بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم अल्लाह के नाम पर, जिसका नाम पृथ्वी या आसमान में कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचाता है, और वह सुनने वाला, जानने वाला है

September 17,2021

प्यारे नबी (सल्ल॰) के चार यार -3: उस्मान गनी (रज़ि.)

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13 Jul 2021
प्यारे नबी (सल्ल॰) के चार यार -3: उस्मान गनी (रज़ि.)

लेखक: इरफ़ान ख़लीली

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहमवाला है।"

कुछ किताब के बारे में

खुदा का शुक्र है कि 'प्यारे नबी (सल्ल.) के चार साथी' के तीसरे भाग को पेश करने का सुअवसर मिल रहा है। यह भाग प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के तीसरे ख़लीफ़ा जुन्नूरैन हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.) की मुबारक ज़िन्दगी के बारे में है।

खुलफ़ाए-राशिदीन की ज़िन्दगी के हालात पढ़ने से हमें पता चलता है कि उन्होंने कितनी परेशानियाँ उठाकर और कितनी सादा ज़िन्दगी गुज़ार कर हुकूमत चलाई और अपनी हुकूमत में जनता को कितना आराम पहुँचाया। हक़ीक़त यह है कि उनकी जिन्दगी न सिर्फ दुनिया के सभी हाकिमों के लिए बल्कि सारे इनसानों के लिए एक नमूना है।

किताब के लेखक जनाब इरफ़ान ख़लीली (मरहूम) ने बड़े सादे और आसान अन्दाज़ में यह किताब लिखी है। खुदा उनको इसका अच्छा बदला दे यह हमारी दुआ है।

नसीम ग़ाज़ी फ़लाही

कुछ अल्फ़ाज़ का मतलब

इस किताब में कुछ ऐसे अल्फ़ाज़ आएँगे, जिनको मुख़्तसर शक्ल में लिखा गया है। किताब पढ़ने से पहले ज़रूरी है कि उन अल्फ़ाज़ की मुकम्मल शक्ल और मतलब समझ लिया जाए, ताकि किताब पढ़ते वक़्त कोई परेशानी न हो। अल्फ़ाज़ ये हैं :

सल्ल. : इसका पूर्ण रूप है, 'सल-लल-लाहु अलैहि वसल्लम जिसका मतलब है, 'अल्लाह उनपर रहमत और सलामती की बारिश करे!' हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) का नाम लिखते, लेते या सुनते हैं तो आदर और प्रेम के लिए दुआ के ये शब्द बढ़ा देते हैं।

अलैहि. : इसकी मुकम्मल शक्ल है, 'अलैहिस्सलाम' यानी 'उन पर सलामती हो! नबियों और फ़रिश्तों के नाम के साथ आदर और प्रेम सूचक ये शब्द बढ़ा देते हैं।

रज़ि. : इसका पूर्ण रूप है, 'रज़ियल्लाहु अन्हु' इसके मानी हैं, 'अल्लाह उनसे राज़ी हो!' 'सहाबी' के नाम के साथ यह आदर और प्रेम सूचक दुआ बढ़ा देते हैं।

 'सहाबी' उस खुश क़िस्मत मुसलमान को कहते हैं, जिसे नबी (सल्ल.) से मुलाक़ात का मौक़ा मिला हो। सहाबी का बहुवचन सहाबा है स्त्रीलिंग सहाबिया है।

अगर किसी सहाबिया के नाम के साथ रज़ि. इस्तेमाल हुआ हो तो रज़ियल्लाहु अन्हा पढ़ते हैं और अगर सहाबा के लिए आए तो रज़ियल्लाहु अन्हुम कहते हैं।

नाम और ख़ानदान

प्यारे नबी (सल्ल.) के तीसरे ख़लीफ़ा का अस्ल नाम उस्मान था, कुन्यत ‘अबू-अब्दुल्लाह' और अबू-उमर और लक़ब जुन्नूरैन था। ज़ुन्नूरैन के माने “दो नूरवाला" है।

आप (रज़ि.) के वालिद का नाम अफ़्फ़ान और माँ का नाम उरवा था। अफ़्फ़ान प्यारे नबी (सल्ल.) के चर्चा होते थे और उरवा आप (सल्ल.) की सगी फूफीज़ाद बहन थीं। उरवा की माँ बैज़ा और प्यारे नबी (सल्ल.) के वालिद अब्दुल्लाह दोनों जुड़वाँ भाई-बहन थे। हज़रत उस्मान (रज़ि.) का ख़ानदानी सिलसिला पाँचवीं पुश्त में प्यारे नबी (सल्ल.) से मिल जाता है। क़बीला क़ुरैश में दो ख़ानदान बहुत मशहूर थे। एक बनू-हाशिम और दूसरा बनू-उमय्या। प्यारे नबी (सल्ल.) बनू-हाशिम खानदान से थे। हज़रत उस्मान (रज़ि.) का ताल्लुक़ बनू-उमय्या ख़ानदान से था। बनू-हाशिम की तरह बनू-उमय्या भी अपनी शराफ़त और बहादुरी की वजह से बहुत मशहूर थे। क़ुरैश का क़ौमी झण्डा, जिसे 'उक़ाब' कहते थे, इसी ख़ानदान के पास रहता था। अरब की मशहूर लड़ाई 'जंगे फुज्जार' में इसी ख़ानदान का मशहूर सरदार हरब-बिन-उमय्या फ़ौज का सरदार बनाया गया था।

पैदाइश और बचपन

हज़रत उस्मान (रज़ि.) हाथी वाले लश्कर (अस्हाबे-फ़ील) की घटना से छः साल बाद पैदा हुए। इस तरह आप प्यारे नबी (सल्ल.) से उम्र में छः साल छोटे थे।

उस ज़माने में मक्कावालों में पढ़ने लिखने का चलन न था। तालीम को लोग ज़रूरी नहीं समझते थे। इसी लिए वहाँ पढ़े-लिखों की तादाद बहुत कम थी। लेकिन चलन के ख़िलाफ़ हज़रत उस्मान (रजि.) को पढ़ने-लिखने का शौक़ बचपन ही से था। आपने बड़ी कोशिश और मेहनत से लिखना-पढ़ना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे आपने इतनी तालीम हासिल कर ली कि आपकी गिनती मक्का के पढ़े-लिखों में होने लगी। सच है अल्लाह तआला मेहनत का फल ज़रूर देता है।

आप (रज़ि.) के वालिद बहुत मालदार थे। आपका बचपन बहुत ठाठ-बाट के साथ आराम से गुज़रा। आप शुरू ही से बहुत नेक, सच्चे, ईमानदार और दूसरों के हमदर्द थे। जिन लड़कों की आदतें बुरी होती थीं, आप हमेशा उनसे दूर रहते थे। आपके सभी दोस्त बहुत शरीफ़ और दयानतदार थे।

जवानी कैसे गुज़री

जब हज़रत उस्मान (रज़ि.) जवान हुए तो वहाँ के चलन के मुताबिक़ आपने भी तिजारत शुरू कर दी। अपनी मेहनत, सच्चाई, ईमानदारी और दियानतदारी की वजह से बहुत जल्द ही तरक़्क़ी कर ली। वे अब मक्का के बड़े ताजिरों में गिने जाने लगे।

आप शुरू ही से बहुत शरीफ़ और नेकदिल थे। आप शराब और जुए से हमेशा बचे रहे। मूर्ति-पूजा से तो आपको सख्त नफ़रत थी। जो लोग इन बुराइयों में फंसे हुए थे उन्हें देख-देखकर आप दिल ही दिल में कुढ़ते रहते थे।

अल्लाह ने आपको बड़ी दौलत दी थी, फिर भी आपको इसपर बिल्कुल घमण्ड न था। दूसरों की तरह सादा ज़िन्दगी गुज़ारते थे। ज़रूरतमन्दों और मुहताजों की मदद करके आप इस तरह खुश होते थे जैसे कोई क़र्ज़दार अपना क़र्ज़ अदा करके खुश होता है। इसी लिए मक्कावाले आपको 'ग़नी' (मालदार) कहते थे। आप इसी नाम से मक्का में मशहूर थे।

आप बहुत ही हयादार और शर्मीले थे। बेशर्मी और बेहयाई के पास कभी भी आप नहीं फटकते थे।

मुसलमान हो गए

जब अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने इस्लाम का पैग़ाम लोगों को पहुँचाना शुरू किया, उस वक़्त हज़रत उस्मान (रज़ि.) की उम्र 34 साल थी। मक्का के रीति-रिवाज और मज़हबी हालात को देखते हुए यह पैग़ाम बिल्कुल अजनबी सा लगता था। लेकिन हज़रत उस्मान (रज़ि.) की नेक तबीअत को इस पैग़ाम में कुछ सुकून सा महसूस होने लगा।

आपके जिगरी दोस्त हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) मुसलमान हो चुके थे। उन्होंने भी अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए दीन की दावत आपके सामने पेश की। एक दिन बड़ी देर तक दोनों दोस्तों में इस्लाम के बारे में बात-चीत होती रही। इस बात-चीत का हज़रत उस्मान (रज़ि.) पर ऐसा असर हुआ कि वे कि प्यारे नबी (सल्ल.) के पास जाने और इस्लाम क़बूल करने के लिए तैयार हो गए।

इत्तिफ़ाक़ की बात खुद नबी (सल्ल.) अबू बक्र (रज़ि.) के यहाँ तशरीफ़ ले आए। वहाँ हज़रत उस्मान (रज़ि.) को देखा तो फ़रमाया, "उस्मान! अल्लाह की जन्नत क़बूल कर, मैं तुझे और तमाम लोगों को सीधा रास्ता दिखाने के लिए भेजा गया हूँ।"

यह जुमला (वाक्य) सुनते ही हज़रत उस्मान (रज़ि.) बेताब हो गए और लपक कर नबी (सल्ल.) का मुबारक हाथ अपने हाथों से पकड़ लिया, ज़बान पर कलिम-ए-शहादत जारी हो गया। इस तरह आप मुसलमान हो गए।

हक़ पर जमे रहे

हज़रत उस्मान (रज़ि.) के मुसलमान होने की खबर बिजली की तरह सारे मक्का में फैल गई। हर तरफ़ काना-फूसी होने लगी। जिसे देखो वह आपको भला-बुरा कहता। ख़ानदानवाले तो जैसे आपके दुश्मन ही हो गए हों। पहले तो बहलाते-फुसलाते रहे फिर डराने धमकाने लगे और आख़िरकार मार-पीट भी करने लगे लेकिन हज़रत उस्मान (रज़ि.) पर इन बातों का कोई असर न हुआ। आप अल्लाह के दीन पर सच्चे दिल से जमे रहे। इससे उनके घरवालों को आपसे और चिढ़ पैदा हो गई।

आख़िरकार आपके चचा हकम-बिन-आस को गुस्सा आ गया। उसने आपके हाथ-पैर रस्सी से कसकर बाँध दिए और कहने लगा, "तुमने बाप-दादा का दीन छोड़कर हमारी बेइज़्ज़ती की है। अल्लाह की क़सम! मैं उस वक़्त तक तुमको नहीं खोलूँगा जब तक कि तुम नए दीन को छोड़ देने का ऐलान न कर दो।"

हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने जवाब दिया, "चचा जान! मैं भी अल्लाह की क़सम खाता हूँ कि दीने-इस्लाम मैं जीते-जी कभी नहीं छोडूँगा।" हकम को और गुस्सा आ गया। उसने आपके मुँह पर एक ज़ोर का तमाँचा मारा और चला गया।

 कुछ दिनों तक हज़रत उस्मान (रज़ि.) इसी तरह बँधे पड़े रहे। आख़िरकार मजबूर होकर उन लोगों ने आपको खोल दिया।

 शादी

प्यारे नबी (सल्ल.) ने अपनी प्यारी बेटी हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) की शादी अपने चाचा अबू-लहब के बेटे उतबा से कर दी थी। पहले तो अबू-लहब इस रिश्ते से बहुत खुश था। वह फ़ख (गर्व) से कहता था कि उसका बेटा प्यारे नबी (सल्ल.) का दामाद है। लेकिन जब प्यारे नबी (सल्ल.) ने अल्लाह का दीन फैलाना शुरू कर दिया तो अबू-लहब आप (सल्ल.) का दुश्मन बन गया। तरह-तरह से आप (सल्ल.) को सताने लगा। इसी जलन में उसने अपने बेटे को मजबूर कर दिया कि वह हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) को तलाक़ दे दे।

प्यारे रसूल (सल्ल.) को इस बात से बड़ी चिन्ता पैदा हुई। कुछ दिनों के बाद आप (सल्ल.) ने सोचा कि रुक़य्या (रज़ि.) की शादी हज़रत उस्मान (रज़ि.) से कर दी जाए। जब इस बात की ख़बर हज़रत उस्मान (रज़ि.) को हुई तो वह खुशी के मारे फूले न समाए। प्यारे नबी (सल्ल.) से अपनी रिश्तेदारी को वे खुश-क़िस्मती समझते थे। आप फ़ौरन तैयार हो गए। इस तरह हज़रत उस्मान (रज़ि.) की शादी हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) से हो गई और वे प्यारे नबी (सल्ल.) के दामाद बन गए।

इस रिश्ते पर हज़रत उस्मान (रज़ि.) हमेशा फ़ख़ करते थे।

हब्शा हिजरत

मक्का में इस्लाम को फैलता हुआ देखकर वहाँ के मुशरिकों का गुस्सा और ज़्यादा बढ़ने लगा। जो भी आदमी अपना पुराना धर्म छोड़कर इस्लाम क़बूल कर लेता तो ये लोग हाथ धोकर उसके पीछे पड़ जाते। ऐसी-ऐसी तकलीफें पहुँचाते कि जिनको देखकर रोंगटे खड़े हो जाते।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) इतने बड़े खानदान से सम्बन्ध रखने के बावजूद ज़ालिमों के ज़ुल्म का निशाना बने हुए थे। खुद उनके रिश्तेदार भी उनके दुश्मन हो गए थे। ख़ानदानवाले उनको इस तरह सताते थे कि जैसे उनका उनसे कोई सम्बन्ध ही न हो।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) पहले तो ये सारी तकलीफें सहते रहे, लेकिन जब पानी सिर से ऊँचा हो गया और ज़ुल्मो-सितम हद से बढ़ गया तो हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की इजाज़त (अनुमति) से आप अपनी बीवी हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) को साथ लेकर चुप-चाप हब्शा देश की तरफ़ हिजरत कर गए।

अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) से फ़रमाया, "मेरी उम्मत में उस्मान (रज़ि.) पहला शख्स है जिसने अपने बाल-बच्चों के साथ हिजरत की।"

 वतन वापसी

हज़रत उस्मान (रज़ि.) को हबशा देश में रहते हुए कई साल बीत गए थे। की आबो-हवा और माहौल आपके लिए बहुत अनुकूल था। बड़े आराम, सुकून और इत्मीनान से दिन गुज़र रहे थे। लेकिन एक तकलीफ़ ज़रूर थी जो दोनों मियाँ-बीवी को बेताब कर देती थी। वह थी प्यारे नबी (सल्ल.) की जुदाई। जब आप (सल्ल.) की याद आती तो दोनों बेचैन हो जाते मगर मजबूर थे। कुछ कर भी नहीं सकते थे।

इसी बीच में किसी ने यह झूठी ख़बर उड़ा दी कि क़रैशवाले मुसलमान हो गए हैं। यह ख़बर सुनते ही दोनों मियाँ-बीवी के चेहरे खुशी से दमक उठे। दोनों ने जल्दी-जल्दी सामान ठीक किया और मक्का के लिए रवाना हो गए। उनके साथ कुछ और मुसलमान भी वापस आ गए।

जब वतन पहुँचे तो मालूम हुआ कि किसी ने यह खबर ग़लत उड़ा दी थी। दूसरे मुसलमान तो हब्शा फिर लौट गए मगर हज़रत उस्मान (रज़ि.) बाल-बच्चों के साथ प्यारे नबी (सल्ल.) के पास ही रह गए।

