بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم अल्लाह के नाम पर, जिसका नाम पृथ्वी या आसमान में कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचाता है, और वह सुनने वाला, जानने वाला है

May 16,2022

हमारा देश किधर जा रहा है?

हमारा देश किधर जा रहा है?

सैयद जलालुद्दीन उमरी

अनुवादक: मुनाज़िर हक़

भूमिका

हमारा देश जिन विकट समस्याओं से घिरा है उनमें साम्प्रदायिक दंगों की समस्या सबसे प्रमुख है। ये दंगे हमारे राष्ट्रीय जीवन का एक अंग बन गए हैं और इनका सिलसिला टूटता नज़र नहीं आ रहा है। जब कोई दंगा होता है तो उसके कारण ढूंढे जाते हैं, कुछ दिनों तक तर्क-वितर्क चलता रहता है, एक-दूसरे पर आरोप लगाए जाते हैं, दुख और अफ़सोस प्रकट किए जाते हैं, थोड़ा-बहुत राहत का काम भी होता है, और फिर ज़िन्दगी की गाड़ी नए ख़तरों, आशंकाओं और दुराग्रहों के साथ चलने लगती है। हर दंगे का कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है, परन्तु इसके बाद भी यह प्रश्न सोचने-समझनेवाले लोगों को परेशान किए रहता है कि ये दंगे बार-बार क्यों होते हैं? इनका सिलसिला क्यों नहीं टूटता, क्यों यहाँ का अम्न व सुकून थोड़े-थोड़े अन्तराल से भंग होता रहता है? क्या इस देश के विभिन्न वर्गों के लोग यहाँ अम्न व सुकून और सुलह एवं प्रेम के साथ नहीं रह सकते, उन्हें एक-दूसरे से क्या शिकायत है, उनके बीच कौन दूरी पैदा कर रहा है तथा घृणा एवं भेदभाव का वातावरण क्यों बनता जा रहा है? क्यों यह भावना जागृत नहीं हो रही है कि ये दंगे किसी सम्प्रदाय के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण देश के लिए विनाशकारी हैं?

ये और इसी प्रकार के कुछ अन्य प्रश्नों पर इस पुस्तक में बहस की गई है। इनमें प्रारम्भ के पाँच लेखों में सम्पूर्ण देशवासियों को सम्बोधित किया गया है, और अन्य लेखों में विशेष रूप से मुसलमानों से वार्ता की गई है। इस दृष्टिकोण को अच्छी तरह समझने के लिए उचित होगा कि केवल दो-एक लेख नहीं, बल्कि सभी लेखों को पढ़ा जाए। इनमें मुसलमानों को उनका भूला हुआ सबक़ याद दिलाने की कोशिश की गई है। देशवासियों से निवेदन है कि वे इस दृष्टिकोण से घृणा एवं दुराव न महसूस करें, बल्कि ठण्ढे दिल एवं दिमाग़ से इसे समझने और परखने की कोशिश करें। यह निवेदन एक हितैषी और हमदर्द का है। इसे अपना विरोधी और शत्रु न समझा जाए।

ये लेख विभिन्न अवसरों पर विभिन्न संदर्भों में पाँच साल की अवधि में लिखे गए हैं और उर्दू मासिक "ज़िन्दगी-ए-नव" और त्रैमासिक “तहक़ीक़ाते-इस्लामी" में प्रकाशित हो चुके हैं। अब पुनरावलोकन के बाद पुस्तक-रूप में प्रकाशित हो रहे हैं। इनमें दो-एक जगहों पर एक ही बात की पुनरावृत्ति सी महसूस होगी। इसका कारण यह है कि हर लेख अपने विषय के आधार पर अपनी एक अलग हैसियत रखता है। इसके प्रवाह को बाक़ी रखने के लिए इसे बर्दाश्त करना पड़ा है। लेख के अन्त में इसकी प्रकाशन तिथि दे दी गई है। इससे इसके पृष्ठभूमि को समझने में मदद मिल सकती है। एक लेख के शीर्षक को ही पुस्तक का शीर्षक बना दिया गया है। अल्लाह से दुआ है कि जिस उद्देश्य से ये लेख लिखे गए हैं वह पूरा हो और उसके बंदों को इससे फ़ायदा पहुँचे।

-जलालुद्दीन

7 मार्च, 1993 ई०

 

साम्प्रदायिक सद्भाव कैसे पैदा हो सकता है?

अप्रैल 1988 ई० की बात है। उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों का इस उद्देश्य से दौरा करने का संयोग हुआ कि देश में साम्प्रदायिक सद्भाव और मेल-जोल का वातावरण बनाया जाए। इस दौरे में कुछ स्थानों पर मुझे भी भाषण करना था। अधिकतर विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया था, जिनमें मुझे समापन भाषण अथवा अध्यक्षीय भाषण में अपने विचार प्रकट करने के अवसर मिले।

इन विचार-गोष्ठियों की एक विशेष बात यह थी कि जिन स्थानीय मुस्लिम अथवा ग़ैर-मुस्लिम बुद्धिजीवियों को अपने विचार प्रकट करने के लिए आमन्त्रित किया गया, वे सभी अथवा उनमें से अधिकतर सम्मिलित हुए और उन्होंने इस मुहिम में बड़ी दिलचस्पी दिखाई। बहुत से लोगों ने इसे अपने दिल की आवाज़ कहा। सबने यह दुख प्रकट किया कि आज़ादी के 41 साल बाद भी देश साम्प्रदायिक दंगों से छुटकारा नहीं पा सका है। इन प्रोग्रामों में मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने इस 'नासूर' के विभिन्न उपचार प्रस्तावित किए। यहाँ हम ग़ैर-मुस्लिम बुद्धिजीवियों के विचार अपने उद्गार के साथ पेश करेंगे। इनमें से कुछ बातें मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने भी कहीं और उनसे हटकर कुछ दूसरे पहलुओं की ओर ध्यान आकर्षित कराया, उनका उल्लेख अल्लाह ने चाहा तो किसी दूसरे अवसर पर करेंगे।

ग़ैर-मुस्लिम भाइयों की ओर से एक बात बहुत स्पष्ट रूप से सामने आई और अधिकतर वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि हमारे देश में साम्प्रदायिक झगड़े प्रायः धर्म के नाम पर होते हैं। हालांकि कोई भी धर्म भेदभाव, घृणा, शत्रुता, अत्याचार एवं अन्याय की शिक्षा नहीं देता। वह प्रत्येक से प्रेम करना सिखाता है। किसी निर्दोष की हत्या करना, लूटमार मचाना, औरतों की अस्मिता एवं इज़्ज़त पर हाथ डालना हर धर्म में गुनाह और पाप के काम हैं। किसी धर्म ने इसकी अनुमति नहीं दी है।

इसमें संदेह नहीं कि माहौल के बिगाड़ने, दंगे भड़काने, आग और ख़ून की होली खेलने और दरिंदगी एवं बर्बरता के नंगे नाच की किसी धर्म ने शिक्षा नहीं दी है। प्रेम, भाईचारा, हमदर्दी, शिष्टता और सभ्यता हर धर्म के अनिवार्य तत्व हैं। इनके बिना धर्म की कल्पना नहीं की जा सकती। परन्तु इस देश का यह दुर्भाग्य है कि धर्म का नाम लेने के बाद भी उसकी इन पवित्र शिक्षाओं का हमारे पारस्परिक सम्बन्ध में कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता। धर्म के साथ उसके ध्वजावाहकों की नीति भी बहस का मुद्दा बनी और इसकी आलोचना की गई।

वास्तविकता यह है कि धर्म के ध्वजावाहक यदि हक़परस्त हों। उनका मन भेदभाव और घृणा से पाक हो। वे खुली मानसिकतावाले हों, तो इसका प्रभाव सामान्य व्यक्तियों पर पड़ सकता है और इनकी मानसिकता का सुधार हो सकता है, परन्तु यहाँ स्थिति यह है कि धर्म के ध्वजावाहक ही धर्म की इन शिक्षाओं से दूर हैं, बल्कि भेदभाव और नफ़रत पैदा करने में उनकी भूमिका किसी से कम नहीं है।

दूसरी बात यह कि धर्म को कुछ बेजान रस्मों का संग्रह बना कर रख दिया गया है। उसे इस रूप में नहीं पेश किया जाता कि वह इन्सान के अन्दर उच्च नैतिक गुण पैदा करता है। शत्रु के साथ भी प्रेम करना सिखाता है और एक-दूसरे का आदर करने और आपसी सम्बन्धों को हैवानों की सतह तक पहुँचने से रोकता है। धर्म जिन नैतिक मूल्यों की शिक्षा देता है, वे यदि हम में पैदा हो जाएं तो विचार एवं व्यवहार के बहुत से मतभेद के बावजूद हम एक-दूसरे को सहन कर सकते हैं।

धर्म के ध्वजावाहकों की एक कमज़ोरी यह भी है कि उन्होंने यह दुनिया अत्याचारियों और सरकशों के हवाले कर रखी है। वे ज़ुल्म-ज़्यादती, हंगामा और दंगे-फ़साद को अपनी आँखों से देखते हैं, परन्तु उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने और उसका मुक़ाबला करने की उनमें हिम्मत नहीं होती बल्कि इसका जज़्बा भी उनके अन्दर पैदा नहीं होता। उन्हें यह भय लगा रहता है कि नफ़रत और भेदभाव की आग ख़ुद उन्हें भी भस्म करके न रख दे। धर्म के ध्वजावाहकों की इस कायरता और नपुंसकता से फ़साद फैलानेवालों के हौसले बुलंद होते हैं और वे अपने कलुषित उद्देश्य को पूरा करने में बहुत आसानी से सफल हो जाते हैं। धर्म के माननेवालों का कर्त्तव्य है कि वे पूर्ण संकल्प और साहस के साथ बुरे कार्य करनेवालों का मुक़ाबला करें। जब तक वे इसके लिए तैयार नहीं होंगे, फ़ित्ना-फ़साद की आँधियाँ चलती रहेंगी और देश को उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे।

यह प्रयास वैयक्तिक अथवा निजी रूप में नहीं, बल्कि मिलजुल कर और संगठित होकर करना चाहिए। यह एक वास्तविकता है कि जो लोग धर्म के नामलेवा हैं और जो भेदभाव, नफ़रत तथा दंगे-फ़साद को नापसंद करते हैं वे संगठित और एकमत नहीं हैं। जबकि फ़सादियों के प्रयास संगठित एवं सुनियोजित होते हैं। वे एक योजना के तहत फ़साद करते और कराते हैं। संगठित और सुनियोजित प्रयासों का जवाब बिखरी हुई कोशिशें नहीं बन सकतीं। इसके लिए संगठित रूप से संघर्ष करना होगा।

एक बात यह कही जाती है कि हमारे राजनीतिज्ञ और देश के नेता धर्म को अपनी गंदी राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हैं और दोनों सम्प्रदायों को लड़ा कर राजनीतिक लाभ प्राप्त करना चाहते हैं।

यह आपत्ति दरअसल अपनी कमज़ोरी और सीधेपन को स्वीकार करना है। यह एक सच्चाई है कि स्वार्थी नेता और पार्टियाँ हर दौर में और हर जगह अपने क्षुद्र उद्देश्य के लिए व्यक्तियों को भी इस्तेमाल करती रही हैं और विचारधाराओं को भी अपने मक़सद के लिए इस्तेमाल किया है। इनके इस शोषणपूर्ण व्यवहार पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आश्चर्य तो इस पर है कि आदमी उनकी निन्दा-आलोचना करे और उन्हें बुरा-भला कहता रहे और फिर बार-बार और बड़ी आसानी से उनका उपकरण भी बन जाए। इससे ऐसा लगता है कि यह आलोचना मात्र आलोचना के लिए ही की जाती है। इसके पीछे कोई सोचा-समझा फ़ैसला नहीं है। यदि ‘धर्मवाले' यह फ़ैसला कर लें कि वे किसी ग़लत व्यक्ति का क्षुद्र कार्य नहीं करेंगे; किसी की तुच्छ इच्छाओं और निन्दित उद्देश्यों के लिए कोई क़दम नहीं उठाएंगे, जो धर्म की शिक्षा के सर्वथा विपरीत हो; ज़ुल्म और अत्याचार एवं फ़साद के लिए तैयार करनेवाली शक्तियों का जम कर मुक़ाबला करेंगे; तो कोई भी व्यक्ति उन्हें दंगे की आग में ज़बरदस्ती नहीं झोंक सकता। किसी धर्म के माननेवाले का इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है कि वह फ़सादियों, शरारती तत्वों और गुण्डों के हाथों में खेलता रहे और उसे दुनिया एक ऐसे मुजरिम की हैसियत से याद रखे, जो धार्मिक मूल्यों पर विश्वास रखने के बाद भी उनका उल्लंघन करता रहा।

कहा जाता है कि साम्प्रदायिक दंगे सरकार कराती है। ये उसकी एक राजनीतिक ज़रूरत बन गए हैं। अंग्रेज़ों ने यहाँ फूट डालो और राज करो (Divide and Rule) की नीति अपनाई थी। अतएव उसने बड़ी चालाकी से भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच घृणा और शत्रुता के बीज बोए, मतभेद पैदा किए और इस बात का निरन्तर प्रयास किया कि ये दोनों क़ौमें किसी मामले में संगठित और एकमत न हों, क्योंकि उनकी एकता में उसे अपनी सत्ता की मौत नज़र आती थी। अतः उसकी सारी कोशिश के बाद भी देश की आज़ादी के लिए जब ये दोनों क़ौमें संगठित हो गईं, तो उसकी सत्ता डगमगाने लगी और अन्ततः उसे भारत को छोड़कर जाना पड़ा। अंग्रेज़ यहाँ से चले गए, परन्तु यहाँ जो सरकार भी सत्ता में रही उसने 'फूट डालो और राज करो' के नुस्ख़े को सीने से लगाए रखा और इसी को इस्तेमाल करती रही। इसका यह तर्क दिया जाता है कि सरकार ने इस सिलसिले में प्रशासन के ख़िलाफ़ कभी कोई सख़्त कार्रवाई नहीं की। सरकार यदि सख़्त रवैया अपनाए तो कहीं फ़साद नहीं हो सकता; और हो जाए तो फैल नहीं सकता।

यह बात बड़ी हद तक सही है और एक लम्बी अवधि से सुनने में आती रही है। परन्तु सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी ही नहीं देश की राजनीतिक पार्टियों में कोई पार्टी ऐसी नज़र नहीं आती जो दंगों में ज़ालिम को खुल्लम-खुल्ला ज़ालिम कहे और खुल कर पीड़ितजनों का साथ दे, और जो वर्गीय, भाषायी एवं धार्मिक संकीर्णता से पवित्र हो, जो दिल से दंगों को ख़त्म करना चाहती हो और उसके लिए कोई व्यापक प्रोग्राम रखती हो। इसलिए वर्तमान सत्ताधारी वर्ग की जगह कोई दूसरी पार्टी सत्तारूढ़ हो जाए तो भी परिस्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आ सकता। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों का मन इस मामले में साफ़ नहीं है।

यहाँ एक प्रश्न मन में बार-बार उभरता है। वह यह कि क्या इस देश का नेतृत्व हमेशा उन्हीं लोगों के हाथ में रहेगा जो हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच फूट डालकर शासन करेंगे? जो दंगा-फ़साद को हवा देंगे और जिन्हें सत्य एवं न्याय से अधिक अपना निजी स्वार्थ प्रिय होगा? यह देश ऐसे नेतृत्व और मार्गदर्शन से वंचित ही रहेगा जो न्याय-इन्साफ़ के ध्वजावाहक हों, जो प्रत्येक स्थिति में सत्य पर जमे रहें, जो अपने आप को ख़तरों में डालकर भी सत्य का साथ दें, जिन्हें अपने सत्ताधिकार को बचाने से अधिक इस बात की चिन्ता हो कि किसी के हक़ न मारे जाएं, किसी कमज़ोर पर कोई अन्याय न हो, कोई मज़लूम इन्साफ़ से वंचित न रहे और कोई निर्दोष किसी अपराध में पकड़ा न जाए? अफ़सोस यह है कि राजनीतिक पार्टियों की आलोचना और साम्प्रदायिक झगड़ों को नापसन्द करनेवालों में भी कोई इस स्तर का व्यक्ति या गिरोह नज़र नहीं आता। इस सिलसिले में छोटी-बड़ी कोई कोशिश होती भी है तो उसे प्रोत्साहित नहीं किया जाता, बल्कि उसे संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। साफ़-सुथरे उद्देश्यों में अपवित्र आकांक्षाएं ढूंढ ली जाती हैं और देश के हितैषियों पर देश के दुश्मन और ग़द्दार होने का लेबल लग जाता है।

कुछ लोग 'एक देश-एक धर्म' के दर्शन को साम्प्रदायिक दंगों को समाप्त करने और विभिन्न जातियों एवं सम्प्रदायों के बीच सद्भाव पैदा करने का एक प्रभावी साधन समझते हैं। उनके निकट आदमी की यह अवधारणा कि वही सत्य पर है और दूसरा अनिवार्य रूप से असत्य पर है, तमाम झगड़ों की बुनियाद है। हालांकि विभिन्न धर्मों के बीच कोई बुनियादी मतभेद नहीं है। सबकी मंज़िल एक है। हर धर्म उसी मंज़िल की ओर ले जाता है। यदि यह हक़ीक़त मन-मस्तिष्क में बैठ जाए कि धर्मों का मतभेद रास्तों का मतभेद है, मंज़िल का मतभेद नहीं है तो धर्मों के तमाम झगड़े ख़त्म हो सकते हैं। कुछ लोग इस मामले को इस हद तक खींच कर ले जाते हैं कि धर्मों का निजी अस्तित्व ही ख़त्म हो जाए। न कोई हिन्दू हिन्दू रहे और न कोई मुसलमान मुसलमान। धर्मों की उभयनिष्ठ शिक्षाएं बाक़ी रखी जाएं और विवादित मुद्दे समाप्त कर दिए जाएं।

धर्मों के विषय में यह समीक्षा सही नहीं है। इनके बीच मात्र रस्म-रिवाज और कुछ वाह्य कर्मकाण्डों के मतभेद नहीं हैं, बल्कि पूर्णतः बुनियादी स्तर के मतभेद हैं, जिनका सम्बन्ध बुनियादी विचारधाराओं एवं आस्थाओं और उनसे सम्बन्धित व्यवहारों से है। धर्मवालों से यह मांग कि वे अपनी आस्थाओं और विचारधाराओं ही से मुक्त हो जाएं सही दृष्टिकोण नहीं है और इन विचारधाराओं एवं आस्थाओं पर क़ायम रहते हुए 'एक देश-एक धर्म' की सोच व्यावहारिक रूप नहीं ले सकती।

इसका एक उपचार यह भी प्रस्तावित किया जाता है कि विभिन्न धर्मों के माननेवालों के बीच शादी-विवाह को प्रोत्साहन दिया जाए। इससे अजनबियत का एहसास कम होगा और निकटता एवं प्रेमभाव पैदा होगा। इस सिलसिले में कुछ मुसलमान बादशाहों की मिसालें भी नमूने के रूप में पेश की जाती हैं।

