بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم अल्लाह के नाम पर, जिसका नाम पृथ्वी या आसमान में कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचाता है, और वह सुनने वाला, जानने वाला है

November 29,2022

क़ुरआन प्रबोधन - 9: उलूमुल-क़ुरआन (क़ुरआन से संबंधित ज्ञान)

29 Oct 2022
क़ुरआन प्रबोधन - 9: उलूमुल-क़ुरआन (क़ुरआन से संबंधित ज्ञान)

 

 

क़ुरआन प्रबोधन - 9: उलूमुल-क़ुरआन (क़ुरआन से संबंधित ज्ञान)

डॉ० महमूद अहमद ग़ाज़ी

अनुवादक: गुलज़ार सहराई

लेक्चर नम्बर-9 (16 अप्रैल 2003)

[क़ुरआन से संबंधित ये ख़ुतबात (अभिभाषण), “मुहाज़राते-क़ुरआनी” जिनकी संख्या 12 है, इनमें पवित्र क़ुरआन, उसके संकलन के इतिहास और उलूमे-क़ुरआन (क़ुरआन संबंधी विद्याओं) के कुछ पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई है। इनमें यह बताया गया है कि क़ुरआन को समझने और उसकी व्याख्या करने की अपेक्षाएँ क्या हैं, उनके लिए हदीसों और अरबी भाषा के ज्ञान के साथ-साथ अरबों के इतिहास और प्राचीन अरब साहित्य की जानकारी भी क्यों ज़रूरी है और इस जानकारी के अभाव में क़ुरआन के अर्थों को समझने में क्या-क्या समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। ये अभिभाषण क़ुरआन के शोधकर्ताओं और उसे समझने के इच्छुक पाठकों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।]

उलूमुल-क़ुरआन के अन्तर्गत वे सारे ज्ञान-विज्ञान आते हैं जो इस्लामी विद्वानों, क़ुरआन के टीकाकारों और समाज के चिन्तकों ने पिछले चौदह सौ वर्षों के दौरान में पवित्र क़ुरआन के हवाले से संकलित किए हैं। एक दृष्टि से इस्लामी ज्ञान एवं कलाओं का पूरा भंडार पवित्र क़ुरआन की तफ़सीर (टीका) से भरा पड़ा है। आज से कमो-बेश एक हज़ार वर्ष पहले क़ुरआन के प्रसिद्ध टीकाकार और फ़क़ीह (धर्मशास्त्री) क़ाज़ी अबू-बक्र इब्नुल-अरबी ने लिखा था कि मुसलमानों के जितने ज्ञान एवं कलाएँ हैं, जिनका उन्होंने उस वक़्त अनुमान सात सौ के क़रीब लगाया था, वे सब के सब अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से हदीस की व्याख्या हैं, और हदीस पवित्र क़ुरआन की व्याख्या है। इस दृष्टि से मुसलमानों के सारे ज्ञान एवं कलाएँ उलूमुल-क़ुरआन की हैसियत रखते हैं।

इस्लाम से जुड़ाव का भी यही तक़ाज़ा है, ज्ञान के एकत्व का तार्किक परिणाम भी यही है, और वैचारिक एकत्व और सृष्टि के एकत्व की धारणा का भी यही फल है कि सारे ज्ञान एवं कलाओं को पवित्र क़ुरआन से वही संबंध हो जो पत्तों को अपनी शाखाओं से, शाखाओं को अपने तने से और तने को अपनी जड़ से होता है। यही वह उद्देश्य है जिसकी प्राप्ति के लिए पिछले साठ सत्तर वर्षों से चिन्तक एवं बुद्धिजीवी प्रयासरत हैं। यह वह प्रयास है जिसको आज सारे सामयिक ज्ञान-विज्ञान को इस्लामी बनाने यानी Islamization of knowledge की संज्ञा दी जाती है, आज मुसलमानों के पास समसामयिक तमाम ज्ञान एवं कलाएँ अधिकतर पश्चिमी साधनों एवं मूलस्रोतों से पहुँची हैं। इन सब ज्ञान एवं कलाओं का आधार और इन सब विचारधाराओं की उठान एक ग़ैर-इस्लामी वातावरण में हुई है। ग़ैर-इस्लामी विचारधारा एवं धारणाओं और अधार्मिक विचारधारा तथा आधार पर इन सारे ज्ञान एवं कलाओं का विकास हुआ है।

यही वजह है कि क़ुरआनी ज्ञान एवं कलाओं में और आधुनिक काल के पश्चिमी ज्ञान एवं कलाओं में बहुत-से स्थानों पर एक विरोधाभास और अन्तर्विरोध महसूस होता है। आधुनिक शिक्षित मानस जो पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा पाकर पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति के वातावरण में तैयार हुआ है, वह बहुत-सी ऐसी धारणाओं को एक तार्किक और स्वाभाविक परिणाम के तौर पर स्वीकार कर लेता है जो पवित्र क़ुरआन की निगाह में सिरे से अस्वीकार्य हैं। इसी तरह से बहुत-सी ऐसी चीज़ें जो पवित्र क़ुरआन की नज़र में सर्वमान्य चीज़ों में शामिल हैं और जिनको अतीत में एक ईमानवाला व्यक्ति बनाए हुए सिद्धांतों के तौर पर स्वीकार कर लेता था और आज भी एक मुसलमान को उन्हें स्वीकार करना चाहिए, वे आधुनकि काल की विचारधारा और धारणाओं के आलोक में संदिग्ध और अस्वीकार्य या कम से कम विवादित तो क़रार पाती ही हैं।

इसलिए जब हम उलूमुल-क़ुरआन की बात करते हैं तो हमारे सामने दो दायरे होते हैं। एक तुलनात्मक रूप से तंग और छोटा दायरा वह है जिसमें वे ज्ञान-विज्ञान शामिल हैं जिनका संबंध प्रत्यक्ष रूप से पवित्र क़ुरआन की तफ़सीर (टीका) और समझ से है, जिसपर आज बात होगी। उलूमुल-क़ुरआन का एक और तुलनात्मक रूप से व्यापक और बड़ा दायरा भी है, और वह दायरा इतना बड़ा है कि उसमें इंसान के वे तमाम वैचारिक प्रयास शामिल हैं जिनकी दिशा उचित हो और जिनका आधार सही हो। यह वह दायरा है जिसमें आए दिन नए-नए ज्ञान एवं अन्तर्ज्ञान शामिल हो रहे हैं, और जिनमें लगातार वृद्धि हो रही है और होती रहेगी। इस दायरे में हर वह चीज़ शामिल है, जिससे मुसलमानों ने अपनी वैचारिक एवं ज्ञानपरक गतिविधियों में काम किया हो और जो पवित्र क़ुरआन के बताई हुई धारणाओं के अनुसार और उसकी आधारभूत शिक्षा के अनुकूल हो।

जब मुसलमान अपने सारे वर्तमान सामाजिक और मानवीय ज्ञान को नए सिरे से संकलित करेंगे तो फिर वे एक प्रकार से क़ुरआन को समझने में सहायक सिद्ध होंगे, जिस तरह अतीत में मुसलमानों के सामाजिक और मानवीय ज्ञान ने क़ुरआन को समझने में सहायता की। मुसलमानों का दर्शन और इतिहास अपने ज़माने में इस्लामी विचारधारा और इस्लामी शिक्षा के प्रसार में सहायक सिद्ध हुआ। जब आज का उसूले-क़ानून, आज का राजनीतिशास्त्र, आज का अर्थशास्त्र और आज के दूसरे तमाम ज्ञान-विज्ञान इस्लामी आधार पर नए सिरे से संकलित हो जाएँगे, तो उस वक़्त एक-बार फिर इन सब ज्ञानों की हैसियत पवित्र क़ुरआन के सेवक और क़ुरआन समझने के उपकरणों तथा संसाधनों की होगी। उस समय यह ज्ञान इसी जीवन-धारणा और सृष्टि की धारणा को बढ़ावा देंगे जो पवित्र क़ुरआन ने दिया है। इस वक़्त यह ज्ञान पवित्र क़ुरआन के सांस्कृतिक मूल्यों को नुमायाँ करेंगे और उस धारणा के आधार पर कुछ और नए ज्ञान और कलाओं को जन्म देंगे जो पवित्र क़ुरआन में मिलती है।

आज की चर्चा का केन्द्र केवल पहला दायरा होगा। इसलिए कि यह उन ज्ञान और कलाओं का दायरा है जिनका पवित्र क़ुरआन की टीका से प्रत्यक्ष रूप से संबंध है। इस ज्ञान एवं अन्तर्ज्ञान की सूची भी बहुत लम्बी है। लेकिन वह अपने अंदर एक ख़ास तरह की सीमितता रखते हैं। यानी उन कलाओं में से किसी एक ख़ास कला में विस्तार तो हो सकता है, लेकिन नए ज्ञान और नई कलाओं के जन्म लेने की संभावनाएँ इस दायरे में तुलनात्मक रूप से सीमित हैं। इसलिए कि पवित्र क़ुरआन का स्वंय अध्ययन करने और टीका लिखने के लिए जिन बातों और मामलों पर ग़ौर करने की ज़रूरत है, उनपर बहुत विस्तार के साथ इस्लामी विद्वानों ने बात की है, और अब बहुत थोड़े पहलू ऐसे रह गए हैं जिनमें कोई नई बात कही जा सके। वर्तमान तर्कों में विस्तार तो हो सकता है, और वर्तमान विचारों में तदधिक गहराई तो पैदा हो सकती है, लेकिन यह पूरी तरह किसी नई सोच को प्रस्तुत करने की संभावना यहाँ बहुत कम होती है। यही वजह है कि उलूमुल-क़ुरआन के इस दायरे में विस्तार और बढ़ोतरी अब बहुत कम होती है। शायद सदियों में एक-आध ऐसा विद्वान सामने आता है जो इस मामले में कोई बिलकुल नई बुनियाद डाल सके, वह भी इतनी निरन्तरता और अधिकता से नहीं होता।

इन उलूमुल-क़ुरआन में वे चीज़ें शामिल हैं, जिनका संबंध कुरआन के अवतरण की कैफ़ियत, उसकी तारीख़, संकलन के चरणों, उसकी कार्य-विधि से है। इसके अलावा पवित्र क़ुरआन के संकलन एवं क्रमिकता के इतिहास, उसकी आयतों और सूरतों के अवतरण का अन्दाज़, अवतरण स्थल और अवतरण की परिस्थितियाँ, जिनके लिए सारगर्भित शब्दावली इल्मे-अस्बाबे-नुज़ूल (क़ुरआन के अवतरण के कारणों का ज्ञान) है। इससे अभिप्रेत वे घटनाएँ या वह स्थिति है जिनमें पवित्र क़ुरआन की कोई आयत या आयतें अवतरित हुई हों। अवतरण के कारण का महत्त्व अपनी जगह सर्वमान्य है।

तर्तीबे-नुज़ूली (अवतरण का क्रम) का इस दृष्टि से भी बेहद महत्त्व है कि इसी से आदेशों के विकास को समझने में बड़ी सहायता मिलती है। पवित्र क़ुरआन में किस तरह क्रम से काम लेकर मार्गदर्शन किया गया, इस क्रम प्रक्रिया को समझने के लिए ज़रूरी है कि आयतों और सूरतों के बारे में तर्तीबे-नुज़ूल का इल्म हो। फिर यह जानना भी ज़रूरी है कि कौन-सी आयत मक्की है और कौन-सी मदनी। इसलिए कि मक्की काल में आदेशों का प्रकार और था और मदनी काल में और था। मक्की सूरतों में अनगिनत आयतें ऐसी हैं जिनका अर्थ समझने के लिए उन्हें मदनी सूरतों के साथ मिलाकर पढ़ना ज़रूरी है। उदाहरण के रूप में मक्की सूरतों में अधिकतर जगहों पर यह बात वर्णित हुई है। لَسْتَ عَلَیْھِمْ بِمُصَیْطِرٍ (लस-त अलैहिम बिमुसैतिरिन) यानी “आप उनपर ठेकेदार नहीं हैं।” यानी अगर वे मानते हैं तो मानें और अगर नहीं मानते तो न मानें। यह मानो उन ज़िद्दी बहुदेववादियों से अलग होने का एलान है, जो इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन जब अल्लाह के रसूल (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम) मदीना मुनव्वरा चले गए और मुसलमानों का एक अलग समाज वुजूद में आ गया और एक अलग इस्लामी हुकूमत क़ायम हुई जिसमें इस्लाम सत्ता में आ गया और इस्लामी क़ानून लागू हो गया तो उस वक़्त इस्लामी क़ानून के बारे में यह नहीं कहा जा सकता था कि मानो यान न मानो। अब स्थिति यह थी कि आप इस्लामी विचारधारा पर ईमान रखें या न रखें इसकी तो ग़ैर-मुस्लिमों को अनुमति थी, लेकिन क़ानून और शरीअत व्यवस्था का मामला इससे भिन्न था। क़ानून तो राज्य की व्यवस्था थी, वह सबको अवश्य ही माननी पड़ती है। कोई चोर यह नहीं कह सकता कि मैंने चूँकि इस्लाम को नहीं स्वीकार किया, इसलिए मैं इस्लाम के क़ानून को भी नहीं मानता, इसलिए मैं हाथ कटवाने के लिए तैयार नहीं हूँ। अब इस तरह के बहानों के आधार पर राज्य की व्यवस्था को भिन्न-भिन्न रूप नहीं दिया जा सकता और न इसकी अनुमति दी जा सकती है। अब वे तमाम आयतें जिनमें बहुदेववादियों के मानने या न मानने का ज़िक्र है केवल मज़हबी उसूलों के मानने या न मानने तक सीमित रहेंगी। इन आयतों का हवाला देकर इस्लामी राज्य के क़ानून और व्यवस्था को मानने से इनकार नहीं किया जा सकता, और न इस की अनुमति दी जा सकती है। इन ग़लत-फ़हमियों से बचने के लिए मक्की और मदनी सूरतों के बारे में जानकारी होना ज़रूरी है।

