بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم अल्लाह के नाम पर, जिसका नाम पृथ्वी या आसमान में कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचाता है, और वह सुनने वाला, जानने वाला है

August 15,2022

इस्लामी अर्थशास्त्र:  एक परिचय

10 Dec 2021
इस्लामी अर्थशास्त्र:  एक परिचय

पुस्तिका 

डॉ. फ़ज़्लुर्रहमान फ़रीदी

अनुवाद: डॉ. सय्यद फ़रहत हुसैन

'अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान बहुत रहमवाला है।'

प्राक्कथन

"इस्लामी अर्थशास्त्र: एक परिचय" अर्थशास्त्र तथा इस्लामी विषयों के विशेषज्ञ एवं प्रख्यात विद्वान डॉ. फ़ज़्लुर्रहमान फ़रीदी के एक उर्दू शोध पत्र इस्लामी मआशियात : एक तारूफ़ का हिन्दी अनुवाद है जो उन्होंने अक्तूबर 1995 को 'इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर इस्लामिक इकानॉमिक्स' द्वारा जामिअतुल-फ़लाह, बिलरियागंज (आज़मगढ़) में आयोजित एक सेमिनार में प्रस्तुत किया था।

प्रस्तुत लेख में पाश्चात्य संस्कृति एवं दर्शन द्वारा पोषित आधुनिक अर्थशास्त्र पर आलोचनात्मक दृष्टि डालते हुए उसकी ख़राबियों को उजागर किया गया है, साथ ही साथ इस्लामी आर्थिक प्रणाली का परिचय कराते हुए उसकी विशेषताओं का उल्लेख भी किया गया है। डॉ. साहब ने इस संक्षिप्त लेख में इस्लामी अर्थशास्त्र को वर्तमान आर्थिक समस्याओं, जैसे आर्थिक उतार-चढ़ाव, मुद्रा-स्फीति, ब्याज आधारित व्यवस्था की ख़राबियाँ, आय तथा धन के असमान वितरण की समस्या, अर्थशास्त्र का नैतिक मूल्यों से तटस्थ हो जाना, उपभोक्तावाद आदि के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है।

आशा है कि यह लघु पुस्तिका हिन्दी भाषी मित्रों को इस्लामी अर्थशास्त्र का परिचय प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होगी।

-नसीम ग़ाज़ी फ़लाही

 

इस्लामी अर्थशास्त्र

इस्लामी अर्थशास्त्र का परिचय कराने से पूर्व दो भ्रान्तियों का निवारण आवश्यक है। पहली भ्रान्ति आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने या तो जान-बूझकर पैदा की है या फिर वे उन बुनियादी वास्तविकताओं से भली-भाँति परिचित नहीं हैं जिनके कारण इस्लामी अर्थशास्त्र का आधुनिक युग में नवीकरण हुआ है। वह भ्रान्ति यह है कि इस्लामी अर्थशास्त्र वास्तव में वर्तमान अर्थशास्त्र का परिशिष्ट या विशिष्ट संस्करण है। यदि आप आधुनिक अर्थशास्त्र में ज़कात को अनिवार्य और ब्याज को वर्जित कर दें तथा आर्थिक नीतियों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक न्याय घोषित कर दें तो यही ज्ञान इस्लामी अर्थशास्त्र बन जाता है। इस विचार के पक्ष में दो तर्क दिए जाते हैं—

प्रथम यह कि वर्तमान अर्थशास्त्र वास्तव में ऐसे नियमों एवं अवधारणाओं का भण्डार है जो नैसर्गिक सिद्धान्तों की भाँति अटल भी है और शाश्वत भी, तथा यह प्रत्येक समाज में लागू होते हैं चाहे उसका कल्चर कैसा भी हो। जीविकोपार्जन प्रत्येक व्यक्ति की स्वाभाविक आवश्यकता है। इसके लिए जो रीतियाँ भी अपनाई जाती हैं उनकी स्थिति तकनीक की है, जैसे किसान का हल और लोहार का हथौड़ा।

द्वितीय यह कि इनसान की प्राथमिकताएँ प्रत्येक समाज में एक जैसी होती हैं। वह अपनी ज़रूरत की सामग्री जुटाना तथा सुख प्राप्त करना चाहता है, इसलिए उसकी क़ीमत तथा उपयोगिता से समान रूप से प्रभावित होता है। उनके अनुसार अर्थशास्त्र वास्तव में इसी संघर्ष तथा इन्हीं प्राथमिकताओं का अध्ययन करता है और ऐसे सामान्य निष्कर्ष, अवधारणाएँ एवं सिद्धान्त बनाता है जो भौतिक विज्ञान की भाँति न इस्लामी हो सकते हैं, न ग़ैर-इस्लामी। यह मात्र वैज्ञानिक विश्लेषण है- आस्था, सामाजिक मूल्यों तथा सांस्कृतिक आधारों में यह तटस्थ है। इस प्रकार, उनके मत में, इस्लामी अर्थशास्त्र एक निरर्थक कार्य है या अधिक-से-अधिक यह एक आंशिक संशोधन की हैसियत रखता है। परन्तु हमारे विचार में, अर्थशास्त्र का तटस्थ रहने का दावा निराधार है जैसा कि आगे स्पष्ट होगा।

एक दूसरी भ्रान्ति धार्मिक लोगों में पाई जाती है, वह यह कि इस्लामी अर्थशास्त्र क़ुरआन, हदीस (हज़रत मुहम्मद सल्ल. की शिक्षाएँ) एवं इस्लामी धर्मशास्त्र के ग्रन्थों में वर्णित उन नियमों का संग्रह मात्र है जो इनसान के आर्थिक जीवन से सम्बन्धित हैं। इस्लामी अर्थशास्त्र उन्हीं नियमों को आर्थिक शब्दावली में प्रस्तुत करके आधुनिक युग के हालात पर उनका क्रियान्वयन करता है। इस विचार का दोष यह है कि यह अर्थशास्त्र को फ़िक़्ह (इस्लामी धर्मशास्त्र) के एक अनुभाग से अधिक नहीं समझता। हालाँकि वर्तमान अर्थशास्त्र क्रय-विक्रय, टैक्स, कस्टम-ड्यूटी, बैंकिंग, बीमा के प्रावधानों का नाम नहीं है, बल्कि उसका कार्य-क्षेत्र आर्थिक कार्य-कलाप, उसके साधन और उसके विकास का विश्लेषण है। ठीक इसी प्रकार इस्लामी अर्थशास्त्र जीवन के आर्थिक पक्ष से सम्बन्धित धार्मिक नियमों एवं क़ानून की सूची तैयार करने का नाम नहीं है, बल्कि वह इस्लामी शिक्षाओं, मूल्यों तथा सिद्धान्तों के अन्तर्गत आर्थिक जीवन तथा उसके नए-नए पहलुओं का विश्लेषण करता है, जिससे यह ज्ञात हो सके कि ईश्वर-प्रदत्त नैतिक मूल्यों की छत्र-छाया में आर्थिक दौड़-धूप की प्रकृति क्या है तथा उसके कारकों की क्या भूमिका है और किस प्रकार की आर्थिक व्यवस्था गठित होती है तथा इनसान की आर्थिक समस्याओं का समाधान किस प्रकार होता है।

आगे की पंक्तियों में हम इस्लामी अर्थशास्त्र की वास्तविक स्थिति पर चर्चा करेंगे और यह भी स्पष्ट करेंगे कि इस्लामी अर्थशास्त्र तथा आधुनिक अर्थशास्त्र में किस प्रकार का मौलिक अन्तर है।

आधुनिक अर्थशास्त्र क्या है?

आधुनिक अर्थशास्त्र इनसान की व्यक्तिगत एवं सामूहिक आर्थिक गतिविधियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन है। इसका विकास एक विशेष सभ्यता के अन्तर्गत हुआ है, इसकी मूल अवधारणाओं में एक धारणा यह है कि दुनिया की कोई भी वस्तु बहुतायत में नहीं मिलती जो सारे इनसानों की आवश्यकता तथा इच्छा की पूर्ति के लिए पर्याप्त हो। इसको अर्थशास्त्री सीमितता या दुर्लभता (Scarcity) का नाम देते हैं। क्योंकि साधनों में दुर्लभता पाई जाती है इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है कि वह उनको प्राप्त करने के लिए संघर्ष करे जो प्रतिस्पर्धा या प्रतियोगिता कहलाती है। इस संघर्ष में सफलता योग्यतानुसार मिलती है। योग्यता को अर्थशास्त्री निपुर्णता (Efficiency) कहते हैं। जो जितना निपुर्ण (Efficient) होगा उसको प्रतिस्पर्धा के इस बाज़ार में उतनी ही सफलता मिलेगी। दुर्लभता की इस दुनिया में संसाधनों का सर्वश्रेष्ठ वितरण वही होता है जो प्रतिस्पर्धा एवं निपुर्णता का फल हो।