जहाँ तक मुसलमान बादशाहों का सम्बन्ध है, एक तो यह कि वे इस्लाम के सच्चे प्रतिनिधि नहीं थे। दूसरे यह कि उन्होंने अपने राजनीतिक उद्देश्यों के तहत जो ग़लत क़दम उठाए उनमें से एक यह भी था। उनके इस व्यवहार का कोई धार्मिक महत्व नहीं है। यहाँ यह हक़ीक़त नहीं भूलनी चाहिए कि शादी से मर्द और औरत के बीच जीवन भर का सम्बन्ध क़ायम होता है। उसमें मज़बूती तभी आ सकती है जबकि उनमें वैचारिक मतैक्य पाया जाए। वैचारिक मतभेद के साथ इस रिश्ते में मज़बूती की उम्मीद नहीं की जा सकती, बल्कि उसका बाक़ी रहना भी बहुत मुश्किल है।

पति-पत्नी के बीच धर्मों का मतभेद भी इस रिश्ते को नुक़्सान पहुँचा सकता है। इस प्रकार के रिश्ते सामन्यतः उन्हीं जोड़ों के बीच सफल होते हैं, जिन्हें धर्म से कोई सरोकार नहीं होता। उन्हें इस बात से कोई दिलचस्पी नहीं होती कि उनका जीवन साथी उनका सहधर्मी है अथवा उसका कोई दूसरा धर्म है। इस प्रकार के अधर्मी व्यक्तियों का व्यवहार धार्मिक लोगों के लिए कोई आदर्श नहीं है।

शादी-विवाह का धर्म से सीधा सम्बन्ध होता है। कम-से-कम इस्लाम के बारे में यह बात बिल्कुल स्पष्ट है। वह इस बात की कदापि अनुमति नहीं देता कि उसके माननेवाले उसके विरोधियों अथवा उसका इन्कार करनेवालों से दाम्पत्य सम्बन्ध क़ायम करें। जो रिश्ते इस प्रकार क़ायम हों, उनके क़ानूनी अधिकारों और कर्त्तव्यों को भी वह स्वीकार नहीं करता।

"अहले-किताब" औरतों से उसने निकाह की गुंजाइश रखी है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बुनियादी आस्थाओं में वे इस्लाम से क़रीब हैं। इसके बावजूद अपनी लड़कियाँ उन्हें देने की इजाज़त नहीं दी है।

हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच प्रेम और सद्भाव का वातावरण बनाने एवं भेदभाव और घृणा की खाई को पाटने का एक उपाय यह भी बताया जाता है कि वे एक-दूसरे के धार्मिक समारोहों में सम्मिलित हों। इससे मन-मस्तिष्क की दूरियाँ कम होंगी, और निकटता बढ़ेगी। कहा जाता है कि देश की आज़ादी से पहले इस प्रकार का वातावरण था, जो अब घटता जा रहा है।

किसी भी धर्म के समारोह का सिलसिला उसकी बुनियादी आस्थाओं और मान्यताओं से सम्बद्ध होता है। हर धार्मिक समारोह अपना एक दर्शन रखता है और यह दर्शन धर्म के बुनियादी दर्शन के अधीन होता है। इस दर्शन को मानने के बाद ही इन समारोहों का औचित्य पैदा होता है, बल्कि कभी-कभी वह ज़रूरी हो जाता है। इसके बिना इन्सान मानसिक शान्ति महसूस नहीं करता। ये समारोह दरअसल इन्सान की निष्ठा एवं प्रेम की अभिव्यक्ति है। इसके लिए मानसिक एकरूपता ज़रूरी है। जिस व्यक्ति का मन किसी धर्म के बुनियादी दर्शन से मेल नहीं खाता और वह उसे ग़लत एवं असत्य समझता है, उसके साथ अपनी निष्ठा की अभिव्यक्ति नहीं कर सकता। यदि करता है तो समझना चाहिए दिखावे के लिए करता है और ऊपरी मन एवं दिखावे से कोई गंभीर उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे लोग बड़े भोले हैं, जो इस प्रकार के निम्न स्तरीय उपायों से दोनों क़ौमों के बीच पाई जानेवाली दूरियों को ख़त्म करना चाहते हैं।

कुछ कम्यूनिस्टों का यह ख़याल भी सामने आया कि धर्म तमाम झगड़ों की बुनियाद है। इसे ख़त्म होना चाहिए। जहाँ कोई धर्म ही न हो, वहाँ इस प्रकार के झगड़े ही पैदा नहीं होंगे।

जो लोग यह बात कहते हैं वे शायद इस हक़ीक़त को भूल जाते हैं या जान-बूझ कर उस पर पर्दा डालना चाहते हैं कि इस वक़्त दुनिया में धर्म ने फ़साद नहीं मचा रखा है। इसके कारण न तो इन्सानों का ख़ून बहाया जा रहा है और न उनके अधिकारों का हनन हो रहा है। यह सब आधुनिक काल की मान्यताओं की लानत है। भौतिकवाद, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों की कमी, जातिवाद, राष्ट्रवाद, वंशवाद, एक ओर तानाशाही का चरम और दूसरी ओर किसी भी प्रकार के अंकुश से रहित प्रजातंत्र ने ख़ुदा की ज़मीन को फ़ित्ना (बुराई) और फ़साद से भर रखा है और पूरी दुनिया अम्न व सुकून के लिए तड़प रही है। सुन्दर दावों के बावजूद इन विचारधाराओं ने अमेरिका के काले लोगों को समानता से वंचित कर रखा है, उन्हीं के कारण रूस, चीन और कम्युनिस्ट देशों को इतिहास की बदतरीन ज़ोर-ज़बरदस्ती और हिंसा के वातावरण में ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ी है, अफ़्रीक़ा के काले बाशिंदों को इस बात की इजाज़त नहीं है कि वे अपने लिए सामान्य मानव अधिकारों की मांग करें, उनको जो सज़ाएं दी जा रही हैं उन से बर्बर युग की याद ताज़ा हो रही है। वर्तमान काल की विचारधाराएं या तो धर्म विरोधी हैं और उसे जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती हैं या उसे उन्होंने ज़िन्दगी के एक अल्प क्षेत्र में डाल रखा है। पूरी दुनिया में धर्म को कहीं मार्गदर्शक का स्थान प्राप्त नहीं है, बल्कि उसे ज़िन्दगी के एक-एक मैदान से हटा दिया गया है। इसलिए वर्तमान ख़राबियों का आरोप उस पर कदापि नहीं लगाया जा सकता। वर्तमान विचारधाराओं को खुले दिल से उनकी ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।

जिस व्यक्ति की दुनिया के हालात पर नज़र है, वह कभी यह नहीं कह सकता कि धर्म फ़साद की जड़ है। भारत में जब हंगामे होते हैं तो इसमें संदेह नहीं कि धर्म का नाम लिया जाता है। परन्तु सच्चाई यह है कि इन हंगामों में किसी धर्म की आस्था एवं कर्म पर विवाद नहीं होता, बल्कि उसके कुछ दूसरे ही प्रेरक तत्व होते हैं।

(माहनामा 'ज़िन्दगी-ए-नव', नई दिल्ली, जुलाई, 1988 ई०)

ग़लतफ़हमियाँ दंगों को जन्म देती हैं

हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगे हमारे राष्ट्रीय जीवन का एक अंग बन गए हैं। थोड़े-थोड़े दिनों के अन्तराल में ऐसे दंगे अवश्य होते हैं। इन दंगों में अपराधी और दोषी तत्व तो शायद हर प्रकार की क्षति से सुरक्षित रहते हैं, परन्तु निर्दोष लोग मारे जाते हैं। देखते-देखते मासूम बच्चे अनाथ हो जाते हैं; माताओं की भरी गोदें सूनी हो जाती हैं; जवान औरतों का सुहाग लुट जाता है; और बूढ़े माँ-बाप बेसहारा हो जाते हैं। पवित्रता और अस्मिता दाग़दार होती और इज़्ज़त-आबरू लुटने लगती है। जहाँ तक आर्थिक क्षति का सम्बन्ध है, एक-एक दंगे में करोड़ों और अरबों रुपये की क्षति होती है। दंगों के बाद के दुष्परिणामों के शिकार अधिकतर उस वर्ग के लोग होते हैं जिनका दंगों से कोई सम्बन्ध नहीं होता और जो इन से दूर रहना  चाहते हैं तथा व्यवहारतः दूर रहते भी हैं।

प्रशासन पर शान्ति-व्यवस्था स्थापित करने की ज़िम्मेदारी होती है, परन्तु उसने हमेशा इस सम्बन्ध में आपराधिक निष्क्रियता का सबूत दिया है। दंगों पर क़ाबू पाने की उसकी ओर से यथासमय कोशिश नहीं होती। स्थानीय अधिकारियों पर निष्क्रियता और पक्षपात के आरोप बार-बार लगाए जाते रहे हैं, परन्तु प्रायः इसकी जाँच की भी ज़रूरत नहीं समझी जाती। पी०ए०सी० शान्ति स्थापित करने के लिए तैनात की जाती है परन्तु वह स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती है। उसके अत्याचार एवं बर्बरता की घटनाएं इतनी उभरी हुई हैं कि उस पर कोई विश्वास नहीं रहा। दंगों से संबन्धित जाँच आयोग बैठाए जाते हैं, परन्तु उनसे कोई लाभ नहीं होता।

इन दंगों को बहुत से नादान लोग और स्वार्थी राजनीतिक नेता निरंतर बढ़ावा देते रहते हैं। अख़बारों और प्रेस का रवैया भी कुछ कम भड़काऊ नहीं होता, बल्कि दंगों का वातावरण तैयार करने और वक़्ते-ज़रूरत बारूद को पलीता दिखाने में वह आगे-आगे रहता है। इन्हीं सब कारणों से दंगे बार-बार भड़कते हैं और दोनों क़ौमों के बीच विवादों की खाई चौड़ी होती चली जाती है। समय बीतने के साथ इन दंगों की संख्या बढ़ती रही है और उसी अनुपात में उनके भयानक परिणाम भी सामने आ चुके हैं। इन दंगों को रोकने की कोशिश नहीं की गई, तो ये पूरे देश के लिए अति विनाशकारी होंगे। भविष्य के इतिहासकार भारत के इतिहास को विभिन्न वर्गों के आपसी संघर्ष और हिंसा के इतिहास के रूप में पेश करेंगे और इस बात पर अपना दुख और क्षोभ प्रकट किए बिना नहीं रह सकेंगे कि इस नासूर ने इतने बड़े देश को ज़हर में डुबो रखा था और इसका एक-एक अंग इसके दुष्प्रभाव से कराह रहा था, परन्तु वह इसका इलाज ढूंढने में नाकाम रहा। उसे सारी दुनिया की चिन्ता थी और वह हर एक के दुख में बेचैन नज़र आता था, परन्तु उसने इस गंभीर समस्या को हल करने में गम्भीर प्रयास नहीं किए जिस से उसका अपना घर उजड़ रहा था।

दंगों में जान, माल और इज़्ज़त-आबरू जिस तरह लुटती है, उससे जान-बूझकर मुख मोड़ना धर्म, नैतिकता एवं सभ्यता एवं सदाचारिता का अपमान होता है। यह वह कोताही है जिसकी क्षतिपूर्ति आसानी से नहीं हो सकती। इस पर तो प्रत्येक सहृदय इन्सान को तड़प उठना चाहिए और इस बात की शपथ लेनी चाहिए कि वह अपने क्षेत्र में आइन्दा कभी दंगा-फ़साद होने नहीं देगा और इस उद्देश्य के लिए बड़ी से बड़ी क़ुरबानी देने के लिए भी तैयार रहेगा। लेकिन अफ़सोस यह है कि इस देश की आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक- तात्पर्य यह कि हर छोटी-बड़ी समस्या पर सोचने और लिखने-बोलनेवाले तो बहुत हैं, परन्तु दंगों और उनसे पैदा होनेवाली तबाही पर सही रुख़ से सोचनेवाले कम ही नज़र आते हैं। उन लोगों की तादाद तो अंगुलियों पर गिनी जा सकती है, जिन में सत्य को स्वीकार करने और उसे अभिव्यक्त करने का साहस हो और जो सही बात कह सकते हैं।

हिन्दू-मुस्लिम दंगे इस देश के बहुसंख्यक वर्ग और सबसे बड़े अल्पसंख्यक वर्ग के बीच होते हैं। बहुसंख्यक वर्ग इस बात पर ख़ुश होता है कि इन दंगों में अल्पसंख्यक वर्ग का अधिक नुक़सान होता है। कभी बहुसंख्यक वर्ग का अधिक नुक़सान होता है तो अल्पसंख्यक ख़ुश होते हैं। कोई यह नहीं सोचता कि यह बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश की समस्या है। मरनेवालों में ऐसे शिक्षक, डॉक्टर, वकील, व्यापारी, उद्योगपति और शिक्षाविद् भी हो सकते हैं जो केवल अपने गिरोह के लिए नहीं पूरे देश के लिए धरोहर की हैसियत रखते हों और उनके अस्तित्व से सम्पूर्ण समाज को फ़ायदा पहुँच सकता हो। क्या उनकी जान लेकर इसलिए ख़ुशी मनाई जा सकती है कि उनका किसी विशेष गिरोह से सम्बन्ध है? इसका एक पहलू यह भी है कि हमारे सामाजिक जीवन में कमानेवाले प्रत्येक व्यक्ति का महत्व है। परिवार में एक व्यक्ति कमाता है और पाँच-दस व्यक्ति उस पर आर्थिक रूप से आश्रित होते हैं। उस एक व्यक्ति के मारे जाने का मतलब यह है कि पूरा परिवार बेसहारा हो गया और ज़िम्मेदारियों में उसी अनुपात से बढ़ोतरी हो गई। यदि देश इन ज़िम्मेदारियों को पूरा न करे तो उसके और अधिक भयंकर परिणाम निकल सकते हैं। हिन्दू-मुस्लिम दुश्मनी की भावना के कारण कभी-कभी आदमी यह सोचने के लिए भी तैयार नहीं होता कि इन दंगों का देश की अर्थव्यवस्था पर कितना विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। मकानों, दुकानों, कारख़ानों और जीवन के लिए आवश्यक चीज़ों के भण्डारों को जला डालना, देश के धन को आग लगाने के समान है। इससे वही व्यक्ति प्रसन्नता का अनुभव कर सकता है जो भावना में अंधा हो चुका है और जिसे देश-हित से कोई रुचि न हो।

यह देश अपनी विचारधारा एवं स्वभाव की दृष्टि से शान्तिप्रिय है। यहाँ का न बहुसंख्यक वर्ग ही दंगा चाहता है और न अल्पसंख्यक वर्ग। दोनों ही इससे दूर रहना चाहते हैं। परन्तु इन्हीं में एक तबक़ा है जो दंगों और हंगामों में आगे-आगे रहता है। उसे न बहुसंख्यकों से हमदर्दी है और न अल्पसंख्यकों से। वह मात्र अपने निजी स्वार्थ एवं हित के लिए यह सब करता रहता है। आम हालात में यह तबक़ा अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता है, परन्तु दंगों के दौरान उसकी हुक्मरानी स्थापित हो जाती है और फ़साद को बहुत जल्द हिन्दू-मुस्लिम मसला बना देने में सफल हो जाता है। सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है? इसका जवाब यह है कि इस देश के दोनों बड़े समुदाय—हिन्दू और मुस्लिम—शायद ग़लतफ़हमियों और दुराग्रहों के वातावरण में जी रहे हैं। हर पक्ष दूसरे से भयभीत रहता है। इस वातावरण में जो भी अफ़वाह फैलाई जाए उस पर यक़ीन कर लिया जाता है। किसी भी ओर से थोड़ी भी लापरवाही और भड़काऊ नारे दूसरे को बेक़ाबू बना देते हैं। इसी कमज़ोरी से फ़ायदा उठाकर दंगाई दंगा भड़काने में सफल हो जाते हैं और दोनों समुदायों को लड़ाते रहते हैं।

जब तक ये ग़लतफ़हमियाँ दूर नहीं होंगी, दंगों का सिलसिला शायद रुक नहीं सकता। मुसलमानों को यहाँ के हिन्दू भाइयों से जो संदेह और आशंकाएं हैं उन्हें उनका कोई प्रतिनिधि ही दूर कर सकता है। अलबत्ता मुसलमानों के बारे में जो ग़लतफ़हमियाँ हिन्दू भाइयों को हैं उनके सम्बन्ध में यहाँ कुछ बातें पेश की जा रही हैं। इसी के साथ उनकी कुछ शिकायतों का भी उल्लेख किया जा रहा है, ताकि गम्भीरता से उन पर ग़ौर किया जा सके।

एक बड़ी ग़लतफ़हमी, जिसे निराधार आरोप कहना चाहिए, यह है कि सारा बिगाड़ इस्लाम का है। उसने अपने माननेवालों और न माननेवालों के बीच एक खाई पैदा कर दी है। वह मुसलमानों को ग़ैर-मुस्लिमों के ख़िलाफ उभारता है और उदारता एवं प्रेम की जगह संकीर्णता, नफ़रत और अनुदारता की भावना पैदा करता है। वह अपने माननेवालों को हमेशा जंग की हालत में रखता है और टकराव एवं संघर्ष की ओर ले जाता है। कहा जाता है कि इस सम्बन्ध में क़ुरआन एवं हदीस में स्पष्ट आदेश हैं। इन आदेशों के होते हुए दोनों समुदाय एकता, मेलजोल और प्रेम से नहीं रह सकते।

यह आरोप उस किताब पर लगाया जाता है, जिसने दुश्मनों के साथ भी क्षमा और दया की शिक्षा दी है, जो अपने माननेवालों को सब्र की ताकीद और सहनशीलता का उपदेश देती है। सब्र का एक पहलू यह है कि आदमी सत्य पर दृढ़-संकल्प रहे और विरोधियों के कटु से कटु व्यवहार के बावजूद भावनाओं में बहकर उत्तेजित अथवा बेक़ाबू न हो। यह शिक्षा क़ुरआन के पृष्ठों पर इतनी निरन्तरता से फैली हुई है साधारण पाठक की निगाह से भी ओझल नहीं रह सकती। परन्तु इसके बावजूद इस्लाम के सम्बन्ध में दुराग्रह और मुसलमानों के सम्बन्ध में ग़लतफ़हमी पैदा करने के लिए उन आदेशों का सहारा लिया जाता है, जो विशेष परिस्थितियों में इस्लामी राज्य को दिए गए हैं।

एक इस्लामी राज्य शान्ति एवं युद्ध दोनों हालतों से दोचार हो सकता है, उन दोनों परिस्थितियों के लिए आदेश अलग-अलग हैं। यदि इस्लामी राज्य के लिए युद्ध अत्यावश्यक हो जाए (क़ुरआन ने युद्धों के कारकों एवं शर्तों से भी बहस की है और शान्ति के हालात से भी) तो उसका निर्देश है कि दृढ़ता एवं साहस के साथ दुश्मन का मुक़ाबला किया जाए और भीरुता एवं कायरता न दिखाई जाए। इस्लामी राज्य को युद्ध की स्थिति में जो ये निर्देश दिए गए हैं, इसके सम्बन्ध में यह समझना या समझाने का प्रयास करना बड़े अन्याय की बात होगी कि हर व्यक्ति से यह सम्बोधन किया जा रहा है कि जिसका मन हो और जब चाहे युद्ध की घोषणा कर सकता है। दुनिया के हर विधान में जंग से सम्बन्धित निर्देश होते हैं, परन्तु यह फ़ैसला करना राज्य का काम होता है कि युद्ध किया जाए या न किया जाए और किया जाए तो कब किया जाए और कब ख़त्म किया जाए? राज्य के इस अधिकार को व्यक्ति अपने हाथ में नहीं ले सकता।