उलूमुल-क़ुरआन का एक महत्त्वपूर्ण विषय ‘मुहकम’ और ‘मुतशाबिह’ है। ‘मुहकमात’ से अभिप्रेत वे आयतें हैं जिनका अर्थ, जिनके शब्द और जिनका सन्देश इतना स्पष्ट और दोटूक है कि उसके बारे में कोई दो इंसानों के दरमियान मतभेद पैदा नहीं हो सकता। और उन आयतों का अर्थ निर्धारित करने में कोई दो राएँ नहीं हो सकतीं। उदाहरणार्थ पवित्र क़ुरआन में है وَآقِیْمُوْالصَّلوٰۃَ, (व अक़ीमुस्सला-त) अर्थात् “और नमाज़ क़ायम करो।” अब नमाज़ क़ायम करने से क्या तात्पर्य है, यह हर मुसलमान जानता है। इसके बारे में किसी सन्देह, मनमानी व्याख्या या झूठ की कोई संभावना नहीं। या मिसाल के तौर पर क़ुरआनी आयत है, وَفِىٓ أَمْوَٰلِهِمْ حَقٌّ لِّلسَّآئِلِ وَٱلْمَحْرُومِ (वफ़ी अमवालिहिम हक़्क़ुन लिस्साइलि वल-महरूम) अर्थात् “उनके मालों में वंचितों और माँगनेवालों का हक़ है।” (क़ुरआन, 51:19) सब जानते हैं कि यहाँ ‘माल में हक़’ से क्या मुराद है।

लेकिन कुछ आयतें ऐसी हैं जिनमें या तो प्रतीकात्मकता का रंग अपनाया गया है, या अलंकार की भाषा में बात की गई है, या इंसानों की समझ के निकट लाने के लिए एक बात को इंसानों की समझ के अनुसार बयान किया गया है। ये वे मामले हैं जो परोक्ष-जगत् से संबंध रखते हैं। पैदाइश से पहले और मरने के बाद की ज़िंदगी से संबंधित हैं, जिनका संबंध आलमे-बरज़ख़ (मरने के बाद से लेकर क़ियामत के दिन पुनः जीवित होने के बीच की स्थित) और क़ियामत की हालत से है कि वहाँ क्या मामले और क्या कैफ़ियतें सामने आएँगी। ऐसी तमाम आयतें ‘मुतशाबिहात’ कहलाती हैं जिनमें इंसानों की समझ के समान शब्दों और इबारतों के द्वारा किसी चीज़ को बयान किया गया हो।

उलूमुल-क़ुरआन का एक महत्त्वपूर्ण विषय असालीबे-मुफ़स्सिरीन (टीकाकारों की शैलियाँ) या मनाहिजे-मुफ़स्सिरीन (टीकाकारों के तरीक़े) भी हैं। इस शीर्षक के अन्तर्गत इस बात पर बहस की जाती है कि टीकाकारों ने पवित्र क़ुरआन की टीका करने के दौरान में कौन-कौन सी शैलियाँ और तरीक़े अपनाए। इस पहलू पर हम इससे पहले चर्चा कर चुके हैं। वहाँ हमने क़ुरआन की टीका करने के साहित्यिक, फ़िक़्ही, शब्दकोशीय और दार्शनिक तरीक़ों पर कुछ विस्तार से चर्चा की थी और लगभग दस तरीक़े चर्चा के अन्तर्गत आए थे। इन सब का अध्ययन भी उलूमुल-क़ुरआन में शामिल है।

उलूमुल-क़ुरआन का एक विभाग ‘क़िरअत’ है, यानी पवित्र क़ुरआन को पढ़ने का अंदाज़ और उसमें आवाज़ों का उतार-चढ़ाव और उनका ऊँचा-नीचा होना। इसपर हम अभी चर्चा करेंगे। क़ुरआन की तिलावत (पाठ) में आवाज़ों की बंदिश, स्वर कम या ज़्यादा होना और आवाज़ों के उतार-चढ़ाव के सन्दर्भ में मैंने डॉक्टर हमीदुल्लाह साहब के हवाले से एक नौ-मुस्लिम की घटना पिछले एक अभिभाषण में उद्धृत की थी। इससे इस कला के महत्त्व और गहराई का एक-बार फिर अंदाज़ा कर लें। पवित्र क़ुरआन में औक़ाफ़ (विराम चिह्न) कहाँ-कहाँ हैं। कहाँ वक़्फ़ करना (ठहरना) ज़रूरी है और कहाँ वक़्फ़ करना ज़रूरी नहीं है, इसका पवित्र क़ुरआन के विषय से बड़ा गहरा संबंध है। फिर रस्मे-उसमानी यानी पवित्र क़ुरआन के वे हिज्जे (Spelling) जो उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ज़माने में ज़ैद-बिन-साबित (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपनाए, वे क्या थे और उसमें कौन-कौन से नुमायाँ पहलू हैं। फिर एक सवाल यह भी पैदा हुआ कि क्या रस्मे-उस्मानी की पैरवी अनिवार्य है। और अगर अनिवार्य नहीं है तो इससे किस हद तक विमुख हुआ जा सकता है।

उलूमुल-क़ुरआन में यह सब और इस तरह के दूसरे अनगिनत विषय हैं जो इस्लामी विद्वानों के शोध एवं शिक्षण तथा लिखने-लिखाने का विषय रहे हैं। इस विषय पर चौथी-पाँचवीं शताब्दी हिजरी से विद्वानों ने लिखना शुरू किया। इससे पहले आरंभिक तीन शताब्दियों में उलूमुल-क़ुरआन पर ज़्यादा नहीं लिखा गया। विधिवत लेख इस विषय पर चौथी सदी के बाद ही के हैं। इस विषय पर इससे पहले संभवतः ज़्यादा इसलिए नहीं लिखा गया कि पहली तीन सदियाँ दरअस्ल संबंधित सामग्री उपलब्ध करने की सदियाँ थीं। जब सारी सामग्री रस्मे-उस्मानी, क़िरअत के ढंग, फ़िक़्ही उसूलों पर और अरबी भाषा की साहित्यिक शैलियों पर एकजुट होकर सामने आ गई तो उसके बाद ही अलग-अलग विषयों को संकलित करने की प्रक्रिया शुरू हुई और वे चीज़ें सामने आनी शुरू हुईं जिनको हम आज उलूमुल-क़ुरआन कहते हैं।

इस विषय पर सबसे पहली किताब जो आज उपलब्ध है, वह अल्लामा इब्ने-जौज़ी की किताब ‘फ़ुनूनुल-अफ़नान फ़ी उलूमुल-क़ुरआन’ है। यह एक बहुत बड़े मुफ़स्सिर (टीकाकार) भी थे, मुहद्दिस (हदीस विशेषज्ञ) भी थे और फ़क़ीह (इस्लामी धर्मशास्त्री) भी, और एक दृष्टि से मनोविशेषज्ञ भी थे। इसलिए कि इंसान के स्वभाव में, दिल में और आदतों में जो गुमराहियों पैदा होती हैं, उनपर उन्होंने एक अत्यंत लाभकारी और विद्वतापूर्ण किताब लिखी है जो अपने विषय पर एक बिल्कुल अलग किताब है। मैं आपको मश्वरा दूँगा कि आप इस किताब को ज़रूर पढ़ें। इस किताब का नाम ‘तलबीसे-इब्लीस’ है। इस किताब में यह बताया गया है कि जब इब्लीस (शैतान) इंसान को बहकाता है तो कैसे बहकाता है और उसके बहकाने के क्या तरीक़े होते हैं। फिर इस किताब में उन्होंने एक विशेषज्ञतापूर्ण प्रयास यह किया है कि उन्होंने यह बताया है कि विभिन्न वर्गों के लोगों को शैतान के बहकाने का अलग तरीक़ा होता है। शैतान हर एक के साथ लगा होता है। विद्वान व्यक्ति के साथ जो शैतान होगा वह भी विद्वान होगा, ताकि उसके स्तर पर उसको बहका सके। अब उसके रास्ते कौन-कौन से हैं, यह चीज़ पढ़ने से संबंध रखती है कि एक व्यापारी कैसे बहकता है, एक शिक्षक, क़ाज़ी (न्यायाधीश) और विद्वान कैसे बहकता है। कहने का तात्पर्य यह बहुत दिलचस्प किताब है।

एक बहुत बड़ी मूल्यवान पुस्तक अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती की ‘अल-इत्क़ान फ़ी उलूमिल-क़ुरआन’ है। इस किताब का उर्दू अनुवाद भी आम तौर पर उपलब्ध है। अल्लामा सुयूती का संबंध मिस्र से था। वहाँ सुयूत नामक शहर जो अल्लामा का वतन था, आज भी मौजूद है। अगर कहा जाए कि इस्लामी इतिहास में चंद लोग जो हर फ़न मौला गुज़रे हैं यह उनमें से एक थे, तो ग़लत न होगा। उन्होंने लगभग 500 किताबें लिखी हैं और इस्लामी ज्ञान एवं कलाओं का कोई मैदान ऐसा नहीं है जिसमें उनकी किताबें मौजूद न हों। तफ़सीर, हदीस, तर्कशास्त्र, साहित्य, इतिहास, जीवनी, चिकित्सा..... मतलब हर विषय पर उनकी रचनाएँ मौजूद हैं। उनका इंतिक़ाल 911 हिजरी में हुआ। उनकी किताब ‘अल-इत्क़ान फ़ी उलूमिल-क़ुरआन’ को पढ़कर अंदाज़ा हो जाता है कि उनके ज़माने तक उलूमुल-क़ुरआन के विषय पर कितना व्यापक काम हो चुका था।

उर्दू भाषा में भी इस विषय पर किताबें मौजूद हैं। प्राचीनतम पुस्तक उन्नीसवीं शताब्दी के एक बुज़ुर्ग मौलाना अबदुल-हक़ हक़्क़ानी की है जो तफ़सीर हक़्क़ानी के भी लेखक हैं। मौलाना हक़्क़ानी ठोस और बड़े आलिम थे। उलूमुल-क़ुरआन के विषय पर उनका बहुत-सा काम है। उन्होंने एक किताब लिखी थी, ‘अत-तिबयान फ़ी उलूमिल-क़ुरआन’। मौलाना की ‘तफ़सीरे-हक़्क़ानी’ इस दृष्टि से नुमायाँ स्थान रखती है कि आधुनिक काल के ज्ञान एवं कलाओं के नतीजे के तौर पर पवित्र क़ुरआन और इस्लाम के बारे में जो सन्देह लोगों के ज़ेहनों में पैदा हुए हैं उनका उन्होंने जवाब देने की कोशिश की है।

उर्दू में एक और किताब उलूमुल-क़ुरआन पर मौलाना मुहम्मद तक़ी उस्मानी की है जो आज से कमो-बेश तीस वर्ष पहले छपी थी। इस किताब में वर्णित वार्ताएँ अधिकतर वही हैं जो ‘अल-इत्क़ान फ़ी उलूमिल-क़ुरआन’ में अल्लामा सुयूती ने बयान की हैं। एक किताब मौलाना मुहम्मद मालिक कांधलवी ने ‘मनाज़िलुल-इरफ़ान फ़ी उलूमिल-क़ुरआन’ के नाम से लिखी थी जो आम मिल जाती है।

जहाँ तक पवित्र क़ुरआन की वर्णन-शैली का संबंध है इससे संबंधित भी कुछ चीज़ें उलूमुल-क़ुरआन में चर्चा के अन्तर्गत आती हैं। और जिन लोगों ने उलूमुल-क़ुरआन पर लिखा है उन्होंने उन सवालों को उठाया है। उनमें से कुछ का उल्लेख हम आज की चर्चा में करेंगे।

भिन्न विद्वानों ने उलूमुल-क़ुरआन के शीर्षक से बहुत-सी बहसों पर क़लम उठाया है, उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण बहसों पर इन अभिभाषणों में चर्चा हो चुकी है, लेकिन कुछ ऐसे विषय जिन पर उलूमुल-क़ुरआन के नाम से विद्वानों ने बहस की है निम्नलिखित हैं—

1. फ़ज़ाइले-क़ुरआन (क़ुरआन के गुण एवं पारलौकिक लाभ) उलूमे-क़ुरआन (क़ुरआन से संबंधित ज्ञान) का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। ख़ुद क़ुरआन मजीद के अलावा हदीसों में पवित्र क़ुरआन और उसकी भिन्न सूरतों के फ़ज़ाइल (गुणों एवं पारलौकिक लाभों) के बारे में जो कुछ बयान हुआ है वह विद्वानों ने इकट्ठा कर दिया है। इन फ़ज़ाइल का विश्वस्ततम स्रोत इमाम बुख़ारी (रहमतुल्लाह अलैह) की ‘अल-जामिउस-सहीह’ है जिसमें किताब फ़ज़ाइले-क़ुरआन के आम शीर्षक के तहत इमाम बुख़ारी (रहमतुल्लाह अलैह) ने 37 अध्याय बाँधे हैं और विश्वसनीय हदीसों का एक बड़ा संग्रह फ़ज़ाइलुल-क़ुरआन के विषय पर जमा कर दिया है। इमाम बुख़ारी (रहमतुल्लाह अलैह) और दूसरे बड़े मुहद्दिसीन के अलावा जिन बुज़ुर्गों ने सबसे पहले फ़ज़ाइले-क़ुरआन के शीर्षक से अलग किताबें लिखीं उनमें इमाम नसाई (मृत्यु 303 हिजरी) इमाम अबू-बक्र-बिन-अबी-शैबा (मृत्यु 235 हिजरी) और इमाम अबू-उबैदा अल-क़ासिम-बिन-सलाम (मृत्यु 224 हिजरी) के नाम शामिल हैं।

फ़ज़ाइले-क़ुरआन पर एक प्रसिद्ध हदीस जो इमाम तिरमिज़ी (रहमतुल्लाह अलैह) और इमाम दारमी (रहमतुल्लाह अलैह) आदि ने अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत की है, इंशाअल्लाह आख़िरी अभिभाषण में सनद (प्रमाण) के साथ बयान करूँगा और इसी पर उस अभिभाषण का यह क्रम समाप्त होगा।

2. ‘ख़वासुल-क़ुरआन’ (क़ुरआन की विशेषताएँ) भी फ़ज़ाइले-क़ुरआन ही की मानो एक शाखा है। इस शीर्षक के तहत उन रिवायतों और हदीसों को जमा किया जाता है जिनमें पवित्र क़ुरआन, उसकी विभिन्न सूरतों और भिन्न आयतों के विशेष अलौकिक लाभों और परिणामों का उल्लेख किया गया है। उदाहरणार्थ यह रिवायत कि सूरा फ़ातिहा पढ़कर रोगी को झाड़ा जाए तो उसके रोगमुक्त होने की आशा है। या यह रिवायत कि ज़हर पेट में चले जाने का इलाज सूरा फ़ातिहा है। इसी तरह सहीह मुस्लिम की यह रिवायत की जिस घर में सूरा बक़रा की तिलावत की जाए वहाँ शैतान दाख़िल नहीं होता आदि।

इस तरह की बहुत-सी हदीसें अलग-अलग सूरतों और आयतों के बारे में हदीस की किताबों में बिखरी हुई हैं। ख़वासुल-क़ुरआन के विषय पर लिखनेवालों ने इन सब हदीसों को जमा करके उनके अलग-अलग संग्रह भी संकलित किए हैं।

