत-सी शक्लें बाज़ार में प्रचलित हो जाती हैं जिनमें कोई व्यक्ति कोई ऐसी चीज़ बेच रहा है जो न उसके पास उस वक़्त मौजूद है, न उसको यह मालूम है कि जो चीज़ें मैं उपलब्ध करूँगा उनकी मालियत क्या होगी, उसकी मात्रा क्या होगी, उसकी गुणवत्ता क्या होगी, स्तर क्या होगा। ऐसी चीज़ का क्रय-विक्रय जायज़ नहीं है। यह वह चीज़ है जिसे शरीअत में ‘ग़रर’ कहते हैं। ‘ग़रर’ की परिभाषा अल्लामा सरख़सी ने यह की है “जिसका अंजाम मालूम न हो, जिसका अंजाम छिपा हुआ हो।” इसी से मिलती-जुलती परिभाषा शैख़ुल-इस्लाम अल्लामा इब्ने-तैमिया ने भी की है। उन्होंने कहा है कि “ग़रर वह है जिसका अन्त अस्पष्ट हो, मालूम न हो।” जिन मामलों में ‘ग़रर’ पाया जाता है वे जायज़ नहीं हैं। न वह लेन-देन जायज़ होगा, न स्वामित्व स्थानांतरित होगा, न वह जायज़ स्वामित्व होगा।

‘ग़रर’ की तीन बड़ी-बड़ी शक्लें हैं। एक तो यह कि आप उस चीज़ की बेच रहे हैं जो सिरे से मौजूद ही नहीं है, या वह कि जिसको आप ख़रीदार के सिपुर्द करने में असमर्थ हैं। उदाहरणार्थ आप बहुत अच्छा ख़ूबसूरत हिरन ख़रीद कर लाए और वह भाग गया। अब कहाँ चला गया, जंगल में चला गया, पहाड़ों में चला गया। अगर आप इस हिरन को यह कहकर बेचें कि मेरा हिरन भाग गया है, इतने पैसे उसकी क़ीमत के रूप से मुझे दे दो और जाकर पकड़ लो। यह ‘ग़रर’ है और यह जायज़ नहीं है। या वह सौदा इतना ना-मालूम हो कि पूरी तरह अस्पष्ट हो, कुछ मालूम न हो। जैसे आजकल कारोबार की कुछ शक्लें हैं कि मेरे पास घर, दुकान, या स्टोर में जो सामान है वह आप ले लें और इतने पैसे दे दें। उस व्यक्ति ने घर में आकर देखा ही नहीं, उसको अंदाज़ा नहीं कि कितना माल है, कितना सामान है और उसकी मालियत किया है, यह भी ‘ग़रर’ है और यह भी नाजायज़ है। हाँ अगर कोई व्यक्ति आकर घर का जायज़ा ले-ले और देख ले कि कितना सामान है, उसको अंदाज़ा हो जाए कि कितनी मालियत का है तो फिर वह ‘ग़रर’ नहीं रहेगा।

‘ग़रर’ की इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने बहुत-सी क़िस्में बताई हैं। एक तो ‘ग़ररे-कबीर’ है। यानी बड़ा ग़रर, वह तो किसी सूरत में जायज़ नहीं है, हर सूरत में हराम है। एक ‘ग़ररे-हक़ीर’ है, यह ‘ग़रर’ तो मामूली है और इतना मामूली है कि आम तौर से लोग इसको नज़र-अंदाज़ कर देते हैं। कुछ सौदे बाज़ारों में ऐसे होते हैं कि उनमें अगर कोई मामूली कमी-बेशी हो तो आम तौर से लोग उसका ख़याल नहीं करते और आम तौर से उसकी कोई शिकायत भी नहीं की जाती। यह ‘ग़ररे-हक़ीर’ है। इसलिए जहाँ ‘ग़ररे-हक़ीर’ हो और अपरिहार्य भी हो तो उसको शरीअत गवारा करती है, उसपर कोई एतिराज़ नहीं करती। उदाहरणार्थ आप बादाम ख़रीदकर लाए, बहुत-सा बादाम उदाहरणार्थ बीस-पच्चीस किलो बादाम आपने ख़रीद लिया। अब हो सकता है कि इसमें कुछ दाने ऐसे हों जिसमें गिरी न हो, बादाम के सौदों में आम तौर से ऐसा होता है। बज़ाहिर आप यह मानकर ले रहे हैं कि जितने बादाम आप ले रहे हैं उन सबमें गिरी मौजूद है। इन बादामों में कुछ दाने ऐसे ज़रूर होंगे जिनमें गिरी नहीं होगी। वास्तविकता में तो यह भी ‘ग़रर’ है, लेकिन ग़ररे-हक़ीर है, इसलिए उसको आम तौर से लोग नज़र-अंदाज़ कर देते हैं, कोई उसकी परवाह नहीं करता। यह जायज़ है इसमें कोई बुराई नहीं है। एक अपरिहार्य ‘ग़रर’ होता है जो ऐसा है कि आप उससे बच नहीं सकते, उसका पता लगाना भी आपके लिए सम्भव नहीं है। आप एक बहुत बड़ी इमारत ख़रीद लें, उसकी बुनियाद बनानेवाले ने कैसी बनाई है, बुनियाद में क्या रखा है, कितनी गहरी है, जितनी बताता है सचमुच भी उतनी है कि नहीं है, कोई व्यक्ति खोदकर नहीं देखता और न खोदकर देखा जा सकता है। ‘ग़रर’ की यह क़िस्म अपरिहार्य है, उसके बताने पर ही आपको विश्वास करना पड़ेगा। इस विश्वास को प्राप्त करने के जो सम्भावित तरीक़े हो सकते हैं वे आप अपना लें। वास्तविक रूप से कुछ चीज़ों का पता लगाना मुश्किल होता है, बल्कि सम्भव नहीं होता। शरीअत ने उनका पता लगाने का आदेश नहीं दिया और अपरिहार्य समझ कर नज़र-अंदाज़ करने का निर्देश दिया है।