मदीना हिजरत

मक्का के मुशरिकों का जुल्मो-सितम हद से ज़्यादा बढ़ गया था। मुसलमानों की जान के लाले पड़ गए थे। वे बेचारे ये सब अत्याचार सह रहे थे और अल्लाह के दीन पर डटे हुए थे। ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह के रसूल (सल्ल.) के पास जाकर शिकायतें किया करते थे।  आप (सल्ल.) उन सबको तसल्ली देते। अल्लाह के वादे याद दिलाते और सब्र की नसीहत फ़रमाते। हज़रत उस्मान (रज़ि.) भी सब्र और शुक्र के साथ ये सारी मुसीबतें झेल रहे थे। आख़िरकार वह दिन आ गया कि अल्लाह ने मदीना जाकर बस जाने की इजाज़त दे दी।

प्यारे नबी (सल्ल.) ने यह खुशखबरी मुसलमानों तक पहुँचा दी और हिदायत कर दी कि जो लोग मदीना जाना चाहें ख़ामोशी के साथ एक-एक दो-दो करके चले जाएँ। इसी हिदायत के मुताबिक़ हज़रत उस्मान (रज़ि.) भी हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) के साथ चुप-चाप मदीना को हिजरत कर गए।

मदीना पहुँचकर आप (रज़ि.) हज़रत औस-बिन-साबित (रज़ि.) के मेहमान हो गए। बाद में नबी (सल्ल.) ने हज़रत उस्मान (रज़ि.) और हज़रत औस (रज़ि.) में भाईचारा करा दिया जिसे 'अहदे- मुआखात' कहते हैं। दोनों अब भाई-भाई की तरह रहने-सहने लगे।

बीरे-रूमा

उस ज़माने में मदीना में मीठे पानी का सिर्फ एक ही कुंआ था। जिसको "बीरे-रूमा' कहते थे। उसका मालिक एक यहूदी था। वह पानी देने में मुसलमानों को बहुत परेशान करता था। उनसे मुँह माँगी क़ीमत लेता था। मुसलमानों के मदीना पहुँच जाने की वजह से मदीना की आबादी भी बढ़ गई थी। और पानी की तकलीफ़ में भी इज़ाफ़ा हो गया था। बहुत एक दिन प्यारे नबी (सल्ल.) सहाबा (रज़ि.) से मुखातिब हुए और फ़रमाया, "जो आदमी इस कुँए को ख़रीदकर अल्लाह की राह में वक्फ कर दे उसको जन्नत मिलेगी।" हज़रत उस्मान (रज़ि.) प्यारे नबी (सल्ल.) की यह बात सुनते ही उठ खड़े हुए और सीधे उस यहूदी के पास पहुँचे। उससे कुँए का सौदा करने लगे। बड़ी मुश्किल से वह आधा कुँआ बारह हज़ार दिरहम में बेचने पर तैयार हुआ। शर्त यह तय पाई कि एक दिन हज़रत उस्मान की पानी लेने की बारी होगी और दूसरे दिन यहूदी की।

मुसलमानों ने यह तरकीब की कि जिस दिन हज़रत उस्मान (रज़ि.) की बारी होती उस दिन वे दो दिन के लिए पानी भर लेते इस तरह यहूदी की आमदनी बहुत कम हो गई। आखिरकार मजबूर होकर उसने अपना आधा हिस्सा भी आठ हजार दिरहम में हज़रत उस्मान (रज़ि.) को बेच दिया। इस तरह पूरा कुँआ बीस हजार दिरहम में मिल गया। जिससे मुसलमानों को पानी के लिए बड़ी सुहूलत हो गई।

यह पहला उपहार था जो हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने इस्लाम और मुसलमानों को पेश किया।

दूसरा उपहार

प्यारे नबी (सल्ल.) अब हिजरत करके मदीना पहुँच गए तो इबादत के लिए आप (सल्ल.) ने एक मसजिद बनवाई जिसका नाम मसजिदे-नबवी पड़ा। मदीना में मुसलमानों की तादाद जब दिन पर दिन बढ़ने लगी तो मसजिदे-नबवी भी छोटी पड़ गई। मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने में बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता था।

इत्तिफ़ाक़ की बात मसजिद से मिला हुआ ज़मीन का एक टुकड़ा बिक रहा था। प्यारे नबी (सल्ल.) ने सहाबा (रज़ि.) से इस ज़मीन के बारे में बात की और फ़रमाया, "है कोई अल्लाह का बन्दा जो इस ज़मीन को ख़रीद कर मसजिद के लिए वक़्फ़ कर दे और अल्लाह के यहाँ अपना दर्जा बुलन्द कराए?" खुश क़िस्मती से उस वक़्त हज़रत उस्मान (रज़ि.) वहाँ मौजूद थे। वे तो ऐसे क़ीमती मौक़ों की तलाश में लगे ही रहते थे। ज़मीन के मालिक से बात-चीत करके उस ज़मीन को मसजिद के लिए बीस या पच्चीस हज़ार दिरहम में खरीद लिया। इस तरह मसजिदे-नबवी काफ़ी बड़ी हो गई।

यह था दूसरा नज़राना जो हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने मदीना पहुँचते ही दीन की ख़ातिर पेश किया।

बद्र की जंग में शिरकत

मक्का के मुशरिकों की शरारतों और ज़ुल्म व सितम से तंग आकर मुसलमान और खुद अल्लाह के रसूल (सल्ल.) मक्का छोड़कर मदीना हिजरत कर गए। ज़ालिमों को पता भी न चला। उनका गुस्सा और भड़क उठा। दो साल के अन्दर ही अन्दर उन्होंने एक बड़ी फ़ौज तैयार की और मदीना पर चढ़ाई कर दी। मुसलमान भी जवाब देने के लिए तैयार हो गए जबकि उनकी तादाद मुशरिकों से तिहाई थी।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) भी लड़ाई में शामिल होने के लिए तैयार थे मगर मुश्किल यह पेश आई कि उनकी बीवी हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) बहुत ज़्यादा बीमार थीं। उनकी देखभाल करनेवाला कोई न था। प्यारे नबी (सल्ल) ने जंग में जाने से हज़रत उस्मान (रज़ि.) को रोक दिया और तसल्ली देते हुए फ़रमाया, "मैं तुम्हें रुक़य्या (रज़ि.) की तीमारदारी के लिए छोड़ रहा हूँ क्योंकि कोई और नहीं है। मगर घबराओ नहीं, तुम्हारी गिनती अल्लाह के यहाँ जंग में शामिल होनेवालों में होगी। तुमको जंग में शरीक होने का सवाब और माले-ग़नीमत का हिस्सा दोनों मिलेंगे।"

अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की मुबारक ज़बान से ये कलिमात (बातें) सुनकर हज़रत उस्मान (रज़ि.) को तसल्ली हो गई और वे हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) की तीमारदारी (देखभाल) में लग गए।

प्यारी बीवी की वफ़ात

यह बीमारी हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) के लिए मौत का पैग़ाम साबित हुई। जितनी तीमारदारी होती थी उतनी ही बीमारी बढ़ती जाती थी यहाँ तक कि प्यारे नबी (सल्ल.) की ग़ैर-मौजूदगी ही में हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) इस दुनिया से चल बसीं। "इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।"

हज़रत उस्मान (रज़ि.) और हज़रत उसामा-बिन-ज़ैद (रज़ि.) हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) को कफ़नाने-दफ़नाने मे लगे हुए थे कि नार-ए-तकबीर की आवाज़ सुनाई दी। पता चला कि बद्र की लड़ाई में फ़तह हासिल करके अल्लाह के रसूल (सल्ल.) मुसलमानों की फ़ौज के साथ वापस तशरीफ़ ला रहे हैं। मदीना में दाखिल होते ही नबी (सल्ल.) को हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) की वफ़ात की खबर मिल गई। आप (सल्ल.) को बहुत दुख हुआ। हज़रत उस्मान (रज़ि.) को आप (सल्ल.) ने बहुत तसल्ली दी।

जैसा कि प्यारे नबी (सल्ल.) फ़रमा चुके थे। आप (सल्ल.) ने हज़रत उस्मान (रजि.) को बद्र का मुजाहिद (अल्लाह की राह में लड़नेवाला सिपाही) क़रार दिया था और माले-ग़नीमत में से सबके बराबर हिस्सा दिया और यह खुशखबरी दी थी कि वे अज्र व सवाब में किसी से कम नहीं रहेंगे।

 ज़ुन्नरैन का लक़ब

 हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) की मौत के बाद हज़रत उस्मान (रजि.) बहुत ज्यादा ग़मगीन रहने लगे। एक दिन हज़रत उमर (रज़ि.) ने हमदर्दी के तौर पर उनसे कहा, "जो कुछ होना था वह हो चुका, अब इतना रंज व ग़म करने से क्या फ़ायदा।" यह सुनकर हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने जवाब दिया. "मैं अपनी बदक़िस्मती पर जितना भी अफ़सोस करूँ वह कम है। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने फ़रमाया था कि क़ियामत के दिन मेरी रिश्तेदारी के सिवा तमाम रिश्तेदारियाँ ख़त्म हो जाएँगी। अफ़सोस कि मेरा रिश्ता प्यारे नबी (सल्ल.) के ख़ानदान से टूट गया।"

 जब यह बात प्यारे नबी (सल्ल.) के कानों तक पहुँची तो आप (सल्ल.) ने अपनी दूसरी प्यारी बेटी हज़रत उम्मे-कुलसूम (रज़ि.) से उनका निकाह कर दिया। इस तरह रसूल (सल्ल.) के ख़ानदान से हज़रत उस्मान (रज़ि.) का ताल्लुक़ दोबारा क़ायम हो गया। हज़रत उस्मान (रज़ि.) बहुत खुश हो गए।

चूँकि आप (रज़ि.) के साथ प्यारे नबी (सल्ल.) की दो बेटियों की शादी हुई थी इसलिए उस दिन से आप (रज़ि.) का लक़ब 'ज़ुन्नूरैन' (दो नूरवाला) पड़ गया।

आप (रज़ि.) के क़त्ल की ख़बर और हुदैबिया की सुलह

बद्र की लड़ाई के अलावा बाक़ी तमाम जंगों में हज़रत उस्मान (रज़ि.) अल्लाह के रसूल (सल्ल.) के साथ शरीक रहे। सन् चार हिजरी में ज़ातुररिक़ाअ की जंग के मौक़े पर आप (रज़ि.) मदीना ही में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के नायब की हैसियत से रहे।

सन् छः हिजरी में प्यारे नबी (सल्ल.) ने मक्का की ज़ियारत करने का इरादा किया। आप (सल्ल.) के साथ चौदह सौ मुसलमान थे। हुदैबिया के मक़ाम पर पहुँचकर मालूम हुआ कि मक्का के मुशरिक जंग की तैयारी कर रहे हैं। प्यारे नबी (सल्ल.) लड़ना नहीं चाहते थे। इसलिए सुलह के खयाल से हज़रत उस्मान (रज़ि.) को अपना सफ़ीर (दूत) बनाकर मक्कावालों के पास भेजा ताकि वे उनको वहाँ आने का अस्ल मक़सद समझा दें। मक्कावाले लड़ने के लिए तैयार थे ही, उन्होंने हज़रत उस्मान (रज़ि.) को क़ैद कर लिया। कई दिन तक जब आप (रज़ि.) वापस न आए तो सबको बड़ी चिन्ता हुई। इसी बीच यह ख़बर उड़ गई कि हज़रत उस्मान (रज़ि.) शहीद कर दिए गए। प्यारे नबी (सल्ल.) को यह खबर सुनकर बहुत दुख हुआ। उनके खून का बदला लेने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठकर आप (सल्ल.) ने मुसलमानों से बैअत (वादा) ली और हज़रत उस्मान (रज़ि.) की तरफ़ से खुद अपना मुबारक हाथ दूसरे हाथ पर रखकर बैअत की। यह बहुत बड़े फ़ख्न (गर्व) की बात थी जो किसी और को नसीब न हुई थी। यह बैअत, बैअते-रिज़वान कहलाती है।

इधर मुसलमानों में बहुत ज़्यादा जोश पैदा हो गया था। जब यह ख़बर मक्का के मुशरिकों को मिली तो वे बहुत डर गए हज़रत उस्मान (रज़ि.) को छोड़ दिया और खुद आकर प्यारे नबी (सल्ल.) से सुलह कर ली। इसे हुदैबिया की सुलह कहते हैं।

फ़ैयाज़ी

सन् नौ हिजरी में यह खबर उड़ी कि रूम का बादशाह अरब पर हमला करना चाहता है। इसकी रोक थाम करना ज़रूरी है। लेकिन यह वह ज़माना था जब मुसलमान बहुत ही ग़रीबी और मुफ़लिसी की ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे। हाथ बिलकुल ख़ाली थे और दुनिया की इतनी बड़ी सल्तनत की फ़ौज से मुक़ाबला था। प्यारे नबी (सल्ल.) बहुत परेशान थे कि क्या किया जाए। आप (सल्ल.) ने हर हालत में मुसलमानों से दिल खोलकर मदद करने के लिए फ़रमाया। ज़्यादातर लोगों ने बड़ी-बड़ी रक़में पेश की। भला हज़रत उस्मान (रज़ि.) कैसे पीछे रह सकते थे? आप (रज़ि.) का एक तिजारती क़ाफ़िला भी शाम (सीरिया) देश से काफ़ी नफ़ा कमाकर वापस आया था। आप (रज़ि.) प्यारे नबी (सल्ल.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और पेशकश की कि तिहाई फ़ौज (लगभग दस हज़ार सिपाहियों से ज़्यादा) के तमाम ख़र्च मेरे ज़िम्मे रहे।

इसके अलावा एक हज़ार ऊँट, सत्तर घोड़े और एक हज़ार दीनार की थैली प्यारे नबी (सल्ल.) की खिदमत में पेश की। प्यारे नबी (सल्ल.) आप (रज़ि.) की इस फ़ैयाज़ी और सख़ावत से बहुत खुश हुए। आप (सल्ल.) उस थैली को अपने मुबारक हाथों पर उछालते थे और फ़रमाते-

"आज के बाद उस्मान का कोई काम उसको नुक़सान नहीं पहूँचाएगा।"

मजलिसे- शूरा के मेम्बर

प्यारे नबी (सल्ल.) जब दुनिया से तशरीफ़ ले गए और हज़रत अबू-बक्र (रज़ि.) मुसलमानों के ख़लीफ़ा चुने गए तो हज़रत उस्मान (रज़ि.) हज़रत अबू-बक्र (रज़ि.) के ख़ास मशवरा देनेवालों में से थे। हज़रत अबू-बक्र (रज़ि.) बगैर आप (रज़ि.) के मशवरे के कोई काम नहीं करते थे। सवा दो साल के बाद जब अबू-बक्र (रज़ि.) इस दुनिया से चल बसे तो वसीयत के मुताबिक़ हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) ख़लीफ़ा बने। यह वसीयत नामा भी हज़रत उस्मान (रज़ि.) के हाथ का लिखा हुआ था। जब हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) वसीयत नामा लिखवा रहे थे तो ख़लीफ़ा का नाम लिखाने से पहले ही बेहोश हो गए- हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने अपने विवेक और समझदारी से काम लेकर उस जगह पर हज़रत उमर (रज़ि.) का नाम लिख दिया। जब हज़रत अबू-बक्र (रज़ि.) को होश आया तो आप (रज़ि.) से वसीयत नामा पढ़वाकर सुना। जब हज़रत उमर (रज़ि.) का नाम सुना तो बे इख़्तियार अबू-बक्र (रज़ि.) की ज़बान से अल्लाहु अकबर निकल गया। हज़रत उस्मान (रज़ि.) की समझ-बूझ की आपने बहुत तारीफ़ की।

हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) भी आप (रज़ि.) का बहुत ख़याल रखते थे। वे इनके मशवरों को बहुत अहमियत देते थे। हज़रत उमर (रज़ि.) ने मशवरा देनेवाले की जो एक टोली (मजलिसे-शूरा) बनाई थी उसमें हज़रत उस्मान (रज़ि.) भी शामिल थे और उनको इस मजलिस में एक ऊँचा मक़ाम हासिल था।

ख़लीफ़ा हो गए

हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) जब इस दुनिया रुखसत होने लगे तो लोगों ने अर्ज़ किया कि आप (रजि.) अपनी जगह ख़लीफ़ा मुक़र्रर कर दीजिए। आप (रज़ि.) ने ख़लीफ़ा बनाने से इनकार कर दिया और फ़रमाया "मैंने इस मामले में बहुत ग़ौर किया लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सका हूँ। अब तो ये छः लोग इसके हक़दार हैं इन ही में से जिसके बारे में सब की राय हो उसे अपना ख़लीफ़ा चुन लेना। खलीफ़ा चुनने में तीन दिन से ज़्यादा की देर नहीं होनी चाहिए।" वे छः नाम ये हैं

हज़रत अली (रज़ि.) उस्मान (रज़ि.), ज़ुबैर (रज़ि.), तलहा (रज़ि.), साद-बिन-अबी-वकास (रज़ि.) और हज़रत अब्दुर्रहमान-बिन-औफ़ (रज़ि.)