3. ‘अस्माए-सुव-र-क़ुरआन व तफ़सीलि-आयात’ (क़ुरआनी सूरतों के नाम और आयतों का विस्तृत वर्णन)। इस शीर्षक के तहत पवित्र क़ुरआन का उप विभाजन, आयतों, सूरतों, अजज़ा (अंशों) आदि के बारे में जानकारी जमा की जाती है। इन जानकारियों में आयतों और अक्षरों की संख्या आदि भी शामिल होती है।

आयत की कलात्मक परिभाषा, आयत के शब्दकोशीय अर्थों, सूरा के शाब्दिक अर्थों और सूरा के पारिभाषिक अर्थों पर भी उलूमे-क़ुरआन पर लिखनेवाले विद्वानों ने चर्चा की है। क़ुरआनी आयतों की संख्या के बारे में क़ारी (क़ुरआन को उसके शुद्ध उच्चारण में पढ़नेवाले) लोगों में कुछ मतभेद हैं। जिसका कारण केवल यह है कि कुछ लोगों ने एक ही इबारत को एक आयत और कुछ दूसरे लोगों ने दो आयतें क़रार दिया। इस मतभेद का मूल कारण वक़्फ़ (विराम चिह्न) का मतभेद है कि कहाँ वक़्फ़ मुतलक़ या वक़्फ़ लाज़िम (ठहरना अनिवार्य) है और कहाँ वक़्फ़ जायज़। इस आंशिक मतभेद की वजह से आयतों की संख्या के बारे में कई कथन सामने आए। अधिकतर कथनों में छः हज़ार दो सौ तक का अंक तो समान है। इससे ऊपर के बारे में कथन भिन्न हैं।

अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती के शोध के अनुसार पवित्र क़ुरआन के कुल शब्दों की संख्या सतत्तर हज़ार नौ सौ चौंतीस (77934) है। निकट अतीत के एक और शोधकर्ता अल्लामा अब्दुल-अज़ीम ज़रक़ानी का शोध भी यही है। जहाँ तक अक्षरों का संबंध है तो उनकी संख्या अल्लामा सुयूती ने तीस लाख बीस हज़ार छः सौ इकहत्तर (3020671) बयान की है।

पवित्र क़ुरआन की सबसे लम्बी आयत सूरा बक़रा की आयत 280 यानी आयते-मदीना है। छोटी, एक शब्द की, बल्कि एक अक्षर की आयतें भी क़ुरआन में मौजूद हैं।

4. उलूमे-क़ुरआन का एक महत्त्वपूर्ण विषय ‘मुहकम’ और ‘मुतशाबिह’ आयतों की पड़ताल और उनकी विस्तृत जानकारी है। इसमें ‘मुतशाबिह’ के प्रकार, मुतशाबिहात की तत्त्वदर्शिता और ज़रूरत आदि पर भी चर्चा है। इसी तरह आम और ख़ास, आज़ाद और अनुकरण करनेवाला, अस्पष्ट और स्पष्ट और तार्किकता और सही अर्थ बयान करने की बहसों में तो दरअस्ल तफ़सीर और उलूमे-क़ुरआन से ज़्यादा उसूले-फ़िक़्ह की बहसें हैं। उनका उद्देश्य ज़्यादा-तर आदेशों और क़ानून का निकालना है।

5. ‘अमसालुल-क़ुरआन’ (क़ुरआन में दिए जानेवाले उदाहरण) उलूमे-क़ुरआन का एक महत्त्वपूर्ण और ज़रूरी मैदान है। बहुत-से विद्वानों और साहित्यकारों ने अमसालुल-क़ुरआन को अपने शोध का विषय बनाया और इसपर अलग से भी किताबें लिखीं और उलूमुल-क़ुरआन और तफ़सीर के विषय पर व्यापक किताबों में भी अमसालुल-क़ुरआन से बहस की। अमसालुल-क़ुरआन पर जिन लोगों ने लिखा है उन्होंने क़ुरआनी मिसालों (उदाहरणों) के साहित्यिक और कलात्मक गुणों पर भी चर्चा की है और उनके धार्मिक एवं नैतिक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला है।

पवित्र क़ुरआन में बहुत-से धार्मिक तथ्यों को समझाने और ज़ेहन में बिठाने के लिए मिसालों से काम लिया गया है और पवित्र क़ुरआन के बहुत-से अर्थों और तथ्यों को ऐसे सुन्दर आवरण में प्रस्तुत किया गया है जिससे बात तुरन्त पढ़ने और सुननेवाले के दिल में उतर जाती है। इस सन्दर्भ में कहीं उपमा से काम लिया गया है कहीं सांकेतिक रूप का इस्तेमाल है कहीं अलंकार का प्रयोग हुआ है।

अमसालुल-क़ुरआन के विषय पर अल्लामा मावरदी, अल्लामा इब्ने-क़य्यिम और अल्लामा सुयूती ने विस्तार से चर्चा की है। अल्लामा सुयूती ने बहुत-से ऐसे क़ुरआनी वाक्य भी बतौर उदाहरण नक़्ल किए हैं जो अरबी भाषा में मुहावरे के तौर पर आम हो गए हैं उनमें से कुछ यहाँ दर्ज किए जा रहे हैं। उदाहरणार्थ

ماعلی رسول الاالبلاغ (रसूल पर केवल सन्देश पहुँचाने की ज़िम्मेदारी है)

کل حزب بما لدیم فرحون (हर गिरोह जो कुछ उसके पास है, उसी में मगन है)

ھل جزاء الاحسان الاالاحسان (एहसान का बदला एहसान के सिवा और क्या हो सकता है)

6. अमसालुल-क़ुरआन से मिलता-जुलता एक महत्त्वपूर्ण विषय ‘अक़सामुल-क़ुरआन’ भी है। यानी पवित्र क़ुरआन में खाई जानेवाली कसमें। पवित्र क़ुरआन का हर विद्यार्थी जानता है कि पवित्र क़ुरआन में कई जगह क़समें खाई गई हैं। उदाहरणार्थ والنجم اذا ھویٰ (वन्नज्मि इज़ा हवा) अर्थात् “क़सम है सितारे की जब वह गिरे।” सवाल यह है कि यह क़सम क्यों खाई गई है। और इसमें क्या तत्त्वदर्शिता है। क़ुरआनी क़समों की तत्त्वदरिशताओं पर शुरू ही से विद्वान विचार करते रहे हैं। बहुत-से विद्वानों ने इस विषय पर अलग से भी किताबें लिखी हैं। हमारे भारतीय उपमहाद्वीप के प्रसिद्ध विद्वान मौलाना हमीदुद्दीन फ़राही ने भी ‘अल-अमआन फ़ी अक़सामिल-क़ुरआन’ के नाम से एक उच्च कोटि की किताब इस विषय पर लिखी थी। उनके शोध का सार यह है कि पवित्र क़ुरआन में जिन चीज़ों की क़सम खाई गई है, उनका इस विषय के सन्दर्भ से गहरा संबंध है।

उदाहरणार्थ इसी ‘वन्नज्म’ की मिसाल में देखे कि इसके तुरन्त बाद ही आयत आई है कि तुम्हारे यह साथी यानी अल्लाह के रसूल (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम) न गुमराह हुए हैं और न झुके हैं और जो बात कह रहे हैं, बिलकुल दुरुस्त कह रहे हैं और अल्लाह की वह्य के आधार पर कह रहे हैं। अब यहाँ नज्म की क़सम क्यों खाई गई? नज्म की क़सम खाने की ज़रूरत इसलिए पेश आई कि इस सूरा में आगे चलकर काहिनों का भी उल्लेख है। और काहिनों का दावा यह था कि उनके जिन्नात और शैतानों से संबंध होते हैं और वे जिन्नात और शैतान आसमानों में जाकर और वहाँ की सुन-गुन लेकर और झूठ में सच मिलाकर बयान करते हैं। कहा गया है कि यह ग़लत है और अगर कोई आसमानों से क़रीब होने की कोशिश भी करेगा तो उसपर शहाबे-साक़िब (उलका पिंड) से चोट लगाई जाएगी और वह वहाँ से भाग जाने पर मजबूर हो जाएगा। अल्लाह तआला के दरबार में कोई भी यों ही पहुँच नहीं  सकता। अब जब कहा गया “क़सम है सितारे की, जब वह गिरे” तो इसका साफ़ मतलब यह है कि यह पूरी धारणा ही ग़लत है, और जो बात उतारी जा रही है वह सौ प्रतिशत सही है, इसलिए कि इसको अल्लाह का फ़रिश्ता लेकर आया है। लेकिन सितारे की क़सम खाकर क़ुरआन की महानता को बयान किया गया है, जिसका संबंध वह्य के अवतरण से है और वह्य के ग़लत दावे करनेवाले और सितारों से चोट खानेवालों की ओर संकेत है। अक़सामुल-क़ुरआन पर और भी चर्चा ज़रा आगे चलकर करेंगे।

7. पवित्र क़ुरआन का एक और महत्त्वपूर्ण विषय ‘क़िससुल-क़ुरआन’ (क़ुरआन में वर्णित पैग़म्बरों के वृत्तांत) भी है। यानी पवित्र क़ुरआन में पिछले पैग़म्बरों और पिछली उम्मतों (नबी के अनुयायी समाजों) की जो घटनाएँ आई हैं, उनका अध्ययन और उनकी तत्त्वदर्शिता पर चिन्तन-मनन। इस सन्दर्भ में एक महत्त्वपूर्ण सवाल बार-बार आने का है। यानी पवित्र क़ुरआन में दोहराव क्यों है। और घटनाओं के इस दोहराव में क्या तत्त्वदर्शिता है, फिर जिन पैग़म्बरों (अलैहिमुस्सलाम) का उल्लेख पवित्र क़ुरआन में आया है उनके चयन किए जाने में क्या तत्त्वदर्शिता है। क़िससुल-क़ुरआन के मामले में पश्चिमी प्राच्यविद, यहूदी और ईसाई दोनों ने आपत्तियाँ करने में कसर नहीं छोड़ी, इन आपत्तियों का जवाब मुसलमान विद्वान पिछले सौ-सवा सौ वर्षों से देते आ रहे हैं।

क़िससुल-क़ुरआन के बारे में एक सैद्धांतिक बात हमेशा याद रखनी चाहिए। वह यह कि पवित्र क़ुरआन बुनियादी तौर पर एक ग्रन्थ और मार्गदर्शन है। इसका उद्देश्य इंसानों को अच्छा इंसान बनाना और इसी सांसारिक जीवन में उनके सुधार और पारलौकिक जीवन में उनके शाश्वत कल्याण का रास्ता बताना है। क़ुरआन का उद्देश्य न इतिहास बयान करना है, न मात्र घटनाएँ बयान करना है। पवित्र क़ुरआन के विपरीत बाइबल पुराना-नियम की बहुत-सी किताबें दरअस्ल प्राचीन यहूदी इतिहास के विवरणों पर आधारित हैं, बल्कि पुराना-नियम के कुछ हिस्से तो किसी प्राचीन सांख्यिकी विभाग के रजिस्टर मालूम होते हैं। यही वजह है कि पश्चिमवाले आम तौर से अपने धर्मग्रन्थों को इतिहास समझकर पढ़ते हैं और इसी ढंग से परिचित हैं। जब यह शैली उनको क़ुरआन में नहीं मिलती तो उलझनों का शिकार हो जाते हैं।

क़िससुल-क़ुरआन के विषय पर बहुत-से प्राचीन एवं आधुनिक मुसलमान विद्वानों ने क़लम उठाया है। उर्दू में इस विषय पर एक बहुत सारगर्भित किताब प्रसिद्ध विद्वान और स्वतंत्रता आन्दोलन के एक नेता मौलाना हिफ़्ज़ुर्रहमान स्योहारवी की क़िससुल-क़ुरआन है। जिसके कई ऐडिशन भारत और पाकिस्तान भारत के भिन्न शहरों से प्रकाशित हो चुके हैं।

क़िससुल-क़ुरआन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू घटनाओं के क्रम और दोहराव का है। दोहराव के विषय पर आगे एक अभिभाषण में बात होगी। क़िसस (वृत्तांतों) में दोहराव के विषय पर भारत ही के एक प्रसिद्ध विद्वान मौलाना अबुल्लैस इस्लाही ने एक बड़ा ज्ञानात्मक लेख लिखा था जो कई बार प्रकाशित हुआ है। इस लेख में मौलाना ने बड़े विस्तार से दोहराव के विषय पर चर्चा की है और बतौर मिसाल यह बताया है कि आदम और इब्लीस के वृत्तान्त में दोहराव क्यों है। इस लेख में उन्होंने अलग-अलग हर घटना की समीक्षा की है और एक-एक आयत की समीक्षा कर के बताया है कि इस ख़ास सन्दर्भ में इस घटना से क्या बताना अभीष्ट है और इस ख़ास मौक़े पर इसमें क्या दर्स छिपा है।

8. एक और विषय है हुजजुल-क़ुरआन, यानी पवित्र क़ुरआन के तर्क और हुज्जतें। पवित्र क़ुरआन में बहुत-से बयानों और दावों के तर्क दिए गए हैं और हर मूल दावे के सुबूत में कोई न कोई तर्क ज़रूर दिया गया है। क़ुरआन के टीकाकार और उलूमे-क़ुरआन के विशेषज्ञों ने इस सवाल पर बड़े विस्तार से चिन्तन किया है कि पवित्र क़ुरआन जब किसी बात के समर्थन में कोई तर्क देता है तो किस अंदाज़ से देता है। अगर ग़ौर करें तो दलील देने में पवित्र क़ुरआन का एक ख़ास ढंग सामने आता है।

तर्क देने के दो तरीक़े मानव इतिहास में प्रचलित रहे हैं। बौद्धिक तर्कों के जितने प्रकार हैं वे उन्हीं दो में से किसी न किसी के अन्तर्गत आते हैं। एक तरीक़ा यह है कि आप किसी चीज़ की कमज़ोरी को सामने रखकर उसे कमज़ोर करने के कारण का पता लगाएँ। दूसरा तरीक़ा यह है कि आप किसी चीज़ को कमज़ोर करने के कारण को सामने रखकर उसकी कमज़ोरी का पता चलाएँ। उदाहरणार्थ आग जलती देखकर आपको पता चल जाए कि यहाँ धुआँ भी होगा। या धुआँ देखकर यह पता चल जाए कि यहाँ आग भी होनी चाहिए। यह दो प्रकार के तर्क वे हैं जो अवलोकन से संबंध रखते हैं।

