بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم अल्लाह के नाम पर, जिसका नाम पृथ्वी या आसमान में कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचाता है, और वह सुनने वाला, जानने वाला है

August 15,2022

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रहमत ही रहमत

रहमत ही रहमत

इस्लाम एक कामिल दीन (पूर्णधर्म) है, जिसने सारे इनसानों को आपस में मिलकर रहने, सामाजिक और सामूहिक रूप से ज़िन्दगी गुज़ारने का एक मुकम्मल निज़ाम दिया है। इस्लाम के इस निज़ाम और दायरे में आनेवाले सामाजिक काम, व्यक्तिगत कामों के मुक़ाबले में बहुत ज़्यादा हैं। एक अन्दाज़े के मुताबिक़ इस्लाम में सामाजिक काम और आदेश तीन चौथाई और व्यक्तिगत काम लगभग एक चौथाई हैं। वास्तविक जनसेवा यह है कि इनसान अल्लाह के बन्दों के साथ अच्छे अख़लाक़ से पेश आए और ख़ुदा के बन्दों के मामले में अपनी ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों को पूरा करे। इस्लाम का मक़सद हर लिहाज़ से इनसानों की भलाई चाहना, उनका हक़ अदा करना और दीन-दुनिया की बेहतरी का बन्दोबस्त करना है। इसे क़ुरआन और हदीस में मख़लूक़ (सृष्टि) से मुहब्बत और मेहरबानी के नाम से बयान किया गया है।

हमारे हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)

हमारे हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)

इरफ़ान ख़लीली “बहुत दिनों से मेरी यह ख़्वाहिश थी कि सीरत की एक ऐसी किताब लिखूँ, जो बच्चों और कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए मुफ़ीद साबित हो, और जिसके द्वारा हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पाक ज़िन्दगी का एक ख़ाका उनके दिलों में बैठ जाय और ज़हनी तौर पर उन्हें कोई बार भी महसूस न हो। इस बात को सामने रखते हुए सीरत की यह छोटी सी पुस्तिका तैयार की गयी, जिसमें ये ख़ुसूसियतें पायी जाती हैं— (1) ज़ुबान सादा और सरल इस्तेमाल की गयी है। (2) अन्दाज़ ऐसा इस्तेमाल किया गया है, जिससे बच्चों में दिलचस्पी पैदा हो। (3) ग़ैर-ज़रूरी तफ़्सील से बचते हुए हर विषय को एक पेज में ख़त्म करने की कोशिश की गयी है। (4) ऐसे वाक्यों को बयान नहीं किया गया है, जो बच्चों के लिए, उकताहट का सबब बनें। (5) सबसे अहम ख़ुसूसियत यह है कि प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पाक ज़िन्दगी से लगाव पैदा करने की कोशिश की गयी है।”

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का व्यवहार अपने शत्रुओं के साथ

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का व्यवहार अपने शत्रुओं के साथ

“(ऐ नबी!) हमने तुम्हें सारे संसार के लिए मात्र दयालुता (रहमत) बनाकर भेजा है।" (क़ुरआन, 21:107) क़ुरआन की यह आयत बताती है कि हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पैग़म्बरी के पद पर नियुक्त करने का वास्तविक उद्देश्य यह रहा है कि संसार में ईश्वर की दया और अनुकम्पा पूर्ण रूप से प्रदर्शित हो और ऐसा न हो कि मानवजाति दुनिया की हर चीज़ से तो फ़ायदा उठाए, किन्तु ईश्वर की दया और उसकी विशेष अनुकम्पा से वंचित रह जाए।

दुनिया के तमाम इनसानों के लिए हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का सन्देश

दुनिया के तमाम इनसानों के लिए हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का सन्देश

सब से पहली चीज़, जो हमें हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के आह्वान में दीख पड़ती है, वह यह है कि आप रंग व नस्ल और भाषा व देश के सारे भेद-भावों को नज़रंदाज़ करके इंसान को इंसान की हैसियत से सम्बोधित करते हैं और कुछ सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं, जो तमाम इन्सानों की भलाई के लिए हैं।

हदीस लेक्चर 5: इल्मे-इस्नाद और इल्मे-रिजाल

हदीस लेक्चर 5: इल्मे-इस्नाद और इल्मे-रिजाल

डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी [ये ख़ुतबात (अभिभाषण) जिनकी संख्या 12 है, इस में इल्मे-हदीस (हदीस-ज्ञान) के विभिन्न पहुलुओं पर चर्चा की गई है । इसमें इल्मे-हदीस के फ़न्नी मबाहिस (कला पक्ष) पर भी चर्चा है । इलमे-हदीस के इतिहास पर भी चर्चा है और मुहद्दिसीन (हदीस के ज्ञाताओं) ने हदीसों को इकट्ठा करने, जुटाने और उनका अध्ययन तथा व्याख्या करने में जो सेवाकार्य किया है, उनका भी संक्षेप में आकलन किया गया है।]

उम्मुल मोमिनीन: हज़रत आइशा सिद्दीक़ा (रज़ियल्लाहु अन्हा)

उम्मुल मोमिनीन: हज़रत आइशा सिद्दीक़ा (रज़ियल्लाहु अन्हा)