उपर्युक्त बुनियादी अवधारणाएँ उद्देश्ययुक्त नहीं हैं, बल्कि उनके बनाने तथा व्याख्या करने के पीछे पाश्चात्य सभ्यता की झलक मिलती है। उनके यहाँ इनसान की एक अपनी परिभाषा है जो उस कल्चर का दर्पण है जिसमें आधुनिक ज्ञान का विकास हुआ है। अर्थशास्त्र के प्रतिष्ठित विद्वानों ने अपनी आवश्यकता के लिए मानव स्वभाव का यह विशेष विचार स्वयं गढ़ा है। उन्होंने इस विचार को न तो मनोविज्ञान से लिया है और न ही उसको तथ्यों एवं अनुभव के आधार पर जाँचा-परखा गया है। उनका उद्देश्य तो ऐसे ज्ञान की बुनियाद डालना था जो शुद्ध विज्ञान के समान हो। इसलिए उन्होंने पशु-पक्षियों का सरसरी तौर पर अध्ययन किया और देखा कि हर पशु-पक्षी के प्रयासों का उद्देश्य अपने भोजन की प्राप्ति है। वह अपने शिकार पर झपटते हैं और शक्तिशाली कमज़ोर को खा जाता है। इस दुनिया का हल्का-सा अध्ययन करने के बाद उन्होंने इसको इनसानों पर लागू किया और यह कल्पना कर ली कि व्यक्ति के आर्थिक प्रयासों का एकमात्र उद्देश्य उपयोगिता (Utility) प्राप्त करना है। ऐसी उपयोगिता जिसे मुद्रा के पैमाने में मापा जा सके। इससे आगे बढ़कर उन्होंने यह भी कल्पना कर ली कि प्रत्येक व्यक्ति कम-से-कम कष्ट उठाकर अधिक-से-अधिक उपयोगिता प्राप्त करना चाहता है।

इस परिकल्पना को वैज्ञानिक बनाने के लिए अर्थशास्त्रियों ने उपयोगिता (Utility) तथा प्रतिफल (Return) के विभिन्न सिद्धान्त एवं माँग-पूर्ति के नियम बनाए। उन्होंने यह भी तय कर लिया कि चूँकि प्रत्येक व्यक्ति अधिक-से-अधिक उपयोगिता प्राप्त करना चाहता है इसलिए प्रतियोगिता स्वाभाविक है। मार्केट प्रतियोगिता (Competition) के आधार पर कार्यरत होते हैं, और यदि प्रत्येक व्यक्ति उसी मैदान में प्रयास करे तो पूरा समाज उससे लाभान्वित होता है। राष्ट्रीय उपज का सर्वोत्तम वितरण वह है जो प्रतियोगिता के परिणामस्वरूप हो। इस प्रतियोगिता में सफलता उस व्यक्ति को प्राप्त होती है जो अधिक योग्य हो तथा हालात और परिस्थितियों को अपने हित में प्रयोग करने का गुर जानता हो। कुशलता एवं योग्यता जिस प्रकार प्राकृतिक व्यवस्था में अस्तित्व एवं सफलता के लिए अपरिहार्य है, उसी प्रकार आर्थिक प्रयासों में भी वह अनिवार्य है और जिस प्रकार कमज़ोर और शक्तिशाली प्राकृतिक व्यवस्था में मिलते हैं उसी प्रकार ग़रीब और अमीर आर्थिक व्यवस्था में भी मिलते हैं। जिस प्रकार शक्तिशाली पशु कमज़ोर को अपना भोजन बना लेता है उसी प्रकार सम्पन्न तथा पूँजीपति अपने से कमज़ोर को शिकार बना लेते हैं। यह दोनों कार्य स्वाभाविक हैं, इनको नैतिकता के पैमाने से मापना उचित नहीं है।

आर्थिक प्रतियोगिता के उचित एवं अनुचित होने का मापदण्ड केवल एक है, वह यह कि उसके नतीजे में राष्ट्रीय उपज में कितनी वृद्धि हुई है। इस प्रतियोगिता को अपनी उचित भूमिका निभाने के लिए अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों ने 'स्वतन्त्र अर्थव्यवस्था' को बुनियादी हैसियत प्रदान की। इस अर्थव्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक प्रकार का जीविकोपार्जन अपनाने की स्वतन्त्रता प्राप्त होगी परन्तु उसके लिए निवेश एवं मार्केट भी स्वतन्त्र हों तथा प्रत्येक विक्रेता को अपनी उपज को अपने मूल्य पर विक्रय करने की स्वतन्त्रता हो। इसी उद्देश्य के लिए निजी स्वामित्व के विचार को प्रमुखता दी गई, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को सम्पत्ति का पूर्ण स्वामित्व प्राप्त होगा जिससे वह अपनी सम्पत्ति को जिस प्रकार उचित समझे प्रयुक्त करे। समाज अथवा सरकार को उसमें हस्तक्षेप का कोई अधिकार न होगा। यदि ये हस्तक्षेप करेंगे तो ‘प्रतियोगिता’ अपनी भूमिका नहीं निभा सकेगी और परिणामस्वरूप राष्ट्रीय उपज में विघ्न पड़ेगा ।

वस्तुओं की क़ीमत

स्वतन्त्र अर्थव्यवस्था में वस्तुओं की क़ीमत को निर्णायक हैसियत प्राप्त होती है। क़ीमत एवं सम्भावित लाभ मिलकर उत्पत्ति के साधन का आवंटन एवं वितरण करते हैं और यह तय करते हैं कि कौन-कौन-सी वस्तुएँ कितनी मात्रा में किस प्रकार उत्पादित की जाएँ। यही दोनों कारक यह भी तय करते हैं कि पैदावार में किस व्यक्ति या समूह का कितना भाग हो। मज़दूर को क्या मिलेगा और पूँजीपति को कितना मिलेगा। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री जैसे एडम स्मिथ, रिकार्डो, जे.एस. मिल तथा उनके अनुयायी जैसे मार्शल आदि के विचार भी यही थे। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में अर्थशास्त्र के विद्वानों ने आर्थिक प्रयासों के तत्वों एवं कारकों का विश्लेषण किया। उदाहरण के लिए 'धन' एवं 'आय' में क्या अन्तर है? उत्पादन के साधनों का प्रतिफल तथा मज़दूरी का निर्धारण किस प्रकार होता है? मुद्रा की क्या भूमिका है? 'निवेश' किस क्रिया को कहते हैं? क़ीमत (Price) पूर्ति (Supply) एवं माँग (Demand) का आपसी सम्बन्ध क्या है? इससे एक क़दम पीछे जाकर उन्होंने उपभोक्ता तथा उत्पादक के प्रेरक निर्धारित किए और विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया।

आर्थिक विकास के कारक

इस बुनियादी अवधारणा से जुड़ा वह विचार था जिसने आर्थिक विकास के कारकों का विश्लेषण किया। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का विचार था कि आर्थिक विकास पूँजीनिवेश पर निर्भर है, और निवेश बचत के अभाव में असम्भव है। बचत व्यक्ति या समूह की आय का वह भाग है जो आवश्यकता की वस्तुओं पर ख़र्च न होकर निवेश में प्रयोग होता हो। आवश्यकता की वस्तुओं में खाने-पीने का सामान और अन्य दिन-प्रतिदिन की आवश्यकताएँ जैसे- मकान, वस्त्र, स्वास्थ्य, शिक्षा, सवारी आदि आते हैं, और निवेश में मशीनें, व्यापार, व्यवसाय तथा कृषि पर किए गए वह व्यय सम्मिलित हैं जिनसे पैदावार में वृद्धि होती है। बचत की क्षमता उन लोगों को प्राप्त होती है जिनकी आय अपनी आवश्यकता से अधिक हो। मज़दूर तथा आम लोगों की बचत की क्षमता कम होती है, बल्कि कभी-कभी वे अपनी आय से अधिक व्यय करने पर मजबूर होते हैं। पूँजीपतियों की आय भी अधिक होती है इसलिए उनकी बचत की क्षमता भी अधिक होती है। अगर कोई समाज आर्थिक उन्नति करना चाहता है तो उसको ऐसी रीतियाँ अपनानी चाहिएँ जिनके परिणामस्वरूप उसके संसाधनों का वितरण पूँजीपति के पक्ष में हो। इस बुनियादी विचार के नतीजे में कुछ सिद्धान्त भी बनाए गए जैसे-मज़दूरी कोष सिद्धान्त (Wage Fund Theory) जिसका साधारण अर्थ यह है कि हर समाज में आय के स्रोतों का एक निर्धारित भाग मज़दूरी के भुगतान के लिए तय होता है अगर मज़दूर की जनसंख्या बढ़ जाए तो मज़दूरी की दर घट जाएगी। इसी विचार के अप्रत्यक्ष समर्थन के लिए मालथस का जनसंख्या सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया जिसने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि प्रकृति ने इनसानों की जनसंख्या बढ़ने की दर ऐसी निर्धारित की है कि वह सदैव साधनों की तुलना में दो गुनी, तीन गुनी या चार गुनी रहेगी।