इनके अलावा दो प्रकार के तर्क और हैं। ये तर्क वे हैं जो तर्कशक्ति और बुद्धि से संबंधति हैं। एक यह कि पवित्र क़ुरआन की शैली के अनुसार आपने बहुत-सी छोटी-छोटी मामूली बातों को बयान किया। फिर उन छोटी-छोटी बातों के आधार पर एक ऐसा मूल सिद्धांत निकाला जो उन सब छोटी-छोटी बातों पर चस्पाँ होता है। उदाहरणार्थ पवित्र क़ुरआन ने बयान किया कि ज़मीन पहले मुरदा होती है, फिर बारिशों और तूफ़ानों के द्वारा ज़िंदा हो जाती है। वृक्ष सूख जाता है, फिर हरा-भरा हो कर दो बारा ज़िंदगी पा जाता है। बस्ती उजड़ती है, फिर दोबारा आबाद होकर ज़िंदा हो जाती है। जब ये सारी चीज़ें मरने के बाद बार-बार ज़िंदा हो रही हैं तो एक इंसान आख़िर क्यों मरने के बाद दोबारा ज़िंदा नहीं हो सकता। यानी छोटी-छोटी मिसालें देकर एक मूल धारणा ज़ेहन में बिठाई गई, वह यह कि मरने के बाद एक चीज़ दोबारा ज़िंदा हो सकती है। इस शैली को ‘मंतिक़े-इस्तिक़राई’ (आगमनात्मक तर्क) कहते हैं, यानी Inductive logic। पवित्र क़ुरआन जो मिसालें देकर समझाता है वे हर एक के अवलोकन में हैं। उसके लिए कोई सुक़रात और अफ़लातून होना ज़रूरी नहीं। धरती के कीड़े मकोड़े और फल-फूल को ज़िंदा होते और मरते हर व्यक्ति हर वक़्त देखता है। इसके लिए किसी बहुत गहरे चिन्तन-मनन की आवश्यकता नहीं है।

इसके मुक़ाबले में यूनानियों में जो मंतिक़ (तर्कशास्त्र) पाई जाती थी वह मंतिक़े-इस्तिख़राजी (निगमनात्मक तर्क) कहलाती है। जिसमें पहले कुछ आम सिद्धांत बयान किए जाते हैं जो अधिकतर एकाकी प्रकार के होते हैं। इन मूल सिद्धांतों को सामने रखकर अनुमान और बौद्धिक तर्कों के द्वारा छोटी-छोटी जानकारियाँ हासिल की जाती हैं। उदाहरणार्थ यूनानी चिकित्सा में उन्होंने एक सिद्धांत बनाया कि हर वह चीज़ जो चौथे दर्जे में गर्म और ख़ुश्क है वह एक ख़ास मात्रा के बाद मानव शरीर के लिए घातक है। यह एक सिद्धांत है। इस सिद्धांत को वे अलग-अलग दवाओं और बूटियों पर चस्पाँ करते हैं। जहाँ-जहाँ चस्पाँ हो जाता है वहाँ उनका सिद्धांत सही सिद्ध हो जाता है जहाँ यह सिद्धांत टूट जाता है, वहाँ वे तावील से (अपने अनुकूल अर्थ निकालकर) काम चलाते हैं।

पवित्र क़ुरआन ने इस शैली को नहीं अपनाया। इसलिए कि इस शैली को अपनाने के लिए ज़रूरी है कि पहले आप एक ख़ास सतह तक इस कला को जानते हों। अगर पवित्र क़ुरआन मंतिक़े-इस्तिख़राजी की यह शैली अपनाता तो उसका संबोधन केवल विद्वानों और दार्शनिकों तक ही सीमित होकर रह जाता, जो समाज में हमेशा बहुत कम होते हैं और शेष नागरिक पवित्र क़ुरआन के संबोधन की सीमाओं से निकल जाते।

पवित्र क़ुरआन का संबोधन चूँकि दुनिया के हर इंसान से है, इसलिए उसने मंतिक़े-इस्तिख़राजी का सिद्धांत नहीं अपनाया। पवित्र क़ुरआन की तर्क शैली इस्तिक़राई (आगमनात्मक) ढंग की है। यही वह शैली है जिससे एक दार्शनिक भी लाभ उठा सकता है और एक आम इंसान भी लाभ उठा सकता है। यही वजह है कि पवित्र क़ुरआन ने अपनी तार्किकता का आधार वस्तुतः अवलोकन पर रखा, और जहाँ बुद्धि एवं तार्किकता के आधार पर तर्क दिए हैं वहाँ आम तौर पर मंतिक़े-इस्तिक़राई (आगमनात्मक तर्क) की शैली ही को आपनाया है। मंतिक़े-इस्तिख़राजी के उसूल पर पवित्र क़ुरआन ने ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया। अगरचे कहीं-कहीं इस शैली का प्रयोग भी मिलता है, लेकिन पवित्र क़ुरआन ने उसको अपनाया नहीं है।

पवित्र क़ुरआन की इस आगमनात्मक शैली ने मुसलमान धर्म शास्त्रियों और चिन्तकों में एक नई चिन्तन-शैली को जन्म दिया। इससे काम लेकर मुसलमान चिन्तकों ने मंतिक़े-इस्तिक़राई के सिद्धांत तय किए। उदाहरणार्थ इमाम ग़ज़ाली (रहमतुल्लाह अलैह) ने जो उन उसूलों के सबसे पहले और सबसे बड़े संकलनकर्ता हैं, इस शैली से बहुत काम लिया। हनफ़ी मसलक के फ़क़ीहों (धर्मशास्त्रियों) ने इस शैली से काम लेकर फ़िक़्ह के बहुत से नियम एवं सिद्धांत संकलित किए। इमाम ग़ज़ाली (रहमतुल्लाह अलैह) की अरबी किताबों का रोमन और लैटिन अनुवाद पश्चिमी चिन्तकों ने देखा। फ़्रांसेस बेकन ने उन्हीं किताबों को देखकर inducticive logic की तर्क शैली पर सिद्धांत बयान किए। पश्चिमी चिन्तक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि उनके यहाँ मंतिक़े-इस्तक़राई के विकास पर मुसलमान चिन्तकों के गहरे प्रभाव हैं। सारे वैज्ञानिक विकास का आधार inductive logic पर है। इसी पर विज्ञान की सारी इमारत की आधारशिला रखी गई है। मंतिक़े-इस्तकराई अर्थात् आगमनात्मक तार्किकता जैसे-जैसे उन्नति करती गई, विज्ञान के आगे बढ़ने के दरवाज़े खुलते गए। यही वजह है कि यूरोप में मुस्लिम उंदलुस और मुस्लिम सक़लिया से भी सम्पर्क के नतीजे में विज्ञान का विकास शुरू हुआ। यह पवित्र क़ुरआन की एक बहुत बड़ी देन है।

9. इसी से मिलता-जुलता एक मैदान वह है जिसको कुछ विद्वानों ने ‘जदलुल-क़ुरआन’ और शाह वलियुल्लाह मुहद्दिस देहलवी ने ‘इल्मुल-मुख़ासमा’ के नाम से याद किया है। यानी पवित्र क़ुरआन की मुनाज़रा (शास्त्रार्थ) की शैली और दूसरे धर्मों के माननेवालों से संवाद का ढंग। पवित्र क़ुरआन की इस शैली पर यों तो बहुत-से विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं, उदाहरणार्थ इमाम राज़ी, अल्लामा इब्ने-तैमियह, अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती, शाह वलियुल्लाह मुहद्दिस देहलवी, लेकिन इस विषय पर अलग-अलग और बिल्कुल दूसरी तरह की किताबें लिखने का सौभाग्य भी कई लोगों ने प्राप्त किया।

पवित्र क़ुरआन में न केवल दूसरे धर्मों के माननेवालों से स्वस्थ बहस और संवाद किया गया, बल्कि जगह-जगह उसके बुनियादी उसूल भी बयान किए गए और मुसलमानों को इसके लिए तैयार किया गया। उदाहरणार्थ यह हिदायत की गई, وَلَا تُجَٰدِلُوٓاْ أَهْلَ ٱلْكِتَٰبِ إِلَّا بِٱلَّتِى (वला तुजादिलू अहलल-किताबि-इल्ला बिल्लती) अर्थात् “और किताबवालों से बस उत्तम रीति से ही वाद-विवाद करो।” (क़ुरआन, 29:46) इसी तरह कहा गया  وَجَادِلْهُمْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ (वजादिलहुम बिल्लती हि-य अहसन) अर्थात् “और उनसे ऐसे ढंग से वाद-विवाद करो जो उत्तम हो।” (क़ुरआन, 16:125)

कुछ विद्वानों ने ख़ास इन आयतों पर ज़ोर देते हुए जो वाद-विवाद के विषय पर हैं, पूरे पवित्र क़ुरआन की तफ़सीर की है। उर्दू भाषा में मौलाना अब्दुल हई हक़्क़ानी की ‘तफ़सीरे-हक़्क़ानी’ और मौलाना ग़ुलामुल्लाह ख़ान की तफ़सीर ‘जवाहरुल-क़ुरआन’ मूल रूप से वाद-विवाद ही के विषय पर हैं। विशेषकर तफ़सीर ‘जवाहरुल-क़ुरआन’ की तो सारी शैली ही शास्त्रार्थवाली है।

10. उलूमुल-क़ुरआन का एक और मैदान ‘बदाइउल-क़ुरआन’ है। ‘बदीआ’ का शाब्दिक अर्थ है अनहोनी और अजीब-ग़रीब चीज़ यानी किसी जगह पवित्र क़ुरआन ने बहुत अछूती शैली अपनाई, किसी जगह कोई बहुत अछूता उदाहरण दिया। किसी जगह कोई आदेश अछूता है। ये सारे ‘बदाइ’ हैं। उनको विद्वानों ने अलग से शोध का विषय बनाया और इसपर स्थायी रूप से किताबें लिखीं।

11. उलूमे-क़ुरआन का एक महत्त्वपूर्ण मैदान ‘ग़रीबुल-क़ुरआन’ है। ग़रीबुल-क़ुरआन से मुराद पवित्र क़ुरआन के वे वाक्य या वे शब्द हैं जिनके अर्थ या तो ज़रा मुश्किल हैं या अरब में अधिक प्रचलित नहीं थे, इसलिए उनके अर्थों को अलग से बयान करने की ज़रूरत पेश आई। इस विषय पर एक बहुत बेहतरीन किताब इमाम राग़िब असफ़हानी की ‘अल-मुफ़रदात फ़ी ग़रीबिल-क़ुरआन’ है। इसका उर्दू अनुवाद भी मिलता है। इस किताब में पवित्र क़ुरआन के जितने मुश्किल शब्द हैं उन सबकी व्याख्या और अर्थ मिल जाते हैं।

12. उलूमुल-क़ुरआन के बारे में एक और चीज़ जो बहुत महत्त्वपूर्ण है वह ‘नासिख़’ (रद्द करनेवाला) और ‘मंसूख़’ (रद्द किया हुआ) का इल्म है। हमारे ज़माने में बहुत-से विद्वानों से इस विषय को समझने में बहुत-सी गलतियाँ हुई हैं। ‘नस्ख़’ का अर्थ हर जगह पूरा बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक आम शब्दावली है जिसका अर्थ मुतक़द्दिमीन (पहले के विद्वानों) के यहाँ बहुत व्यापक था। लेकिन मुताख़्ख़िरीन (बाद के विद्वानों) ने इसको ज़रा सीमित अर्थ में इस्तेमाल किया है।

‘नस्ख़’ से मुराद मुतक़द्दिमीन के यहाँ यह है कि कोई पहले की आयत या कोई इल्म जो अवतरित किया गया, उसको बाद में आनेवाले किसी आदेश ने सीमित या विशिष्ट (qualify) कर दिया। या किसी नई स्थिति को उस आम आदेश से निकालकर उसके लिए अलग आदेश दे दिया। उदाहरण के तौर पर मक्का मुकर्रमा की बहुत-सी सूरतों में बार-बार यह बयान हुआ था कि ‘आप उनके ज़िम्मेदार नहीं हैं।’ ‘उनको उनके हाल पर छोड़ दें’, ‘जिसका जी चाहे माने और जिसका जी चाहे न माने।’ यह एक आम आदेश है, जिसमें नबी की तब्लीग़ी (धर्म प्रचार संबंधी) ज़िम्मेदारियों की निशानदेही की गई है। यानी एक मुबल्लिग़ (प्रचारक) का काम सिर्फ़ पैग़ाम पहुँचा देना है। मानना या न मानना यह लोगों की अपनी ज़िम्मेदारी है। लेकिन मक्का मुकर्रमा से हिजरत कर जाने के बाद मदीना मुनव्वरा में जब इस्लामी राज्य अस्तित्व में आ गया तो वहाँ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हैसियत एक मुबल्लिग़, एक आह्वाहक, एक नबी और एक रसूल के साथ-साथ एक क़ानूनविद, एक राज्य प्रमुख, एक न्यायाधीश और एक महान सेनापति की भी थी। अब आपको बहुत-से आदेश ऐसे भी देने थे जो नबी की तब्लीग़ी ज़िम्मेदारीयों से बढ़कर थे। इन आदेशों के बारे में वे निर्देश अब ज्यों के त्यों लागू नहीं हो सकते थे, जिनमें कहा गया था कि जिसका जी चाहे माने, जिसका जी चाहे न माने। अब अगर मदीना मुनव्वरा में चोरी का एक अपराधी लाया गया और उस हाथ काटने की सज़ा हुई तो वह चोर अब यह नहीं कह सकता कि पवित्र क़ुरआन में आया है कि जिसका जी चाहे माने और जिसका जी चाहे न माने, या यह कि चूँकि मैं इस किताब को नहीं मानता, इसलिए उसके अनुसार मेरा हाथ नहीं काटा जा सकता। अब तो यह एक राज्य का क़ानून है जो हर किसी पर अनिवार्य रूप से चलेगा। यानी आदेश का यह हिस्सा जो राज्य के क़ानून से संबंध रखता है, उस आम आदेश से निकल गया। अब यहाँ नया आदेश आ गया। अब उस पिछले आदेश को इस नए हुक्म की रौशनी में पढ़ा जाएगा। इसको मुतक़द्दिमीन की परिभाषा में ‘नस्ख़’ कहते हैं।

