بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم अल्लाह के नाम पर, जिसका नाम पृथ्वी या आसमान में कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचाता है, और वह सुनने वाला, जानने वाला है

November 30,2022

मुहम्मद (स॰)

रहमत ही रहमत

इस्लाम एक कामिल दीन (पूर्णधर्म) है, जिसने सारे इनसानों को आपस में मिलकर रहने, सामाजिक और सामूहिक रूप से ज़िन्दगी गुज़ारने का एक मुकम्मल निज़ाम दिया है। इस्लाम के इस निज़ाम और दायरे में आनेवाले सामाजिक काम, व्यक्तिगत कामों के मुक़ाबले में बहुत ज़्यादा हैं। एक अन्दाज़े के मुताबिक़ इस्लाम में सामाजिक काम और आदेश तीन चौथाई और व्यक्तिगत काम लगभग एक चौथाई हैं। वास्तविक जनसेवा यह है कि इनसान अल्लाह के बन्दों के साथ अच्छे अख़लाक़ से पेश आए और ख़ुदा के बन्दों के मामले में अपनी ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों को पूरा करे। इस्लाम का मक़सद हर लिहाज़ से इनसानों की भलाई चाहना, उनका हक़ अदा करना और दीन-दुनिया की बेहतरी का बन्दोबस्त करना है। इसे क़ुरआन और हदीस में मख़लूक़ (सृष्टि) से मुहब्बत और मेहरबानी के नाम से बयान किया गया है।

हमारे हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)

इरफ़ान ख़लीली “बहुत दिनों से मेरी यह ख़्वाहिश थी कि सीरत की एक ऐसी किताब लिखूँ, जो बच्चों और कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए मुफ़ीद साबित हो, और जिसके द्वारा हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पाक ज़िन्दगी का एक ख़ाका उनके दिलों में बैठ जाय और ज़हनी तौर पर उन्हें कोई बार भी महसूस न हो। इस बात को सामने रखते हुए सीरत की यह छोटी सी पुस्तिका तैयार की गयी, जिसमें ये ख़ुसूसियतें पायी जाती हैं— (1) ज़ुबान सादा और सरल इस्तेमाल की गयी है। (2) अन्दाज़ ऐसा इस्तेमाल किया गया है, जिससे बच्चों में दिलचस्पी पैदा हो। (3) ग़ैर-ज़रूरी तफ़्सील से बचते हुए हर विषय को एक पेज में ख़त्म करने की कोशिश की गयी है। (4) ऐसे वाक्यों को बयान नहीं किया गया है, जो बच्चों के लिए, उकताहट का सबब बनें। (5) सबसे अहम ख़ुसूसियत यह है कि प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पाक ज़िन्दगी से लगाव पैदा करने की कोशिश की गयी है।”

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का व्यवहार अपने शत्रुओं के साथ

“(ऐ नबी!) हमने तुम्हें सारे संसार के लिए मात्र दयालुता (रहमत) बनाकर भेजा है।" (क़ुरआन, 21:107) क़ुरआन की यह आयत बताती है कि हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पैग़म्बरी के पद पर नियुक्त करने का वास्तविक उद्देश्य यह रहा है कि संसार में ईश्वर की दया और अनुकम्पा पूर्ण रूप से प्रदर्शित हो और ऐसा न हो कि मानवजाति दुनिया की हर चीज़ से तो फ़ायदा उठाए, किन्तु ईश्वर की दया और उसकी विशेष अनुकम्पा से वंचित रह जाए।

दुनिया के तमाम इनसानों के लिए हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का सन्देश

सब से पहली चीज़, जो हमें हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के आह्वान में दीख पड़ती है, वह यह है कि आप रंग व नस्ल और भाषा व देश के सारे भेद-भावों को नज़रंदाज़ करके इंसान को इंसान की हैसियत से सम्बोधित करते हैं और कुछ सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं, जो तमाम इन्सानों की भलाई के लिए हैं।

जगत्-गुरु (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

अबू-ख़ालिद जगत-गुरु (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) दरअस्ल 'हादी-ए-आज़म (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)' (उर्दू) का नया हिन्दी तर्जमा है। 'हादी-ए-आज़म' किताब जनाब अबू-ख़ालिद साहब (एम॰ ए॰) ने ख़ास तौर पर बच्चों के लिए लिखी थी, जो बहुत ज़्यादा पसंद की गई और बहुत-से स्कूलों और मदरसों में यह किताब पढ़ाई जा रही है।

जायसी के दोहे और इस्लाम के अन्तिम पैगंबर मुहम्मद (सल्ल०)

सोरठा : साईं केरा नाँव, हिया पूर, काया भरी । मुहम्मद रहा न ठाँव, दूसर कोइ न समाइ अब ॥ अर्थ :- साईं (मुहम्मद (सल्ल०)) के नाम से तन एवं हृदय पूर्ण रूप से भर चुका है, मुहम्मद (सल्ल०) के बिना चैन नहीं है, अब हृदय में दूसरा कोई समा भी नहीं सकता ।

हज़रत मुहम्मद (सल्ल.): एक महान समाज-सुधारक

“और जब उनसे कहा जाता है कि अल्लाह ने जो उतारा है उसका अनुसरण करो, तो कहते हैं कि हमने अपने बाप-दादा को जिस तरीक़े पर पाया है, वही हमारे लिए काफ़ी है। क्या उनके बाप-दादा न कुछ जानते हों और न सीधे रास्ते पर हों तब भी वे उन्हीं का अनुसरण करेंगे?” (क़ुरआन - 2:170)

हज़रत मुहम्मद (स०): जीवन और सन्देश

"नाप-तौल में कमी न करो, नाप कर दो तो पूरा-पूरा दो, वज़्न करो तो तराज़ू ठीक रखो (मामलों में) यह तरीक़ा उत्तम और परिणाम की दृष्टि से बहुत अच्छा है। जिस बात का तुम्हें ज्ञान नहीं है उसके पीछे न पड़ो, याद रखो कान, नाक, आंख, दिल हर एक के बारे में अल्लाह के यहाँ पूछा जाएगा। धरती में इतरा कर न चलो, तुम न धरती को फाड़ सकते हो, और न पहाड़ की ऊँचाई को पहुँच सकते हो। ये बातें अल्लाह की दृष्टि में अप्रिय हैं।” (क़ुरआन, 17:35-38)

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) का रवैया अपने दुश्मनों के साथ

आज जब हम पैग़म्बरों की जीवनी तथा उनकी शिक्षाओं का अध्ययन करते हैं, तो हमें बड़ा आश्चर्य होता है कि इन मेहरबान पैग़म्बरों का विरोध लोगों ने क्यों किया? सच्ची बातों पर आधारित उनकी शिक्षाओं को देशवासियों ने क्यों न स्वीकार कर लिया? हर एक पैग़म्बर का उनके अपने काल में विरोध किया गया, उनका उपहास किया गया, हर प्रकार के अत्याचार उनपर किए गए ।

हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) : एक संक्षिप्त परिचय

डॉक्टर मुहम्मद अहमद हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बहादुर होने के साथ बहुत ही नरम दिल थे। आप कमज़ोर लोगों के साथ ही बेज़ुबान जानवरों तक के बारे में नरमी का हुक्म फ़रमाते थे। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की जीवन व शिक्षा का सार और उद्देश्य यह है कि इन्सान अपने एकमात्र स्रष्टा और पालनहार के बताये हुए मार्ग पर चलकर ही ज़िन्दगी गुज़ारे ताकि वह इस लोक और परलोक में सफलता प्राप्त कर सके।