धन एवं स्वामित्व से जुड़ा एक छोटा-सा मामला हक़ और ज़िम्मे का भी है। हक़ से क्या मुराद है? स्वामित्व भी एक हक़ है। इसलिए जब स्वामित्व की बात आएगी तो हक़ की बात भी आएगी। लाभ भी एक हक़ है। हुक़ूक़े-मजुर्रदा (अभौतिक अधिकार) भी हक़ हैं। हक़ की अनेक परिभाषाएँ आधुनिक इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने की हैं। उदाहरणार्थ बीसवीं सदी के एक बहुत बड़े फ़क़ीह उस्ताद मुस्तफ़ा अहमद अज़-ज़रक़ा ने जो हक़ की परिभाषा की है वह इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) की बहसों से ली गई है। विशेष रूप से हनफ़ी फ़ुक़हा के कलाम से जो कुछ मालूम होता है, उसकी रौशनी में हक़ से मुराद शरीअत का निर्धारित किया हुआ या स्वीकार किया हुआ वह विशेष अधिकार है जिसके नतीजे में हक़दार को वह अधिकार प्राप्त हो जाता है जो दूसरों को प्राप्त नहीं होता। इसी के क़रीब-क़रीब परिभाषा प्रसिद्ध क़ानून विशेषज्ञ और मिस्र के फ़क़ीह के उस्ताद अब्दुर्रज़्ज़ाक़ सुहनवरी ने भी की है। इन लोगों की परिभाषाओं पर बड़ा गहरा प्रभाव फ़्रांसीसी क़ानून की धारणाओं का है। यह दोनों लोग फ़्रांसीसी क़ानून से अच्छी तरह परिचित थे और जिन लोगों की ख़ातिर यह परिभाषा संकलित कर रहे थे वे फ़्रांसीसी क़ानून के विशेषज्ञ ही थे। इसलिए उन्होंने हक़ की परिभाषा और क़िस्में बयान करते हुए फ़्रांसीसी क़ानून की धारणाओं को सामने रखा है। इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने, प्राचीन इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने ‘हक़’ की धारणा को इतना स्पष्ट और नुमायाँ समझा कि अलग से हक़ की परिभाषा करना ज़रूरी नहीं समझा। लेकिन चूँकि फुक़हा के साहित्य में ‘हक़’ का उल्लेख बार-बार आता है, हदीसों में आया है। पवित्र क़ुरआन में यह शब्द आया है। इन सबको सामने रखकर ‘हक़’ की जो धारणा फुक़हा के सामने है, वह स्पष्ट हो जाती है। ‘हक़’ से मुराद वह अधिकार है या वह विशेषाधिकार यानी privilege है जो किसी व्यक्ति को जायज़ तरीक़े से शरीअत के आदेशों के अनुसार प्राप्त हो और उसके नतीजे में उसको कोई बरतने या कोई लाभ प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त होता हो।

‘हक़’ से मिलती-जुलती एक धारणा ‘ज़िम्मा’ की भी है। ‘ज़िम्मा’ के शाब्दिक अर्थ तो गारंटी के हैं लेकिन ‘ज़िम्मा’ से मुराद वह ज़िम्मेदारी (liability) है जो किसी व्यक्ति पर पड़ती हो या वह ज़िम्मेदारी है जो किसी व्यक्ति पर लागू होती हो और उस ज़िम्मेदारी के नतीजे में वह कोई काम करने या कोई कर्तव्य निर्वाह करने का पाबंद हो। ज़िम्मा, हक़ और इल्तिज़ाम, इन तमाम मामलों का सम्बन्ध माल से है। माल को समझने के लिए ज़रूरी है कि ज़िम्मा, हक़ और इल्तिज़ाम की धारणाओं से भी अवगत हुआ जाए।

इल्तिज़ाम से मुराद वह ज़िम्मेदारी है जो कोई व्यक्ति ख़ुद अपने ऊपर लागू करता है। उदाहरणार्थ क़र्ज़ का बोझ या क़र्ज़ के हवाले में कोई व्यक्ति यह ज़िम्मेदारी ले कि वह दूसरे का क़र्ज़ अदा करेगा तो यह इल्तिज़ाम की एक क़िस्म है। इल्तिज़ाम या तो किसी क़र्ज़ का होता है, यानी इल्तिज़ाम-बिद्दैन। या किसी निर्धारित चीज़ के उपलब्ध करने का होता है, यानी इल्तिज़ाम-बिल-ऐन, या किसी काम को करने का इल्तिज़ाम होता है कि मैं फ़ुलाँ काम कर दूँगा, यानी इल्तिज़ाम-बिल-फ़ेल, या किसी चीज़ से बचने की ज़िम्मेदारी होती है कि यह काम मैं नहीं करूँगा और न होने दूँगा, यह इल्तिज़ाम-बिल-इम्तिना कहलाता है। यह तमाम इल्तिज़ाम की क़िस्में हैं जिनका ‘उक़ूद’ से गहरा सम्बन्ध है। और चूँकि उक़ूद का धन एवं स्वामित्व से गहरा सम्बन्ध है इसलिए इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्री) जब माल से बहस करते हैं तो इन तमाम विषयों से भी बहस करते हैं जिनका धन एवं स्वामित्व से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध होता है।

ये था अत्यन्त संक्षिप्त सारांश उन बहसों का जो धन एवं स्वामित्व के बारे में इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने की हैं।

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