अतः हज़रत उमर (रज़ि.) को दफ़न करने के बाद ये छः लोग इकट्ठा हुए और उन सबने हज़रत अब्दुर्रहमान-बिन-औफ़ (रज़ि.) को इस चुनाव का ज़िम्मेदार बना दिया। इस ज़िम्मेदारी को पूरा करने में हज़रत अब्दुर्रहमान-बिन-औफ़ (रज़ि.) ने बड़ी मेहनत और दौड़-धूप से काम लिया। हज का मौसम था। हज से फ़ारिग़ होकर लोग मदीना में आए हुए थे। मदीना के अलावा दूसरी जगहों के मुसलमान भी बहुत ज़्यादा तादाद में जमा हो गए। हज़रत अब्दुर्रहमान (रज़ि.) ख़ामोशी के साथ एक-एक से मिलते और उसकी राय मालूम करते रहे।

तीन दिन पूरे होने के बाद आप (रज़ि.) ने तमाम सहाबा (रज़ि.) को मसजिद में जमा किया। कुछ बातें फ़रमाकर सबसे पहले खुद अब्दुर्रहमान-बिन-औफ़ (रज़ि.) ने हज़रत उस्मान (रज़ि.) के हाथ पर बैअत की, फिर हज़रत अली (रज़ि.) ने। इसके बाद बैअत का सिलसिला जारी हो गया। इस तरह हज़रत उस्मान (रज़ि.) मुसलमानों के ख़लीफ़ा चुन लिए गए।

यह बात चार मुहर्रम सन् चौबीस हिजरी सोमवार के दिन की है।

खुतबा दिया

खलीफ़ा बनने के बाद हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने लोगों को इकट्ठा किया और खुतबा दिया –

“भाइयो! यह दुनिया, जहाँ तुम ठहरे हुए हो और अपनी ज़िन्दगी के दिन पूरे कर रहे हो, ख़त्म हो जानेवाली है। इसलिए नेकी और भलाई के जितने काम हो सकें उनको अंजाम देते हुए मौत की तरफ़ बढ़ो। तुम इस दुनिया के रंग-ढंग और तौर तरीके देख चुके हो। याद रखो! धोखा देना दुनिया की आदत है। होशियार रहो! ज़िन्दगी तुम्हें धोखे में न डाल दे और वह मक्कार शैतान तुमको बहलाकर ग़लत रास्ते पर न लगा दे। जो लोग दुनिया से चले गए हैं उनसे इबरत (सबक़) हासिल करो। नेकी के कामों में लगे रहो। क्योंकि अल्लाह तुम्हारी तरफ़ से ग़ाफ़िल नहीं है। कहाँ हैं वे दुनियावाले जिन्होंने दुनिया को पसन्द किया, आबाद किया और सालों उससे फ़ायदा उठाया, क्या दुनिया ने उनको निकाल नहीं फेंका? क्या वे यहाँ से खाली हाथ नहीं गए? इस दुनिया को उसी तरह छोड़ देने के लिए तैयार रहो जिस तरह अल्लाह ने उसके बारे में फ़रमाया है और आख़िरत के चाहनेवाले बन जाओ।"

कितनी प्यारी बातें उस्मान (रज़ि.) ने फ़रमाईं। लोग ख़ामोश बैठे सुनते रहे। एक-एक लफ़्ज़ उनके दिलों में उतर रहा था।

पहला मुक़द्दमा

खलीफ़ा बनते ही हज़रत उस्मान (रज़ि.) के सामने पहला मुक़द्दमा हज़रत अब्दुल्लाह-बिन उमर-फ़ारूक़ (रज़ि.) का पेश हुआ। इसकी रूदाद यह है –

हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) की शहादत से कुछ दिन पहले उनका क़ातिल अबू-लूलू, नव-मुस्लिम ईरानी सरदार हुरमुज़ान और एक ईसाई गुलाम जफ़ीना एक जगह बैठे हुए मशवरा कर रहे थे। उधर से हज़रत अब्दुर्रहमान-बिन-अबू-बक्र (रज़ि.) का गुज़र हुआ। उनको देखते ही अबू-लूलू उठकर चल दिया। उठते वक्त एक खंजर, जो वह लिए हुए था उसके हाथ से गिर गया। उसे गिरते और उठाते हुए भी हज़रत अब्दुरहमान (रज़ि) ने देखा था। बात आई गई हो गई। लेकिन जब अबू-लूलू ने हज़रत उमर (रज़ि.) को जख्मी किया और वह पकड़कर मार दिया गया तो उसके पास से जो खंजर निकला उसको हज़रत अब्दुर्रहमान (रज़ि) ने पहचान लिया कि यह वही खंजर है।

उन्होंने इस बात का ज़िक्र अपने भाई हज़रत उबैदुल्लाह-बिन-उमर (रज़ि.) से किया। वे पहलवान तो थे ही, उनको गुस्सा आ गया। बदला लेने के जोश में उठे और जाकर हुरमुज़ान को क़त्ल कर दिया। हज़रत साद-बिन-अबी-वकास (रजि.) ने जो यह घटना देख रहे थे, दौड़े और उबैदुल्लाह-बिन-उमर (रज़ि.) को क़ैद कर लिया। जब यह मुक़द्दमा हज़रत उस्मान (रज़ि.) के सामने पेश हुआ, तो आप (रज़ि.) ने हुरमज़ान के क़त्ल के बारे में सवाल किया। उन्होंने इक़रार कर लिया। इसपर हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने सहाबा (रज़ि.) मशवरा किया। हज़रत अली (रज़ि.) ने से फ़रमाया कि अब्दुल्लाह-बिन-उमर (रज़ि.) को हुरमज़ान के क़िसास (क़ल्ल के बदले क़त्ल) में क़त्ल कर देना चाहिए हज़रत अम्र-बिन-आस (रज़ि.) ने इस राय से इखतिलाफ़ किया और कहा, "अभी कल की बात है, बाप शहीद किया गया है। आज उसका बेटा क़त्ल कर दिया जाए। इससे आम लोगों में बेचैनी पैदा हो जाएगी।" लोगों ने हज़रत अम्र-बिन-आस (रज़ि.) की बात की ताईद की।

हज़रत उस्मान (ज़ि) ने थोड़ी देर सोच-विचार किया। फिर फ़रमाया, "यह घटना मेरे ख़लीफ़ा होने से पहले की है इसलिए इसकी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर नहीं आती।" फिर आप (रज़ि.) ने यह तरकीब कि खुद उबैदुल्लाह-बिन-उमर (रज़ि.) के वली बन गए और उनकी तरफ़ से हुरमुज़ान के क़त्ल का मुआवज़ा अदा कर दिया। इस फैसले से सब खुश हो गए- और हज़रत उबैदुल्लाह-बिन-उमर (रज़ि.) की जान बच गई।

ईरानी बग़ावत

हज़रत उमर (रज़ि.) की शहादत की खबर फैलते ही कुछ देशों में बग़ावत की लहर दौड़ गई। ईरान का बादशाह यज्देगर्द, जिसको ईरान से निकाल दिया गया था, अभी ज़िन्दा था। उसने मौक़ा ग़नीमत जानकर साज़िशें करनी शुरू कर दीं। ईरानी लोगों ने उसका साथ दिया। हज़रत उस्मान (रज़ि.) भी इससे ग़ाफ़िल न थे। उन्होंने ईरानियों को बग़ावत का मज़ा चखाने के लिए फ़ौरन एक फ़ौज भेजी।

ईरानियों और मुसलमानों से जगह-जगह मुक़ाबले हुए मगर हर जगह ईरानियों को मुँह की खानी पड़ी और वे मैदान छोड़कर भाग गए। उनका सिर कुचलने के लिए इस्लामी लश्कर मुल्क के अन्दर घुसता चला गया और उन इलाक़ों पर भी क़ब्ज़ा कर लिया जो पहले आज़ाद थे। ईरानियों ने हार मान ली और मुसलमानों से दोबारा सुलह कर ली। ईरान पर इस दोबारा फ़तह से इस्लामी सल्तनत बहुत ज़्यादा बढ़ गई। एक तरफ़ बल़ और तुर्किस्तान में इस्लामी झण्डा लहराने लगा और दूसरी तरफ़ हरात, काबुल और ग़ज़नी तक के बादशाहों ने इताअत क़बूल कर ली। खुरासान का ज़्यादातर हिस्सा नीशापुर, तौस, मरु वग़ैरा धीरे-धीरे इस्लामी हुकूमत में शामिल हो गए।

कुछ दिनों बाद यज्दगर्द भी दुनिया से चल बसा।

रूमवालों की बग़ावत

क़ैसरे-रुम (रूमी बादशाह) ने भी छेड़-छाड़ शुरू कर दी। सबसे पहले एशिया-ए-कोचक की तरफ़ से शाम (सीरिया) देश पर हमला कर दिया। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने यह ख़बर सुनते ही मदद के लिए एक फ़ौज हज़रत मुआविया (रज़ि.) को भेज दी। जिसने शाम पहुँचकर रूमियों के दाँत खट्टे कर दिए। इस्लामी फ़ौज एशियाए कोचक में दाखिल हो गई और फ़तह का झण्डा लहराती हुई आरमीनिया से तबरिस्तान तक पहुँच गई- अफ़्रीक़ा के इलाकों में भी कैसरे-रूम ने साज़िश का जाल बिछा रखा था। वहाँ का हाकिम ज़ुरजैर था। जो बहुत बहादुर था। वहाँ रूमियों से बहुत कड़ा मुक़ाबला हुआ। यह लड़ाई चालीस दिन तक चलती रही। ज़ुरजैर ने अपनी फ़ौज में यह एलान करा दिया कि जो फ़ौजी मुसलमानों के सरदार अब्दुल्लाह-बिन-साद का सिर लाएगा उसको एक लाख अशरफ़ियाँ और जुरजैर की लड़की दे दी जाएगी इस एलान से रूमियों में जोश बढ़ गया।

हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-जुबैर (रज़ि.) ने मशवरा दिया कि ऐसा ही एलान मुसलमानों की तरफ़ से भी करा दिया जाए। इधर से एलान होते ही जंग में तेज़ी आ गई। आखिरकार हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-ज़ुबैर (रज़ि) ही ने आगे बढ़कर जुरजैर को क़त्ल कर दिया। उसका मरना था कि रूमी फ़ौज की हिम्मत टूट गई और वह मैदान से भाग खड़ी हुई। मुसलमानों की जीत हुई। एलान के मुताबिक़ हज़रत अब्दुल्लाह (रज़ि.) को एक लाख अशरफ़ियाँ और जुरजैर की लड़की दे दी गई। इस तरह तराबुलस के इलाक़े पर भी मुसलमानों का क़ब्जा हो गया।

कुछ अहम वाक़िआत

हज़रत उस्मान (रज़ि.) की ख़िलाफ़त के दौरान कुछ वाक़िआत ऐसे हो गए जो आगे चलकर फ़ितना और फ़साद का सबब बने। हालाँकि हक़ीक़त में उनका इलज़ाम हज़रत उस्मान (रज़ि.) पर बिल्कुल नहीं आता।

पहला वाक़िआ- हज़रत उमर (रज़ि.) की वसीयत के मुताबिक़ हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने हज़रत साद-इब्ने-अबी-वक़्क़ास (रज़ि.) को कूफ़ा का गवर्नर बना दिया था। उस वक़्त बैतुलमाल का इन्तिज़ाम हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-मसऊद (रज़ि.) के पास था। एक बार हज़रत साद (रज़ि.) को किसी ख़ास ज़रूरत के लिए बैतुलमाल से एक बड़ी रक़म क़र्ज़ के तौर पर लेना पड़ी। कुछ अर्से बाद हज़रत अब्दुल्लाह (रज़ि.) ने इस रकम की वापसी का मुतालबा किया। जिसपर दोनों में कुछ कहा-सुनी हो गई यहाँ तक कि झगड़े की नौबत आ गई। इसका असर यह हुआ कि कूफ़ावाले कुछ लोग हज़रत साद (रज़ि.) की तरफ़ और कुछ हज़रत अब्दुल्लाह (रज़ि.) की तरफ़ हो गए।

यह मामला हज़रत उस्मान (रज़ि.) के सामने पेश हुआ। आप (रज़ि.) इस बे उसूले पन की वजह से हज़रत साद (रज़ि.) पर बहुत नाराज़ हुए और गवर्नर के पद से उनको हटा दिया। उनकी जगह पर हज़रत वलीद-बिन-उक़बा (रज़ि.) को गवर्नर बना दिया। उनका ताल्लुक़-बनी-उमय्या के खानदान से था।

यह घटना सन् 25 हिजरी की है।

दूसरा वाक़िआ- हज़रत अम्र-बिन-आस (रज़ि.) हज़रत उमर (रज़ि.) के ज़माने से मिस्र के गवर्नर चले आ रहे थे। मिस्र वालों को सिंचाई करने की जो सुहूलतें दी गई थीं उनको देखते हुए वे ख़िराज की रक़म बहुत कम अदा करते थे।

यह हज़रत उमर (रज़ि.) को शिकायत थी। हज़रत उस्मान (रज़ि.) जब खलीफ़ा हुए तो उन्होंने भी ख्रिराज की रक़म बढ़ाने का मुतालबा किया लेकिन हज़रत अम्र-बिन-आस (रज़ि.) ने जवाब दिया कि "ऊँटनी इससे ज़्यादा दूध नहीं दे सकती।" हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने गवर्नरी के दो हिस्से कर दिए। फ़ौज का इन्तिज़ाम तो हज़रत अम्र-बिन-आस (रज़ि.) के पास रहने दिया। बैतुलमाल और दूसरे इन्तिज़ामों की देखभाल हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अबी-सरह (रज़ि.) के ज़िम्मे कर दी ।

इस तब्दीली से ख़िराज की रक़म पहले से दोगुनी हो गई। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने हज़रत अम-बिन-आस (रज़ि.) से फ़ख़ के अन्दाज़ में फ़रमाया, "देखो! आख़िर उसी ऊँटनी ने ज़्यादा दूध दे दिया ना- !" उन्होंने जवाब दिया, "दूध तो दिया मगर बच्चे भूखे रह गए।"