या उदाहरण के तौर पर कोई आम मार्गदर्शन दिया गया। पहले कहा गया था कि अल्लाह तआला ने पाक-साफ़ चीज़ों को तुम्हारे लिए हलाल क़रार दिया है और बुरी चीज़ों को हराम क़रार दिया है। ‘तय्यिबात’ (पाक-साफ़ चीज़ें) सब वैध और ‘ख़बाइस’ (बुरी चीजें) सब अवैध हैं। अब यह हो सकता है कि अरब के लोग उस ज़माने में अपने ख़याल में जिस चीज़ को ‘तय्यिब’ और पाक समझते हों वह दरअस्ल ‘तय्यिब’ न हो, और बाद में उसके अवैध होने का आदेश अवतरित करके बताया जाए कि यह चीज़ ‘तय्यिब’ नहीं, बल्कि ‘ख़बीस’ है। अब यह कहना कि उस वक़्त उसे ‘तय्यिबात’ कहा गया था, अब ‘ख़बाइस’ में शामिल करके हराम क़रार दिया गया है, दुरुस्त न होगा। बल्कि कहा जाएगा कि नए आदेश ने पिछले आदेश को और अधिक स्पष्ट कर दिया। यह भी ‘नस्ख़’ ही कहलाएगा। इसलिए कि यह भी ‘नस्ख़’ ही की एक कैफ़ियत है। गोया उसके कुछ अंश जिनको तुम उसमें शामिल समझते थे, उनके बारे में बताया गया कि वे पहले आम आदेश में शामिल नहीं थे।

इस तरह के आदेशों को जानने और समझने के लिए विषय से संबंधित तमाम आयतों की जानकारी रखना और उनकी तर्तीबे-नुज़ूली (अवतरण क्रम) को जानना बहुत ज़रूरी, बल्कि अपरिहार्य है।

फिर इल्मे-नासिख़-ओ-मंसूख़ के महत्त्व की दूसरी महत्त्वपूर्ण वजह यह है कि पवित्र क़ुरआन के बहुत-से आदेश क्रमिक रूप से अवतरित हुए हैं। उदाहरणार्थ अरबों में शराब बहुत आम थी। जिन लोगों ने अज्ञानकाल में शराब नहीं पी उनमें से सिर्फ़ दो प्रतिष्ठित सहाबा के नाम लोग जानते हैं। अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उस्मान ग़नी (रज़ियल्लाहु अन्हु)। अरब के बाक़ी तमाम लोगों में यह चीज़ ख़ूब प्रचलित थी। और अरबों की सामाजिकता का हिस्सा बन चुकी थी। इस्लाम ने शराब को तुरन्त हराम क़रार नहीं दिया, बल्कि तत्त्वदर्शिता के साथ हराम क़रार दिया। पहले कहा गया, وَ اِثْمُهُمَاۤ اَكْبَرُ مِنْ نَّفْعِهِمَاؕ (उनका गुनाह उनके फ़ायदे से बढ़कर है) यानी हो सकता है कि शराब में कुछ फ़ायदा भी हो, सुरूर की लज़्ज़त से थोड़ी देर के लिए इंसान बे-ख़ुद हो जाए, लेकिन इसका गुनाह उसके सीमित लाभ से कहीं बढ़कर है। यानी इस आयत के द्वारा एक सन्देश दे दिया गया है कि इस्लाम शराब को पसंद नहीं करता। जो लोग विवेक रखते थे, वह इसी से समझ गए कि शराब पीना इस्लाम के स्वभाव के ख़िलाफ़ है। उन्होंने तुरन्त शराब छोड़ दी। उसके बाद आदेश आया कि नशे की हालत में नमाज़ न पढ़ो। यानी एक और बंदिश आ गई। इसके बाद आख़िर में फ़ाइनल आदेश अवतरित किया गया कि يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّمَا ٱلْخَمْرُ وَٱلْمَيْسِرُ وَٱلْأَنصَابُ وَٱلْأَزْلَٰمُ رِجْسٌ مِّنْ عَمَلِ ٱلشَّيْطَٰنِ فَٱجْتَنِبُوهُ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ अर्थात् “ऐ ईमान लानेवालो! ये शराब और जुआ और देवस्थान और पाँसे तो गंदे शैतानी काम हैं। अतः तुम इनसे अलग रहो, ताकि तुम सफल हो।” (क़ुरआन, 5:90) अब अगर यह क्रमानुगत प्रक्रिया सामने न हो तो पढ़नेवाला सन्देह में पड़ सकता है कि अगर नमाज़ के मौक़े पर नशा करना हराम है तो शायद नमाज़ के वक़्त के सिवा हलाल होगा। और अगर क़ुरआन यह मानता है कि शराब में कोई फ़ायदा भी है तो चलो उस फ़ायदे की ख़ातिर ही थोड़ी-सी शराबनोशी कर लेनी चाहिए। ऐसा समझना दुरुस्त न होगा और यह पवित्र क़ुरआन की ग़लत व्याख्या होगी। बल्कि यह एक क्रमानुगत प्रक्रिया थी जिसमें एक-एक करके ये आदेश दिए जा रहे थे। अब वह काम ख़त्म हो गया। इस हद तक कि यह अनुमति मंसूख़ (निरस्त) कर दी गई, और मानो इस आदेश की total abrogation हो गई। अगरचे यह आयत अब भी पवित्र क़ुरआन में लिखी हुई है कि नशे की हालत में नमाज़ न पढ़ो, और इससे यह मफ़हूम निकलता है कि नमाज़ से बाहर नशे की हालत हो सकती है। लेकिन इस पूर्व दिए गए आदेश का पालन करने की अब अनुमति नहीं है।

‘नस्ख़’ की एक और मिसाल देखिए, एक जगह आता है कि तुममें से हर एक पर यह अनिवार्य है कि वसीयत करे अपने क़रीबी रिश्तेदारों और बाक़ी लोगों के लिए। इस आदेश का पालन करना उस वक़्त तक हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य था जब तक विरासत के आदेश अवतरित नहीं हुए थे। जब विरासत के आदेश आ गए तो फिर उस आदेश का पालन करने की ज़रूरत नहीं रही। और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने एलान कर दिया कि अब वारिस के लिए कोई वसीयत नहीं होगी। यह भी इसी क्रमानुगत प्रक्रिया का एक नमूना है कि पहला आदेश मंसूख़ (निरस्त) हो गया। अगरचे पवित्र क़ुरआन में ही पिछला आदेश अब भी लिखा हुआ है। लेकिन अब उसका पालन नहीं होगा।

एक और बड़ा स्पष्ट उदाहरण जिसमें ख़ुद पवित्र क़ुरआन ही से पता चलता है कि ये आदेश मंसूख़ है। वह सूरा-8 अनफ़ाल का वह आदेश है जिसमें कहा गया है कि तुममें से अगर बीस सब्र करनेवाले बहादुर हों तो वे दो सौ का मुक़ाबला करेंगे और अगर तुममें सौ बहादुर धैर्यवान हों तो वे एक हज़ार का मुक़ाबला करेंगे। यानी मिसाली और आईडियल स्थिति यह है कि तुममें से एक दस का मुक़ाबला करे और अल्लाह तआला की मदद इस कमी को पूरा कर देगी। फिर बाद में कहा गया कि अब अल्लाह तआला ने इस ज़िम्मेदारी में कमी कर दी। इसलिए कि अब तुमपर भी यह बात स्पष्ट हो गई कि तुममें कमज़ोरी पाई जाती है। अब अगर सौ बहादुर और सब्र करनेवाले हों तो वे दो सौ का मुक़ाबला करेंगे। और अगर एक हज़ार बहादुर हों तो दो हज़ार का मुक़ाबला करेंगे। गोया एक और दो का अनुपात हो तो मुक़ाबला करना अनिवार्य है, और दुश्मन के सामने डट जाना दीन (धर्म) का एक फ़र्ज़ है। इस फ़र्ज़ को अदा करने में कमज़ोरी दिखाना ठीक नहीं है। अब यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अल्लाह तआला ने कमी कर दी।

ये सारे मामले ‘नस्ख़’ के दायरे में आते हैं। उनमें कहीं पूरी तरह संशोधन मुराद है और कहीं आंशिक संशोधन, कहीं विशिष्ट करना मुराद है और कहीं सीमित करना, कहीं संक्षिप्त आदेश का विस्तृत विवरण मुराद है और कहीं सिर्फ़ यह याद दिलाना अभीष्ट है कि इस आयत को अमुक आयत के साथ मिलाकर पढ़ा जाए तो दोनों का अर्थ स्पष्ट होगा। इस मिलाकर पढ़ने को भी ‘नस्ख़’ कहते हैं। लेकिन इस नासिख़-ओ-मंसूख़ और क्रमानुगत आदेशों के सारे मामले को समझने के लिए यह मालूम होना ज़रूरी है कि पहले कौन-सी आयत अवतरित हुई और बाद में कौन-सी अवतरित हुई। कम से कम बड़ी-बड़ी समस्याओं के बारे में यह जानकारी होनी चाहिए। इसलिए भी यह उलूमुल-क़ुरआन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

13. उलूमुल-क़ुरआन के सन्दर्भ में उलेमा इस्लाम ने इसपर भी बहस की है कि सबसे पहले कौन-सी आयत अवतरित हुई और सबसे बाद में कौन-सी। आम तौर पर इस्लामी विद्वानों की यही राय है और इसमें कोई बड़ा मतभेद नहीं है कि सबसे पहले अवतरित होनेवाली आयतें सूरा-96 अलक़ की आरंभिक पाँच आयतें हैं, और सबसे आख़िरी आयत जिसपर उन प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) का मतैक्य है जो अल्लाह के रसूल (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सबसे क़रीबी रिश्तेदार और साथियों में से थे, और आपके ख़ानदानवालों में शामिल थे, जैसे आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) और अब्दुल्लाह-बिन-अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु)। यानि जो लोग आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के घर में बहुत ज़्यादा आते-जाते थे उनका कहना है कि आख़िरी आयत जो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर अवतरित हुई वह सूरा-2 बक़रा की आयत-281 है : وَ اتَّقُوْا یَوْمًا تُرْجَعُوْنَ فِیْهِ اِلَى اللّٰهِۗ ثُمَّ تُوَفّٰى كُلُّ نَفْسٍ مَّا كَسَبَتْ وَ هُمْ لَا یُظْلَمُوْنَ۠ अर्थात् “और उस दिन का डर रखो जबकि तुम अल्लाह की ओर लौटोगे, फिर प्रत्येक व्यक्ति को जो कुछ उसने कमाया पूरा-पूरा मिल जाएगा और उनके साथ कदापि कोई अन्याय न होगा।” इस पहली और आख़िरी आयत के निर्धारण के साथ-साथ प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने इस का भी निर्धारण करने की कोशिश की कि वे कौन-सी आयतें थीं जो सफ़र में अवतरित हुईं। कौन-सी आयतें अपने ठिकाने पर अवतरित हुईं। कुछ आयतों और सूरतों के बारे में स्पष्ट रूप से मालूम है कि वे सफ़र में अवतरित हुईं। उदाहरणार्थ सूरा-48 फ़तह। जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सुलह हुदैबिया से वापस आ रहे थे उस वक़्त यह पूरी सूरा अवतरित हुई। इसी तरह सूरा-63 मुनाफ़िक़ून ग़ज़वा-ए-बनू-मुस्तलिक़ से चलने के बाद सफ़र के दौरान अवतरित हुई। वे आयतें या सूरतें जो सफ़र में अवतरित हुईं, ‘सफ़री’ कहलाती हैं। उनकी संख्या थोड़ी है। पवित्र क़ुरआन का अधिकतर भाग मक्का या मदीना में ठहरने के दौरान अवतरित हुआ।

इसी तरह से ‘नहारी’ (दिन से संबंधित) और ‘लैली’ (रात से संबंधित) आयतें हैं जो दिन और रात में अवतरित की गई हैं, अर्थात् रात में अवतरित होनेवाली आयतें और दिन में अवतरित होनेवाली आयतें। बहुत-सी आयतें ‘फ़राशी’ और ‘नौमी’ कहलाती हैं। अर्थात् वे आयतें जो बिस्तर में और नींद की हालत में अवतरित हुईं। पैग़म्बरों (अलैहिमुस्सलाम) के बारे में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कहा कि “नबियों की आँखें तो सोती हैं, लेकिन उनके दिल जागते रहते हैं। उनके दिल पर नींद का प्रभाव नहीं होता। वह्य का अवतरण चूँकि दिलपर होता है इसलिए नींद के दौरान में भी कभी-कभी आयतों का अवतरण होता था। इसी तरह ‘सैफ़ी’ और ‘शिताई’ आयतें भी हैं, अर्थात् पवित्र क़ुरआन का कौन-सा हिस्सा सर्दी में अवतरित हुआ और कौन-सा हिस्सा गर्मी में अवतरित हुआ। इसी तरह यह निर्धारित करने की कोशिश की गई कि कौन-सी आयतें ज़मीन पर अवतरित हुईं और कौन-सी आसमान पर, यानी ‘अर्ज़ी’ और ‘समाई’। आसमानों पर अवतरित होनेवाली तो एक ही आयत का उल्लेख मिलता है कि जब मेराज के सफ़र के दौरान नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बुराक़ पर आसमानों की ओर जा रहे थे, यानी बुराक़ पर सवार थे, उस वक़्त यह आयत अवतरित हुई وَسْـَٔلْ مَنْ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رُّسُلِنَآ أَجَعَلْنَا مِن دُونِ ٱلرَّحْمَٰنِ ءَالِهَةً يُعْبَدُونَ अर्थात् “तुम हमारे रसूलों से, जिन्हें हमने तुमसे पहले भेजा, पूछ लो कि क्या हमने रहमान के सिवा भी कुछ उपास्य ठहराए थे, जिनकी बन्दगी की जाए?” (क़ुरआन, 43:45) यह वह आयत है जो आसमानों से आसमानों पर अवतरित हुई।

क़ुरआनी आयतों के इन विभिन्न प्रकारों से यह ज़रूर अंदाज़ा हो जाता है कि प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) और क़ुरआन के विद्वानों को पवित्र क़ुरआन के अवतरण का विवरण इकट्ठा करने से कितनी असाधारण दिलचस्पी थी, और इस काम को उन्होंने किस मुहब्बत और अक़ीदत (श्रद्धाभाव) से पूरा किया। अगर क़ुरआन की टीका के काम में इन जानकारियों को कि यह आयत रात के वक़्त अवतरित हुई और वह आयत दिन के वक़्त अवतरित हुई, बहुत अधिक महत्त्व प्राप्त नहीं है। कोई आयत रात को अवतरित हुई हो या दिन को। दोनों सूरतों में उसके आदेशों का महत्त्व समान है, लेकिन इससे मुसलमानों की इस मुहब्बत और लगाव का अंदाज़ा ज़रूर हो जाता है जो उनको पवित्र क़ुरआन से रहा है।