आधुनिक अर्थशास्त्र का एक कारनामा यह भी है कि उसने मनुष्य को मात्र एक आर्थिक एजेन्ट घोषित किया जो सूझ-बूझ तथा विवेक रखता है, जो हर दिशा से हटकर केवल उपयोगिता या लाभ प्राप्त करना चाहता है। बल्कि एक चरण आगे बढ़कर 'विवेक' (Rationality) की परिभाषा ही यह है कि कम-से-कम क़ीमत पर अधिक-से-अधिक उपयोगिता या लाभ प्राप्ति ही विवेकपूर्ण व्यवहार है। दूसरा कारनामा यह किया कि माँग, पूर्ति, क़ीमत, मुद्रा, आय तथा उत्पादन की ऐसी यान्त्रिक व्यवस्था बनाई जिसके नीचे इनसान दब गया। उसकी संवेदना, उसकी भावनाएँ, उसकी प्राथमिकताएँ और उद्देश्य, उसकी सोच और समझ सब आर्थिक नियमों के अधीन हो गए और क़ीमत, माँग व पूर्ति वास्तविक तत्व बना दिए गए। आर्थिक गतिविधियों में किन कारकों की क्या भूमिका होती है उन सबका निर्धारण वित्तीय नीति, मुद्रा की आपूर्ति, बैंकिंग नीति, कर व्यवस्था, आयात-निर्यात द्वारा होती है। परिणामतः व्यक्ति का स्वभाव, उसका व्यवहार और उसकी संवेदनाओं की अनदेखी कर दी गई। इस दृष्टिकोण के दो परिणाम सामने आए, एक यह कि पश्चिम के इनसान को अनजाने में जनमानस का प्रतिनिधि समझकर उन्हीं पॉलीसियों को तीसरी दुनिया के देशों में भी अपना लिया गया। इसी कारण अधिकांश देशों में यह पॉलीसियाँ असफल रहीं। इस असफलता का बेहतरीन विवेचन जी. मिर्डल (G. Myrdal) जैसे प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों तथा संयुक्त राष्ट्र की "कुछ संस्थाओं ने स्वयं किया है। इसका दूसरा नतीजा यह निकला कि 'अर्थशास्त्र' पर से भरोसा उठ गया और आर्थिक असमानता, मुद्रा-स्फीति, बेरोज़गारी, आर्थिक शोषण, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसी समस्याओं ने तीसरी दुनिया को ऐसी मंझधार में फँसा दिया जहाँ से निकलना कठिन है।

कुछ महत्वपूर्ण प्रयास

मनुष्य की उपर्युक्त विशुद्ध आर्थिक अवधारणा को वास्तविकता के निकट लाने के लिए विगत कुछ दशकों में कुछ महत्वपूर्ण प्रयास किए गए, परन्तु उनका परिणाम ऐसा रहा कि मानो मूल पुस्तक पर कुछ फ़ुटनोट लिख दिए जाएँ। उदाहरण के लिए यह स्पष्ट किया गया कि व्यक्ति का उद्देश्य मात्र लाभ कमाना या उपयोगिता प्राप्ति नहीं है, बल्कि कुछ अन्य अनार्थिक उद्देश्य भी हो सकते हैं। इस वास्तविकता को मूल अवधारणा में अतिरिक्त संशोधन के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार सिद्धान्त तो वही रहा, उसमें केवल फ़ुटनोट बढ़ा दिए गए। यह भी स्वीकार किया गया कि आर्थिक विकास न्याय के साथ होना चाहिए। परन्तु इससे आर्थिक विकास के सिद्धान्त में मात्र पेवन्दकारी ही की गई। इसी प्रकार यह भी स्वीकार किया गया कि राष्ट्रीय आय का वितरण केवल आर्थिक माँग (जो आवश्यकता से अधिक वित्तीय क्षमता के अर्थ में है) की बुनियाद पर नहीं होना चाहिए, बल्कि आवश्यकता (Needs) को निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए। मगर इस संशोधन की हैसियत भी नीति-निर्माण में इसको ध्यान रखने जैसी है वरन् सिद्धान्त तो वही रहा। इस तरह कार्य-कुशलता (Efficiency) के साथ न्याय (Equity) का जोड़ लगा दिया गया, मगर स्वतन्त्र प्रतियोगिता और स्वतन्त्र मार्केट में आय तथा उत्पादन के आवंटन तथा वितरण में कार्य कुशलता के रोल का अस्ल सिद्धान्त वही रहा। न्याय को अब भी हाशिए में स्थान दिया जा रहा है जैसा भारत की नई आर्थिक नीति से स्पष्ट है।

आधुनिक अर्थशास्त्र

आधुनिक अर्थशास्त्र के दो भाग हैं- एक सूक्ष्म (Micro), दूसरा बृहत् (Macro)। सूक्ष्म अर्थशास्त्र में आर्थिक इकाइयों का अध्ययन किया जाता है, जैसे एक उपभोक्ता, एक बाज़ार, एक कारख़ाना, एक वस्तु की माँग-पूर्ति और क़ीमत, यही वह भाग है जिसको अर्थशास्त्र की बुनियाद कहा जाता है। यद्यपि प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का युग बीतने के बाद जे. एम. कीन्ज़ (J.M. Keynes) के नेतृत्व में बृहत् अर्थशास्त्र का प्रभुत्व हो गया था परन्तु अब सूक्ष्म अर्थशास्त्र का महत्व पुनः बढ़ गया है। सूक्ष्म अर्थशास्त्र ही वास्तव में वह धारणा प्रस्तुत करता है जिसका ऊपर के पैराग्राफ़ों में उल्लेख किया गया है। बृहत् अर्थशास्त्र का काम केवल यह है कि उन्हीं वैचारिक आधारों का सामूहिक स्तर पर विवेचन करता है इसलिए मूल रूप से उसी मानवीय अवधारणा पर आधारित है जिसपर सूक्ष्म अर्थशास्त्र है। उपयोगिता चाहनेवाले व्यक्तियों का समूह जिनकी सोच प्रभावित तो हो सकती है, मगर अपने मूल में अस्तित्व में रहती है तथा नीति-निर्माण में ध्यान में रखना आवश्यक है, वह यह तय कर लेती है कि पूरा समाज ऐसे मनुष्यों का योग है जो अपनी व्यक्तिगत उपयोगिता या लाभ की माँग में व्यस्त रहते हैं जिसका प्रेरक क़ीमत की कमी और लाभ की वृद्धि है।

Maximum profit with maximization of utility or minimum pain at minimum cost.

इस्लामी आर्थिक व्यवस्था क्या है?

इस्लामी अर्थशास्त्र आर्थिक प्रयासों के वैकल्पिक तथा किसी सीमा तक परिवर्तित विश्लेषण एवं विवेचन का नाम है। इस विश्लेषण में इनसान की आर्थिक दौड़-धूप को जीवन का एक अंग माना जाता है, न कि मूल, जबकि की आधुनिक अर्थशास्त्र में आर्थिक दौड़-धूप को मानव-जीवन में बुनियादी हैसियत प्रदान की गई है। मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार उत्पत्ति के साधनों का स्वामित्व ही एकमात्र कारक है जो इनसानी सम्बन्धों को निर्धारित करता है। इनसानी सोच, उसका विवेक, उसका आचरण, उसका धर्म तथा उसकी प्राथमिकताएँ उसी से प्राप्त की गई हैं। बल्कि उसका इतिहास भी उसी के अधीन है। पूँजीवादी व्यवस्था के समर्थक यद्यपि इस विचारधारा को स्वीकार नहीं करते परन्तु उनके विचार तथा उनका विवेचन अप्रत्यक्ष रूप से उसी को शक्ति पहुँचाते हैं। उनकी थ्योरी की मूल परिकल्पना यही आर्थिक दौड़-धूप के अपने अन्दरूनी नियम व क़ानून हैं जिनपर व्यक्ति का आचरण और उसका दृष्टिकोण कुछ भी प्रभाव नहीं डालता। इस प्रकार पूँजीवादी व्यवस्था जीवन के दूसरे पहलुओं से आर्थिक तत्वों का सम्बन्ध काट देता है। उदाहरण के लिए, माँग किन वस्तुओं की हो, पूर्ति किस प्रकार हो, वित्तीय एवं प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग कैसे हो, पूँजी निवेश कैसे और कहाँ किया जाए? यह और इसी प्रकार के अन्य मामले इस प्रणाली में नैतिकता के जीवन दर्शन से आज़ाद हैं। इसके विपरीत इस्लामी आर्थिक प्रणाली जीवन को एक 'इकाई' मानती है और आर्थिक दौड़-धूप को मानवता तथा नैतिकता के अधीन समझती है। अतः उसकी माँग पूर्ति की अवधारणा नैतिकता तथा धार्मिक आधारों पर स्थापित होती है।