इस तरह यह नज्म चला तो, मगर कुछ दिनों के बाद दोनों ज़िम्मेदारों को एक दूसरे से कुछ शिकायतें पैदा हो गई। यह इख़तिलाफ़ इतना बढ़ा कि मामला हज़रत उस्मान (रज़ि.) के सामने पेश हुआ। आप (रज़ि.) ने इस मामले की छान-बीन की। ग़लती हज़रत अम्र-बिन-आस (रज़ि.) की साबित हुई। आपने उनको गवर्नर के पद से अलग कर दिया और अब्दुल्लाह-बिन-अबी-सरह (रज़ि.) के ज़िम्मे दोनों काम कर दिए। हज़रत अब्दुल्लाह (रज़ि.) हज़रत उस्मान (रज़ि.) के रजाई (दूध शरीक) भाई थे।

यह घटना सन् 26 हिजरी की है।

तीसरा वाक़िआ : बसरा के गवर्नर हज़रत अबू-मूसा अशअरी (रज़ि.) से वहाँ के आम लोग खुश न थे। उन्होंने कई बार उस समय के ख़लीफ़ा हज़रत उमर (रज़ि.) तक उनकी शिकायत पहुँचाई मगर हज़रत उमर (रज़ि.) के रोब-दाब से मामला दब जाता था। जब हज़रत उस्मान (रज़ि.) ख़लीफ़ा हुए तो उनकी नर्म पालिसी की वजह से उन्होंने खुल्लम खुल्ला हज़रत अबू-मूसा-अशअरी (रजि.) की मुख़ालफ़त शुरू कर दी।

इत्तिफ़ाक़ की बात कि उसी ज़माने में कुर्दो ने बग़ावत कर दी। अबू-मूसा (रज़ि.) ने मसजिद में जिहाद पर तक़रीर की और पैदल जाने की बड़ी फ़ज़ीलत बयान फ़रमाई। लोग इससे बहुत प्रभावित हुए और बहुत से लोग सवारी रखने के बावजूद पैदल जाने पर तैयार हो गए। लेकिन जब चलने का वक़्त आया तो हज़रत अबू-मूसा-अशअरी (रज़ि.) इस शान से निकले कि बेहतरीन तुर्की नस्ल के घोड़े पर सवार थे और उनका सामान चालीस खच्चरों पर लदा हुआ था। यह देखकर कुछ लोग आगे बढ़े और घोड़े की लगाम पकड़कर कहने लगे, "क़ौल व अमल में यह फ़र्क क्यों? दूसरों को जिस बात पर उभारते और तरगीब दिलाते हो उसपर खुद अमल क्यों नहीं करते ?" हज़रत-मूसा (रज़ि.) कोई तसल्ली बख्श जवाब न दे सके।

समुन्दरी लड़ाइयाँ

क़बरस, जिसको आजकल सायपर्स कहते हैं, बहरे-रूम (समुद्र का नाम) में शाम देश के पास एक बहुत उपजाऊ जज़ीरा (प्रायद्वीप) है। यूरोप और रूम की तरफ़ से इस जज़ीरे से होकर मिस्र और शाम पर आसानी से हमला हो सकता था। यह रूम के बादशाह के असर में था। इससे ज़ि.) से समुन्दरी लड़ाई की इजाज़त माँगी। मगर उनकी दरखास्त मंजूर नहीं की गई थी।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) के सामने भी यह दरखास्त पेश की गई। आप (रज़ि.) ने इस शर्त के साथ उसे मंजूर कर लिया कि इस मुहिम में उसी को शामिल किया जाए जो अपनी खुशी से आए किसी के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती न की जाए।

मुसलमानों का बहरी बेड़ा (समुद्री जहाज़) बड़ी शान व शौकत के साथ आगे बढ़ा। उस वक़्त सिर्फ़ रुम के बादशाह ही के पास बहरी फ़ौज (जल सेना) थी। रूमियों से लगभ पचास लड़ाइयाँ हुई। हर एक में रूमियों को मुँह की खानी पड़ी। इस तरह सिर्फ़ क़बरस ही नहीं बल्कि वे तमाम जज़ीरे जो रूम के बादशाह के क़ब्जे या असर में थे सब पर मुसलमानों का क़ब्जा हो गया। और रूम का बादशाह हिम्मत हार गया।

ये लड़ाइयाँ सन् 31 हिजरी तक होती रहीं।

दूसरी जंगों में फ़तह

हज़रत उस्मान (रज़ि.) की ख़िलाफ़त के ज़माने में इस्लामी हुकूमत बहुत दूर-दूर तक फैल गई थी। कबरस, तराबुलस और तब्रिस्तान के अलावा और भी बहुत से मुल्क जीत लिए गए।

सन् 31 हिजरी में हज़रत हबीब-बिन-मुस्लिमा-फुहरी (रज़ि.) ने आरमीनिया को फ़तह करके इस्लामी सल्तनत में उसे शामिल कर लिया।

सन 32 हिजरी में अमीर मुआविया (रज़ि.) तंगनाए कुस्तुन्तुनिया तक बढ़ते चले गए। इसी साल अब्दुल्लाह-इब्ने-आमिर (रज़ि.) ने मरुरूद, तालक़ान, फ़ारयाब और जौज़जान को फ़तह किया।

सन् 33 हिजरी में अमीर मुआविया (रज़ि.) ने रूम के हसनुल-मरात पर हमला किया और उसी साल खुरासान के बागियों को मुँहतोड़ जवाब देकर उनकी कमर तोड़ दी गई और उनको अपनी इताअत क़बूल करने पर मजबूर कर दिया गया।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) की ख़िलाफ़त के ज़माने में ही रूम का बादशाह मारा गया और ईरानी बादशाह यज्दगर्द भी दुनिया से चल बसा। इस तरह इन दोनों की शरारतों की वजह से थोड़े-थोड़े दिनों के बाद इस्लामी हुकूमत में जो गड़बड़ी मचती रहती थी और जिससे पूरी सल्तनत में एक हलचल सरी मच जाती थी, वह सूरत ख़त्म हो गई। लोग अमन-चैन से रहने लगे।

ख़िलाफ़त ख़ातिमे की तरफ़

हज़रत उस्मान (रज़ि.) की बारह साल की ख़िलाफ़त में शुरू के छः साल बहुत अमन और सुकून से गुज़रे। हर जगह जीत पर जीत हासिल हुई। इस्लामी हुकूमत दूर-दूर तक फैल गई। माल-दौलत की बहुत ज़्यादती हो गई। दौलतमन्दी और अमीरी की वजह से मुसलमानों में भी वही खराबियाँ और बुराइयाँ पैदा होनी शुरू हो गई जो ऐसी हालत में दूसरी क़ौमों और लोगों में हुआ करती हैं। मेहनत की जगह ऐश पसन्दी और काहिली आ गई। हर आदमी पूरी क़ौम के मुक़ाबले में अपने ज़ाती फ़ायदे को अहमियत देने लगा। जिसकी वजह से लोगों में खुदग़ज़ी पैदा हुई। इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों में एक दूसरे से नफ़रत और दुश्मनी के जज़बात उभरे। मुसलमानों में आपस में जो एकता थी वह खत्म होने लगी। सबके सब बिखर गए। इसीलिए प्यारे नबी (सल्ल.) मुसलमानों से फ़रमाया करते थे –

"मुझे तुम्हारे फ़क़्र (ग़रीबी) से डर नहीं महसूस होता बल्कि तुम्हारी दुनिया की दौलत के ख़तरों से डरता हूँ।"

फ़ितना और फ़साद

ख़िलाफ़त का आख़िरी ज़माना हज़रत उस्मान (रज़ि.) के लिए बहुत तकलीफ़ देनेवाला और आज़माइश का दौर था। इसके कारण ये थे।

  1. सहाबा (रज़ि.) की वह नस्ल जिसने प्यारे रसूल (सल्ल.) से तरबियत हासिल कि थी, ख़त्म हो चुकी थी। जो बाक़ी थे वे अपने बुढ़ापे की वजह से एक तरफ़ कोने में बैठ गए थे। नई नस्ल वैसी न थी। ईमानदारी, अद्ल व इनसाफ़ और सच्चाई में वे लोग बहुत कम दर्जे के थे।
  2. हुकूमत बहुत फैल चुकी थी, जिसमें सैकड़ों क़ौमें आबाद थीं। उनके दिलों में मुसलमानों के खिलाफ़ नफ़रत और बदला लेने के जज़बात पाए जाते थे।
  1. हज़रत उस्मान (रज़ि.) क़ुदरती तौर पर बहुत नेक, माफ़ करनेवाले और नर्म मिज़ाज के थे। किसी के साथ सख्ती का बरताव नहीं करते थे। इस आदत की वजह से बदमाश लोगों के हौसले बढ़ गए।
  2. आप (रज़ि.) अपने खानदानवालों का बहुत ख़याल रखते थे। अपनी जाती दौलत से उनकी मदद करते थे। शरारती लोगों ने मशहूर कर दिया कि यह सब सरकारी बैतुलमाल की दौलत है।
  3. नई नस्ल में इमाम की इताअत का वह जज़बा न था जो अगलों में पाया जाता था।
  4. दूसरी क़ौमों के लोग जो मुसलमान हो गए थे उनकी सही तरबियत न हो सकी थी। बाद में यही लोग फ़ितना और फ़साद का कारण बने।

बाहरी अस्बाब

फ़ितना और फ़साद के उन अस्वाब पर भी एक नज़र डाल लीजिए जो गैरों ने पैदा किए और जिनकी वजह से हज़रत उस्मान (रज़ि.) को तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा।

  1. क़बाइली दुश्मनी, यानी बनू-हाशिम को बनू-उमय्या की यह तरक़्क़ी और उरूज किसी तरह पसन्द न था। खिलाफ़त और ओहदों का हक़दार वे अपने आपको समझते थे।
  2. इसी तरह अरब के दूसरे क़बीले भी उन ओहदों का हक़दार अपने आप को क़ुरैशियों से कम नहीं समझते थे और क़ुरैशी अफ़सरों के फ़न और उनकी बड़ाई को ख़त्म करना चाहते थे।
  3. मजूसी (आग की पूजा करनेवाले) यह चाहते थे कि ख़िलाफ़त ऐसे ख़ानदान में चली जाए जिसके ज़रीए से उनको ज़्यादा से ज़्यादा अधिकार और सुहूलतें हासिल हो सकें।
  4. यहूदी यह चाहते थे कि किसी न किसी तरह मुसलमानों में आपसी फूट पड़ जाए ताकि इनकी सल्तनत और ताक़त चूर-चूर हो जाए।

अपने इन इरादों को पूरा करने के लिए ये सब लोग पूरी इस्लामी हुकूमत में साजिशों का जाल बिछा रहे थे और गड़बड़ी फैला रहे थे।

सबसे बड़ा फ़सादी

हज़रत उस्मान (रज़ि.) के ज़माने में जो फ़साद बरपा हुआ उसकी बुनियाद अब्दुल्लाह-बिन-सबा ने डाली थी। यह एक यमनी यहूदी था। इसकी माँ हबशी थी। इसी लिए इसे इब्नुस्सौदा (काली का बेटा) भी कहते थे। खिलाफ़त के आठवें साल यह बसरा के गवर्नर हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-आमिर (रज़ि.) के पास पहुँचा और मुसलमान हो गया। हक़ीक़त यह है कि इस्लाम क़बूल करना तो सिर्फ एक बहाना था। वह मुसलमान बनकर इस्लामी ख़िलाफ़त को बरबाद करना चाहता था।

शुरू में उसने हज़रत उस्मान (रज़ि.) के गवर्नरों को बदनाम करना शुरू किया। सबसे पहले उसे बसरा से निकाला गया तो वह कूफ़ा चला गया। कूफ़ा से शाम होता हुआ मिस्र पहुँच गया। मिस्र को उसने अपना मर्कज़ (केन्द्र) बना लिया। जहाँ-जहाँ वह गया वहाँ अपनी चालबाज़ी और मक्कारी से अपने साथी बनाकर छोड़ता गया, जो फ़ितना और फ़साद को बराबर हवा देते रहे।

मिस्र पहुँचकर तो उसने हज़रत उस्मान (रज़ि.) और उनके सरदारों की मुखालिफ़त खुल्लम खुल्ला शुरू कर दी। बल्कि उसे मज़हबी रंग दे दिया। उसने यह झूठी बात फैलाना शुरू की कि प्यारे नबी (सल्ल.) के असूल जानशीन तो हज़रत अली (रज़ि.) हैं। बाक़ी जो हुए वे सब ज़बरदस्ती के थे। उसने और उसके गुर्गों ने यह ग़लत फ़हमी खूब-खूब फैलाई। बसरा, कूफ़ा और मिस्र में उसका बहुत ज़ोर था। बहुत से लोग उसके धोखे में आ गए।

सबसे बड़ा फ़ितना

आप जानते ही हैं कि हज़रत अबू-बक्र (रज़ि.) ने अपनी ख़िलाफ़त के ज़माने में क़ुरआन मजीद को एक जिल्द में जमा करा दिया था लेकिन उसकी इशाअत और आम करने का काम न वह कर सके और न हज़रत उमर (रज़ि.)। अब भी क़ुरआन मजीद के पढ़ने का ढंग अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग था। इससे यह ख़तरा था कि क़ुरआन मजीद में कोई कमी या ज़्यादती न हो जाए।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने इस कमी को गम्भीरता से महसूस किया। आप (रज़ि.) ने बड़े-बड़े सहाबा (रज़ि.) को बुलाकर मशवरा किया। सबकी यह राय हुई कि क़ुरआन मजीद का जो नुस्खा (प्रति) हज़रत अबू-बक्र (रज़ि.) ने मुरत्तब कराया था और जो हज़रत हफ़सा (रज़ि.) के पास मौजूद था, उसकी नक़लें करा ली जाएँ और तमाम गवर्नरों को भेज दिया जाए ताकि वे उसी के मुताबिक़ लोगों को नक़्ल करा दें और पहले के नुस्खे जो उनके पास हैं और मशकूक (संदिग्ध) हैं, उनको जलवा दिया जाए।

तमाम सहाबा (रज़ि.) के मशवरे के मुताबिक़ जब तजवीज़ पर अमल किया गया तो इब्ने-सबा और उसके गुर्गों को हज़रत उस्मान (रज़ि.) और उनके गवर्नरों के खिलाफ़ ग़लतफ़हमियाँ फैलाने का और मौक़ा मिल गया। अवाम को यह कहकर वरगलाया गया कि हज़रत उस्मान (रज़ि.) और उनके गवर्नरों ने क़ुरआन पाक को जलवाकर उसकी बेहुरमती की है। आम लोग बेचारे असल हालात और वाक़िआत से वाक़िफ़ न थे। इसलिए उनके दिलों में हज़रत उस्मान (रज़ि.) के खिलाफ़ बुरे-बुरे ख़यालात पैदा होने लगे।

साज़िशों का जाल

अब्दुल्लाह-बिन-सबा और उसके साथी सारी सल्तनत में फैल गए थे। उनकी साज़िशों का मर्कज़ मिस्र था। जहाँ खुद इने-सबा रहता था। उनका सबसे बड़ा मक़सद यह था कि हज़रत उस्मान (रज़ि.) को और उनके गवर्नरों को आम लोगों में बदनाम किया जाए आम लोग असल हालात से वाक़िफ़ न होने की वजह से उनके जाल में फँस जाते थे और उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगते थे। फिर उन्होंने यह तरीक़ा अपनाया कि गवर्नरों के ख़िलाफ़ ज़ुल्म और ज़्यादती की झूठी शिकायतें लिख-लिखकर ख़लीफ़ा के दरबार में भेजने लगे।

जब शिकायतों का एक चट्टा लग गया तो हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने सहाबा (रज़ि.) से मशवरा किया कि क्या करना चाहिए? सबकी राय यह हुई कि इन शिकायतों की सच्चाई का पता लगाया जाए इस काम के लिए हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-उमर (रज़ि.), उसामा-बिन-ज़ैद (रज़ि.), मुहम्मद-बिन-मुस्लिम (रज़ि.) और अम्मार-बिन-यासिर (रज़ि.) मुक़र्रर किए गए।