14. इन ज्ञान एवं कलाओं में कुछ ऐसे हैं जो क़ुरआन की टीका करने और क़ुरआन को समझने में ज़्यादा महत्त्व रखते हैं। इनमें से एक अवतरण के कारण हैं। इससे अभिप्रेत वह स्थिति है जिसमें कोई आयत या सूरा अवतरित हुई। कुछ लोगों का कहना यह है कि अवतरण के कारण का सिरे से कोई महत्त्व नहीं है और इस बारे में अगर जानकारी उपलब्ध न भी हो तो पवित्र क़ुरआन के समझने में कोई रुकावट पैदा नहीं हो सकती। इस राय का आधार जिस सिद्धांत पर है वह यह है कि अस्ल एतिबार पवित्र क़ुरआन के शब्द के आम अर्थ का होगा। उदाहरणार्थ एक ख़ास स्थिति में एक आदेश अवतरित हुआ तो यह नहीं समझा जाएगा कि यह आदेश उस ख़ास स्थिति के लिए है। बल्कि अगर शब्द आम हैं तो आदेश भी आम होगा। उदाहरणार्थ एक महिला अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास आई और बहुत बुलंद आवाज़ से शिकायत की कि “मेरे पति ने मेरे साथ ‘ज़िहार’ (तलाक़ का एक प्रकार) किया है। मुझे नहीं मालूम कि अब मेरी क़ानूनी हैसियत और दर्जा क्या है। आप मुझे बताएँ।” नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कहा, “बी-बी! मेरे पास अभी तक तुम्हारे मसले के बारे में कोई निर्देश नहीं आया।” इसपर उन्होंने और ज़्यादा शोर मचाया कि आपके पास भी निर्देश नहीं आया है तो फिर मैं क्या करूँ। इस मौक़े पर सूरा-58 मुजादला अवतरित हुई, بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ قَدْ سَمِعَ ٱللَّهُ قَوْلَ ٱلَّتِى تُجَٰدِلُكَ فِى زَوْجِهَا وَتَشْتَكِىٓ إِلَى ٱللَّهِ وَٱللَّهُ يَسْمَعُ تَحَاوُرَكُمَآ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌۢ بَصِيرٌ अर्थात् “अल्लाह ने उस स्त्री की बात सुन ली जो अपने पति के विषय में तुमसे झगड़ रही है और अल्लाह से शिकायत किए जाती है। अल्लाह तुम दोनों की बातचीत सुन रहा है। निश्चय ही अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, देखनेवाला है।” (क़ुरआन, 58:1) अब ज़ाहिरी तौर पर तो यह आयत इस ख़ास औरत के बारे में अवतरित हुई है जो आकर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से झगड़ी थी, लेकिन जो आदेश अवतरित हुए वे सर्वमान्य रूप से तमाम मुसलमानों के लिए हैं और इस्लामी क़ानून का हिस्सा हैं।

इसके विपरीत कभी-कभी ऐसा भी होता है कि पवित्र क़ुरआन में एक ख़ास आयत आई है, और वह एक सीमित स्थिति पर लागू होती है। लेकिन उसके शब्द आम होते हैं। यह बात समझने के लिए भी अवतरण के कारण का जानना ज़रूरी है। उदाहरणार्थ एक जगह आया है कि तुम उन लोगों की तरह न हो जाना जो यह चाहते हैं कि उनकी तारीफ़ की जाए उन कामों के लिए जो उन्होंने सिरे से किए ही नहीं। मरवान-बिन-हकम ख़लीफ़ा थे। उन्होंने जब यह आयत पढ़ी तो उन्हें फ़िक्र हुई कि यह तो हर व्यक्ति चाहता है कि लोग उसकी तारीफ़ करें। अगर यह चीज़ इतनी बुरी है कि पवित्र क़ुरआन ने उसे बुरा बताया है तो फिर तो इससे बचना चाहिए। और बचना मुश्किल है। उन्होंने कुछ प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) से इसका मतलब पूछा और अपनी इस आशंका का ज़िक्र किया। उन्होंने बताया कि इस आयत का मतलब वह नहीं है जो आप समझ रहे हैं। इसलिए कि यह तो हर इंसान का स्वभाव है, प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसकी तारीफ़ की जाए, और उसे अपनी तारीफ़ सुनकर ख़ुशी भी होती है। लेकिन यह आयत एक ख़ास सन्दर्भ में अवतरित हुई थी। हुआ यों कि अल्लाह के रसूल (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास एक बार यहूदियों का एक मुक़द्दमा आया जिसमें यहूदियों ने आवेदन किया कि आप हमारे अपराधियों का फ़ैसला कर दें। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कहा कि मैं तुम्हारी किताब के अनुसार इस मुक़द्दमे का फ़ैसला करूँगा। बताओ तुम्हारी किताब में इस बारे में क्या लिखा है। उन्होंने तौरात के संबंधित आदेशों के बारे में ग़लत बताया। और ग़लत बताने के बाद ऐसी विजयपूर्ण दृष्टि से अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तरफ़ देखा जैसे अब अल्लाह के रसूल (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम) उनकी तारीफ़ करेंगे और कहेंगे कि तुमने बड़ा अच्छा काम किया। तुरन्त नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर वह्य अवतरित हुई और आपको यह सूचना दी गई कि लोग तौरात के ज्ञान के बारे में आपको ग़लत बता रहे हैं, तौरात का आदेश वह नहीं है, बल्कि यह है। इस सन्दर्भ में यह आयत अवतरित हुई कि ऐसे लोगों की तरह न हो जाओ जो अव्वल तो झूठ बोलते हैं और जो काम न किया हो इसमें इस बात की आशा करते हैं कि उनकी तारीफ़ की जाए। चुनाँचे यह ख़ास तौर पर यहूदियों के इस रवैये के बारे में है। इस तरह का रवैया अगर किसी और का हो तो फिर यह धमकी उसपर भी लागू हो सकती है।

इसी तरह कभी-कभी पवित्र क़ुरआन में किसी जगह कोई ख़ास शब्द आया होता है जो किसी प्रचलित भ्रान्ति को दूर करने के लिए होता है। अगर वह ग़लतफ़हमी मालूम न हो तो फिर उस शब्द पर असंबंधित विवाद पैदा हो सकता है। उदाहरणार्थ जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हज और उमरा के आदेश दिए तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सफ़ा और मरवा के दरमियान ‘सई’ करने (फेरा लगाने) को अनिवार्य ठहरा दिया। यह सात चक्कर उमरे के अरकान (धार्मिक क्रियाएँ) हैं और हज में फ़र्ज़ (अनिवार्य) की हैसियत रखते हैं। सफ़ा और मरवा की सई के बिना हज पूरा नहीं होता, लेकिन पवित्र क़ुरआन में है, اِنَّ الصَّفَا وَ الْمَرْوَةَ مِنْ شَعَآىِٕرِ اللّٰهِ١ۚ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ اَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ اَنْ يَّطَّوَّفَ بِهِمَاؕ وَ مَنْ تَطَوَّعَ خَيْرًاۙ فَاِنَّ اللّٰهَ شَاكِرٌ عَلِيْمٌ अर्थात् “निस्संदेह सफ़ा और मरवा अल्लाह की विशेष निशानियों में से है, अतः जो इस घर (काबा) का हज या उमरा करे उसके लिए इसमें कोई दोष नहीं कि वह इन दोनों (पहाड़ियों) के बीच फेरा लगाए। और जो कोई स्वेच्छा और रुचि से कोई भलाई का कार्य करे तो अल्लाह भी गुणग्राहक, सर्वज्ञ है।” (क़ुरआन, 2:158) अब बज़ाहिर यह लगता है कि अगर कोई ‘सई’ कर ले तो कोई गुनाह नहीं है और अगर न करे तो भी कोई हरज नहीं है। आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के भानजे अब्दुल्लाह-बिन-ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अन्हु), यानी उनकी बड़ी बहन अस्मा-बिंते-अबी-बक्र (रज़ियल्लाहु अन्हा) के बेटे, उनको यही ख़याल हुआ। इसपर उन्होंने जाकर अपनी ख़ाला (मौसी) से पूछा। ख़ाला ने जवाब दिया कि अगर वह बात होती जो तुम कह रहे हो तो यों होता कि कोई हरज नहीं है अगर तवाफ़ न करे, यानी अगर उनकी सई न करे तो कोई हरज नहीं है। लेकिन यहाँ है कि अगर सई करे तो कोई हरज नहीं है। इसकी पृष्ठभूमि और है।

फिर उन्होंने विस्तार से बताया कि अज्ञानकाल में इस्लाम से पहले अरब के कुछ बहुदेववादी क़बीलों ने सफ़ा और मरवा पर एक-एक मूर्ति लाकर रख दी थी। ताकि जब ‘सई’ करके एक चक्कर पूरा हो तो उस बुत को चूम लें। दूसरा चक्कर पूरा हो तो दूसरे बुत को चूम लें। इस्लाम से पहले हर क़बीले की मूर्ति अलग होती थी। इसलिए वह क़बीले जो उन मूर्तियों के पुजारी नहीं थे वे सफ़ा और मरवा की सई नहीं करते थे। उनमें अंसार भी शामिल थे। अंसार के क़बीले औस और ख़ज़रज चूँकि इन बुतों को नहीं मानते थे, इसलिए इस्लाम से पहले जब वे हज या उमरा के लिए आया करते तो वह सफ़ा और मरवा की ‘सई’ करने में संकोच करते थे। जब इस्लाम आया और हज और उमरा विस्तृत आदेश आ गए तो ‘सई’ को भी अनिवार्य क़रार दे दिया गया। अब जब अंसारी सहाबी हज और उमरा के लिए तशरीफ़ ले गए तो उन्होंने सोचा कि हमें यहाँ ‘सई’ करनी चाहिए या नहीं। ऐसा न हो कि यह गुनाह हो या नाजायज़ हो तो उनके जवाब के लिए यह आयत अवतरित हुई कि इसमें कोई गुनाह नहीं है, बल्कि काबा की निशानियों में से हैं।

यहाँ ‘सई’ करना एक नबी की सुन्नत है। अल्लाह तआला की ओर से एक ईमानवासी महिला की याद मनाने का आदेश है। एक महिला को अल्लाह तआला की ओर से श्रेष्ठ स्थान दिया गया है कि जहाँ उसने सात चक्कर लगाए, तो वहाँ अब तुम भी सात बार चक्कर लगाओ। चुनाँचे इस पाकबाज़ महिला की याद में उस जगह नबी भी दौड़ता है और वली भी दौड़ता है। गुनहगार भी दौड़ता है और नेक व्यक्ति भी। विद्वान दौड़ता है और अज्ञानी भी। अतः अगर यह सारी पृष्ठभूमि सामने न हो तो फिर यहाँ क़ुरआन की जो शैली बयान की गयी है कि कोई गुनाह नहीं, यह किसी ग़लतफ़मी का कारण भी बन सकता है जैसा कि अब्दुल्लाह-बिन-ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) जैसे व्यक्ति के लिए बना।

यही वजह है कि अवतरण के कारण का महत्त्व अपनी जगह है और उसका इल्म होना चाहिए। अगरचे आदेश का दारो-मदार शब्द पर होगा। अगर शब्द आम हैं तो आदेश आम होगा और अगर शब्द ख़ास हैं तो आदेश ख़ास होगा। अवतरण के कारण का इल्म रखने से किसी भी आदेश की पृष्ठभूमि को समझने में मदद मिलती है। इस आदेश को स्पष्ट करने में भी मदद मिलती है और याद करने में भी मदद मिलती है, इसलिए कि घटना जल्दी याद हो जाती है।

अवतरण के कारणों पर यों तो क़ुरआन के तमाम टीकाकारों ने चर्चा की है और हर बड़े टीकाकार ने अवतरण के कारण, अवतरणकाल, और अवतरण की परिस्थितयों का उल्लेख किया है, लेकिन कुछ लोगों ने इसपर अलग-अलग किताबें भी लिखी हैं और अवतरण के कारणों को उन्होंने एक अलग कला के तौर पर संकलित किया है। इस विषय पर सबसे पहली किताब जिस महान व्यक्तित्व से संबद्ध है, वह इमाम बुख़ारी (रहमतुल्लाह अलैह) के उस्ताद और प्रसिद्ध फ़क़ीह (धर्मशास्त्री) और मुहद्दिस इमाम अली-बिन-मदीनी हैं। अली-बिन-मदीनी हदीस के इतिहास के अत्यंत महत्त्वपूर्ण और सम्मानित व्यक्तित्वों में से एक हैं। अवतरण के कारणों के ज्ञान पर पहली किताब इमाम अली-बिन-मदीनी की बताई जाती है। दूसरी किताब जो आम तौर पर हर जगह मिलती है, वह अल्लामा अली-बिन-अहमद अल-वाहिदी की है जो पाँचवीं सदी हिजरी के बुज़ुर्ग थे। उन्होंने तफ़सीर (टीका) के विषय पर कई किताबें लिखी थीं, जिनमें से कुछ आज भी उपलब्ध हैं। अवतरण के कारणों पर उनकी इस किताब का नाम भी ‘अस्बाबुन्नुज़ूल’ ही है।

एक किताब अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती की भी ‘अस्बाबुन्नुज़ूल’ (अवतरण के कारणों) के विषय पर है जिसका नाम ‘लिबाबुन-नुक़ूलि फ़ी अस्बाबुन्नुज़ूल’ है। यह किताब भी कई बार प्रकाशित हो चुकी है और हर जगह उपलब्ध है।

अगर अवतरण के कारणों का ज्ञान इंसान के सामने हो तो उसको क़ुरआन को समझने में बहुत-से लाभ प्राप्त होते हैं। पहली बात तो यह है कि वह ख़ास आदेश जिसके अवतरण के कारण से बहस अभीष्ट है, उसकी तत्त्वदर्शिता और उसका सन्दर्भ तुरन्त समझ में आ जाता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई आदेश किसी ख़ास कारण के साथ ख़ास होता है जो केवल अवतरण के कारण या शाने-नुज़ूल के जानने से मालूम हो जाता है कि इन हालात में इस आदेश को लागू किया जाएगा और किन हालात में इस आदेश को लागू नहीं किया जाएगा। कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई चीज़ इतनी स्पष्ट नहीं होती जितनी हमारी समझ के लिए ज़रूरी है। अवतरण के कारण को देखने से स्पष्ट हो जाती है, जैसे ‘ला जुना-ह’ (कोई हरज नहीं) की मिसाल अभी गुज़री।