कहा जाता है कि मुसलमानों में अपने आप को सबसे अच्छा समझने की भावना अर्थात् सर्वश्रेष्ठता की भावना है और यही चीज़ उनको एकता और देश की मुख्यधारा से दूर रखती है।

मुसलमानों की सर्वश्रेष्ठता की भावना का मतलब यदि यह है कि वे इस्लाम की सर्वश्रेष्ठता के क़ायल हैं और उन्हें इस्लाम की शिक्षाओं, उसके मूल्यों, उसकी सभ्यता एवं संस्कृति, उसके ज्ञान एवं कलाओं और दुनिया पर उसने जो उपकार किए हैं, उन पर गर्व है तो इसकी किसी को शिकायत नहीं होनी चाहिए, इसलिए की यह कोई ग़लत बात नहीं है। हर समुदाय को अपने धर्म एवं सभ्यता पर गर्व होता है। वह अपने पूर्वजों की महानता की चर्चा करता है और उनके कारनामों को गर्व के साथ बयानक रता है। इसका उसे अधिकार प्राप्त है। हाँ, किसी को यह अधिकार नहीं है कि अपनी सभ्यता एवं संस्कृति दूसरों पर थोपने की कोशिश करे अथवा उनसे अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को भूल जाने की अपेक्षा करे। इसे सांस्कृतिक आक्रमण कहा जाता है। इस प्रकार की हिंसा की कोई भावना मुसलमानों में नहीं है। उल्टे उन्हें यह शिकायत है कि वे सांस्कृतिक हिंसा के शिकार बनाए जा रहे हैं और उन्हें अपने अतीत से बेगाना बनाने और उससे काटने की कोशिश हो रही है। इस शिकायत को दूर करना यहाँ के बहुसंख्यक वर्ग का काम है।

मुसलमानों की सर्वश्रेष्ठता की भावना के सम्बन्ध में एक बात यह भी कही जा सकती है कि उन्होंने यहाँ कई सदियों तक हुकूमत की है, इसलिए उनकी मानसिकता हुक्मरानों की बन गई है। वे मानसिक रूप से दूसरों को अपने समान समझने के लिए तैयार नहीं होते। इसलिए उनके साथ उनका रवैया भी ग़लत हो जाता है।

यह आकलन सही नहीं है। यदि इसे सही मान लिया जाए तो इसका दोष ख़ुद यहाँ के बहुसंख्यक वर्ग पर पड़ता है। यह एक वास्तविकता है कि यहाँ मुसलमानों की हुकूमत रही है। लेकिन इससे पहले एक लम्बी अवधि तक यहाँ के बहुसंख्यक वर्ग को हुकूमत और सत्ता प्राप्त रही है। इसमें बड़े-बड़े राजा-महाराजा पैदा हुए, बड़े-बड़े कारनामे किए और भारत को संगठित और शक्तिशाली बनाने की कोशिशें होती रहीं। ये सारी चीज़ें बहुसंख्यक वर्ग के अन्दर भी सर्वश्रेष्ठता की भावना पैदा कर सकती हैं। जहाँ तक आज़ादी के बाद के समय का सम्बन्ध है, इसमें बहुसंख्यक ही व्यवहारतः सत्ता पर क़ाबिज़ रहा है। इस कारण इनके अन्दर सर्वश्रेष्ठता की भावना का पाया जाना अधिक सम्भव है। मुसलमान यह समझते हैं कि बहुसंख्यक वर्ग के अन्दर दरअसल सर्वश्रेष्ठता की भावना पाई जाती है और वह सत्ता के नशे में पक्षपात अथवा अन्याय कर रहा है।

मुसलमानों के बारे में एक बात यह भी कही जा रही है कि इस मुल्क में वे हमलावरों की हैसियत से आए; क़त्ल एवं ख़ूनख़राबा किया; यहाँ की आबादी को ज़बर्दस्ती मुसलमान बनाया; उनके मन्दिरों को ढहाकर मस्जिदें बनवाईं; उनसे हुकूमत छीनी और उन्हें ग़ुलाम बनाए रखा; आशय यह है कि मुसलमानों ने भारत में ज़ुल्म का इतिहास बनाया।

ये शिकायतें वास्तव में मुसलमान सुल्तानों और बादशाहों से हैं। परन्तु इन्हें इस प्रकार पेश किया जाता है जैसे सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय से ये शिकायतें हों। हालांकि यदि यह साबित कर दिया जाए कि किसी समुदाय के अमुक गिरोह ने ग़लती की है तो इसके लिए सम्पूर्ण समुदाय को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ये उसी तरह की शिकायतें हैं जिस तरह की शिकायत यहाँ के द्रविड़ों को आर्यों से हैं, परन्तु हम यहाँ फ़िलहाल इस बहस में पड़ना नहीं चाहते कि उनकी शिकायतें सही हैं या ग़लत और उन्हें शिकायत का हक़ है या नहीं। अलबत्ता मुसलमान सुल्तानों के सम्बन्ध में कुछ बातें पेश करना चाहेंगे।

यह दावा नहीं किया जा सकता कि भारत के मुसलमान बादशाहों में सब के सब फ़रिश्ता-समान थे और उनसे कोई ग़लती नहीं हुई। उनसे बहुत-सी ग़लतियाँ हुई होंगी। लेकिन इसके साथ ही यह भी एक हक़ीकत है कि उनके ज़ुल्मो सितम की जो दासतानें बयान की जाती हैं इतिहास से उनमें से अधिकांश का सबूत नहीं जुटाया जा सकता। ये दासतानें मुसलमानों के इतिहास को दाग़दार बनाने और हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच नफ़रत के बीज बोने के लिए गढ़ी गई हैं। उन्हें आँख बंद करके स्वीकार कर लेना और उन पर आग्रह करना एक नापाक मक़सद में सहयोग देना और दुश्मन की योजना को सफल बनाना है।

इन बादशाहों ने न्याय एवं इंसाफ़ और सहिष्णुता, ग़ैर-मुस्लिमों के अधिकारों की सुरक्षा, उनके मज़हब की आज़ादी और उसके सम्मान के भी शानदार उदाहरण पेश किए हैं।

उन्होंने प्रशासन-व्यवस्था में पक्षपातहीनता और खुलेपन का सबूत दिया है। ग़ैर-मुस्लिमों को उच्च-पद प्रदान किए। युद्धों में उन पर विश्वास किया और इतने बड़े पैमाने पर जागीरें और अनुदान दिए कि भारत का कोई भी इतिहासकार आसानी से इन्हें नज़रअन्दाज़ नहीं कर सकता। उनके ये गुण तो आज के प्रजातन्त्र-काल के लिए भी नमूना बन सकते हैं। सही बात यह है कि उन बादशाहों के कमज़ोर पहलुओं को देखने की जगह उनके इन गुणों को देखना चाहिए और उन्हें अपने अन्दर पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए।

कुछ लोग बड़ी मासूमियत के साथ कह देते हैं कि मुसलमान अपने बादशाहों से सम्बन्ध-विच्छेद एवं अप्रियता की घोषणा कर दें। स्पष्ट है कि यह ऐलान उनके अच्छे कामों से तो नहीं हो सकता, उनके ग़लत कामों से होगा। इसके लिए उन आरोपों की छानबीन करनी होगी जो उन पर लगाए जाते हैं। यह तहक़ीक़ केवल मुसलमान हुक्मरानों के शासनकाल की ही नहीं होगी, बल्कि भारत के सम्पूर्ण इतिहास की होगी जो हज़ारों साल की अवधि पर फैली हुई है। यदि यह साबित हो जाए कि यहाँ के किसी भी हुक्मरां ने किसी समुदाय या गिरोह के साथ अन्याय और अत्याचार किया था तो उससे उसका समुदाय अपनी अप्रियता एवं सम्बन्ध-विच्छेद का ऐलान करेगा। इस प्रकार का प्रयास सम्पूर्ण इतिहास को दाग़दार बनाकर रख देगा, क्योंकि कोई भी समुदाय अपनी मासूमियत और बेगुनाही का दावा नहीं कर सकता। इससे कोई नैतिक एवं सामाजिक लाभ तो नहीं प्राप्त होगा अलबत्ता हर समुदाय इस एहसास में घिर जाएगा कि उसने बड़े-बड़े मुजरिम पैदा किए हैं और आज उनकी ग़लतियों की उनसे तौबा कराई जा रही है। स्पष्ट है कोई भी जाग्रत समुदाय इस अपमान को सहन नहीं कर सकता।

वास्तविकता यह है कि इतिहास शिक्षा ग्रहण करने के लिए पढ़ा जाता है ताकि आतीत में जो ग़लतियाँ हुई हैं उनसे बचने की कोशिश की जाए और जो ख़ूबियाँ मौजूद थीं, उन्हें जहाँ तक सम्भव हो अंगीकार किया जाए। इतिहास के अध्ययन का यह मक़सद कभी नहीं होता कि जिन लोगों से अतीत में ग़लतियाँ हुईं, सदियों के बाद उनकी क़ौम की निंदा की जाए अथवा उसका हिसाब-किताब चुकाया जाए। इस प्रकार पूरी दुनिया हिसाब देने और हिसाब लेने में लग जाएगी।

इस देश के बहुसंख्यक वर्ग को जिस प्रकार यहाँ के हुकमरानों से शिकायत है उसी प्रकार आम मुसलमानों से भी शिकायत हो सकती है और है, परन्तु इसका दुखद पहलू यह है कि इन शिकायतों के नतीजे में इस्लाम ही से दुराग्रह और दुर्भावना पाई जाती है। ये शिकायतें सही हों या ग़लत, इनकी बुनियाद पर इस्लाम से बदगुमान हो जाना सही नहीं है।

इस्लाम कुछ उसूलों और दृष्टिकोणों का नाम है। यह विचार-प्रधान सिद्धान्त (Ideology) है। मुसलमान उसके माननेवाले (Believers) हैं। ज़रूरी नहीं की किसी विचारधारा के माननेवालों का व्यवहार और कर्म ठीक उसी के अनुसार हो। उनके जीवन में मूल-विचारधारा से विकृति भी पाई जा सकती है। इस विकृति के बहुत से कारण हो सकते हैं। इसके बावजूद उनकी इस पहलू से आलोचना की जा सकती है कि वे इस विचारधारा की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर रहे हैं, परन्तु उनकी इस विकृति से उस विचारधारा को आलोचना का निशाना नहीं बनाया जा सकता। इस्लाम के माननेवालों में भी बहुत सी ख़ामियाँ हैं। उनकी ये ख़ामियाँ उनकी ग़फ़लत और लापरवाही के सबूत हैं। ये इस्लाम की किसी ख़ामी के सबूत नहीं हैं।

यही मामला मुसलमान हुक्मरानों एवं शासकों का है। वे इस्लाम के सच्चे नुमाइंदा नहीं थे। उनके बहुत से काम इस्लाम के अनुसार होते थे और बहुत-सी चीज़ें इस्लाम के ख़िलाफ़ भी उनकी ज़िन्दगी में पाई जाती थीं। जो लोग उनकी शिकायत करनेवाले हैं वही लोग मुसलमान आलिमों (विद्वानों), सुधारकों और सूफ़ियों के प्रति श्रद्धा भी प्रकट करते हैं, जिन्हें बहुत हद तक हम इस्लाम के नुमाइंदा कह सकते हैं। इसका मतलब यह है कि शिकायतें सियासी हैं। इस्लाम से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है। परन्तु जब दंगे की आग भड़कती है तो आदमी इस सादा-सी हक़ीक़त को भूल जाता है और इस्लाम भी उस आलोचना की लपेट में आ जाता है।

यहाँ मुसलमान बादशाहों और हिन्दू राजाओं के बीच जो जंगें हुईं, कभी-कभी उन्हें कुफ़्र (इस्लाम-विरोध) एवं इस्लाम की जंगों के रूप में पेश किया जाता है। यह सही नहीं है। ये जंगें न तो हिन्दू मत के बचाव और सुरक्षा के लिए लड़ी गईं और न इस्लाम की विजय इनका मक़सद था। ये अपनी सल्तनों के विस्तार और मज़बूती के लिए लड़ी जाती रहीं। ये कभी हिन्दू राजाओं और मुसलमान बादशाहों के बीच हुई, कभी ख़ुद मुसलमान बादशाह एक-दूसरे के ख़िलाफ़ मैदान में उतरे और कभी दोनों ओर हिन्दू राजा थे। इन जंगों को हिन्दू मत और इस्लाम की जंगें मानना और फिर उनकी दुश्मनी में इस्लाम अथवा हिन्दू मत के सम्बन्ध में कोई निर्णय करना उचित नहीं है, बल्कि अन्याय है।

इस्लाम और मुसलमानों के बारे में इस प्रकार की और भी ग़लतफ़हमियाँ हैं। इन ग़लतफ़हमियों को दूर होना चाहिए। इसके बिना न तो इस्लाम को सही शक्ल में समझा जा सकेगा और न मुसलमानों के बारे में यहाँ के बहुसंख्यक वर्ग की राय बदलेगी।

(माहनामा 'ज़िन्दगी-ए-नव', नई दिल्ली, मई, 1989 ई०)

हमारा देश किधर जा रहा है?

इस समय देश में साम्प्रदायिक दंगों की जो भयानक लहर चल रही है, उसे देखकर ऐसा आभास होता कि हिंसा में विश्वास करनेवाले संगठनों को यहाँ अपने हौसले पूरे करने की छूट मिल गई है। उनके लक्ष्य की पूर्ति के मार्ग में कोई रुकावट नहीं है। क़ानून एवं व्यवस्था उनके सामने बेबस है। वे जहाँ चाहें दंगा करा सकते हैं और क़त्ल एवं लूटपाट का बाज़ार गर्म हो सकता है। दंगे इस देश की नियति बन गए हैं। आज यहाँ दंगा भड़कता है कल वहाँ; इतने भयंकर दंगे देश की आँखों ने कम ही देखे होंगे। इन दंगों ने देश-विभाजन के परिणामस्वरूप होनेवाले दंगों की याद ताज़ा कर दी है। ये दंगे बताते हैं कि इंसान बर्बरता पर उतर आता है तो दरिन्दों एवं भेड़ियों को भी पीछे छोड़ देता है।

हमारे देश में विभिन्न धर्मों के माननेवाले लोग हैं। संविधान के अनुसार इन सबको समान अधिकार प्राप्त है। हर धर्म माननेवालों को अपने धर्मानुसार इबादत करने (पूजा-पाठ करने) तथा इबादतगाह (पूजा-स्थल) बनाने का अधिकार प्राप्त है, परन्तु दुनिया के किसी धर्म ने इसकी इजाज़त नहीं दी कि दूसरे धर्म के पूजास्थल अपनी ताक़त के बल पर ढहा दिए जाएं; उसी स्थान पर अपना पूजा-स्थल बना लिए जाएं। दुनिया ने अत्याचार एवं बर्बरता के बहुत सारे प्रदर्शन देखे हैं। इसके लिए धर्म को इस्तेमाल करना उसे बदनाम करना है। अफ़सोस कि इस देश में यही हो रहा है और धर्म के ध्वजावाहकों के हाथों हो रहा है!

हर व्यक्ति को अपने धर्म की शिक्षा एवं उसके प्रचार-प्रसार का अधिकार है। परन्तु जब इसमें हिंसा एवं क्रूरता आदि आती है तो वह अपना यह अधिकार खो देता है। फिर प्रत्येक सभ्य समाज एवं आदर्श नागरिक का यह कर्तव्य हो जाता है कि इसके ख़िलाफ़ उठ खड़ा हो और जब तक हिंसा एवं क्रूरता का क्रम न टूटे, उस समय तक अपना संघर्ष जारी रखे। यह देखकर दुख होता है कि हिंसा का नंगा नाच जारी है और सारे देश में किसी एक व्यक्ति में भी यह साहस नहीं है कि उसके सामने आए और उसे चुनौती दे। कौन कह सकता है कि हिंसा का यह दानव किस को कब निगल जाएगा और कौन इससे बचा रहेगा?