इस्लामी अर्थशास्त्र की बुनियाद

इस्लामी अर्थशास्त्र की बुनियाद ब्रह्माण्ड तथा इनसान के सम्बन्ध में ऐसी विचारधारा पर आधारित है जो आधुनिक विज्ञान के प्रतिकूल और उससे टकरानेवाली है। यह अवधारणा क़ुरआन तथा हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के आदेशों पर आधारित है। इस विचारधारा के अनुसार यह कायनात (सृष्टि) एक ऐसे कृपाशील एवं उदार ईश्वर की बनाई हुई है जिसने सभी जीवों की स्वाभाविक आवश्यकताओं के लिए भरपूर जीवन-सामग्री उपलब्ध कराई है। यहाँ वास्तविक रूप से दुर्लभता (Scarcity) नहीं पाई जाती, इसलिए कि यह अल्लाह के अनुग्रह एवं कृपा के विरुद्ध है। जो भी दुर्लभता यहाँ पाई जाती है वह अधिकतर इनसानों की अन्यायपूर्ण व्यवस्था का फल है, या फिर अकर्मण्यता के कारण है। यह आधुनिक अर्थशास्त्र की दुर्लभता सम्बन्धी विचारधारा के बिल्कुल विपरीत है। उसके अनुसार यहाँ सिद्धान्त एवं व्यवहार में दुर्लभता पाई जाती है। मालथस के अनुसार अगर संसाधनों को विकसित किया जाए तो बढ़ने की दर 1,2,3 के हिसाब से होती है, जबकि उसकी तुलना जनसंख्या 1,2,4,8 के अनुपात बढ़ती है। इसलिए यह दुर्लभता बढ़ती जाएगी। फिर यहाँ जीवन के साधनों के वितरण का आधार केवल क्षमता, कुशलता तथा बाज़ारी क़ीमत पर होता है। चूँकि प्रकृति ने इनसानों के बीच इस आधार पर अन्तर रखा है, इसलिए किसी को कम मिलता है, किसी को अधिक मिलता है। पवित्र क़ुरआन में है—

“धरती पर चलनेवाला कोई जीव ऐसा नहीं है जिसकी आजीविका अल्लाह के ज़िम्मे न हो।” (क़ुरआन, सूरा-11 हूद, आयत-06)

“यह तो हमारी कृपा है कि हमने आदम की सन्तान को श्रेष्ठता दी तथा थल व जल में सवारियाँ प्रदान कीं तथा उनको पवित्र वस्तुओं से आजीविका और अपनी रचनाओं पर स्पष्ट श्रेष्ठता प्रदान की।” (क़ुरआन, सूरा-17 बनी-इसराईल, आयत-70)

अगर इनसानी वितरण प्रणाली न्यायपूर्ण हो तो धरती पर बसनेवाले सभी लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है, परन्तु समस्या यह है कि अपनी शक्ति तथा कार्य-विधि द्वारा कुछ लोग तथा कुछ वर्ग संसाधनों के अधिकांश भाग पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं। इससे कमज़ोरों के लिए कम बचता है, भुखमरी, ग़रीबी तथा बीमारी उनका मुक़द्दर बन जाती है। जनसंख्या की आधुनिक विचारधारा ने इनसानों को मात्र उपभोक्ता माना है, उत्पत्ति करनेवाला नहीं, अर्थात् जब एक बच्चा संसार में आता है तो वह केवल मुँह लेकर आता है, काम करनेवाले हाथ नहीं। उसको खिलाने के लिए कितना भी प्रयास करो परन्तु हर प्रयास के विपरीत उसकी आबादी बढ़ती जाती है। जबकि तथ्य इसके विपरीत यह साबित करते हैं कि यद्यपि पिछले सौ सालों में इनसानी जनसंख्या बढ़ी है परन्तु देशों का स्तर पहले से कई गुना बेहतर हुआ है। ग़रीब तथा पिछड़े देशों के साथ अगर अमीर देश सहयोग करते तथा आपराधिक फ़ुज़ूलख़र्ची पर रोक लगाते तो ग़रीबी में असाधारण कमी होती। परन्तु वर्तमान जनसंख्या सिद्धान्तों ने ग़रीबी का सारा दोष ग़रीब देशों की जनसंख्या के ऊपर डाल दिया है। इस दृष्टिकोण की तुलना में इस्लामी दृष्टिकोण है जो कायनात (सृष्टि) के रचयिता के अनुग्रह एवं कृपा पर जीवन का निर्माण करता है, जिसने धरती में संसाधनों के इतने भण्डार उपलब्ध करा रखे हैं कि यदि इनसान न्याय से काम ले, अपव्यय के स्थान पर उचित रीति अपनाए तो संसाधन सम्पूर्ण मानवता की भरपाई करेंगे। आज भी आंकड़े यह साबित करते हैं कि संसार में इतना खाद्यान्न, पानी तथा अन्य साधन मौजूद है जो सम्पूर्ण मानवता की आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं, यदि अमीर और सम्पन्न लोग अपने अपव्यय पर अंकुश लगा लें।

इस्लामी अर्थशास्त्र की दूसरी मूल धारणा यह है कि प्रकृतिदत्त संसाधनों से लाभ उठाने के लिए परिश्रम ज़रूरी है। आधुनिक अर्थशास्त्र ने भी परिश्रम को आवश्यक माना है परन्तु उसने साधनों के बँटवारे को व्यक्ति की दौड़-धूप तथा क्षमता के पूर्ण अधीन कर दिया है। उनका पक्ष यह है कि इनसानी समाज की सबसे लाभप्रद उत्पादन की वे गतिविधियाँ हैं जो व्यक्ति की क्षमता तथा कार्यकुशलता के कारण सफल होती हैं। इसलिए उनके अनुसार वह अर्थव्यवस्था सर्वश्रेष्ठ है जो कार्यों के आधार पर संसाधनों का बँटवारा करती है। जो जितना इस उत्पादन से लाभान्वित होगा उसको उतने ही अधिक जीवन के संसाधन प्राप्त होंगे। इस व्यवस्था में मानवता, नैतिकता तथा ईशपरायणता जैसे गुणों का कोई स्थान नहीं है। यह एक मशीनी क़ानून है जैसा कि पशुओं के जीवन में शक्ति एवं क्षमता को महत्व प्राप्त है। अर्थात् जीने का अधिकार उसी जानवर को है जो झपटने तथा शिकार करने की क्षमता रखता हो। मार्केट थ्योरी इसी सिद्धान्त पर खड़ी है। इसके विपरीत इस्लामी अर्थशास्त्र का उसूल है कि यद्यपि क्षमता एवं निपूर्णता मानवीय उन्नति के लिए आवश्यक है परन्तु संसाधनों का वितरण पूरी तरह उसके अधीन कर देना बेरहमी, कठोरता, अनैतिकता एवं अत्याचार है। इसलिए उसके अनुसार कार्य-कुशलता का संसाधनों के वितरण में बुनियादी महत्व नहीं होना चाहिए, बल्कि उसको मानव-प्रेम, ग़रीब-समर्थक तथा न्याय के अधीन होना चाहिए। यही कारण है कि स्वामित्व की इस्लामी धारणा में संसाधन अल्लाह की अमानत समझे जाते हैं जो सम्पन्न लोगों को इसलिए दिए गए हैं कि वे इनका उचित उपयोग करें। अपने ऊपर भी ख़र्च करें और माँग करनेवाले और वंचित पर भी। पवित्र क़ुरआन में है–

“और उनके धन में हक़ था माँगनेवालों तथा वंचितों का।" (क़ुरआन, सूरा-51 ज़ारियात, आयत-19)

हमारा दावा यह नहीं है कि वर्तमान युग के अर्थशास्त्र के विद्वान तथा नीति निर्माण करनेवाले संस्थान इस तथ्य से अनजान हैं या अपनी नीतियों तथा पॉलीसियों के बनाने में इसको अनदेखा करते हैं, बल्कि हमारा मत यह है कि अर्थशास्त्र के बाज़ार के सिद्धान्त में इस तथ्य को बाहरी तत्व (Exogenous) समझा जाता है तथा वास्तविक सिद्धान्त के निर्माण के उपरान्त इसको हाशिए के रूप में सम्मिलित किया जाता है। त्रुटि उसी अवधारणा में है जिसपर अर्थशास्त्र की आधारशिला है। इसलिए वस्तुस्थिति की गम्भीरता के बावजूद अब भी अर्थशास्त्र मात्र कार्यकुशलता तथा दुर्लभता के विचार पर स्थापित है और इसी पर उसका विकास हो रहा है।

