بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم अल्लाह के नाम पर, जिसका नाम पृथ्वी या आसमान में कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचाता है, और वह सुनने वाला, जानने वाला है

May 16,2022

जायसी के दोहे और इस्लाम के अन्तिम पैगंबर मुहम्मद (सल्ल०)

16 Dec 2021
जायसी के दोहे और इस्लाम के अन्तिम पैगंबर मुहम्मद (सल्ल०)

हाफिज़ शानुद्दीन   

शांति, अमन ,सलामती ऐसे शब्द हैं जिसे हर कोई पसंद करता है । हर प्राणी कि ये प्रबल इच्छा रहती है कि वह शांति के वातावरण में सलामती के साथ अपना जीवन व्यतीत करे । परन्तु जिस समय में मुहम्मद सल्ल॰ का प्रादुर्भाव हुआ उस समय शब्द शांति अपना अस्तित्व खो चुका था । और लोग शांति के लिए तरसते थे । ऐसी दुर्गम परिस्थिति में अल्लाह ने मानवों पर दया करते हुए इसके मार्गदर्शन हेतु दयावान पैगम्बर मुहम्मद सल्ल॰ को अवतरित किया तथा फरिश्ता जिब्रइल के माध्यम से पवित्र कुरआन का संदेश दिया । हज़रत मुहम्मद सल् लल्लाहु अलइहि व-सल्लम जिसका संक्षिप्त रूप (सल्ल०) और अर्थ ‘हजरत मुहम्मद पर अल्लाह की ओर से कृपा एवं शांति हो’। मुहम्मद अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ "प्रशंसनीय" होता है । ये नाम आपके पितामह अब्दुल मुत्तलिब ने रखा था । मुहम्मद सल्ल॰ इस्लाम धर्म के लगभग एक लाख चौबीस हज़ार पैगम्बरों में सबसे अंतिम पैगम्बर हैं इनके पश्चात प्रलय तक अब कोई पैगम्बर नहीं आएगा ।  मुहम्मद (सल्ल०) वह श्ख़स हैं जिन्होने हमेशा सच बोला और सच का साथ दिया यही कारण था कि इनके दुश्मन भी इनको “सादिक़” (सच्चा) कहते थे और ये बात इतिहास में पहली बार घटी है ।   

सूने रेगिस्तान से एक नए संसार का निर्माण मैसूर विश्वविधालय के दर्शन शास्त्र विभाग के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर एवं लेखक डॉक्टर के॰एस॰रामा कृष्णाराव साहब ने हजरत मुहम्मद सल्ल॰के व्यक्तित्व पर एक पुस्तक कि रचना की है जिसका नाम “इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद सल्ल॰” रखा है । प्रोफेसर राव लिखते हैं मैंने जब पैगंबर मुहम्मद (सल्ल०) के बारे में लिखने का इरादा किया तो मुझे संकोच हुआ । लेकिन समस्या का एक दूसरा पहलू ये भी था कि मनुष्य समाज में रहता है और हमारा जीवन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दूसरे लोगों के जीवन से जुड़ा होता है ऐसी दशा में जबकि हम अपने निजी विचारों व धार्मिक धारणाओं पर कायम हों,अगर थोड़ा बहुत ये भी जान लें कि हमारा पड़ोसी किस तरह सोचता है, उसके कर्मों के मुख्य प्रेरणा स्त्रोत क्या हैं ? तो यह जानकारी कम से कम अपने माहौल के साथ तालमेल पैदा करने में सहायक तो बनेगी । प्रस्तुत है उस पुस्तक से उद्धृत कुछ अंश जो प्रोफेसर राव ने पैगंबर मुहम्मद सल्ल॰ के प्रति अपार श्रद्धा व्यक्त करते हुए लिखी है :- “मेरी नज़र में मुहम्मद सल्ल॰ अरब के सपूतों में महाप्रज्ञ और सबसे उच्च बुद्धि के व्यक्ति हैं । जब आप पैदा हुए अरब उपमहाद्वीप केवल एक सुना रेगिस्तान था । मुहम्मद (सल्ल०) की सशक्त आत्मा ने इस सूने रेगिस्तान से एक नए संसार का, एक नए जीवन का, एक नई संस्कृति तथा स्भ्यता का निर्माण किया । आपके द्वारा एक ऐसे नए राज्य की स्थापना हुई जो मराकाश से लेकर इंडीज तक फैला और जिसने तीन महाद्वीपों एशिया,अफ्रीका और यूरोप के विचार और जीवन पर अपना अभूतपूर्व प्रभाव डाला ” ।

जायसी के दोहों में मुहम्मद (सल्ल०)

मलिक मुहम्मद जायसी को शायद कम ही लोग जानते हैं । ये हिन्दी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण प्रेमाश्रयी धारा के कवि हैं ।  ये एक अत्यंत उच्चकोटि के सरल और उदार सूफ़ी थे जिन्होने अपनी अंतिम पुस्तक “अखरावट” में पैगंबर मुहम्मद सल्ल॰ के नूर अर्थात ज्योति का वर्णन इस प्रकार किया है :-

दोहा : गगन हुता नहिं महि हुती, हुते चंद नहिं सूर ।

      ऐसइ अंधाकूप महँ रचा मुहम्मद नूर  ॥

अर्थ :- न तो आकाश था न धरती, न चंद्रमा था और ना ही सूरज । ऐसे शून्य वातावरण वाले अंधकार में अल्लाह ने मुहम्मद सल्ल॰ के नूर अर्थात ज्योति को रचा ।

व्याख्या :- हिन्दी के महापंडित श्री राम चन्द्र शुक्ल जी इस दोहे की व्याख्या इस प्रकार करते हैं “हदीस के अनुसार जब दुनिया का कोई वजूद नहीं था, न तो आकाश था न धरती,न चंद्रमा था और ना ही सूरज तो सबसे पहले अल्लाह ने मुहम्मद सल्ल॰ का नूर अर्थात ज्योति को बनाया” ।

 सोरठा :  साईं केरा नाँव, हिया पूर, काया भरी ।

          मुहम्मद रहा न ठाँव, दूसर कोइ न समाइ अब ॥

अर्थ :-  साईं (मुहम्मद (सल्ल०)) के नाम से तन एवं हृदय पूर्ण रूप से भर चुका है, मुहम्मद (सल्ल०) के बिना चैन नहीं है, अब हृदय में दूसरा कोई समा भी नहीं सकता ।     

व्याख्या :-  कवि जायसी कहते हैं कि मैं मुहम्मद सल्ल॰ के प्रेम से भाव-विभोर हो उठा हूँ, ऐसा असीमित प्रेम कि जिनके नाम मात्र से ही मेरा हृदय और तन झूम उठा है,अब तो हाल ऐसा है कि मुहम्मद सल्ल॰ के बिना चैन ही नहीं है । ऐसी सत्य,पवित्र और अकाट्य प्रेम की बंधन से स्वयं को बांध चुका हूँ कि उनके अतिरिक्त अब कोई दूसरा मेरे हृदय तथा मन में समा ही नहीं सकता ।  

 

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