उन्होंने जाकर पूरी तरह तहक़ीक़ात की तो ज़ुल्म और अत्याचार की ये सारी दास्तानें सरासर झूठ साबित हुई। उन्होंने वापस आकर हज़रत उस्मान (रज़ि.) को रिपोर्ट दे दी। सिर्फ़ हज़रत अम्मार-बिन-यासिर (रज़ि.) मिस्र से वापस न आए। शिकायतों का यह सिलसिला बराबर जारी रहा।

फ़साद मिटाने की पहली कोशिश

फ़सादियों की शरारतें बराबर जारी थीं। उनको ख़त्म करने के लिए हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने एक तरकीब सोची। आप (रज़ि.) ने एलान करा दिया कि आनेवाले हज के मौक़े पर तमाम गवर्नर मदीना में जमा हों। उनके ख़िलाफ़ जिसको भी कोई शिकायत हो वह उस मौक़े पर आए और उनके सामने अपनी शिकायत बयान करे, वहीं उसका फ़ैसला कर दिया जाएगा।

हज का ज़माना आया तमाम गवर्नर मदीना में जमा हो गए, मगर शिकायत करनेवाला कोई भी न आया। हक़ीक़त यह थी कि किसी को कोई शिकायत होती तो आता। वहाँ तो सब शिकायतें, झूठी और बनावटी थीं। किसी के साथ कोई ना इनसाफ़ी नहीं हुई थी।

आख़िर में हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने गवर्नरों और दूसरे सहाबा (रज़ि.) से मशवरा किया कि इन मनसूबाबन्द (योजनाबद्ध) साज़िशों से किस तरह निपटा जाए। सबने यही राय दी कि साज़िश के सरग़नों के नाम तो मालूम ही हैं, उनको गिरफ्तार करके सख़्त से सख़्त सज़ा दी जाए तो यह सारा फ़ितना व फ़साद ख़त्म हो जाएगा। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने अपनी रहमदिली की वजह से इस मशवरे को पसन्द न किया और फ़रमाया-

"मैं मुसलमानों का खून-खराबा पसन्द नहीं करता।"

इस तरह यह बैठक भी बे नतीजा होकर रह गई।

फ़सादियों की नई स्कीम

हज़रत उस्मान (रज़ि.) का यह एलान सुनकर फ़सादियों के सरग़ने सिर जोड़कर बैठ गए और एक नई स्कीम तैयार की। उन्होंने तय किया कि जब सारे गवर्नर मदीना चले जाएँ तो उनकी ग़ैर मौजूदगी से फ़ायदा उठाकर हर सूबे से लोग जमा किए जाएँ और फिर सब एक साथ मदीना को रवाना हों। वहाँ पहुँचकर हज़रत उस्मान (रज़ि.) से मुतालबा किया जाए कि वे तमाम गवर्नरों को बरतरफ़ (अलग) कर दें। अगर वे इसके लिए राज़ी न हों तो उनसे ख़िलाफ़त छोड़ देने के लिए कहा जाए और अगर वे इसपर भी तैयार न हों तो फिर तलवार के ज़रीए फ़ैसला कराया जाए।

इस नई स्कीम पर अमल करने में उम्मीद के ख़िलाफ़ बहुत वक़्त लग गया। ये लोग अभी रवाना भी न हुए थे कि तमाम गवर्नर अपने-अपने सूबों में वापस आ गए। मौक़ा हाथ से निकल गया। सबके सब तितर-बितर हो गए। स्कीम धरी की धरी रह गई। सब एक दूसरे का मुँह तकते रह गए।

यह घटना सन् 34 हिजरी की है।

 फिर नाकामी

पिछले साल फ़सादी अपने मंसूबे में नाकाम हो चुके थे। इसलिए इस साल यानी सन् 35 हिजरी के शव्वाल महीने ही में उन्होंने अपनी तजवीज़ पर अमल शुरू कर दिया। हज के बहाने से मुख़्तलिफ़ क़ाफ़िले बसरा, कूफ़ा और मिस्र से एक ही वक़्त में रवाना हुए और मदीना से कुछ दूरी पर अलग-अलग ठहरे।

जब हज़रत उस्मान (रज़ि.) को यह खबर मिली तो आपने एक रोज़ नमाज़ के बाद लोगों से ख़िताब किया। आप (रज़ि.) ने फ़रमाया, "ये लोग मेरा ख़ातिमा करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि अगर वे ऐसा करेंगे तो मुसलमानों में बदले की ऐसी आग भड़क उठेगी जो क़ाबू से बाहर हो जाएगी और फिर बाद में ये खुद अपनी इस हरकत पर पछताएंगे।" यह सुनकर मदीनावालों ने आपका साथ देने का वादा किया और फ़सादियों से निपटने के लिए तैयारियाँ करने लगे।

फ़सादियों ने जब यह सूरते-हाल देखी तो उनके हाथों के तोते उड़ गए। उन्होंने सोचा था कि मदीनावाले भी उनका साथ देंगे और उनकी मदद से वे मदीना में दाखिल हो जाएंगे। यहाँ तो पाँसा ही पलट गया। अब तो मदीनावाले उनसे मुक़ाबला करने के लिए तैयार थे। फ़सादी शहर के अन्दर घुसने की हिम्मत न कर सके और अपना सा मुँह लेकर रह गए।

धुतकार दिए गए

फ़सादियों के सरग़ने सूरते-हाल पर ग़ौर करने के लिए एक बार फिर सिर जोड़कर बैठे। ख़लीफ़ा बनाने के मामले में उनमें आपस में फूट पड़ गई। मिस्रवाले हज़रत अली (रज़ि.) को ख़लीफ़ा बनाना चाहते थे। बसरावाले हज़रत तलहा (रज़ि.) को और कूफ़ावाले हज़रत ज़ुबैर (रज़ि.) को पसन्द करते थे। बहुत सोच विचार के बाद यह तय हुआ कि सरग़नों का एक दल पहले जाकर इन हज़रात से मुलाक़ात और बात चीत कर ले।

यह दल सबसे पहले अल्लाह के नबी (सल्ल.) की पाक बीवियों (रज़ि.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और कहा, "हमारे आने का मक़सद सिर्फ़ यह है कि हम ख़लीफ़ा के सामने गवर्नरों की शिकायत पेश करके उनको बदलने की दरखास्त करें।" पाक बीवियों को इनकी नीयत पर शक हुआ। उन्होंने कोरा जवाब दे दिया।

उनसे नाउम्मीद होकर वे लोग बारी-बारी हज़रत अली (रज़ि.) हज़रत जुबैर (रजि.) और हज़रत तलहा (रज़ि.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए। अपने आने की ग़रज़ बयान की। सबकी तरफ़ से उनको एक ही जवाब मिला कि, "यह बात किस तरह मान ली जाए कि इतने से काम के लिए तीनों अलग-अलग जगहों से एक वक़्त में इतने लोग आ जाएँ। यक़ीनन इसमें कोई साज़िश है।" हज़रत अली (रज़ि.) ने तो उनको धुतकार ही दिया। यह दल मुँह लटकाए हुए वापस लौट गया।

बला टल गई

इधर हज़रत उस्मान (रज़ि.) इन हालात को देख-देखकर दिल ही दिल में कुढ़ रहे थे। वे फ़ितना और फ़साद को बिलकुल पसन्द नहीं करते थे। वे यह नहीं चाहते थे कि उनकी वजह से मुसलमानों में खून-खराबा हो। आप (रज़ि.) ने हज़रत अली (रज़ि.) को बुलाया और उनसे फ़रमाया, "आप इन फ़सादियों की शिकायतें सुन लें और उन्हें इत्मीनान दिला दें कि अगर उनकी शिकायतें सही हुई तो उनपर हमदर्दी से ग़ौर किया जाएगा? और उन्हें दूर करने की पूरी-पूरी कोशिश की जाएगी।"

बदलते हुए हालात को देखकर फ़सादी भी बद् दिल हो रहे थे और उनमें से कुछ अपनी हरकतों पर शर्मिन्दा भी थे। जब हज़रत अली (रज़ि.) ने उनसे मुलाक़ात की तो उन्होंने अपना सिर्फ एक मुतालबा पेश किया कि मिस्र के गवर्नर हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अबी-सरह (रज़ि.) को हटाकर उसकी जगह मुहम्मद-बिन-अबू-बक्र (रज़ि.) को गवर्नर बना दिया जाए।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) के सामने जब यह मुतालबा पेश किया गया तो आप (रजि.) ने उसे मंजूर फ़रमा लिया और उसी वक़्त अब्दुल्लाह (रज़ि.) की बरतरफ़ी और मुहम्मद-बिन-अबू-बक्र (रज़ि.) की तक़रीर का फ़रमान लिखकर हज़रत अली (रज़ि.) के हवाले कर दिया। यह फ़रमान पाकर तीनों गरोह ज़ाहिरी तौर पर खुश-खुश वापस हो गए।

मदीनावालों ने इत्मीनान का साँस लिया कि बला टल गई और फिर अपने काम-काज में लग गए।

एक और साजिश

कुछ दिनों के बाद एक दिन अचानक मदीना की गलियों में तकबीर के नारों और घोड़ों की टापों से एक शोर मच गया। लोग घबरा कर घरों से बाहर निकल आए। देखा कि फ़सादियों की मिस्री जमाअत वापस आ गई है। और 'बदला-बदला' के नारे लगा रही है। हज़रत अली (रज़ि.) ने जाकर वापस आने की वजह मालूम की। मिस्रयों ने बताया कि रास्ते में ख़लीफ़ा का एक क़ासिद (दूत) मिला, जो हबशी था। वह बहुत तेज़ी के साथ मिस्र की तरफ जा रहा था। उसके चेहरे से बदहवासी टपक रही थी। हमें शक हुआ। हमने उससे पूछा कि तुम कहाँ जा रहे हो। उसने कहा कि ख़लीफ़ा (रजि.) ने मिस्र के गवर्नर के पास भेजा है। मुहम्मद-बिन-अबू-बक्र (रज़ि.) ने उसको क़ैद कर लिया। उससे पूछा कि तू किसका गुलाम है? तो कभी वह कहता अमीरुल-मोमिनीन का और कभी कहता मरवान का। उसकी तलाशी ली गई तो उसके पास से एक खत निकला जो अमीरुल-मोमिनीन की तरफ़ से अब्दुल्लाह-बिन-अबी-सरह (रज़ि.) के नाम था। ख़त में लिखा था कि “जब मुहम्मद-बिन-अबू-बक्र मिस्र पहुँचे तो उनको और उनके तमाम साथियों को क़त्ल कर दिया जाए और जो ख़त उनके पास है, उसपर अमल करने की कोई ज़रूरत नहीं।"

हज़रत अली (रज़ि.) यह सारी घटना सुनकर दंग रह गए और बहुत सोच में पड़ गए।

घेरा डाल दिया

हज़रत अली (रज़ि.) और दूसरे सहाबा (रज़ि.) मिसवालों को लेकर हज़रत उस्मान (रज़ि.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और मामला उनके सामने पेश किया। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने हैरत के साथ अपनी ला-इल्मी (अनभिज्ञता) ज़ाहिर की और क़सम खाकर कहा कि न मैंने यह ख़़त लिखवाया है और न ही भिजवाया है। हज़रत उस्मान (रज़ि.) का यह क़सम के साथ इनकार सुनकर सहाबा (रज़ि.) को यक़ीन आ गया कि इसमें इनका हाथ नहीं है। उन्होंने अनुमान लगाया कि यह मरवान की शरारत हो सकती है।

 मिस्रवालों को मौक़ा मिल गया। उन्होंने हज़रत उस्मान (रज़ि.) से ख़िलाफ़त छोड़ने का मुतालबा कर दिया। उन्होंने कहा, "बहरहाल कुछ भी हो जो ख़लीफ़ा इस क़द्र ग़ाफ़िल हो कि इतनी बड़ी घटनाएँ हो जाएँ और उसे खबर तक न हो वह किसी तरह ख़िलाफ़त के लायक़ नहीं।" हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने जवाब दिया, "ऐसा कभी नहीं हो सकता। क्योंकि अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने मुझसे फ़रमाया था। ऐ उस्मान! अल्लाह तुमको एक क़मीस पहनाएगा लोग उसको उतारना चाहेंगे। अगर तुमने उसे उतार दिया तो जन्नत की खुश्बू तुमको नसीब न होगी। इसलिए मैं ख़िलाफ़त नहीं छोड़ सकता।"

आप (रज़ि.) का यह जवाब सुनकर फ़सादी आपे से बाहर हो गए और आप (रज़ि.) के घर को चारों तरफ से घेर लिया।

मसजिद में भी आना बन्द

मदीना में बाग़ियों का क़ब्ज़ा था। घेराव में ज़्यादा सख्ती न थी। क़बज़ा होने के बावजूद वे लोग हज़रत उस्मान (रज़ि.) पर कोई बेजा दवाव डालते हुए डरते थे। आप (रज़ि.) को मसजिद आने की इजाज़त थी मगर किसी से मिलने या बात-चीत करने की इजाज़त न थी।

जुमा का दिन आया तो हज़रत उस्मान (रज़ि.) नमाज़ के बाद मिम्बर पर तशरीफ़ ले गए और बागियों को मुखातब करके फ़रमाया, "तुम लोग अच्छी तरह जानते हो कि अल्लाह के रसूल (रज़ि.) ने उन लोगों पर लानत फ़रमाई थी जो तुम्हारी जैसी हरकतें करेंगे। तुम अपनी ग़लतियों से तौबा करो और अपने आपको अल्लाह की लानत से बचाओ।" अभी आपने इतना ही फ़रमाया था कि मसजिद में शोर मच गया। हज़रत जैद-बिन-साबित (रज़ि.) और मुहम्मद-बिन-मुस्लिम (रज़ि.) ने हज़रत उस्मान (रज़ि.) की बात की तस्दीक़ के लिए खड़ा होना चाहा लेकिन उनको बिठा दिया गया। फिर पथराव शुरू हो गया। एक बदमाश ने हज़रत उस्मान (रज़ि.) के हाथ से असा छीनकर तोड़ दिया। पत्थरों की बौछार से आप (रज़ि.) ज़ख्मी होकर गिर पड़े और बेहोश हो गए। लोग उनको उठाकर घर ले गए।

इस घटना के बाद से हज़रत उस्मान (रज़ि.) का मसजिद जाना बन्द कर दिया गया। घेराव में और ज़्यादा सख़्ती आ गई।

 खाना-पानी भी बन्द

बाग़ियों के जब ये तेवर देखे गए तो मदीनावालों को बहुत ज़्यादा चिन्ता हुई। हज़रत अली, तलहा, जुबैर, जैद और सईद (रज़ि.) ने अन्दर जाना चाहा तो उन ज़ालिमों ने रोक दिया। उन्होंने सूरते-हाल से हज़रत उस्मान (रज़ि.) को आगाह कराया और इजाज़त माँगी कि अगर आप फ़रमाएँ तो इन बागियों को इनकी शरारत का मज़ा चखा दिया जाए। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने सख्ती से मना करा दिया, "मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से मुसलमानों में खून-खराबा हो। जब तक फ़सादी खुद तलवार न उठाएँ उनके ख़िलाफ़ हरगिज़ तलवार न उठाई जाए।" अपने खलीफ़ा का यह हुक्म पाकर सब ख़ामोश हो गए। अलबत्ता एहतियात के तौर पर यह किया गया कि हथियारबन्द नौजवानों की एक टोली को आप (रज़ि.) के दरवाजे पर तैनात कर दिया गया ताकि बाग़ी कोई नामुनासिब हरकत न करने पाएँ। इस टोली में हज़रत अली (रज़ि.) हज़रत तलहा (रज़ि.) और हज़रत जुबैर (रज़ि.) के बेटे भी शामिल थे।