कभी-कभी पवित्र क़ुरआन में किसी ख़ास घटना की ओर इशारा होता है, किसी व्यक्ति का सांकेतिक शैली में उल्लेख होता है, लेकिन नाम नहीं होता। अब अगर नाम मालूम हो जाए तो घटना ज़्यादा बेहतर अंदाज़ में समझ में आ जाती है। पवित्र क़ुरआन में सांकेतिक रूप से कई प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) का उल्लेख है। जैसे पवित्र क़ुरआन की यह आयत, وَ لَا یَاْتَلِ اُولُوا الْفَضْلِ مِنْكُمْ وَ السَّعَةِ اَنْ یُّؤْتُوْۤا اُولِی الْقُرْبٰى وَ الْمَسٰكِیْنَ وَ الْمُهٰجِرِیْنَ فِیْ سَبِیْلِ اللّٰهِ ﳚ-وَ لْیَعْفُوْا وَ لْیَصْفَحُوْاؕ-اَلَا تُحِبُّوْنَ اَنْ یَّغْفِرَ اللّٰهُ لَكُمْؕ-وَ اللّٰهُ غَفُوْرٌ رَّحِیْمٌ अर्थात् “तुममें से जो बड़ाईवाले हैं और समार्थ्यवान हैं वे नातेदारों, मुहताजों और अल्लाह के मार्ग में घर छोड़नेवालों को देने से बाज़ रहने की क़सम न खा बैठें। उन्हें चाहिए कि क्षमा कर दें और उनसे दरगुज़र करें। क्या तुम यह नहीं चाहते कि अल्लाह तुम्हें क्षमा करे? अल्लाह बहुत क्षमाशील, अत्यंत दयावान है।” (क़ुरआन, 24:22) इस आयत में अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) की ओर संकेत है, जैसा कि अवतरण के कारण के विवरण से मालूम होता है। अब अगर यह मालूम हो जाए कि यहाँ किस ‘साहिबे-फ़ज़्ल’ (बड़ाईवाले) की तरफ़ इशारा है तो आयत को समझने में मदद मिलती है। और ज़्यादा गहराई से बात समझ में आ जाती है।

ये वे लाभ हैं जो अवतरण के कारणों के ज्ञान से प्राप्त होते हैं। इसलिए क़ुरआन के टीकाकारों ने अवतरण के कारणों के बारे में रिवायतों को जमा किया और उनके द्वारा इस सन्दर्भ का पता लगाने की कोशिश की जिसमें कोई आयत अवतरित हुई थी।

15. उलूमुल-क़ुरआन का एक और महत्त्वपूर्ण क्षेत्र ‘मुश्किलातुल-क़ुरआन’ या ‘मुश्किलुल-क़ुरआन’ कहलाता है। मुश्किलुल-क़ुरआन या मुश्किलातुल-क़ुरआन से मुराद वे बहसें हैं जिनको लिखने के लिए बहुत अधिक सावधानी और चिन्तन-मनन की ज़रूरत है। ये वे बहसें हैं कि जिनके बारे में चिन्तन-मनन और सावधानी से काम न लिया जाए तो बहुत-सी उलझनें और ग़लतफ़हमियाँ पैदा हो सकती हैं। इसलिए इन उलझनों को दूर करना बड़ा ज़रूरी है। उदाहरण के तौर पर एक जगह सूरा-2 बक़रा में आता है। وَاتَّبَعُواْ مَا تَتْلُواْ الشَّيَاطِينُ عَلَى مُلْكِ سُلَيْمَانَ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمَانُ अर्थात् “और वे उस चीज़ के पीछे पड़ गए जिसे शैतान सुलैमान की बादशाही पर थोपकर पढ़ते थे——हालाँकि सुलैमान ने कोई कुफ़्र नहीं किया था,” (क़ुरआन, 2:102) यहाँ हारूत और मारूत की एक घटना सुनाई गई है। अब अगर आदमी इन आयतों को यह समझकर पढ़े कि पैग़म्बरों का स्थान और रुत्बा क्या है, और अल्लाह-तआला के फ़रिश्तों के बारे में पवित्र क़ुरआन क्या बताता है। अल्लाह तआला की ओर से आज़माइश किन-किन स्थितियों में होती है। ये सारी चीज़ें सामने हों तो बात स्पष्ट हो जाती है। लेकिन कभी किसी शाब्दिक ग़लती की वजह से और कभी-कभी इसराइलियात और दीगर ख़ुराफ़ात की भरमार की वजह से भी ग़लतफ़हमी पैदा हो जाती है। और अगर एक बार कोई उलझन पैदा हो जाए और उसको दुरुस्त तफ़सीर से दूर न किया जाए तो वह फिर बढ़ती रहती है और उससे और उलझनें पैदा होती हैं। तफ़सीर (टीका) की बहुत-सी किताबों में हारूत और मारूत की घटना में बहुत कुछ उलटा-सीधा बयान हुआ है, और इस्लामी विद्वानों ने उसपर बहुत लम्बी और विस्तृत चर्चाएँ की हैं। यह ख़ुद अपनी जगह शोध का और इस्लामी विद्वानों की बहसों का एक स्थायी विषय बन गया है। इसलिए उसको भी मुश्किलात उल-क़ुरआन में शामिल कर लिया गया है। अब इस पूरे साहित्य में जो इधर-उधर से आकर जमा हुआ, सही रास्ता निर्धारित करके यह बताना कि इससे मुराद क्या है और यह किस तरह की आज़माइश थी जो अल्लाह तआला की ओर से भेजी गई ‘मुश्किलातुल-क़ुरआन’ का विषय है। यहाँ अल्लाह का कथन اِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌ فَلَا تَكْفُرْؕ (इन्नम्मा नहनु फ़ित-नतुन फ़ला तकफ़ुर) अर्थात् “हम तो केवल परीक्षा (के लिए) हैं, तू कुफ़्र (अधर्म) में न पड़।” (क़ुरआन, 2:102) पूरी घटना को समझने में मूल भूमिका निभाता है। इस आयत की तफ़सीर इस पूरी चर्चा में एक बड़ी मौलिक चीज़ है। और बहुत ज़िम्मेदारी का तक़ाज़ा करती है।

पवित्र क़ुरआन में एक जगह आया है, وَعَلَى الَّذِينَ يُطِيقُونَهُ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ अर्थात् “ जो लोग उसकी (यानी रोज़े के फ़िदया की) ताक़त रखते हैं या ताक़त नहीं रखते वे एक मिस्कीन का खाना बतौर फ़िद्या के दें। अब सवाल यह है कि यहाँ ताक़त रखने से क्या मुराद है, किस चीज़ की ताक़त रखते हों। कुछ लोगों का कहना है कि यहाँ ताक़त रखने से मुराद यह है कि रोज़े की ताक़त रखते हों, जो ताक़त रखने के बावजूद रोज़ा न रखें वे फ़िद्या दे दें। यह कथन प्रकट में ग़लत मालूम होता है और पवित्र क़ुरआन के इस पूरे सन्दर्भ से जिसमें रोज़ों की फ़र्ज़ियत (अनिवार्यता) का दोटूक उल्लेख है, बेजोड़-सा मालूम होता है। कुछ और लोगों का कहना है कि इससे मुराद यह है कि फ़िद्या देने की ताक़त रखते हों। यह कथन शाब्दिक और व्याकरण की दृष्टि से कुछ सन्दिग्ध-सा लगता है। इन सब आपत्तियों से बचने के लिए कुछ लोगों ने कहा कि इससे मुराद यह है कि इसकी (रोज़ा की) ताक़त न रखते हों। इसपर विभिन्न लोगों ने बहुत-सी बहसें पेश की हैं और एक दृष्टिकोण तक पहुँचने की कोशिश की है। यह वह चीज़ है जिसको मुश्किलातुल-क़ुरआन के नाम से याद करते हैं। इस विषय पर भी क़ुरआन के विद्वानों ने अलग-अलग बड़ी उच्च स्तरीय किताबें लिखी हैं। एक किताब मौलाना अनवर शाह कश्मीरी की है जिनके बारे में अल्लामा इक़बाल ने कहा था कि इस्लामी दुनिया पिछले तीन सौ वर्षों में मौलवी अनवर शाह का उदाहरण नहीं पेश कर सकी।

16. एक और महत्त्वपूर्ण चीज़ जिसका मैंने पहले सरसरी तौर पर उल्लेख किया था, वह अक़सामुल-क़ुरआन है। यानी पवित्र क़ुरआन की क़समें। पवित्र क़ुरआन में क़समें क्यों बयान की गई हैं। इसका एक आम और सादा-सा और तुरन्त जवाब तो यह है कि अरब में रिवाज था। चूँकि पवित्र क़ुरआन अरब की चिर-परिचित शैली के अनुसार है और अरब की टकसाली भाषा में अवतरित हुआ है, इसलिए अरबों में जो वर्णन-शैली प्रचलित थी उसी को पवित्र क़ुरआन ने अपनाया, इसी वजह से पवित्र क़ुरआन में क़समें भी आई हैं। सच तो यह है कि पवित्र क़ुरआन के एक गंभीर विद्यार्थी के लिए यह जवाब काफ़ी है।

लेकिन इसके बावजूद विद्वानों ने इस विषय को विशेष रूप से चिन्तन-मनन तथा अध्ययन का विषय बनाया। उन्होंने जब पवित्र क़ुरआन की क़समों पर विचार किया और उसमें लिखी बातों का जायज़ा लिया तो कई नई चीज़ें सामने आईं। जहाँ-जहाँ पवित्र क़ुरआन में अल्लाह तआला ने अपनी और अपने अस्तित्व तथा गुणों की क़समें खाई हैं, वहाँ तो किसी सवाल की गुंजाइश नहीं, इसलिए कि अल्लाह तआला की सत्ता इसकी हक़दार है कि उसकी क़सम खाई जाए। लेकिन जहाँ अल्लाह तआला ने अपनी सृष्ट रचनाओं की क़सम खाई है, वहाँ क़सम से क्या अभिप्रेत है। उदाहरणार्थ चाँद और सूरज की क़सम खाई गई है। ऐसी क़समों में थोड़े-से चिन्तन-मनन की आवश्यकता है। और इस सवाल का जवाब देना ज़रूरी है कि ये क़समें क्यों खाई गई हैं। ग़ौर करने से पता चलता है कि कुछ जगह तो उन सृष्ट रचनाओं की क़सम खाई गई है जो अल्लाह तआला के रचनात्मक एवं सृजनात्मक गुण का एक ख़ास नमूना हैं। उदाहरणार्थ وَالسَّمَآءِ وَمَا بَنَاھَا (वस्समाइ वमा बनाहा) अर्थात् “क़सम है आकाश की और जैसा कुछ उसे बनाया।” (क़ुरआन, 91:5) आकाश अल्लाह की रचनाओं में से एक नुमायाँ स्थान रखता है। उसकी क़सम खाकर अल्लाह तआला की सामर्थ्य और रचनात्मकता की ओर ध्यान दिलाना अभीष्ट है।

कुछ जगह ऐसा है कि अल्लाह तआला ने अपने पैग़म्बरों (अलैहिमुस्सलाम) से जुड़े कुछ ख़ास स्थानों की क़सम खाई है। जैसे तूरे-सीना की क़सम है। وَالطُّوْرِ (वत्तूर) अर्थात् “क़सम है तूर की।” तूर पर अल्लाह तआला ने तजल्ली (दीप्ति) की। मूसा (अलैहिस्सलाम) को नुबूवत (पैग़म्बरी) प्रदान की। तूर-सेना से मानो नुबूवत का एक ख़ास रिश्ता बनता है। तूर की क़सम खाने का अर्थ यह है कि याद करो उस घटना को जब तूर पर अल्लाह तआला की तजल्ली हुई और याद करो उस कैफ़ियत को जब मूसा (अलैहिस्सलाम) से अल्लाह तआला ने बात की और उनको पैग़म्बरी या पैग़म्बरी प्रदान की। मानो यहाँ क़सम खाने से अभिप्रेत इस घटना की याद दिलाना अभीष्ट है। और यह जताना अभीष्ट है कि जब इस घटना को याद करोगे तो वह बात समझ में आ जाएगी जो आगे बयान की जा रही है।

कुछ जगह ऐसा है कि जिन चीज़ों की क़सम खाई गई वहाँ उनका महत्त्व बताना अभीष्ट है। उदाहरणार्थ क़ियामत की क़सम, لَاۤ اُقْسِمُ بِیَوْمِ الْقِیٰمَةِۙ وَ لَاۤ اُقْسِمُ بِالنَّفْسِ اللَّوَّامَةِؕ अर्थात् “नहीं, बल्कि मैं क़सम खाता हूँ क़ियामत के दिन की। और नहीं, बल्कि मैं क़सम खाता हूँ इंसान के नफ़्स (मन) की जो इंसान की मलामत करता है।” (क़ुरआन, 75:1-2) यानी इंसान के अंदर एक नफ़्से-लव्वामा (धिक्कारनेवाली अन्तरात्मा) मौजूद है तो यह एक बड़ी अच्छी चीज़ है। और इसी तरह क़ियामत के दिन के तख़्त हिसाब-किताब का महत्त्व है। क़ियामत का महत्त्व याद हो तो इंसान बहुत-सी बुराइयों से बचा रहता है।

कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी बात में ज़ोर पैदा करने के लिए और वर्णन-शैली में शिद्दत पैदा करने के लिए क़सम की शैली अपनाई जाती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम) भी बयान में ज़ोर पैदा करने के लिए क़सम का इस्तेमाल किया करते थे। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) सादिक़ (अत्यंत सत्यवादी) और अमीन (ईमानदार) थे, इसलिए आपको क़सम खाने की ज़रूरत इसलिए तो पेश नहीं आ सकती थी कि लोग अल्लाह की पनाह आपको झूठा समझ रहे हों या सच्चा क़रार देने में संकोच कर रहे हों। जहाँ दुश्मन भी सच्चा समझते हों, जहाँ क़त्ल के लिए बाहर इकट्ठा होनेवाले भी अपनी अमानतें अंदर रखवाते हों, वहाँ कोई झूठा क्यों समझेगा? लेकिन बात में ज़ोर पैदा करने के लिए अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का क़सम खाने का ख़ास अंदाज़ था। जब आपको किसी ख़ास बात पर-ज़ोर देना होता था तो अपने दाएँ हाथ के अंगूठे को बाएँ हाथ की हथैली पर मारकर इन शब्दों में क़सम में खाया करते थे وَاللَّذِیْ نَفْسُ مُحَمَّدٍ بِیَدِہٖ अर्थात् “उस सत्ता की क़सम जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है!” यह अंदाज़ मात्र बयान में ज़ोर पैदा करने के लिए अपनाते थे ताकि लोग ध्यानाकर्षित हो जाएँ। इसी तरह पवित्र क़ुरआन में कुछ जगह सिर्फ़ ध्यान दिलाने के लिए क़सम की बात बयान हुई है।

