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ईशग्रंथ कु़रआन में अनाथों, मुहताजों, नातेदारों आदि से संबंधित शिक्षाएं

क़ुरआन, चूंकि सर्वजगत के रचयिता और पालनहार की वाणी है, इसलिए इसमें समस्त मानवजाति के कल्याण और भलाई की बात की गई है और उसके लिए नियम दिए गए हैं। इसमें मनुष्यों को विभन्न वर्गों, क्षेत्रों, जातियों, नस्लों और रंगों में बांटकर उनमें भेदभाव नहीं किया गया है। हर तरह के भेदभाव से ऊपर उठकर हरेक को समान अधिकार दिए गए हैं साथ ही हरेक को कुछ दायित्वों के पालन करने के आदेश भी दिए गए हैं। संसार में कमज़ोर वर्गों का हमेशा शोषण किया जाता रहा है, इस लिए क़ुरआन ने कमज़ोर और वंचित वर्गों के अधिकारों पर बहुत ज़ोर दिया है और उन्हें समानता का अधिकार देने की ताकीद की है। इस लेख में क़ुरआन की ऐसी ही शिक्षाओं का उल्लेख किया जा रहा है।

अन्तिम ऋषि

इन्सान को ज़िन्दगी जीने के लिए ज्ञान और जानकारी की ज़रूरत होती है। उसका बडा हिस्सा उसकी पांच ज्ञानेन्द्रियों - आंख, कान, नाक, जीभ, और त्वचा के माध्यम से उसे हासिल हो जाता है। इसके साथ ही ईश्वर ने उसे बुद्धि, विवेक और चेतना की शक्ति भी दी है जिसके द्वारा वह उचित या अनुचित, लाभ या हानि को परखता है। बात ज्ञानेंद्रियों की हो या बुद्धि-विवेक की सब जानते हैं कि ये मनुष्य ने अपनी कोशिश, मेहनत, सामर्थ्य या इच्छा से प्राप्त नहीं किया है, बल्कि ये ईश्वर द्वारा प्रदान किये गए हैं। दूसरी ओर यह भी सच्चाई है कि केवल पांच ज्ञानेन्द्रियों और बुद्धि के सहारे ही जीवन के सारे फ़ैसले नहीं किए जा सकते। केवल इन आधारों पर किए फैसले कभी बहुत ग़लत, बड़े हानिकारक और घातक भी हो सकते हैं। अर्थात जीने के लिए उपरोक्त साधनों के अतिरिक्त भी किसी साधन से ज्ञान लेने की आवश्यकता है। ज्ञानेन्द्रियों और बुद्धि-विवेक की पहुंच से आगे का ज्ञान मनुष्य तक पहुंचाने के लिए ईश्वर ने मनुष्यों में से ही कुछ को चुन कर अपना दूत, सन्देष्टा, प्रेषित, रसूल, नबी, पैग़म्बर या Prophet बनाया और इनके माध्यम से मनुष्यों को वह ज्ञान दिया, जो बहुत महत्वपूर्ण हैं। ईशदूतों का यह सिलसिला लम्बे समय तक चलता रहा। फिर जब दुनियावालों तक पर्याप्त ज्ञान पहुंच गया और ज्ञान को सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी हो गई तो ईश्वर ने अंतिम रसूल हज़रत मुहम्मद पर यह सिलसिला बंद कर दिया।