بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم अल्लाह के नाम पर, जिसका नाम पृथ्वी या आसमान में कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचाता है, और वह सुनने वाला, जानने वाला है

May 16,2022

मानवता उपकारक हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

30 Mar 2020
मानवता उपकारक हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

लेखक- अबू मुहम्मद इमामुद्दीन रामनगरी
प्रकाशक: मधुर सन्देश संगम

 

 

 

अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है।

औरतों पर उपकार

हर व्यक्ति का सबसे पवित्र रिश्ता माँ से होता है। ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के एक कथन के अनुसार पुरुषों पर स्त्रियों को तिगुनी श्रेष्ठता प्राप्त है। एक व्यक्ति ने शदूत से पूछा कि मैं सबसे अधिक किसके साथ भलाई करूँ? आपने फ़रमाया, ‘माँ के साथ, उसने पूछा, ‘फिर किसके साथ?' आपने फ़रमाया, ‘माँ के साथ।' उसने पूछा, फिर किसके साथ? आपने फ़रमाया, ‘माँ के साथ' उसने चौथी बार पूछा, ‘उसके बाद?' आपने फ़रमाया, ‘बाप के साथ।' (तिरमिज़ी)

हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के इस कथन से पता चलता है कि स्त्री को पुरुष पर तिगुनी श्रेष्ठता प्राप्त है। आपका एक कथन है, ‘‘माँ के क़दमों तले जन्नत है।' 

पुरुष का सबसे निकट सम्बन्ध अपनी पत्नी से होता है। पत्नी पति की जीवन साथी होती है इसलिए वह आदर की पात्र होती है। लेकिन पुरुषों ने उसको केवल काम-वासना का साधन बना लिया। वह आदर भी करता था तो सम्मान भाव से नहीं, बल्कि भोग-विलास के भाव से।

संसार के हर देश में, सभ्य-असभ्य हर जाति में बहुविवाह का चलन था। पुरुष जितनी स्त्रियाँ चाहता रख लेता, परन्तु न सबका आदर कर सकता, न सबको सुखी रख सकता। अरब के निवासी दासियों के होते हुए भी आठ-आठ पत्नियाँ रख लेते और जिसको जब चाहते तलाक़ दे देते, झूठा दोष लगाकर मह्र (विवाह का सुनिश्चित स्त्री धन) भी न देते, मरनेवाले पति और पिता के धन एवं जायदाद में औरत का कोई हिस्सा न था। भारत में भी बहुविवाह का चलन था। अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में बहुविवाह की सीमा निश्चित कर दी। चार पत्नियों तक की तो अनुमति दे दी, परन्तु इन कड़ी शर्तों के साथ कि चारों के साथ समान व्यवहार किया जाए। जो इस आदेश का पूरा-पूरा पालन न कर सके, उसको एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार नहीं। अल्लाह तआला ने मरनेवाले पति और पिता के धन-जायदाद में स्त्रियों का हिस्सा भी निश्चित कर दिया जो क़ुरआन में सविस्तार उल्लिखित है और इस्लामी क़ानून का अनिवार्य अंश है। इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने उपदेश में पत्नियों के साथ अच्छा व्यवहार करने की शिक्षा दी है। उन्होंने कहा-
‘‘तुममें अच्छा व्यक्ति वह है जो अपनी पत्नी के सम्बन्ध में अच्छा है और मैं तुममे अपनी पत्नियों के बारें में सबसे अच्छा व्यक्ति हूँ।''

अरब के लोग बेटियों की हत्या कर देते थे। भारत में भी यही प्रथा थी। क़ुरआन ने लोगों को इस दुष्कर्म से मना किया। महा ईशदूत ने बेटियों से स्नेह की शिक्षा ही नहीं दी, बल्कि स्नेह के साथ सम्मान का आदर्श भी उपस्थित किया। बेटियों को पाल-पोसकर विवाह कर फल जन्नत में अपने निकट स्थान, बताया। स्त्रियों को बहुत सम्मानित किया। माता की सेवा का फल भी जन्नत और बेटी से स्नेह और लालन-पालन का फल भी जन्नत बताया गया। बहन को भी बेटी के बराबर ठहराया गया। पत्नी को दाम्पत्य जीवन, घराने व समाज में आदरणीय, पवित्र, सुखमय व सुरक्षित स्थान प्रदान किया गया।