इस्लामी अर्थशास्त्र : भूमिका, प्रवृत्ति एवं उद्देश्य

इस्लामी अर्थशास्त्र के अनुसार व्यक्ति की भूमिका, उसके रुझान तथा उद्देश्यों को बुनियादी हैसियत प्राप्त है। वह एक विवेकशील प्राणी अवश्य है परन्तु उसके विवेक का स्तर मात्र लागत तथा लाभ के गणक की नहीं है। वर्तमान अर्थशास्त्र के अनुसार एक उपभोक्ता केवल उपयोगिता प्राप्त करना चाहता है तथा उत्पादक के रूप में केवल लाभ कमाना चाहता है, ये दोनों स्तर मुद्रा तथा भौतिकता से पोषित होते हैं। इसके विपरीत इस्लामी अर्थशास्त्र के अनुसार व्यक्ति केवल वित्तीय लाभ तथा शारीरिक आराम ही प्राप्त नहीं करना चाहता, बल्कि वह अभौतिक तथा धन के अतिरिक्त भी उद्देश्य रखता है जिसको 'परलोक की सफलता' के द्वारा व्यक्त किया जाता है। क्रेता की माँग का प्रेरक केवल भौतिक या वित्तीय लाभ नहीं होता, बल्कि ईश्वर को राज़ी करना तथा मानव-कल्याण भी होता है। यह दोनों चीज़ें (Dimensions) मिलकर उसकी माँग को निर्धारित करते हैं। वह किन वस्तुओं को किस मात्रा में प्राप्त करेगा, इसका निर्धारण जहाँ उसकी आवश्यकता करती है, वहीं ईश-भय भी करता है। वह फ़ुज़ूलख़र्च नहीं होता, बल्कि सन्तुलित मार्ग अपनाता है। वह हराम से दूर रहता है, विलासिता से बचता है और इस प्रकार राष्ट्रीय आय का ऐसा वितरण होता है जिससे जीवन की आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन बढ़ता है तथा बर्बादी की मानसिकता दब जाती है। इसी प्रकार उत्पादन में संलग्न व्यक्ति पूँजी लगाते समय केवल लाभ को ही ध्यान में नहीं रखता, बल्कि आम इनसानों का कल्याण भी उसके समक्ष होता है। यह अवधारणा विवेकपूर्ण, इनसानियत दोस्त तथा ईश्वर की प्रसन्नता से परिपूर्ण है, जबकि आधुनिक विचारधारा कठोरता पर आधारित है।

साथ ही इस्लामी अर्थशास्त्र में व्यक्ति के आचरण, शिक्षा-दीक्षा, तकनीकी क्षमता, उसके उद्देश्य एवं प्रवृत्ति को प्राथमिकता प्राप्त होती है तथा पूँजी निर्माण (Capital Accumulation) को द्वितीय। उसके अनुसार कमाने के साधनों को धन के बराबर महत्व प्राप्त है। उसके सिद्धान्तों के अनुसार धनोपार्जन में अनुमन्य या जाइज़ रीति ही समाज के सामूहिक कल्याण की गारंटी बन सकती है। बेईमानी, विश्वासघात और धोखे पर आधारित रीति से एक व्यक्ति का माल बढ़ जाता है परन्तु समाज को उससे असाधारण हानि पहुँचती है और परिणामस्वरूप एक अन्यायपूर्ण अत्याचार व शोषण पर आधारित अर्थव्यवस्था अस्तित्व में आती है। व्यक्ति के लिए ये दो परस्पर विरोधी विचारधाराएँ हैं जिनमें से एक आधुनिक अर्थशास्त्र है और दूसरा इस्लामिक आर्थिक प्रणाली है। आधुनिक अर्थशास्त्र में बृहत् (Macro) अर्थशास्त्र वास्तव में व्यक्ति की इसी अवधारणा से लिया गया है, इसी लिए कुल मिलाकर वह भी मानवता तथा नैतिक मूल्यों से वंचित है। इस तथ्य को बेहतर तरीक़े से समझने के लिए हम उन मूल समस्याओं की ओर पलटेंगे जो आधुनिक ज्ञान की बुनियाद हैं जिससे उसकी तुलना में हम इस्लामी बृहत् अर्थशास्त्र की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट कर सकें।

आधुनिक अर्थशास्त्र के तीन बुनियादी प्रश्न और उनके उत्तर

आधुनिक अर्थशास्त्र के बारे में कहा जाता है कि वह तीन बुनियादी प्रश्नों पर वार्ता (बहस) करता है–

  • प्रथम, क्या उत्पादित किया जाए? What to produce?
  • द्वितीय, उत्पादन कैसे किया जाए? How to produce?
  • तृतीय, उत्पादन किसके लिए किया जाए? For whom to produce?

यह बात याद रखने की है कि इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करते समय ब्रह्माण्ड तथा व्यक्ति सम्बन्धी भौतिक अवधारणा को प्रमुखता से सामने रखा जाता है, जिसका हम पूर्व में उल्लेख कर चुके हैं।

आधुनिक अर्थशास्त्र इन तीनों प्रश्नों का उत्तर मार्केट से प्राप्त करता है, जिसमें क़ीमत एवं निर्माण लागत बुनियादी तत्व की हैसियत से काम करते हैं। क़ीमत निर्धारण माँग तथा पूर्ति द्वारा होता है। पूर्ति की निर्भरता उत्पादन लागत (Cost of Production) पर होती है तथा माँग उपभोक्ता की प्राथमिकता, वस्तुओं की उपयोगिता तथा उसकी आय पर निर्भर होती है। क्योंकि संसार में दुर्लभता विद्यमान है अर्थात् संसाधन माँग की तुलना में पर्याप्त नहीं होते इसलिए उत्पादक को उनके बीच चुनाव करना होता है। चुनाव का आधार बाज़ार में वस्तुओं की संभावित माँग तथा संभावित लाभ में होता है। इसलिए उन वस्तुओं का उत्पादन करना चाहिए जिनकी माँग हो। व्यवहार में माँग उस क़ीमत से व्यक्त होती है जो क्रेता देने को तैयार है तथा भुगतान करने की क्षमता भी रखता है। उत्पादक यह देखता है कि किन वस्तुओं की संभावित माँग तथा क़ीमत ऐसी हो जिससे उसको अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त हो सके, दूसरे शब्दों में क़ीमत आकर्षक हो। इसी आधार पर संसाधनों का वितरण होता है तथा कुल राष्ट्रीय उपज की गुणवत्ता तथा मात्रा का निर्धारण होता है।

दूसरे प्रश्न का उत्तर उत्पादन लागत से सम्बन्धित है। उत्पादक का उद्देश्य न्यूनतम मूल्य पर उत्पादन करना होता है जिससे उसके लाभ की दर अधिकतम हो सके। मूल्य की कमी निर्भर है साधनों तथा उत्पादन तकनीक के प्रयोग एवं ट्रेनिंग पर। उत्पादन लागत से आशय उत्पत्ति के साधनों की क़ीमतें तथा उनकी पूर्ति है। इसके लिए अर्थशास्त्रियों ने ऐसे सिद्धान्त प्रतिपादित किए जिसके द्वारा वह विभिन्न उत्पत्ति के साधनों की उत्पादन क्षमता की व्याख्या करते हैं। मज़दूर तथा पूँजी को प्रयोग में लाने तथा उनके विभिन्न संयोजनों (Combinations) को व्यवस्थित करने के लिए वह मज़दूर तथा पूँजी की क़ीमत तथा उनकी उत्पादन क्षमता की तुलना करते हैं। इस प्रकार वह इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उनका कौन-सा संयोजन मूल्य के आधार पर सर्वोत्तम है।

उत्पादन लागत में केवल वित्तीय व्यय ही देखे जाते हैं, यह नहीं देखा जाता कि किसी चीज़ के उत्पादन करने या न करने या किसी वैकल्पिक चीज़ की पैदावार न करने से समाज के सामान्य कल्याण पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसका इस पूरे आकलन (Calculus) में कोई उल्लेख ही नहीं होता।

तीसरे प्रश्न का उत्तर भी आधुनिक अर्थशास्त्र माँग व पूर्ति के नियम तथा बाज़ार मूल्य के सिपुर्द करता है। राष्ट्रीय बचत का बँटवारा उपभोक्ता और क्रेता की माँग पर निर्भर करता है। पैदावार किन हाथों तक पहुँचे इसका उत्तर इस बात पर है कि कौन इस पैदावार को प्राप्त करने की शक्ति रखता है और उसके मूल्य का भुगतान कर सकता है। सरल भाषा में इस प्रश्न का उत्तर यह है कि उत्पादन उस व्यक्ति या समूह के लिए किया जाना चाहिए है जो उसका मूल्य दे सकता हो। वर्तमान विद्वानों ने इस उत्तर की कठोरता (संवेदनहीनता) को महसूस करते हुए इसका उत्तर इस प्रकार दिया कि “जो उसकी माँग रखता हो।" उन्होंने इस तथ्य की अनदेखी कर दी कि माँग तो मात्र साधनों का द्योतक है न कि आवश्यकता का।

इन तीनों बुनियादी प्रश्नों के उत्तर का निष्कर्ष यह है–

  1. माँग को वास्तविक महत्व प्राप्त है न कि आवश्यकता को।
  2. समाज के अभौतिक कल्याण एवं ख़ुशहाली के बजाय वस्तुओं की आपूर्ति में उत्पादन लागत को प्रमुख स्थान प्राप्त है।
  3. कुल राष्ट्रीय उपज में किसका कितना भाग होगा इसका निर्धारण उत्पादन के साधन की उत्पादन क्षमता द्वारा होगा।