बाग़ी लोगों ने हज़रत उस्मान (रज़ि.) के घर के चारों तरफ़ इतना सख़्त घेराव कर दिया कि खाना और पानी भी अन्दर नहीं पहुँचाया जा सकता था। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी उम्मे-हबीबा (रज़ि.) कुछ खाना और पानी लेकर खुद तशरीफ़ ले गईं लेकिन ज़ालिमों ने उनको भी रोक दिया और उनके साथ बेअदबी से पेश आए।

तीन बातें

हज़रत उस्मान (रज़ि.) के घेराव में दिन-ब-दिन सख्ती होती जा रही थी। बाग़ी किसी को भी अन्दर नहीं जाने देते थे। हज़रत उस्मान (रज़ि.) की परेशानियाँ बढ़ती जा रही थीं सहाबा (रज़ि.) यह हालत देखकर बहुत बेचैन हो रहे थे। मदीनावाले बड़ी बेचैनी के साथ अपने खलीफ़ा के का इन्तिज़ार कर रहे थे। हुक्म

हज़रत मुग़ीरा-बिन-शाबा (रज़ि.) किसी तरह अन्दर पहुँचने में सफल हो गए। उन्होंने जाकर अमीरुल-मोमिनीन से कहा, "अमीरुल-मोमिनीन, ये तीन बातें हैं इनमें से एक बात मान लीजिए। अब ज़्यादा देर न कीजिए।"

(1) आपके तरफ़दार और जाँनिसार बहुत बेचैनी से आपके हुक्म का इन्तिज़ार कर रहे हैं। आप बाहर निकलें, बागियों का मुक़ाबला करके उनको बाहर निकाल दें।

(2) पीछे की दीवार तोड़कर आप मक्का के लिए रवाना हो जाएँ। वह हरम है वहाँ ये लोग लड़ न सकेंगे।

(3) आप शाम (सीरिया) चले जाएँ। वहाँ अमीर मुआविया (रज़ि.) मौजूद हैं। वे सब इन्तिज़ाम कर लेंगे।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने जवाब दिया।

(1) जंग करके मैं वह पहला ख़लीफ़ा नहीं बनना चाहता जो मुहम्मद (सल्ल.) की उम्मत में खून-खराबा कराए।

(2) अगर मैं मक्का चला जाऊँ तो मुझे डर है कि ये बद नसीब लोग हरम शरीफ़ का भी एहतिराम नहीं करेंगे और जंग से बाज़ न आएँगे।

(3) शाम भी नहीं जा सकता क्योंकि अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की जुदाई मुझसे सही न जाएगी।

यह सुनकर हज़रत मुग़ीरा (रज़ि.) खामोश हो गए और वापस आ गए।

हज का ज़माना आ गया

घेराबन्दी हुए लगभग एक महीना हो चुका था। हालात बिगड़ते ही जा रहे थे। मदीनावाले बेचैन हो रहे थे। उनको बड़ी चिन्ता थी कि आखिर इस बद-अमनी का नतीजा क्या होगा। पूरे शहर में बाग़ी फ़ैल गए थे हर आदमी अपने आपको ख़तरे में महसूस कर रहा था। अब तो हज का ज़माना भी आ गया। लोग हज की तैयारी करने लगे। आख़िरकार सफ़र पर जाने का वक्त आ गया।

अमीरुल-मोमिनीन हज़रत उस्मान (रज़ि.) घर से बाहर तशरीफ़ नहीं ला सकते थे इसलिए आप अपने मकान की छत पर तशरीफ़ ले गए। हज के लिए जानेवालों को हिदायत दी और अब्दुल्लाह-इने-अब्बास (रज़ि.) को हज का अमीर मुक़र्रर किया। हज़रत आइशा (रज़ि.) भी हज के लिए तशरीफ़ ले गईं। अपने भाई मुहम्मद-बिन-अबू-बक्र से भी चलने के लिए कहा जो बागियों के सरगनों में से एक था। लेकिन उसने जाने से मना कर दिया।

इधर हज़रत उस्मान (रज़ि.) को अपनी शहादत का यक़ीन होता जा रहा था, क्योंकि जिस तरह हालात सामने आ रहे थे उनके बारे में नबी (सल्ल.) कई बार उनसे पेशनगोई फ़रमा चुके थे नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया था कि जब इस तरह के हालात सामने आएँ तो घबराना नहीं और सब्र-व-सुकून के साथ सहन करना। हज़रत उस्मान (रज़ि.) प्यारे नबी (सल्ल.) की इस वसीयत पर पूरी तरह अमल करने की कोशिश कर रहे थे।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) अच्छी तरह जानते थे कि नबी (सल्ल.) के हुक्म पर चलना ही ईमान की पहचान है।

शहीद कर दिए गए

इधर बाग़ी परेशान थे। ज़िलहिज्जा की 18 तारीख थी। हज का मौसम खत्म हो रहा था। हाजी वापस आनेवाले थे। अभी मदीना लगभग ख़ाली था। मौक़ा ग़नीमत जानकर उन्होंने हज़रत उस्मान (रज़ि.) के मकान पर हमला कर दिया। हथियार बन्द टोली ने जो हिफ़ाज़त पर तैनात थी, हमले का जवाब दिया। इस तरह जंग शुरू हो गई। जब मामला ज्यादा बढ़ गया तो मुहम्मद बिन-अबू-बक्र (रज़ि.) कुछ लोगों के साथ पिछली दीवार फाँद कर घर में घुस गए।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) कुरआन की तिलावत कर रहे थे। मुहम्मद-बिन-अबू-बक्र (रज़ि.) ने आगे बढ़कर आपकी मुबारक दाढ़ी पकड़ ली और ज़ोर से खींची। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने फ़रमाया, "भर्तीजे! अगर तुम्हारे बाप जिन्दा होते तो उनको यह हरकत पसन्द न आती।" यह सुनकर वे शर्म के मारे पीछे हट गए और फिर वापस चले गए। किनाना-बिन-बशर ने आगे बढ़कर हज़रत उस्मान (रज़ि.) के माथे पर लोहे की छड़ इस ज़ोर से मारी कि आप (रज़ि.) पहलू के बल गिर पड़े और खून से लथ-पथ हो गए। उसी वक़्त सौदान-बिन-हमरान ने आप (रज़ि.) पर तलवार का वार किया, जिसे आप (रज़ि.) की बीवी हज़रत नाइला (रज़ि.) ने अपने हाथ पर रोक लिया। उनकी तीन उंगलियाँ कट कर अलग हो गई। फिर पत्थर दिल अम्र-बिन-हमक़ आप (रज़ि.) के सीने पर सवार हो गया और नेज़े के नौ ज़ख्म लगाए। इस तरह अमीरुल-मोमनीन हज़रत उस्मान (रज़ि.) शहीद हो गए। इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।

कफ़न-दफ़न

हज़रत उस्मान (रज़ि.) 18 ज़िलहिज्जा सन् 35 हिजरी जुमा के दिन असर के वक्त शहीद किए गए थे। चूँकि आप कुरआन की तिलावत कर रहे थे इसलिए आप (रज़ि.) के खून की छींटें निम्नलिखित आयत पर पड़ी थीं।

पस उन लोगों के मुकाबले में अल्लाह तुम्हारी हिमायत के लिए काफी है वह सब कुछ जानता और सुनता है। (2: 137)

कुरआन मजीद का वह नुस्खा आजकल ताशकन्द के अजाइबघर में मौजूद है। शहादत की खबर फैलते ही पूरे मदीना में तहलका मच गया। पूरा शहर बागियों के क़ब्जे में था। उनके डर से किसी को यह हिम्मत न हुई कि अलानिया हज़रत उस्मान (रज़ि.) की लाश को दफ़न कर दे। शनिवार का दिन गुज़ारकर रात में कुछ लोगों ने कफ़न-दफ़न की हिम्मत की। गुस्ल दिए बगैर वैसे ही जनाज़े की नमाज़ हज़रत ज़ुबैर-बिन-अव्बाम (रज़ि.) या हज़रत ज़ुबैर-बिन-मुतइम (रज़ि.) ने पढ़ाई । कुल सत्तरह आदमी जनाज़े को ले गए और जन्नतुल बक़ी के पीछे हशे-कौकब में आप (रज़ि.) को दफ़न कर दिया गया। बाद में यह हिस्सा भी जन्नतुल-बक़ीअ में शामिल कर लिया गया। मदीना की कोई आँख ऐसी न थी जो आप के ग़म में रोई न हो।

शहादत के वक़्त आप (रज़ि.) की उम्र 82 साल की थी। आप (रज़ि.) ने लगभग बारह साल तक ख़िलाफ़त की ज़िम्मेदारी को पूरा किया।

बाग़ियों का अंजाम

अमीरुल-मोमिनीन के ख़िलाफ़, बगैर किसी माकूल वजह के बग़ावत करना और फिर उनको शहीद कर देना कोई मामूली बात न थी बल्कि दीन की मुख़ालिफ़त की बड़ी घिनौनी मिसाल थी। इतिहास बताता है कि उन बाग़ियों को बड़ी ही इबरतनाक सज़ा मिली, जो इस मुहिम में शामिल थे।

अबू-क़ुलाबा कहते हैं कि मैंने शाम (सीरिया) देश में एक आदमी को यह कहते सुना कि हाय दोज़ख की आग! उसके दोनों पाव और हाथ कटे हुए थे। जब उससे उसका हाल पूछा गया तो उसने बताया कि मैं उन लोगों में था जो हज़रत उस्मान (रज़ि.) को शहीद करने गए थे। जब मैं उनके पास पहुँचा तो उनकी बीवी ने शोर मचाया। मैंने उनको एक तमाचा मार दिया हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने यह देखकर बद्दुआ दी कि "खुदा तेरे हाथ और पाँव काट दे और तुझे जहन्नम में डाल दे।" हाथ-पाँव तो मेरे कट चुके हैं अब दोज़ख़ की आग का डर है।

यज़ीद-बिन-हबीब कहते हैं कि जितने लोग मिस्र से हज़रत उस्मान (रज़ि.) के ख़िलाफ़ बग़ावत करके आए थे उनमें से एक भी ऐसा न बचा जो पागल न हो गया हो।

सच है बुराई में किसी का साथ देने का नतीजा बुरा ही होता है।

आप (रज़ि॰) कैसे थे

हज़रत उस्मान (रज़ि.) का क़द न ज़्यादा लम्बा था और न ज़्यादा छोटा। चेहरा खूबसूरत था। आप (रज़ि.) का रंग गेंहुवाँ था। नाक ऊँची और आगे थोड़ी सी झुकी हुई थी गाल गोश्त से भरे हुए थे, उन पर चेचक के हल्के दाग़ थे। दाढ़ी घनी और लम्बी थी। सिर के बाल भी घने और लम्बे थे जो कानों तक पहुँचते थे जोड़ों की हड्डियाँ मोटी और सीना चौड़ा था। दाँत चमकदार थे, उनको सोने के तार से बाँधकर मज़बूत किया गया था। दाढ़ी को ज़र्द रंग से रंगते थे और बालों में ख़िज़ाब भी लगाते थे।

मिज़ाज में सफ़ाई और पाकी का ख़याल बहुत था मुसलमान होने के बाद रोज़ाना नहाते थे। कपड़े सादे और अच्छे पहनते थे। इत्र भी लगाते थे। ऐसे कपड़ों को पहनने से परहेज़ करते थे जिनको पहनकर मिज़ाज में घमण्ड या दिखावे का जज्बा पैदा हो। आमतौर पर हमेशा तहबन्द बाँधते थे। सिर्फ़ उस दिन पाजामा पहना जिस दिन वे शहीद किए गए, ताकि सतर न खुलने पाए। आप (रज़ि.) सरापा शर्म व हया थे। कमज़ोरी और बुढ़ापे की वजह से आम तौर पर नर्म, हल्का और जल्द हज़म होनेवाला खाना खाते थे। दस्तरखान पर हमेशा रिश्तेदारों और दोस्तों का मजमा रहता था।

रात का ज्याज़्यादातर हिस्सा इबादत में गुजारी। कभी-कभी रात भर जागते और एक ही रकअत में क़ुरआन मजीद का बहुत सा हिस्सा तिलावत कर लेते। दूसरे-तीसरे दिन रोज़ा रखते। कभी-कभी महीनों रोज़े से रहते। कितने अच्छे थे हमारे अमीरुल-मोमिनीन!

अल्लाह का डर

अल्लाह का ख़ौफ़ और डर तमाम भलाइयों और नेकियों की जड़ है। जिस दिल में अल्लाह का डर नहीं उससे किसी नेकी की उम्मीद नहीं की जा सकती।

 हज़रत उस्मान (रज़ि.) की आँखें अल्लाह के डर से हमेशा नम रहती थीं। जब सामने से किसी का जनाज़ा गुज़रता तो आप (रज़ि.) खड़े हो जाते और फूट-फूटकर रोने लगते। क़ब्रों के पास से निकलते तो इस क़द्र रोते कि दाढ़ी आँसुओं से भीग जाती। लोगों ने पूछा, "जन्नत और दोज़ख़ का हाल सुनकर आप इतने बेक़रार नहीं होते जितने क़ब्रों को देखकर हो जाते हैं।" आप (रज़ि.) ने फ़रमाया, "अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने फ़रमाया है कि क़ब्र आखिरत की सबसे पहली मंज़िल है। अगर यह आसानी से तय हो गई तो बाक़ी मंज़िलें आसान हैं और अगर इसमें मुश्किल पेश आई तो फिर आगे का खुदा हाफ़िज़ है।"

एक बार आप (रज़ि.) ने सज़ा के तौर पर अपने एक गुलाम का कान मरोड़ दिया। फिर बदले का ख़याल आया। आप (रज़ि.) ने गुलाम से कहा, "तुम भी मेरा कान मरोड़ लो। यहाँ का बदला आख़िरत के बदले से बहुत अच्छा है।"

प्यारे नबी (सल्ल.) से मुहब्बत

हज़रत उस्मान (रज़ि.) को हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) से इतनी मुहब्बत थी कि किसी वक्त और किसी हालत में भी प्यारे नबी (सल्ल.) की जुदाई गवारा न थी। तमाम लड़ाइयों में अल्लाह के रसूल (सल्ल.) के साथ-साथ रहे। हमेशा जॉनिसारी का हक़ अदा किया, सिवाए बद्र की लड़ाई के जबकि आप (रज़ि.) को खुद प्यारे नबी (सल्ल.) ने हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) की तीमारदारी के लिए मदीना में ही रोक दिया था। प्यारे नबी (सल्ल.) की किसी भी परेशानी या तकलीफ़ को देखकर आप (रज़ि.) बेताब हो जाते थे। एक बार की बात है कि नबी (सल्ल.) के घर में चार दिन से मुसलसल फ़ाक़ा था। इसलिए नबी (सल्ल.) और आप (सल्ल.) के घर के लोगों की कमज़ोरी की वजह से अजीब सी हालत हो गई। जब हज़रत उस्मान (रज़ि.) को इस बात की खबर हुई तो वे बेचैन हो गए। उन्होंने फ़ौरन कई बोरे आटा, छुहारे, एक बकरी का गोश्त और तीन सौ दिरहम (रुपये) भेजे और इसके साथ ही यह कहला दिया कि इसे पकाने में देर होगी, मैं पका हुआ खाना भी भेजता हूँ। आप (रज़ि.) बहुत सारा पका हुआ खाना लेकर हाज़िर हुए।

अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने दुआ फ़रमाई, "ऐ अल्लाह में तो उस्मान (रज़ि.) से राज़ी हूँ, तू भी इनसे राज़ी रह।"

नबी (सल्ल॰) का अदब

 हज़रत उस्मान (रज़ि.) नबी (सल्ल.) की इज़्ज़त और अदब का पूरा ख़याल रखते थे। कोई बात ऐसी न होने देते थे जिससे आप (सल्ल.) की बे अदबी का शक-शुबह भी हो सकता हो।

जिस हाथ से प्यारे नबी (सल्ल.) के मुबारक हाथ पर बैअत की थी उस हाथ से हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने कभी कोई नापाक चीज़ नहीं छुई।

अल्लाह के रसूल (सल्ल.) के घरवालों (अहले-बैत) और पाक बीवियों का ख़ास तौर पर ख़याल रखते थे। दूसरों के मुकाबले में हमेशा उनको फ़ज़ीलत देते थे। इसी लिए अपनी ख़िलाफ़त के वक्त में जब ज़रूरतमन्दों के रमज़ान के वज़ीफ़े तय किए तो प्यारे नबी (सल्ल.) की पाक बीवियों का वज़ीफ़ा दूसरों से दोगुना तय किया।

 हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.) प्यारे नबी (सल्ल.) की पाक बीवियों का कितना ख़याल रखते थे!