दासों पर उपकार

महाईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के आने से पहले संसार भर में दास प्रथा प्रचलित थी। भारत भी इस मामले में किसी से पीछे न था। दास मनुष्य होते हुए भी पशु-समान थे। दासों का न अपने ऊपर कोई अधिकार था, न अपनी पत्नी और न अपनी संतान ही पर। वे पशु के के समान ही ख़रीदे और बेचे जाते थे। पशु के समान ही उनसे काम लिया जाता था, मारा और पीटा जाता था। उनका अपना कुछ न था, स्वामी के दिए हुए स्थान में रहते थे, स्वामी का दिया हुआ कच्चा-पक्का, रूखा-सूखा भोजन खाते थे। हर तरह का अत्याचार चुप-चाप सहने के लिए मजबूर होते थे।

भारत धार्मिक देश था। यहाँ धर्मात्मा थे, दानशील थे, साधु, संत और महात्मा भी थे। परन्तु दास इनकी दया और सहानुभूति से वंचित थे। हालात से मजबूर होकर कहना पड़ता है कि उस समय धर्म भी दासों के सम्बन्ध में ख़ामोश था। मनुस्मृति में भी दासों के विषय में दया, सहानुभूति के दो शब्द न थे, वेदों तथा उपनिषदों में भी दासों को इस अवस्था से निकालने के लिए कोई रास्ता न था। दास भी यह मानकर कि वे पैदा ही इसी लिए हुए हैं, अपनी हालत पर संतोष करते हुए लोगों की सेवा में ही अपना सम्पूर्ण जीवन लगा देते। इस विषय में श्री ज्ञानेन्द्रनाथ श्रीवास्तव दैनिक ‘अमृत प्रभात' इलाहाबाद 23 दिसम्बर, 1979 के अंक में लिखते हैं- 

‘‘रोमन साम्राज्य में गुलामों का व्यापार होता था। इस साम्राज्य के पतन के बाद भी यह बर्बर प्रथा जारी रही। अपने देश के इतिहास का अध्ययन करनेवाले अकसर इस तथ्य को नज़रअंदाज कर देते हैं कि यहाँ भी दास-प्रथा लम्बे समय तक मौजूद रही (आज भी है-बँधुआ मज़दूरों, घरेलू नौकरों के रूप में--लेखक)। वे मनुष्य, जो किसी दूसरे की सम्पत्ति थे, जिनका अपना कहने को कुछ नहीं था, यहाँ तक कि जिनका अपने शरीर पर भी अधिकार नहीं था, उन्हें दास कहा जाता था। रोम में रोमन क्लासिकल लॉ और भारत में कौटिल्य, मनु और नारद जैसे व्यवस्थाकारों ने अपने ग्रंथों में दासता-विषयक नियम बनाकर इस प्रथा को मान्यता दी थी। इस दलित वर्ग के विषय में पर्याप्त जानकारी हमें प्राचीन भारतीय वाड्मय से प्राप्त होती है। वेदों में दास शब्द अधिकांशत: आर्यो के विरोधियों के लिए प्रयुक्त हुआ है, जिन्हें वे ‘अनास' (नासा रहित अर्थात् चिपटी नाकवाले), ‘मृधवाक्' (अस्पष्ट वाणीवाले) और ‘शिश्नदेवा:' आदि शब्दों से सम्बोधित करते थे। संभवत: आर्यों ने इन्हें युद्ध में परास्त करने के बाद अपना दास बना लिया होगा। दास शब्द का प्रयोग यद्यपि वैदिक साहित्य में बहुत हुआ है, पर इससे उनके जीवन और सामाजिक स्तर पर विशेष प्रकाश नहीं पड़ता। छठी शताब्दी ई0 पू0 में बुद्ध की वाणी पालि भाषा में मुखरित हुई। उनके दर्शन को जन-जन तक पहॅँचाने के लिए पालि साहित्य विकसित हुआ। पालि साहित्य और जातक कथाएँ, जो कि तत्कालीन समाज की जीवित प्रतिबिम्ब हैं, दासों के सुख-दुख की कहानी भी कहती है। इन ग्रन्थों से पता चलता है कि दास एक निरीह प्राणी था। जिसे सुख की शायद कोई कल्पना भी न थी। भय, असुरक्षा और वास उसके स्थाई भाव थे। त्रिपिटक ग्रन्थों में कहीं भी दास की सुरक्षा के लिए क़ानूनों का उल्लेख नहीं मिलता और न ऐसे नियम ही जो कि स्वामी के प्रति असीमित अधिकारों को सीमित कर सकें। दास-दासियों की सारी ख़ुशी उनके स्वामी की कृपा पर निर्भर थी। स्वामी द्वारा दास को प्रताड़ना देना बड़ी साधारण बात थी। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जब अकारण ही स्वामी द्वारा दास की हत्या कर दी गर्इ या उसके नाक-कान काट लिए गए और स्वामी को कोई दण्ड नहीं मिला। ‘विमानवक्ष' मे एक ऐसा ही उदाहरण मिलता है, जिसमें स्वामी ने क्रोध के क्षणिक आवेश मे आकर खेत की चौकीदारी करनेवाले अपने दास की हत्या कर दी और उसके कुटुम्बजन चुपचाप रोते रहे। 