प्रजातंत्र में आज़ादी का एक तात्पर्य यह समझा जाता है कि धार्मिक समारोह और जलसे-जुलूस पर पाबंदी न लगाई जाए, परन्तु उन धार्मिक समारोहों को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने, दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने एवं उन्हें उत्तेजित करने और उन पर हमला करने का बहाना बना लिया जाए तो देश की अखण्डता के लिए उन पर पाबन्दी लगाना आवश्यक है। ज़ुल्म को खुल कर खेलने का अवसर देना सम्पूर्ण देश को तबाही एवं विनाश की ओर ले जाना है। जब किसी गिरोह को हिंसा, हत्या, ख़ूनख़राबा और लूटपाट का चस्का लग जाए तो हर कमज़ोर उसका निशाना बनता है। वह अपने और पराए का कोई भेद नहीं करता। हिंसा और उसकी प्रकृति एवं परिणाम को यथासमय महसूस न किया जाए तो सारा देश उसकी लपेट में आ सकता है और उस आग को शान्त करना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा।

इस हिंसा की एक प्रमुख मिसाल बाबरी मस्जिद और उससे सम्बन्धित ज़मीन का विवाद है। यह विवाद इस समय अदालत में है। दुनिया के प्रत्येक सभ्य समाज में मिल्कियत से सम्बन्धित विवाद में अदालत के फ़ैसलों को सर्वोच्चता प्राप्त है। किसी पक्ष का इस सीमा तक पहुँच जाना कि वह अपने ख़िलाफ़ अदालत के फ़ैसले को भी स्वीकार नहीं करेगा, हिंसा का स्पष्ट एवं ज्वलंत उदाहरण है। यह क़ानून की सर्वोच्चता का खुल्लम-खुल्ला इन्कार है। यह इस बात का ऐलान है कि वह ताक़त के बल पर अपनी बात मनवाने और अपनी योजना पर अमल करना चाहता है। वह जंगल के क़ानून पर यक़ीन रखता है जहाँ न्याय एवं इंसाफ़ का नहीं बल एवं ताक़त का राज होता है। इस प्रवृत्ति को रोका नहीं गया तो किसी के अधिकार सुरक्षित नहीं रह सकते। अधिकार उसका होगा, जो बलशाली होगा।

कुछ लोग कहते हैं कि ये दंगे धर्म के आधार पर होते हैं। धर्म का प्रश्न जब बीच में आ जाता है तो भावनात्मक उत्तेजना उत्पन्न हो जाती है। यदि इन दंगों का धर्म से कोई सम्बन्ध न हो तो आम लोगों की भावनाएं उत्तेजित नहीं होंगी।

परन्तु वास्तविकता यह है कि इन दंगों का सम्बन्ध धर्म से बिल्कुल नहीं है। दुनिया के किसी भी धर्म ने बस्तियों को उजाड़ने, आबादियों को वीरानियों में बदलने, मकानों, खेतों और कारख़ानों को उजाड़ने और चमचमाते बाज़ारों को राख का ढेर बना देने की शिक्षा नहीं दी। धर्म इन्सानों को मुहब्बत के रिश्ते में बांधता और हमदर्दी एवं भलाई का पाठ पढ़ाता है। धर्म अत्याचार का मार्ग नहीं दिखाता। हाँ, इंसान अपनी दरिन्दगी और पाशविकता को छुपाने के लिए धर्म का लबादा ओढ़ लेता है।

अब तो हिंसा को धर्म के नाम की भी ज़रूरत नहीं है। आज़ादी के बाद से उर्दू को दबाने और ख़त्म करने का प्रयास जारी था। उर्दू बोलनेवालों की ओर से निरन्तर यह मांग हो रही थी कि उर्दू को उसका जायज़ अधिकार दिया जाए। उनकी यह मांग उचित और क़ानून सीमा के भीतर थी। उत्तर प्रदेश की सरकार ने भी कुछ वर्ष पूर्व इस की मांग को स्वीकार करने का फ़ैसला किया था। यह फ़ैसला हो सकता है उर्दूवालों के वोट प्राप्त करने के लिए किया गया हो, परन्तु इसका किसी विशेष समुदाय से सम्बन्ध नहीं था। उर्दू बोलनेवालों में मुसलमान और ग़ैर-मुस्लिम दोनों हैं और सम्पूर्ण देश में यह भाषा बोली एवं समझी जाती है। उत्तर प्रदेश तो हमेशा से इसका केन्द्र रहा है। परन्तु दुर्भाग्य से इसे केवल मुसलमानों की भाषा समझा जाता है। अतः उत्तर प्रदेश सरकार के उर्दू को मान्यता देने की घोषणा के साथ ही दंगे शुरू हो गए। बदायूँ में इस प्रकरण को लेकर जिस प्रकार ख़ूनख़राबा हुआ और जिस प्रकार ट्रेनों पर हमला करके निहत्थे यात्रियों को मार डाला गया, उससे स्पष्ट है कि यहाँ का हिंसा में विश्वास रखनेवाला वर्ग दूसरों को उनके जायज़ एवं संवैधानिक अधिकारों को भी देने के लिए तैयार नहीं है।

एक राष्ट्र के दृष्टिकोण से आशंका एवं परेशानी की बात यह है कि इन घटनाओं पर सारे देश को तड़प उठना चाहिए था और उसके हमदर्दों और शुभचिन्तकों की नींदें ख़त्म हो जानी चाहिए थीं, परन्तु यह देख कर दिल दुखता है कि इस पर जो दुख एवं बेचैनी पाई जानी चाहिए थी वह पूरी दिखाई नहीं देती है। हालात कितने संगीन और नाज़ुक हैं या तो इसका एहसास नहीं है और या जानबूझकर इसे नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। यह किसी एक वर्ग अथवा समुदाय का मसला नहीं है, बल्कि सारे देश का मसला है। यह निष्क्रियता अपराध है और यह सारे देश को ले डूबेगी।

देश के किसी भाग में हरिजनों पर अत्याचार होता है तो चारों ओर हलचल मच जाती है। पार्लियामेन्ट एवं एसेम्बलियाँ विरोध के स्वरों से गूंजने लगती हैं। किसी भी अत्याचार के ख़िलाफ़ ऐसा ही विरोध प्रदर्शन होना चाहिए, परन्तु भागलपुर, मुंगेर, सीतामढ़ी और बदायूँ की धरती अत्याचार एवं क्रूरता से चीख़ उठी और इंसानियत न्याय एवं इंसाफ़ को बराबर आवाज़ देती रही और जब मानवाधिकार के ध्वजावाहकों और क़ानून के रखवालों ने कोई ध्यान न दिया तो ख़ामोश हो गई। यह ख़ामोशी दिलों को दहला देने के लिए काफ़ी नहीं है? इन भयंकर घटनाओं पर जिन व्यक्तियों एवं संगठनों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की और न्यायिक जाँच की मांग की है, उन सब को धन्यवाद देने के बाद यह सवाल करने का मन करता है कि क्या ये घटनाएँ केवल प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कर देने भर से ही थम जाएंगी?

बोफ़ोर्स प्रकरण काफ़ी अरसे से अख़बारों पर छाया हुआ है। भारत से लेकर स्विटज़रलैण्ड तक इसकी छानबीन हो रही है। इससे सम्बन्धित दस्तावेज़ उपलब्ध किए जा रहे हैं। अख़बारों में लेख एवं संपादकीय लिखे जा रहे हैं। यदि यह कहा जाए कि इस विषय पर सैकड़ों पन्ने स्याह किए जा चुके, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन्हें देख कर आभास होता है कि हमारे राजनीतिक दल देश के ग़म में घुले जा रहे हैं, इसके उत्थान एवं विकास के लिए बेचैन हैं। वे करोड़ों के धोखे एवं बेईमानी का पर्दा चीर डालना चाहते हैं। वे इस देश की आर्थिक क्षति और उसके साथ किए जानेवाले धोखे को सहन करने के लिए तैयार नहीं हैं। निस्संदेह इस प्रकरण का पटाक्षेप होना चाहिए। यह देश की भलाई और विकास के लिए अत्यन्त ज़रूरी है। प्रश्न यह है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और देश के अन्य प्रान्तों में हाल के दिनों में होनेवाले दंगों की इतनी भी अहमियत नहीं है जितनी बोफ़ोर्स प्रकरण की है? इन दंगों में सैकड़ों लोग मारे गए, इससे कई गुना अधिक लोग घायल और अपंग हुए, मकान एवं बस्तियाँ उजड़ीं, कारोबार तबाह हुए और करोड़ों रुपये की आर्थिक क्षति हुई। उन लोगों का तो कोई उल्लेख ही नहीं है जो लापता हैं और जिनकी दुर्दशा किसी को मालूम नहीं। क्या ये सब बोफ़ोर्स से कम हैं? क्या इसके लिए भी वही बेचैनी और तड़प पाई जाती है? आख़िर इस भेदभाव का कारण क्या है?

इस पूरे मामले को हमारी राजनीतिक पार्टियों ने केवल इस दृष्टि से देखा कि इस से आम चुनावों में किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है। सत्तारूढ़ पार्टी ने विपक्षी पार्टियों को दोषी ठहराया कि वे साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित कर रही हैं और टकराव का वातावरण बना रही हैं। विपक्षी पार्टियाँ सरकार और प्रशासन को ज़िम्मेदार ठहराती हैं। किसी में यह साहस नहीं कि अत्याचार के ख़िलाफ़ खड़े हों, उसके ख़िलाफ़ अपनी ज़ुबान खोलें और पीड़ितों के समर्थन में आवाज़ उठाएं। बड़े से बड़े राजनीतिक नेता भी अपनी ज़ुबान से हमदर्दी का एक शब्द निकालने से पहले हज़ार बार सोचता है कि इसका उसके राजनीतिक कैरियर पर क्या प्रभाव पड़ेगा। मज़लूम का समर्थन और ज़ालिम का विरोध करके अपनी सियासी हैसियत को दांव पर लगाना नहीं चाहता। देश की सभी बड़ी पार्टियाँ बहुसंख्यक वर्ग के तीव्र दबाव में हैं। अल्पसंख्यकों के लिए उसे नाख़ुश करने का साहस इन में से किसी में नहीं है। इन हालात में मुसलमान किसी भी पार्टी से क्या अपेक्षा कर सकते हैं? उन्हें अपनी समस्याएं स्वयं ही सुलझानी होंगी। इसके लिए अपने अस्तित्व की सुरक्षा, अपने दीन एवं ईमान (इस्लाम) पर दृढ़ता से जमे रहने के साथ संयम एवं साहस की ज़रूरत होगी और ऐसी दूरगामी कार्य योजना (रणनीति) बनानी होगी कि यहाँ वे अपने अस्तित्व को भी सुरक्षित रख सकें और समुदाय का कल्याण और भलाई चाहनेवाले की हैसियत से इस देश का मार्गदर्शन एवं नेतृत्व भी कर सकें।

ये पंक्तियां 7 नवम्बर, 1989 ई० को लिखी गई हैं। आम चुनाव होनेवाले हैं। अल्लाह ही जानता है कि इनके छपते-छपते हालात क्या रुख़ बदलते हैं और देश का क्या नक़्शा बनेगा?

(माहनामा "ज़िन्दगी-ए-नव", नई दिल्ली)

धार्मिक वर्ग से कुछ निवेदन

यह एक हक़ीक़त है और बहुत ही दर्दनाक हक़ीक़त है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर बार-बार ऐसा वातावरण बना दिया जाता है कि अवाम का एक वर्ग बुद्धि एवं विवेक को त्याग बैठता है और दंगों, हंगामों, हत्या एवं तोड़-फोड़ का एक सिलसिला शुरू हो जाता है। दंगों और हंगामों की आग जहाँ भड़कती है प्रायः वहीं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दूर-दराज़ के स्थान भी इसकी लपेट में आ जाते हैं।

यह स्थिति किसी विशेष धर्म के लिए ही नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लिए चिन्तनीय है। इसके कारण धर्म पर से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। देश के गंभीर लोग यह सोचने पर मजबूर हो सकते हैं बल्कि हो रहे हैं कि धर्म एक जुनून (उन्माद) है। यह केवल तोड़फोड़ एवं लड़ाई-झगड़े का माध्यम है। इससे मनुष्य के कल्याण की आशा नहीं की जा सकती, और इससे दूर रहने में ही भलाई है। हो सकता है यह धर्म के विरुद्ध एक षड्यन्त्र और उसे बदनाम करने का तरीक़ा हो। इस पर धार्मिक वर्ग को गंभीरता से सोचना चाहिए और इससे बचाव का प्रयास करना चाहिए।

इस स्थिति के पैदा होने के कई कारण हो सकते हैं। एक कारण तो यह है कि धर्म, राजनीतिज्ञों का हथकण्डा बन कर रह गया है। देश का नेतृत्व तो बहुत बड़ी बात है, यहाँ इससे बहस नहीं है, सीमित अर्थ में धर्म का नेतृत्व भी उन लोगों के हाथ में नहीं है जो इससे (धर्म से) निःस्वार्थ एवं निष्ठा-भाव से जुड़े हुए हैं। इसका नेतृत्व व्यवहारतः वे लोग कर रहे हैं जिनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है; उनकी ज़िन्दगियाँ उसकी शिक्षाओं से ख़ाली हैं; वे अपने छोटे-छोटे हित के लिए झूठ एवं धोखाधड़ी से काम ले सकते हैं; परायों ही को नहीं अपनों को भी धोखा देने में वे तनिक संकोच नहीं करते; कमज़ोर लोग उनके अत्याचार का शिकार होते हैं और उनका शोषण करने में उन्हें ज़रा भी झिझक नहीं होती। यही लोग लड़ाई-झगड़े और दंगे में आपको आगे-आगे मिलेंगे। इन्हें धर्म से कोई हमदर्दी नहीं है, बल्कि अपने हित के लिए वे सक्रिय हैं और धर्म को इसका माध्यम बनाए हुए हैं।

इस स्थिति का दूसरा कारण यह है कि यहाँ की जनता का बहुसंख्यक ख़ुद अपने धर्म, उसकी शिक्षाओं और उसकी अपेक्षाओं से अनभिज्ञ है। उसे धर्म से केवल एक प्रकार का भावनात्मक लगाव है। इसी कारण धर्म के नाम पर उसे आसानी से जमा किया जा सकता है। उसकी इस धार्मिक भावना का स्वार्थी वर्ग लाभ उठा रहे हैं और धार्मिक नारों के द्वारा जनता को गुमराह कर रहे हैं। जनता के लिए यह फ़ैसला करना कठिन हो रहा है कि कौन धर्म के मामले में निष्ठावान है और कौन धर्म के नाम पर उसका शोषण कर रहा है?

ये सारे हंगामे धर्म के नाम पर होते हैं। इसलिए धर्म से निःस्वार्थ सम्बन्ध रखनेवाले लोगों, दलों और उसके शुभचिन्तकों की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। यह उनका प्रथम कर्त्तव्य है कि धर्म की तस्वीर को बिगड़ने न दें। यहाँ की साधारण एवं विशिष्ट जनता को बताएं कि धर्म अत्याचार एवं बर्बरता को फैलाने के लिए नहीं, उसे मिटाने के लिए आया है। उसने घृणा एवं शत्रुता का नहीं प्रेम एवं भाईचारा का पाठ पढ़ाया है। वह ज़ुल्म को मिटाना और न्याय एवं इंसाफ़ को स्थापित करना चाहता है। यह बात विस्तारपूर्वक हर क्षेत्र से पेश की जानी चाहिए कि दुनिया के किसी धर्म ने हत्या एवं ख़ूनख़राबा, बलात्कार एवं लूटमार का हुक्म नहीं दिया है। किसी धर्म ने यह पाठ नहीं पढ़ाया है कि बेगुनाहों को निर्ममता के साथ क़त्ल कर दिया जाए, मासूम बच्चों के गले काट दिए जाएं, आबाद घरों में आग लगा दी जाए, राह चलते लोगों पर हमले हों और उन्हें चाकुओं एवं गोलियों का निशाना बनाया जाए, निहत्थे और असहाय मुसाफ़िरों को अपनी मंज़िल तक पहुँचने से पहले ख़त्म कर दिया जाए, इंसान अपनी इंसानियत का लबादा उतार फेंके और दरिन्दा बन जाए, उसकी दरिन्दगी और पाशविकता के कारण जवान औरतों के सुहाग लुट जाएं, औरतों की पवित्रता एवं शालीनता की चादर तार-तार होने लगे, मासूम बच्चे अनाथ और बेसहारा हो जाएं और बूढ़े माँ-बाप अपने सहारे खो बैठें। जिस व्यक्ति का धर्म से नाममात्र को भी सम्बन्ध है उस से दरिन्दगी की अपेक्षा नहीं की जा सकती वह इस पाप की कल्पना से भी कांप उठेगा।

ये बातें केवल ज़ुबानी जमा ख़र्च के तौर पर न हों, बल्कि धर्म के वास्तविक अनुयायिओं को दंगों एवं फ़साद के मुक़ाबले में डट जाना चाहिए। जो लोग फ़साद भड़कानेवाले, षड्यन्त्र रचनेवाले और दंगों में लिप्त हों अनके स्याह चेहरों पर से नक़ाब उतार देना चाहिए और उन्हें दुनिया के सामने नंगा कर देना चाहिए। ये वे लोग हैं जो अपने स्वार्थ के लिए अंधे हो जाते हैं, इनका धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है और इन्हें इनके अपराध का दण्ड मिलना ही चाहिए। इन्हें समाज से अलग-थलग कर दिया जाए और धर्म के इस्तेमाल की इजाज़त न दी जाए। जनता को उनके षड्यन्त्रों से अवगत कराया जाए, उनके मकड़जाल से उन्हें मुक्ति दिलाई जाए और उन्हें योग्य नेतृत्व उपलब्ध कराया जाए। धर्म के ध्वजावाहकों के इस अपराध को इतिहास माफ़ नहीं करेगा कि इनके सामने इंसान धर्म के नाम पर हैवान बन जाए और वे मूक दर्शक बने रहें। इससे बड़ी बदनसीबी और क्या होगी कि धर्म का नेतृत्व बुरे और दंगा-फ़साद भड़कानेवाले लोगों के हाथों में हो और वे इसके नैतिक मूल्यों की अवहेलना एवं इसकी तस्वीर को विकृत करते फिरें और धर्म के नामलेवा इनका मुक़ाबला भी न कर सकें।

नैतिक शिक्षाएं सभी धर्मों की पूंजी हैं। द्वेष, ईर्ष्या, घृणा, लोभ, लिप्सा, अहंकार, अभिमान जैसे रोग से पाक होना एवं पवित्रता, शीलता, सत्यवादिता, सदाचारिता, सत्यनिष्ठता, उच्चोत्साह, जान-माल का सम्मान, आतिथ्य सत्कार तथा सादगी जैसे गुणों से परिपूर्ण होना, छोटों से प्यार एवं मुहब्बत एवं बड़ों का सम्मान करना, कमज़ोरों को सहारा देना, दुखियों, मुहताजों और ज़रूरतमंदों के काम आना, लोगों के अधिकारों को पूरा करना, ज़ालिम को ज़ुल्म से रोकना एवं मज़लूम का साथ देना, ये वे श्रेष्ठतम नैतिक मूल्य हैं जिनके बारे में विभिन्न धर्मों के बीच कोई मतभेद नहीं है। ये धर्म की शिक्षाओं के प्रमुख अंश हैं, बल्कि सही बात यह है कि इनके बिना धर्म की कल्पना भी मुश्किल से की जा सकती है। ये इंसान को इंसान और व्यक्ति एवं समाज के सम्बन्ध को अच्छा बनाते हैं। इनकी चर्चा से किसी धार्मिक गोष्ठी को ख़ाली नहीं होना चाहिए। सभी संचार माध्यमों को इसमें लग जाना चाहिए और सबसे पहले धार्मिक वर्ग को इनका नमूना पेश करना चाहिए।

इसमें संदेह नहीं कि धर्मों के बीच मतभेद भी हैं और उनका एक लम्बा इतिहास भी है। कहीं तौहीद (एकेश्वरवाद) है, कहीं शिर्क (बहुदेववाद) है, कहीं आसमानी हिदायत की कल्पना है और कहीं कठिन साधना मनोकामनाओं पर अंकुश के परिणामस्वरूप इंसान के अन्दर से हिदायत उभरती है, कहीं आख़िरत (परलोकवाद) है और कहीं आवागमन और पुनर्जन्म की अवधारणा है, कहीं इबादत एवं साधना के बाद भी इंसान और ईश्वर का अन्तर हर स्थिति में शेष रहता है और कहीं इंसान मुक्ति पाकर ईश्वर में विलीन हो जाता है। कुछ लोगों के निकट ही नहीं कि ये मतभेद समाधान विहीन हैं, बल्कि धार्मिक विवाद का इतिहास गवाही देता है कि इनसे संघर्ष और टकराव पैदा होता है।

इसके विपरीत कुछ लोग समझते हैं कि धर्मों के बीच जो मतभेद पाया जाता है वह गंतव्य का नहीं मार्गों का मतभेद है। मंज़िल सबकी एक है और रास्ते जुदा-जुदा हैं। वे मतभेद को अवास्तविक समझते हैं और उन्हें वह अहमियत नहीं देते जो दी जानी चाहिए। इस कारण उनके समाधान की ओर उनका ध्यान नहीं है। परन्तु वास्तविकता यह है कि धर्मों के बीच मतभेद हैं और बुनियादी मतभेद हैं। उनमें आस्था का भी मतभेद है। न तो इससे इन्कार किया जा सकता है और न इसे आंशिक और ग़ैर-बुनियादी कहकर नज़रअंदाज़ ही किया जा सकता है। परन्तु इन सारे मतभेदों के बाद भी हक़ीक़त तक पहुँचा जा सकता है। इसके दरवाज़े जिस प्रकार दुनिया के किसी गिरोह के लिए बंद नहीं हैं, उसी प्रकार धार्मिक वर्ग के लिए भी बन्द नहीं हैं। हाँ, इसके लिए दो बातों पर ध्यान देना होगा:

  1. एक तो यह कि विभिन्न धर्मों के सम्मान की भावना पैदा की जाए। कोई व्यक्ति किसी धर्म का अपमान न करे, उसकी शिक्षाओं में कांट-छांट न करे, उसके प्रति वे बातें न जोड़े जिनसे उसका कोई सम्बन्ध न हो, उसके सम्माननीय व्यक्तियों एवं बुज़ुर्गों को बुरा-भला न कहे और उनकी शिक्षाओं का मज़ाक़ न उड़ाए। धर्मों के बीच जो मतभेद हैं उन्हें ज़बर्दस्ती ख़त्म करने और किसी एक धर्म या संस्कृति को बलपूर्वक थोपने की कोशिश न की जाए। ज़ोर-ज़बर्दस्ती इंसान की प्रकृति के विपरीत है, क्योंकि धर्म वास्तविक ईश्वरवाद का नाम है और किसी को बलपूर्वक ईश्वरवादी नहीं बनाया जा सकता। जब ईश्वर ने अपनी बंदगी के लिए इंसान को विवश नहीं किया, तो कोई दूसरा व्यक्ति उसे कैसे मजबूर कर सकता है?
  2. दूसरे यह कि अक़ीदा (आस्था) और अमल (कर्म) की आज़ादी हर व्यक्ति का बुनियादी हक़ है। इस हक़ को स्वीकार करके धार्मिक लोगों को अपने मतभेद सुलझाने चाहिएं। खुले वातावरण में एक-दूसरे के विचारों को गंभीरता से समझने की कोशिश की जाए, किसी भी मसले में तथ्यों को विकृत करने, घटनाओं को तोड़ने-मोड़ने और रद्द या इन्कार का रवैया नहीं अपनाना चाहिए। समस्याओं को निष्ठा के साथ हल करने की भावना हो और न्याय एवं इन्साफ़ के तक़ाज़े पूरे किए जाएं तो पेचीदा से पेचीदा समस्या भी हल हो सकती है। यह आश्चर्यजनक बात है और धार्मिक लोगों के लिए लज्जाजनक कि बड़े-बड़े राजनैतिक विवाद तो बातचीत से हल हों और धार्मिक जगत में इसकी सम्भावना शेष न रहे।

इस सम्बन्ध में आख़िरी बात यह है कि धर्म के बारे में मान लिया गया है कि इसका सम्बन्ध इन्सान के केवल निजी जीवन से है, सामूहिक जीवन इस से स्वतन्त्र रहेगा और इसे स्वतन्त्र रहना चाहिए। इसके पक्ष में यह दलील दी जाती है कि धर्म व्यावहारिक नहीं है और सामूहिक जीवन का बोझ उठाने की इसमें शक्ति नहीं है। कहा जाता है कि धार्मिक विवाद भी इस राह में रुकावट हैं। वे सामूहिक जीवन के लिए अति विनाशकारी हैं। इन विवादों के कारण इस बात की अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि धर्म लोगों को जोड़ने और उन्हें एक दूसरे से क़रीब करने का काम कर सकेगा। इससे बिखराव ही फैल सकता है। इस तर्कविहीन और अस्वाभाविक बात को धार्मिक लोगों ने भी व्यवहारतः स्वीकार कर लिया है, हालांकि यह धर्म के ख़िलाफ़ एक साज़िश है। धर्म की भूमिका पूजापाठ और उपासना तक सीमित हो और दुनिया का सुधार एवं कल्याण तथा उसकी समस्याओं से उसका सम्बन्ध न हो तो इससे किसी को क्या दिलचस्पी हो सकती है? धर्म-विरोधी तत्व यही चाहते हैं कि धर्म अपना आकर्षण खो दे और वह बेजान होकर रह जाए। फिर मज़े की बात यह है कि एक ओर तो यह कहा जाता है कि धर्म का सामूहिक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए, दूसरी ओर धर्म की नैतिक शिक्षाओं की ज़रूरत और उसका महत्व भी स्वीकार किया जाता है, हालांकि धर्म का रिश्ता सामूहिक जीवन से टूटने के बाद इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती कि इसके नैतिक मूल्य समाज में शेष रहेंगे।

धर्म के मूल, उसके विवाद और जीवन से उसके सम्बन्ध के बारे में इस्लाम का एक विशेष दृष्टिकोण है। वह यह है कि इन्सान ख़ुदा के दीन (धर्म) या उसकी हिदायत एवं रहनुमाई से कभी वंचित नहीं रहा। उसने पहले दिन ही से उसे दीन की दौलत प्रदान की है। यह दीन बुनियादी तौर पर हमेशा एक ही रहा है। लेकिन इससे विलगाव भी होता रहा। इन्सानों का यह विलगाव इच्छाओं के अनुसरण और मनोकामनाओं का परिणाम था। ख़ुदा की ओर से हर काल में उसके पैग़म्बर और रसूल आते रहे और उसी दीन की ओर पलट आने का अह्वान करते रहे।

क़ुरआन एक ओर इन शिक्षाओं की व्याख्या करता है, जो ख़ुदा के पैग़म्बरों के द्वारा इस दुनिया में आती रही हैं, दूसरी ओर उनमें जो काट-छांट एवं बढ़ोतरी एवं विलगाव हुआ है उसकी भी निशानदेही करता है। उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी और प्रमुख गुण यह है कि वह ख़ुदा से इन्सान के आध्यात्मिक सम्बन्ध को मज़बूत करने के साथ यह भी बताता है कि इन्सान किस तरह पूरी ज़िन्दगी में ख़ुदा की इच्छा का पाबन्द रह सकता है? इसके लिए वह इबादत (उपासना-पद्धतियों) एवं अख़लाक़ से लेकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा सभ्यता एवं संस्कृति अर्थात् जीवन के हर क्षेत्र के लिए एक नक़्शा पेश करता है। इसमें अधिकारों एवं कर्तव्यों का विभाजन न्याय, इन्साफ़ और समानता की बुनियाद पर किया गया है। उसका दावा है कि वह ख़ुदा की तरफ़ से आनेवाला आख़िरी दीन (धर्म) है और अपने मूल रूप में सुरक्षित है। इसमें संदेह नहीं यह बहुत बड़ा दावा है। इसे किसी भेदभाव या संकीर्ण दृष्टि की बुनियाद पर रद्द कर देना सही न होगा। इस पर गंभीरतापूर्वक चिन्तन की ज़रूरत है।

क्या इस्लाम हमारी समस्याएं हल कर सकता है?

इस समय देश जिन नाज़ुक और संगीन हालात से गुज़र रहा है, इन से हर दर्दमंद इन्सान बेचैन और परेशान है। नहीं मालूम हालात कब क्या रुख़ इख़्तियार करेंगे और देश कहाँ पहुँचेगा? अफ़सोस यह है कि इन हालात में जिस खुली मानसिकता एवं विशाल हृदयता का सबूत देना चाहिए और हम में जो संगठन एवं एकता होनी चाहिए, वह नहीं है। हम छोटी-छोटी समस्याओं में उलझे हुए हैं और एक-दूसरे से संघर्षरत हैं।

राष्ट्र या क़ौमें कुछ सामूहिक गुणों और उच्च नैतिक मूल्यों की बुनियाद पर तरक़्क़ी करती हैं। जिस क़ौम का दामन इन गुणों से ख़ाली हो, उसके लिए तरक़्क़ी के रास्ते बन्द हो जाते हैं और वह बहुत जल्द पतनोन्मुख हो जाती है। अफ़सोस कि ये उच्च नैतिक मूल्य हमारी क़ौमी ज़िंदगी (राष्ट्रीय जीवन) में यदा-कदा ही नज़र आते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हर व्यक्ति स्वयं अपने और अपने परिवार के हित के पीछे दौड़ रहा है। देश और राष्ट्र के हित से किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है। वह अपने हित के लिए सम्पूर्ण राष्ट्र को बड़े से बड़ा नुक़सान बेझिझक पहुँचा सकता है। इस मामले में वे लोग भी किसी से पीछे नहीं हैं, जो देशभक्त होने के दावेदार हैं और दूसरों से वफ़ादारी का सबूत मांगते फिरते हैं। देश के संसाधन सम्पूर्ण राष्ट्र की अमानत हैं, परन्तु एक छोटा-सा तबक़ा उन पर क़ाबिज़ है। उसे इत्मीनान है कि क़ानून उसकी राह में रुकावट नहीं बन सकता। झूठ, धोखा, और रिश्वतख़ोरी के द्वारा वह उससे बच सकता है। इसमें सफलता न मिलने पर उसके बड़े लोगों के सम्बन्ध काम आ सकते हैं।

हमने पश्चिम से जो मूल्य एवं आदर्श हासिल किए हैं, उनमें सबसे प्रमुख आदर्श बेहयाई (निर्लज्जता), नग्नता एवं अश्लीलता है। साहित्य, मनोविज्ञान, संस्कृति एवं कला के नाम पर इसे इस प्रकार बढ़ावा दिया जा रहा है जैसे देश और समाज की सबसे अहम ज़रूरत यही है। समाचार पत्र-पत्रिकाएं, किताबें, रेडियो, टी०वी०, सिनेमा अर्थात् प्रचार-प्रसार के सभी माध्यम इसी काम को बढ़ावा दे रहे हैं। बेहयाई के बढ़ने को पश्चिम तरक़्क़ी का चिह्न समझता है और हम भी इसी भ्रम में घिरे हैं। सिवाए इसके क्या कहा जाए कि "वह भी नादान हम भी नादान।" इसी प्रकार दौलत और पूंजी में वृद्धि तथा पद एवं प्रतिष्ठा में तरक़्क़ी के साथ-साथ नशीले पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के छात्रों को इसकी लत बुरी तरह लग रही है। जिस समाज में बेहयाई आम हो, परदा ख़त्म हो जाए और नशीली दवाओं का इस्तेमाल बढ़ जाए वह व्यभिचार से सुरक्षित नहीं रह सकता। ऐसे समाज में व्यभिचार एवं यौन-शोषण जैसी बुराई ज़रूर फैलेगी और उसके बुरे परिणाम ज़रूर सामने आएंगे। पश्चिम के पूंजीपति और धनी देश इस ऐयाशी को किसी तरह बर्दाश्त कर रहे हैं और अभी कुछ समय तक शायद बर्दाश्त भी कर ले जाएं, परन्तु भारत जैसे ग़रीब देश के लिए इसे बर्दाश्त करना आसान नहीं है। यह वह रोग है, जो इन्सान की शक्ति और ताक़त को घुन की तरह खा जाता है। अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस देश को यह घुन लग चुका है।

किसी देश की सबसे बड़ी ताक़त उसकी एकता और उसका संगठन है। यह न तो केवल इच्छा और कामना करने से प्राप्त होता है और न मात्र भाषणों एवं लेखों से। इसे न तो ज़ोर-ज़बरदस्ती से पैदा किया जा सकता है और न वादों से। इसके लिए ज़रूरी है कि सारे देश में प्रेम एवं भाईचारे का वातावरण पाया जाए। हर एक के साथ समानता और बराबरी का व्यवहार किया जाए। हर व्यक्ति दूसरे के हित को अपना हित समझे, किसी का शोषण न हो, किसी पर ज़ुल्म एवं ज़्यादती न हो। यदि कोई ज़्यादती करे तो क़ानून उसका हाथ पकड़ ले और बग़ैर किसी लाग-लपेट के न्याय एवं इंसाफ़ क़ायम करे, परन्तु यह एक हक़ीक़त है कि ऐसे वातावरण को पैदा करने में हम नाकाम हैं। इस देश के विभिन्न वर्ग एक-दूसरे के साथ अविश्वास के वातावरण में जी रहे हैं। हर वर्ग दूसरे को अपना प्रतिद्वन्द्वी समझता है और उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता रहता है। किसी के अन्दर प्रतिशोध की भावना है और किसी को अपनी जान बचाने की चिन्ता है। इतने बड़े देश की सत्ता एवं राजनीति जिस सूझ-बूझ, विवेक, विशाल हृदयता, प्रेम, उदारता, शिष्टता एवं सभ्यता की अपेक्षा करती है वह बहुत कम हमारे हिस्से में आई है।

इसमें संदेह नहीं कि आज भी हमारे इस देश में ऐसे लोग मौजूद हैं जिनके चरित्र एवं आचरण को चैलेंज नहीं किया जा सकता, जिनके अन्दर उच्च नैतिक गुण पाए जाते हैं, जो देश के सच्चे शुभचिन्तक हैं और जो देश के प्रति निष्ठावान हैं, परन्तु इस हक़ीक़त से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि समाज पर उनका प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता। उनका निजी चरित्र राष्ट्रीय चरित्र नहीं बन सका है। जब तक सम्पूर्ण राष्ट्र के अन्दर वे उच्च नैतिक गुण न पाए जाएं जो उसे जीवन एवं शक्ति प्रदान करते हैं, तब तक उसके विकास और तरक़्क़ी की ज़मानत दुनिया की कोई ताक़त नहीं दे सकती।

इस्लाम के आने से पूर्व अरब महाद्वीप इन्हीं हालात से गुज़र रहा था। पूरा इलाक़ा विभिन्न क़बीलों में बँटा हुआ था, कोई ऐसी राजनीतिक व्यवस्था नहीं थी जो उन सब को एकता के सूत्र में पिरोती। उनका कोई लीडर अथवा नेता नहीं था, जिसके आदेशों का पालन करने के लिए वे बाध्य होते बल्कि हर क़बीले का अपना सरदार था, जो उस पर शासन करता था। नियमानुसार कोई राज्य-विधान नहीं था बल्कि कुछ रस्म-रिवाज थे, जिनकी पाबंदी हो रही थी। उनके बीच छोटी-छोटी बात पर भयंकर जंगें शुरू हो जातीं और कभी-कभी लम्बी अवधि तक ख़ूनख़राबा चलता रहता। किसी की जान एवं माल सुरक्षित नहीं थे। ज़ुल्म की चक्की पूरी शक्ति के साथ चल रही थी। ताक़तवर कमज़ोर को खाए जा रहा था। ग़ुलामों, अनाथों, औरतों एवं विधवाओं के साथ अनुचित व्यवहार किया जाता था। लूटमार, क़त्ल, बलात्कार एवं व्यभिचार आम था। शराब पानी की तरह इस्तेमाल की जाती थी। इस प्रकार पूरा समाज एक ज़बर्दस्त राजनीतिक और नैतिक संकट में घिरा हुआ था।

इस्लाम ने उन सब को इस परिकल्पना के तहत एकत्र किया कि वे अपनी मर्ज़ी के मालिक एवं आज़ाद नहीं हैं। वे इस दुनिया में मनमानी करने के लिए स्वतन्त्र नहीं हैं, बल्कि वे ख़ुदा के बंदे (ग़ुलाम) हैं और उसकी इबादत एवं बंदगी के लिए पैदा किए गए हैं। अल्लाह ने उनकी हिदायत (मार्गदर्शन) के लिए अपना आख़िरी रसूल भेजा और अपनी आख़िरी किताब उतारी। उनकी नजात (मुक्ति) एवं कामियाबी के लिए सिर्फ़ यही एक किताब है। वे इसका अनुसरण करें। इस अधार पर उसने इनके मन-मस्तिष्क में बड़ी क्रान्ति ला दी। जो ख़ुदा को भूले हुए थे उनके हृदयों को ख़ुदा के भय से भर दिया; जो दुश्चरित्र थे उनके चरित्र को ऐसा चमका दिया कि चाँद-तारे भी शर्माएं; जो किसी विधि-विधान को जानते तक न थे, उनके सम्पूर्ण जीवन को ख़ुदा की शरीअत का पाबन्द बना दिया; जिनकी कोई राजनीतिक व्यवस्था नहीं थी, उन्हें एक सुदृढ़ राजनीतिक व्यवस्था दी; जो एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे थे, उन्हें भाई-भाई बना दिया; जो परस्पर संघर्षरत थे उनमें दूध और शकर की तरह मेलजोल करा दिया। फिर उन सब को जोड़ कर ऐसी उम्मत (क़ौम) बनाई जो भलाई फैलानेवाली है और उसके द्वारा पूरी दुनिया के सुधार का काम लिया गया।

इस्लाम ने इन परस्पर संघर्षरत गिरोहों को जोड़कर जिस प्रकार एक मिल्लत और एक उम्मत बनाया उसका उल्लेख क़ुरआन ने इन शब्दों में किया है—

“ऐ ईमानवालो अल्लाह से डरो जिस तरह उससे डरने का हक़ है और तुम्हें मौत आए तो इस्लाम ही की हालत में आए। सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और मतभेद एवं विलगाव में न पड़ जाओ और अल्लाह के एहसान को याद करो कि तुम एक-दूसरे के दुश्मन थे तो अल्लाह नें तुम्हारे दिलों को जोड़ दिया और उसके फ़ज़्ल (कृपा) से तुम भाई-भाई बन गए। तुम आग के गढ़े के किनारे खड़े थे। अल्लाह ने उससे तुम्हें बचा लिया। इस तरह अल्लाह तुम्हें अपनी आयतें खोल-खोल कर बयान करता है। ताकि तुम मार्ग पालो।” -क़ुरआन 3:102-103

ईमानवालों को एकता एवं भाईचारे की जो दौलत मिली उसके उल्लेख से पहले उन्हें ईश-भय की, इस्लाम पर जमे रहने और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ने की हिदायत की गई है, क्योंकि यह दौलत उन्हें इसी से मिली है। इसमें इस बात की ओर भी संकेत है कि वे इस हिदायत पर नहीं चलेंगे तो बिखर जाएंगे और उनकी शक्ति टुकड़े-टुकड़े होकर समाप्त हो जाएगी।

इन आयतों में जिन चीज़ों की हिदायत की गई है, आइए, उन पर ग़ौर किया जाए।

इन आयतों का सम्बोधन ईमानवालों से है। ईमान यह है कि इन्सान इस हक़ीक़त को मान ले कि अल्लाह इस कायनात (ब्रह्माण्ड) का पैदा करनेवाला एवं इसका मालिक है और इस कायनात की तमाम चीज़ें उसकी रचना हैं और सब पर उसका शासन चलता है। इन्सान अल्लाह का बंदा है, उसे केवल अल्लाह ही की बंदगी करनी चाहिए। वही उसका पूज्य एवं शासक है। उसके अतिरिक्त किसी दूसरे की इबादत एवं बंदगी उसके लिए जायज़ नहीं है।

ईमानवालों को आदेश दिया गया है कि तक़वा (ईश-भय) को अपनाएं। 'तक़वा' दिल की एक विशेष अवस्था का नाम है। जब दिल में अल्लाह के डर के सिवा किसी का डर न हो, जब उसकी मुहब्बत हर दूसरी चीज़ की मुहब्बत से अधिक हो, जब इन्सान पर अल्लाह को ख़ुश करने और उसकी नाराज़गी से बचने की चिन्ता छा जाए और जब इन्सान अल्लाह के सामने बंदे की हैसियत से अपने आप को डाल दे और उसकी बंदगी के लिए स्वेच्छा से तैयार हो जाए, यही 'तक़वा' है।