कितने अच्छे थे आप (रज़ि.)!

अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की पैरवी

प्यारे नबी (सल्ल.) से मुहब्बत और अक़ीदत का यह लाज़िमी नतीजा है कि नबी (सल्ल.) की हर बात और अमल की पैरवी दिल-जान से की जाए। एक बार वुजू करने के बाद हज़रत उस्मान (रज़ि.) खड़े हुए और मुसकुराने लगे लोगों ने इस तरह अचानक मुसकुराने की वजह पूछी। आप (रज़ि.) ने जवाब दिया कि मैंने एक बार नबी (सल्ल.) को इसी तरह वुजू करके मुसकुराते हुए देखा था।

एक बार सामने से जनाज़ा गुज़रा तो आप (रज़ि.) खड़े हो गए। बाद में फ़रमाया कि नबी (सल्ल.) ऐसा ही किया करते थे।

एक बार अस्र के वक़्त सबके सामने वुजू करके दिखाया कि हमारे नबी (सल्ल.) इसी तरह वुज़ू किया करते थे।

आप (रज़ि.) बहुत शर्मीले थे

शर्म और हया हज़रत उस्मान (रज़ि.) की ख़ास सिफ़त थी। सहाबा (रज़ि.) में आप जैसा शर्मीला कोई और न था। यहाँ तक कि खुद नबी (सल्ल.) भी इस मामले में आप (रज़ि.) का लिहाज़ फ़रमाया करते थे।

एक बार का ज़िक्र है कि नबी (सल्ल.) सहाबा (रज़ि.) के बीच बेतकल्लुफ़ी के साथ बैठे हुए थे। आप (सल्ल.) की रान का कुछ हिस्सा खुल गया था, इतने में हज़रत उस्मान (रज़ि.) के आने की ख़बर मिली। नबी (सल्ल.) सँभल कर बैठ गए और अपनी रान को भी ढक लिया। सहाबा (रज़ि.) ने इस एहतियात की वजह पूछी तो आप (सल्ल.) ने फ़रमाया

 "उस्मान (रजि.) की हया से तो फ़रिश्ते भी शर्माते हैं।"

 प्यारे नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया था, "लोगो! (तन्हाई की हालत में भी बगैर ज़रूरत) नंगे होने से बचो। क्योंकि तुम्हारे साथ फ़रिश्ते बराबर रहते हैं, किसी वक़्त भी अलग नहीं होते।" हज़रत उस्मान (रज़ि.) इस हुक्म की इतनी पाबन्दी करते थे कि अपनी ज़िन्दगी में बन्द कमरे में भी कभी नंगे नहीं हुए। यहाँ तक कि मारे शर्म के आप (रज़ि.) नहाते भी बैठकर ही थे। देखा आपने! कितने शर्मीले थे हज़रत उस्मान (रज़ि.)।

 आप (रज़ि.) बहुत सब्र करनेवाले थे

शर्म व हया की तरह हज़रत उस्मान (रज़ि.) की दूसरी ख़ास सिफ़त सब्र थी। आप (रज़ि.) हमेशा सब्र व शुक्र से काम लेते थे। इसकी बेहतरीन मिसाल आपकी शहादत का वाक़िआ है। कौन सी ऐसी तकलीफ़ थी जो बागियों ने आप (रज़ि.) को न पहुँचाई हो! चालीस दिन तक मकान की घेरा-बन्दी किए रहे, कहीं भी आना जाना बन्द, खाना-पीना बन्द, मिलना-जुलना बन्द। यहाँ तक कि कोई मिलने के लिए भी नहीं आ सकता था। आप (रज़ि.) के हमदर्द साथी बार-बार दरखास्त करते थे कि आप (रज़ि.) इजाज़त दें तो हम इन बागियों से निपट लेंगे लेकिन आप हर बार मना करते रहे और उनको समझाते रहे। जब वे बहुत ज़िद करने लगे, तो आपने यह कहकर उन्हें खामोश कर दिया कि "इस वक़्त मेरा सबसे बड़ा मददगार वह है जो मेरी ख़ातिर तलवार न उठाए।"

आपको यह गवारा न था कि मुसलमानों में आपस में खून-खराबा हो। सारी तकलीफें बरदाश्त करते हुए आप (रज़ि.) इस फ़ानी दुनिया से चल बसे।

आप (रज़ि.) बहुत ही सनी (दानी) थे

हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) की ख़िलाफ़त के ज़माने की बात है। मदीना में बहुत सख्त रहता (सूखा) पड़ा। लोग दाने-दाने को तरस गए। संयोग की बात; उसी दौरान हज़रत उस्मान (रज़ि.) के एक हज़ार ऊँट ग़ल्ले से लदे हुए आए। मदीना के ताजिर खरीदने के लिए दौड़ पड़े। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने उनसे पूछा कि शाम की खरीदारी पर तुम लोग कितना नफ़ा दोगे। उन्होंने जवाब दिया कि दस रुपये पर दो रुपये। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने कहा मुझे इससे ज़्यादा मिल रहा है। बात चलती रही। आखिर में ताजिरों ने कहा कि हम दस रुपये के माल को पन्द्रह रुपये में ले सकते हैं। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने कहा मुझे इससे भी ज़्यादा मिल रहा है। ताजिरों को बड़ी हैरत हुई। कहने लगे मदीना के तमाम ताजिर तो यहाँ मौजूद हैं। भला वह कौन है जो हम से ज़्यादा क़ीमत दे रहा है। आप (रज़ि.) ने जवाब दिया कि मुझे एक रुपये के माल के दस रुपये मिल रहे हैं। तमाम ताजिर हक्का-बक्का रह गए। एक-दूसरे का मुँह तकने लगे। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने एलान फ़रमाया, "मैं तुम सब लोगों को गवाह करता हूँ कि मैंने ये सारा का सारा ग़ल्ला अल्लाह की राह में मदीना के ज़रूरतमन्दों को दे दिया जो एक नेकी का बदला दस नेकी के बराबर देता है।"

 देखा आपने कितने सखी थे हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.)!

 नर्मी से जवाब देते

जिस तरह हज़रत उस्मान (रज़ि.) के मिज़ाज में बहुत नर्मी थी उसी तरह आप (रज़ि.) की ज़बान भी बहुत नर्म और मीठी थी। आप (रज़ि) सख्ती का जवाब हमेशा नमी से देते थे कभी आप (रज़ि.) ने किसी से बद कलामी (बुरा भला कहना) नहीं की।

एक बार हज़रत अम्र-बिन-आस (रज़ि.) ने बात-चीत के दौरान हज़रत उस्मान (रज़ि.) के वालिद की शराफ़त पर तंज़ (व्यंग्य) किया। आप (रज़ि.) ने नर्मी से जवाब दिया, "ऐ अम्र (रज़ि.) इस्लाम के ज़माने में जिहालत के ज़माने का ज़िक्र मुनासिब नहीं।" हज़रत अम्र (रज़ि.) ख़ामोश हो गए और अपनी बात-चीत के अन्दाज़ पर शर्मिन्दा हुए।

इसी तरह एक बार जुमा के दिन मिम्बर पर खुतबा दे रहे थे कि एक तरफ़ से आवाज़ आई, "ऐ उस्मान (रज़ि.)! तौबा करो और हद से आगे न बढ़ो।" आपने उसी वक़्त काबा की तरफ़ मुँह करके दुआ की, "ऐ अल्लाह! मैं पहला तौबा करनेवाला हूँ, जिसने तेरी बारगाह में रुजू किया।"

देखा आपने, कितनी नर्मी से आप (रज़ि.) जवाब देते थे! अल्लाह हमें भी ज़बान दराज़ी से बचाए और मीठी बोली बोलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन!

अच्छा सुलूक

हज़रत उस्मान (रज़ि.) अपने रिश्तेदारों के साथ हमेशा अच्छा सुलूक किया करते थे। उनके आड़े वक़्त में काम आते थे। ख़ामोशी के साथ उन सबकी मदद किया करते थे।

आप (रज़ि.) के चाचा हकम इब्नुल-आस (ये हजरत उस्मान (रज़ि.) के वही चचा हैं जिन्होंने इस्लाम क़बूल कर लेने की सज़ा में आप (रज़ि.) को रस्सी से बांधकर डाल दिया था।) को अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने ताइफ़ में जिला वतन कर दिया था। आप (रज़ि.) ने बड़ी कोशिश करके उनकी ख़ता माफ़ कराई और अपनी ख़िलाफ़त के दौर में उनको मदीना बुला लिया और उनकी माली मदद की। इसी तरह दूसरे रिश्तेदारों को भी जिस लायक़ वे होते थे वेसी ही मुलाज़मतें दीं।

 दोस्तों के साथ भी आप (रज़ि.) का ऐसा ही सुलूक रहता था। उनकी ज़रूरत पर बड़ी-बड़ी रक़में क़र्ज़ दे दिया करते थे और कभी-कभी वापस भी नहीं लेते थे। एक बार हज़रत अबू-तलहा (रज़ि.) ने एक बड़ी रक़म क़र्ज़ ली। कुछ दिनों के बाद वापस देने आए तो लेने से मना कर दिया और फ़रमाया, "यह तुम्हारी मुरव्वत का बदला है।"

 लिखना पढ़ना जानते थे

जैसा कि आप पढ़ चुके हैं कि हज़रत उस्मान (रज़ि.) को बचपन ही से इल्म हासिल करने का बहुत शौक था। आप (रज़ि.) ने अपनी मर्जी से लिखना-पढ़ना शुरू कर दिया और इतना सीख लिया कि आप (रज़ि.) इसमें माहिर हो गए और आप (रज़ि.) की गिनती मक्का के पढ़े लिखे लोगों में होने लगी।

जब आप (रज़ि.) मुसलमान हो गए तो अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने आपकी क़ाबिलीयत से बहुत फ़ायदा उठाया। जब भी वह्य नाज़िल होती तो नबी (सल्ल.) आप (रज़ि.) को बुलाकर लिखवा दिया करते थे। हज़रत आइशा (रज़ि.) का बयान है कि एक बार रात के वक़्त वह्य नाज़िल हुई तो हज़रत उस्मान (रज़ि.) वहाँ मौजूद थे। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने उनको लिखने का हुक्म दिया। आप (रज़ि.) ने उसी वक़्त हुक्म की तामील की।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) के लिखने का ढंग बहुत निराला था। आप (रज़ि.) की तहरीर (लिखावट) में इतना असर होता था कि पढ़नेवाला असर लिए बगैर नहीं रहता था। इसी लिए प्यारे नबी (सल्ल.) अपने निजी ख़तों को भी आप (रज़ि.) ही से लिखवाया करते थे।

कारनामे

हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) ने अपनी हिकमत और सिवासी सूझ-बूझ और अमली ताक़त से इस्लामी हुकूमत को बहुत बढ़ा दिया था। लेकिन दुश्मन इस तरक्की को देख-देखकर दिल ही दिल में जल रहे थे हज़रत उमर (रज़ि.) की आँख बन्द होते ही कई देशों में बग़ावत शुरू हो गई। ऐसे नाजुक हालात से निपटना हज़रत उस्मान (रज़ि.) ही का काम था। यूँ तो आप (रज़ि.) अपने ज़ाती मामलों में बहुत नर्म मिज़ाज थे लेकिन मुल्की इन्तिज़ाम में गड़बड़ी पैदा करनेवालों के सिलसिले में आप बहुत सख़्त थे। आप (रज़ि.) ने अपनी हिम्मत, हौसला और इरादे की मज़बूती से काम लेकर बागियों को ऐसा मज़ा चखाया कि फिर वे ज़िन्दगी भर सिर न उठा सके। उनकी सारी ताक़त चकना-चूर हो गई। अगर हज़रत उस्मान (रज़ि.) की तरफ़ से ज़रा भी नर्मी या कमज़ोरी दिखाई जाती तो इस्लामी हुकूमत टुकड़े-टुकड़े होकर रह जाती।

सिर्फ़ इतना ही नहीं बल्कि इस्लामी शासन और भी फैल गया। अफ़्रीक़ा में ताराबूलस, बरका और मराक़श फ़तह हुए। ईरान पूरा फ़तह हो गया और आस-पास के देश भी क़ब्जे में आ गए। जैसे अफ़ग़ानिस्तान, खुरासान और तुर्किस्तान का एक हिस्सा। दूसरी तरफ़ आरमीनिया और आज़र बाईजान पर जब क़ब्ज़ा हो गया तो इस्लामी शासन की सरहद कोहे-क़ाफ़ तक पहुँच गई। एशिया-ए-कोचक का एक हिस्सा इस्लामी हुकूमत के क़ब्जे में आ गया। इस्लामी समुन्दरी बेड़े ने जज़ीरा क़बरस और दूसरे जज़ीरों पर क़ब्ज़ा करके रूमी बेड़े की कमर तोड़ दी।

हुकूमत का इन्तिज़ाम

इस्लामी हुकूमत की बुनियाद ही आपस के मशवरे पर रखी गई थी। हज़रत उमर (रज़ि.) ने उसे बाक़ायदा एक नज़्म के तहत क़ायम कर दिया। हज़रत उस्मान (रज़ि.) की ख़िलाफ़त में शुरू के छः साल तो यह नज्म बिलकुल उसी तरह चलता रहा लेकिन बाद में हालात कुछ ऐसे हो गए जिनकी वजह से इसमें कुछ कमज़ोरी आ गई। लेकिन फिर भी जब कभी किसी मामले की तरफ़ तवज्जुह दिलाई जाती तो हज़रत उस्मान (रज़ि.) फ़ौरन उसकी रोक-थाम करते। छोटे या बड़े हर एक के नेक मशवरों को क़बूल करके उनपर अमल करते।

आम लोगों को यह हक़ हासिल था कि वे हुकूमत के नज़्म या हुकूमत के ओहदेदारों (पदाधिकारियों) के तर्जे-अमल (व्यवहार) पर नुक्ता चीनी कर सकें। इसलिए जब आपके पास कूफ़ा के गवर्नर वलीद-बिन-उक़बा, की शराब पीने की शिकायत पहुँची तो आप (रज़ि.) ने फ़ौरन उसको गवर्नरी से हटाकर शरीअत के मुताबिक़ उसको सज़ा सुनाई।

इसी तरह आप (रज़ि.) ने अब्दुल्लाह-बिन-साद की जंगी मुहिमों से खुश होकर उनको माले-ग़नीमत का पाँचवाँ हिस्सा दे दिया था। बहुत से लोगों ने इस पर एतिराज़ किया। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने यह रक़म उनसे वापस लेकर बैतुलमाल में जमा कर दी।

गवर्नरों की मजलिसे-शूरा

सूबों का इन्तिज़ाम बेहतर बनाने के लिए हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने गवर्नरों की एक कमेटी बनाई जिसका नाम मजलिसे-शूरा रखा गया। इसकी बैठक हर साल हज के मौक़े पर होती थी। उस वक्त तमाम गवर्नर मौजूद होते थे। वे अपनी-अपनी मुशकिलें और परेशानियाँ कमेटी के सामने रखते थे। उनपर ग़ौर और मशवरे करने के बाद फ़ैसले होते थे गवर्नरों के लिए यह ज़रूरी था कि अपने-अपने सूबों की लिखित रिपोर्टे लाया करें। आम लोगों को भी यह हक़ था कि अगर किसी गवर्नर के खिलाफ़ उनको शिकायत है तो वहीं पेश करें। उसकी जाँच-पड़ताल होती थी और उसे दूर किया जाता था। अगर कोई ज़्यादा अहम बात होती थी तो उसकी तहक़ीक़ात के लिए वफ़्द भेजा जाता था। इसकी रिपोर्ट आने पर अमल दरामद होता था। इस काम के लिए आम तौर पर निम्नलिखित तीन बुजुर्ग सहाबा (रज़ि.) मुक़र्रर थे।

  1. मुहम्मद-बिन-मुस्लिम (रज़ि.) 2. अब्दुल्लाह-बिन-उमर (रज़ि.) 3. उसामा-बिन-जैद (रज़ि.)