मक्का के इस्लाम-विरोधी क़सम पर आपत्ति किया करते थे। यही आपत्ति बाद में प्राच्यविदों ने भी की और आजकल के पश्चिमी चिन्तक भी करते हैं। पवित्र क़ुरआन में इस आपत्ति का जवाब दिया गया है। उनकी आपत्ति यह थी कि क़सम तो वह खाता है जिसको लोग झूठा समझते हैं। वह अपनी बात मनवाने की ख़ातिर क़सम खाता है तो अल्लाह तआला को आख़िर क़सम खाने की ज़रूरत क्यों पेश आई? एक आपत्ति जो आजकल प्राच्यविद् करते हैं वह यह है कि इंसान जिस चीज़ की क़सम खाता है उस चीज़ की महानता की धारणा उसके दिल में पहले से मौजूद होती है। कोई माँ की क़सम खाता है, कोई मूर्तियों की क़सम खाता है और कोई ख़ुदा की और कोई रसूल की क़सम खाता है। मतलब यह कि जिसकी भी क़सम खाईं उसकी महानता का एहसास पहले से क़सम खानेवाले के दिल में होता है। तो सवाल यह पैदा होता है कि आख़िर अल्लाह तआला अपनी मख़्लूक़ (सृष्टि) की महानता क्यों बयान कर रहा है, और यह कि यह बात उसकी गरिमा के योग्य नहीं है। ज़ाहिर है कि यह बात वही लोग कहेंगे जो पवित्र क़ुरआन को आसमानी किताब नहीं मानते। न मक्का के इस्लाम-विरोधी मानते थे और न उनके प्राच्यविद् मानते हैं।

लेकिन ये कारण जो क़सम के लिए ऊपर बयान हुए हैं यह इस बात के स्पष्टीकरण के लिए काफ़ी हैं कि पवित्र क़ुरआन में क़समें क्यों बयान हुई हैं। फिर विरोधी यह भी कहते हैं कि मुनकिर (इनकार करनेवाले) के लिए क़सम बेकार है और मोमिन (ईमानवाले) के लिए गै़र-ज़रूरी। मुसलमान के लिए क़सम खाना ज़रूरी नहीं और इस्लाम को न माननेवाले के लिए उसका कोई लाभ नहीं है। लेकिन ये सारी आपत्तियाँ उसी समय पैदा होती हैं जब यह मान लिया जाए कि क़सम सिर्फ़ वहाँ खाई जाएगी जहाँ बात को क़सम के बिना संदिग्ध माना जा रहा हो। जबकि कभी-कभी बात को संदिग्ध समझे बिना भी ज़ोर देने की ज़रूरत पेश आती है। कभी-कभी जिन चीज़ों की क़सम खाई जा रही है, उनका हवाला देने की ज़रूरत पेश आती है। कभी-कभी बतौर गवाह के और बतौर सुबूत के क़सम का उल्लेख करने की ज़रूरत पेश आती है। وَالْعَصْرِ (वल-अस्र) अर्थात् “ज़माने की क़सम!“ यानी ज़माना गवाह है कि इंसान घाटे में है। ज़माना किसको कहते हैं। इंसान की उम्र को ज़माना कहते हैं। मेरी और आपके जन्म से लेकर मरने तक जो वक़्त है वह मेरे लिए ज़माना है। और वह लगातार घट रहा है, तो सच तो यह है इंसान घाटे में है। मेरी और आपकी जो सबसे क़ीमती चीज़ है यानी ज़िंदगी वह लगातार घट रही है। अतः इंसान लगातार घाटे मैं है, सिवाय उस इंसान के जो भले कर्म करे, उसके घाटे को अल्लाह तआला लाभ में परिवर्तित कर देता है। कुछ जगह ऐसा होता है कि पवित्र क़ुरआन ने विशेष ऐतिहासिक घटनाओं का हवाला दिया होता है और उस हवाले का अंदाज़ क़सम का होता है। जैसे وَ التِّیْنِ وَ الزَّیْتُوْنِۙ وَ طُوْرِ سِیْنِیْنَۙ وَ هٰذَا الْبَلَدِ الْاَمِیْنِۙ अर्थात् “साक्षी है तीन (इंजीर) और ज़ैतून और तूरे-सीनीन, और यह शान्तिपूर्ण भूमि (मक्का)।” (क़ुरआन, 95:1-3)

यहाँ चार चीज़ों की क़सम खाई गई है, तूर की, इंजीर की, ज़ैतून की और उस शान्तिपूर्ण शहर (मक्का) की। अब तूरे-सीनीन और ‘बलदिल-अमीन’ का इशारा तो मालूम है कि एक जगह का संबंध मूसा (अलैहिस्सलाम) से है। और दूसरी जगह का संबंध अल्लाह के रसूल (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम) से है। ज़ैतून से भी अंदाज़ा हो जाता है कि इसका इशारा किस तरफ़ है, ज़ैतून सबसे पहले फ़िलस्तीन और शाम (सीरिया) में पैदा हुआ। फिर शाम और फ़िलस्तीन ही से हर जगह गया। और आज भी शाम और फ़िलस्तीन में दुनिया का बेहतरीन ज़ैतून पैदा होता है। चुनाँचे ज़ैतून से मुराद वह इलाक़ा है जो ईसा (अलैहिस्सलाम) से संबंध रखता है। इसलिए बज़ाहिर अंदाज़ा होता है कि इंजीर से भी कोई ऐसा इलाक़ा मुराद होगा। जहाँ किसी पैग़ंबर का जन्म हुआ होगा। विद्वानों ने इंजीर की तफ़सीर में बहुत कुछ लिखा है कि यहाँ इंजीर से क्या मुराद है। एक राय यह भी है कि इससे किसी ऐसे पैग़ंबर की भूमि अभिप्रेत है जहाँ इंजीर बहुत पैदा होते होंगे। किसी ने कुछ मुराद लिया और किसी ने कुछ, लेकिन इस बात पर टीकाकार आम तौर पर एकमत हैं कि इससे किसी ख़ास पैग़ंबर की ऐतिहासिक घटना की ओर इशारा अभीष्ट है।

17. उलूमुल-क़ुरआन में एक और चीज़ इल्मे-क़िरअत है। लेकिन पवित्र क़ुरआन को पढ़े जाने का अंदाज़, उसके नियम एवं सिद्धांत और उन नियमों का ज्ञान। अल्लाह के रसूल (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम) के मदीना में आने के बाद जब बड़े-बड़े क़बीलों ने इस्लाम स्वीकार करना शुरू किया तो हर क़बीले का लहजा अलग-अलग हुआ करता था। विभिन्न क़बीलों में विभिन्न लहजे प्रचलित थे। एक क़बीला ‘ह’ को ‘ऐन’ पढ़ता था। अब इस बात की प्रबल संभावना थी कि वे ‘हत्ता हीन’ को ‘अत्ता ईन’ पढ़ लें। इसी तरह कुछ क़बीले थे, वे ‘क़ाफ़’ को ‘शीन’ बोलते थे। कुछ ‘अल’ को ‘अम’ बोलते थे। इसलिए शुरू में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अनुमति दे दी थी कि हर क़बीला अपने लहजे में पवित्र क़ुरआन पढ़ सकता है। ऐसा आपने संभवतः इसलिए किया कि क़बीलों के दरमियान कोई तुरन्त मतभेद या वैमनस्य पैदा न होने पाए। फिर जैसे-जैसे लोग क़ुरैशी या हिजाज़ के लहजे से परिचित होते जाएँगे, वैसे-वैसे हिजाज़ के लहजे को सीखकर उसमें क़ुरआन पढ़ते जाऐंगे। यह कैफ़ियत उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के दौर तक रही और फिर उसकी मनाही हो गई, जिसका विवरण पहले बयान किया जा चुका है। इसके बाद जब पवित्र क़ुरआन सरकारी प्रबंध में लिखा गया तो क़ुरैश और हिजाज़ के लहजे ही के अनुसार लिखा गया, और जहाँ एक अक्षर को दूसरा अक्षर पढ़ने की संभावना थी, वह संभावना हमेशा के लिए ख़त्म हो गई। प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने सर्वसहमति से यह तय किया कि सामयिक सुविधा और अस्थायी ज़रूरत अब ख़त्म हो चुकी है।

लेकिन इस क़बाइली फ़र्क़ के अलावा भी किसी शब्द को बोलने में अहले-ज़बान में भिन्न इलाक़ों या क़बीलों के लोगों के भिन्न तरीक़े होते हैं, कोई एक ही शब्द को ज़बर से बोलता है और कोई ज़ेर से बोलता है। एक ही इलाक़े की भाषा होती है, इसको लिखा भी एक ही तरह जाता है। अर्थ भी एक ही होता है। लेकिन फिर भी ज़ेर-ज़बर का मतभेद मौजूद होता है। क़ुरैशी लहजे और हिजाज़ी भाषा की सीमाओं के अनदर इस ज़ेर-ज़बर के मतभेद की बाद में भी अनुमति रही और आज भी अनुमति है, इसलिए कि यह विविधता रस्मे-उस्मानी के अनुसार है। इसमें जिस हद तक अनुमति है उस हद तक क़िरअतों के मतभेद की भी अनुमति है। इसलिए कि यह रस्मे-उस्मानी के अनुसार है। उसके अनुसार विभिन्न क़िरअतें प्रचलित हैं, प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने विभिन्न तरह से अल्लाह के रसूल (सल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम) से पवित्र क़ुरआन सुना। उन्होंने दूसरों को पढ़कर सुनाया, उनसे ताबिईन को पहुँचा और फिर तबा-ताबिईन तक, और उनसे क़िरअत के विशेषज्ञों तक। और उनसे आज तक निरन्तरता से हमारे दौर तक चला आ रहा है।

इस मामले में उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) का एक बड़ा कारनामा यह भी है कि जब उन्होंने अपने प्रबंधन में सात या ग्यारह सरकारी प्रतियाँ तैयार करवाईं तो हर प्रति के साथ उन्होंने एक विश्वसनीय क़ारी भेजा कि वह जाकर लोगों को यह प्रति पढ़ाए। मदीना मुनव्वरा में जहाँ अस्ल प्रति रखी गई थी, वहाँ ज़ैद-बिन-साबित (रज़ियल्लाहु अन्हु) ख़ुद इस काम के लिए मौजूद थे कि जो भी उनसे पवित्र क़ुरआन पढ़ना चाहे उसको पढ़ा दें और उसकी क़िरअत और रस्म का तदधिक स्पष्टीकरण कर दें। इस तरह भिन्न लोगों को भिन्न इलाक़ों में भेजा गया जिससे सात भिन्न क़िरअतें प्रचलित हुईं। इन क़िरअतों पर लोगों ने बहुत-सी किताबें लिखी हैं। आज भी ये क़िरअतें दीनी मदरसों में पढ़ाई जाती हैं।

18. आख़िरी चीज़ रस्मे-उस्मानी है। यानी वह लिपि-शैली जिसके अनुसार उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के आदेश से ज़ैद-बिन-साबित (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने पवित्र क़ुरआन को लिखा। उसमें कहीं-कहीं अरबी भाषा की वर्तमान लिपि और पवित्र क़ुरआन की लिपि में फ़र्क़ है। उदाहरणार्थ किताब का शब्द पवित्र क़ुरआन में बहुत-से स्थानों पर अलिफ़ के बिना लिखा गया है। सिर्फ़ ‘क त ब‘ (کتب) लिखा है। और ‘त’ के ऊपर खड़ी ज़बर है (کتٰب) ‘या अय्युहा’ का जहाँ शब्द है तो ‘य’ के ऊपर खड़ी ‘ज़बर’ है। और ‘अय्युहा’ का अलिफ़ उसके साथ मिल गया है। जब हम अरबी में लिखेंगे, तो ‘य’ अलिफ़ और दूसरा ‘अलिफ़’ साथ लिखेंगे, लेकिन पवित्र क़ुरआन में एक ही अलिफ़ के साथ लिखा जाता है। कुछ जगह एक अक्षर पवित्र क़ुरआन की लिपि में बढ़ा दिया गया है। मसला जहाँ-जहाँ ‘वाऊ’ बहुवचन आया है। वहाँ ‘वाऊ’ के बाद अलिफ़ की अभिवृद्धि है, जैसे ‘मुलाक़ू रब्बहुम’ (ملاقوا ربھم)। यहाँ ‘वाऊ’ के साथ अलिफ़ बढ़ाया है। इसी प्रकार ‘आमनू’ (آمنوا) के बाद अलिफ़ है। यह शैली ज़ैद-बिन-साबित (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपनाई और पवित्र क़ुरआन की किताबत (सुलेख) में इसकी पैरवी हो रही है। कभी-कभी ऐसा होता है कि एक अक्षर की जगह उन्होंने दूसरा अक्षर रख दिया है। सलात, सॉद लाम और वाऊ है और लाम पर खड़ी ज़बर है (صلٰوۃ) ज़कात भी इसी तरह है। कुछ जगह एक अक्षर अतिरिक्त लिखा हुआ है। जैसे ‘उलाइ-क’। इसपर ‘पेश’ काफ़ी है। लेकिन इसमें ‘हमज़ा’ है और फिर ‘वाऊ’ है और उसके बाद ‘लाम’ है। कुछ जगह दो अक्षर होने चाहिएँ थे, लेकिन वहाँ एक ही अक्षर पर बस किया गया है।

यह है रस्मे-उस्मानी जिसके बारे में मुसलमान विद्वानों का लगभग 99 प्रतिशत मतैक्य है कि इसकी पैरवी लाज़िमी है। इसका उल्लंघन जायज़ नहीं है। पवित्र क़ुरआन में जहाँ-जहाँ भी किताबत हुई है या लिखा गया है उसकी पाबंदी को ज़रूरी समझा गया और उसके उल्लंघन को जायज़ नहीं समझा गया। अगरचे बहुत थोड़े लोग ऐसे भी हैं जो यह कहते हैं, कि रस्मे-उस्मानी की पैरवी शरई दृष्टि से अनिवार्य नहीं, उसका उल्लंघन किया जा सकता है। और जहाँ अपरिहार्य हो रस्मे-उस्मानी से अलग हटा जा सकता है। लेकिन इस दृष्टिकोण को अधिकतर सर्वसहमति हासिल नहीं हुई। आज भी जहाँ-जहाँ पवित्र क़ुरआन की छपाई का सरकारी इंतिज़ाम है, मिसाल के तौर पर मिस्र, सऊदी अरब और पाकिस्तान, वहाँ आज भी क़ानूनी तौर पर यह अनिवार्य है कि पवित्र क़ुरआन को रस्मे-उसमानी के अनुसार लिखा जाए। अगर कोई ऐसा न करे तो सरकार पवित्र क़ुरआन की ऐसी सभी प्रतियों को ज़ब्त कर सकती है जो रस्मे-उस्मानी के अनुसार न हों, और इस संबंध में सज़ा दे सकती है। और यह क़ानून आज से नहीं, बल्कि लम्बे अरसे से चला आ रहा है। बेहतर भी यही है कि रस्मे- उसमानी की पाबंदी की जाए ताकि लोग इससे परिचित रहें और पवित्र क़ुरआन का हर विद्यार्थी पवित्र क़ुरआन को इसी रस्मुल-ख़त (लिपि) में पढ़ रहा है जिस लिपि में प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने इसको लिखा और लिखवाया था।

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