आदेश दिया गया है कि जीवन भर इस्लाम पर क़ायम रहो। इस्लाम और तक़वा दो अलग-अलग चीज़ें नहीं है, बल्कि एक ही सच्चाई के दो पहलू हैं। तक़वा आन्तरिक अवस्था है और इस्लाम उसकी वाह्य अवस्था का नाम है। तक़वा यदि, वास्तव में, दिल में मौजूद है तो वह इस्लाम बन कर इन्सान की ज़िन्दगी में अनिर्वायत: परिलक्षित होगा। जिस तक़वा का व्यावहारिक जीवन में संकेत न मिले, वह तक़वा ही नहीं है।

इसके बाद कहा गया कि अल्ललाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो। अल्लाह की रस्सी से तात्पर्य उसकी किताब क़ुरआन है। अल्लाह सारे इन्सानों का हाकिम और उसकी किताब उसका क़ानून है। ईमान, तक़वा और इस्लाम इस किताब से मिल सकता है। अल्लाह का हुक्म है कि सारे इन्सान इस किताब को रहनुमा (मार्गदर्शक) बनाएं और इसके पीछे चलें। इसके नतीजे में उन्हें दो चीज़ें मिलेंगी: एकता-संगठन और आख़िरत की कामियाबी।

अल्लाह को मानने के बाद इन्सान के अन्दर यह यक़ीन उभरता है कि इन्सान बंदे और ग़ुलाम हैं। वे एक परिवार के सदस्य हैं जिन्हें मिलकर अल्लाह की इबादत और आज्ञापालन का कर्तव्य पूरा करना है। वे एक हैं और एक ही काम के लिए पैदा किए गए हैं। अल्लाह के निकट न कोई तुच्छ अथवा हेय है न शरीफ़ अथवा महान, सबकी हैसियत एक जैसी है। इन्सानों के बीच भाषा, वर्ण, जाति एवं देश के जो मतभेद पाये जाते हैं वे कुछ छोटे-छोटे कारकों की बुनियाद पर अस्तित्व में आए हैं। उनका कोई वास्तविक आधार नहीं है। कल क़ियामत के दिन इंसान की क़िस्मत का फैसला इन तुच्छ कारकों की बुनियाद पर नहीं होगा, बल्कि उसके आचरण की बुनियाद पर होगा। वहाँ सफलता उस व्यक्ति को मिलेगी जिसके आचरण अच्छे हैं, जो ईमानवाला एवं मुस्लिम है और जिसके अन्दर तक़वा पाया जाता है। जो इन गुणों से वंचित है, उसे अल्लाह के अज़ाब (यातना) से कोई पद अथवा प्रतिष्ठा बचा नहीं सकती है और न ख़ानदान के आधार पर ही उसकी मुक्ति सम्भव है। उसके लिए अपमान ही अपमान है। यह यक़ीन महानता, तुच्छता अथवा हीनता के सारे भेदभाव को ख़त्म कर देता है और सारे इन्सान अपने मतभेदों को भूल कर एक पंक्ति में खड़े हो जाते हैं। हमारे देश के विभिन्न गिरोहों एवं समुदायों को सिर्फ़ इसी बुनियाद पर जोड़ा जा सकता है। इसके अलावा इसकी एकता का और कोई उपाय नहीं हो सकता। सवाल है कि क्या हमारा देश इसके लिए तैयार होगा? (माहनामा "ज़िन्दगी-ए-नव" नई दिल्ली, मई 1990)

मुसलमानों की शिकायतें और उनका इलाज

यह एक हक़ीक़त है कि इस देश के अल्पसंख्यकों को, जिनमें मुसलमान सबसे प्रमुख हैं, यहाँ के उन लोगों से जो बहुसंख्यक वर्ग से सम्बन्धित हैं, बहुत-सी शिकायतें हैं और उनकी अभिव्यक्ति भी होती रहती है।

कुछ लोग मुसलमानों की इन शिकायतों और इनकी अभिव्यक्ति के तरीक़े में कट्टरता महसूस करते हैं। कुछ बातों को अतिश्योक्तिपूर्ण भी बताया जाता है। कुछ लोगों को सम्भव है कि इस मामले में मुसलमानों के रवैये की तल्ख़ी बुरी मालूम पड़ती हो, परन्तु कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति इन्हें निराधार अथवा अनुचित नहीं कह सकता।

मुसलमान समझते हैं कि उनके ख़िलाफ़ घोर पक्षपात का वातावरण हर ओर छाया हुआ है और वे इस वातावरण में साँस लेने को मजबूर हैं। इस पक्षपात का प्रदर्शन कभी किसी व्यक्ति की ओर से होता है और कभी किसी गिरोह की ओर से; न तो राजनीतिक दलों का दामन इससे बिल्कुल पाक है और न सामाजिक संगठनों का; प्रशासन भी इस रोग से ग्रसित है और सरकार भी। इस भेदभाव एवं पक्षपात का कोई एक रूप नहीं है, बल्कि यह बहुत से रूप धारण करके प्रकट होता है।

मुसलमान इस देश में अपनी पहचान के साथ जीना चाहते हैं। उनकी यही इच्छा यहाँ के बहुत से लोगों और संगठनों के लिए असहनीय हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मुसलमानों की पहचान और उनके व्यक्तित्व का बाक़ी रहना उनके लिए बल्कि सारे देश के लिए बहुत बड़ा ख़तरा हो और ख़तरे का वे हर क़ीमत पर मुक़ाबला करना चाहते हों। इसके लिए कभी राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होने की मांग की जाती है, कभी पर्सनल लॉ में सुधार की नसीहत की जाती है और समान सिविल कोड पर ज़ोर दिया जाता है, कभी कहा जाता है कि मुसलमान अपनी प्राचीन संस्कृति एवं परम्परा को छोड़कर ज़माने का साथ दें, अन्यथा वे ग़रीबी, पिछड़ापन आदि से छुटकारा नहीं पा सकते। इसका यह मतलब होता है कि मुसलमान तरक़्क़ी करना चाहें तो अपनी सभ्यता, संस्कृति एवं जीवन-मूल्यों को छोड़ दें और जिस प्रकार दूसरी क़ौमें आँखे बंद करके ज़माने के पीछे दौड़ रही हैं, वे भी उसमें सम्मिलित हो जाएं। यही भेदभाव एवं संकीर्ण मानसिकता इस बात की अनुमति नहीं देती कि मुसलमानों की सदियों पुरानी इबादतगाहें और पवित्र स्थल की यथास्थिति बनी रहे, उन पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए बहाने ढूंढे जाते हैं और इसमें कामियाबी भी होती रहती है।

इस भेदभाव एवं संकीर्ण मानसिकता के कारण मुसलमान राष्ट्रीय जीवन में उस सहयोग और हमदर्दी से वंचित हैं, जो उन्हें यहाँ के नागरिक होने की हैसियत से मिलना चाहिए और जो किसी भी व्यक्ति और दल की भौतिक एवं आर्थिक उन्नति के लिए ज़रूरी है। यह नहीं कि उन्हें सहयोग नहीं मिल रहा है बल्कि उनकी योग्यताओं एवं प्रतिभाओं तक को नहीं स्वीकारा जाता। जो प्रतिभाएं देश एवं राष्ट्र के काम आ सकती हैं, वे बेकार जाती हैं, उनकी सेवाओं को सराहा नहीं जाता, जिससे उनके उमंग एवं उत्साह ठण्डे पड़ जाते हैं। उनकी वफ़ादारी को शक एवं संदेह की नज़र से देखा जाता है और उन्हें दूसरे मुल्कों का एजेन्ट क़रार देने में भी संकोच नहीं होता। स्थिति कुछ ऐसी बनती जा रही है जैसे मुसलमान अपराधियों के कटघरे में खड़े हों और एक के बाद एक उन पर आरोपों की बौछार हो रही हो। उनका सबसे बड़ा काम इन आरोपों का खण्डन करना है। जब किसी गिरोह को अपराधी क़रार देकर उसके खण्डन में लगा दिया जाए तो वह अपनी या देश की भलाई के लिए क्या सोचेगा और क्या कर पाएगा?

इस भेदभाव और संकीर्ण मानसिकता के साथ राजनीतिक शक्तियाँ एवं सत्ता भी जमा हो गई हैं (वैसे संविधान के अनुसार मुसलमान भी सत्ता में सम्मिलित हैं।) इसलिए इसका प्रभाव बड़े पैमाने पर और दूरगामी होते हैं और जीवन के प्रत्येक सामूहिक क्षेत्र में महसूस होते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में जिन संस्थाओं की देखरेख बहुसंख्यक वर्ग के हाथों में है, उनमें मुसलमान का प्रवेश मुश्किल है। इसलिए मुसलमान अधिकतर अपनी ही संस्थाओं में शिक्षा प्राप्त करने पर मजबूर हैं। उन्हें शिक्षा के बाद नौकरी में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनके मुक़ाबले में बहुसंख्यक वर्ग के अभ्यर्थी को प्रधानता दी जाती है। इसीलिए भी मुसलमानों में शिक्षित बेरोज़गारों की संख्या बढ़ती जा रही है।

कभी-कभी इसका कारण मुसलमानों की अयोग्यता बताई जाती है। हालांकि यह एक बेकार बात है इसलिए कि इसका कोई सबूत नहीं है। यह बात उस वक़्त साबित हो सकती है जबकि शिक्षा के क्षेत्र में मुसलमानों और अन्य लोगों को एक समान सुविधाएं एवं अवसर प्राप्त हों। इस समय स्थिति यह है कि मुसलमान बच्चे अपनी जिन संस्थाओं में शिक्षा पा रहे हैं उनमें वे सुविधाएं नहीं होतीं जो बहुसंख्यक वर्ग की संस्थाओं में होती हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि उनका स्तर निम्न होगा। उनके स्तर को ऊँचा उठाने में कुछ ऐसी रुकावटें हैं, जिन्हें सरकार के सहयोग ही से दूर किया जा सकता है। परन्तु सरकार की कृपा-दृष्टि बहुसंख्यक संस्थाओं पर ही रहती है।

आर्थिक क्षेत्र में भी मुसलमान पिछड़ते जा रहे हैं। आज भारत उद्योग-धंधों में तेज़ी से तरक़्क़ी कर रहा है, छोटे-बड़े अनगिनत उद्योग स्थापित हो रहे हैं। कृषि एवं अन्य खाद्यान्न के क्षेत्र में बड़े-बड़े फार्म अस्तित्व में आते जा रहे हैं। यह सब कुछ सरकार की देखरेख अथवा उसके द्वारा उपलब्ध कराई गई सुविधाओं की बुनियाद पर हो रहा है। इसमें मुसलमानों का अनुपात न के बराबर है। वे अधिकतर मज़दूर और कारीगर की हैसियत से काम कर रहे हैं और बड़े उद्योगपतियों की पूंजी बढ़ा रहे हैं। इसी प्रकार आयात-निर्यात (Export-Import) में भागीदारी नाममात्र की है।

सरकारी सेवाओं में मुसलमानों का अनुपात आज़ादी के बाद गिरता चला गया है। कुछ उच्च सेवाओं के दरवाज़े जैसे उनके लिए बंद हो गए हों। प्रशासनिक सेवाओं से वे बेदख़ल होकर रह गए हैं। ऐसा आभास होता है कि प्रशासन से वे जान-बूझकर दूर रखे जाते हैं।

देश की वर्तमान प्रजातांत्रिक व्यवस्था के तहत संसद और विधान सभाओं में मुसलमानों की आबादी के अनुसार उनके प्रतिनिधि नहीं पहुँच पाते। देश को कुछ इस प्रकार चुनाव क्षेत्रों में बांटा गया है कि मात्र मुसलमानों के वोट के आधार पर उनका कामियाब होना मुमकिन नहीं है। गिनती के वे कुछ क्षेत्र इसके अपवाद हैं, जहाँ इस प्रकार का बँटवारा संभव नहीं है। ग़ैर-मुस्लिम क्षेत्रों से वही मुसलमान कामियाब हो सकता है जिसे धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने खड़ा किया हो और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का मतलब इस समय बहुसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करनेवाली पार्टियाँ हैं। इन पार्टियों के टिकट पर जो मुसलमान कामियाब होते हैं, उन्हें पार्टी के नेतृत्व और हाईकमान के समक्ष अपनी वफ़ादारी का सबूत पेश करने से ही फ़ुर्सत नहीं मिलती, ऐसे में बेचारे मुसलमानों की चिन्ता कहाँ से कर पाएंगे?

इन परिस्थितियों और इस वातावरण में मुसलमान यदि अपने जायज़ अधिकारों की मांग करें, अपनी रक्षा का प्रयास करें और अपने अधिकार छीने जाने एवं अपने प्रति नाइंसाफ़ी को समाप्त करने के लिए दौड़-धूप करें तो उन पर साम्प्रदायिकता और राष्ट्र विरोधी का लेबल लग जाता है। इस प्रकार के हर प्रयास को मुसलमानों को मुख्यधारा से अलग रखने की कोशिश समझी जाती है। हालांकि किसी समुदाय का अपने समुदाय के कल्याण एवं उसकी रक्षा का प्रयास करना साम्प्रदायिकता कदापि नहीं है। साम्प्रदायिकता नाम है अपने समुदाय के फ़ायदे के लिए दूसरे समुदायों को नुक़सान पहुँचाने का। ख़ुदा का शुक्र है कि मुसलमानों का दामन इससे पाक है।

यह समीक्षा सही या ग़लत है यह तो अलग बात है, इस समीक्षा का असल समस्या से कोई सीधा सम्बन्ध भी नहीं है। यहाँ दो अलग सवाल हैं। एक यह कि मुसलमानों में ग़फ़लत और कोताही है या नहीं? संभवतः इससे कोई भी व्यक्ति इन्कार नहीं कर सकता कि वे ग़फ़तल में पड़े हुए हैं। इसे दूर होना चाहिए। इस सम्बन्ध में हर प्रयास सराहनीय होगा। परन्तु इस समय एक दूसरा ही सवाल विचारणीय है। वह यह कि मुसलमानों के साथ भेदभाव बढ़ता जा रहा है या नहीं? यदि है तो इसका क्या इलाज है? क्या मुसलमानों की मेहनत से यह भेदभाव दूर हो सकता है और मुसलमानों के साथ इन्साफ़ होने लगेगा? भेदभाव एवं मानसिक संकीर्णता इस बात का नाम है कि कोई व्यक्ति आपकी तरक़्क़ी को देखना न चाहे और आपके पतन का इच्छुक हो। इस भावना के होते हुए क्या इस बात की अपेक्षा की जा सकती है कि उनकी मेहनत का सम्मान किया जाएगा और उनके लिए तरक़्क़ी की राहें खुल जाएंगी। क्या इस समय व्यवहारतः योग्य मुसलमानों को अवसर दिए जा रहे हैं? इसके अतिरिक्त मुसलमानों की ग़फ़लत एवं कोताही इस बात का औचित्य प्रदान नहीं करती कि उनके साथ नाइंसाफ़ी हो और उन्हें उनके जायज़ अधिकारों से वंचित कर दिया जाए।

मुसलमानों की राजनीतिक पार्टियाँ इस मसले को राजनीतिक तौर पर हल करना चाहती हैं। इसके किसी निश्चित अथवा अन्तिम हल पर उनका मतैक्य नहीं है। हाँ, विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव सामने आते रहते हैं और कुछ अमल करने की कोशिश भी होती है।

एक बात यह कही जाती है कि भारत के संविधान में अल्पसंख्यकों को जो अधिकार प्राप्त हैं उनमें इस प्रकार संशोधन होना चाहिए कि इस समय जो ज़्यादतियाँ हो रही हैं, उन्हें समाप्त किया जा सके। संसद और असेम्बलियों में उनकी जनसंख्या के आधार पर उनके स्थान निश्चित हों, उनके द्वारा स्थापित किए गए शिक्षण संस्थानों को और आज़ादी मिले, उनको ज़्यादा सुविधाएं प्राप्त हों और जिन शिक्षण संस्थानों को सरकार चलाती है उनमें उनकी उचित संख्या को जगह दी जाए, नौकरियों के लिए क़ानून में जनसंख्या के आधार पर उनका हिस्सा निश्चित हो, साम्प्रदायिक दंगों में उनकी क्षतिपूर्ति और उनके पवित्र स्थलों की सुरक्षा के लिए क़ानून बनाए जाएं आदि।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि मौजूदा संविधान में भी अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से कम अधिकार प्राप्त नहीं हैं। परन्तु अल्पसंख्यकों को शिकायत यह है कि ये अधिकार व्यवहार-रूप में उन्हें प्राप्त नहीं हैं। प्रश्न यह है कि जब संविधान में मौजूद अधिकार नहीं मिल रहे हैं तो उनमें कुछ और अधिकारों की वृद्धि होने के बाद क्या वे सब अधिकार मिलने लगेंगे? दस अधिकारों की प्राप्ति में जो भेदभाव रुकावट बने हुए हैं, क्या उनकी संख्या पंद्रह हो जाने से वे समाप्त हो जाएंगे या उनमें कमी आ जाएगी? आशंका तो यह है कि इस रुकावट में और वृद्धि ही होगी।

एक विचार यह है कि सारा दोष तत्कालीन सरकार का है। वह यदि मुसलमानों के साथ इंसाफ़ करना चाहे तो कर सकती है। इसकी राह में कोई बड़ी रुकावट नहीं है। मुसलमानों ने इस मामले में अब तक सत्तारूढ़ पार्टी से उम्मीदें रखी हैं और आज़ादी के बाद हर मौक़े पर उसका साथ दिया, परन्तु अनुभवों से पता चला कि उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। प्रजातन्त्र में चुनाव एक बड़ी शक्ति है। इस शक्ति को मुसलमान इस्तेमाल करें और इस सरकार को बदल दें।

इतनी बात स्पष्ट है कि मौजूदा प्रजातांत्रिक ढांचे में, मुसलमान अकेले अपने वोट के द्वारा न सरकार बना सकते हैं और न किसी सरकार को बदल सकते हैं। इसके लिए उन्हें किसी दूसरी पार्टी का साथ देना होगा। वह पार्टी वही हो सकती है जो यह वादा करे कि वह मुसलमानों के साथ इन्साफ़ और उनके अधिकारों की रक्षा करेगी। परन्तु अफ़सोस की बात यह है कि कोई भी पार्टी इस प्रकार का वादा करने या मुसलमानों की मांगों को अपने चुनाव घोषणा पत्र में सम्मिलित करने के लिए तैयार नहीं है। मौजूदा हालात में इसकी आशा भी नहीं की जा सकती। हो सकता है कि सत्तारूढ़ पार्टी में और जो पार्टियाँ सता नहीं हैं उनमें कुछ ऐसे खुले और साफ़ विचार के व्यक्ति हों, जो मुसलमानों से हमदर्दी रखते हों और यह चाहते हों कि उनकी समस्याओं का समाधान हो। आप उनसे जितना फ़ायदा उठा सकते हैं उठा लें, परन्तु यह बात याद रखनी चाहिए कि वे अपनी पार्टी की सामान्य नीति के विरुद्ध नहीं जा सकते। अन्यथा वे पार्टी के लिए असहनीय हो जाएंगे। फिर उन्हें इस बात का भी डर है कि मुसलमानों का समर्थन करने के बाद वे बहुसंख्यक वर्ग के वोट से वंचित हो जाएंगे। आज की सम्पूर्ण राजनीति वोट ही के चारों ओर घूमती है। इस हानि को सहन करने का साहस किसी में नहीं है।

इस मौक़े पर एक और बात कही जाती है। वह यह कि यहाँ पिछड़ी जातियाँ भी बहुसंख्यक वर्ग के शोषण का शिकार हैं। वे उनकी सत्ता को क़तई पसन्द नहीं करती हैं और उनके ख़िलाफ़ उनके अन्दर उग्र भावनाएं पाई जाती हैं। यदि मुसलमानों का उनके साथ एका हो तो आबादी में उनका अनुपात बढ़ जाएगा, बल्कि हो सकता है कि अनुपात उनके पक्ष में हो जाए। विभिन्न गिरोह जो अपनी जगह प्रभावहीन हैं, मिलकर एक ज़बर्दस्त शक्ति बन सकते हैं और यहाँ की राजनीति का रुख़ बदल सकते हैं।

इसमें संदेह नहीं कि यहाँ की पिछड़ी जातियों को अपने उत्पीड़न का एहसास ज़रूर है और वे इसके लिए प्रयास भी कर रहे हैं, परन्तु आपके दुख-दर्द का उन्हें एहसास नहीं है। उन्हें आपकी समस्याओं के समाधान की चिन्ता नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं के समाधान की चिन्ता है। वे आपके सहयोग से अपनी समस्याएं हल करना चाहते हैं।

दलित एवं पिछड़ी जातियाँ, जिनके साथ आप एका स्थापित करना चाहते हैं, उनका नेतृत्व आपके हाथ में नहीं है, बल्कि ख़ुद उनके हाथ में है और वे आपको भी अपने नेतृत्व में लेकर चलना चाहते हैं। हो सकता है उनका नेतृत्व उनकी अपनी कुछ समस्याएं हल कर ले। प्रश्न यह है कि आपकी समस्याओं से भी उसे दिलचस्पी होगी और वह उसे हल करेगा?

