بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم अल्लाह के नाम पर, जिसका नाम पृथ्वी या आसमान में कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचाता है, और वह सुनने वाला, जानने वाला है

August 15,2022

मुख पृष्ठ

इस्लाम और सन्यास

इस्लाम और सन्यास

आख़िरत की मुक्ति और कल्याण के सम्बन्ध में धर्मो का सामान्य मत यह है कि इस संसार से विमुख होकर पुर्णतः एकांत ग्रहण कर लिया जाए और दुनिया के समस्त आस्वादनों और कामनाओं से अपने आप को मुक्त करके जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में जीवन व्यतीत किया जाए। लेकिन इस्लाम दुनिया में रहने और उसकी नेमतों से लाभान्वित होने को पारलौकिक मोक्ष की प्राप्ति में कोई बाधा नहीं समझता, बल्कि इस्लाम तो आया ही इसीलिए है कि वह मानव को दुनिया में रहना सिखाए।

इस्लाम क्या है

इस्लाम क्या है

जयपुर राज-महल में चल रहे एक विशेष कार्यक्रम में 11 जून 1971 ई0 की रात में इस्लाम का परिचय कराने हेतु यह निबन्ध प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में गणमान्य जनों के अतिरिक्त स्वंय राजमाता गायत्री देवी भी उपस्थित थीं।

इस्लाम का आरम्भ

इस्लाम का आरम्भ

इस्लाम की शुरुआत उसी वक़्त से है, जब से इंसान की शुरुआत हुई है। इस्लाम के मायने हैं, ‘‘ख़ुदा के हुक्म का पालन''। और इस तरह यह इंसान का पैदाइशी धर्म है। क्योंकि ख़ुदा ही इंसान का पैदा करने वाला और पालने वाला है इंसान का अस्ल काम यही है कि वह अपने पैदा करने वाले के हुक्म का पालन करे। जिस दिन ख़ुदा ने सब से पहले इंसान यानी हज़रत आदम और उन की बीवी, हज़रत हव्वा को ज़मीन पर उतारा उसी दिन उसने उन्हें बता दिया कि देखो: ‘‘तुम मेरे बन्दे हो और मैं तुम्हारा मालिक हूँ। तुम्हारे लिए सही तरीक़ा यह है कि तुम मेरे बताये हुए रास्ते पर चलो।

इतिहास के साथ अन्याय

इतिहास के साथ अन्याय

दुर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा, और उनको दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढ़ंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी साम्प्रदायिक एवं स्वार्थी तत्व इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने और उसे ग़लत रंग देने में लगे हुए है।

मानव जीवन और परलोक

मानव जीवन और परलोक

मृत्यु-पश्चात् जीवन (परलोक, ईश्वरीय न्याय, कर्मों का पूरा बदला, स्वर्ग पाने की ललक, नरक से बचने की चिंता) की इस्लामी अवधारणा ने सांसारिक जीवन के किसी भी पहलू को अछूता, किसी भी क्षेत्र को अप्रभावित न छोड़ा। इतिहास दुनिया की सबसे उजड्ड, बेढब, अनपढ़, असभ्य, शराबी, दुराचारी, दुष्चरित्र, बद्दू क़ौम के सदाचरण, ईमानदारी, सभ्यता, दयालुता, क्षमाशीलता, जन-सेवा, परमार्थ, त्याग, उत्सर्ग, ज्ञान-विज्ञान तथा मानवीय-मूल्यों की श्रेष्ठता व उत्कृष्टता को रिकार्ड में ले आने पर विवश हो गया। यह बदलाव, यह सम्पूर्ण क्रान्ति लाने में इस्लाम की मूलधारणा ‘विशुद्ध' एकेश्वरवाद के साथ लगी हुई ‘परलोकवाद-अवधारणा' की ही अस्ल भूमिका व अस्ल योगदान है।

नारी और इस्लाम

नारी और इस्लाम

''ऐ लोगो! अपने रब से डरो, जिसने तुम्हे एक ज़ान से पैदा किया, और उससे उसका जोड़ा बनाया और उन दोनों से बहुत-से मर्द और औरतें फैंला दी, और अल्लाह से डरो जिसका वास्ता देकर तुम एक-दूसरे से अपने ह़क मांगते हो, और रिश्तों का सम्मान करो । निस्संदेह अल्लाह तुम्हारी निगरानी कर रहा है।‘‘ (क़रआन 4:1)

नशाबन्दी और इस्लाम

नशाबन्दी और इस्लाम

"लोग आप से शराब और जुए के विषय में पूछते हैं। कह दीजिए कि इन दोनों में बड़ा गुनाह है और यद्यपि इन में लोगों के लिए कुछ लाभ भी है, किन्तु इन का गुनाह इन के लाभ से कहीं अधिक है।" (2:219) शराब के सिलसिले में इस्लाम की सख़ती का यह हाल है कि एक व्यक्ति ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से पूछा कि: "क्या दवा के रूप में उसे प्रयोग में लाने की इजाज़त है ? तो आपने कहा, "शराब दवा नहीं बल्कि बीमारी है।"

उंच-नीच छूत-छात

उंच-नीच छूत-छात

"लोगो! हमने तुम को एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और फिर तुम्हें परिवारों और वंशों में विभाजित कर दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। तुम में अधिक बड़ा वह है जो ख़ुदा का सर्वाधिक भय रखने वाला है और निसन्देह अल्लाह जानने वाला और ख़बर रखने वाला है।" (सूरः हुजुरात)

शांति और सम्मान

शांति और सम्मान

जिस धर्म या संस्कृति की आधारशिला सत्य न हो उसकी कोई भी क़ीमत नहीं। जीवन को मात्र दुख और पीड़ा की संज्ञा देना जीवन और जगत् दोनों ही का तिरस्कार है। क्या आपने देखा नहीं कि संसार में काँटे ही नहीं होते, फूल भी खिलते हैं। जीवन में बुढ़ापा ही नहीं यौवन भी होता है। जीवन निराशा द्वारा नहीं, बल्कि आशाओं और मधुर कामनाओं द्वारा निर्मित हुआ है। हृदय की पवित्र एवं कोमल भावनाएँ निरर्थक नहीं हो सकतीं। क्या बाग़ के किसी सुन्दर महकते फूल को निरर्थक कह सकते हैं?

हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) सबके लिए

हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) सबके लिए

सार्वभौमिकता के परिप्रेक्ष्य में, हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के, भारतवासियों का भी पैगम्बर होने की धारणा तकाजा करती हैं कि आप (सल्ल.) के समकालीन भारत पर एक संक्षिप्त दृष्टि अवश्य डाली जाए, और चूंकि आप की पैगम्बरी का ध्येय एवं आप (सल्ल.) के ईशदूतत्व का लक्ष्य मानव-व्यक्तित्व, मानव-समाज के आध्यात्मिक व सांसारिक हर क्षेत्र मे सुधार, परिवर्तन, निखार व क्रान्ति लाना था, इसलिए यह दृष्टि भारतीय समाज के राजनैतिक, सामाजिक व धार्मिक सभी पहलुओं पर डाली जाए।