दासियों की स्थिति और भी दयनीय थी। यदि वे सुन्दर हुईं तो उन्हें स्वामी की वासना का शिकार होना पड़ता था। धम्मपाद में ऐसी ही एक दासी का उदाहरण है। स्वामी के साथ सोने के अपराध में गृहस्वामिनी ने उसके नाक-कान काट लिए।

दास-दासियों को मज़दूरी करके, धन कमाकर अपने स्वामी को देना पड़ता था। ऐसा न करने पर उन्हें यातनाएँ सहनी पड़ती थीं। ‘नामसिद्धि' जातक में धनपाली नामक दासी के साथ ऐसा ही हुआ था, जिसे उसके मालिक काम करके मज़दूरी न देने के कारण दरवाज़े पर बिठाकर रस्सी से पीट रहे थे। 

दासों के प्रति कठोरता उन्हें नियंत्रित करने का साधन मानी गई थी। उन्हें सभी अधिकारों से वंचित कर दिया गया था। वैधानिक दृष्टि से दास मनुष्य न होकर एक वस्तु था। वह अपनी इच्छा के अनुसार कुछ नहीं कर सकता था। उसकी प्रत्येक छोटी-बड़ी वस्तु उसके स्वामी की होती थी और वह स्वामी की चल सम्पत्ति का अंग था। स्वयं सम्पत्ति का अंग होने पर दास के लिए निजी सम्पत्ति की कल्पना करना ही असंभव था। हाँ ‘कट्टहारि जातक' में कौशल नरेश के पुत्र विद्डम, जिसकी मां दासी कन्या थी और इसी कारण वह अपने अधिकार से वंचित हो रहा था, के लिए उत्तराधिकारी की सिफ़ारिश की गई है।

दासों की कई कोटियाँ होती थीं। यह श्रेणी-निर्धारण बहुत कुछ इसपर निर्भर करता था कि वे किस प्रकार प्राप्त किए गए हैं। दासी के गर्भ से जन्म लेनेवाली संतान भी दास होती थी और उस पर उसी स्वामी का अधिकार होता था। दास-दासी उपहार में दिए जाते थे। जुए में हारे व्यक्ति को भी दास लिया जाता था। युद्ध-बंदी को दास बनाना तो वैदिक समय से ही प्रचलित था। दासों की एक प्रमुख श्रेणी थी-क्रीत दास। जातक कथाओं में अक्सर ‘सौ मुद्राओं' में ख़रीदे हुए दासों का उल्लेख है। लगता है उस समय दास का यह सामान्य मूल्य था।''

महाईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दास-दासियों का सम्मान ही नहीं बढ़ाया, बल्कि दास प्रथा को समाप्त भी कर दिया। इस सम्बन्ध में विख्यात अंग्रेज़ विद्वान मिस्टर बास्वर्थ अपनी किताब ‘‘मुहम्मद एंड मुहम्मडनिज़्म'' में लिखते हैं--

‘‘अब हम देखना चाहते हैं कि इस्लाम ने दासों के विषय में क्या किया। इसमें संदेह नहीं कि इस बारे में भी, न केवल उन्नति की ओर प्रगति की गई, बल्कि स्त्रियों के सम्बन्ध में जो क़ानून बनाए गए उनके मुक़ाबले में दासों के बारे में ज़्यादा तरक़्क़ी की गई। निस्संदेह हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दासता को बिलकुल मिटा नहीं दिया, क्योंकि देश की हालत को देखते हुए ऐसा करना न उचित था और न सम्भव। लेकिन उन्होंने ग़ुलामों को आज़ाद कराने पर लोगों को उभारा और इस संबंध में क़ानून बनाया गया और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई मुक्त ग़ुलाम इसलिए नीच और हीन न समझा जाए कि उसने मेहनत और परिश्रम से एक सत्य और सम्मानपूर्ण जीवन व्यतीत किया है। और उनके बारे में जो ग़ुलामी की हालत में है, यह हुक्म दिया कि उनके साथ दया और नम्रता का व्यवहार किया जाए। उन्होंने अपने हज के अंतिम भाषण में, जो अपनी परलोक यात्रा से कुछ ही दिन पहले मक्का में दिया था, कहा था- ‘‘मुसलमानो ! तुम अपने ग़ुलामों को वैसा ही खाना खिलाओ जैसा तुम ख़ुद खाते हो, और वैसा ही कपड़ा पहनाओ जैसा तुम ख़ुद पहनते हो, क्योंकि वे भी ख़ुदा के बन्दे हैं। उनको कष्ट देना उचित नहीं,'' इस्लाम के इस क़ानून ने तो ग़ुलाम का अर्थ ही बदल दिया।