माइल ख़ैराबादी हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) इस्लाम के सबसे पहले ख़लीफ़ा हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) की छोटी बेटी थीं। इस्लामी इतिहास में जिस तरह हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) सबसे ज़्यादा मशहूर हैं उसी तरह हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) मुसलमान औरतों में सबसे ज़्यादा नुमायाँ हैं, और हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का यह परिचय भी कितना शानदार है कि वे अल्लाह के आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ललाहु अलैहि वसल्लम) की प्यारी बीवी थीं और यह कि अल्लाह तआला ने नबी (सल्ललाहु अलैहि वसल्लम) की बीवियों को उम्महातुल मोमिनीन (मुसलमानों की माएँ) कहा है। इस इरशाद के मुताबिक़ हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) उम्मुल मोमिनीन (मुसलमानों की माँ) हैं।

हदीस लेक्चर 4: इल्मे-रिवायत और हदीस के प्रकार

हदीस लेक्चर 4: इल्मे-रिवायत और हदीस के प्रकार

डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी [ये ख़ुतबात (अभिभाषण) जिनकी संख्या 12 है, इस में इल्मे-हदीस (हदीस-ज्ञान) के विभिन्न पहुलुओं पर चर्चा की गई है । इसमें इल्मे-हदीस के फ़न्नी मबाहिस (कला पक्ष) पर भी चर्चा है । इलमे-हदीस के इतिहास पर भी चर्चा है और मुहद्दिसीन (हदीस के ज्ञाताओं) ने हदीसों को इकट्ठा करने, जुटाने और उनका अध्ययन तथा व्याख्या करने में जो सेवाकार्य किया है, उनका भी संक्षेप में आकलन किया गया है।]

क्या पैग़म्बर की फ़रमाँबरदारी ज़रूरी नहीं?

क्या पैग़म्बर की फ़रमाँबरदारी ज़रूरी नहीं?

मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी यह किताब अस्ल में मौलाना सैयद अबुल-आला मौदूदी (1903-1979 ई.) के दो लेखों (इत्तिबाअ् व इताअते-रसूल' और 'रिसालत और उसके अह्काम) का हिन्दी तर्जमा है। ये लेख मौलाना के लेखों के उर्दू संग्रह तफ़हीमात, हिस्सा-1 में प्रकाशित हुए हैं। ये लेख उन्होंने सन् 1934 और 1935 ई. में उर्दू पत्रिका 'तर्जुमानुल-क़ुरआन' में कुछ लोगों के सवाल के जवाब में लिखे थे। सवाल पैग़म्बर की फ़रमाँबरदारी करने के बारे में था। मौलाना मौदूदी (रहमतुल्लाहि अलैह) ने बड़े ही प्रभावकारी ढंग से दलीलों के साथ उनका जवाब दिया। आज भी इस तरह के सवाल बहुत से लोगों के दिमाग़ों में आते हैं या दूसरे लोगों के ज़रिए पैदा किए जाते हैं और लोग उन सवालों की ज़ाहिरी शक्ल को देखकर मुतास्सिर हो जाते हैं कि अगर कोई आदमी ख़ुदा को एक मानता है और कुछ अच्छे काम भी करता है तो क्या उसके लिए पैग़म्बर पर ईमान लाना और उसकी फ़रमाँबरदारी ज़रूरी है? और अगर ज़रूरी है तो क्यों? इसलिए ज़रूरत महसूस की गई कि ऐसे क़ीमती लेखों का हिन्दी में तर्जमा प्रकाशित किया जाए।

हमारे रसूले-पाक (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

हमारे रसूले-पाक (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

तालिब हाशिमी मेरे दिल में भी बहुत दिनों से ख़ाहिश थी कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की एक ऐसी सीरत (जीवनी) लिखूँ— मेरे दिल में भी बहुत दिनों से ख़ाहिश थी कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की एक ऐसी सीरत (जीवनी) लिखूँ— 1. जो मुख़्तसर हो लेकिन उसमें कोई ज़रूरी बात न छूटे। 2. जिसमें जंचे-तुले हालात और आख़िरी हद तक सच्चे वाक़िआत दर्ज हों। 3. जिसकी ज़बान इतनी आसान और सुलझी हुई हो कि उसको छोटी उम्र के लड़के-लड़कियाँ और कम पढ़े-लिखे लोग भी आसानी से समझ सकें। 4. जो स्कूलों और मदरसों के कोर्स में शामिल की जा सके। 5. जिसकी रौशनी में माँ-बाप और उस्ताद (शिक्षक) अपने बच्चों और शागिर्दों को नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पाक ज़िन्दगी के वाक़िआत को आसानी से याद करा सकें। 6. जिसमें नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बेहतरीन अख़लाक़ के अलग-अलग पहलुओं को दिल में उतर जानेवाले तरीक़े से ज़िक्र किया गया हो।

प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कैसे थे?

प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कैसे थे?

इरफ़ान ख़लीली नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ज़िन्दगी के गुलदस्ते का हर फूल बेमिसाल, हर एक की ख़ुशबू मेरे दिल के दामन को अपनी ओर खींच रही थी। मैं अजीब कशमकश में पड़ा हुआ था। न छोड़ते बनता था, न पकड़ते। मेरे अल्लाह ने मेरी मदद की। ज़ेहन में एक ख़याल उभरा— "क्यों न नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ज़िन्दगी के उन वाक़िआत को जमा कर दूँ जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से सीधा ताल्लुक़ रखते हों।" इस किताब के पढ़नेवालों से गुज़ारिश है कि इसे ग़ौर से पढ़ें और इस की बातों को अपनी ज़िन्दगियों में समोने की कोशिश करें।