उपर्युक्त विशेषताओं पर आधारित प्रणाली में जीवन व्यतीत करने का सामान केवल सम्पन्न लोगों को प्राप्त होगा। ऐसे लोग ही बाज़ार में माँग उत्पन्न करेंगे, यही मार्केट में क्रय करेंगे। रहे ग़रीब और मुहताज जिनकी आवश्यकता के पीछे वित्तीय शक्ति न हो इससे वंचित रह जाएंगे। अमीर और अमीर होगा तथा ग़रीब और ग़रीब हो जाएगा। क्योंकि माँग सम्पन्न लोगों की प्राथमिकता का द्योतक होगी इसलिए कुल उत्पादन में उनकी आवश्यकता और उनकी पसन्द को सामने रखा जाएगा। इसलिए कुल उत्पादन के अंग अमीर और धनवान व्यक्तियों तथा सम्पन्न समूहों के अनुसार होंगे।

इस फ़लसफ़े का परिणाम है कि आज सभी देशों में सामान्यतया तथा पिछड़े देशों में विशेषकर राष्ट्रीय संसाधन विलासिता सम्बन्धी चीज़ों में इस प्रकार ख़र्च किए जाते हैं कि एयर कन्डीशन्ड कारें, फ़ाइव स्टार होटल, महँगे अस्पताल भारत जैसे देश में उपलब्ध हैं जो ग़रीब की पहुँच से दूर हैं, जहाँ जनता रेल की जनरल बोगी में या सिटी बसों में जानवरों की भाँति ठूस दी जाती है, जहाँ ग़रीब जानलेवा बीमारी में सरकारी अस्पताल की दवाओं पर निर्भर रहता है, गन्दी बस्तियों में गन्दा पानी पीकर गुज़र करता है, जहाँ देश की बड़ी संख्या अपने बच्चों को प्राइमरी शिक्षा भी दिलाने की स्थिति में नहीं है।

इस फ़लसफ़े का दूसरा परिणाम यह है कि पूँजी निवेश करते समय न प्रदूषण को महत्व दिया जाता है और न समाज के स्वास्थ्य को, न उसके आचरण को, न इनसानी जान का महत्व सामने रखा जाता है और न उसकी मूलभूत आवश्यकताओं का। इसी लिए उद्योगपति वायु प्रदूषण को तनिक भी महत्व नहीं देते। लोग अपने लाभ के लिए मानव अँगों को बेच देते हैं। केमीकल के उद्योग इनसानों के स्वास्थ्य को तबाह करने को अपने खेल का एक हिस्सा समझते हैं, जहाँ दवा तथा खाद्य सामग्रियों में ख़तरनाक मिलावट की जाती है। लाभ कमाना जीवन का लक्ष्य होता है। क्योंकि वर्तमान अर्थव्यवस्था में बॉन्ड, हुन्डी, शेयर तथा स्टॉक एक्सचेन्ज के वित्तीय गोरख धन्धों के द्वारा बड़ी तीव्र गति से दौलत में वृद्धि होती है, इसलिए हर छोटा-बड़ा व्यक्ति उसी ओर दौड़ता है। अब दौलत प्राप्त करने का साधन वास्तविक उत्पादन नहीं रह गया है, बल्कि वित्तीय प्रपत्रों का शातिराना खेल अधिक आकर्षक है। यही वह स्थिति है जो सेक्योरिटी घोटाले, काले धन तथा अन्य घोटालों के लिए ज़िम्मेदार है। वित्तीय लाभ प्राप्त करने की दौड़ है जो प्रत्येक चरण और प्रत्येक स्तर पर सामने आ रही है यहाँ तक कि महँगे अस्पतालों में केवल इन्कम टैक्स से बचने के लिए खुली धोखाधड़ी से काम लेकर 'चैरिटेबिल' का बोर्ड लगाया जाता है, झूठ व्यापार का सामान्य साधन बन गया है।

इसके विपरीत वह आर्थिक प्रणाली है जो इस्लाम के दिए हुए नैतिक मूल्यों, प्राथमिकताओं तथा लक्ष्यों पर निर्मित किया जाता है। इस आर्थिक प्रणाली में उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर मानव प्रेम तथा सामाजिक कल्याण का द्योतक हैं, जिनकी वैचारिक पृष्ठभूमि में ब्रह्माण्ड का दर्शन तथा मानवीय अवधारणा है, जिसका उल्लेख हम ऊपर कर चुके हैं।

जीवन-दर्शन

संसाधनों की दुर्लभता, प्रतियोगिता तथा वित्तीय लाभ की प्राप्ति को व्यक्ति का लक्ष्य बनानेवाला जीवन-दर्शन आर्थिक सफलता को व्यक्ति की बुद्धि एवं परिश्रम का फल घोषित करता है। जो व्यक्ति सफल होता है वह यह समझता है कि सम्पूर्ण सफलता उसके बाहुबल का परिणाम है। इसलिए उसके व्यक्तित्व में घमण्ड और ख़ुदपसन्दी उत्पन्न हो जाती है। वह कमज़ोर को रौंद कर गुज़रने को अपना अधिकार समझता है। दुनिया के ख़ज़ानों में उसे जो कुछ भी प्राप्त होता है वह उसमें से ग़रीबों और कमज़ोरों को देने को केवल अपनी दानवीरता और उदारता बताता है। उसके विचार में यह लूट-खसोट तथा शोषण की दुनिया है। इसमें जो भी जितना लूट ले वह उसका अधिकार है। वह प्राप्त धन को बढ़ाने के जुनून में घिरा रहता है। सन्तोष नाम की स्थिति उसके जीवन से बाहर हो जाती है। कृत्रिम आवश्यकताओं को बढ़ाना उसकी प्रवृत्ति बन जाती है। इसके विपरीत वह जीवन-व्यवस्था है जिसमें दो महत्वपूर्ण बुनियादें- कृतज्ञता तथा भरोसा हैं। आस्थावान इस कायनात को ईश्वर का उपहार समझता है और परिश्रम से प्राप्त धन को उसकी अनुकम्पा समझता है। वह यह जानता है कि इस दुनिया में अनेक लोग ऐसे हैं जो बुद्धि एवं विवेक में उससे कम नहीं हैं, परन्तु परिस्थितियाँ उनके प्रतिकूल हैं इसलिए वे कमज़ोर एवं ग़रीब हैं। इस पर वह ईश्वर का कृतज्ञ होता है, उसकी कृतज्ञता की व्यावहारिक घोषणा के लिए वह अन्य लोगों के साथ अच्छा बर्ताव करता है। अत्याचार, वचन-भंग तथा शोषण से अपने दामन को बचाता है। घमण्ड के स्थान पर नम्रता उसकी आदत बन जाती है। इस प्रणाली में उपभोक्ता अपनी प्राथमिकता में व्यक्तिगत हित के साथ-साथ परलोक की सफलता को भी सामने रखता है। वह अपनी शॉपिंग सूची से वर्जित वस्तुओं जैसे नशे के सामान को निकाल देता है। सम्बन्धियों, दीन-दुखियों की आवश्यकताओं को पूरा करने का अपनी सामर्थ्य-भर प्रयास करता है। बजट बनाते समय इस बात पर ध्यान देता है कि कौन-सी चीज़ें शारीरिक आराम व राहत के लिए आवश्यक हैं तथा कौन-सी आत्मा-शुद्धि के लिए। इसके लिए वह अपने समय का उचित नियोजन करता है और फ़ुज़ूलख़र्ची से बचता है। अपने धन में वंचित तथा असम्पन्न का हक़ स्वीकार करता है। इस कार्य के जो परिणाम आते हैं वह कम-से-कम तीन हैं- पहला यह कि अधिकांश माँग आवश्यकता पर केन्द्रित होती है, दूसरे यह कि विलासिता सम्बन्धी सामान की माँग कम होती है जिससे उत्पादन के साधन दूसरे सामाजिक हित के कार्यों के लिए उपलब्ध हो जाते हैं तथा तीसरे यह कि माँग की प्रवृत्ति के सुधार के नतीजे में मुद्रा-स्फीति में असाधारण कमी होती है। उत्पादन लागत, विशेषकर मज़दूरी के दबाव की प्रवृत्ति कम हो जाती है।

वर्तमान युग में वस्तुओं की माँग पैदा करने में विज्ञापन की भूमिका को सब जानते हैं। जीवन स्तर को ऊँचा करने की लालसा में अस्वाभाविक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि का सामान करते हैं। परिणामस्वरूप एक ऐसा समाज अस्तित्व में आता है जिसमें उचित तथा वास्तविक आवश्यकताएँ एक तिहाई होती हैं, शेष दो तिहाई तो विज्ञापन का परिणाम होती हैं, या दूसरों के जीवन स्तर की नक़ल का नतीजा, जिसे अर्थशास्त्री प्रदर्शन प्रभाव (Demonstration Effect) कहते हैं। भाईचारे तथा अच्छे आचरण पर आधारित समाज, व्यक्ति को अपनी माँग को केवल बुनियादी आवश्यकताओं या आरामदायक आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित रखता है इसलिए कि उसे दूसरे कमज़ोर और ग़रीब इनसानों के कल्याण को सामने रखना होता है, यह उसके ईश-भक्ति वाले आचरण का अंग होता है, क़ानूनी प्रावधान नहीं होता।