इसी बैठक में दूसरे ओहदेदारों और ज़िम्मेदारों के कामों की जाँच पड़ताल होती थी। हज़रत उस्मान (रज़ि.) तो बड़े रहमदिल और तबीयत के नर्म थे। लेकिन जायज़ा लेते वक्त बहुत सख्ती से काम लेते थे। जो बात पकड़ में आ जाती थी उसे पूरी तरह साफ़ करने की कोशिश करते थे।

मुल्की इन्तिज़ाम

मुल्की इन्तिज़ाम के सिलसिले में जो उसूल और जानते हज़रत उमर (रज़ि.) ने बना दिए थे वे अपनी जगह पर मुकम्मल थे बल्कि तजरिबे की रौशनी में जहाँ-जहाँ कोई तब्दीली करने की ज़रूरत समझी वह हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने कर दी।

हज़रत उमर (रज़ि.) ने शाम देश को तीन सूबों (प्रान्तों) में बाँट दिया था लेकिन हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने उसे एक ही सूबा क़रार दिया अलबत्ता जो नए मुल्क फ़तह होते रहे उनके अलग-अलग सूबे बना दिए गए।

हज़रत उमर (रज़ि.) के ज़माने में सूबे की इन्तिज़ामी और फ़ौजी दोनों ज़िम्मेदारियाँ सूबे के गवर्नर के सुपुर्द होती थीं। वही सूबे का इन्तिज़ाम भी करता था और फ़ौज की देख-भाल भी। मगर हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने अपनी ख़िलाफ़त के ज़माने में फ़ौज की निगरानी के लिए फ़ौज के अफ़सर का नया ओहदा क़ायम किया। इस तरह सूबे के इन्तिज़ामी काम तो गवर्नर निपटाता था। और फ़ौज की देखभाल फ़ौज का अफ़सर करता था।

इसके अलावा बाक़ी विभाग जितने हज़रत उमर (रज़ि.) ने क़ायम किए थे वे ज्यों के त्यों रहने दिए। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने उनमें कोई तब्दीली नहीं की।

फ़ौजी इन्तिज़ाम

हज़रत उमर (रज़ि.) ने अपने ज़माने में जो फ़ौजी निज़ाम कायम किया था। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने उसे और तरक़्क़ी दी। फ़ौजी ख़िदमत के बदले में जिन लोगों के वज़ीफ़े मुक़र्रर थे हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने उसमें सौ-सौ दिरहम और बढ़ा दिए। फ़ौजी और इन्तिज़ामी विभाग, जैसा कि लिखा जा चुका है, अलग-अलग करके उनके ज़िम्मेदार अलग-अलग मुक़र्रर कर दिए गए।

फ़ौज के जो सेंटर पहले से मुक़र्रर थे उनके अलावा तराबुलस, क़बरस, तिबरिस्तान और आरमीनिया में भी फ़ौजी सेंटर क़ायम कर दिए गए। हर जिले में फ़ौजी छावनियाँ बनाई गई जहाँ पर थोड़ी-थोड़ी फ़ौज हमेशा रहती थी।

घोड़ों और ऊँटों के लिए चरागाहों में भी इज़ाफ़ा किया गया। नई-नई चरागाहें बनाई गई और पुरानी चरागाहों को और बढ़ाया गया। हर चरागाह के पास एक-एक पानी का चश्मा (कुँआ) तैयार कराया गया। चरागाहों में काम करनेवालों के लिए घर भी बनवाए गए।

 बैतुलमाल

हज़रत उस्मान (रज़ि.) बेतुलमाल को मुसलमानों की अमानत समझते थे। उसकी रक़म को आप बहुत एहतियात से ख़र्च करते थे। यहाँ तक कि आप बारह साल ख़लीफ़ा रहे और इस मुद्दत में आपने अपने ज़ाती खर्च के लिए बैतुलमाल से एक पैसा भी नहीं लिया।

आपके ज़माने में इस्लामी हुकूमत बहुत दूर-दूर तक फैल गई थी। इसकी वजह से बैतुलमाल की आमदनी भी बहुत बढ़ गई थी। इसी हिसाब से हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने लोगों के वज़ीफ़ों में भी एक-एक सौ दिरहम का इज़ाफ़ा कर दिया।

हज़रत उमर (रज़ि.) रमज़ान के महीने में प्यारे नबी (सल्ल.) की पाक बीवियों (रज़ि.) को दो-दो दिरहम और दूसरे हक़दार लोगों को एक-एक दिरहम रोज़ाना बैतुलमाल से दिया करते थे हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने इसके अलावा हक़दार लोगों का खाना भी बैतुलमाल ही से जारी करा दिया।

आप (रज़ि.) अपने रिश्तेदारों के साथ बहुत फ़ैयाज़ी से पेश आते थे और वह सारा ख़र्च आप (रज़ि.) अपनी जेब से किया करते थे बैतुलमाल पर इसका बोझ बिलकुल नहीं डालते थे। जैसा कि एक मौक़े पर आप (रज़ि.) ने फ़रमाया, "में अपने रिश्तेदारों को जो कुछ देता हूँ अपने माल से देता हूँ और मुसलमानों के माल को न अपने लिए जाइज़ समझता हूँ और न किसी दूसरे के लिए।"

नई-नई इमारतें

हुकूमत चारों ओर फैल जाने के साथ तमा सूबों में अलग-अलग दफ्तरों के लिए नई-नई इमारतें बनाई गई। आम लोगों के फ़ायदे और आराम के लिए सड़कें, पुल और मसजिदें बनाई गई, मुसाफ़िरों के लिए मुसाफ़िर ख़ाने बनाए गए। कूफ़ा शहर में उस वक़्त तक कोई मेहमान खाना नहीं था। बाहर से आनेवालों को बड़ी तकलीफ़ होती थी। आप (रज़ि.) ने एक बहुत बड़ा मेहमान खाना बनवा दिया।

यह ज़रूरत महसूस की गई कि दारुल-ख़िलाफ़त (राजधानी) की सड़कें अच्छी होना चाहिएँ। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने मदीना के रास्तों में जगह-जगह चौकियाँ, सराए और पानी के चश्मे (कुएँ) बनवा दिए। नजूद के रास्ते में मदीना रो चौबीस मील के फ़ासले पर एक बहुत अच्छी सराए बनाई। एक छोटा बाज़ार बसाया गया और मीठे पानी का एक कुआँ बनवाया गया जो ‘बीरुस्साइब' के नाम से मशहूर है।

खैबर की तरफ़ से कभी-कभी मदीना में बहुत खतरनाक सैलाब आ जाया करता था, जिससे शहर को और मसजिदे-नबवी को नुक़सान पहुँच जाता था। हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने मदीना से थोड़ी दूरी पर मदरी के पास एक बाँध बनवा दिया और नहर खुदवाकर सैलाब का रुख़ फेर दिया। इस बाँध का नाम महरोज़ बाँध है।

मसजिदे-नबवी की नई तामीर

मसजिदे-नबवी अब नमाज़ियों के लिए छोटी पड़ने लगी थी। नमाज़ पढ़नेवालों को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता था। खलीफ़ा होते ही हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने मसजिद को बढ़ाने का इरादा किया लेकिन मसजिद के चारों तरफ़ जिन लोगों के मकान थे वे लोग काफ़ी मुआवज़ा देने पर भी अपने मकानों को बेचने पर रजामन्द न होते थे। वे कहते थे कि अगर उन्होंने अपने मकानों को दे दिया और दूसरी जगह जाकर बस गए तो मसजिदे-नबवी से दूर हो जाएँगे।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) पाँच साल तक बराबर कोशिश करते रहे आख़िरकार कामयाबी हासिल हो गई। और वे सारे मकान मिल गए। बड़ी तैयारी के साथ आप (रज़ि.) ने तामीर शुरू करा दी। तामीर की निगरानी करनेवालों के साथ आप (रज़ि.) खुद भी दिन-रात लगे रहते थे। दस महीने की मुसलसल मेहनत के बाद मसजिदे-नबवी एक खूबसूरत और मज़बूत इमारत की शक्ल में तैयार हो गई। इसकी लम्बाई पचास गज़ बढ़ गई अलबत्ता कुछ मजबूरियों की वजह से चौड़ाई न बढ़ाई जा सकी। मसजिदे-नबवी की ये बढ़ोत्तरी सन् 29 हिजरी में हुई।

इस तरह मुसलमानों को मसजिदे-नबवी में नमाज अदा करने में अब बड़ी आसानी हो गई।

दीनी ख़िदमत

प्यारे नबी (सल्ल.) के नायब होने की हैसियत से हज़रत उस्मान (रज़ि.) का सबसे अहम फ़र्ज़ यह था कि वे दीन फैलाने का काम करते। इसी लिए आप (रज़ि.) को अपने इस फ़र्ज़ का पूरी तरह एहसास था। कोई लम्हा ऐसा नहीं गुज़रता था कि आप (रज़ि.) इस फ़र्ज़ से ग़ाफ़िल होते हों। जंग में जो क़ैदी गिरिफ़्तार होकर आते आप (रज़ि.) खुद उनके पास जाते। दीने-इस्लाम की खूबियाँ उनके सामने पेश करते। इस्लाम क़बूल करने की दावत देते। जो लोग इस्लाम क़बूल कर लेते उनको दीन की तालीम देते। फ़िक़ही मसलों को समझाते।

मसजिदे-नबवी की नई तामीर का हाल आप पड़ ही चुके हैं। मदीना की आबादी बढ़ने की वजह से जुमा के दिन एक अज़ान काफ़ी नहीं होती थी इसलिए आप (रज़ि.) ने एक अज़ान देनेवाला और मुक़र्रर किया जो ज़ोरा के मक़ाम पर अज़ान देकर लोगों को नमाज़ के वक़्त से (अवगत) करता था। मुत्तला

आप (रज़ि.) की सबसे बड़ी दीनी ख़िदमत तो क़ुरआन पाक का प्रचार-प्रसार है। नए-नए मुसलमानों को क़ुरआन पढ़ने में बड़ी परेशानी होती थी। क्योंकि शामवाले, इराक़वाले, बसरावाले और कूफ़ावाले सबके पढ़ने का अन्दाज़ अलग था। इसीलिए आप (रज़ि.) ने उस क़ुरआन पाक को प्रकाशित कराया जो उस अरबी ज़बान में था जो कि प्यारे नबी (सल्ल.) की ज़बान थी। अगर आप (रज़ि.) ऐसा न करते तो आज क़ुरआन पाक का भी वही हाल होता जो इंजील, तौरात और दूसरी आसमानी किताबों का हुआ।

खूबियाँ

  1. हज़रत उस्मान (रज़ि.) शक्ल व सूरत में नबी करीम (सल्ल.) से बहुत मिलते-जुलते थे।
  2. आप (सल्ल.) बचपन ही से अपने ज़माने की बुरी आदतों से बचे हुए थे।
  3. आप (रज़ि.) अल्लाह और रसूल (सल्ल.) से हया (शर्म) करते थे और फ़रिश्ते आप (रज़ि.) से।
  4. आप (रज़ि.) ने अपने बाल-बच्चों के साथ दो हिजरतें कीं। (i) हब्शा की हिजरत (ii) मदीना की हिजरत।
  5. आप (रज़ि.) दो नूरवाले थे। यानी आपके निकाह में प्यारे नबी (रज़ि.) की दो बेटियाँ रही हैं।
  6. आप (रज़ि.) जैसा दुनिया में कोई दूसरा शख्स नहीं गुज़रा जिसके निकाह में किसी नबी की दो बेटियाँ रही हों।
  7. आप (रज़ि.) हज करने का सबसे बेहतर तरीक़ा जानते थे।
  8. आप (रज़ि.) चौथे मुसलमान थे यानी आपसे पहले सिर्फ तीन ही लोग ईमान लाए थे।
  9. आप (रज़ि.) सहाबा (रज़ि.) में सबसे ज़्यादा मालदार और सनी (दानी) थे।
  10. आप (रजि.) बद्र की जंग में शामिल न हो सके थे मगर आपकी गिनती बद्रवालों में होती है।
  11. आप (रज़ि.) ने अपने मालदार होने पर कभी भी घमण्ड नहीं किया।
  12. इस्लाम लाने से पहले भी आप (रज़ि.) की गिनती मक्का के मालदारों में होती थी।

अच्छी और प्यारी नसीहतें

पढ़िए! देखिए हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने कितनी अच्छी-अच्छी नसीहतें की हैं –

  • फ़र्ज़ का दिल से अदा करना इबादत का लुत्फ़ (मज़ा) बढ़ा देता है।
  • हराम चीज़ों से परहेज़ मुसलमान को पुत्तक़ी (परहेज़गार) बना देता है।
  • अफ़सोस है उस आदमी पर जो दोज़ख़ पर ईमान रखते हुए गुनाह करे।
  • अल्लाह के साथ तिजारत करो तो बहुत नफ़ा (लाभ) होगा।
  •   परहेज़गार वह है जो दूसरों को तो जन्नती समझे और खुद अल्लाह के अज़ाब से  

       काँपता रहे।

  • वह आदमी बरबाद हो गया जिसने उम्र तो लम्बी पाई लेकिन आख़िरत के सफ़र के

       लिए कोई तैयारी नहीं की।

  • जो दुनिया को कैद खाना समझता है, क़ब्र उसके लिए आराम का घर है।
  •  अगर तुम्हारा दिल पाक-साफ़ है तो क़ुरआन मजीद के पढ़ने या सुनने से कभी न

     उकताएगा।

  • बन्दगी इसे कहते हैं कि –

  *   अल्लाह की फ़रमाँबरदारी की जाए।

 

      *   वादा पूरा किया जाए।

       *  जो मिल जाए उसे काफ़ी समझा जाए।

      *  जो न मिल सके उसपर सब्र किया जाए।

  • अगर तू गुनाह ही करना चाहता है तो ऐसी जगह तलाश कर जहाँ अल्लाह न देख

     सके

  • जालिम की तारीफ़ करने से अल्लाह का ग़ज़ब भड़कता है।
  • मुसलमान के ज़लील व ख़्वार होने का सबब उसका दीन से ग़ाफ़िल होना है।
  • अल्लाह की नेमतों का ग़लत इस्तेमाल, नेमतों का इनकार है।
  • गुनाह किसी न किसी तरह दिल को बेचैन रखता है।
  • खुलूस के साथ नेक अमल करने से इबादत में दिल लगता है।
  • बेकार और बेफ़ायदा है:

        *  वह इल्म जिसपर अमल न किया जा सके।

        *  वह हथियार जिसे इस्तेमाल न किया जा सके।

        *  वह माल जो नेक कामों में खर्च न किया जा सके।

        *  वह मसजिद जिसमें नमाज़ न पढ़ी जा सके।

        *   वह नमाज़ जो मसजिद में न पढ़ी जा सके।

देखा आपने! कितनी प्यारी-प्यारी नसीहतें हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने फ़रमाई हैं। अल्लाह हमें उनपर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन!!

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