जो लोग युद्ध में बन्दी होकर आए हों और अपनी स्वतंत्रता खो बैठे हों। ऐसे बन्दी अगर मुसलमान हो जाते तो उनके सम्बन्ध में यह हुक्म था कि आज़ाद कर दिए जाएँ। लेकिन अगर वे अपने धर्म पर क़ायम रहते तो भी मुसलमानों को उनके लिए इस्लाम के पैग़म्बर का हुक्म यह था कि तुम उन्हें अपना भाई समझो। उन्होंने फ़रमाया- ‘‘जो मालिक अपने ग़ुलाम के साथ मेहरबानी करे वह ख़ुदा को पसंद होगा और जो अपने अधिकार को बुरे तौर पर काम में लाए यानी ग़ुलाम को सताएगा तो वह स्वर्ग में प्रवेश न पाएगा।'' एक मुसलमान ने उनसे (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से) सवाल किया कि मेरा ग़ुलाम जो मुझे नाराज़ करे तो उसको मुझे कितनी बार माफ़ करना चाहिए। हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जवाब दिया, ‘‘एक दिन में सत्तर बार।'' आपने क़ैदी औरतों को पत्नी बनाना उचित ठहराया।

लेकिन वह औरत जिससे बिना विवाह समागम हो जाए उसके बारे में यह हुक्म दिया कि वह संतान से अलग न की जाए, न फिर वह बेची जाए, बल्कि मालिक के मर जाने के बाद वह आज़ाद समझी जाए'' जो मुसलमान मालिक अपने दास पर नाराज़ हो उसपर अनिवार्य है कि वह उसको तुरन्त आज़ाद कर दे। मालिक कितना ही सम्पन्न क्यों न हो अदालत को अनुमति थी कि उसको ग़ुलाम पर दया करने के लिए मजबूर किया जाए। सारी मानव जाति का ईश्वर की दृष्टि में समान होना एक ऐसा सिद्धान्त था जिसपर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने बार-बार ज़ोर दिया है। इस तरह चूँकि यह सिद्धान्त ग़ुलामी के रिश्ते एवं जातपात के अन्तर को बिलकुल मिटा देता था इसलिए उसने ग़ुलामी की हीनता को भी मिटा दिया''।

ऊपर इस्लाम के जिन आदेशों का वर्णन किया गया है उनमें दो आदेशों को और भी शामिल करना चाहिए था। पहला, हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया-

‘‘ग़ुलामों से ऐसे काम न लिए जाएँ जो उन्हें थका दें और यदि उनको ऐसा कठिन काम दिया जाए जो उनको थका दे तो उसमें स्वंय उनकी सहायता की जाए।'' (सहीह बुख़ारी)

‘‘कोई ‘मेरा ग़ुलाम' और ‘मेरी लौंडी' न कहे। तुम सब ख़ुदा के दास हो और तुम्हारी सब औरतें ख़ुदा की दासियाँ हैं। यूँ कहना चाहिए कि मेरा बच्चा, मेरी बच्ची।'' (सहीह मुसलिम)

सारांश यह है कि महा ईशदूत ने गुलामों और लौंडियों के कष्ट ही को कम या समाप्त नहीं किया, बल्कि उनको उचित सम्मान दिलाने के लिए उनके सम्बन्ध में ‘ग़ुलाम' या ‘लौंडी' शब्द का प्रयोग ही निषिद्ध ठहरा दिया। दासी (ग़ुलाम औरत) से पैदा होनेवाली सन्तान को क़ानूनन ‘‘आज़ाद'' क़रार दिया। दासों-दासियों को आज़ाद करने व कराने को प्रोत्साहित किया। परिणाम-स्वरूप इस्लामी समाज में आगे चलकर यह शोषित वर्ग विलुप्त हो गया और बड़े-बड़े ज्ञानी, विद्धान व शासक इस वर्ग की नस्ल से पैदा हुए।

स्रोत

 

 

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