इनसान दोस्त पूँजीपति

इस प्रकार के पैदावार करनेवाले और उद्योगपति की प्राथमिकताओं में अन्तर होता है। वह अन्य लोगों की भाँति लाभ कमाने का इच्छुक तो होता है परन्तु उसके धन विनियोग के मानदण्ड (Criteria of Investment) में समाज के हितों की प्राप्ति तथा हानियों से बचना एक आवश्यक अंग बन जाता है। एक ईश-भक्त तथा इनसान दोस्त पूँजीपति उन मार्गों का चयन करता है जो जनमानस के हित में हों चाहे लाभ की दर कुछ कम भी हो। इस कमी को वह पालनहार की प्रसन्नता प्राप्त करने के भरोसे पूरा करता है। यदि उसके सामने दो विकल्प हों— एक वह जिसमें लाभ की दर अधिक हो परन्तु समाज के नैतिकता व स्वास्थ्य के प्रतिकूल हो या दरिद्र व असम्पन्न के लिए अवसर कम हो और हानिकारक हो तो वह कम दरवाले लाभ को प्राथमिकता देगा। ऐसे समाज में यह सम्भव ही नहीं है कि नशा, ब्लू फ़िल्मों, मानव अंगों के क्रय-विक्रय के लिए तो पूँजी बड़ी मात्रा में उपलब्ध हो परन्तु दरिद्रों व ग़रीबों के आवास, उनके स्वास्थ्य, उनकी शिक्षा तथा अन्य आवश्यकताओं में पूँजी निवेश 'शून्य' हो और सरकार को ही व्यवस्था करनी पड़े, जैसा कि इस समय देश में दिखाई पड़ रहा है। देश में निजी सेक्टर का निवेश उन स्कीमों से दूरी बनाए रखता है जहाँ लाभ बहुत कम हो चाहे समाज के लिए हितकारी हों— जैसे अच्छे शिक्षण संस्थान, अस्पताल, शुद्ध पेयजल, उचित यातायात आदि। ऐसी स्कीमें सरकारी फ़ंडिंग की ही मुहताज होती हैं। इस समाज में जमाख़ोरी करके कृत्रिम रीति से क़ीमतों में वृद्धि करना, प्राकृतिक साधनों का अपव्यय, वातावरण में प्रदूषण वर्तमान आर्थिक व्यवस्था की विशेषताएँ बन चुके हैं। ईश-भक्ति पर आधारित इस्लामी व्यवस्था में इन ख़राबियों की सम्भावना लगभग शून्य हो जाती है।

इस्लाम काल्पनिक दर्शन नहीं

इस्लाम धर्म एक काल्पनिक विचार नहीं है जिसमें केवल मनुष्य के आचरण, उसका ईश-भय तथा इनसानियत दोस्ती पर पूर्ण भरोसा किया जाता हो, यही कारण है कि इस्लाम में अर्थव्यवस्था का ऐसा संगठनात्मक प्रबन्ध किया गया है जिससे मनुष्य के नियंत्रण से बाहर होने की संभावना कम-से-कम हो जाती है। इनमें एक महत्वपूर्ण व्यवस्था वह है जो वित्तीय तथा व्यापारिक मामलों में ब्याज का उन्मूलन करती है तथा व्यापार तथा वित्तीय निवेश में केवल लाभ तथा हानि को बुनियाद घोषित करती है।

वर्तमान वित्तीय व्यवस्था

आधुनिक वित्तीय व्यवस्था में ब्याज दौलत के अवास्तविक स्रोतों के विस्तृत द्वार खोलता है। इसके कारण यह सम्भव है कि कोई व्यक्ति आर्थिक प्रमाण-पत्रों, प्रतिज्ञा-पत्रों, शेयर व स्टॉक आदि के क्रय-विक्रय से धन प्राप्त कर ले जो वास्तविक आर्थिक क्रिया की तुलना में कहीं अधिक होती है। वर्तमान व्यवस्था में सकल राष्ट्रीय आय की गणना एक निर्धारित अवधि में विकसित सम्पत्तियों से की जाती है। परन्तु सम्पत्तियाँ विभिन्न प्रकार की होती हैं इसलिए व्यवहार में उनके बाज़ार मूल्य का अनुमान लगाकर उनका योग निकाला जाता है, मगर सम्पत्तियों के मूल्य की गणना सामान्य वस्तुओं की भाँति नहीं की जाती, बल्कि उत्पादन इकाई (फ़र्म या कम्पनी) के शेयरों तथा अन्य वित्तीय प्रपत्रों के मूल्यांकन के सन्दर्भ से गणना की जाती है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में किसी इकाई के लाभ की सम्भावना शेयर तथा वित्तीय प्रपत्रों के मूल्य तय करते हैं अर्थात आशा तथा सम्भावनाएँ पूरे स्टॉक एक्सचेंज के व्यवसाय की बुनियाद बनती हैं। सम्भावित लाभ कमाना मनोवैज्ञानिक स्थितियों का नाम है जो वास्तविकताओं से जुड़ी होती है परन्तु स्वयं वास्तविक नहीं होतीं, यह तनिक से झटके में नीचे आ सकती हैं तथा थोड़ी-सी सम्भावना में ऊपर जा सकती हैं। इसलिए मिन्टों में हज़ारों-लाखों लोगों के धन में कमी हो सकती है और इसी तरह कुछ क्षणों में कई गुणा बढ़ सकती है। जिन औद्योगिक इकाइयों के शेयर का मूल्य बाज़ार में गिर जाता है उनकी उत्पादन क्षमता तथा भावी विकास प्रभावित हो जाता है। इस प्रकार पूँजी निवेश की पूरी क्रिया मात्र सम्भावनाओं तथा अनुमान द्वारा निर्मित होती है, इसी तरह राष्ट्रीय उपज तथा आय का आकलन कम और अधिक होता रहता है। राष्ट्रीय आय तथा सम्पदा का यह आकलन केवल धोखा है। आप अधिकतर सुनते होंगे कि स्टॉक एक्सचेन्ज में शेयरों तथा वित्तीय प्रमाण-पत्रों की क़ीमत में उतार-चढ़ाव से प्रभावित होकर लोगों ने आत्म-हत्या कर ली। प्रपत्रों एवं शेयरों के सम्भावित लाभ उत्पन्न करने की बुनियाद पर लगाया हुआ अन्दाज़ा वास्तविक निवेश को बुरी तरह प्रभावित करता है। इस पूरे गोरख-धन्धे में वास्तविक उत्पादन की भूमिका गौण होती है। इस क्रिया में छल-कपट और धोखे का कितना रोल हो सकता है इसका विश्लेषण करने के लिए आपको पूरे सिस्टम का गहन अध्ययन करने की आवश्यकता है जो इस लेख में सम्भव नहीं है। ब्याज दर जिसपर यह भवन निर्मित होता है उसमें लहरों की भाँति परिवर्तन होते हैं जिनके कारण वित्तीय प्रणाली में अस्थिरता (lnstability) बनी रहती है, उत्पादन लागत प्रभावित होती है इसी कारण ब्याज आधारित स्वतन्त्र अर्थव्यवस्था में बराबर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं।

ब्याज पर आधारित वित्तीय प्रणाली

शेयर मार्केट के अतिरिक्त बैंकिंग तथा गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं में ब्याज को बुनियादी हैसियत मिली हुई है, बल्कि जानकार लोग यह जानते हैं कि शेयरों के मूल्य तथा पूँजी की उपलब्धता का सम्बन्ध ब्याज दर से है। सूदी व्यवस्था वास्तविक उत्पादन तथा वित्तीय संसाधनों के बीच के सीधे सम्बन्ध को तोड़ देता है और एक ऐसी आर्थिक प्रणाली अस्तित्व में आती है जिसमें स्थायित्व बुरी तरह प्रभावित होता है। वर्तमान व्यवस्था में ऋण देने की शर्त ब्याज के भुगतान की क्षमता तथा ज़मानत (Collateral) होती है। नतीजा यह होता है कि जो सक्षम लोग ज़मानत (प्रभूति) उपलब्ध न करा सकते हों वह वंचित रह जाते हैं, उन लोगों और कम्पनियों को ऋण दिए जाते हैं जो पहले से ही आर्थिक रूप से सुदृढ़ हों तथा ऋण लौटाने की क्षमता रखते हों इसलिए वित्तीय साधनों का बहाव उसी ओर अधिक होता है जहाँ ये साधन पहले से ही उपलब्ध हों। इस प्रकार साधनों और ब्याज का केन्द्रीकरण अधिक-से-अधिक हो जाता है तथा आय की असमानता और बढ़ जाती है और धन के अन्यायपूर्ण वितरण की स्थिति और सुदृढ़ हो जाती है। ब्याज पर आधारित वित्त प्रदान करने में यह नहीं देखा जाता कि पूँजीपति पूँजी कहाँ लगा रहा है, बल्कि केवल पूँजी लगाने के संभावित लाभ पर नज़र होती है। इस लाभकारिता का अनुमान भी केवल वित्तीय आधारों पर लगाया जाता है। इस व्यवहार के परिणाम समाज के लिए हानिकारक भी होते हैं तथा आय की असमानता का कारण भी बनते हैं।