यहाँ यह बात सामने रहनी चाहिए कि जब दो गिरोहों में एका होता है, तो जो गिरोह नेतृत्व की भूमिका निभाता है और जो राजनीतिक आधार पर मज़बूत होता है, वही फ़ायदे में रहता है। परिस्थितियाँ उसके पक्ष में आ जाएं तो वह अपने सहयोगी पक्ष को नज़रअंदाज़ भी कर सकता है। आमतौर पर नज़रअन्दाज़ कर ही देता है। इसका अनुभव स्वतन्त्रता आन्दोलन के सिलसिले में मुसलमानों को हो चुका है। उन्होंने अल्पसंख्यक होने के बाद भी देश की आज़ादी के लिए कांग्रेस से कम बलिदान नहीं दिए हैं। परन्तु सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने, जो बहुसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करती थी, मुसलमानों के साथ जो व्यवहार किया उससे सारी दुनिया परिचित है। आज जिन समस्याओं एवं कठिनाइयों की मुसलमान शिकायत करते हैं, वे सब या उनमें से अधिकतर उसी के काल की पैदावार हैं।

पिछड़ी जातियों के बारे में इस हक़ीक़त को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि उनके सामने देश और विभिन्न वर्गों के कल्याण एवं विकास की कोई योजना या प्रोग्राम नहीं है। वे केवल ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ एक प्रतिक्रिया के रूप में उभर रही हैं। चूंकि सरकार को भी वे ब्राह्मणों की सरकार समझती हैं, इसलिए उसके खिलाफ़ हैं। इस प्रतिक्रिया में वे सफल हो जाएं तो आशंका है कि वे भी ज़ुल्म का वही रवैया करेंगी, जिसका आरोप वे सत्तारूढ़ वर्ग पर लगा रही हैं। क्योंकि प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई का स्वभाव ही यही है कि वह किसी सीमा पर नहीं रुकती। वह तमाम सीमाओं को तोड़ कर आगे निकल जाना चाहती है। यह स्थिति सारे देश के लिए विनाशकारी है। इसमें उनका साथ किसी प्रकार भी नहीं दिया जा सकता। यह चीज़ एक और संघर्ष की बुनियाद बन सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि मुसलमान किसी पार्टी से राजनीतिक समझौता न करें या किसी पार्टी का समर्थन करें और उसका समर्थन प्राप्त करें। इस प्रजातांत्रिक देश में इस प्रकार की उदासीनता कुछ और पेचीदगियाँ पैदा कर सकती हैं। स्पष्ट है कि सभी पार्टियाँ एक तरह की नहीं हैं, मुसलमान किसी ऐसी पार्टी का समर्थन नहीं कर सकते जो उनके धर्म, सभ्यता एवं संस्कृति को ख़त्म करना चाहती हो और जिसके सत्ता में आने से उनके सांवैधानिक और बुनियादी अधिकार ही ख़तरे में पड़ सकते हों। उनका समर्थन किसी ऐसी ही पार्टी को प्राप्त होगा, जो उनकी समस्याओं एवं परेशानियों को समझती हो, जो उनसे हमदर्दी करे और जिससे इस बात की आशा की जा सके कि वह संविधान की पाबंद रहेगी, परन्तु इससे भी हमारी समस्या पूर्णतः हल नहीं होती। इसके लिए दो काम करने होंगे।

एक यह कि सारे देश में ऐसा वातावरण बनाया जाए कि हर व्यक्ति के बुनियादी और मानवीय अधिकारों का सम्मान हो और व्यवहारतः वे उसे प्राप्त हों। किसी व्यक्ति का चाहे उसका सम्बन्ध किसी भी वर्ग से हो, कोई बुनियादी अधिकार छिनने न पाए। प्रजातन्त्र के लाभ किसी एक गिरोह तक सीमित होकर न रह जाएं बल्कि प्रत्येक को उसका लाभ पहुँचे। जान-माल और इज़्ज़त-आबरू हर एक की सुरक्षित रहे और उसे आस्था, विचार एवं व्यवहार की आज़ादी प्राप्त हो। क़ानून का शासन हो और सब को इन्साफ़ आसानी से मिले। कमज़ोर वर्ग का आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक शोषण बन्द हो और विकास के अवसर उन्हें प्राप्त हों। इस मामले में मुसलमानों को दूसरों की ओर याचना की दृष्टि से देखने की जगह आगे बढ़कर नेतृत्व की भूमिका निभानी होगी। इसमें उन्हें उन वर्गों का सहयोग आसानी से प्राप्त हो सकता है जो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और जो उन्हीं समस्याओं में घिरे हैं जिनमें मुसलमान घिरे हुए हैं। देश में जब इस प्रकार का वातावरण होगा तो राजनीतिक पार्टियाँ भी उसकी रोशनी में अपनी कार्य-पद्धति बनाने को मजबूर होंगी और उसके ख़िलाफ़ क़दम उठाना आसान न होगा।

इससे आगे जो काम मुसलमानों के करने का है और जिसे केवल वे ही कर सकते हैं वह यह है कि इस देश में इस्लाम के ध्वजावाहक और प्रतिनिधि बन कर उठें और इस्लाम जिन समस्याओं का समाधान बड़ी ही सुगमता से करता है, उसे पूरे विश्वास के साथ पेश करें।

अब तक इन सारी कोशिशों का रुख़ यह रहा है कि देश के मौजूदा ढांचे में वे एक क़ौम की हैसियत से ज़िन्दा रहें और भौतिक दृष्टि से अच्छी स्थिति में हों। इसमें न तो सोचा-समझा यह ईमान एवं यक़ीन शामिल है कि इस्लाम उनकी और देश की समस्याएं हल कर सकता है और न उसके अनुसार कोई कार्य पद्धति ही बनाई गई है। यह एक सच्चाई है और सच्चाई की स्पष्ट अभिव्यक्ति होनी चाहिए कि इस्लाम भेदभाव की दीवारों को ढहाता है, कमज़ोर पर से ताक़तवरों के आधिपत्य को समाप्त करता है और उनके अधिकारों की रक्षा करता है। इसके द्वारा ज़ुल्म एवं ज़्यादती का ख़ात्मा और न्याय एव इन्साफ़ क़ायम हो सकता है। मसला केवल इस दुनिया ही का नहीं है आनेवाली दुनिया का भी है। इस्लाम उसकी कामियाबी की भी ज़मानत देता है। इस्लाम इन्सान की एक स्वाभाविक मांग है और उसकी एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसके बिना किसी देश, किसी वर्ग और किसी व्यक्ति की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। मुसलमानों का कर्त्तव्य है कि वे इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए खड़े हो जाएं। इसी से अन्ततः उनकी समस्याओं का भी समाधान होगा और दुनिया की समस्याओं का भी। क्या वे इसके लिए तैयार हैं?

(माहनामा “ज़िन्दगी-ए-नव," नई दिल्ली, अक्टूबर 1988 ई०)

इन हालात में हम क्या करें?

देश में ताज़ा संसदीय चुनाव सम्पन्न हो गए और नई सरकार बन गई। चुनावों में हंगामों एवं हिंसात्मक कार्रवाइयों से हमारा देश अपरिचित नहीं है। यह सब कुछ यहाँ होता ही रहता है, परन्तु इस बार सम्पूर्ण चुनावी प्रक्रिया ही हंगामों और हिंसक कार्रवाइयों की छत्रछाया में सम्पन्न हुई। जाली वोट इस बहुलता से डाले गए कि पिछला रिकार्ड टूट गया। चुनाव आयुक्त ने अधिकतर शिकायतों को सही स्वीकार करते हुए एक हज़ार से अधिक स्थानों पर दोबारा पोलिंग का आदेश दिया। उन क्षेत्रों में भी अनियमितता और धांधली हुई, जिन में बड़े-बड़े नेता और विभिन्न पार्टियों के पदाधिकारी खड़े हुए थे। यह नैतिक पतन की चरम सीमा है। इनमें से किसी ने भी इस पर क्षोभ प्रकट नहीं किया। यहाँ तक कि किसी ने इन धांधलियों को स्वीकार तक नहीं किया। जो लोग जनता के प्रतिनिधि बन कर सामने आते हैं, उनके नैतिक आचरण का यह हाल हो तो आम जनता से नैतिक आदर्श प्रस्तुत करने की क्या अपेक्षा की जा सकती है?

देश के संसदीय आम चुनावों में हमेशा कांग्रेस कामियाब होती रही है, केवल 1977 ई० का चुनाव अपवाद है जिसमें इमरजेंसी लागू करने और इस दौरान होनेवाले काले कारनामों के कारण उसे नाकामी का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस की इस लगातार कामियाबी में मुसलमानों का बड़ा हाथ रहा है। उसकी सारी कमियों के बावजूद उन्होंने उसी को अपना हितैषी जाना और उसी को वोट दिया।

मौजूदा चुनाव के दौरान उत्तरी भारत साम्प्रदायिक दंगों की आग में जलता रहा। इस आग को बुझाने में कांग्रेस ने जिस निष्क्रियता का सबूत दिया और जिस प्रकार भेदभाव एवं पक्षपात से काम लिया, मुसलमानों को उससे मायूसी हुई। उन्होंने महसूस किया कि वे अपनी जान-माल, इज्ज़त-आबरू और मज़हबी आज़ादी के सिलसिले में उस पर विश्वास नहीं कर सकते। उन्हें कांग्रेस के विकल्प को भी आज़माना चाहिए। उन्होंने मौजूदा सरकार के पक्ष में इस उम्मीद के साथ वोट दिया कि वह कांग्रेस की तरह उनसे उदासीनता का बर्ताव नहीं करेगी, उनके जायज़ अधिकारों की रक्षा करेगी, उनकी समस्याओं को समझेगी और उन्हें न्यायपूर्ण तरीक़े से हल करेगी। देखना यह है कि यह सरकार उनकी उम्मीदों को किस हद तक पूरा करती है।

इस समय मुसलमान जिन संगीन हालात से गुज़र रहे हैं, वे नए नहीं हैं। उनकी एक लम्बी पृष्ठभूमि है, परन्तु यह हक़ीक़त है कि क़ौमों पर नाज़ुक से नाज़ुक हालात आते हैं और उसी में उनका इम्तिहान होता है। जो क़ौमें जीवन-शक्ति से वंचित होती हैं, वे विपरीत हालात के सामने हार मान लेती हैं, उन पर निराशा छा जाती है, उनकी निगाहों के सामने अंधेरा ही अंधेरा होता है और उन्हें चारों ओर मौत के भयानक साए नज़र आने लगते हैं। उनके पास जो जीवन-शक्ति होती है वह भी मायूसी, घबराहट और बेचैनी की भेंट चढ़ जाती है। उन हालात से ही स्पष्ट होने लगता है कि उसके दिन पूरे हो चुके हैं। वह मिटना चाहती है और मिट रही है। जो क़ौम अपनी जगह छोड़ने के लिए तैयार हो जाए उसे उखाड़ फेंकने में देर नहीं लगती। हालात का एक ही रेला उसे सूखे पत्तों की तरह बहा ले जाता है।

ज़िन्दा क़ौमों का हाल दूसरा होता है। कठिन एवं विपरीत हालात उनकी शक्ति में वृद्धि का कारण बनते हैं। वे हिम्मत नहीं हारतीं, कायरता एवं भीरुता नहीं दिखातीं, उन पर निराशा नहीं छाती। वे इस विश्वास, उत्साह एवं निश्चय के साथ ज़िन्दगी गुज़ारती हैं कि हालात के सामने हार नहीं मानेंगी, बल्कि हालात को ठीक करने और अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करेंगी। जिस क़ौम में यह दृढ़ निश्चय एवं उत्साह हो, दुनिया की कोई ताक़त उसे मिटा नहीं सकती। इस्लाम अपने माननेवालों में ऐसा ही दृढ़ निश्चय एवं उत्साह पैदा करता है। उसका सम्पूर्ण इतिहास दृढ़ निश्चय एवं उत्साह का इतिहास है। यदि इस्लाम के माननेवाले अपना दृढ़ निश्चय एवं उत्साह खो बैठें और हालात के सामने सिर झुका दें तो अपने दीन (मज़हब) को अपमानित और अपने इतिहास को कलंकित करेंगे।

ज़िन्दगी में हर क़दम पर सब्र और धैर्य की ज़रूरत पेश आती है। प्रतिकूल परिस्थितियों में तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। यहाँ कामियाबी उसी को मिलती है जो नाज़ुक से नाज़ुक मौक़े पर भी सब्र का दामन न छोड़े, जज़्बात में भड़क कर बेक़ाबू न हो, होश-हवास न खो बैठे और कोई ऐसी हरकत न करे जो उसके लिए भी और उस समुदाय के लिए भी जिससे वह जुड़ा है, नुक़सान का कारण बने। बहुत-सी कठिनाइयाँ इसी कारण जन्म लेती हैं कि आदमी क्रोध एवं ग़ुस्से में ऐसे क़दम उठा लेता है, जो उसे नहीं उठाना चाहिए। सब्र यह है कि आदमी अपने सही मत पर दृढ़ रहे और जिस वक़्त जो क़दम उठाना चाहिए वही उठाए। सब्र का इस्लाम ने जितना आग्रह किया है, हमारा जीवन उससे उतना ही ख़ाली है। बेसब्री, जल्दबाज़ी और क्रोध का प्रदर्शन करके हम सब्र का फल भोगना चाहते हैं जो इस दुनिया में सम्भव नहीं है।

सब्र का यह मतलब नहीं है कि जज़्बात ठण्डे पड़ जाएं और सारी क़ौम कायर और संवेदना-शून्य हो जाए। उसकी ज़िन्दगी और मौत का फ़ैसला हो रहा हो और बड़े-बड़े हादसे उस पर गुज़र जाएं और वह ख़ामोश तमाशाई बनी रहे। जब कोई क़ौम अपने अधिकारों से चुपचाप ख़ाली होती चली जाए और ज़ुल्म-ज़्यादती पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न करे तो यह उसकी कमज़ोरी और बेबसी का स्पष्ट संकेत है। परन्तु यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि जज़्बात के साथ तत्वदर्शिता एवं बुद्धिमानी भी ज़रूरी है। हालात से बाख़बर रहना, दंगाइयों एवं आपराधिक तत्वों की योजनाओं से परिचित होना और उन्हें नाकाम बनाने का हर संभव प्रयास करना ज़रूरी है। इस देश की बहुत बड़ी आबादी दंगा-फ़साद को नापसन्द करती है, परन्तु इसकी कमज़ोरी यह है कि वह फ़सादियों के सामने आने की हिम्मत नहीं करती, उनके अन्दर हिम्मत एवं साहस पैदा करना होगा। आपको ऐसे लोग भी मिलेंगे, जो ज़ुल्म एवं नाइंसाफ़ी को ख़त्म करने में आपका साथ देंगे। आपको उन सब का सहयोग प्राप्त करना होगा। सरकार की ज़िम्मेदारी है कि देश के एक-एक नागरिक की जान-माल और उसके सांवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे, उसकी इस ज़िम्मेदारी को उसे याद दिलाना होगा। उसकी निष्क्रियता की आलोचना करनी होगी, ऐसे सभी जायज़ उपाय करने होंगे कि वह आपको नज़रअंदाज़ न कर सके और आपकी शक्ति को महसूस करे। इस प्रकार आप हालात को ठीक रखने में मदद कर सकते हैं।

यह हक़ीक़त नहीं भूलनी चाहिए कि ज़ुल्म की उम्र बहुत थोड़ी होती है। वह अधिक दिनों तक जारी नहीं रह सकता। अल्लाह ज़ुल्म को सख़्त नापसंद करता है, परन्तु उसका तरीक़ा यह है कि वह ज़ुल्म को एक ख़ास समय तक मुहलत देता है। यदि वह ज़ुल्म से न रुके और अपना रवैया न बदले तो उसे इस प्रकार पकड़ता है कि फिर कोई पनाह की जगह उसके लिए नहीं बचती। बड़ी-बड़ी ज़ालिम क़ौमें ख़ुदा के इस क्रोध का निशाना बन चुकी हैं। इस देश के लिए भला चाहने वालों को चाहिए कि ज़ुल्म-ज़्यादती और दंगा-फ़साद से इसे पाक करें, वरना  यह देश एक दिन तबाह हो जाएगा और हम सब इसके साथ तबाह हो जाएंगे। परन्तु ज़ुल्म को वही ख़त्म कर सकता है जिसका दामन हर प्रकार के ज़ुल्म से पाक हो, जो किसी पर ज़्यादती न करे, जो किसी की जान-माल, इज़्ज़त-आबरू पर हाथ न डाले, जिसके बारे में यह यक़ीन हो कि वह किसी के साथ बुरा सलूक नहीं करेगा, जिस पर लोग विश्वास करें, जो मुसीबत के वक़्त ढाल बन जाए, जो ज़ालिम का हाथ पकड़े और मज़लूम का साथ दे। मुसलमान की यही हैसियत है और अपनी इस हैसियत को उसे बाक़ी रखना चाहिए।