लाभ-हानि पर आधारित वित्तीय व्यवस्था

इसके विपरीत एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था में जिसमें पूँजीपति लाभ-हानि के आधार पर पूँजी उपलब्ध कराता है, वित्तीय संस्थाएँ और बैंक न केवल यह कि वास्तविक उत्पादन पर नज़र रखते हैं, बल्कि सामान्य सामाजिक कल्याण से सीधे जुड़ जाते हैं। इस वित्त व्यवस्था में मात्र वित्तीय प्रपत्रों एवं स्टॉक के हेर-फेर से दौलत कमाना सम्भव नहीं रहता। इसका अवसर तो केवल उस समय मिलता है जब ब्याज का आम चलन हो। ब्याज की अनुपस्थिति में मुद्रा एक 'क्रय-विक्रय योग्य वस्तु' के स्थान पर केवल 'उत्पादन का साधन' बन जाती है। इसलिए मुद्रा का सृजन (Creation of Money) लाभकारी कार्य उसी समय बनता है जब वह वास्तविक उत्पादन पर पहुँचे, इस स्थिति में मुद्रा-स्फीति की सम्भावना कम-से-कम हो जाती है।

इस्लामी आर्थिक प्रणाली में ब्याज की अनुपस्थिति साधारण निर्माताओं के लिए इस बात की सम्भावना नहीं रहने देती कि वह हेरा-फेरी करके धन कमा सकें। ऋण देने में भी प्रतिभूति का महत्व शून्य हो जाता है, क्योंकि पूँजी धारक साझेदारी के आधार पर स्वयं औद्योगिक इकाई के क्रिया-कलाप में भाग लेता है। क्षमता तथा सम्भावित माँग का उचित अनुमान ही पूँजी उपलब्धता को निर्धारित करता है। सक्षम परन्तु साधनों के सम्बन्ध में कमज़ोर उत्पादक भी वित्तीय साधन से वंचित नहीं रहता। इसलिए दौलत तथा आय के अन्यायपूर्ण वितरण की प्रवृत्ति में स्पष्ट कमी आती है, इसलिए स्थाई उतार-चढ़ाव (fluctuation) की सम्भावनाएँ कम-से-कम हो जाती हैं। नक़दी प्रमाण-पत्रों तथा ब्याज दर में शीघ्र होनेवाले परिवर्तन केवल मनोवैज्ञानिक सम्भावनाओं के कारण होते हैं, जबकि यहाँ (इस्लामी व्यवस्था में) परिवर्तन वास्तविक उत्पादन के परिणामस्वरूप होते हैं, परन्तु अर्थव्यवस्था में इस बात की सम्भावना रहती है कि आयों में असमानता रहे या उनमें वृद्धि हो। इसलिए इस्लाम ने ज़कात (अनिवार्य दान) तथा ऐच्छिक दान-पुण्य का ऐसा प्रबन्ध किया है जिससे इस प्रवृत्ति में प्रभावी परिवर्तन सम्भव हो जाता है। इसके अतिरिक्त उसने विरासत (उत्तराधिकार) की ऐसी व्यवस्था की है जो धन के केन्द्रीयकरण को कम करती है। आज के हिसाब से ज़कात की दर बहुत कम है परन्तु उसकी सीमा भी ऐसी रखी गई है कि उसके क्षेत्र में बहुत बड़ी संख्या आ जाती है। इस प्रणाली में सरकार उत्पादन को निजी सेक्टर में रखती है। सरकार की ज़िम्मेदारी केवल तीन कार्यों तक सीमित रहती है, प्रथम, ऐसी सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराना जिनसे निजी पूँजी अच्छे परिणाम दे सके, दूसरे यह कि सामूहिक या सामाजिक स्तर पर जो ख़राबी उत्पन्न हो उसको दूर करे, तीसरे यह कि धन के न्यायपूर्ण वितरण की व्यवस्था को लागू करने पर ध्यान दे तथा आवश्यक विधियाँ अपनाए।

संक्षेप में इस्लाम की शिक्षाओं के आधार पर बनाई गई प्रणाली को निम्नलिखित बिन्दुओं में वर्णित किया जा सकता है—

  1. इस प्रणाली में आर्थिक स्वतन्त्रता को बुनियाद के रूप में स्वीकार किया गया है, परन्तु यह स्वतन्त्रता केवल निजी हितों के लिए ही नहीं है बल्कि सामूहिक हितों के आधीन है।
  2. यद्यपि इस प्रणाली में व्यक्तिगत लाभ को महत्व दिया गया है परन्तु यह केवल वित्तीय लाभ नहीं है, बल्कि इसमें पारलौकिक सफलता एक आवश्यक अंग के रूप में सम्मिलित है जो उसकी प्रकृति एवं स्थिति में आधारभूत अन्तर उत्पन्न कर देती है।
  3. इस प्रणाली में नक़दी, मूल-धन तथा सम्पत्तियों का महत्व गौण होता है, व्यक्ति के आचरण तथा सामाजिक हितों के महत्व को प्राथमिकता प्राप्त होती है।
  4. इस आर्थिक प्रणाली में समता व न्याय को बुनियादी लक्ष्य के रूप में सामने रखा जाता है और इसके लिए उचित संगठनात्मक तथा वैधानिक वातावरण उपलब्ध किया जाता है।
  5. इस आर्थिक प्रणाली में ऐसा सामाजिक तथा वैचारिक वातावरण बनाया जाता है कि उत्पादन के साधनों का बँटवारा ऐसा हो जिससे जीवन की अतिआवश्यक वस्तुओं की पैदावार को प्राथमिकता प्राप्त हो, उसके पश्चात् आरामदायक वस्तुओं के कृत्रिम व्यय के द्वार इसमें बन्द किए जाते हैं।
  6. यह आर्थिक प्रणाली वास्तविक उत्पादन (Real production) और नक़द साधनों के बीच सीधा सम्बन्ध बनाती है, वर्तमान प्रणाली की भाँति अप्रत्यक्ष नहीं। इसलिए यह केवल लाभ तथा जोखिम वहन करने की अनुमति देता है, ब्याज की अनुमति नहीं देता।
  7. इस प्रणाली में प्राप्तियाँ तथा आय केवल श्रम, संगठन एवं साहस के नतीजे में उत्पन्न होती हैं, नक़दी या मूल-पूँजी या प्रपत्रों के हेर-फेर (क्रय-विक्रय) को यहाँ बाहर कर दिया जाता है, इस प्रणाली के अनुसार मुद्रा विक्रय योग्य वस्तु नहीं है, बल्कि विनिमय का एक साधन मात्र है।
  8. यह पूँजी निवेश के ऐसे मानक तय करता है जिनके लागू होने से व्यक्ति तथा समाज दोनों को एक साथ फ़ायदा पहुँचे, बल्कि व्यक्ति के हित को सामाजिक हित से जोड़ देता है। इस उद्देश्य के लिए वह केवल अवधारणा पर भरोसा नहीं करता, बल्कि औपचारिक नियम बनाता है और सामूहिक संस्थाएँ स्थापित करता है।
  9. इस प्रणाली में माँग तथा आवश्यकता दोनों का ऐसा सुन्दर मिश्रण अस्तित्व में आता है जिससे कार्य-कुशलता तथा इनसान दोस्ती अथवा न्याय दोनों आर्थिक दौड़-धूप के अंग बन जाएँ। बाज़ार की माँग की त्रुटियाँ तथा राष्ट्रीय आय का अन्यायपूर्ण वितरण वह सामूहिक आवश्यकता के अधीन करता है और इस उद्देश्य के लिए वह पूँजीपति की सोच को भी बनाता है तथा ऐसी संस्थाएं तथा नियम बनाता है जिनसे ये उद्देश्य प्राप्त हो सकें। वह इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साधनों की एक बड़ी मात्रा को ग़रीब व असम्पन्न की ओर हस्तान्तरित करने की क़ानूनी व्यवस्था करता है तथा शासन का उत्तरदायित्व भी घोषित करता है कि वह अपनी नीतियों तथा कार्य-विधि द्वारा इस आय के हस्तान्तरण को सुनिश्चित करे।
  10. इस आर्थिक प्रणाली में चूँकि सरकार स्वयं वास्तविक उत्पादक नहीं होती, बल्कि वह उत्पादन की रुकावटों को दूर करती है इसलिए उसको अपने मौलिक व्यय को पूरा करने में और धन के न्यायोचित वितरण में असाधारण साधनों की कोई आवश्यकता नहीं होती जिसके लिए वह आय प्राप्ति के लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती करे या बड़े पैमाने पर केन्द्रीय बैंक से ऋण लेकर मुद्रा-स्फीति पैदा करे। इसलिए इस आर्थिक प्रणाली में टैक्स कम-से-कम होंगे तथा मुद्रा-सृजन की आवश्यकता भी कम-से-कम होगी। इन दोनों कारणों से सामान्य वस्तुओं के मूल्यों में लगातार ऊपर जाने की प्रवृत्ति भी सीमित होगी।

 

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