इस सिलसिले में आख़िरी बात यह कहनी है कि मुसलमानों की समस्याएं उनकी एकता एवं उनके मिलजुल कर प्रयास करने से ही हल हो सकती हैं। हालात इतने उलझे हुए हैं और समस्याएं इतनी कठिन हैं कि किसी एक व्यक्ति के लिए इन्हें हल कर सकना सम्भव नहीं है। समस्याएं सबकी हैं और सभी को मिलजुल कर हल करनी होंगी। इसके लिए उन्हें अपने छोटे-छोटे मतभेदों को भूलकर एक प्लेटफ़ार्म पर आना होगा। यदि समुदाय बिखरा हुआ हो तो उसकी आवाज़ कमज़ोर होगी। कमज़ोर आवाज़ इस हंगामे के दौर में नहीं सुनी जाती।

इस समुदाय में एकता अल्लाह की किताब और उसके रसूल मुहम्मद (सल्ल॰) की सुन्नत के आधार पर हुई थी और उसे बता दिया गया था कि उसकी ताक़त इसी एकता में निहित है। मतभेद एवं बिखराव उसे कमज़ोर कर देगा और ज़िन्दगी के मैदान में उसके क़दम उखड़ जाएंगे। क़ुरआन के अनुसार—

“अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करो, और आपस में झगड़ो नहीं वरन् तुम्हारे अन्दर कमज़ोरी पैदा हो जाएगी और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी। सब्र करो। बेशक अल्लाह सब्र करनेवालों के साथ है।" (क़ुरआन, 8:46)

अफ़सोस कि हमने क़ुरआन की इस नसीहत को भुला दिया। अब इसका इलाज यही है कि पूरा समुदाय अल्लाह की किताब और मुहम्मद (सल्ल॰) की सुन्नत की तरफ़ पलट आए और अपनी पंक्तियों को ठीक कर ले। उसकी बीमारी का इलाज पहले भी यही था और अब भी यही है।  (माहनामा “ज़िन्दगी-ए-नव”, 6 दिसम्बर 1989)

कुछ हमारे विचारने की बातें

6 दिसम्बर, 92 ई० को बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गई। इसके बाद जो कुछ हुआ उसे बयान करने के लिए शब्द साथ नहीं देते। देश के विभिन्न क्षेत्रों में आग सी लग गई; भयंकर दंगों का लम्बा सिलसिला शुरू हो गया; क़त्ल एवं ख़ूनख़राबे का बाज़ार गर्म हो गया; अवांछनीय तत्वों के हाथ सैकड़ों बेगुनाह जानें भी गईं; हज़ारों लोग घायल हुए, इज़्ज़तें लुटीं; मकानें और दुकानें अग्नि की भेंट चढ़ीं; करोबार तबाह हुए; अरबों रुपए की आर्थिक क्षति हुई; लोग घरों से बेघर हो गए; पूजास्थलों तक की पवित्रता पामाल हुई और वे तबाह की गईं।

दंगों की भयावहता और जान-माल की तबाही को देखकर बहुत से लोगों को 1947 ई० की याद आ गई, किसी ने इसे देश के वर्तमान इतिहास का काला-अध्याय घोषित किया, किसी ने कहा कि गांधी जी के क़त्ल के बाद यह सबसे बड़ा राष्ट्रीय संकट है। गांधी जी हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे, उन्हें क़त्ल करके इस एकता को तोड़ने की कोशिश की गई थी, बाबरी मस्जिद को शहीद करनेवालों का भी यही मक़्सद है। दोनों के पीछे एक ही मस्तिष्क काम कर रहा है।

इस भयंकर स्थिति ने सोचने-समझनेवालों को हिला कर रख दिया और दिमाग़ों में तरह-तरह के प्रश्न उभरने लगे। क्या हमारे देश में वास्तव में क़ानून का शासन है या कोई गिरोह अपनी शक्ति के बल पर यहाँ मनमानी कर सकता है और उसे रोका नहीं जा सकता? देश की राजनीतिक व्यवस्था की बुनियाद धर्मनिरपेक्षता एवं प्रजातन्त्र पर रखी गई है, क्या यह बुनियाद अब कमज़ोर होती जा रही है और उसके ढह जाने का ख़तरा है? यहाँ के नैतिक मूल्यों में आपसी सहयोग एवं सहिष्णुता बहुत प्रमुख समझी जाती थी, क्या अब ये मूल्य शेष नहीं रहे और अतीत की यादें बन कर रह गए हैं? देश के विकास, एकता और अखण्डता का जो नक़्शा यहाँ के राष्ट्र-पुरुषों ने अपने सामने रखा था, क्या अब वह बदल रहा है और एक नया नक़्शा उभर रहा है? जिस देश को विभिन्न धर्मों, सभ्यता एवं संस्कृतियों का संगम समझा जाता था, क्या अब वे धर्म एवं संस्कृतियाँ आपस में मिलजुल कर यहाँ रह सकेंगी और उन्हें स्वाभाविक रूप से फलने-फूलने के अवसर प्राप्त होंगे या यहाँ केवल एक सभ्यता, एक संस्कृति और एक विशेष विचारधारा को शेष रहने का अधिकार मिलेगा?

इन दंगों में सबसे अधिक मुसलमान प्रभावित हुए। देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग होने के बावजूद मुस्लिम समाज यह सोचने पर मजबूर है कि बाबरी मस्जिद का शहीद होना आकस्मिक घटना या भावनात्मक एवं सामयिक दुर्घटना है अथवा इसके पीछे कोई सोचा-समझा मंसूबा और गहरी साज़िश है? इबादतगाह (पूजास्थल) तो दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह समझी जाती है, उसका सम्मान हर व्यक्ति करता है, चाहे वह किसी भी समुदाय या वर्ग की इबादतगाह हो, जब वह सुरक्षित नहीं रही तो फिर कौन-सी चीज़ सुरक्षित रह सकती है? क्या उनकी जान-माल, इज़्ज़त-आबरू और धर्म एवं सभ्यता किसी बड़े ख़तरे में घिरी हैं? देश में वे सम्माननीय जीवन कैसे व्यतीत कर सकते हैं? क्या अब मायूसी और अंधेरा ही अंधेरा है या उम्मीद की कोई किरण भी है?

हालात ख़राब अवश्य हैं, परन्तु मायूसी का कोई सवाल ही नहीं है। क़ौमों पर नाज़ुक से नाज़ुक वक़्त आता है और कभी अत्यन्त ख़राब हालात से उन्हें गुज़रना पड़ता है। इसी में उनका इम्तिहान होता है। जो क़ौम हालात को कठिन और वातावरण को विपरीत देखकर न घबराए, मायूस न हो, हिम्मत न हारे, होश-हवास बाक़ी रखे, हालात का मुक़ाबला करे और दृढ़ संकल्प एवं वीरता का सबूत दे वह कामियाब होती है और अपना स्थान ख़ुद बनाती है। इसके विपरीत हालात की गंभीरता जिस क़ौम को बेचैन और कमज़ोर कर दे तथा जो हर छोटी-बड़ी आज़माइश को अपने लिए मौत का पैग़ाम समझ बैठे उसे दुनिया की कोई ताक़त जीवन और जीवन-शक्ति प्रदान नहीं कर सकती। वह अपने आप ही ख़त्म होती चली जाती है। परन्तु वास्तविकता यह है कि जो क़ौम अल्लाह के अस्तित्व पर यक़ीन रखती हो वह कभी मायूसी एवं निराशा का शिकार नहीं हो सकती, क्योंकि सबसे बड़ी शक्ति उसी की है, उससे बड़ी कोई शक्ति नहीं। सारी शक्तियों का स्रोत वही है। वह जब चाहे रात के अन्धकार को सुबह की रोशनी में बदल सकता है और मौत के सायों में ज़िन्दगी के चिह्न पैदा करना उसके लिए असम्भव नहीं है। हालात यदि अंधकारमय हैं तो उसके आदेश से प्रकाशमान भी हो सकते हैं। परन्तु ये चमत्कार उस वक़्त प्रकट होते हैं और उन लोगों के लिए प्रकट होते हैं जो ईमान एवं अमल की दौलत से मालामाल हों, जो केवल एक अल्लाह पर भरोसा रखते हों, जो हर हाल में उसके दामन से चिमटे रहें, जो उसके अतिरिक्त किसी और से कोई अपेक्षा न रखें और उसी को अपना अन्तिम आश्रयदाता समझें।

हालात से घबरा कर कुछ लोग इनके शीघ्र समाधान की मांग करते हैं। निस्संदेह उनका त्वरित समाधान ढूंढना भी ज़रूरी है। परन्तु यह कोई अन्तिम और सही समाधान नहीं होगा। मौजूदा हालात पैदा होने में हमारी अपनी ग़फ़लत और कोताही का बड़ा हाथ है। इनमें बदलाव लाने के लिए भी प्रयास करना होगा। कोई शॉर्टकट समाधान इस लम्बे प्रयास का विकल्प नहीं है।

  1. सबसे पहले देशवासियों के सामने हमारा सही परिचय पेश करने की ज़रूरत है। हमारा परिचय ऐसी क़ौम के रूप में न हो जिसका एक निश्चित लक्ष्य एवं उद्देश्य नहीं है, कोई विशेष जीवन-सिद्धान्त एवं विशेष सभ्यता एवं सामाजिक मान्यता नहीं है बल्कि कुछ ऐतिहासिक प्रक्रियाओं एवं कुछ रस्म-रिवाजों ने इसे एक क़ौम बना दिया है। इसके विपरीत इसका परिचय एक ऐसे समुदाय के रूप में हो जो एक निश्चित सिद्धान्त एवं विचारधारा का मालिक है, जिन्हें वह सत्य पर आधारित और अपने लिए एवं सारी दुनिया के लिए भलाई एवं मुक्ति का माध्यम समझता है। वह एक विशेष चिन्तन-शैली एवं जीवन-सिद्धान्त रखता है, जो उसे जान, माल और दुनिया की हर चीज़ से ज़्यादा प्रिय है, जिसे वह किसी क़ीमत पर छोड़ नहीं सकता। वह एक ऐसा समुदाय है, जो नैतिक मूल्यों को सम्माननीय समझता है। उसकी सभ्यता, सामाजिक, जीवन, राजनीति, हर चीज़ के पीछे उच्च, श्रेष्ठ एवं पवित्र परिकल्पनाएं सक्रिय हैं।

इस परिचय पर यदि व्यंग्य किया जाता है, हंसी उड़ाई जाती है, रूढ़िवादी और दक़ियानूसी होने का ताना दिया जाता है, आधुनिक युग की अपेक्षाओं से बेख़बरी का आरोप लगाया जाता है तो इसे बर्दाश्त किया जाए। इन आरोपों के खण्डन में जो भी उचित कोशिश हो सकती है की जाए और इन आरोपों एवं संदेहों को बुद्धिमानी से दूर करने का प्रयास किया जाए।

  1. जिन उच्च सिद्धान्तों एवं जीवन-मूलेयों पर ईमान का हम दावा करते हैं, उन्हें हमारी ज़िन्दगियों में दृष्टिगोचर होना चाहिए। हमारा चरित्र उनका प्रतिनिधित्व करे, हमारे आचरण उनकी गवाही दें, हमारे अख़लाक़ से उनका सबूत मिले, हमारे मामले उनकी पुष्टि करें और हमारे आपसी सम्बन्ध से उनका परिचय हो। हम में से जो जिस ख़ानदान का सदस्य हो उसके अधिकारों को समझे, किसी का पड़ोसी हो तो अच्छा पड़ोसी हो, व्यापारी हो तो ईमानदार व्यापारी हो, नौकर हो तो कर्त्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों को भली-भांति जानता हो, मालिक हो तो अपने मातहतों के अधिकार पूरा करे, उससे न किसी को भय हो और न कोई ख़तरा उससे महसूस करे। वह हर एक के दुख में काम आनेवाला हो, हर एक के सुख-दुख में साथ देनेवाला हो। दुनिया को यह सबूत मिले और लगातार मिलता चला जाए कि मुसलमान दुख-सुख, कठिनाई एवं आसानी किसी हाल में इस्लामी शिक्षाओं के विपरीत काम नहीं करता, वातावरण शान्त हो, चारों ओर दंगे-फ़साद के शोले भड़क रहे हों, तो भी वह इस्लाम के द्वारा निर्धारित की गई सीमाओं को नहीं लांघता। दंगों में जब मासूम और बेगुनाह मारे जाते हैं, इज़्ज़तें लूटी जाती हैं, जायदादें आग में झोंकी जाती हैं, उस वक़्त भी वह दूसरों की जान-माल, इज्ज़त-आबरू का रक्षक बन कर सामने आता है। इस प्रकार वह जहाँ रहे और जिस हाल में रहे इस्लाम की शिक्षाओं का पाबन्द रहे और इसके द्वारा दुनिया को इस्लाम का संदेश मिलता रहे।
  2. इस समुदाय को 'ख़ैरे-उम्मत' कहा गया है। इसका मतलब यह है कि वह सारी दुनिया के लिए अपने पास भलाई एवं कल्याण का पैग़ाम रखता है। इस पैग़ाम को आम होना चाहिए। इस देश के सामने यह बात आनी चाहिए और पूरे ज़ोर के साथ आनी चाहिए कि मुसलमान इस देश के लिए भला चाहनेवाले हैं और ख़ुदापरस्ती (ईश-भक्ति) की बुनियाद पर इसका निर्माण एवं विकास चाहते हैं। विभिन्न वर्गों और गिरोहों के बीच टकराव को वे ग़लत समझते हैं और उनके बीच एकता और एकरूपता की भावना पैदा करते हैं। वे किसी के पक्षधर अथवा विरोधी नहीं हैं, बल्कि सब इन्सानों को एक ख़ुदा की रचना समझते हैं और उनकी भलाई का प्रोग्राम रखते हैं। वे इस देश के समाने ज़ुल्म-ज़्यादती को ख़त्म करनेवाले और न्याय एवं इन्साफ़ के ध्वजावाहक के रूप में आएं, यहाँ के जातीय एवं वर्गीय संघर्ष को समाप्त करें, कमज़ोर वर्गों को शक्तिशाली वर्गों के अत्याचार एवं शोषण से बचाएं और मानवीय एकता की शिक्षा दें।
  3. क़ुरआन ने मतभेद एवं आपसी फूट से मना किया और कहा कि इससे तुम कमज़ोर हो जाओगे और तुम्हारे क़दम उखड़ जाएंगे। आज इसी स्थिति में हम घिरे हैं। अल्लाह ने इस समुदाय को कुछ बुनियादी मान्यताओं के तहत एकीकृत एवं संगठित किया था और वह एक सीसा पिलाई हुई दीवार बनकर उभरी थी। विरोधी शक्तियाँ उससे टकरातीं, परन्तु इसमें कोई दरार नहीं डाल सकती थीं। परन्तु ये मान्यताएं ही निगाहों से ओझल हो गई हैं। छोटी-छोटी समस्याओं ने हमारी पंक्तियों में बड़े-बड़े दरार डाल दिए हैं और हम एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। कुछ बातों में मतभेद स्वाभाविक है, वह मतभेद मौजूद है और रहेगा। उनमें अधिकतर मतभेद-आंशिक हैं और मूल सिद्धान्त से उनका कोई लेना-देना नहीं है। परन्तु विभिन्न कारणों से वे ही छोटे-छोटे मतभेद हमारे बीच फूट का ज़रिया बन गए हैं। इस स्थिति को समाप्त होना चाहिए। इस हक़ीक़त को हम नहीं भूल सकते कि इस समुदाय का फ़ायदा एवं नुक़सान एक है। इस पर यदि कोई मुसीबत आती है तो किसी का मसलक (पंथ) मालूम करके नहीं आती, बल्कि समुदाय का सदस्य होने की हैसियत से आती है। इस देश में हमारी मौजूदा समस्याओं का एक कारण यह भी है कि 12 करोड़ की तादाद में होने के बावजूद हमारी कोई एक आवाज़ नहीं है। हमारी एक आवाज़ होती तो शायद हमारी समस्याएं इतनी पेचीदा न होतीं।
  4. इस वक़्त सबसे प्रमुख मसला यह है कि देश के विभिन्न वर्गों के बीच नफ़रत, भेदभाव और संकीर्ण मानसिकता का जो वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है उसका भरपूर मुक़ाबला किया जाए। शान्ति स्थापित हो, क़ानून का शासन हो, न्याय एवं इंसाफ़ हो, हर व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त हों, विकास के मार्ग सबके लिए खुले रहें और हर एक को अपनी योग्यतानुसार देश एवं क़ौम की सेवा का अवसर प्राप्त हो। जो मतभेद हों उन्हें गंभीरतापूर्वक शान्ति के वातावरण में हल करने की कोशिश की जाए। यह किसी एक व्यक्ति या गिरोह की नहीं पूरे देश की ज़रूरत है। यह इस मुल्क की अंदरूनी आवाज़ है, जिसे दबाने की कोशिश की जाती है। इस विशाल एवं विस्तृत देश में एक छोटा-सा वर्ग है जो यहाँ के वातावरण को गंदा करना चाहता है और कर रहा है। हंगामों को हवा देता और उनमें सम्मिलित रहता है | इस वर्ग का कोई दीन-धर्म या कोई अख़लाक़ नहीं है। इसके जो नापाक इरादे हैं, उनसे दुनिया परिचित है। इस वर्ग के लोग हर जगह और हर क़ौम में मिल जाएंगे। परन्तु इस देश की बहुत बड़ी आबादी अम्न, शान्ति एवं सुकून चाहती है। उसके पास इन हंगामों के लिए न फ़ुर्सत है और न यह उसका स्वभाव है। उसकी कमज़ोरी यह है कि इन नाज़ुक हालात में ख़ामोशी में ही अपना भला समझती है। उसके अन्दर सत्य को सत्य और असत्य को असत्य कहने का साहस नहीं है। परन्तु इसके साथ हमारे लिए ख़ुशी की बात यह है कि ऐसे लोगों की पहले भी कमी नहीं थी और मौजूदा हंगामों के बाद तो इनकी तादाद बढ़ी ही है, जिन्होंने हाल के दंगों और हंगामों पर अपना दुख प्रकट किया है। जो लोग इनमें आगे-आगे रहे हैं, उनके नापाक इरादों को स्पष्ट किया है और ज़ुल्म एवं नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है। उन्हें इस बात पर अफ़सोस और सदमा है कि इन हंगामों से हमारी छवि बिगड़ी है और बदनामी एवं रुसवाई हुई है। इनमें राजनीतिक लोग भी हैं, बुद्धिजीवी एवं चिन्तनशील लोग भी हैं। सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं और पत्रकारिता से सम्बंध रखनेवाले तो अच्छी ख़ासी तादाद में मौजूद हैं। राजनीतिक पार्टियों ने भी इस पर दुख एवं पीड़ा जताई है। ज़रूरत इस बात की है कि इस एहसास को विस्तार दिया जाए और उन लोगों के साथ मिलकर शान्ति-सुरक्षा, न्याय एवं इंसाफ़ का वातावरण बनाया जाए और यह सच्चाई पूरी शक्ति के साथ स्पष्ट की जाए कि इस देश की अखण्डता, एकता तथा विकास के लिए शान्ति व्यवस्था का क़ायम रहना ज़रूरी है। इसके लिए सोच-विचार कर योजना एवं कार्य पद्धति तैयार करने की ज़रूरत है।

 

(25 जनवरी, 1993, प्रकाशित त्रैमासिक 'तहक़ीक़ाते-इस्लामी', उर्दू, जनवरी-मार्च, 1993)

 

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